Category: आपके आलेख

  • जातीय दंश, रंगभेद, लिंगभेद और हमारा दोगलापन

    वैसे तो लड़कियों के इनबॉक्स में रोज़ तमाम तरह के मैसेज आतें हैं, पर बीते दिनों कुछ लड़कियों के जो मैसेज आए उन्होनें मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया। पहाड़ों पर घुमक्कड़ी की कई फ़ोटो के अपलोड के दौरान बहुत से कॉमेंट और मैसेज मिले, लेकिन मेरी लड़की दोस्तों ने जो लिखा वो लगभग कई बहुजन लड़कियों के अतीत-वर्तमान और रोज़मर्रा से जुड़ी प्रेक्टिसेस, उनके सपनों की ऊंचाइयों, समाज की खाइयों, गढ़ रहे व्यक्तित्व, बनते-बिगड़ते विश्वास-आत्मविश्वास की बात है।

    एक लड़की ने लिखा है कि मैं आपकी ही तरह साँवली हूँ, बचपन से लेकर आज तक भी हमेशा सबने इग्नोर ही किया, मेरे साँवले रंग के पीछे मेरी तमाम योग्यतायें फीकी ही मानी जाती रही है, मैं खुद भी सबकी सुन-सुन कर इतनी दब्बू हो गई हूँ कि मान ही लिया है कि मैं सुंदर नहीं हूं इसलिए ही फ़ेसबुक पर भी कभी अपनी फ़ोटो लगाने की हिम्मत नहीं कर पाई। पर आपको देखकर एक नया हौसला मिला है, आप साँवले होते हुए भी कितना स्मार्टली-बोल्डली ख़ुद को कैरी करती हैं, आपके कॉन्फिडेंस की क़ायल हूँ मैं। आपको देखकर एक नया आत्मविश्वास मिला कि खूबसूरती गोरी चमड़ी की मोहताज़ नहीं। अब मैं भी अपने काले रंग को लेकर हीन नहीं महसूस करूँगी।

    दूसरा मैसेज एक और लड़की ने किया है कि दीदी मेरा रंग भी आपकी तरह काला है, हम तीन बहनें हैं और सभी का रंग साँवला ही है। काले रंग वज़ह से हर जगह लोग नाक-मुँह सिकोड़ते हैं। और दलित हूँ लोग रंग देखकर ही अंदाजा लगा लेते हैं। मेरी दीदी की शादी में बहुत मुश्किल आ रही है, सिर्फ़ रंग की वज़ह से बहुत दहेज़ मांग रहें हैं लड़के वाले जबकि मेरी दीदी गवर्मेंट जॉब में है। मैं जानती हूँ मेरे और मेरी छोटी बहन के साथ भी यही होगा। पर मैं ऐसे नहीं चाहती, मुझे मंजूर नहीं कि लोग मुझे मेरे रंग से नापें। आपको फ़ेसबुक पर बहुत दिनों से पढ़ रही हूँ, आपसे हिम्मत मिलती है, आपमें बहुत कॉन्फिडेंस है, मैं भी ऐसे ही बनना चाहती हूँ।

    अगला मैसेज है जो मराठी में है,जिसका हिन्दी अनुवाद लिख रही हूँ। मैम आप बहुत अच्छा लिखती हो, मेरे पापा को मैंने ही बताया था कि अपने समाज की ही है यह लड़की। पापा स्मार्ट फोन नहीं चला पाते हैं पर हमेशा आप जो भी लिखती हो, मुझसे पढ़वाते हैं। मैंने आपके मनाली टूर की फ़ोटो भी दिखाई है घर में सभी को। आपकी वजह से मुझे भी कॉलेज से जा रहे ट्रिप पर माथेरान जाने की परमिशन मिल गई है। इसलिए आपको बड़ा वाला थेंक्स। आपसे ज़िंदगी जीना सीख रही हूं।

    एक और मैसेज मिला जो एक शादीशुदा लड़की का है, जो लिखती है कि मेरा सपना था कि पूरी दुनिया देखूँ, घूमना चाहती थी, पढ़ना चाहती थी पर बारहवीं के तुरंत बाद घरवालों के दबाव में शादी करनी पड़ी, मैं अपने सपने जी ही नहीं पाई, अब बस हॉउस वाइफ हूँ घर, बच्चे और पति बस। काश! कि पैसे होते तो मैं भी आपकी तरह पढ़ पाती, नौकरी करती और पूरी दुनिया घूम पाती। आपको इस तरह घूमते देख रही हूँ तो ऐसे लग रहा है कि हम साथ-साथ घूम रहें हैं। आप पूरी दुनिया घूमना, आपके पीछे-पीछे ही सही मेरे सपने भी पूरे हो जाएंगे।

    ये मैसेज चार अलग-अलग लड़कियों के थे, नाम डिस्क्लोज नहीं कर रही हूँ। ये सभी बहुजन लड़कियाँ ही हैं, ये चार मैसेज चार परिस्थितियों को आपके सामने रखतें हैं। इनबॉक्स में जवाब तो दे चुकी हूँ पर पोस्ट लिखा आप सभी के लिए। काला होना क्या होता है? दलित होना क्या होता है? लड़की होना क्या होता है? और इन सब बातों का एक साथ होने के क्या मायने हैं जानती हूं मैं। बचपन से लेकर अब तक भी भुगता और भुगत रही हूँ बहुत कुछ। इस दुनिया का सबसे वर्स्ट कॉम्बिनेशन है काली दलित लड़की होना। मैंने बचपन से ना केवल जातिवाद का दंश झेला है बल्कि अपने काले रंग के साथ लगातार रंग भेद भी झेल ही रही हूँ। बचपन से ही हमारे आसपास के लोग काले रंग को लेकर इतना हीन महसूस करा देतें हैं कि हम खुद को बदसूरत मान ही लेते हैं। मेरे साथ भी यही मामला था। लोग मेरा रंग देख कर बड़ी आसानी से मुझे नीच जात की हूँ “रंग से जाति पता लगाओ प्रतियोगिता” से जान लेते थे। बचपन में नवरात्रों में कन्या भोजन में खीर-पुड़ियाँ खिलाने के लिए लोग बुलाते तो रंग देखकर ही; मैं और मेरी जैसी काली लड़कियाँ पहले ही बाहर रोक दी जाती। रंग से नीच जात पहचानना बड़ा आसान सा फंडा है हमारे सो कॉल्ड महान देश में। फिर बाहर ही दोना-पत्तल में खीर-पूड़ी मिलती जो उस वक़्त घोर ग़रीबी में मेरे लिये बहुत बड़ी बात थी, फ़िर भले ही वो दो हाथ दूर से फेंक कर दी जाती रही हो। खैर जो दलित लड़कियाँ गोरी होती हैं, उनके साथ भी बड़ा बुरा व्यवहार होता है। लोग उनकी जात गोरे रंग की वजह से पहचान नहीं पाते हैं और फिर गोरी दलित लड़कियों को बोलते हैं कि जरूर उनकी माँ किसी सवर्ण के साथ सोई होगी। पर मैं तो काली हूँ इसलिए सीधे-सीधे पहचानी जाती रही हूँ।

    बचपन में मैं भी पहनना चाहती थी चटख लाल रंग की फ़्रॉक और बनना चाहती थी लालपरी। बहुत मन होता था कि काश! डार्क नीले रंग के कपड़े पहन पाऊं पर मम्मी-पापा मार-पीट कर वही सफ़ेद, हल्का ग़ुलाबी, हल्का पीला रंग घुमा-फिराकर दिला देते थे। कॉलेज आने तक भी मुझमें कॉन्फिडेंस नहीं था कि डार्क या पसंद के रंग पहन पाऊं। क्योंकि तब तक काले रंग, नीच जात की लड़की होने से जुड़े तमाम भेदभाव को मैं नीचे सिर झुका कर स्वीकार की हुई थी।स्कूल-कॉलेज में यही एक मात्र यूएसपी थी कि पढ़ने में अच्छी थी और सरकारी स्कूल में अंधों में काना राजा टाइप हालात थे। चाहते हुए भी कभी स्कूल में मैडम ने किसी डाँस या नाटक में भाग नहीं लेने दिया क्योंकि उसमें सुंदर मतलब गोरी लड़कियां ही चलती थी। मैं कभी स्कूल में नाच ही नहीं पाई और ना ही कभी मुख्य अतिथियों का स्वागत करने मिला काले होने की वजह से।

    बहुत छोटे से गाँव से दिल्ली तक के सफ़र में वो तमाम दिक़्क़तों से लड़ा है, अपने-परायों से जूझा है इस कॉन्फिडेंस तक आने में। पूरे समय खुद को छुपाती-बचाती नज़रें नीची रखी हुई हीनभावना से ग्रस्त दब्बू दीपाली से आज की दीपाली का सफ़र में बहुत कुछ झेल कर संघर्ष करके सीखा, बुना, गुना, पचाया और तचाया है। ये सब बातें इसलिए लिख रही हूँ दोस्तों क्योंकि ये सब तमाम लड़कियों/लड़कों के संघर्ष हैं अपनी-अपनी तरह के। बहुजनों के लिए समाज में ऐसी परिस्थियां या प्रिविलेज नहीं हैं कि उन्हें ज़िंदगी की ज़मीन उर्वर मिले। और मैं कोई विशेष नहीं हूँ हाँ ख़ुद को बेहतर इंसान बनाने की कोशिश लगातार कर रही हूँ।

    रंग भेद के साथ जातिभेद का डबल टॉर्चर और लिंगभेद की वर्स्टनेस के साथ उनसे जुड़ी तमाम मुश्किलों से लड़कर आज वाला आत्मविश्वास ला पाई हूँ। बाबासाहेब का शुक्रिया कहने के लिए शब्द नहीं बचते मेरे पास कि कुछ भी कह पाऊँ। अगर पढ़-लिख नहीं पाती तो शायद ये दीपाली भी नहीं होती। तो मेरे सभी बहुजन दोस्तों ख़ूब पढ़िए, लड़िए हम लोगों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और पाने के लिए पूरी दुनिया है।

  • जाति विनाश कैसे हो? –Sanjay Jothe

    जाति विनाश कैसे हो? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जाति विनाश अगर सवर्णों से अपेक्षित है तो ये व्यर्थ का प्रोजेक्ट है. लेकिन जाति विनाश दलितों पिछड़ों से अपेक्षित है तो इस प्रोजेक्ट से बहुत उम्मीद की जा सकती है.

    जाति विनाश कैसे होगा इसकी विस्तार से चर्चा करने से पहले दो वक्तव्य याद रखिये. महान आयरिश लेखक, विचारक और नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ से एक बार किसी ने पूछा था कि नेता कौन होता है? शॉ ने मजाकिया अंदाज में चुटकी लेते हुए बताया कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही हो उसी दिशा में झंडा उठाकर सबसे आगे हो लेने वाला ही नेता होता है.” दूसरा वक्तव्य डॉ. अंबेडकर का है जब वे अपनी प्रसिद्ध किताब “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के दुसरे संस्करण की भूमिका लिख रहे थे. उन्होंने लिखा “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इन दो वक्तव्यों में जाहिर तौर पर उपर उपर कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन आगे के विस्तार में जाकर हम देखेंगे कि ये ‘अलग अलग’ वक्तव्य जाति उन्मूलन के मुद्दे पर बहुत दूर से एकदूसरे से कैसे जुड़ते हैं.  

    जाति विनाश या जाति का उन्मूलन सदा से भारतीय शूद्रों (ओबीसी) दलितों (अनुसूचित जातियों) दमितों (स्त्रीयों) का सपना रहा है. इसे लेकर जितना चिंतन मंथन और काम हुआ है उसकी बड़ी असफलता को साफ़ –साफ़ देखा जा सकता है. एक सामाजिक, राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में इस मुद्दे पर जितना काम हुआ है उससे अपेक्षित परिणाम नहीं आये हैं बल्कि इस काम ने इन जातियों और समुदायों को पहचान या शिनाख्त की राजनीति (आइडेंटिटी पोलिटिक्स) की अंतहीन अँधेरी सुरंग में धकेल दिया है. इस अँधेरी सुरंग में ये ही पता नहीं चलता कि आपके नाम से आपके हक में नारे लगाने वाले राजनेताओं के हाथ में आपके लिए फूल हैं या खंजर है. इस अँधेरी राजनीति में सिर्फ शोर और नारे सुनकर जो लोग शामिल हुए हैं उनके चेहरों पर निराशा और पराजय का भाव साफ़ नजर आता है. पहले जो लोग हाथों में फूल लेकर आपके साथ नारे लगा रहे थे उनके सभी फूल अब कमल के फूल बन गये हैं. सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा और उनकी सरकारों की गुलामी करने में इन दलित आदिवासी या अल्पसंख्यक ‘क्रांतिकारियों’ को किसी तरह लज्जा का अनुभव नहीं हो रहा है. आज जब देश में दलितों आदिवासियों मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे हैं तब दलित और आदिवासी नेताओं, अधिकारियों की चुप्पी बहुत भयानक सच्चाई को उजागर करती है. ये चुप्पी सिर्फ दलित नेताओं, झंडाबरदारों और प्रशानिक अधिकारियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि शूद्र (ओबीसी), दलित आदिवासी तबकों से आने वाले बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी इस स्थिति के सामने मौन और दुविधाग्रस्त होकर खड़ा है.

    जाति नाश या जाति उन्मूलन की मूल भावना और लक्ष्य को अगर ठीक से देखा जाए तो आप पायेंगे कि एक अच्छे उद्देश्य से जो काम शुरू किया गया उसकी दिशा और उसकी कार्यपद्धति बहुत हद तक गलत रही है. ये वक्तव्य जाति उन्मूलन के अभी तक के देशव्यापी प्रयासों पर एक साझी टिप्पणी के रूप में समझा जा सकता है. इस वक्तव्य के कई पहलू हैं और ये वक्तव्य कई बिन्दुओं पर आधारित है.

    हम शुरुआत करते हैं डॉ. अंबेडकर के जाति उन्मूलन के आह्वान से. उनका प्रसिद्ध भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” जो कि असल में सवर्णों को उनके धर्म की बुराई के बारे में जागरूक करते हुए लिखा गया था उसमे जाति व्यवस्था का और उसकी अनैतिकता और दरिन्दगी का विश्लेषण किया गया है. लेकिन इसमें बहुत स्पष्ट शब्दों में जाति उन्मूलन का कोई प्रेक्टिकल रोडमेप नहीं दिया गया है. हालाँकि वो भाषण हो भी नहीं पाया और हमें तत्कालीन सवर्ण हिन्दू मानस की प्रतिक्रिया भी इस पर नहीं मिल पायी. बाद में ये भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के नाम से एक किताब के रूप में प्रकाशित हुआ. इस किताब का उद्देश्य सवर्ण हिन्दुओं को उनकी जाति व्यवस्था के प्रति जागरूक करना था ताकि वे अपनी बीमारी को पहचान सकें. इस किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में भी डॉ. अंबेडकर ने  इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. उसके बाद डॉ. अंबेडकर जाति उन्मूलन के अन्य संभव सामाजिक, राजनीतिक शैक्षणिक और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन संबंधी आयामों में भी प्रयोग और प्रवेश करते हैं. लेकिन इस सबका परिणाम क्या हुआ?

    यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि इसका परिणाम नहीं हुआ है. वास्तव में इसका बहुत कुछ परिणाम हुआ है. दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन गौर से देखा जाए तो जाति उन्मूलन नहीं हुआ है. दलितों दमितों की आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति में सुधार अवश्य हुआ है लेकिन व्यापक रूप से देखें तो भारत की सामाजिक या धार्मिक जमीन पर उनके लिए स्थिति बिलकुल भी नहीं बदली है. इसका सीधा अर्थ ये है कि ऊपर-ऊपर कास्मेटिक बदलाव हुए हैं लेकिन गहराई में जाति का विभाजन – जाति अंतर्गत विवाह और भोजन की विवशता के रूप में – अभी भी वहीँ का वहीं बना हुआ है. इसको और सरल शब्दों में कहें तो जाति के आधार पर विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध अभी भी बना हुआ है जो बताता है कि जाति अभी भी पूरी तरह बनी हुई है. फिर इस केन्द्रीय तथ्य के बाकी सारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सभ्यतागत परिणाम हैं जो हम सब रोज अखबारों में पढ़ते हैं. अखबार की ये खबरें बीमारी को दिखाती हैं लेकिन बीमारी के असल कारण – जाति और वर्ण के भेद की निरन्तरता को नहीं दिखाती है.

    दो घटनाओं को उदाहरण की तरह लीजिये. पहला उदाहरण ये कि अभी किसानों की आत्महत्याओं से हम सब दुखी और चिंतित हैं. शायद भारत ने दुनिया में अनोखा वर्ल्ड रिकार्ड बनाया है जिसमे किसानों ने युद्ध या गृहयुद्ध या आर्थिक मंदी के न होने की दशा में भी इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्याएं की हैं. इसका कुछ संबंध जाति और वर्ण की बहस से भी अवश्य जुड़ता है. जिस वर्ण या जाति के लोग किसान हैं या भूमिहीन मजदूर हैं उन जातियों वर्णों के लोगों का राजनीति और व्यापार जगत में ‘सक्रिय’ प्रतिनिधित्व कितना है? स्थानीय व्यापारियों के जगत में किस जाति या वर्ण का कब्जा है? मंडियों में अनाज के व्यापार पर और सब्जियों के बाजार में सदियों से किन जातियों और वर्ण का कब्जा है? बीज, खाद, कीटनाशकों की दुकानों और बैंकों तक में किन जातियों और वर्णों का वर्चस्व है? फिर इन सबको नियंत्रित करने वाली शासन-प्रशासन या कानून की व्यवस्था की बागडोर किन जातियों और वर्णों के हाथ में है? इस सबके बाद अब ये देखिये कि किसानों मजदूरों की जातियों के सक्रिय प्रतिनिधि ऊपर वाले स्तरों पर कितने हैं? सरल शब्दों में कहें तो बात ये है कि किसान या मजदूर के मरने पर शेष ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के मरने” जैसा दुःख होता है क्या? किसान या मजदूर के कमजोर और अशिक्षित रह जाने पर ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के पिछड़ जाने” जैसा दुख होता है क्या? इसका उत्तर है – नहीं. उन्हें इस तरह का कोई दुःख नहीं होता. उन्हें इन आत्महत्याओं से या इस पिछड़ेपन से न तो व्यक्तिगत दुःख होता है न ही उनकी राजनीति, अर्थसत्ता या सामाजिक सत्ता पर कोई खतरा नजर आता है इसीलिये वे इसे नजरअंदाज करके बड़ी आसानी से सदियों सदियों जहां के तहां बने रहते हैं.

    दूसरा उदाहरण देखिये. सवर्ण हिन्दुओं को जब महसूस हुआ कि राम मन्दिर मुद्दे को वे अपनी राजनीतिक सत्ता मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं तो उन्होंने देश भर में इसके लिए आन्दोलन छेड़ दिया. मन्दिर मस्जिद के होने या न होने से किसी गरीब हिन्दू या मुसलमान का कोई भला नहीं होता लेकिन चूँकि स्वर्ण हिन्दू राजनीति को इसकी जरूरत थी इसलिए उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द्र को नुक्सान पहुंचाते हुए भी ये काम किया. वे ऐसा कर सके क्योंकि समाज, व्यापार, शासन, प्रशासन, धर्म संस्कृति और मीडिया के हर स्तर पर उनके लोगों का दबदबा है. उनका अपना नेटवर्क और प्रेशर ग्रुप है जो देश और देश की गरीब जनता से ज्यादा अपने जातीय और वर्णगत नेटवर्क के प्रति अधिक वफादार है.

    इसका सीधा अर्थ ये हुआ कि भारत की राजनीति और सामाजिक प्रक्रियाएं सवर्णों के आपसी सामाजिक संबंधों और समीकरणों से चलती हैं. उन प्रक्रियाओं में दलितों पिछड़ों के समाजों में उभर रहे सुख दुःख का कोई असर शामिल नहीं है. सवर्ण हिन्दू अपने लिए मंदिर बनवाने के लिये देश भर में आन्दोलन कर देंगे लेकिन किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर गरीब असहाय मजदूरों और किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के मुद्दे पर कुछ नहीं करेंगे. इससे ये सीख मिलती है कि अगर दलितों शूद्रों के आपसी जातीय समीकरण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से एकदूसरे के निकट आकर एक हो जाएँ तो आप इस सवर्ण राजनीति या समाज को अपने अनुसार बदल सकते हैं. याद रखिये, दलित पिछड़ों के समाज में समाज के अलग अलग स्तरों में अगर आपसी मेलजोल नहीं है तो दलितों पिछड़ों की राजनीति इसी तरह बिकती रहेगी आपके दलित नेता सवर्णों की गोदी में बैठकर ऐसे ही पुरस्कार पाते रहेंगे.

    कल्पना कीजिये कि भारत में शासन-प्रशासन में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व रखने वाली जातियों के बच्चों में कोई बीमारी फैलती है और उनके जीवन पर संकट आता है. तब ये प्रतिनिधि क्या करेंगे? क्या ये अपने बच्चों को भी दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों के बच्चों की तरह उपेक्षा से देखेंगे? या फिर ये अपने शासन प्रशासन की शक्ति और पहुँच का इस्तेमाल अपने बच्चों की बेहतरी और सेहत के लिए करेंगे? इसका जवाब आसान है. ये लोग पूरी ताकत लगाकर अपने बच्चों की सेहत और खुशहाली के लिए शासन प्रशासन से ऐसी नीतियाँ बनवायेंगे जो उनके हित में हों. उसे लागू करवाने का भी इन्तेजाम करेंगे. ऐसा कारनामा हमारे सांसद और विधायक अपनी अपनी तनख्वाह बढवाने के लिए कई बार कर चुके हैं.

    इस काल्पनिक उदाहरण के बाद वास्तविकता में भारत की गरीब जातियों के बारे में सोचिये. उनके बारे में सोचने वाले और वास्तव में मुंह खोलने वाले इस राजनीति, शासन-प्रशासन में कितने हैं? और इससे भी बड़ी बात ये कि क्या इन लोगों को पता है कि वे अपने बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं और भारत से जाति को खत्म करके न सिर्फ अपने लोगों को बल्कि स्वयं भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी को सबल बना सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर है – नहीं. सरल शब्दों में कहें तो भारत की पिछड़ी जातियों को उनके प्रतिनिधियों और सक्षम लोगों को बहुत हद तक ये साफ़ साफ़ पता ही नहीं है कि वे अपने लोगों की और भारत की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या (जो कि दलित और शूद्र/ओबीसी/आदिवासी/अल्पसंख्यक है ) की जिन्दगी को निर्णायक रूप से सुधारने के लिए क्या कर सकते हैं या उन्हें क्या करना चाहिए.

    इस सवाल को दुसरे कोण से देखिये. क्या भारत के इन बहुसंख्य लोगों के कमजोर या बीमार होने से सवर्ण जातियों के सामाजिक सम्मान या राजनीतिक आर्थिक रुतबे में कोई खतरा पैदा होता है? इसका जवाब ये है कि भारत के बहुसंख्यक लोगों के कमजोर होने से उन सवर्णों को नुक्सान नहीं बल्कि फायदा होता है. तब वे अपनी राजनीति अपने धर्म और अपनी संस्कृति को, अपने भोजन या कपडे की पसंद को आपके ऊपर थोप सकते हैं. अभी आंख खोलकर देखिये, भारत में ये ही खेल चल रहा है. तब आप क्यों और कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ये जातियां और वर्ण दलितों शूद्रों और आदिवासियों लिए बेहतर नीतियों या बेहतर राजनीति के निर्माण के लिए मेहनत करेंगी? और आप इनसे ये उम्मीद करते हैं तो आप स्वयं क्या करेंगे? क्या बैठकर इंतज़ार करेंगे? कब तक इन्तेजार करेंगे?

    इस बात को गहराई से समझिये, राजनीति या प्रशासन में कुछ अच्छा करने की सदिच्छा के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह राजनीतिक संकल्प (पोलिटिकल विल) का विषय है. और राजनीतिक संकल्प असल में सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक लाबिंग का खेल है. हो सकता है कि सवर्ण जातियों में बहुत से संवेदनशील राजनेता, प्रशासक चिन्तक, लेखक कार्यकर्ता या सामान्य नागरिक हों. मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ ऐसे बहुत लोग हैं. और ये भी सच है कि दलितों पिछड़ों के हक की आवाज उठाने के लिए हजारों लाखों सवर्ण हिन्दूओ और ब्राह्मणों भी बहुत ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, पहले भी उन्होंने भारत को सभ्य बनाने के लिए और जाति सहित अस्पृश्यता आदि के उन्मूलन के लिए बहुत कुछ किया है. लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते तो इसका इमानदार विश्लेषण करना होगा.

    ऊपर के इस विस्तार में जाने के बाद आप देखेंगे कि जाति नाश आरंभ से एक ऐसा प्रयास रहा है जिसमे जाति व्यवस्था से पीड़ित लोगों की बजाय जाति व्यवस्था से फायदा उठाने वालों पर अधिक ध्यान दिया गया है. एक अर्थ में ये जरुरी भी था. दलितों पिछड़ों को ये बताना जरुरी था कि तुम्हारी दुर्दशा के लिए तुम नहीं बल्कि ये सामाजिक धार्मिक व्यवस्था जिम्मेदार है, ताकि वे हीन भावना से निकलकर कुछ करने को सक्षम हो सकें. साथ ही हिन्दुओं को उनके शास्त्रों और धर्म में छुपे कैंसर के बारे में भी बताना जरुरी था ताकि वे दुनिया की अन्य सभ्यताओं और धर्मों से अपनी तुलना कर सकें. ये काम न्यूटन या गेलिलियो के काम जैसा है. कबीर रैदास फूले अंबेडकर पेरियार आदि ने ये काम पूरी उंचाई तक ले जाकर मुकम्मल कर दिया है. एक तरह से उन्होंने न्यूटन की तरह गुरुत्वाकर्ष्ण सिद्धांत खोजकर दे दिया है. अब हमे आइन्स्टीन या स्टीफेन हाकिंग की तरह आगे बढना है. आज भी हम अंबेडकर फूले पेरियार की तरह सिर्फ सवर्णों को संबोधित करते रहेंगे तो इसका मतलब है कि हम हर पीढी में न्यूटन की तरह ग्रेविटी की खोज करते रहेंगे. फिर हम ग्रेविटी के ज्ञान पर आधारित राकेट यान कब बनायेंगे? तब हम मार्टिन लूथर की तरह समाज और संस्कृति में पुनर्जागरण कब लायेंगे?

    जाति व्यवस्था के लिए सवर्णों को संबोधित करने की बात हमारे लेखन, साहित्य, राजनीतिक सामाजिक बहस में और दस्तावेजों में डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण – एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट – से ही चली आ रही है. डॉ. अंबेडकर ने सवर्णों की सभा के लिए ही इसे लिखा था और इस भाषण के पहले और बाद में भी अपने लोगों के लिए सवर्णों की सदिच्छा पर निर्भर न रहते हुए भी स्वयं की शक्ति में भरोसा रखते हुए कई महत्वपूर्ण काम किये हैं, लेकिन जाति विनाश के विमर्श और आन्दोलन के केंद्र में जाति से पीड़ित जातियों की बजाय लाभ पाने वाली जातियों को रखने की प्रवृत्ति अभी भी कम नहीं हुई है. इसका सरल भाषा में मतलब ये हुआ कि आज भी दलित पिछड़ों के बीच में आपसे बातचीत होती है तो सवर्ण द्विज हिन्दुओं की भूमिका पर अधिक चर्चा होती है स्वयं दलित पिछड़े अपने बीच जाति भेद कैसे गिरा सकते हैं इस बात पर बहुत कम चर्चा होती है.

    दलितों पिछड़ों को समझना चाहिए कि समाज, राजनीती और शासन प्रशासन सहित व्यापार रोजगार आदि भी असल में सामाजिक आर्थिक संबंधों और राजनीतिक नेटवर्किंग या लॉबिंग से चलते हैं. ऊपर बताये उदाहरण में अगर सवर्ण प्रतिनिधि अपने बच्चों के इलाज के लिए या अपनी तनख्वाह बढाने के लिए शासन प्रशासन को मजबूर कर सकते हैं तो आपको भी यह सोचना है कि आप स्थानीय व्यापार, सामाजिक आर्थिक समीकरण, स्थानीय राजनीति, स्थानीय बाजार, स्थानीय या क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक या वैचारिक बहस को अपनी जातियों और वर्ण की एकता से कैसे प्रभावित कर सकते हैं? ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है जो राजनीति से ज्यादा समाज की रोजमर्रा जिन्दगी पर लागू होता है. इस प्रश्न का जो उत्तर है उसके दो पहलु हैं:

    1. पहला ये कि राजनीतिक या सामाजिक बदलाव लाबिंग या सामाजिक नेटवर्क के आपके हित में सक्रीय होने से होता है. ऐसा नेटवर्क बनाना और उसे आपके हित में सक्रीय करना आपकी यानि दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी है. अगर इसके लिए आप सवर्ण द्विज हिन्दुओं का मुंह देखते हैं तो आप कार्यवाही और सोच विचार की कमान उनके हाथों में दे देते हैं फिर वे जैसे चाहें आपको घुमाते रहेंगे.

    2. दूसरा ये कि अगर आप राजनीतिक सामाजिक नेटवर्क बनाने और सक्रिय करने में अपनी ही जातियों और वर्ण के लोगो को केंद्र में रखें सिर्फ उनसे ही उम्मीद करें और आपस में अपनी जातियों को पहले खत्म कर सकें तो जाति उन्मूलन के विमर्श और उसपर कार्यवाही की कमान आपके हाथ में होगी. तब स्वर्ण द्विज हिन्दू चाहकर भी आपको भटका नहीं सकेंगे. और तब वे आपके राजनीतिक नेतृत्व को खरीद भी नहीं पायेंगे.

    अब मुद्दा ये है कि समाज और राजनीति में दलित पिछड़े अपना नेटवर्क और अपनी लाबी को कैसे मजबूत करेंगे?

    इसके उत्तर के लिए हमें डॉ. अंबेडकर के वक्तव्य को ठीक से समझना पड़ेगा. जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है डॉ. अंबेडकर ने “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इस वक्तव्य पर गौर कीजिये. यहाँ सवर्ण हिन्दुओं से उम्मीद की जा रही है कि वे जाति व्यवस्था के जहर को समझें और ये भी समझें कि उनकी ये बीमारी शेष भारत के लिए क्यों खतरनाक है. बाद के दौर में हम देख पाते हैं कि सवर्ण हिन्दुओं को अपनी इस बीमारी की वजह से शेष भारत के नुकसान की कोई चिंता नहीं है. इसके विपरीत उन्हें इस बीमारी को बढाते जाने की चिंता अधिक है. अगर आप भारत में सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक संगठनों और प्रचलित बाबाओं कथाकारों और गुरुओं के कामों का विश्लेषण करें तो वे जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं बल्कि जिस पलायनवादी और पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से जाति व्यवस्था को ताकत मिलती है, उसी अध्यात्म का पाठ पढाये जा रहे हैं. सवर्ण सांस्कृतिक संगठन हिंदुत्व की विभाजक राजनीति कर रहे हैं और दलितों शूद्रों मुसलमानों के शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास, स्वास्थय सुविधाओं सहित सामाजिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संभावना को कमजोर बना रहे हैं, घोषित रूप से जाति आधारित आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं और इससे भी आगे बढ़कर वे आरक्षण के मुद्दे पर दलितों शूद्रों आदिवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं.

    इन बातों का मतलब ये हुआ कि सवर्ण द्विज हिन्दू अभी भी जाति को अपनी बीमारी के रूप में या देश के लिए खतरे के रूप में नहीं देख पा रहे हैं या इस तरह देखना नहीं चाहते हैं. इसका कारण भी साफ़ है कि चूँकि उन्हें इस बीमारी को बनाये रखने से फायदा होता है इसलिए वे अपनी तरफ से इसे खत्म करने का कोई काम नहीं करेंगे. इसका साफ़ मतलब ये है कि डॉ. अंबेडकर हिन्दुओं को नहीं समझा पाए कि वे बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी देश के लिए खतरनाक है. थक हारकर उन्होंने दलितों को बौद्ध धर्म में जाने की सलाह दी थी.  उनका ये कदम इस बात के लिए था कि सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद करना बेकार है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को स्वयं अन्धविश्वासी धर्म और परम्परा को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर अपनी मदद खुद करनी चाहिए.

    अब इस बिंदु पर आकर अब एक सबसे बड़ा सवाल उठता है कि स्वर्ण द्विज हिन्दुओं को छोडिये, क्या दलितों, शूद्रों आदिवासियों और मुसलमानों को ये बात समझ में आ गयी है कि “उनके अपने भीतर की जाति व्यवस्था उनके अपने लिए क्यों और किस तरह खतरनाक है?” ये सवाल अजीब लगेगा लेकिन यही असली सवाल है. और इसका उत्तर ये है कि दलितों पिछड़ों को पता ही नहीं है कि ये ‘उनकी अंदरूनी जाति व्यवस्था’ ही उनके लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है. मेरे इस वक्तव्य पर बहुत लोगों को तकलीफ होगी या इसका मजाक उड़ाया जा सकता है. लेकिन हकीकत यही है कि दलित और पिछड़े समुदाय अपनी खुद की अलग अलग जातियों में विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध नहीं तोड़ पाए हैं. अभी भी दलितों और आदिवासियों और शूद्रों में आपसी एकीकरण नहीं हो पाया है और इसी कारण इनके राजनीतिक और सामाजिक प्रेशर ग्रुप निकम्मे पड़े हैं.

    कल्पना कीजिये कि किसानों कामगारों और मजदूरों की जातियों में आपस में एकीकरण हो जाए, ये सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद लगाना छोड़कर खुद ही अपने बीच जाति नाश करके अपने बीच में विवाह और भोजन सहित अन्य सामाजिक आर्थिक व्यवहार शुरू कर दें तो क्या होगा? इससे ये होगा कि एक समाज के रूप में और एक राजनीतिक इकाई के रूप वे संगठित हो जायेंगे. एक जाति में दुसरी जाति की बेटी या बहु या रिश्तेदार होगा तो उन्हें उस जाति के गरीब या अमीर होने में दुःख या सुख का अनुभव होगा. ऐसे में जब सभी जातियों के हित एकदूसरे से विवाह और भोजन सहित व्यापार रोजगार आदि के रास्ते से जुड़ जायेंगे तब दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों के सामाजिक और राजनीतिक संगठन एक भारी संख्या (भारत की जनसंख्या का 70 प्रतिशत से भी अधिक) के जरिये अपने सपनों का समाज और भारत बना सकेंगे. तब तीस प्रतिशत या तीन प्रतिशत रसूखदारों को भी आपके लिए बदलना ही पड़ेगा. जब सवर्ण द्विज हिन्दू ये देखेंगे कि जाति व्यवस्था से ‘उन्हें’ उनकी राजनीति और उनके व्यापर को नुक्सान हो रहा है तब वे जाति उन्मूलन का प्रयास अपनी तरफ से इमानदारी से शुरू करेंगे. मतलब ये हुआ कि सभी दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों को अपनी अंदरूनी जाति व्यवस्था तोड़कर पूरे समाज को इस स्तर तक ले जाना है जहां सवर्णों को अपनी राजनीति, व्यापार, रोजगार आदि के मामले में जाति व्यवस्था से नफरत होने लगे. तभी वे कुछ करेंगे. और जब तक वे कुछ न करें तब तक हमें अपने भीतर जाति व्यवस्था को खत्म करना है.  

    अब इस लेख की शुरुआत में आये जार्ज बर्नार्ड शॉ के वक्तव्य पर लौटते हैं कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही है उसी दिशा में झंडा लेकर आगे हो लेने वाला नेता होता है” ये वक्तव्य असल में राजनीतिक नेतृत्व और राजनीतिक अवसरवादिता को व्यक्त करता है. साथ ही बर्नार्ड शॉ का ये मजाक असल में जनता की असली ताकत को भी उजागर करता है. जनता (हमारे लिए भारत की गरीब जातियां) अगर अपनी मर्जी से कोई एक दिशा चुन कर उसपर निकल पड़े तो सारे नेता उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ने के लिए मजबूर हो जायेंगे. इस बात को आप अभी भी होता हुआ देख सकते हैं. जिन लोगों ने गाय या मन्दिर या राष्ट्रवाद के इर्दगिर्द राजनीति खडी की है उन्होंने ये काम राजनीति में सीधे सीधे नहीं किया है बल्कि धीमे जहरीले धार्मिक प्रचार और शिक्षा, धार्मिक प्रवचनों, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों, धार्मिक सीरियल्स, कार्टून, फिल्मों आदि के माध्यम से भीड़ को धर्म, मन्दिर, गौरक्षा और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया है. अब जब भीड़ उन जहरीले प्रचार और शिक्षा को मानकर एक दिशा में निकल पड़ी तब उनकी “बी टीम” के राजनेता झंडा लेकर आगे हो गये हैं और भारत की राजनीति और संसद में ताकतवर होकर नजर आने लगे हैं.

    भीड़ के इस चुनाव के तर्क को आगे बढायें तो हमें देखना होगा कि दलित और पिछडे क्या सीखकर किस दिशा में दौड़ रहे हैं? आप गहराई से देखें तो उन्होंने इन सवर्ण धार्मिक बाबाओं, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों सहित उनके धर्म और देवी देवताओं से ही शिक्षा ली है और उस शिक्षा पर खड़ी जाति व्यवस्था और धर्म को अपनी ही अंदरूनी जातियों को मजबूत बनाने में इस्तेमाल किया है. जब सवर्ण नेता या किसी भी जाति वर्ण के नेता ये देखते हैं कि दलित या पिछड़े खुद ही जाति व्यवस्था और इस व्यवस्था को सिखाने वाले अन्धविश्वासी धर्म को ही मजबूत करने में लगे हुए हैं तो वे भी झंडा उठाकर उसी दिशा में दौड़ पड़ते हैं. इसमें उनकी गलती कम है दलितों पिछड़ों की गलती अधिक है. ऐसे में जाति व्यवस्था को खत्म करने वाला सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व उभर ही नहीं सकता. ऐसे में किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणापत्र में जाति उन्मूलन एक एजेंडे की तरह शामिल नहीं हो सकता. ऐसे में जाति उन्मूलन का वादा चुनाव में जीत का आश्वासन नहीं बन सकता.

    ये दलितों पिछड़ों की बड़ी आबादी के लिए बड़ी शर्म की बात है कि मंदिर या मस्जिद की लड़ाई या “मन्दिर वहीं बनायेंगे” जैसी बातें चुनाव में जीतने के लिए आश्वासन बन जाती हैं और “जाति सभी मिटायेंगे” जैसे नारों की कल्पना तक राजनीतिक घोषणापत्र या राजनीतिक रणनीति से नहीं जुड़ पाई है. इसका ये मतलब है कि बीमारी या कमजोरी राजनीति में नहीं है बल्कि दलितों पिछड़ों की भीड़ में ही कहीं असली बीमारी छुपी हुई है.  वे खुद अपनी राजनीतिक प्रतिनिधियों को ये सन्देश साफ ढंग से नहीं दे पाए हैं कि उन्हें जाति और जातिवादी धर्म को कमजोर करना पसंद है या इन्हें मजबूत करना पसंद है. जब राजनीतिक नेता दलितों पिछड़ों को सवर्ण हिन्दुओं के मन्दिरों में पंडालों में कथाओं और जगरातों में कीर्तन करता हुआ देखते हैं, पुनर्जन्म और आत्मा परमात्मा की शिक्षा से प्रभावित होता हुआ देखते हैं, लगन महूरत और ज्योतिष में भरोसा करता हुआ देखते हैं  तो वे समझ जाते हैं कि ये भीड़ जाति नाश की दिशा में नहीं बल्कि जाति को और जातिवादी धर्म को मजबूत करने की दिशा में जा रही है. तब वे भी अपनी अवसरवादी फितरत के साथ उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ते हैं और नारा लगाने लगते हैं. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ अपमानित किये जाने पर भी बार बार उसी मन्दिर में जाती है तो वे नेता नारा लगाते हैं कि ‘मंदिर वहीं बनायेंगे’. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ आपसी जातियां मिटाने लगें तो कल को ये ही नेता नारा लगायेंगे कि “जाति सभी मिटायेंगे”. आपके नेता क्या करेंगे क्या नारा लगायेंगे ये आपको आपकी भीड़ को और आपके समुदायों को आपस में मिलकर तय करना है.

    अब इस सब से करने योग्य क्या हासिल हुआ?

    इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि आपको जाति के नाश के लिए दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी है. दलितों पिछड़ों को सवर्णों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे आकर उनका धार्मिक अंधविश्वास और उस पर आधारित जाति को मिटा दें. इसके विपरीत दलितों पिछड़ों को आपस में मिलजुलकर अपनी-अपनी जातियों में विवाह, भोजन और सामाजिक, आर्थिक व्यवहार के अन्य रिश्ते बनाने होंगे. और इससे भी बढ़कर एक काम और करना होगा. जो धर्म या अन्धविश्वास जाति व्यवस्था को मजबूत करता है. जो धर्म या शास्त्र या गुरु या बाबा आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की शिक्षा देता है उससे दूरी बनाइए. उनकी शिक्षाओं में ही असली दुर्भाग्य छुपा हुआ है, जाति व्यवस्था की जड़ इसी धार्मिक शिक्षा में और इस पर आधारित पलायनवादी अध्यात्म में छुपी हुई है. अगर इस शिक्षा को दलित और पिछड़े नकार दें तो भारत भी सभ्य और समर्थ हो सकता है.

    ऐसे नकार के लिए दलितों पिछड़ों को अतिवादी नहीं बनना है, न कोई सेना या हिंसक आन्दोलन खड़ा करना है, न तो हिन्दू धर्म को अब अपमानित करना है न उनके देवी देवताओं शास्त्रों का उपहास करना है ये सवर्ण  हिन्दुओं का उनका अपना धर्म है वे जिस तरह उसे मानते हैं उन्हें मानने पूजने का संवैधानिक अधिकार उनके पास है. वे दलितों शूद्रों स्त्रीयों को अपने मंदिरों शास्त्रों के लिए अपवित्र या नीच समझते हैं तो दलितों शूद्रों को उन मन्दिरों शास्त्रों के निकट जाकर उन्हें दुखी नही करना चाहिए, ये शिष्टाचार की बात है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को पने मूल श्रमण धर्म ‘बौद्ध धर्म’ का अभी से पालन करना शुरू कर देना चाहिए. इसके लिए धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है. आपको सिर्फ आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक और अन्धविश्वासी बातों में विश्वास करना बंद करना है और भारत के संविधान के अनुरूप वैज्ञानिक चित्त का अपने भीतर और अपने परिवार रिश्तेदारों मित्रों में विकास करना है. अपने बच्चों और स्त्रीयों मित्रों रिश्तेदारों आदि को को काल्पनिक मिथकों, देवी-देवताओं, भूत-प्रेत, या पितरों आदि के पूजा पाठ आदि से दूर कर लेना है. किसी अंधविश्वास की गुलामी हो या उसका मजाक बनाना हो दोनों एक तरह की अति है, कोई भी अति समाज के लिए ठीक नहीं होती. इनके बीच में मध्यम मार्ग और संतुलित मार्ग ये है कि आप अपने भीतर की जाति व्यवस्था खत्म करें और अंधविश्वास से दूरी बना लें और वैज्ञानिक और नैतिक लोकतांत्रिक चेतना का विकास करते रहें. यही दलितों पिछड़ों और भारत को सक्षम और समृद्ध बनाने का रास्ता है.  

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • ईद के मौके पर बेहतरीन भविष्य की शुभकामनायें

    विद्या भूषण रावत

    ईद के ख़ुशी के मौके पर सभी दोस्तों को बहुत मुबारकबाद. देश के मौजदा हालातो से अफ़सोस तो होता है के जिम्मेदार लोगो की जुबान पर नफ़रत फैलाने वालो के लिए कुछ अल्फाज़ भी नहीं है. अभी अभी दिल्ली पहुंचा हूँ . रास्ते में देख रहा था बच्चे ख़ुशी ख़ुशी, चहकते हुए, महकते हुए ईदगाह की और जा रहे हैं . मन में सोच रहा था के इन बच्चो को पता है के उनके समय की दुनिया कैसी होगी , नफ़रत की आग में लोगो को झोंककर आप कौन सा विकास करोगे. क्या कोई मुल्क नफ़रत की सियासत पर तरक्की कर पायेगा. हम अपने मतभेदों को जानते हैं लेकिन मनभेद नहीं था पर आज जिस तरीके से इतिहास को तोड़कर, डंडे के बलपर, गली गली मुहल्लों में अफवाह फैलाकर जो नफ़रत फैलाई जा रही है उसका मुकाबला करना होगा . सदियों से साथ रह रहे लोगो को अलग करने की साजिश का पर्दाफास करना होगा.

    अगर इस देश में रह रही हज़ारो जातियों और कौमो में बहुत मतभेद थे और हैं तो उनके साथ रहने के भी लाखो किस्से मिलेंगे . केवल साथ रहने के नहीं, अपितु साथ चलने और साथ लड़ने के भी हजारो किस्से मौजूद हैं और उनको दोबारा से ढूंढ कर न केवल निकालना होगा अपितु उसको मौजूदा दौर में अपने राजनैतिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक जीवन का हिस्सा भी बनाना होगा.

    अराजक लोगो के पास इतिहास में खंगाल करके भी सिवाय तिकडमो के और कुछ नहीं है . समाज को हजारो जातियों में धकेल कर उसके खिलाफ लड़ने या उसके खात्मे के लिए उनके पास कोई इतिहास नहीं है. अब शातिरपने में मुसलमानों और अंग्रेजो को जातिव्यस्था का जनक बताकर ये लोग अपने किये पर पर्दा नहीं डाल सकते. सवाल ये नहीं के जातियां किसने बनाइ और कैसे आयी अपितु सवाल ये है के आप ने अपने इतने लम्बे इतिहास में जातियों और जातिवाद के खात्मे के लिए कौन कौन से आन्दोलन किये , क्या प्रयास किये . आज़ाद भारत में दलितों, पिछडो को थोडा सा भी हिस्सा देने पर उनके खिलाफ मेरिट की झूठी दलील देने वाले क्या वाकई में उनको न्याय देंगे.

    बहुत वर्षो पूर्व इंडोनेशिया के एक गाँव में गया . वो ऐतिहासिक बांडुंग से दूर जंगलो में था , जहाँ गया वो कबीलाई संस्कृति. एक सरदार और बाकी साथ में बैठे लोग . पर्दा था लेकिन सऊदी ब्रांड नहीं, मतलब औरते बात कर सकती थी. भाषा के तौर पर हम पूरी तरह अजनबी थे . हमारे इण्डोनेशियाई दोस्त ने परिचय कराया के मैं भारत से आया हूँ .बस उसका इतना कहना था के वहा के समुदाय के सर्वोच्च नेता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा . वह बहुत बाते बोल गए. कहा के हमारी संस्कृति, हमारा मज़हब पहले भारत आया और फिर इंडोनेशिया. इस्लामिक देश होते हुए भी वहां पर भारत का प्रभाव दिखाई देता है और उसको बदलने की किसी ने कोशिश न ही की . अभी भी इमामो के नाम विष्णु और राम के नाम पर मिल जायेंगे और सभी महिलाओं के नाम के आगे देवी कॉमन शब्द है चाहे वह मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम . गरुडा, बाली, राम आदि शब्द वह अत्यंत कॉमन हैं . हालांकि सऊदी पैसे का खेल अभी वहा भी दीखता है .

    इसलिए ईद की ख़ुशी में बहुत से बाते सोचने की हैं . मैं अमूमन धार्मिक त्योहारों पर ज्यादा नहीं बोलता लेकिन अगर कोई मुझे बधाई मिलती है तो दे देता हूँ लेकिन मैं मानता हूँ धार्मिक कर्म कांडो से दूर भी बहुत से लोग इन त्यौहारों को एक दुसरे से संपर्क बनाने के साधन मानते हैं. बहुत से लोगो के लिए ये मौके हैं गिले सिक्वे भुलाने के और नए सिरे से दोस्ती करने के . ईद के मौके पर मैं ये कहना चाहता हूँ के आज़ाद भारत के नागरिक होने के नाते के ये देश हमेशा सबका रहेगा . ये न हिन्दू राष्ट्र होगा न इस्लामिक न ईसाईं और न कोई और . हाँ इस देश में जिनको सदियों से सत्ता, शिक्षा,संस्कृति, व्यापार, आदि से दूर रखा गया वो अब हिसाब मांग रहे हैं और इसलिए इतनी सारी दिक्कते आ रही हैं . मुसलमान इस देश में न तो बाहर से आये और यदि आये भी तो ७०० वर्ष का लम्बा इतिहास है जब उन्होंने और लोगो के साथ मिलकर ये देश बनाया . अगर मुसलमानों को ७०० वर्षो का इतिहास का हिसाब देना है तो कुछ हज़ार वर्ष पूर्व आये आर्यों को भी अपना हिसाब देना पड़ेगा . शायद ये हिसाब किताब के कारण ही आजकल इतनी परेशानिया बढ़ी हैं .

    ईद के पर्व पर बहुत से लोग विरोध स्वरूप काली पट्टी पहनने की बात कर रहे हैं . विरोध करना बिलकुल वाजिब है और उसके लिए कुछ संकेतो की जरुरत होती हैं लेकिन मैं काले को विरोध के तौर नकारात्मकता के प्रतीक मानने के बिलकुल खिलाफ हूँ . न ही मैं काले धन, काला कानून इत्यादि जैसे नस्लवादी शब्दकोष का इस्तेमाल करता हूँ न करूँगा क्योंकि अन्याय के विरूद्ध हमारी लड़ाई में दलितों, पिछडो, हिस्पनिको, अफ्रीकी मूल के लोगो के साथ जाति, धर्म, नस्ल के आधार पर जो भेदभाव होता आया है उसके विरूद्ध सबको एक होना पड़ेगा . इसलिए देश में जो घट रहा है और उस पर जिम्मेवार लोगो के शंकित चुप्पी पर हमारा विरोध है और हम सभी साथियो के साथ खड़े हैं .

    एक बात सभी को याद रखनी चाहिए के दुनिया भर में इन्सानियातो को शर्मसार करने वाली घटनाएं धर्म को राजनीती के जरिये सत्ता में पहुँचने वाले लोगो ने बनाई है और इसमें गैर मजहबी जो अल्पसंख्यक होते हैं उनको खलनायक बनाकर रोटिया सकने का धंधा पुराना है , जरुरत है उसको पहचानने की . कोई देश अपने एक समुदाय या नागरिक को मारकर आगे नहीं बढ़ सकता . जो लोग ये सोचते हैं के गृह युद्ध से उनकी ‘चाहत’ पूरी हो जायेगी वो गलतफहमी में हैं. युद्ध, बम, मार काट ने आज तक तो किसी समस्या का समाधान नहीं किया है और आगे भी नहीं करेंगी . समस्याओं और गलतफहमियो का समाधान बातचीत में हैं और मत भिन्नता और डाइवर्सिटी को स्वीकारने में हैं .

    आज ईद के मौके पर एक बार फिर सभी को बहुत बहुत शुभकामनाये ,इन हालातो में भी हौसला बनाकर लड़ना है ताकि अपनी आगे की पीढ़ीयो को हम एक बेहतरीन समाज दे पाए . बुद्ध के मध्य मार्ग से उत्तम कुछ नहीं. हम सभी में १०० फ़ीसदी तो सभी एक नहीं सोचेंगे लेकिन कम से कम ५० फ़ीसदी भी समान सोच बनती है जो नफ़रत पैदा करने वालो की चालो को समझती है तो ३०% के दम पर देश पर राज चलाने वालो को २०१९ से पहले अच्छा विकल्प मिल सकता है . हम कही भी रहे लेकिन साथियो के संघर्षो में भागीदार बने, अगर पास में हैं तो शामिल हों, नहीं हैं तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और कम से कम विचार के लेवल पर तो प्रबुद्ध बने . लड़ाई बहुत बड़ी है लेकिन असंभव नहीं है . एक सुनहरे भविष्य के लिए हमें इतना तो करना पड़ेगा ही

     

  • किसान

    Prem Singh
    Agriculture Social Scientist

    [themify_hr color=”red”]

    जी हाँ किसान जीन्स पहनता है, चश्मा लगाता है, मोटरसाइकिल भी चलाता है, बैल गाड़ी, ट्रैक्टर सहित सभी गाड़ियाँ चलाता है। दारू भी पीता है, ख़ूब नाचता, गाता भी है। किसान मजबूरीवश मज़दूर भी हो सकता है, रिक्शा, ताँगा भी चलाता मिल सकता है।

    इस देश का किसान बिना ज़मीन का भी होता है और सैकड़ों बीघे का भी हो सकता है; साथ में जो मंत्री, विधायक बनकर सरकारी लूट से या खनिज आदि की डकैती डाल कर ज़मीन ख़रीदने के बाद भी किसान नहीं भी हो सकता है।

    किसान ज्योतिष,बैद्य या कवि भी हो सकता है। वह कोई भी उत्पादक जो प्रकृति के साथ मन से जीता है और मानव के उपयोग लिए कुछ भी निर्माड करता है किसान है। दार्शनिक अल्लहड़ता और श्रम दोनो का समन्वय ही किसानी है। किसानी ही इसका धर्म है।

    प्रकृति को हम सीधे पूजते है बिना किसी प्रतीक या बिचौलिया के, जैसे पेड़, नदी, गाय, पहाड़ आदि। जो हमारी चेतना के विकास के लिए जिये मरे हमारे आराध्य हैं जैसे राम, कृष्ण, गांधी आदि। हमारा कोई प्रतीक और बिचौलिया नहीं है। इस मर्म को जो जानता है वही इस देश को जानता है।  

    जो इसको जिये बिना, समझे बिना आयातित राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक सिद्धान्तों को या धार्मिक मान्यताओं को थोपना चाहता है वह स्वयं थक कर कुछ दिन में समाप्त हो जाता है या हमारे साथ घुल जाता है। अभी सब के सब आयातित और समाज विघटन के सिद्धांत( फूट डालो राज करो) पर आधारित राजनैतिक दल है। इसीलिए व्यक्तिवादी है और अल्पावधि में जनता नकार देती है।

    किसानो की धरती से निकले राजनैतिक सिद्धांत एवं दल की अभी भी प्रतीक्षा है।

     

     

  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!

     

  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!

     

  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!

     

  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!

     

  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!

     

  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!