Category: आपके आलेख

  • अजीब सी लड़कियां

    अजीब सी लड़कियां

    Mukesh Kumar Sinha[divider style=’full’]

    वो अजीब लड़की
    सिगरेट पीते हुए साँसे तेज अन्दर लेती थी
    चिहुँक कर आँखे बाहर आने लगती हैं पर खुद को संभालते हुए,
    खूब सारा धुंआ
    गोल छल्ले में बना कर उड़ा देती है !

    ठुमक कर कहती है
    देखो कैसे मैंने उसे उड़ा दिया धुंए में, बेचारा
    न मेरा रहा, न जिंदगी रही उसकी !

    फिर, नजरें बचा कर भीगती आँखों से कह देती
    उफ़, हिचकी आयी न,
    अन्दर तक चला गया धुंआ !
    अजीब ही है वो अजीब लड़की !

    वही अजीब लड़की, गियरवाली साइकिल को चलाते हुए
    फर्राटेदार उडाती है, और ठोक देती है
    मर्सिडीज का बोनट
    मुस्काते हुए कहती है सहेली से
    गलती से आँख भींचते हुए मैंने आगे देखा
    तो मुझे लगा, वही बैठा है उसमें !

    तभी तो जान से मारने का मन हुआ उसको
    सायकिल से मर्सिडीज का क़त्ल !
    अजीब लड़कियां ऐसे ही तो मारती हैं किसीको !
    है न !

    प्यार में पागल हो कर
    फिर मरने के बदले मारने का तरीका बताती हैं
    अजीब सी लड़कियां ….. !
    जिंदगी जीना जानती हैं
    शायद ये अजीब सी लड़कियां !

    अपने पहले ब्रेकअप के बाद
    दुसरे वाले बॉयफ्रेंड के उँगलियों को
    अपने मध्यमा और तर्जनी में दबाये
    खिलखिलाते हुए
    उसके मर्दानेपन को ढूंढते हुए कह उठती है
    यार उस जैसा नहीं तू !

    खूब सक्सेस का झंडा गाडती हैं,
    सीरियसनेस ऐसा कि भुल जाती है
    मम्मा पापा तक को
    पर अकेलेपन में चुपके से बिलख कर रोती हैं
    और अगर कोई सामने दिख जाए
    तो उसके आँखों में आँखे डाल
    कह उठती हैं, देखना तो कुछ चला गया है आँखों में
    ऐसी तो होती है ये अजीब सी लड़कियां !

    अजीब सी जिंदगी के
    अजीब अजीब पन्नों को
    अजब गजब पलों में रंगते हुए
    बेशक लगती हैं अलग ये अजीब सी लड़कियां
    पर धडकते धडकनों के साथ
    सीने पर रख कर अपना सर
    आँखे मूंदे, बेहद अपनी सी लगती हैं ये अजीब सी लड़कियां !!

  • धर्म रक्षा के नाम पर धार्मिक भीरूपन और मानसिक संकीर्णताएं

    धर्म रक्षा के नाम पर धार्मिक भीरूपन और मानसिक संकीर्णताएं

    Apoorva Pratap Singh

    [divider style=’full’]

    जब मैं पैदा हुई थी उससे कुछ समय पहले बाबरी तोड़ी गयी थी । राम एक नारा बन चुके थे । फिर भी घर के वातवरण के कारण मैं एक लंबे समय तक इस बात गर्व करती रही कि मेरे पास हजारों भगवान हैं फिर पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में अपने आप आया कि राम इन सबके बॉस हैं । यकीनन माहौल से आया, 5-7 साल की उम्र से मुझे समझ आ गया कि मेरी पार्टी बीजेपी है ।
    यह इसलिए बता रही हूँ कि घर में स्वस्थ माहौल होते हुए भी मस्तिष्क पर धर्माधारित राजनीति का कितना प्रभाव पड़ता है !

    अब आगे चलते हैं,
    मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें मैंने कहा कि राम के लिए पज़ेसिव होने की ज़रूरत नहीं है ! कई आरोप लगे मेरे ऊपर, किसी मूर्ख ने कहा कि “मैं लड़की नहीं होती तो वो मुझको मेरी ही भाषा में समझाते” वामपंथी से ले के शातिर तक कहा गया !

    मैंने कहा कि हिन्दू धर्म जैसा कुछ भी नहीं बस यह हमको एक नाम देने की अवधारणा के अंतर्गत किया गया, ज्ञानियों को बहुत आपत्ति हुई ! अब यह पोस्ट इसलिए नहीं लिख रही हूं कि सफाई देनी है इसलिए लिख रही हूँ कि आप कुछ और नहीं सोच पा रहे हैं !

    सबसे पहली बात यह कि हमारी कई लोकसंस्कृतियाँ हैं, जिनमें कोई किसी को मानता है तो कोई किसी को । जब आप शादी के समय अपने घरों में दीवार पर कपड़े से ढक के देवता बनाते हैं तो वो आपके पित्रों होते हैं । जो सबके अलग हैं । यही से हमारी शुरुआत होती है कि हमारे सबसे बड़े शुभ काम हमारे पूर्वजों के बिना अधूरे हैं । यही हमारा बेस था । हम मूलत चमत्कार में विश्वास न करने वाले लोग हैं । हम अपने घर तक के अलग अलग देव रखने वाले लोग!

    हास्यास्पद है कि इसे हिंदुओं को ईश्वरविहीन करने कि साजिश बोल दिये लोग, मतलब बोलने से पहले सोचते भी है कि नहीं कि बस बोल देते हैं !
    आप चमत्कार को ही ईश्वर मानने लगे हैं क्या ? माफ कीजिये आप खुद के पतन को आमन्त्रित
    कर रहे हैं ।

    हम इसीलिए अलग लोग हैं कि हमारी कोई किताब हमको नहीं सिखाती कि क्या करने से हिन्दू है और क्या कर देंगे तो नहीं रहेंगे । हिन्दू सिर्फ एक टर्मिनोलोजी है जो हमको बांधने को इस्तेमाल हुई । हम श्रुतियों द्वारा परंपरा निभाने वाले लोग हैं । हम नास्तिकता को जगह देने वाले लोग ! हम अपने ही भिन्न दर्शनों में वाद स्थापित कर भेद बताने वाले लोग ! क्या बन गए हैं ? भगवा गमछादधारी भीरु !
    जब शिव के कंपटीशन में ब्रह्मा और विष्णु उतारे गए वहीं से बहुत कुछ बदल गया ।

    हम राजा को भगवान मानने वाले लोग !
    शैव यानि काशी और वैष्णव यानि अवध ! इनके जो भी राजा हुए उन्हें हमने साकार ईश्वर बना लिया ।

    बाद में राजारविवर्मा ने अपनी कल्पना शक्ति अनुसार चित्र बनाए ।

    हमें स्वतन्त्रता संग्राम में एकजुट करने के लिए तिलक ने गणेश पूजा पंडाल की शुरुआत की जिससे धर्म के आधार पर सही, लोग एक जगह एकजुट हों । तिलक के उस मंतव्य का परिस्थिति अनुसार जो कारण रहे वही आज हिन्दू कट्टरता के कारक की तरह गलत इस्तेमाल हो रहे हैं ।

    राम का जिस चालाकी से राजनीतिकरण कर दिया गया और जनता खुश हो गयी वो दुखद है । आप तर्क देंगे कि हमें धर्म बचाने को एकनिष्ठ आस्था की आवश्यकता है और राम उस के ध्व्जवाहक । अगर एक ध्वज नहीं हुआ तो कोई भी मुसलमान-ईसाई बना दिया जाएगा ।

    लेकिन धर्म है कहाँ आपका ? आस्था क्या होती है ? मूल क्या था आपका और आज आप क्या कर रहे हैं ? आप सत्यनारायन कथा के प्रचार मात्र को अपनी आस्था बनाए बैठे हैं ! उस कथा में कथा कहाँ है ? आप तो खुद ही अपनी मूल संस्कृति को क्षीण कर रहे हैं उसके बाद बक़ौल आपके आप संस्कृति भी बचाने की कोशिश करते हैं !!

    आस्था के नाम पर मुहम्मद साहब गधे पर बैठ चाँद के टुकड़े कर देते हैं और यीशु जिंदा हो उठते हैं । उपनिषदों, अध्यात्म पर विश्वास करने वाले हम, अब ऐसी ही कई आस्थाएं पाले बैठे हैं ।

    आपकी आस्था हर बार घायल हो जाती है जब भारत के किसी कोने में आपके मान्यता प्राप्त ईश्वर से उलट किसी को पूजा जाता है । जब बंगलोर में हिन्दी को साइन बोर्ड से हटाने की मांग आपको देश की संप्रभुता पर खतरा लगती है । मेरा प्रश्न इतना है कि पूरे देश की संप्रभुता आपके अनुसार क्यों तय होनी चाहिये ! जवाब बड़ा आसान है आपकी आस्था !!!

    आस्था व्यक्तिगत हो तभी तक ठीक है लेकिन जब इस आस्था का इस्तेमाल संस्कृति के विरुद्ध ही हो तब ? यहाँ की लोक संस्कृतियों को आपकी ही आस्था कुचलने लगे इतनी चालाकी से कि खुद हलाल होने वाले को ही समझ न आए तब ?

    मेरी आस्था इंसान को कुत्ता मानती हो और उसको पट्टे में बंद कर के रखना चाहे तो ? किसी की आस्था अनुसार सारा हिसाब महरला में अल्लाह करेंगे तो यहाँ अदालत बनाने का औचित्य ही क्या है ?

    आप कहते हैं कि कोई भी एक भगवान न हुआ तो कोई भी कलमा पढ़ा के अल्लाह हु अकबर बुलवा के गोलियां चलवा देगा ! अब इसका उत्तर आपका ही प्रिय शब्द आस्था देगा ! क्या ऐसा ही कहीं लिखा हुआ है कि जब कोई एक ईश्वर को माने तभी वो बचेगा ? क्या यह आप नकल नहीं कर रहे ?

    मेरे लिए आस्था जो सशंकित, भयभीत हो वो आस्था नही है । आपकी आस्था इतनी डरी हुई क्यूँ है ? क्या हम आज एक स्वतंत्र चेतना वाला समाज जिसकी शुरुआत हमारे संस्कृति पुरोधाओं ने की थी, उससे भटक नहीं गए । अगर आस्था इतनी बड़ी चीज़ है जो भटकने नहीं देती तो यह आस्था ‘स्वचेतना’ पर क्यूँ नहीं रखनी चाहिए ! स्वचेतना केवल नास्तिक हो जाना नही होता यह आस्तिकों में भी भरपूर होती है ।

    जब आप कहते हैं कि षडयंत्र के तहत हमको इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से भरा गया तो अब आप क्या कर रहे हैं सिवाय एक भयभीत समाज बनाने के । आपका पुनरुत्थान इतना सिमटा संकीर्ण क्यों है !

    जब मैं कहती हूँ कि उपनिषद हर बात पर सवाल करते हैं तो आपको यह क्यों लगता है कि आपका ईश्वर और आस्था खतरे में है और मैं आपको मूर्ख कह रही हूँ !! जबकि मैंने तो कुछ कहा ही नहीं, आप इतने डरे हुए क्यू हैं !
    आप खुद समझ लीजिये कि आप अपनी जड़ से दूर निकल आए हैं !

    हम पर आक्रमण हुए, हम हारते रहे फिर भी हम बचे हुए हैं । आपके अनुसार हमारी धार्मिकता के कारण, पर जहां तक मैं देख पाती हूँ वहाँ तक हमारी आध्यात्मिक चेतना ने हमें बचाए रखा ।

    उस चेतना का ह्रास आपकी यह पज़ेसिवनेस कर रही है, जो आपके ईश्वर के राजनीतिकरण से निकली है ! अनुयायी ही धर्म के संहारक होते हैं और भक्त ही ईश्वर के हत्यारे, आप इन्हीं में से कुछ है !

    संस्कृति विशाल है धर्म मात्र उसका एक बिन्दु ! लेकिन आप उस बिन्दु को इतना बड़ा कर चुके हैं कि आप अपनी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को खुद ही वैचारिक रूप से पंगु बना रहे हैं, पश्चिम की नकल उसका ही एक हिस्सा !
    आप स्वतंत्र है किसी को भी ईश्वर मानो, हमारी संस्कृति किसी को अल्लाह तक नहीं रोकती ! किन्तु आपकी आस्था कब फेसबुक पर किसी को गरिया दे इसलिए उसकी नाक में पगहैया बांध के रखिए !

    सबसे अंतिम बात जब सुप्रीम कोर्ट अपने तमाम फैसलों में हिन्दू को धर्म नहीं शैली कहती है तो आपको कोई दिक्कत नहीं । जैसे हाल में एक फैसले में कहा था कि धर्म का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में नहीं हो सकता लेकिन हिन्दू इसमें अपवाद है क्योंकि वो धर्म नहीं शैली है !! तब आपने हल्ला क्यों नहीं काटा कि यह हमको धर्म मानने से इंकार क्यों कर रहे हैं, हमारी आस्था से खेल रहे हैं !!! हमारी स्वनाम्धन्य हिन्दू पार्टी क्यों नहीं कहती कि हमारे ईश्वर खतरे में है अब !!

    अंतिम बात यह कि मैंने किसी को मूर्ख नहीं कहा, भटका हुआ अब जा के कह रही हूँ कि आप इतने भटक गए हैं कि आपको सब कुछ खुद के खिलाफ साजिश दिखने लगी है। जबकि साज़िश आपकी खुद की रचाई हुई है।

  • चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

    चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

    विद्या भूषण रावत

    अक्टूबर १ को पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि थी लेकिन सतही तौर पर याद करने के अलावा उनके बारे में बहुत कुछ जानकारी न तो उपलब्ध है और न ही उनके जीते जी उन्हें सत्ताधारी इज्जत दे पाए क्योंकि चन्द्र सिंह हमेशा ही सत्ताधारियो से टकराए. वह आर्य समाजी थे और  गाँधी से भी बहुत प्रभावित थे लेकिन उनके विचार और एक्शन में वह इन दोनों ही विचारो से बहुत आगे थे . चन्द्र सिंह का जन्म १८९१ में गढ़वाल में हुआ था और २१ वर्ष के आयु में वह फौज में भर्ती हो गए. पहाड़ो में उन्होंने अथाह गरीबी देखी और इसी कारण अधिकांश युवा फौज में भर्ती होते थे . चन्द्र सिंह गढ़वाली ने द्वितीय विश्वयुध में ब्रिटिश सेना के की और से भाग लिया. चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी आज के सांप्रदायिक दौर में एक मिशाल है जिसे बार बार पढना और सुनाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को संप्रदायिक सौहार्द की खातिर कर दिया . आज जब हमारी सेनाओं और पुलिस प्रशाशन का सम्प्रदयिककरण हो रहा है तब देश के सैनिक, प्रशासक और पत्रकार भी ये पढ़े के क्यों इस देश की एकता और मजबूती के लिए चन्द्र सिंह की कहानी पढना जरुरी है और ये भी के पेशावर का विद्रोह केवल एक झटके में किया गया सैन्य विद्रोह नहीं था अपितु इसके पीछे चन्द्र सिंह की राजनैतिक समझ थी जो यह मानती थी के अंग्रेजी राज भारत में हिन्दू मुस्लिम विभाजन कर हमेशा के लिए शाशन करना चाहता था .

    दुःख इस बात का है के इतिहासकारों और नेताओं ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के साथ अन्याय किया . उनके इतने बड़े विद्रोह को जिसके फल्वरूप गढ़वाल रायफल के जाबांज देशभक्त सिपाहियों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और अपने हथियार डाल दिए ताकि एक और जलियांवाला न हो/ चन्द्र सिंह गढ़वाली की वीरता को न तो चारण इतिहासकारों ने स्थान दिया न ही सत्ताधारियो ने क्योंकि उनके विचार बहुत क्रन्तिकारी थे. इस सन्दर्भ में हमें भारतीय साहित्य के पुरोधा राहुल संकृत्यायन का ऋणी होना पड़ेगा जिन्होंने १९५५ में चन्द्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा लिखी जो किताबमहल प्रकाशन ने छपी. महत्वपूर्ण बात यह के इस पुस्तक में जिस बारीकी से राहुल जी ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के जीवन के बारे में बात की है वो बहुत महत्वपूर्ण है खासकर इस सन्दर्भ में जब तथाकथित इतिहासकारों की नज़र से इतिहास गायब हो तो हमें ओरल हिस्ट्री का सहारा लेना पड़ेगा .

    मैंने बचपन में चन्द्र सिंह गढ़वाली के बारे में सुना था क्योंकि वो मेरे ननिहाल के पास के थे . लेकिन मुझे उनकी महत्ता या महानता का अंदाज केवल तब हुआ जब मैंने राहुल जी द्वारा लिखित उनकी जीवनी पढ़ी और यही से मेरा ये गहन सोच है के घुम्म्क्कड़ लोग अगर चाहे तो न केवल बहुत बड़े साहित्य की रचना कर सकते हैं अपितु इतिहास को भी खोज निकालेंगे जिन्हें भारत के सन्दर्भ में ब्राह्मणवादी साहित्यकारों और नेताओं ने छुपाया है.

    क्या यह शर्मनाक नहीं के गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे नेताओं ने जीवन पर्यंत चन्द्र सिंह गढ़वाली को न तो सम्मान दिया और न ही उन्हें उनके योगदान के लिए कोई आधिकारिक मदद. आज़ादी के बाद भी कुछ सालो तक उनको अपराधी ही माना जाता रहा .  चन्द्र सिंह आर्य समाज से प्रभावित थे और गाँधी जी की सभाओं में भी जाते थे लेकिन वो सेना में होने के बावजूद भी लोकतान्त्रिक थे.

    चन्द्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक भूमिका के लिए हमें ये समझना पड़ेगा के पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम में पठानों के इलाके में खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें बादशाह खान के नाम से भी जाना जाता है, कांग्रेस और गाँधी जी के साथ मिलकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे . पठानों ने इस अवसर पर कांग्रेस का साथ दिया था और ये बात सब जगह पता चल चुकी थी के अंग्रेज पठानों के इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे और उसके लिए उन्हें ऐसी बहादुर सैन्य टुकड़ी चाहिए थी जो बिलकुल उस इलाके न हो ताकि  सैनिक बिना किसी चिंता के बेशर्मी से विद्रोह को कुचल सके. ये निति तो अंग्रेजो के बाद भी सभी सरकारे करते हैं के किसी भी स्थान पर जन विद्रोह को दबाने के लिए वहा से दूर के सैनिको को बुलाया जाता है ताकि उनका कोई सहानुभूति स्थानीय लोगो के साथ न हो  और वो निर्दयिता से अपना काम करें . गढ़वालियो को पहाड़ से पेशावर या एबोटाबाद भेजने के पीछे अंग्रेजो की यही रणनीति थी के वे पठान विद्रोह को बेरहमी से कुचल देंगे लेकिन चन्द्र सिंह की जाति धर्म से ऊपर उठकर जन असंतोष को राजनितिक समझ आज के दौर में और भी प्रासंगिक है .

    १९३० में पेशावर की उस घटना का चिंत्रण जो राहुल जी की पुस्तक में विस्तार पूर्वक है :

    “२३ अप्रेल १९३० को कंपनी के ओहदेदारों और सिपाहियों को हुक्म हुआ : ‘ पांच मिनट के अन्दर फालिन हो जाए’. राइफ़ले, दूसरे सामान, और फौजी मोटरे सामने तैयार रखी गयी थी. रसौइयो को एक घंटे के अन्दर रोटी पका देने का हुकुम दिया गया था . ७ बजे से ८ बजे तक यह काम होते रहे. ‘ सुबह कप्तान रिकेट ने आदेश दिया : गढ़वाली बटालियन एडवांस’. गढ़वाली बटालियन आगे बढ़ो.

    राष्ट्रीय झंडे के चारो और वीर पठान खड़े थे . मंच पर खड़े होकर एक सिख नेता ने कभी पश्तो में और कभी उर्दू में जोशीला व्याख्यान देना शुरू किया . लोगो से आवाज आती..नारे तकबीर : अल्लाह हो अकबर, महात्मा गाँधी की जय.

    कप्तान रिकेट ने कहाँ , ‘ तुम लोग गोली से मारे जाओगे , नहीं तो गोली से मारे जाओगे. पठान जनता टस से मस नहीं हुई . गोली से खेलना वह नहीं भूली थी. अब कप्तान रिकेट ने हुक्म दिया : गढ़वाली तीन राउंड फायर. चन्द्र सिंह रिकेट के बाएं खड़े थे . उन्होंने जोर से बोला : गढ़वाली सीज फायर. गढ़वाली गोली मत चलाओ . हुकुम को सुनते ही गढ़वालियो ने अपनी अपनी राइफ़ले जमीन पर कड़ी कर दी . इसे कहने के आवश्यकता नहीं के गढ़वालियो ने देश के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखला दी . एक गढ़वाली सैनिक उदे सिंह ने अपनी बन्दूक को एक पठान के हाथ में देकर कहा : लो भाई, अब आप लोग हमको गोली मार दे .

    जिस वक़्त पलटन १ और २ के सभी सिपाहियों ने अपने अपनी राइफ़ले जमीन पर रख दी, उसी समय नंबर ३ पलटन के कमांडर लुथी सिंह को यह सब नहीं देखा गया और उसने आगे बढ़कर फायर करने का हुकुम दिया और स्वयं से गोली भी चलाई. लेकिन पलटन ३ के लोग भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए . कप्तान रिकेट ने लाल लाल आंखे करके चन्द्र सिंह की और देख कर कहा : क्यों, यह क्या बात है ? चन्द्र सिंह ने कहा : ये सारे लोग निहत्थे हैं . निहत्थो पर गोली कैसे चलाये

    इसके बाद वहा अंग्रेजो ने अपनी प्लाटून को भेजा जिसने लोगो पर फायरिंग कर दी जिसमे कई लोग मारे गए. सब जगह अफरा तफरी हो गयी और कप्तान रिकेट की भी मौत हो गयी . चन्द्र सिंह और उनके साथियो ने भी खुद को किसी तरह से बचाया क्योंकि अव्यवस्था में तो किसी को पता नहीं होता के कौन दोस्त हे ओर कौन दुश्मन.

    ( चन्द्र सिंह गढ़वाली : राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से )

    पेशावर में अफरातफरी मच गयी . किसी तरह से सभी विद्रोही सिपाही बच कर अपनी बैरकों में आये और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया . चन्द्र सिंह को एबटाबाद जेल में भेजा गया. वह लगभग १४ वर्षो तक जेल में रहे . पूरे विद्रोह की खास बात यह थी के ये देश के पुर्णतः विचारिक था, देशभक्ति से ओतप्रोत था और अपने ही देश के निहत्थे नागरिको पर गोली चलाने को गलत मानता था. चन्द्र सिंह और उनके साथियो के लिए पेशावर जैसे जगह बिलकुल नयी थे, न ही उनके पास भागने के कोई रस्ते थे क्योंकि सभी पहाड़ो से आये थे इसलिए न तो भाषा और न ही खान पान उनके पसंद. वे सभी फौज के सिपाही थे और उस वक़्त अधिकांश लोग जो पढ़ लिख नहीं पाते थे फौज में ही जाते थे . लेकिन इन सबके बावजूद वे सांप्रदायिक सौहार्द के लिए इतनी बड़ी मिशाल पैदा करेंगे इसको समझना चाहिए. इससे भी अधिक ये चिंता के हमे ‘निहत्थो’ पर गोली नहीं चलानी है . आज के फौज और पुलिस के अधिकारियों और निति निर्माताओं के लिए ये बहुत बड़ा सबक है जो मुसलमानों को दुश्मन समझते हैं . जब पहाड़ो से आये लोग जहाँ मुस्लिम उपस्थिति न के बराबर थी और जहाँ ब्रिटिश भी नहीं पहुँच पाए वो लोग सेना में जाकर समय मिलने पर अपने देश के लोगो पे गोली चलाने से इनकार कर दे और वो भी उस स्थान पर जो कही से भी उनका नहीं था, न ही उनके समर्थन में प्रदर्शन करने वाले लोग वहा होते, ये बात इतिहास में बहुत कम मिलेगी लेकिन चालाक इतिहासकारों ने इस बात को हाशिये पे डाला.

    आज़ादी के बाद चन्द्र सिंह भटकते रहे . सभी साथी जिन्हें कालापानी की सजा हुयी वे न्याय की आश में रहे लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला.  चन्द्र सिंह रिहाई के बाद सामाजिक राजनैतिक जीवन में सक्रिय हो गए लेकिन वह कभी चुनाव नहीं जीत पाए . कांग्रेस उनकी चाहत नहीं थी और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकेट पर वो चुनाव लडे परन्तु जनता का भरोषा नहीं जीत पाए आखिर जनता उन्हें चाहे क्यों ? उनके क्रन्तिकारी विचारो को अगर सुनेंगे तो पता चलेगा के जातिवादी जनता क्यों उन्हें चाहेगी ? उत्तराखंड में दलितों के प्रश्न पर उन्होंने जो कहा वो समझने वाला है और शायद जातिवादी पार्टियों और नेताओं को वो रास नहीं आया .

    सह्श्रब्दियो से जिस जाति व्यवस्था ने हमारे देश की चौथाई मानवता को इस हीन् अवस्था में पहुँचाया, वह तब तक उन्हें उठने नहीं देगी जब तक उस व्यवस्था में भीतर आग नहीं लगा दी जाती और यह आग शिक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था से ही लगाईं जा सकती है .

     

    उत्तराखंड के अन्दर दलितों के अधिकारों के विषय में चन्द्र सिंह गढ़वाली के विचार

    जमींदारी प्रथा ख़त्म कर बंजर और जंगलो के जमीन उनको देनी चाहिए

    नौकरियो में अनुपात के मुताबिक उनको जगह मिले

    उनकी पढाई के लिए शिक्षा निशुल्क हो

    अस्सेम्बलियो और कौंसिलो में उनके लिए अनुपात के मुताबिक सीटे दी जाए

    उद्योगों में उन्हें प्रथम स्थान मिले

    (राहुल जी की पुस्तक वीर चन्द्र सिंह गड्वाली) से साभार.

    अब आप समझ सकते हैं इतने क्रन्तिकारी व्यक्ति को उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ में दलितों के अधिकार की बात करेगा तो पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या उसके बाद के सवर्ण नेता क्यों सम्मान करेंगे ? चन्द्र सिंह गढ़वाली जिन्दगी भर आर्थिक बदहाली में रहे . उनका ये दर्द हमेशा था के पेशावर काण्ड के क्रांतिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया .

    २० सितम्बर १९५४ को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा जिसमे उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का विवरण दिया था . उनकी झोपड़ी वर्षा से टूट चुकी थी और आमदनी के नाम पर उन्हें १६ रुपैये पेंशन मिलती थी. उनके ऊपर १४००० रुपैये का कर्ज था. खाने पीने के बर्तन भी नहीं थे . उन्होंने सरकार से अपनी मदद की अपील की . लगभग एक वर्ष बाद २५ जुलाई १९५५ को प्रदेश सरकार ने एक पत्र भेजकर ‘ख़ुशी’ जाहिर की के उन्हें आजीवन १४ रुपैये महीने पेंशन मिला करेगी.

    ( राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से )

    शर्म की बात  यह के ६५ वर्ष की उम्र में देश के लिए इतनी कुर्बानियों के बाद भी और व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखने पर भी सरकार ने उन्हें १४ रुपैये लायक ही समझा ये दर्शाता है के भारत में स्वाधीनता के बाद गैर गांधीवादी विद्रोह के नायको के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया .अक्टूबर १, १९७९ में उनका निधन हो गया . आज अस्मिताओ के इस युग में चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम लेकर उनको स्मारकों में सीमित करने का प्रयास है लेकिन उनके विचारों से तो सामंतवादी जातिवादी सांप्रदायिक नेताओं और पार्टियों को कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि उनके विचारो और पेशावर कांड में उनकी ऐतिहासिक भूमिका के लिए वो आज भी याद किये जाने चाहिए . साप्रदायिक सौहार्द की मजबूती के लिए पेशावर के उनके विद्रोह को आज भी याद करना जरुरी है .

     

  • संतुलन

    संतुलन

    Hayat Singh


    यह क्षोभ, विमोह, हताशा और निराशा
    दिन-महीने या साल विशेष से नहीं, बल्कि
    कई दशकों से पल रही
    असन्तुष्टियों का उबाल थी
    यह बात ज्ञात भी सभी को थी, लेकिन अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार
    कोई साइकिल में सवार था
    कोई हाथी में
    कोई नुक्कड़ के खोखे पर
    लड़ा रहा था पंजा

    राष्टीय से अंतर्राष्टीय की होड़ में
    गाँव-गुठार को भूल गए
    मार्क्स-लेनिन की रट के चलते
    गाँधी-अम्बेडकर से दूरी बना लिए

    गीता,कुरान और बाइबिल
    चलना था तीनों को साथ लेकर
    उलझे रह गए
    किसी एक विशेष में

    ध्यान रहे
    सनद के लिए लिखी जा रही
    आखिरी पंक्तियों के लिए
    लिखी गयी हैं भूमिका में ऊपर की पंक्तियाँ

    पत्तियों का रंग हरा ही रहने दो
    फूलों को गुलाबी रहने दो
    सब कुछ गेरुआ हो जाने पर
    संतुलन बिगड़ जाएगा प्रकृति का।
    सावधान!
    सावधान!
    सावधान!
    सावधानी हटेगी तो
    फिर से दुर्घटना घटेगी।

  • जीवन मझदार

    जीवन मझदार

    एक भी नाव नहीं है मेरे पास
    लकड़ी की या कागज़ की
    और तुम कहते हो
    कि दो नावों पर सवार हूँ मैं

    देख ही रहे हो
    ३२ साल से एक नदी को
    पार नहीं कर पा रहा हूँ
    बीच धार में चिल्ला रहा हूँ
    मुझे बचा लो
    कोई आता भी नहीं बचाने अब किसी को

    कितनी नावों में कितनी बार
    बैठने की हसरत लिए
    मर नहीं जाऊंगा एक दिन

    वैसे अच्छा ही हुआ कोई नाव नहीं है
    क्या पता उसमे एक छेद होता
    और डूब जाता मैं
    या नाव ही उलट जाती .

    अब बहुत अँधेरा है पहले से अधिक
    बहुत तेज़ आंधी
    खून खून चारों तरफ दीवारों पर

    सच कहता हूँ
    अब दम घुटने लगा है
    आपस में ही उलझ गए हम
    एक दूसरे को दुश्मन मान बैठे हैं
    अब तो लगता है
    यह नाव भी अब नाव कहाँ है
    जब बुलेट ट्रेन चलने की बात हो रही है
    मुल्क में

    एक भी नाव नहीं है
    एक भी सायकिल नहीं
    नंगे पाव् ही चलना है
    रेत में
    फिर क्या कहना
    कि पाँव जल रहे हैं मेरे
    कृपया मेरे इस त्याग को दर्ज कर लिया जाये इतिहास में

  • भारत के सभ्य होने की राह में सबसे बड़ी बाधा – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत के सभ्य होने की राह में सबसे बड़ी बाधा – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक ख़ास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है. कई लोगों ने भारत में सामाजिक क्रान्ति की संभावना के नष्ट होते रहने के संबंध में जो विश्लेषण दिया है वो कहता है कि भारत का धर्म इसके लिए जिम्मेदार है. निश्चित ही भारत का धर्म प्रतिक्रान्ति का हथियार है लेकिन सर उपर उपर नजर आने वाले इस धर्म को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह ठीक नहीं है.

    धर्म मोटे अर्थों में कर्मकांड, विश्वास और पूजा पद्धति इत्यादि इत्यादि का जमघट होता है, ये स्वयं अपना स्त्रोत नहीं है बल्कि ये भी किसी अन्य गहरी विधा के गर्भ से जन्मता है. ठीक से कहें तो भारतीय धर्म का मूल उसके भाववादी दर्शन में है. इस लोक के शोषण और सच्चाइयों से भाग कर परलोक में परम शान्ति या मोक्ष को खोजते हुए जन्म मरण (भवचक्र) से बाहर निकलना इस दर्शन का इसका मूल लक्ष्य है. ऐसे लक्ष्य असल में इस जमीन पर चल रहे जीवन को सम्मान नहीं देते बल्कि किसी आसमानी लोक या हवा हवाई स्वर्ग में या मोक्ष या बैकुंठ को सम्मान देते हैं.

    जो लोग ये कहते हैं की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना इस जमीन पर घट रहे जीवन के खिलाफ है वे बहुत हद तक सही हैं. इसके बावजूद ये वक्तव्य अधूरा है. मेरा गहरा अनुभव ये है की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना भी तभी उठती है जबकि आपके समाज में जमीनी जीवन के खिलाफ एक निर्णायक मनोवृत्ति बन चुकी हो. उदाहरण के लिए भारत में सामाजिक और लौकिक जीवन की जमीनी सच्चाइयों को छुपाते हुए उनमे पल रही सडांध और बीमारी को लगातार दबाते हुए समाज में यथास्थिति बनाये रखना ही भारत की परम्परा रही है.

    भारत में पुरोहित वर्ग, शासक वर्ग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा से एक ख़ास तरह की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाया है. इस संरचना में अस्सी प्रतिशत कामगारों मजदूरों, स्त्रीयों और अछूतों को पूरी व्यवस्था के लाभों से वंचित रखने का काम किया है. यह काम सैनिक बल से या लठैतों के जरिये नहीं किया जा सकता. इसे सामाजिक धार्मिक विश्वास के जरिये ही किया जा सकता है. इस ख़ास तरह की अमानवीय सामाजिक संरचना को बनाये रखने के लिए धर्म ने बड़ी चतुराई से हजारों साल तक बढिया काम किया है. भारत के धर्म ने कर्मकांडों और त्योहारों के जरिये इन अस्सी प्रतिशत बहुजनों के बीच निश्चित ही एक ख़ास तरह की गुलामी, कायरता और भाग्यवाद को फैलाया है. विशेष रूप से बहुजनों की स्त्रीयों को इस धर्म ने व्रत उपवासों, त्योहारों आदि के जरिये एकदम गुलाम और कायर बनाया हुआ है.

    ये गुलाम और डरपोक स्त्रीयां एक डरपोक कौम को जन्म देती हैं जो किसी भी बदलाव या तर्क की बात से डरते हैं. ये अस्सी प्रतिशत डरपोक और दिशाहीन लोग वही हैं जिन्हें सामाजिक क्रान्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन ये खुद उस क्रान्ति को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

    भारतीय धर्म को और उसके स्वाभाविक परिणाम को इस तरह देखना बहुत आसान है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा अनुभव ये बताता है कि हमें धर्म के बाह्य कर्मकांडीय स्वरूप पर प्रश्न उठाने से या उसे ध्वस्त कर देने भर से कोई स्थाई समाधान नहीं मिलने वाला है. बाहरी कर्मकांड रुक भी जाएँ तो यह जहरीली अमरबेल फिर से पनप जायेगी. इसका जीवन स्त्रोत कहीं और छुपा हुआ है.

    आप गौर कीजिये इस समाज के पढ़े लिखे तबके पर, ये शहरी मध्यमवर्ग तबका धर्म के बाहरी कर्मकांड जैसे कि यज्ञ, हवन, बलि, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, दान दक्षिणा, ब्राह्मण भोज आदि नहीं करता है. ये तबका – जिसमे सुशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रबन्धक, और हर तरह के पेशेवर और नई पीढी के युवा या अप्रवासी भारतीय आते हैं – वे ग्रामीण या कस्बाई कर्मकांड नहीं करते हैं. वे लोग बहुत मौकों पर प्रगतिशील भी नजर आते हैं. अक्सर वे पार्टी इत्यादि में शराब और मांस का सेवन करते हुए मिल जाते हैं. यही लोग शहरों में लिव इन रिलेशन और समलैंगिक शादियों सहित लोकतंत्र, साम्यवाद, क्रान्ति आदि के झंडे भी लहराता हुआ मिल जायेंगे. ऐसा करते हुए वे खुद की और दूसरों की नजरों में स्वयं को “गैर-रुढ़िवादी” सिद्ध कर देते हैं. लेकिन आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म में इनका विश्वास कभी कम नहीं होता.

    सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब ये हुआ कि ये प्रगतिशील युवा वर्ग सिगरेट शराब और मांस सहित फ्री सेक्स के बावजूद पूरी ठसक के साथ अंदर से धार्मिक बना रहता है और इस सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है. ये एक विचित्र लेकिन परेशान करने वाला तथ्य है. इसका ये अर्थ हुआ कि बाहरी आडंबरों से भारत के इस धर्म का या इस धर्म के वास्तविक जहर का कोई अधिक सम्बन्ध नहीं है. बल्कि बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों से भी कहीं अधिक गहराई में छुपा इसका जहरीला अध्यात्म या रहस्यवाद ही इसका असली जीवन स्त्रोत है. उसी स्त्रोत से जहर का वो फव्वारा फूटता है जो हर दौर में हर पीढ़ी में पूरे भारत को पागल बनाये रखता है. इस बात को गहराई से समझना होगा, ये थोड़ी उलझी हुई बात है.

    असल में भारत का धर्म कोई एकरूप बात नहीं है इसके हजारों विभिन्न रंग और चेहरे हैं. इसी को विविधता कहके महिमंडित किया जाता है. लेकिन इन विविध रूपों के भीतर एक सा जहर लहू बनके बहता है. वह लहू है इसकी ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की मान्यता’. इसी जहरीली त्रिमूर्ति के गर्भ से परलोक की महिमा और इस लोक की निंदा जन्म लेती है. बाहरी आडंबर, कर्मकांड कुछ भी हों अंदर ही अंदर इनमे कर्म का विस्तारित सिद्धांत (इस जन्म का कर्म अगले जन्म को तय करेगा) चलता रहता है. इसी में लपेट कर दान दक्षिणा, पुण्य, पाप आदि की सलाहकारी भी चलती रहती है, इसी से ध्यान साधना के तरीके बनाये जाते हैं और लोगों को व्यर्थ के तन्त्र मन्त्र ध्यान भजन में उलझाया जाता है. बाहर के कर्मकांड बदल भी जाएँ तो थोड़े दिनों बाद इस जहरीले कुँए से नई जहरीली बेल पनप कर समाज पर फ़ैल जाती है. उदाहरण के आजकल के पूजा पंडाल जगराते जुलूस, सामूहिक भोज आदि भारत में बहुत पुराने नहीं हैं.

    जब स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों में आजादी के आन्दोलन के लिए या तथाकथित हिन्दू जीवन दर्शन को प्रचारित करने के लिए हिन्दुओं सहित बहुजन जातियों को संगठित करने की आवश्यकता हुई तब पुराने दर्शन और कर्म के सिद्धांत पर आधारित कर्मकांडों को नये रूप में ढाल दिया गया और नये देवी देवताओं सहित नई आरती, नये पूजा विधान, जुलूस, जगराते, डांडिया, सामूहिक भोज आदि निर्मित कर दिए गये. इनमे शामिल होने वाले लोगों के मौलिक मनोविज्ञान अभी भी आत्मा, परमात्मा और कर्म के विस्तारित सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा से ही नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ये इनोवेशन किया गया था. इन नये कर्मकांडों से इन्हें आजाद करवा भी दिया जाए तो कोई बदलाव नहीं होने वाला. उस अमरबेल में से फिर नये अंकुर अपने आप निकल आयेंगे.

    यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले दलितों बहुजनों में भी इसी कारण कोई ख़ास बदलाव नहीं आता है. उनके मन में गहराई में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष या स्वर्ग या जन्नत जैसे अंधविश्वास भरे ही रहते हैं. इन जहरीले बीजों को अपने साथ ले जाकर वे ध्यान समाधी मोक्ष जन्नत आदि के लिए नये कर्मकांड खुद ही बना लेते हैं. वे भी पुराने देवी देवता छोड़कर नये देवी देवता और तीर्थ, मन्दिर ध्यान केंद्र आदि बना लेते हैं और नये धर्म में भी पुराने भारतीय धर्म की जहरीली खुराक फैला देते हैं. ये एक लाइलाज बीमारी नजर आती है.

    अब बड़ा सवाल ये है कि इसका इलाज कैसे हो?

    मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है. हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी. इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

    ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं. ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं कि कई पीढियां इसमें से बाहर नहीं निकल पाती. आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाये रखते हुए उसके ऊपर ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

    ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है. इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं. पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं. युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है.

    अपने परिवारों, गाँवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है. इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है.

    इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

    इसलिए सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों आदिवासियों को मेरी यही सलाह होती है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएँ. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें. ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही प्रगतिशील एजेंट हैं.

    आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता पौराणिक बकवास का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं. ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं.

    अगर धोती या जनेऊ या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक नही होगा. लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते.

    यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.

  • किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए, केवल अपने परिवार लायक उपजाना चाहिए –दीपक पुजारी

    किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए, केवल अपने परिवार लायक उपजाना चाहिए –दीपक पुजारी

    Deepak Pujari

    किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए और केवल अपने परिवार के लायक उपजा कर बाकी ज़मीन को पड़त छोड़ देना चाहिए। जो लोग अपने बच्चों को डेढ़ लाख की मोटर साइकल, लाख का मोबाइल लेकर देने में एक बार भी नहीं कहते कि महँगा है, वे लोग किसानों की माँग पर बहस कर रहे है कि दूध और गेहूँ महँगा हो जाएगा।

    माॅल्स में जाकर अंधाधुंध पैसा उजाड़ने वाले गेंहूँ की कीमत बढ़ जाने से डर रहे हैं। तीन सौ रुपये किलो के भाव से मल्टीप्लैक्स के इंटरवल में पॉपकॉर्न खरीदने वाले मक्का के भाव किसान को तीन रुपये किलो से अधिक न मिलें इस पर बहस कर रहे है। एक बार भी कोई नहीं कह रहा कि मैगी, पास्ता, कॉर्नफ़्लैक्स के दाम बहुत हैं।

    सबको किसान का क़र्ज़ दिख रहा है और यह कि उस क़र्ज़ की माफी की माँग करके किसान बहुत नाजायज़ माँग कर रहा है। यह जान लीजिए कि किसान क़र्ज़ में आप और हमारे कारण डूबा है। उसकी फसल का उसको वाजिब दाम इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि उससे खाद्यान्न महँगे हो जाएँगे। 1975 में सोने का दाम 500 रुपये प्रति दस ग्राम था और गेंहू का समर्थन मूल्य किसान को मिलता था 100 रुपये। आज चालीस साल बाद गेंहू लगभग 1500 रुपये प्रति क्विंटल है मतलब केवल पन्द्रह गुना बढ़ा और उसकी तुलना में सोना आज तीस हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम है मतलब 60 गुना की दर से महँगाई बढ़ी मगर किसान के लिए उसे पन्द्रह गुना ही रखा गया। ज़बरदस्ती, ताकी खाद्यान्न महँगे न हो जाएँ। 1975 में एक सरकारी अधिकारी को 400 रुपये वेतन मिलता था जो आज साठ हज़ार मिल रहा है मतलब एक सौ पचास गुना की राक्षसी वृद्धि उसमें हुई है। इसके बाद भी सबको किसान से ही परेशानी है।

    किसानों को आंदोलन करने की बजाय खेती करना छोड़ देना चाहिए। बस अपने परिवार के लायक उपजाए और कुछ न करे। उसे पता ही नहीं कि उसे असल में आज़ादी के बाद से ही ठगा जा रहा है।

    किसान क्यों हिंसक हो गया है यह समझना होगा, जनता को भी और सरकार को भी। किसान अब मूर्ख बनने को तैयार नहीं है। बरसों तक किया जा रहा शोषण अंततः हिंसा को ही जन्म देता है। आदिवासियों पर हुए अत्याचार ने नक्सल आंदोलन को जन्म दिया और अब किसान भी उसी रास्ते पर है। आप क्या चाहते हैं कि आप समर्थन मूल्य के झाँसे में फँसे किसान के खून में सनी रोटियाँ अपनी इटालियन मार्बल की टॉप वाली डाइनिंग टेबल पर खाते रहें और जब किसान को समझ में आए सारा खेल तो वह विरोध भी नहीं करे।

    आपको पता है आपका एक सांसद साल भर में चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँकने का अधिकारी होता है, लेकिन किसान का चार हजार का बिजली का बिल माफ करने के नाम पर आप टीवी चैनल देखते हुए बहस करते हैं। यह चेत जाने का समय है। कहिए कि आप साठ से अस्सी रुपये लीटर दूध और कम से कम साठ रुपये किलो गेंहू खरीदने के लिए तैयार हैं, कुछ कटौती अपने ऐश और आराम में कर लीजिएगा। नहीं तो कल जब अन्न ही नहीं उपजेगा तो फिर तो आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उस दाम पर खरीदेंगे ही जिस दाम पर वे बेचना चाहेंगी।

    एक किसान की नजर
    किसान पुत्र
    दीपक पुजारी

    Deepak Pujari

    • Founder, President at Rangbhumi Group Of Art
    • Founder, President at Pragati Path Foundation
    • Former Chief executive officer at Matribhumi Jan Seva Sansthan
  • ओशो: प्रतिक्रान्ति का शिखर पुरुष –Sanjay Jothe

    ओशो: प्रतिक्रान्ति का शिखर पुरुष –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    (नोट: बाबाओं के सम्मोहन के विषय में बात करते हुए आप अगर ओशो रजनीश को भूल रहे हैं तो आप सबसे बड़ी भूल कर रहे हैं, वर्तमान बाबा बाजार का जहरीला माडल देने वाले इन बाबाजी को बार बार समझना होगा ताकि इस बीमारी का ठीक निदान किया जा सके)

    ओशो पर बात करते हुए अक्सर ही यह मान लिया जाता है कि चूँकि वे बुद्ध से सबसे ज्यादा प्रभावित थे इसलिए उनकी शिक्षाएं बुद्ध या बौद्ध दर्शन के अनुकूल हैं. यह भी मान लिया जाता है कि चूँकि उन्होंने कई बार अंबेडकर और दलितों का पक्ष लेते हुए महात्मा गांधी और हिन्दू धर्म सहित वर्ण व्यवस्था पर चोट की है इसलिए वे अंबेडकर की शिक्षाओं के पक्ष में हैं. यहाँ बहुत स्पष्टता से मैं इन दोनों मान्यताओं को नकारना चाहता हूँ.

    ओशो न तो पूरी तरह से अंबेडकर के पक्ष में हैं न ही बुद्ध या बौद्ध दर्शन के पक्ष में हैं. वे इन दोनों का ब्राह्मणीकरण कर रहे हैं और बुद्ध के मुंह से वह सब निकलवा रहे हैं जो बुद्ध के मूल दर्शन में कहीं है ही नहीं. यह बात अंबेडकरवादियों और दलितों सहित भारत के आदिवासियों, शूद्रों, पिछड़ों और स्त्रीयों को साफ़ साफ़ समझ लेनी चाहिए. इस तथ्य को उजागर करना इस किताब का एक बड़ा उद्देश्य है.

    Osho

    असल में प्रारंभिक दौर में ओशो ने जो नास्तिकवादी और तर्कवादी दिशा ली थी उसकी असफलता के बाद उन्होंने तय किया कि वे भारत की अन्धविश्वासी जनता को उसके अंधविश्वास के जरिये ही पकड़ेंगे और स्वयं को स्वीकृत बनायेंगे. उस समय उन्हें न केवल स्वयं को स्वीकृत बनाने की आवश्यकता थी बल्कि उन्हें धन संपत्ति और संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता थी. इसलिए उन्होंने गहराई से निरीक्षण करके पाया कि आम भारतीय अन्धविश्वासी और धर्मभीरु मनुष्य किस बात से प्रभावित होता है और किस बात से उत्तेजित होता है. इन दोनों का एकसाथ उपयोग करते हुए उन्होंने ब्राह्मणवादी मान्यताओं पर खड़े धर्म और साधना का प्रचार शुरू किया. इसी दौर में उन्होंने नव संन्यास की घोषणा की इसके बाद उनकी प्रसिद्धि बढती ही गयी और वे शीघ्र ही एक सम्पन्न आश्रम में रहने लगे. लेकिन ब्राह्मणवाद को उपयोग करते हुए वे यह भूल रहे थे कि जिस खेल को वे शुरू कर रहे हैं वो खेल वे खुद ही कभी बंद नहीं कर सकेंगे.

    धार्मिक अंधविश्वास पर खड़ी कोई भी रचना दुर्निवार होती है. ब्राह्मणवाद इतना जहरीला खेल है कि इसका उपयोग करने वाले को भले ही यह लगता हो कि वो इसका उपयोग कर रहा है लेकिन अंत में जाहिर होता है कि ब्राह्मणवाद ही उस व्यक्ति को निगलकर उपयोग करने लगता है. ठीक यही ओशो के साथ हो रहा है. उनके शिष्यों की आजकल की शिक्षाओं को देखिये और उनके आश्रमों को देखिये. यह बहुत साफ़ हो जाता है कि ब्राह्मणवादी खेल का उपयोग करने के बाद ओशो कभी ब्राह्मणवाद के चंगुल से आजाद नहीं हो सके और इसी खींचतान में उनका अंत हुआ. उनकी अंतिम किताब में वे ब्राह्मणी अर्थ के या वेदान्तिक अर्थ के पुनर्जन्म को प्रचारित करते हुए विदा हो रहे हैं.

    इससे साफ़ जाहिर हो रहा है कि बुद्ध की प्रशंसा और अनत्ता की प्रशंसा करते हुए भी वे अनत्ता के आधार पर रचे गये पुनर्जन्म के निषेध को अपने “सबसे विद्रोही” शिष्यों के सामने अपने अंतिम प्रवचनों में भी नहीं रख पा रहे हैं. इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यही हुआ कि या तो वे वेदान्तिक पुनर्जन्म को ही सत्य मानते हैं, या फिर बुद्ध की प्रशंसा करते हुए भी वे बुद्ध के मुंह से वेदांत की प्रशंसा करवाना चाह रहे हैं. दोनों स्थितियों में वे बुद्ध और अंबेडकर के खिलाफ जा रहे हैं और उस सनातनी पाखण्ड का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसमे “सर्वम खल्विदं ब्रह्मं” अर्थात सब कुछ ब्रह्म ही है – कहने वाले आदिशंकराचार्य एक चांडाल के स्पर्श कर जाने पर कुपित हो जाते हैं. कण कण में ब्रह्म का दर्शन करने की सलाह और भेदभाव छुआछूत एकसाथ चलाए रखना, यही सनातनी पाखण्ड है यही ब्राह्मणवाद का सबसे खतरनाक अस्त्र है. ऊपर ऊपर समावेश और प्रगतिशीलता की प्रशंसा चलती है लेकिन सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार में एक इंच का भी बदलाव नहीं आने दिया जाता सामाजिक व्यवस्था जहां की तहां एक पर्वत सी अचल बनी रहती है.

    इस लेख से गुजरते हुए सभी पाठक मित्रों से निवेदन है कि वे एक बात को बहुत साफ़ तौर से समझ लें और नोट कर लें. भगवान् रजनीश पर भारत का सबसे बड़ा ब्राह्मणवादी गुरु होने का जो आरोप यहाँ लगाया जा रहा है उसका यह अर्थ नहीं है कि भगवान् रजनीश पुरातनपंथी या रुढ़िवादी विचारक या गुरु हैं. न ही इसका यह अर्थ है कि वे प्राचीन भारतीय दर्शन और समाज व्यवस्था को बनाये रखने का सचेतन प्रयास कर रहे हैं. इसके विपरीत वे बहुत प्रगतिशील विचारों वाले, बहुत खुले और दुस्साहसिक वैचारिक प्रयोग करने वाले व्यक्ति हैं जिन्होंने कई मौकों पर पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौती दी है और पश्चिम में हुई सफल क्रांतियों की शिक्षाओं को कई कई तरह से बतलाने का प्रयास किया है.

    इसके बावजूद वे कुछ ख़ास अर्थों में भयानक रूप से ब्राह्मणवादी हैं और उनका इस तरह का ब्राह्मणवाद किसी जाहिर और घोषित रूप से काम करने वाले ब्राह्मणवाद से अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह प्रगतिशील और क्रांतिकारी चर्चाओं के पीछे छिपकर काम करता है. न केवल सिद्धांत में ऐसा है बल्कि यह जमीनी तौर पर उनके विशाल शिष्य समुदाय में उनकी दिनचर्या और उनकी दार्शनिक, धार्मिक, रहस्यवादी और सामाजिक मान्यताओं में साफ़ देखा जा सकता है. यह बात जटिल है इसलिए इसे बिन्दुवार समझना औचित होगा:

    १. भगवान रजनीश घोषित रूप से स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में हैं और स्त्री को वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि लैंगिक आजादी देने के भी पक्ष में हैं. लेकिन यह बात उनकी मुख्या प्रस्तावना में शामिल नहीं है. जिस रहस्यवाद या धर्म दर्शन को वे प्रचारित कर रहे हैं और जिस वेदान्तिक ढाँचे के आधार पर वे पुनर्जन्म और मोक्ष की धारणा का प्रचार कर रहे हैं वह ढांचा और वे धारणाएं ऐतिहासिक रूप से पुरुष सत्ता और पितृ-सत्ता को ही मदद करती आई हैं.

    उदाहरण के लिए वे गीता की व्याख्या करते हुए कृष्ण द्वारा दिए गए वक्तव्य को दोहराते हैं “स्त्रीयों में मैं कीर्ति हूँ” इस कीर्ति की व्याख्या करते हुए वे इसे एक विशिष्ठ गुण बताते हैं और इसे संवेदनशीलता और स्त्रैणता से जोड़ते हैं जो स्त्री को एक ख़ास तरह के ढाँचे में जकड़कर देखने जैसा है. यह मान लिया गया है कि स्त्री स्त्रैण ही होगी, नाजुक और संवेदनशील होना ही उसका आत्यंतिक गुण है. इस तरह की चर्चाओं का समाज पर जो प्रभाव है और रुढ़िवादी हिन्दू समाज इसे जिस भाँती स्वीकार करता है उसे अब ध्यान से देखिये. वह समाज जब स्त्री पुरुष की समानता और स्त्री अधिकारों की बातों के साथ साथ कीर्ति की इस तरह की व्याख्या सुनता है तब असल में उसकी स्मृति में क्या गहराई से रजिस्टर होता है? निश्चित ही उसके मन में आर्थिक या लैंगिक आजादी की प्रस्तावना की बजाय कीर्ति की व्याख्या ही अधिक गहराई से अंकित होगी. लेकिन जब लोग कीर्ति की व्याख्या से प्रभावित होकर भगवान् रजनीश का गुणगान करेंगे तब कई लोग गलती से यह मान लेंगे कि यह गुणगान उस व्यक्ति का है जिसने स्त्री की परिपूर्ण स्वतंत्रता की प्रस्तावना दी है.

    २. इसी तरह जब वे अंबेडकर की प्रशंसा करते हुए दलितों आदिवासियों या शूद्रों (ओबीसी) के अधिकारों को समर्थन दे रहे हैं तब वे बहुत क्रांतिकारी नजर आते हैं लेकिन असल में विचार की दृष्टि से क्रांतिकारी बनते हुए भी वे सामाजिक सस्थाओं के सन्दर्भ में जब वर्ण व्यवस्था पर टिप्पणी करते हैं तो वे वर्ण व्यवस्था के “क्रियात्मक तर्क (फंक्शनल लोजिक) का पूरी तरह समर्थन करते हैं और इसे कार्य विभाजन की ही एक पद्धति बताकर महिमामंडित करते हैं. गीता की व्याख्या करते हुए वे कृष्ण द्वारा चार वर्णों के सृजन को इसी तर्क से समझाते और वैध ठहराते हैं. इसके बाद भी उनके बाद के प्रवचनों में वे जोर देकर कहते हैं कि पैदा तो सभी शुद्र होते हैं कोई कोई अपने पुरुषार्थ से ब्राह्मण बन पाता है. इस बिंदु को सावधानी से समझना होगा. जब वे इस प्रकार का वक्तव्य दे रहे हैं तो असल में वे वर्ण व्यवस्था को मान्यता दे रहे हैं भले ही वे इसे जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर वैध ठहरा रहे हैं लेकिन अंततः तो वे इसे स्वीकृति दे ही रहे हैं और यह भी जतला रहे हैं कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और शुद्र निकृष्ट है जिसे महान श्रम करके ब्राह्मणत्व अर्जित करना है.

    आश्चर्य इस बात का है कि ठीक यही तर्क ब्राह्मणवादी भी देते हैं वे भी कर्म और श्रम के विभाजन के आधार पर ही वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करते हैं और बड़ी आसानी से श्रमिकों के विभाजन के प्रश्न से बच निकलते हैं. श्रमिकों के विभाजन का प्रश्न अंबेडकर ने उठाया था और कहा था कि वर्ण या जाति व्यवस्था असल में श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है. यहाँ यह नोट करना होगा कि भगवान रजनीश बाद के वर्षों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था को सिरे से नकारते हुए इसे नष्ट कर देने की बात भी करते हैं और कई प्रवचनों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था के जहरीले परिणामों की चर्चा करते हुए इसे अमानवीय बताते हैं.

    इस विषय में भी यही प्रश्न खडा होता है, कि समाज, वर्ण और जाति व्यवस्था पर गौर करते हुए एक आम आदमी या एक आम रजनीशी के मन में कौनसी सलाह ज्यादा गहराई से अंकित हो रही है या काम कर रही है? वर्ण व्यवस्था को उखाड़ देने की सलाह या वर्ण व्यवस्था को कृष्ण द्वारा कार्य गुण कर्म के अनुसार मानव का वर्गीकरण करने की सलाह? हम पाते हैं कि भगवान् रजनीश और कृष्ण की महिमा से प्रभावित एक आम भारतीय या रजनीशी असल में कृष्ण का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित है अंबेडकर का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित नहीं है. इस बात का परीक्षण करने के लिए किसी भी आम रजनीशी या अध्यात्मिक रुझान रखने वाले आम भारतीय हिन्दू से बात की जा सकती है.

    ३. ध्यान और समाधि सहित मोक्ष के मुद्दों पर भी भगवान् रजनीश की प्रस्तावनाएँ एकदम पारम्परिक हैं. उनमे जिन प्रयोगों का उल्लेख है और जिन नवाचारों का उल्लेख है वे बहुत नए नहीं हैं. हाँ यह अवश्य है कि वे आम जन के प्रचलन से बाहर हो गये थे और केवल मठों और आश्रमों तक सीमित हो गए थे. न केवल वे प्रयोग बल्कि उनकी सांगत व्याख्याएं भी पहले से मौजूद थीं जिनका सरलीकरण और प्रचार भगवान रजनीश ने बहुत प्रभावशाली ढंग से किया. लेकिन यहाँ एक गहरी बात जो नोट करनी आवश्यक है वो ये कि इन ध्यान विधियों और इनसे जुड़े जिस मनोविज्ञान का वे प्रचार करते रहे उसकी दार्शनिक प्रष्ठभूमि क्या है? कोई भी आसानी से देख सकता है कि इस प्रष्ठभूमि में आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्म का विस्तारित सिद्धांत, गुरु शिष्य परम्परा और कृपा या शक्तिपात आदि की पुरातन मान्यताएं हैं. ये मान्यताएं असल में ब्राह्मणवादी या वेदान्तिक मान्यताएं हैं दुर्भाग्य से इन्ही पर भारत में शोषण और दमन सहित अंधविश्वास और भाग्यवाद का पूरा भवन खडा है. ऐसे में इस मूलभूत ब्राह्मणवादी रहस्यवाद या धर्म दर्शन को प्रचारित करके वे ब्राह्मणवादी शोषण के तन्त्र को ही लाभ पहुंचा रहे हैं.

    हालाँकि वे बुद्ध या महावीर की प्रशंसा करते हुए परमात्मा या आत्मा तक को नकार देते हैं लेकिन वह उनकी मूल शिक्षा नहीं है. न ही उस शिक्षा ने उनके पूरे शिष्य समुदाय का निर्माण किया है. आज भी अगर उनके शिष्यों से यह पूछा जाए कि आत्मा और परमात्मा सहित पुनर्जन्म पर उनके क्या विचार हैं तो वे इन तीनों को स्वीकार करते हैं और पुनर्जन्म के स्मरण सहित पाप पुण्य के अगले या पिछले जन्म पर प्रभाव को भी मान्यता देते हैं. वे शून्य या अनत्ता पर आधारित ध्यान या निर्वाण की चर्चा नहीं करते हैं.

    इसके दो कारण हैं एक तो ये कि भगवान रजनीश सहित ओशो ने ही कभी भी शुन्य या अनत्ता की अलग से व्याख्या नहीं की है और न ही अनत्ता के आधार पर जन्म मरण या निर्वाण को समझाया है. दुसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण ये है कि भगवान रजनीश के अधिकाँश शिष्य वे हैं जो उनके द्वारा आत्मा और पुनर्जन्म आधारित ब्राह्मणी या वेदान्तिक रहस्यवाद से प्रभावित होकर उनके निकट आये हैं. अभी भी उनके प्रमुख शिष्य जिस तरह का संन्यास देते हैं और जिस तरह से साधना सिद्धि और निर्वाण की बात करते हैं वह आवागमन के चक्र से मुक्त होने की धारणा पर ही आधारित है.

    इसमें एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि भगवान् रजनीश और उनका परवर्ती अवतार ओशो, दोनों ही बारम्बार यह दोहराते हैं कि अनत्ता और आत्मा एक ही हैं और एक ही सत्य के दो नाम हैं. वे शून्य और पूर्ण को भी एक ही निरुपित करते हैं और इसे एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ बताते हैं. साथ ही यह भी बतलाते हैं कि बुद्ध ने अव्याख्य की व्याख्या न करके जो निर्णय लिया था वह महान निर्णय था और यह मानते हैं कि जिस चीज की व्याख्या संभव न हो उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए. इस सन्दर्भ में वे लुडविनविटगिस्टीन का प्रसिद्द वक्तव्य भी दोहराते हैं कि जिस बात को समझाया न जा सके उसे उठाया ही नहीं जाना चाहिए.

    इस सन्दर्भ में अगर हम विचार करें कि उनका वृहत्तर शिष्य समुदाय किस बात से प्रभावित होकर उनके पास आ रहा है? क्या पूर्ण को शुन्य मानकर आ रहा है? या शुन्य को पूर्ण में अनुवाद करके उनके पास आ रहा है? भगवान रजनीश में एक प्रश्न के उत्तर में बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती कहा था यह वक्तव्य उन्होंने आदि शंकर पर उठाये गए एक प्रश्न के उत्तर में दिया था जिसमे रामानुज द्वारा शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध निरुपित करने का उल्लेख किया गया था. अब ध्यान से देखना होगा कि उनका शिष्य समुदाय वास्तव में शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध मान रहा है या बुद्ध को प्रछन्न वेदांती मान रहा है? ठीक से देखें तो पता चलता है कि यहाँ बुद्ध का ही वेदान्तीकरण या ब्राह्मणीकरण हो रहा है न कि शंकराचार्य का बौद्धिकरण.

    ४. अध्यात्म, साधना और मुक्ति के प्रश्न पर भी भगवान् रजनीश की जो प्रस्तावनाएँ सर्वाधिक प्रचलित हैं वे गुरु शिष्य परम्परा और समर्पण, शरणागति पर आधारित हैं. तर्क, दुस्साहस, खतरे में जीना और अप्प दीपो भव् की बुद्ध की प्रस्तावना का वे जब तब समर्थन अवश्य करते हैं लेकिन यह उनकी मूल शिक्षा नहीं है. उनकी मूल शिक्षा, जिससे कि उनका अधिकतम शिष्य समुदाय प्रभावित है वह गुरु पर निर्भरता और सतत मार्गदर्शन देने वाले माडल पर आधारित है. बौद्ध अर्थ की अप्प दीपो भव वाली क्षण क्षण जागरूकता वाली शैली – जो कि ओशो के समकालीन कृष्णमूर्ति द्वारा सर्वाधिक प्रचारित की गयी – वह भगवन रजनीश या ओशो की मूल शिक्षा नहीं है.

    क्षणवाद और निर्विकल्प जागरूकता पर आधारित यह शैली या विधि (हालाँकि इसे विधि कहना पूरी तरह ठीक नहीं) पुनर्जन्म और आत्मा के नकार पर ही खड़ी है. इसकी मूल मान्यता यह है कि शरीर और मन सहित आत्मा (व्यक्तित्व या स्व) असल में प्रकृति और समाज के द्वारा दिए गए हैं और कोई आत्यंतिक व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती जो कि एक से दुसरे शरीर या जन्म में प्रवेश करती हो. न तो मैं और मेरे की तरह कोई शरीर है न स्व या व्यक्तित्व या आत्मा है. जो सत्ता स्व या आत्मा की तरह भासती है असल में वह एक झूठा आभास भर है जो शरीर, और समाज द्वारा दिए गए तात्कालिक व्यक्तित्व या मन के गठजोड़ द्वारा निर्मित होती है. शरीर की मृत्यु के बाद शरीर और मन के ये टुकड़े बिखर जाते हैं और अन्य शरीरों और मनों के निर्माण में उपयोग कर लिए जाते हैं. इस तरह वहां आत्मा या स्व जैसा कुछ नहीं है. बुद्ध के अनुसार इसी को अपने अनुभव से जान लेना निर्वाण या मुक्ति है.

    लेकिन भगवान् रजनीश और ओशो भी जिस ढंग से मोक्ष की व्याख्या करते रहे हैं वह ढंग सनातन आत्मा और परमात्मा को मान्यता देता है और इस आत्मा का परमात्मा में विलीन होना ही मोक्ष निरूपित किया गया है. अब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा सनातन अर्थात अजर अमर है (गीता के अनुसार) तो वह परमात्मा में विलीन होकर भी बनी रहेगी. अर्थात वह पूर्ण रूप से विलीन होकर खो नहीं रही है बल्कि अपना सत्व या अपनी अस्मिता बचाए रख रही है. अगर कहें कि वह पूर्णतया विलीन हो जाती है या खो जाती है तो फिर अजर अमर या सनातन नहीं रही. इस प्रकार आत्मा की अमरता और मोक्ष दो विरोधी सिद्धांत हुए जिनमे से कोई एक ही सत्य हो सकता है. लकिन वेदांती रहस्यवाद या ब्राह्मणवाद इन्हें एकसाथ इस्तेमाल करता है. जबकि बुद्ध इसमें परमात्मा और आत्मा दोनों को निरस्त करके निर्वाण को बहुत तर्कसंगत और सबके लिए संभव बना देते हैं. बुद्ध के अनुसार “हमारा” कोई शरीर नहीं है और “हमारा” कोई मन/व्यक्तित्व/आत्मा नहीं है बल्कि शरीर भी चार भूतों का उत्पाद है और मन भी स्मृतियों, कल्पनाओं, विचारों, संस्कारों और वासनाओं का समुच्चय है.

    ये चार भूत अर्थात पदार्थ और ये संस्कार वासनाएं अर्थात मन ये सब बाहर से आता है अन्य व्यक्तियों, प्राणियों और वनस्पतियों से यह पदार्थ आते हैं और समाज, शिक्षा, परिवार से ये विचार आते हैं इसलिए शरीर सहित मन या व्यक्तित्व भी “मेरा” या “हमारा” नहीं है बल्कि समष्टि का है और उसी में खो जाता है. जो व्यक्ति आज नजर आ रहा है वह समय में पहली और अंतिम बार जन्मा है. उसका शरीर और उसका मन मर जाने के बाद उसके शरीर के भूतों का और उसके मन के संस्कारों का सौ प्रतिशत हिस्से का दुबारा एकसाथ किसी नए गर्भ में प्रवेश कर जाना लगभग असंभव है इसलिए नया व्यक्ति इस मरे हुए व्यक्ति के शरीर या मन के अंशों को धारण करते हुए भी पूरी तरह वो पुराना व्यक्ति नहीं है. इस प्रकार कोई पुनर्जन्म नहीं होता बल्कि हर जन्म एक नए व्यक्ति का जन्म होता है.

    अनत्ता को इस तरह “शरीर और मन दोनों ही मेरा नहीं है” और मैं और मेरा जैसी भी कोई सत्ता नहीं है के रूप में जान लेना ही निर्वाण कहा गया है. हालाँकि वेदान्त और ब्राह्मणवादी रहस्यवाद भी मुक्ति को मैं और मेरे से मुक्ति के अर्थ में ही देखते हैं लेकिन वे एक भयानक विरोधाभास का निवारण नहीं कर पाते. वो विरोधाभास यह है कि अगर आत्मा अमर है तो मोक्ष में विलीन कैसे हो जा सकती है या खो कैसे सकती है? और अगर मोक्ष ही अंतिम सत्य है या आत्मा व शरीर के अल्पकालिक अस्तित्व की तुलना में वही सर्वकालिक या सनातन सच्चाई है तो आत्मा शरीर की तरह एक क्षणिक सत्ता हुई. इस बिंदु पर आते ही हम बुद्ध के दर्शन में प्रवेश कर जाते हैं. अर्थात अनंत मोक्ष के सामने आत्मा क्षणिक ही साबित होती है. यही बुद्ध का सिद्धांत है, आत्मा या स्व असल में एक क्षणिक आभास मात्र है.

    अब इतने विस्तार में जाने के बाद हम यह देखेंगे कि एक आम रजनीशी या ओशो का सन्यासी आत्मा सहित मोक्ष को किस रूप में देखता है? अनुभव बताता है कि ओशो या भगवान रजनीश का एक आम सन्यासी भारत के एक आम धार्मिक हिन्दू की भांति आत्मा की अमरता को मानता है और परमात्मा से मिलन के अर्थ में ही योग और मोक्ष को स्वीकार करता है. इस प्रकार पुनः यह सिद्ध होता है कि भगवान् रजनीश या ओशो के शिष्य असल में बुद्ध के बताये अनत्ता और निर्वाण की प्रशंसा सुनकर ओशो या रजनीश के सन्यासी नहीं हुए हैं बल्कि वे वेदांती और ब्राह्मणवादी आत्मा और मोक्ष के सिद्धांत से प्रभावित होकर रजनीश या ओशो के निकट आये हैं.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • ब्लू व्हेल

    ब्लू व्हेल

    Kumar Vikram

    ब्लू व्हेल किसी भी चिड़िया का नाम हो सकता है
    अंधभक्तों की टोली का सरताज किसी बाबा का नाम
    अथवा इतिहास को सर के बल खड़ा करने को आमादा लोगों को अपने वोटपाश में बाँधे किसी नेता का नाम

    ग़रीब किसानों के लिए वह हो सकता है
    बैंकों दलालों सरकारी नीतियों मानसून की
    रहस्यमय मिलीभगत का नाम
    जो स्वचालित वीडियो गेम की तरह
    उन्हें ऋण लेने को
    और अंतत: आत्महत्या के लिए उकसाते रहते हैं 

    शास्त्रों में तो जीवन की परिकल्पना ही
    शायद ब्लू व्हेल का ही दूसरा नाम है
    जहाँ अनेक तरह के पूर्व निर्धारित क़र्ज़
    मनुष्य को ग्लानि और कुंठा से भर देते हैं
    जिनसे बचकर निकलने के सारे दरवाज़े
    पहले से ही बंद कर दिए गए होते हैं

    और फिर अपने घातक मोहपाश में बँधे शमां परवानों पर 
    अनगिनत शेर नज़्म ग़ज़ल
    लिखने वालों को ब्लू व्हेल के बारे में नया क्या बताना
    कुछ पूछना है तो उनसे कुछ डर डर कर
    और कुछ हिचकिचाते हुए पूछो 

    जो अपना सर्वस्व
    बाढ़ दंगों भूकंप नरसंहार बीमारी युद्ध दुर्घटनाओं में
    गँवाकर कर भी
    नई सुबह के इंतज़ार में
    आकाश की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं

    कि आख़िर किस आंतरिक साहस से वे
    ब्लू व्हेल की अवधारणा को ख़ारिज करते हैं
    या तुम्हारी ही तरह वे भी किसी दुशचक्र में ही फँसे हैं
    जिसे तुम्हारी रूमानियत मानने को मना करती है


    * ब्लू व्हेल एक समकालीन इन्टरनेट गेम है जिसके अदृश्य ‘एडमिन’ उसे खेलने वाले को एक तरह से मनोवैज्ञानिक रूप सेनियंत्रित कर आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इस गेम के कारण पूरी दुनिया (और भारत) में कई युवा अपनी जान गँवाचुके हैं और कई जगहों पर इसपर प्रतिबंध लग चुका है।

    Kumar Vikram


  • हमें भारत मे छुआछूत, दंगा और बाबा म्यूजियम चाहिए –Sanjay Jothe

    हमें भारत मे छुआछूत, दंगा और बाबा म्यूजियम चाहिए –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जर्मनी और रवांडा जैसे कुछ अफ्रीकी देशों में कई सारे होलोकॉस्ट म्यूजियम हैं स्कूल कॉलेज के बच्चों को वहां दिखाया जाता है कि हिटलर के दौर में या हुतु तुत्सी जातीय हिंसा के दौर में किस नँगाई का नाच हुआ था, कैसे पढ़े लिखे समझदार लोग जानवर बन गए थे और एकदूसरे की खाल नोचने लगे थे। 

    मरे हुए लोगों को खोपड़ियां, कंकाल, जूते, कपड़े, उनके बर्तन, फर्नीचर इत्यादि सब सजाकर रखे गए हैं ताकि अगली पीढ़ी देख सके कि वहशीपन क्या होता है और धार्मिक नस्लीय जातीय हिंसा से क्या क्या संभव है।

    भारत मे भी हर जिले में भी ऐसा ही कम से कम एक “दंगा, छुआछूत और बाबा म्यूजियम” होना चाहिए जिसमें उस इलाके में हुए धार्मिक जातीय दंगों का विवरण और फोटो इत्यादि रखे गए हों। छुआछूत के आधार पर उस इलाके के पाखण्डी सवर्ण द्विजों ने सालों साल तक कैसे अपनी ही स्त्रियों और दलितों, यादवों, अहीरों, कुर्मियों, कुम्हारों, किसानों, मजदूरों, शिल्पियों को जानवर सी जिंदगी में कैद रखा, कैसे मूर्ख बनाकर गरीबों की जमीनों और औरतों को लूटा – ये सब बताया जाना चाहिए।

    कैसे यज्ञ हवन और पूजा पाठ करने वालों, ज्योतिषियों, गुणियों कान फूंकने वाले ओझाओं ने औरतों और शूद्रों दलितों को शिक्षा और रोजगार सहित पोष्टिक भोजन और जीवन के अधिकार से वंचित रखा ये दिखाया जाना चाहिए।

    कितने बाबाजन, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और धर्मगुरुओं ने कितने बलात्कार किये, कितने मर्डर किये, कितनी जमीने दबाई कब कोर्ट ने उन्हें दबोचा, वे कितने साल जेल में रहे – ये सब विस्तार से बताना चाहिए।

    अगली पीढ़ी अगर इन सब मूर्खताओं को करीब से देख समझ ले तो उसे कावड़ यात्रा, कार सेवा, देवी देवता के पंडालों, धार्मिक दंगों, बाबाओ के बलात्कार और जातीय धार्मिक दंगों सहित छुआछूत भेदभाव और अंधविश्वास से बचाया जा सकता है। 

    लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि ये सब बताने की बजाय भारतीय परिवार अपने बच्चों को अपने मूर्ख पारिवारिक गुरुओं, देवी देवताओं के पंडालों और आत्मा परमात्मा की बकवास सिखाने वाले शास्त्रों की गुलामी सिखाते हैं। हर पीढ़ी बार बार उसी अंध्विश्वास, छुआछूत और कायरता में फंसती जाती है। 

    भारत मे व्यक्ति और समाज की चेतना का एक सीधी दिशा में रेखीय क्रमविकास नहीं होता बल्कि यहां सब कुछ गोलाई में घूम फिरकर वहीं का वहीं पुराने दलदली गड्ढे में वापस आ जाता है। इसीलिए ये मुल्क और इसकी सभ्यता कभी आगे बढ़ ही नहीं पाती, हर पीढ़ी उन्हीं बीमारियों में बार बार फसती है जिन्हें यूरोप अमेरिका के समाज पीछे छोड़ चुके हैं।

    भारत के धर्म और सँस्कृति को इतना सक्षम तो होना ही चाहिए कि अपने लिए नए समाधान न सही कम से कम नई समस्याएं ही पैदा कर ले। बार बार उन्हीं गड्ढों में गिरना भी कोई बात हुई? 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।