Category: आपके आलेख

  • क्या केवल अंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण  उनका सम्मान करना है? –Prof Ram Puniyani

    क्या केवल अंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण उनका सम्मान करना है? –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    गत 14 अप्रैल को पूरे देश में लगभग सभी राजनैतिक दलों और समूहों ने डॉ भीमराव अंबेडकर की 127वीं जयंती जोरशोर से मनाई। परन्तु इस मौके पर भाजपा का उत्साह तो देखते ही बनता था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि कांग्रेस, अंबेडकर की विरोधी थी और उसने उन्हें कभी वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार ने जितना सम्मान अंबेडकर को दिया है, वैसा किसी और सरकार ने नहीं किया।

    जहाँ तक अंबेडकर पर कब्जा करने के अभियान का सम्बन्ध है, भाजपा, कई स्तरों पर काम कर रही है। पहला, वह यह प्रचार कर रही है कि कांग्रेस, अंबेडकर के विरुद्ध थी और दूसरा, कि भाजपा उनके नाम पर भीम जैसे एप जारी कर और पार्टी  के नेता दलितों के साथ उनके घरों में भोजन कर उन्हें सम्मान दे रहे हैं। इन दिनों अंबेडकर को सम्मान देने की होड़ मची हुई है और इस मामले में भाजपा ने सभी को पीछे छोड़ दिया है। परन्तु क्या भाजपा की नीतियाँ सचमुच उन सिद्धांतों के अनुरूप हैं, जो अंबेडकर को प्रिय थे? सम्मान का क्या अर्थ है? क्या किसी महान व्यक्ति की प्रशंसा में गीत गाना उसका सम्मान है या उसके सामाजिक व राजनैतिक योगदान को मान्यता देना?

    यह कहने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जहाँ तक विश्वदृष्टि और विचारधारा का प्रश्न है, भाजपा और अंबेडकर में कोई समानता नहीं है। भाजपा दो जुबानों में बोलने में माहिर है। पार्टी के इस दावे में कोई दम नहीं है कि कांग्रेस ने अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया। हम सब जानते हैं कि जाति प्रथा की बेड़ियों को काटने के अंबेडकर के संघर्ष से प्रभावित होकर ही महात्मा गांधी ने अपना अछूत प्रथा विरोधी अभियान चलाया था। यह अंबेडकर को सम्मान देने का सही और असली तरीका था। यद्यपि, अंबेडकर कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, परंतु फिर भी, उन्हें नेहरू केबिनेट में शामिल किया गया और कानून जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। कांग्रेस ने अंबेडकर के सरोकारों को गंभीरता से लिया और उन्हें संविधानसभा की मसविदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। नेहरू और कांग्रेस, दोनों सामाजिक सुधार के हामी थे और नेहरू के कहने पर ही अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल तैयार किया था, जिसका भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस ने जबरदस्त विरोध किया था।

    भाजपा का अंबेडकर के प्रति दृष्टिकोण क्या था? सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि भाजपा, 1980 में अस्तित्व में आई। उसके पहले उसका पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ (1952) और उसका पितृसंगठन आरएसएस (1925), राजनीति में सक्रिय था। इन तीनों ही संगठनो की मूल विचारधारा हिन्दू राष्ट्रवाद की थी। सभी नाजुक मोड़ों पर आरएसएस ने विचारधारा के स्तर पर अंबेडकर का विरोध किया। जब भारतीय संविधान का मसविदा संविधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया, उस समय आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ (30 नवंबर 1949) ने लिखा, ‘‘भारत के नए संविधान में सबसे बुरी बात यह है कि उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है…उसमें भारत की प्राचीन संवैधानिक विधि का एक निशान तक नहीं है। ना ही उसमें प्राचीन भारतीय संस्थाओं, शब्दावली या भाषा के लिए कोई जगह है…उसमें प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास की तनिक भी चर्चा नहीं है। मनु के नियम, स्पार्टा के लाईकरगस और फारस के सोलन के बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनु के नियम, जिन्हें मनुस्मृति में प्रतिपादित किया गया है, पूरी दुनिया में प्रशंसा के पात्र हैं और भारत के हिन्दू, स्वतःस्फूर्त ढंग से उनका पालन करते हैं और उनके अनुरूप आचरण करते हैं। परंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इस सबका कोई अर्थ ही नहीं है‘।

    इसी तरह जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया, उसके बाद इन संगठनों ने उन पर अत्यंत कटु हमला बोल दिया। आरएसएस मुखिया एमएस गोलवलकर ने इस बिल की कड़ी आलोचना की। अगस्त 1949 में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा कि अंबेडकर जिन सुधारों की बात कर रहे हैं ‘‘उनमें कुछ भी भारतीय नहीं है। भारत में विवाह और तलाक आदि से जुड़े मसले, अमरीकी या ब्रिटिश माडल के आधार पर नहीं सुलझाए जा सकते। हिन्दू संस्कृति और विधि के अनुसार, विवाह एक संस्कार है, जिसे मृत्यु भी नहीं बदल सकती। विवाह एक समझौता नहीं है, जिसे किसी भी समय तोड़ा जा सकता है‘‘। उन्होंने आगे कहा, ‘‘यह सही है कि देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू समाज की नीची जातियों में तलाक का रिवाज है परंतु इस आचरण को ऐसा आदर्श नहीं माना जा सकता, जिसका पालन सभी को करना चाहिए‘‘ (आर्गनाईजर, सितंबर 6, 1949)।

    भाजपा, एनडीए गठबंधन के सहारे सन् 1998 में सत्ता में आई। उस समय एनडीए सरकार की केबिनेट के एक महत्वपूर्ण सदस्य अरूण शौरी ने अंबेडकर की अत्यंत तीखी निंदा की थी।  वर्तमान सरकार के मंत्री यद्यपि अंबेडकर की मूर्तियों और चित्रों पर माला चढ़ाते नहीं थक रहे हैं परंतु एक केन्द्रीय मंत्री अनंतकृष्ण हेगड़े ने खुलेआम यह घोषणा की है कि भाजपा, संविधान को बदलना चाहती है। अंबेडकर, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता के जबरदस्त पक्षधर थे परंतु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धर्मनिरपेक्षता स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा झूठ है। भाजपा की रणनीति यही है कि वह एक ओर बाबासाहेब की शान में कसीदे काढ़ती रहे तो दूसरी ओर जाति और लैंगिक समानता के उनके सिद्धांतों को कमजोर करती रहे। बाबासाहेब के विचार क्या थे, यह इसी से स्पष्ट है कि उन्होंने उस मनुस्मृति का दहन किया था, जिस पर संघ परिवार घोर श्रद्धा रखता है।

    अंबेडकर, जाति के उन्मूलन के हामी थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि जाति, सामाजिक न्याय की राह में एक बड़ा रोड़ा है। इसके विपरीत, आरएसएस,जातियों के बीच समरसता की बात करता है और यही कारण है कि उसने दलितों में काम करने के लिए सामाजिक समरसता मंच गठित किए हैं। जहां तक जाति के उन्मूलन का प्रश्न है, उस पर संघ परिवार मौन धारण किए हुए है।

    भाजपा की राजनीति के केन्द्र में हैं भगवान राम। अगर भाजपा सचमुच अंबेडकर का सम्मान करती होती तो क्या वह भगवान राम को अपनी राजनीति का मुख्य प्रतीक बनाती? भाजपा ने भगवान राम के नाम का प्रयोग कर आम हिन्दुओं को गोलबंद करने का हर संभव प्रयास किया। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अयोध्या में राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है। आजकल रामनवमी का त्यौहार बहुत उत्साह से मनाया जाने लगा है और इस दौरान हथियारबंद युवा जुलूस निकालते हैं। वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि ये जुलूस मुसलमानों के इलाकों से जरूर गुजरें। अंबेडकर, राम के बारे में क्या सोचते थे? वे अपनी पुस्तक‘रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म‘ में राम की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि राम ने शम्बूक को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि वह शुद्र होते हुए भी तपस्या कर रहा था। इसी तरह, राम ने पेड़ के पीछे छुपकर बाली की हत्या की। अंबेडकर, राम की सबसे कटु आलोचना इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया और सालों तक उसकी कोई खोजखबर नहीं ली।

    अंबेडकर के चित्रों और उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण करके अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया जा सकता। उन्हें सम्मान देने के लिए यह जरूरी है कि हम मनुस्मृति की उनकी आलोचना को स्वीकार करें, भारतीय संविधान के मूल्यों को सम्मान दें और समर्पित भाव से धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के लिए काम करें। भाजपा की नीतियों ने दलितों के विरूद्ध पूर्वाग्रह में वृद्धि की है और उनके खिलाफ हिंसा भी बढ़ी है। पिछले चार साल इसके गवाह हैं। गांधी, नेहरू और कांग्रेस, अंबेडकर से उनकी मत विभिन्नता के बावजूद अंबेडकर और उनके सरोकारों का सम्मान करते थे।  

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • नरेंद्र मोदी : विरोधी इस बंदे की ताक़त और अंधभक्त इसकी कमज़ोरियों को खुली आंख से देखें –Tribhuvan

    नरेंद्र मोदी : विरोधी इस बंदे की ताक़त और अंधभक्त इसकी कमज़ोरियों को खुली आंख से देखें –Tribhuvan

    Tribhuvan

    लंदन में चोगम सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसून जोशी वाले कार्यक्रम को लेकर पूरी दुनिया में फैले भारतीयों के बीच ख़तरनाक़ बहस चल रही है। इससे पहले मोदी को चाहने वाले इकतरफ़ा मो:दी-मो:दी का समवेत गुंजार करते थे। अब मोदी के विरोधियों का स्वर भी बहुत प्रबल हो गया है; लेकिन एक चीज़ है कि मोदी के विरोधी मोदी की ताक़त और मोदी के भक्त मोदी की कमज़ोरियों को नहीं भांप रहे।

    मोदी विरोध का स्वर जब से मज़बूत हुआ है, राहुल गांधी भी उन्हें बांहें ऊंची करके चुनौती देने लगे हैं। लेकिन राहुल जी, एक बात समझने की है कि ये बंदा नरेंद्र मोदी है, न तो राजनाथ सिंह और न ही सुषमा स्वराज है। न यह अटल बिहारी वाजपेयी है और न ही लालकृष्ण आडवाणी। ये सबके सब राजनीति के उसी फ़ील्डक्लब के मेंबर थे, जिसमें आपकी कांग्रेस और उस जैसी अन्य पार्टियाें के लोग थे।

    मोदी को चुनौती दीजिए, लेकिन पहले मोदी को ठीक से समझ तो लीजिए। मोदी के सामने तुम नहीं हो यार। तुम सुरक्षा कर्मियों के हाथों में पल बढ़कर बड़े हुए हो। जहां पुलिस होती है, वहां भय ही होता है। निर्भीकता नहीं होती। खिलंदड़ापन नहीं हो सकता। इसीलिए तुम एक ऐसी भाषा और ऐसे अंदाज़ में मोदी का विरोध करते हो, जो जनपथ और अकबर रोड के कुछ ख़ास अहातों के गमलों में उगाई और आप तक पहुंचाई जाती है।

    यह भाषा आम हिन्दुस्तानी की भाषा नहीं है। आपके हावभाव भी आम भारतीय नागरिक के नहीं हैं। केवल कुर्ता और पायजामा पहन लेने से भर से आप ऐसे नेता का सामना नहीं कर सकते, जिसने घाट-घ्राट का पानी पिया हो। आपने बचपन से छान-छान कर ठाठ किए हैं और वह आग के दरियाओं को पार करके गांव की गलियों के गंदे और गलीज़ कहे जाने वाले जांबाज़ लड़कों के लड़ भिड़कर तरह-तरह के इम्तिहान में पास होकर निकला है।

    दरअसल राहुल बाबा, तुम समझते हो कि अब इस देश के विपक्ष की राजनीति में वही भाषा काम आएगी, जो आज तक आती रही है। तुम्हें तुम्हारे रायबहादुर (राय देने वाले बहादुर लोग) समझाते हैं कि मठों और मंदिरों में जाने से सत्ता की राह निकल आएगी। राह नहीं तो कोई पगडंडी ही मिल जाएगी। लेकिन यह ऐसे हाईवेज का जमाना है, जिसमें आगे की गाड़ी इतनी स्पीड से चलती है कि पीछे वाली उसे क्रॉस नहीं कर पाती।

    अब न तो अटल बिहारी का ज़माना है और न ही लालकृष्ण आडवाणी का। अब न तो वह संघ है और न ही वह भाजपा है। ये सबके सब राजाओं के जमाने से कार्पोरेट कलेवर में आ चुके हैं और अब कंपनी संस्कृति से सब चल रहा है और तुम हो कि अभी बाबा आदम के ज़माने वाली राजनीति का टटुआ दौड़ा रहे हो।

    तुम्हारा कांग्रेस संगठन दीमक लगे काठ का ऐसा घोड़ा है, जो लोहे की जंग लगी लगाम चबा रहा है। क्या इसके सहारे तुम मोदी का मुक़ाबला करोगे? यह जो मोदी है, वह अलग तरह का नेता है।

    यह सिर्फ़ प्रधानमंत्री नहीं है। यह सिर्फ़ भाजपा का नेता भर नहीं है। यह पट्‌ठा सियासी ज़मीन का पुराना कसरती है। यह दिल्ली के सब नेताओं से ज़्यादा ज़मीनी और ज़्यादा यथार्थवादी है। तुम भले इसे ज़्यादा शिक्षित मत मानो और तुम्हारी कांग्रेस के प्रति अप्रकट भक्ति वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी या वामपंथी-प्रगतिशील खेमे के लोग इसका उपहास उड़ाएं, लेकिन यह बंदा बहुत ज़्यादा शिक्षित नहीं होने पर भी दिल्ली में रहकर जंग खा चुके भाजपा और कांग्रेस सहित सभी दलों के नेताओं से कहीं अधिक तत्पर, संलग्न और कटिबद्ध है।

    यह दिल्ली या किसी प्रदेश की राजधानी के ऐश्वर्यशाली घर में पैदा हुआ लड़का नहीं है। यह राजनीतिक चांदनी वाले घरों के निर्जन आंगन में तुम्हारी तरह पला-बढ़ा राजकुमार भी नहीं है। यह सुदूर भारत के ठेठ गांव की गंदी और बदबूदार गलियों में पैदा हुआ, खेला-कूदा और सुलगते अभावों में गुलिस्तान ढूंढ़कर आगे बढ़ा लड़का है।

    यह शोलों, धुएं के बादलों और रुला देने वाली नाकामियों के बीच पला-बढ़ा है। इसका बचपन तपती बालू वाली धरती पर नंगे पांव गुजरा है। यह तुम्हारी तरह चांदनी बिछे आंगन के गमले में नहीं उगा है।

    यह हम आम हिन्दुस्तानियों के लालच को भी जानता है और साहस को भी। भारत की धरती के कोने-कोने की ख़ाक़ छान चुका यह कल का प्रदेश स्तरीय नेता आज का विश्वस्तरीय नेता बनने के दिवास्वयं बेच रहा है। यह बहुतेरे लोगों को ढिठाई से भरा भी दिखता है, लेकिन असल में यह बहुत ज़्यादा धैर्य की आधारशिला पर खड़ा एक वक्र व्यक्तित्व है। यह चिंताओं के कोहरे से भी घिरता है तो अपने लिए चांदनी से चिना एक मकान तलाश लाता है।

    आप अपनी घोर निष्क्रिय राजनीति की मुंडेर पर इसे जब धुएं की लकीर बनता देखते हैं तो यह अगले दिन शोला बनकर आप पर टूट पड़ता है। आप हों या वामपंथी, समाजवादी या फिर अन्यान्यपंथी, सबके सब अपने-अपने विचारों और अपने संगठनों के जंग को सहलाते हुए आंदोलनहीनता के कारण अपने चंद्रमाओं को अंधेरों में डुबोते हैं और इसका दुस्साहस देखिए कि यह बेवफ़ाई भी बहुत मज़े से करेगा और इम्तिहान से निकल जाएगा। यह जिस मेहरबान से काम निकालेगा, उसका दुश्मन भी हो जाएगा और भूतपूर्व मेहरबान को अपना हमदर्द बने होने के भ्रम में भी डाले रखेगा।

    यह हर दिन एक नया भ्रम पैदा करता है। यह अच्छी तरह जानता है कि इस देश का आम भारतीय कितना भोला-भाला है और उसका सियासी टटलू कैसे काटा जा सकता है! कैसे किसी हिन्दुस्तानी को पीली परत चढ़े पीतल को सोने की ईंट बताकर बेचा जा सकता है। लेकिन तुम्हें तो पगले अभी यही पता नहीं कि टटलू काटना कहते किसे हैं और यह टटलू काटने का उस्ताद है। यह राजनीति का बहुत मंजा हुआ खिलाड़ी है।

    भारतीय समाज मानता है कि जो पांडे जी के पांचों वेदों में, वह पंडाइन की छिगुनिया में! और यह तो भोले बंदे पंडाइन की छिगुनिया क्या, पूरी की पूरी पंडाइन को भी छिका-छुकूकर कलंदर हो गया।

    इसलिए दोस्त, न कांग्रेसियों के चक्कर में पड़ और न विदेशी पॉलिटिकल मैनेजरों के भुलावे में आ। अकबर रोड से फटाफट फूट ले और एकलव्य बनकर इसी से कुछ सीख ले। अंगूठे-वंगूठे तो कटते रहते हैं। इस मोल में हाथ भी कटे तो महंगा नहीं! यह बहुत कम पढ़ा लिखा है, लेकिन गुणा बहुत है। हालांकि न तो इसने और न तूने कभी अमीर मीनाई को पढ़ा होगा, लेकिन इस बंदे ने अभी घाेर विरोध के दिनों में अमीर मीनाई की ग़ज़ल के उस शेर को बहुत शानदार ढंग से सही साबित किया है कि : कौन सी जा (जगह) है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं, शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर!

    सच कह रहा हूं, सीख ले उससे कुछ कि कातिल भी बनो तो मरने वाले को यह एहसास करा दो कि यह खून आलूदा मिट्‌टी नहीं, उसे रचाने के लिए लाई गई मेंहदी है!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook

  • बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद –Sanjay Jothe

    बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध को पता चल चुका था कि उनकी मृत्यु तय हो चुकी है. एक गरीब लोहार के घर जहरीला भोजन खाने से उनके शरीर में जहर फैलने लगा था. गौतम बुद्ध जहर को अपने शरीर में फैलता हुआ अनुभव कर रहे थे. उन्होंने तुरंत घोषणा करवाइ कि वे अब विलीन होने वाले हैं और यह गरीब लोहार भाग्यशाली है कि इसके घर अंतिम भोजन करके मैं विलीन हो रहा हूँ.

    यह बात सुनकर वो गरीब लोहार ग्लानी और पश्चाताप से रोने लगा, बुद्ध ने उसे प्यार से समझाते हुए उसकी सुरक्षा के इन्तेजाम किये. साथ में बुद्ध के जो शिष्य थे वे अपने गुरु की इस करुणा और महानता से प्रभावित हुए. जहरीला भोजन कराने वाले व्यक्ति के प्रति भी उनमे इतनी करुणा थी.

    इसी तरह एक बार और बुद्ध अपनी सुरक्षा की चिंता किये बिना एक खूंखार हत्यारे अंगुलिमाल के पास जाते हैं. उन्हें पता है कि वह डाकू उनकी ह्त्या कर सकता है लेकिन वे फिर भी उसे समझाने जाते हैं और अपने प्रेम और करुणा से उसे प्रभावित करके अपने साथ लेकर ही लौटते हैं.

    बुद्ध की मृत्यु के बाद इन जैसी हजारों घटनाओं का पता चलते ही बुद्ध के शिष्यों का नैतिक साहस नई बुलंदी पर पहुँच गया. जो गुरु करुणा की मुद्रा में मौत को गले लगा सकता है उसके शिष्यों में एक ख़ास किस्म की नैतिकता आ ही जाती है. यही नैतिक साहस एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक धर्म को जन्म देता है.

    सदियों बाद डाक्टर अंबेडकर के जीवन में भी इस तरह की चुनौतियाँ और दुःख आते हैं. वे बहुजनों (ओबीसी, SC/ST और स्त्रीयों) की मुक्ति के लिए अकेले लड़ रहे हैं. उनके नवजात बच्चे गरीबी, बीमारी के कारण एक के बाद एक मरते जाते हैं. हालत ये होती है कि अपने बच्चों के कफ़न खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं होते हैं. उनकी पत्नी अपनी साडी के टुकड़े से अपने पुत्र का कफन बनाती हैं.

    डॉ. अंबेडकर और उनकी पत्नी इतनी विपन्नता, अपमान और दुःख के बावजूद न तो झुकते हैं न रुकते हैं और न कोई समझौता करते हैं. वे चाहते तो एक वकील या स्टॉक एक्सचेंज सलाहकार की तरह चुपचाप प्रेक्टिस करके मजे से सुविधापूर्ण जीवन जी सकते थे.

    एक अन्य अवसर पर महाराष्ट्र में कालाराम मंदिर सत्याग्रह के दौरान डॉ. अंबेडकर अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ खुद भी लाठी खाते हैं, उन पर जानलेवा हमला किया जाता है. इस सबके बीच वे अपने मित्रों अनुयायियों को छोड़कर भागते नहीं हैं. अपने मिशन में एक विराट नैतिक बल और नैतिक साहस लिए आगे बढ़ते हैं. उनके बाद हजारों बहुजन आन्दोलनकारियों को इन कहानियों ने प्रभावित किया और तैयार किया है.

    इसी तरह ओबीसी माली समाज से आने वाले ज्योतिबा फुले हैं, उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले हैं जिन पर हमले होते हैं वे भी भयानक गरीबी में बहुजन मुक्ति के लिए और शुद्रातिशुद्रों और स्त्रीयों की मुक्ति के लिए काम करते थे. वे कभी अपने लोगों को छोड़कर नहीं भागे न ही किसी के आगे झुके.

    * * *

    वहीं दुसरी तरफ अपने शरीर में बुद्ध के अवतरण की घोषणा करने वाले ओशो रजनीश को देखिये.

    ओशो रजनीश एक गाल पर चांटा पड़ने पर के बदले दोनों गाल नोच लेने की शिक्षा देते हैं. भारत की सरकार को आँख दिखाते हैं. अमेरिका को “फक यू” “गो टू हेल” कहकर चुनौती देते हैं. लेकिन जब भारत सरकार और अमेरिकी सरकार से निर्णायक लड़ाई का क्षण आता है तो पहले भारत में रातोरात अपने शिष्यों को अकेला छोड़कर भाग जाते हैं और दुसरी बार अमेरिका में अपने शिष्यों को अकेला मरने के लिए एक रात चुपचाप प्लेन में बैठकर उड़ जाते हैं.

    इस भयानक अंतर पर गौर कीजिये. श्रमण परम्परा के, बहुजन परम्परा के महापुरुष एक नैतिक साहस और इमानदारी के साथ अपने शिष्यों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते हैं. और दुसरी तरफ व्यापारी बुद्धि के ब्राह्मणवादी बाबा लोग सिद्धांतों की जलेबी बनाते हुए अपने ही शिष्यों का शोषण करते हैं और जरूरत पड़ने पर छोड़कर भाग जाते हैं.

    इसीलिये उनके शिष्यों में कोई नैतिक साहस और कोई सुधारवादी आन्दोलन नहीं पैदा होता.

    इस विस्तार में देखने के बाद आप समझ सकेंगे कि क्यों बुद्ध, फूले और अंबेडकर के शिष्यों में एक नैतिक साहस और स्पष्टता होती है और वे सब कुछ सहकर भी अपना आन्दोलन आगे बढाए जाते हैं.

    इससे ये भी समझ में आयेगा कि क्यों साबुन तेल शेम्पू या ध्यान, समाधि बेचने वाले भगोड़े बाबाओं के शिष्यों में एक अवसरवादिता, कायरता और अस्पष्टता होती है, और ऐसे भगोड़े बाबाओं के शिष्य क्यों कुछ नहीं कर पाते हैं. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

    मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

    Tribhuvan

    लोग उसे स्वामी विवेकानंद की तरह प्रेम नहीं करते, क्योंकि वह विदेशी भाषा में विदेशी लोगों को प्रसन्न करने के लिए विदेशी धरती पर नहीं गया था। उसे जब केशवचंद्र सेन ने कहा कि आप विदेश होकर आ जाएंगे तो भारत में आपको अपार सम्मान मिलेगा तो उसने कहा : पहले मैं अपने घर का अंधेरा दूर कर लूं। समय बचा तो वहां भी जाऊंगा। यह विचित्र साधु कोई और नहीं, दयानंद सरस्वती था। कबीर और मार्टिन लूथर के बाद यही साधु इस धरती पर हुआ, जिसने धार्मिक पाखंडों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। और साबित किया कि किस तरह मंदिर और मूर्तियां देश के पतन का कारण बन रही हैं।

    वह इस देश के कोने-कोने में घूमा। अफ़गानिस्तान के उस किनारे से लेकर बर्मा की सीमा तक वह गया। वह हर धर्म के भीतर तक गया। ज्ञान की थाह ली। वह हर धर्मग्रंथ की थाह लेने की कोशिश करता रहा। उसने मंदिरों में ईश्वर को तलाशने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हर जगह पतन और अंधेरे के दर्शन हुए। यह देखकर उनका खून खौल उठा और उन्होंने ऐसे समय में मंदिरों और मूर्तियों के खिलाफ़ आवाज उठाई जब देश में न आज जैसी चेतना थी और न हालात।

    दयानंद सरस्वती ने 1875 के आसपास ही अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश लिख दिया था। इसके 11वें अध्याय में उन्होंने मंदिरों और मूर्तियों को अध्यात्म के बजाय 16 बुराइयाों का कारण बताया और कहा कि ये विनाशकारी चीज़ें हैं। मंदिरों को उन्होंने भ्रष्टाचार और व्यभिचार का केंद्र बताया। उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर मंदिरों और साधुओं के हालात देखे और समझे थे और उनके बारे में बहुत खुलकर लिखा। हालांकि उनके इन विचारों के कारण ही एक रूढ़िवादी ब्राह्मण ने उन्हें दूध में शीशा पिघलाकर दे दिया था और उसी से स्वामी जी की मृत्यु हो गई थी। लेकिन आखिरी समय तक दयानंद सरस्वती ने मंदिरों-मूर्तियों के नाम पर चलने वाले गलत चीज़ों पर बहुत मुखर होकर आवाज़ उठाई थी।

    स्वामी जी ने मंदिरों और मूर्तिपूजा की 16 बुराइयां भी गिनाईं, जिनसे देश आज भी दो-चार हो रहा है। उनका कहना था, इससे मन-मस्तिष्क में जड़ता आ जाती है। धन का अपव्यय और दुरुपयोग होता है। मंदिरों में अपार चढ़ावा और धन आने से व्यभिचरण और दुराचरण बेरोकटोक फैलता है। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में लिखा कि मंदिर-मूर्तियां देश की एकता को खंडित करने का कारण बन सकती हैं, जो कि हम राममंदिर-बाबरी मस्जिद प्रकरण में देख ही रहे हैं। उनका तर्क था कि इससे पर्यावरण का भारी विनाश होता है और लोगों के समय, संसाधन और शक्ति का तो यह अपव्यय है ही। सिर्फ़ इसे ही भक्ति का कारण मान लेने से मनुष्य सच्चे आध्यात्मिक मार्ग से दूर हो जाता है और इस तरह वह धर्म के मार्ग को छोड़कर अधर्म की राह पकड़ लेता है।

    यह सही है कि मंदिर और मूर्ति के प्रति बहुत से लोगों की आस्थाएं जुड़ी होती हैं और सब मंदिरों में व्यभिचार भी नहीं होते। लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने आज से 143 साल पहले जो आशंका व्यक्त की थी, वह आसिफा जैसी सुकुमार बेटी के साथ हुए नृशंस कांड और शंभु की रामनवमी के दिन शोभा यात्रा की घटनाओं से बहुत सच साबित होती है। आखिर आसिफा के पिता ने भी तो सहज ही उत्तर दिया कि वे कितनी ही बार बेटी को ढूंढ़ते हुए मंदिर के पास से निकले, लेकिन यह सोचकर कभी भीतर नहीं गए कि इस पवित्र स्थल पर उसे कोई क्यों लेकर जाएगा! दयानंद का कहना था कि धर्म का उद्देश्य है अहंकारों और सभी तरह की बुराइयों का आत्म विसर्जन। न कि लोगों को लूटना-खसोटना। उनका कहना था कि मंदिरों के निर्माण से बेहतर है कि अाप सुदूर आबादियों में लोगों के भले के लिए ऐसे विद्यालय खोलें, जहां से विवेकी बनने की शिक्षा मिले। सत्यार्थप्रकाश में एक जगह जब कोई सनातन धर्म के सबसे बड़े उदघोष गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु वाला श्लोक पढ़ता है तो वे कहते हैं : गुरु कोई ब्रह्मा-व्रह्मा नहीं होता। गुरु अगर कामी-क्रोधी हो तो उसे समझाना, दंड देना और फिर भी न माने और कामुकता दिखाए तो मृत्युदंड दिलवा देना चाहिए। क्योंकि गुरु एक संस्था है।

    उनके लिए धर्म एक पाखंड मुक्त जीवन जीने की पद्धति है। समस्त संसार से प्रेम करने की एक प्रक्रिया। अपने झूठ और असत्य का परित्याग करने की और सत्य और आलोक को अपने भीतर समेट लेने की। वे ख्याति और मूर्तिस्थापना के बहुत विरोधी थे। इसलिए उन्होंने कहा था कि आप सब मेरे पदचिह्नों पर मत चलो। सच की तलाश करो और उसे आत्मसात करो। उनका कहना था कि जिस तरह बिना मनुष्य ज्ञानेंद्रियों का उपयोग किए बिना अंधेेरे और अविद्या का शिकार हो जाता है, उसी तरह धर्म के नाम पर मंदिर और मूर्तियां मनुष्य को अंधकार और अविद्या के मार्ग पर ले जाती हैं। उन्होंने अपनी मूर्ति या चित्र प्रकाशित करवाने के लिए भी वर्जनाएं की थी। वह बुरे लोगों और बुराइयों से अंतिम क्षण तक लड़े। काशी में पंडितों को चुनौती दी तो हरिद्वार में पाखंड खंडिनी गाड़ी। लोगों ने उन्हें बहुत चेताया, लेकिन उनका कहना था कि बुराइयों का विरोध करने में तनिक भी पीछे नहीं हटना चाहिए। एक भी इंच नहीं। वे अंतिम समय के अंतिम क्षण तक जीवंत बने रहे और मंदिरों-मठों और मूर्तियों को धर्म के विनाश और मानवता के पतन का कारण बताते रहे।

    मैं अपने पिता के पास बैठकर अपने स्कूली दिनों में सोचा करता था कि दयानंद के विचार रात के अंधकार में बिजली की कौंध की तरह हैं और वे भारत को सभी तरह के धार्मिक पापों से मुक्ति दिला देंगे। वे मेरी कच्ची उम्र के दिन थे। मुझे उन दिनों आर्यसमाज मंदिरों में आते साधु और विभिन्न भजनोपदेशक ऐसे बांस के पेड़ लगते थे, जिनसे कुछ दिनों में बांसुरियां बनेंगी और वे चेतना और विवेक की स्वरलहरियों से भारत की धरती को ही नहीं, समूचे विश्व को गुंजायमान बना देंगी। मेरे मानस पटल पर चेतना का आलोक झिलमिलाने लगा था। मुझे लगता था कि अभी कुछ ही समय बाद इस देश के समस्त कोने विवेक से दमक उठेंगे और समस्त शिक्षित लोग अंधेरों से लड़ रहे होंगे। लेकिन अब जब सच का वह स्वप्न भंग हुआ है तो देखता हूं कि जिस साधु ने मंदिरों, मूर्तियाें और सांप्रदायिकता (हिन्दी में यह शब्द सबसे पहले दयानंद सरस्वती ने ही प्रयुक्त किया था) के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी थी, उसी के वनोद्यान के बांस आज मूर्तियों, मंदिरों और सांप्रदायिकों के हाथों की कुल्हाड़ियों के दस्ते बने हुए हैं। वे अगर बांसुरियां बने होते तो शायद आज किसी आसिफा के साथ देश की सबसे पवित्र भूमि के मंदिर में ऐसा न केवल ऐसा नहीं होता। ऐसा करने वालों के समर्थकों का तो तत्काल ही शिरोच्छेन ही कर दिया जाता!



    Tribhuvan’s facebook wall

  • …. और डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए :: अम्बेडकर व गांधी –Prasanna Prabhakar

    …. और डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए :: अम्बेडकर व गांधी –Prasanna Prabhakar

    Prasanna Prabhakar

    गांधी जी की हत्या हो चुकी थी। उसके कुछ समयोपरांत बाबा साहब ने एक ब्राह्मण डॉ सविता कबीर से पुनर्विवाह किया। घटना उसी समय की है।

    डॉ अम्बेडकर ने कर्नाट प्लेस, दिल्ली के खादी भण्डार के पास प्यारेलाल को खड़े देखा। वह कार से उतर गए और सीधा उनके पास पहुंचे। बोले – यदि बापू जीवित होते तो वह जरूर इस विवाह को अपना आशीर्वाद देते। कहते-कहते डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए। हम उन्हें समझ नहीं सके- उन्होंने कहा।

    गांधी जीवित होते तो अम्बेडकर को शायद ही 1952 में रिपब्लिकन पार्टी बनाने नौबत पड़ती। गांधी की हत्या के बाद सामाजिक सुधारों के लिए जमीन पर काम करनेवाला अम्बेडकर के सिवा कोई बड़ा नाम शेष नहीं था।

    6 सितम्बर 1954, शायद अम्बेडकर ने महात्मा को इतनी बड़ी श्रद्धांजलि कभी न दी थी। राज्य सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा – “हम सभी जानते हैं कि दलित उनके निकटतम और प्रियतम थे। ” . (नमक पर कर लगाते हुए, उसे अनटचेबल सोसाइटी फण्ड में डालने की बात थी; संविधान सभा)

    राजनैतिक लाभ हेतु अक्सर विरोधाभासों को हवा दी जाती है। ऐसे में बहुत कुछ छुप जाता है।

    आज़ादी के बाद अम्बेडकर और गांधी, विरोधी नहीं (जैसा दिखाया जाता रहा है), बल्कि एक दूसरे के पूरक थे। असमय हत्या से भारतवर्ष ने बहुत कुछ खो दिया। अम्बेडकर भी कहाँ ज्यादा जी सके।

    अम्बेडकर जी भी बदले और गांधी जी भी। अम्बेडकर ने यह बात इसलिए कही होगी क्योंकि गांधी जी का यह निर्णय था कि वह केवल उसी विवाह को आशीर्वाद देंगें जिसमें एक पक्ष हरिजन हो। स्वर्गीय नारायण देसाई जी के विवाह में इसलिए ही नहीं गए जबकि वह अनन्य सहयोगी श्री महादेव देसाई के पुत्र थे।

    यह अलग बात है कि अपने चुने मार्गों से दोनों ही न डिगे। राजनीति भी पर्दा डालती है। वर्तमान लक्ष्य चुनिंदा बातों को ही उठाते हैं।

    बाकी नफरत की बातों को हवा देने के लिए मटेरियल मिल ही जाता है।

    4 साल पहले एक किताब पढ़ी थी- डॉ डी आर नागराज की द फ्लेमिंग फ़ीट (the flaming feet and other essays)। लेखक कर्नाटक के एक दलित समुदाय से ही सम्बद्ध थे। किताब गांधी-अम्बेडकर से शुरू होकर वर्तमान दलित राजनीति पर खत्म होती है।

    किताब के केंद्र में एक घटना है। पूना पैक्ट के बाद गांधी जी को अनशन तोड़ना है। एक दलित लड़के के हाथ से पानी पीने के बाद प्रतीकात्मक रूप से इस समय का चयन किया गया। वह लड़का नहीं आता है। बाद में पत्र लिखकर क्षमा माँगतें हुए यह बताता है कि वह चाहते हुए भी अपने समुदाय की भावना के विरुद्ध नहीं जा सकता। 
    डॉ नागराज भारत में दलित राजनीति का प्रारंभ यहीं से बताते हैं।

    मुद्दा स्व शुद्धिकरण और आत्मसम्मान के मध्य अटक गया। जरूरी दोनों थे और हैं।

    एक के आरोपों में यह था कि दूसरा केवल स्व शुद्धिकरण की बातें कर रहा है जबकि ऐसा नहीं था। तो दूसरे के अनुयायी केवल साथ खाकर और बैठकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते थे। ऐसे में अम्बेडकर का यह सोंचना सही ही था कि इससे दलित लीडरशिप उभरकर सामने नहीं आती। रिप्रजेंटेशन की बात करना अनायास ही नहीं था।

    अम्बेडकर उस परंपरा से भी परिचित होंगे जो जाति व्यवस्था को आध्यात्मिक रूप से नकारती थी…योगी, साधु, नाथपंथी ..

    मगर यह केवल आध्यात्मिक रूप से सिमटी रह गईं। राजनीति और समाज के दायरे में अधिक प्रभाव नहीं डाल सकी। एक विचार कहता है कि जाति का सुदृढ़ होना उपनिवेशवाद की देन है। यदि यह परंपरा इतनी ही प्रभावी होती तो इस दौरान इसका योगदान क्या रहा? निश्चित रूप से राजनीति हावी थी और राजनीति ही इसका इलाज ढूंढा गया।

    इसलिए यह प्रयोग अभिनव था। अपने को अलग दिखाने की प्रवृति आई। गांधी समझ चुके थे इसलिए संदर्भित समुदाय के आर्थिक स्वालम्बन के लिए तत्पर हो गए। वह भी स्वतंत्रता समर के बीच। स्वराज और स्वतंत्रता , कुछ तो फर्क होगा।

    नागराज आगे लिखते हैं कि दलित मूवमेंट का ओरिजिन दो ध्रुवों के मिलन में था। एक था ट्रान्सेंडैंटल आस्पेक्ट जो कास्ट ईगो से भिड़ता और दूसरा शिक्षा और जॉब में अवसर का मामला।

    अम्बेडकर ने दूसरे को पकड़ा। सिर्फ दूसरे को। गांधी ने हालांकि दोनों पर कोशिश की। लेकिन उनका जोर जॉब को ही सम्माननीय बनाने पर था । उनकी शिक्षा पद्धति में तो सवर्णों के लिए भी यही संदेश रहा। बाद में दोनों एक दूसरे की ओर बढ़े।

    नागराज कहते हैं कि दोनों में कोई भी पूर्ण नहीं हैं। एक दूसरे के पूरक अवश्य हैं। आगे लिखते भी हैं कि आज दलित मूवमेंट सिर्फ दूसरे पर अटक गया है और पहले को दूर ही करता जा रहा है। एक क्लोज्ड सिस्टम बनता जा रहा है जिसके भुक्तभोगी अंततः ये स्वयं होंगे।

    आज वो अवश्य कहते कि पहलेवाले भी सिर्फ स्किल की एकविमीय बातें करते हैं।

    किताब अच्छी है। वर्तमान दौर की कास्ट आधारित राजनीति पर एक अभिनव दृष्टि डालती है।

    Prasanna Prabhakar

  • ओशो रजनीश और भारत के बहुजनों का भविष्य –Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश और भारत के बहुजनों का भविष्य –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश पर जो नयी डॉक्युमेंट्री आई है उसे गौर से देखिये. शीला एक नादान किशोरी की तरह रजनीश से मिलती है. शीला के पिता रजनीश से प्रभावित हैं. शीला को उनके पिता कहते हैं कि ये व्यक्ति अगर लंबा जी सका तो ये दुसरा बुद्ध साबित होगा.

    हर किशोरी लड़की की तरह शीला भी अपने पिता के इन बाबाजी के प्रति समर्पण से स्वयं भी प्रभावित होती हैं. कुछ मुलाकातों के बाद वो स्वयं भी रजनीश को अपना सर्वस्व समर्पित करके उनके लिए काम करने लगती हैं. बाद में शीला एक नए एम्पायर को खड़ा करने के लिए एक शातिर संगठन की रचना और संचालन करती हैं. ये संगठन अमेरिका में स्थानीय नागरिकों और कानून व्यवस्था के लिए भारी चुनौतियाँ खड़ी करता है.

    अंत में रजनीश को भी कहना पड़ता है कि शीला एक अपराधी हैं और ईर्ष्यालु महिला है, शीला ने जो कुछ किया वह शीला की जिम्मेदारी है मेरी इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है. फिर ओशो रजनीश शीला पर लाखों डालर्स के गबन का और हत्याओं के षड्यंत्र का आरोप लगाते हैं और फिर शीला कानूनी पचड़ों से बचने के लिए जर्मनी के जंगलों में शरण लेती हैं.

    आज भी वे स्विट्जरलैंड में ज्यूरिख के पास किसी गाँव में गुमनाम और अपमानित सा जीवन जी रही हैं और ओशो रजनीश के कारनामों का खुलासा करती रहती हैं. अगर ये बाबाजी इनके जीवन में न आये होते तो इनका जीवन अधिक शांतिपूर्ण और सम्मानित हो सकता था.

    यहाँ इस प्रसंग में दो बातों पर गौर कीजियेगा.

    सबसे पहली और बड़ी बात ये कि शीला के पिता और शीला स्वयं ओशो रजनीश को “दुसरे बुद्ध” के रूप में देख रहे हैं. वे असल में ओशो रजनीश से नहीं बल्कि बुद्ध की महिमा से प्रभावित हैं और इसीलिये वे बुद्ध की तरह होने का दावा करने वाले ओशो के निकट आ रहे हैं. बाद में शीला जब ओशो रजनीश की हकीकत जानतीे हैं तब वे आश्चर्यचकित रह जाती हैं.

    दुसरी बात इस उदाहरण में यह दिखाई देती है कि ओशो रजनीश जैसे वेदांती धूर्त बाबा लोग किस तरह देश और दुनिया के प्रतिभाशाली लोगों को पहले बुद्ध और महावीर के निरीश्वरवादी श्रमण दर्शन की व्याख्या करके प्रभावित करते हैं और किस तरह बाद में उनसे पैसे बटोरने और अपराध करवाने का काम लेते हैं. बाद में इन्ही लोगों को दूध में गिरी मक्खी की तरह उठाकर फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कुछ संगठन आजकल भारत के युवाओं को दंगों में इस्तेमाल करने के बाद उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं.

    ये अध्यात्म बेचने वाले गुरु आजकल के जातीय और राजनीतिक दंगा करवाले वाले सांस्कृतिक संगठनों की चालबाजी से बहुत कुछ मिलते जुलते है. दोनों का तरीका बिलकुल एक जैसा है. किशोर और युवा लड़कों को धर्म संस्कृति और राष्ट्रवाद इत्यादि की बहस से प्रभावित करके उनसे दंगे करवाए जाते हैं शहर जलवाए जाते हैं और चुनाव जीते जाते हैं.

    इन दो बातों का बहुजन समाज के लिए और भारत की स्त्रीयों के लिए विशेष अर्थ है,

    अगर बुद्ध, आंबेडकर और लोहिया की प्रस्तावनाओं को आप अपना भविष्य बनाने के लिए या समाज और देश का भविष्य बनाने के लिए उचित समझते हैं तो आपको ओशो रजनीश जैसे बाबाओं और दंगा करवाने वाले सामाजिक राजनीतिक संगठनों से बहुत सावधान रहना चाहिए, आप यहीं फेसबुक पर देख सकते हैं, ओशो रजनीश के अधिकाँश सन्यासी पक्के हिन्दुत्ववादी और ब्राह्मणवादी हैं.

    आजकल के दंगाई जिस तरह मासूम बच्चों को दंगों में झोंकते हैं उसी तरह ये बाबा लोग भी सरल मन के स्त्री पुरुषों को शातिर अपराधियों में बदल डालते हैं. शीला का उदाहरण एकदम आजकल के दंगों में बर्बाद हुए युवकों के उदाहरण से मिलता है.

    ये न सिर्फ व्यक्ति के मनोविज्ञान को तहस नहस कर देते हैं बल्कि एक समाज की नैतिकता और नागरिकता बोध को भी बर्बाद कर डालते हैं.

    एक अन्य बात आप गौर से देखिये, अभी इस देश में कितना शोषण दमन अपराध और षड्यंत्र चला रहा है. और इन जैसे बाबाओं के करोडो “अध्यात्मिक” और “ध्यानी” शिष्य इस देश में हैं. वे इस समाज में हो रहे इन बलात्कारों अपराधों और दंगों के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाते. वे दंगाइयों और बलात्कारियों के साथ खड़े हैं.

    ये “व्यक्तिगत मोक्ष” साधने वाले और ध्यान समाधि और बुद्धत्व का ढोल पीटने वाले लोग भारत के सबसे घिनौने और शातिर लोग हैं. ये अपने गुरुओं और राजनीतिक दलों की ही तरह अवसरवादी धूर्त होते हैं.

    भारत के ओबीसी, दलितों, आदिवासियों और स्त्रीयों (सभी बहुजनों) को इनसे दूर ही रहना चाहिए.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • नेहरु की विरासत की अवहेलना, भारतीय प्रजातंत्र को कमज़ोर करेगी –Prof Ram Puniyani

    नेहरु की विरासत की अवहेलना, भारतीय प्रजातंत्र को कमज़ोर करेगी –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    पिछले कुछ वर्षों से, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु की विरासत को नज़रंदाज़ और कमज़ोर करने के अनवरत और सघन प्रयास किये जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उनका नाम लेने से बचा जा रहा है और कई स्कूली पाठ्यपुस्तकों में से उन पर केन्द्रित अध्याय हटा दिए गए हैं। राष्ट्रीय अभिलेखागार की भारत छोड़ो आंदोलन पर केन्द्रित प्रदर्शनी में उनका नाम तक नहीं है। सत्ताधारी दल के प्रवक्ता,वर्तमान सरकार की असफलताओं के लिए नेहरू की नीतियों को दोषी ठहरा रहे हैं। सोशल मीडिया में उनके बारे में निहायत घटिया बातें कही जा रही हैं। यह बताया जा रहा है कि वे और उनके पुरखे अत्यंत विलासितापूर्ण जीवन जीते थे। ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर, विभाजन और कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को दोषी ठहराया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो यहां तक कह दिया कि नेहरू ने सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया था।

    आईए, हम उद्योग, तकनीकी, कृषि, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में नेहरू के योगदान पर नजर डालें और यह देखें कि आधुनिक भारत के निर्माण में उनका क्या योगदान था। नेहरू, अंतर्राष्ट्रीय मामलों से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ थे। वे पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के विरूद्ध चल रहे संघर्षों के समर्थक थे और नस्लवाद के कड़े विरोधी थे। वे सभी देशों की समानता के पक्षधर थे। जहां तक भारत का प्रश्न है, गांधीजी के जादू से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। कांग्रेस के अध्यक्ष बतौर उन्होंने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने की मांग की। वे केवल खादी पहनते थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और वे कुल मिलाकर 3,269 दिन जेल में रहे। वे एक जिज्ञासु पाठक और प्रतिभाशाली लेखक थे। उनकी आत्मकथा व उनके द्वारा लिखित ‘भारत एक खोज‘ और ‘पिता के पत्र, पुत्री के नाम‘अंतर्राष्ट्रीय साहित्य की अनमोल विरासत हैं। विभाजन का मुद्दा काफी उलझा हुआ था। अंग्रेज, इस देश को दो टुकड़ों में बांटने पर आमादा थे। वे ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि सावरकर ने काफी पहले द्विराष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया था और जिन्ना, अलग इस्लामिक देश की अपनी मांग पर अड़े हुए थे। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में से पटेल वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें यह अहसास हो गया था कि देश का विभाजन अपरिहार्य है। नेहरू को इस कड़वे सच को स्वीकार करने में कई और महीने लग गए। कश्मीर के मामले में पटेल ने जूनागढ़ में भाषण देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान हैदराबाद पर अपना दावा छोड़ दे तो भारत, कश्मीर को उसका हिस्सा बनने देगा। शेख अब्दुल्ला के जोर देने पर नेहरू ने कश्मीर के महाराजा के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर करवाकर, भारतीय सेना को पाकिस्तानी कबाईलियों से मुकाबला करने कश्मीर भेजा।

    जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है, गांधीजी को देश ने यह अधिकार दिया था कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री को चुनें। गांधीजी को यह अहसास था कि नेहरू को वैश्विक मामलों की बेहतर समझ है और राजनैतिक दृष्टि से वे पटेल की तुलना में उनके अधिक योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध होंगे। जहां तक लोकप्रियता का सवाल है, नेहरू, पटेल से कहीं आगे थे। एक बार एक आम सभा में उमड़ी भारी भीड़ के बारे में पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर पटेल ने कहा कि लोग जवाहर को देखने आए हैं,उन्हें नहीं।

    आज सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने की नेहरू की नीति की आलोचना की जा रही है। यह नीति नेहरू ने अकारण और केवल अपनी इच्छा से नहीं अपनाई थी। बांबे प्लान (1944) के तहत उद्योगपति, सरकार से आधारभूत उद्योगों की स्थापना के लिए सहायता की अपेक्षा कर रहे थे। सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित आधारभूत उद्योगों ने देश की औद्योगिक प्रगति की राह खोली। नोबेल पुरस्कार विजेता पाल कुर्गबेन ने कहा था कि भारत ने तीस साल में जो हासिल किया है, उसे हासिल करने में इंग्लैंड को 150 साल लग गए थे। यह इसलिए हो सका क्योंकि गणतंत्र के शुरुआती वर्षों में नेहरू ने देश को एक मजबूत नींव दी।

    शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में उनकी नीतियों के कारण ही आज हम दुनिया के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा कर पा रहे हैं और भारत एक बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। औद्योगीकरण के साथ-साथ, नेहरू ने शिक्षा और विज्ञान पर भी बहुत जोर दिया। आज अगर हम अपनी तुलना उन देशों से करें, जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए थे, तो हमें पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी के मामले में हम उनसे कहीं आगे हैं। नेहरू और अंबेडकर ने यह सुनिश्चित  किया कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अधीन नागरिकों में वैज्ञानिक समझ का विकास करने की जिम्मेदारी राज्य को सौंपी जाए। नेहरू ने नीति निदेशक तत्वों के इस हिस्से को मूर्त स्वरूप देते हुए आईआईटी, इसरो, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, सीएसआईआर इत्यादि जैसी संस्थाओं की नींव रखी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसी उत्कृष्ट संस्थाओं की स्थापना की गई।

    जब हम स्वाधीन हुए, उस समय देश की साक्षरता दर 14 प्रतिशत और औसत आयु 39 वर्ष थी। आज हम मीलों आगे निकल आए हैं, यद्यपि हमें और आगे जाना है।

    सामाजिक स्तर पर नेहरू बहुवाद के हामी थे और धर्मनिरपेक्षता को राज्य की मूल नीतियों का हिस्सा मानते थे।  अपनी इसी प्रतिबद्धता के चलते, विभाजन के बाद हुए कई दंगों में वे हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए खुली जीप पर सवार हो खून की प्यासी भीड़ों के बीच गए। सन् 1961 के जबलपुर दंगों के बाद, उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया। आज के शासकों के विपरीत, वे धार्मिक अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत सके। उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं जैसे योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को कमजोर या समाप्त किया जा रहा है। आज देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है और कारपोरेट घरानों को लूट की पूरी छूट मिली हुई है।

    क्या उनमें कोई कमियां नहीं थीं? क्या उन्होंने कोई गलती नहीं की? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। उनके हिस्से में असफलताएं और गलतियां भी थीं। उन्होने चीन पर अगाध विश्वास किया और भारत-चीन युद्ध में हम पराजित हुए। बड़े बांधों के संबंध में उनकी नीति में भी कमियां थीं। परंतु कुल मिलाकर उन्होंने न केवल भारत,बल्कि पूरी दुनिया पर अपनी गहरी और सकारात्मक छाप छोड़ी है।

    क्षुद्र सोच से ग्रस्त आज के शासक, नेहरू के योगदान को नजरअंदाज करना चाहते हैं। वे उसे कम कर बताने की कोशिश कर रहे हैं। नेहरू द्वारा स्थापित दो महत्वपूर्ण संस्थाओं योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को भंग कर दिया गया है। नेहरू आज विघटनकारी और संकीर्ण विचारधारा के निशाने पर हैं। उनके बारे में अगणित झूठ फैलाए जा रहे हैं। सबसे घृणास्पद यह है कि सुनियोजित तरीके से उनके व्यक्तिगत चरित्र, उनके परिवार और उनके योगदान को बदनाम किया जा रहा है। आज जो लोग सरकार में हैं, उनके विचारधारात्मक पूर्वजों ने कभी स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। उनके पास अपना कहने को कोई नायक है ही नहीं। यही कारण है कि वे सरदार पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं। विचारधारा के स्तर पर वे नेहरू को अपनी राह में बड़ा रोड़ा पाते हैं। अगर नेहरू की विचारधारा इस देश में जिंदा रहेगी तो वे अपने संकीर्ण लक्ष्यों को कभी हासिल न कर सकेंगे। यही कारण है कि वे नेहरू पर कीचड़ उछाल रहे हैं।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

    वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

    Kumar Shyam

    यह विडियो राजस्थान के चूना बहुल इलाक़ों में स्थित चूना-फैकिट्रयों में काम करने वाले श्रमिकों के वास्‍तविक हालातों की ग्राऊंड-रिपोर्टिंग है। सीमित संसाधनों से एक यूट्यूबर द्वारा इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासी एवं स्‍थानीय मज़दूरों पर होने वाले बेतहाशा शोषण को सामने लाने का प्रयास है। सियासत और मुख्‍यधारा की मीडिया के लिए अरूचिकर हो चुके इन मसलों को इस विडियो में दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह से इन फैक्ट्रियों में मज़दूरों के स्‍वास्‍थ्‍य से लेकर उनके रहन-सहन की मलभूत आवश्‍यकतओं से वंचित रखा जाता है। पर्यावरणीय प्रदुषण के अलावा स्‍थानीय ग्रामीणों को किस तरह से मुश्किलों को सामना करना पड़ता है।

    Kumar Shyam

  • “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    एक अफ़गान मित्र जो कि वरिष्ठ एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव-विज्ञानी/समाजशास्त्री) हैं और जो राजनीतिक शरणार्थी की तरह यूरोप में रह रही हैं शाम होते ही कसरत करने लगीं, दौड़ने लगीं, वे अकेली नहीं थीं उनके साथ स्थानीय यूरोपीय लड़कियां और दो अमेरिकी अधेड़ प्रोफेसर भी कसरत कर रहे थे. होटल से लगे मैदान में वे हँसते मुस्कुराते हुए वर्जिश कर रहे थे. ये सब अगले दिन से शुरू होने वाली कांफ्रेंस के लिए आये थे. मैं उनका मेहमान था. कुछ समय बाद भोजन पर बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा कि आप सब पहले से ही इतने स्वस्थ और संतुलित शरीर वाले हैं आज ही आप यात्रा करके पहुंचे हैं आज कसरत न करते तो क्या हो जाएगा?

    स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में मानवशास्त्र और समाजशास्त्र कांफ्रेंस के दौरान इन मित्रों से मुलाक़ात हुई और कांफ्रेंस के दौरान कुछ एक गजब की बातचीत हुई, आज अपने भारतीय मित्रों के लिए यहाँ रख रहा हूँ.

    मेरा प्रश्न सुनकर अफगान प्रोफेसर हंसने लगीं, मैंने मजाक में कहा कि अब आपको इस हंसी के बारे में और अपनी कसरत के औचित्य के बारे में कोई गंभीर एंथ्रोपोलोजिकल या समाजशास्त्रीय व्याख्या देनी ही पड़ेगी. सभी मित्र हंसने लगे सभी मित्र मजाक के मूड में थे, आगे इस मुद्दे पर वे अफ़ग़ान प्रोफेसर बोलने लगीं कि पहले मैं भी ऐसे ही सोचती थी कि एक दो दिन कसरत न की जाए तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन बाद में समझ में आया कि अच्छी आदतों का एक अपना प्रवाह होता है एक सातत्य होता है जो बनाकर रखना जरुरी होता है. न केवल अच्छी या बुरी बातों का व्यक्तिगत चुनाव से रिश्ता होता है बल्कि उनका आपके समाज संस्कृति और धर्म से भी सीधा रिश्ता होता है. 

    ये बात अफगानिस्तान में रहते हुए समझ नहीं आई थी. लेकिन जब अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा और यहाँ यूरोप में आकर बसी तब पता चला कि एशिया और यूरोप की संस्कृति और समाज में बुनियादी फर्क क्या है और इस फर्क का इंसानों के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य से क्या रिश्ता है.

    आगे उन्होंने बताया कि असल में अफगानिस्तान पाकिस्तान भारत नेपाल जैसे मुल्कों में शरीर और मन के स्वास्थ्य का ख्याल रखने के लिए कोई इंसेंटिव और कोई व्यवस्था ही नहीं है. वहां सब कुछ मुर्दा और जड़ व्यवस्था में बंधा हुआ है. इसीलिये लोगों के शरीर और मन भी मुर्दा हो गये हैं. व्यक्तिगत जीवन में सृजन और प्रेम न होने के कारण ये मुल्क अपनी सेहत भी ठीक नहीं रख पाते. इसीलिये अफगानिस्तान भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में डाइबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत तो पूरी दुनिया में डाइबिटीज के मामले में पहले नम्बर पर है. 

    पाकिस्तान अफगानिस्तान के नीम हकीमों के इश्तिहार देखिये वे दो ही चीजों को बीमारिया समझते हैं तीसरी कोई बीमारी नहीं उनकी नजर में. ये दो बीमारियाँ हैं – कब्ज और नपुंसकता. ये दोनों  चीजें सीधे सीधे लाइफस्टाइल और समाज के मनोविज्ञान से जुडी हुई हैं. ये कब्ज और नपुंसकता न केवल इन समाजों के इंसानों के शरीर में है बल्कि इनकी संस्कृति में भी है. ये समाज न कुछ पैदा कर पा रहे हैं न पुरानी गंदगी को शरीर से बाहर निकाल पा रहे हैं. ये कहकर वे हंसने लगीं.

    ये बात सुनकर मैं चौंका, मैंने उनसे पूछा कि थोड़ा विस्तार से बताइए.

    वे आगे बताने लगीं कि वे पेशावर, कराची और दिल्ली में भी रह चुकी हैं, काबुल में पैदा हुई हैं. उन्होंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के समाज धर्म और संस्कृति को बहुत करीब से देखा है. भारत और पाकिस्तान में बचपन से ही लोगों को अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए कोई प्रेरणा या कारण नहीं दिया जाता. 

    इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहाँ प्रेम करने, दोस्ती, खेलकूद, और औरत मर्द के बीच रिश्ते बनाने की कोई आजादी नहीं है. कबीलों और अमीर गरीब के झगड़े इतने ज्यादा हैं कि आप अपने लिए दोस्त या लड़की या लड़का चुनकर उसे प्रभावित करके अपना दोस्त या जीवनसाथी बनाने की कल्पना ही नहीं कर सकते. आप अपने पडौसी, सहकर्मी, बॉस, या अधीनस्थ को उसकी कबीले वंश इलाके या जाति के गणित लगाये बिना बर्दाश्त ही नहीं कर सकते.

    भारत पाकिस्तान या अफगानिस्तान जैसे समाजों में लड़का लड़की अपनी मर्जी से अपने साथी नहीं चुन सकते. लेकिन यूरोप में वे अपनी मर्जी से ही जीवन साथी और मित्र चुनते हैं. इसीलिये यूरोपियन लड़के लडकियां ही नहीं बल्कि अधेड़ और बूढ़े बूढियां भी अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं. मन को प्रफुल्लित और स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि बेहतर भाषा, बातचीत के ढंग, नये विषयों का ज्ञान, नए हुनर, नई कलाएं संगीत, नृत्य, काव्य इत्यादि सीखकर अपने मित्रों और गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड आदि को प्रभावित कर सकें. 

    इस तरह न केवल वे व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक और मानसिक स्तर पर अनुशासित, स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं बल्कि इसी कारण से वे सामूहिक रूप से एक स्वस्थ, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज का निर्माण भी करते हैं. इसीलिये वे विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, खेलकूद, साहस और शौर्य आदि में बेहतर प्रदर्शन करके दुनिया पे राज करते हैं.

    आगे उन्होंने बताया कि पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत जैसे देशों में मामला एकदम उलटा है. यहाँ लड़की को उसका पति और लडके को उसकी पत्नी, उसके माँ बाप खोजकर देते हैं. उन्हें खुद अपने लिए जीवनसाथी की तलाश का कोई अधिकार नहीं है. इन बदनसीब मुल्कों में अगर कोई लडकी अपने लिए खुद कोई लडका चुन ले तो या तो परिवार और कबीले की नाक कट जाती है या जाति और कुल की नाक कट जाती है. ये लडके लडकियाँ अपनी योग्यता या अपनी खूबियों का प्रदर्शन करके अपने लिए बेहतर जीवनसाथी नहीं चुन सकते. इसीलिये उनके जीवन में अपने शरीर, मन, कैरियर को बेहतरीन हालत में बनाये रखने के लिए एक बहुत स्वाभाविक सी प्राकृतिक प्रेरणा ही जन्म नहीं ले पाती.

    ऐसे में इन मुल्कों के लडके लड़कियों को अच्छी भाषा, बातचीत का ढंग, कला, नृत्य, काव्य, संगीत इत्यादि सीखने की प्रेरणा ही नहीं होती. अगर आप इन सब कलाओं से अपने संभावित जीवनसाथी को प्रभावित और आकर्षित ही न कर सकें तो आपके व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक जीवन से सभ्य होने की, संवेदनशील या सृजनात्मक होने की सारी प्रेरणा ही खत्म हो जायेगी.

    पूरे जीव जगत और पेड़ पौधों को देखिये. वहां भी सारी सृजनात्मकता, कला, कौशल, शौर्य, क्षमता और सौन्दर्य का सीधा संबंध अपने लिए बेहतर जीवनसाथी के चुनाव से जुडा हुआ है. जिन समाजों ने इस सच्चाई का सम्मान किया है वे आगे बढ़े हैं और इस सच्चाई को नहीं समझ सके हैं वे बर्बाद हुए हैं.

    अब एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़की के बारे में सोचिये. उसे उसके माँ बाप उसका पति खोजकर देंगे. वो लडकी खुद अपनी मर्जी से अपना साथी नहीं चुन सकती. ऐसे में वो अपने आसपास के हजारों लड़कों में से अपनी पसंद के लडके को प्रभावित या आकर्षित करने के लिए न गीत संगीत या नृत्य सीखना चाहेगी, न कविता या शायरी सीखेगी न अच्छा भोजन बनाना सीखना चाहेगी न ज्ञान विज्ञान सीखेगी, वो सिर्फ और सिर्फ अपने चेहरे को खुबसुरत बनाने पर ध्यान देगी. 

    वो लडकी उतना ही सीखेगी या करेगी जितना कि उसके माँ बाप द्वारा खोजे गये नये परिवार और पति को खुश करने के लिए न्यूनतम रूप से आवश्यक होगा. यही चीज सेक्स और रोमांस के संबंध में उसकी क्षमता या पसंद को भी नियंत्रित करेगी वो कभी भी सेक्स या और्गाज्म का पूरा सुख नहीं लेना चाहेगी, क्योंकि ऐसा करते ही वो अपने पति की नजर में “गंदी औरत” बन जाएगी.

    इसी तरह एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़का भी अपने संभावित जीवन साथी को चुन नहीं सकता इसलिए वो अपने शरीर को स्वस्थ रखने, मन को सृजनात्मक बनाने, नयी कला, गीत संगीत, काव्य, हुनर आदि सीखने के लिए प्रेरित ही नहीं होता.

    अन्य मित्र भी इन बातों का समर्थन कर रहे थे. वे भी समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के प्रोफेसर और रिसर्चर थे. किसी एक ने भी इन बातों का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने अलग अलग अनुभवों से इन बातों का समर्थन ही किया.

    इन बातों के प्रकाश में भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के समाज संस्कृति और धर्म को ठीक से देखिये.

    इन मुल्कों में शादियाँ, रिश्तेदारी और संबंध प्रेम के आधार पर नहीं बल्कि घृणा के आधार पर होते हैं. शादी ब्याह में अधिक जोर इस बात पर होता है कि किन जातियों कबीलों या समुदायों को “नहीं” लाना है. किन लोगों जातियों या समुदायों को “लाना” है इस पर जोर लगभग नहीं ही होता है. वहीं यूरोप अमेरिका में अपने जीवन या परिवार में किसे “लाना” है इस बात पर सर्वाधिक जोर होता है. एक बार वे अपनी उम्र, विचार, और समान क्षमता के लोग पसंद कर लेते हैं और हर हालत में उनकी अमीरी गरीबी या कबीले वंश आदि को नकारते हुए उन्हें अपने जीवन या परिवार या समूह में शामिल कर लेते हैं.

    इस तरह यूरोप के प्रेम आधारित समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर मेलजोल और सभ्यता का विकास तेजी से होता है और भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान के घृणा आधारित समाज में सब तरह की सृजनात्मक प्रेरणाओं पर धर्म संस्कृति और भेदभाव का एक बड़ा भारी ताला लगा रहता है.

    भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में “किन लोगों” को “शामिल नहीं करना है”, किन लोगों को “जीने नहीं देना है” किन लोगों को “पढने लिखने नहीं देना है” या “रोजगार नहीं करने देना है” – इसकी बहुत साफ़ साफ़ प्रस्तावनाएँ लिखी गईं हैं. ये प्रस्तावनाएँ ही इन मुल्कों का धर्म और संस्कृति है. मनुस्मृति में तो साफ़ लिखा ही है कि किन वर्णों जातियों को शिक्षा और सम्पत्ति का अधिकार नहीं है. इसीलिये भारत पाकिस्तान जैसे समाज कभी भी प्रेम, बंधुत्व, मित्रता, सहकार, समता, सृजन, आदि के आधार पर न तो व्यक्तिगत जीवन जी पाते हैं न सामाजिक या सामूहिक जीवन का निर्माण ही कर पाते हैं.

    भारत की घृणा आधारित संस्कृति और यूरोप की प्रेम आधारित संस्कृति का विभाजन इसमें देखिए, आप देख सकेंगे कि आज का पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत ऐसा क्यों बन गया है. इन मुल्कों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, खेलकूद में प्रदर्शन, ज्ञान विज्ञान में फिसड्डीपन, गरीबी और जहालत इत्यादि को देखिये और आज के यूरोप की बुलंदियों को देखिये. अगर आप वर्तमान यूरोप की संस्कृति और समाज की तुलना भारती पाकिस्तानी समाज से नहीं कर पा रहे हैं तो आप भारत को समर्थ बनाने के संभावित मार्ग की कल्पना भी नहीं कर पायेंगे.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • क़ातिल बेगुनाह, तलवार न्यायाधीश और कुसूरवार गवाह उर्फ़ सलमान बनाम बिश्नोई समाज –Tribhuvan

    क़ातिल बेगुनाह, तलवार न्यायाधीश और कुसूरवार गवाह उर्फ़ सलमान बनाम बिश्नोई समाज –Tribhuvan

    Tribhuvan

    अली सरदार जाफ़री का एक शेर है: तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद, बे-गुनह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा। यानी जहां तेग़ यानी तलवार न्यायाधीश हो और जहां सूली और फ़ांसी गवाह हों, वहां पर क़ातिल ही बेगुनह हुआ करता है।

    सलमान खान प्रकरण में जो दोषी है, वह तो सबकी चर्चाओं और सम्मान के केंद्र में है, लेकिन जो न्याय दिलाने वाले और सम्मान के पात्र लोग हैं, वे हाशिये पर हैं। हम आज अगर पतन और गिरावट की राह पर हैं तो इसीलिए कि अपराधी की शोभा यात्रा निकाली जा रही है और जिसकी शोभा यात्रा निकाली जानी चाहिए, उन्हें उजड्ड और पुरातनपंथी हास्यास्पद बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रकरण में जो गवाह हैं और इस भ्रष्ट और गंदी व्यवस्था में भी पीछे नहीं हटे, वे बिश्नोई समुदाय से हैं और जांभोजी की शिक्षा के कारण ही वे निष्ठा के साथ खड़ रह सके। अगर ये निष्ठाएं नहीं होतीं तो सलमान कभी के इस प्रकरण से बाहर हो चुके होते।

    इन हालात में मुझे बताइये कि हमारे मीडिया और विश्व हिंदू परिषद के जोधपुर वाले उन हिंसकभाव वाले लोगों में क्या फ़र्क़ है, जो निरपराध अफराजुल की नृशंस हत्या करने वाले शंभु की शोभा यात्रा निकाल रहे हैं। देश का पूरा मीडिया और आम लोग तो भी वही सब होने को मरे जा रहे हैं!

    भगवान जांभोजी गुरुनानक जी से 18 साल पहले हुए थे। जांभाेजी का अनुयायी होने के लिए उसे 29 नियमों का मानना जरूरी है। दोनों संतों ने गुरुघरों का जो शिल्प अपनाया, उसमें एक अदभुत साम्य है। ये मसीत और मंदिर के बीच संतुलन कायम करते हैं। क्षमाशीलता को ऊपर मानते हैं। लेकिन प्राणी मात्र की रक्षा करना और हरे वृक्ष नहीं काटना दो ऐसे नियम हैं, जो बिश्नोई धर्म को बाकी सब धर्मों से अलग रखते हैं। हरे पेड़ों की रक्षा के लिए तो बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इनमें 111 तो महिलाएं थीं।

    बिश्ननोई समाज में भी मुस्लिम समाज की तरह मनुष्य को दफ़नाया जाता है, न कि जलाया जाता है। ऐसे बहुतेरे संप्रदाय हैं, जिनमें पार्थिव देह को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। लेकिन बिश्नाई धर्म के प्रति बचपन से ही मेरा अाकर्षण इसलिए रहा है, क्योंकि यह धर्म जीवों के प्रति अपार प्रेम रखता है। किसी भी बिश्नोई बहुल गांव में जाएं तो वहां आपको कितने ही हरिण और मोर ऐसे मिलेंगे, मानो हम किसी अभयारण्य में आ गए हों। बिश्नोई जीव की रक्षा के प्रति इतने प्रतिबद्ध होते हैं कि जीव की हत्या करने वाले की हत्या तक करने में भी उन्हें संकोच नहीं होता। ऐसे भी उदाहरण देखे जाते हैं। यह देखकर तो अांखों में आंसू आ जाते हैं कि कई बार किसी हरिणी को कुत्ते या जंगली जानवर मार दें और उसके बच्चे भूखे हों तो बिश्नोई महिलाएं उन्हें अपने बच्चे की तरह अपने सीने से लगाकर दूध पिला देती हैं। यह अदभुत और अकल्पनीय है।

    जिस युग में पर्वत, पहाड़, नदियां, झरने, वन संपदा और कुदरत के वारे वरदानों को इन्सान तबाह करने पर तुला है तब जांभाेजी भगवान की शिक्षाएं बहुत प्रासंगिक दिखाई देती हैं।

    Credits: Tribhuvan’s Facebook