Category: आपके आलेख

  • बदली –Hukam Singh Rajput

    बदली –Hukam Singh Rajput

    Hukam Singh Rajput

    अपना रंग जमाती बदली,
    सबको नाच नचाती है बदली!
    नित्य कहा से आती बदली,
    नित्य कहा पर जाती है बदली!

    अपना रंग बदल देती बदली,
    सफेद से लाल काली हो जाती है बदली
    आकाश से हट जाती बदली,
    आकाश पर छा जाती है बदली!

    धीरे-धीरे चलती बदली,
    दौड़ खूब लगाती है बदली!
    सीधी कभी ना चलती बदली,
    गोल गोल घूमजाती है बदली!

    पर्वत पर छा जाती बदली,
    अपना रंग दिखाती है बदली!
    चंदा सूरज छुपा देती बदली,
    कभी खुद छुप जाती है बदली!

    हवा को पलट देती बदली,
    हवा संग चल देती है बदली!
    पतली हो जाती बदली,
    मोटी बन जाती है बदली!

    ओष को रोक देती बदली,
    ओले खूब गिराती है बदली!
    तुषार गिरा देती बदली,
    जल खूब बरसाती है बदली!

    गरज गरज कर चलती बदली,
    बिजली खूब चमकाती है बदली!
    इन्द्र-धनुष बना देती बदली,
    मयूर को नाच नचाती है बदली!

    धारवा छोड देती बदली,
    पपीहै को पानी पिलाती हैबदली!
    बेजान झरनो को जिवीत करती बदली,
    धरती पर स्वर्ग बना देती है बदली!

    गरजती तो बास ऊगाती,
    चमकती है तो
    आम के फूल जलाती है बदली!
    ठंड खूब पहुंचाती बदली,
    गरमी भी पहुँचाती है बदली!

    सिमट-सिमट कर सिमट जाती बदली,
    छोटी से बड़ी हो जाती है बदली!
    घट-घट कर घट जाती बदली,
    आकाश से हट जाती है बदली!

    कहा से पानी लाती बदली,
    कौन जाने जल कैसे बरसाती है बदली!
    बून्द-बून्द कर बून्द गिराती बदली,
    मूसलाधार जल बरसाती है बदली!

    सागर से गुजर जाती बदली,
    खारे पानी को मीठा बनाती है बदली
    हरियाली कर देती बदली,
    हरे रंग को हरती है बदली!

    सागर की पनिहारी बदली,
    गगन की पटरानी है बदली!
    अलग-अलग दल मे रहती बदली,
    बरसनै पर एक हो जाती है बदली!
    कहे राजपूत जग को पालती बदली
    जग की जीवन जननी है बदली !!

    Hukam Singh Rajput

  • मालदार आदमी

    मालदार आदमी

    Kashyap Kishore Mishra

    कारवां के साथ एक बेहद अमीर आदमी था, जिसके पास खूब दौलत थी, दुनिया जहाँ की कीमती चीजों का उसके पास अंबार था, उसके साथ पचपन ऊँटो का काफिला था । नौकरों की फौज थी । कारवां के साथ एक इंसान ऐसा भी था जो बिल्कुल अकेला था, उसकी बड़ी आम सी माली हालत मालूम होती थी । कारवाँ जब ठहरता वह किसी के साथ रोटी खा लेता कहीं भी सो लेता । हरदम मुस्कुराते रहता और सामने पड़ने वाले हर शख्स को सलाम करता चलता ।

    अमीर आदमी को उसकी मुस्कुराहट और जब तब सलाम करना बेहद नागवार गुजरता । एक रात अमीर के सामने पड़ने पर उसनें सलाम करते यूँ ही पूछ लिया “आप कहाँ से हैं ?” अमीर को उससे बात करना अपनी हेठी लगी पर जवाब देना ही था तो अमीर नें बताया “मैं कूफा का सबसे बड़ा अमीर हूँ, मुझे यह बताने की जरूरत नहीं होती ना ही मुझे तुम्हारे बारे में जानने की दिलचस्पी है ।”

    वह आदमी यह सुन सिर्फ़ मुस्कुराता रहा । कारवाँ के साथ चल रहे दरवेश ने यह देखा सुना और खामोश रहा ।

    दो दिन भी न गुजरे थे कि एक दिन सहरा में तेज तूफान उठा । अमीर के सारे ऊँट इधर उधर भाग खड़े हुए और उनके साथ के खादिमों का भी कुछ पता न था, अमीर अपने ऊँट के साथ सहरा में भटक गया । कई रोज भटकते हुए उसने आधे होश आधी बेहोशी की हालत में उस आदमी को देखा । अमीर ने उसे आवाज़ दी और जैसे ही वह आदमी करीब आया अमीर बेहोश हो चला ।

    उसकी बेहोशी टूटी तो वह अपने काफिले के साथ था, उस आदमी ने उसे उसके काफिले से मिला दिया पर उसके बाद उसको दूसरी जानिब जाना था सो वह अपनी रह चलता बना ।

    अमीर बड़ा सोगवार था उसने बड़ी नाराजगी से अपने नौकर से कहा “तुझे उसे रोकना था, मैं उसे मालामाल कर देता।”

    पास ही मौजूद दरवेश से रहा न गया और उसने कहा ” तेरी जान उस अजनबी की रहमत है और तू तो किस कदर नालायक है कि जिसने तूझे जिंदगी बख्शी तू उसे एक शुक्रिया तक अदा कर सके इस लायक भी नहीं ।”

    Kashyap Kishor Mishra


  • पिता के जूते

    पिता के जूते

    Mukesh Kumar Sinha

    जूता पिता का 
    पहली बार पहना था तीन दशक पहले
    जब उन्होंने कहा था –
    टाइट है, काटने लगा है पैर
    तुम ही पहन लो 
    पापा का संवाद था बड़े होते बेटे के साथ 
    अधिकार को कमी की पैकिंग में लपेट कर 
    कहा गया था शायद
    पर सुन ही नहीं सका था ‘मैं’

    पहली बार 
    बांधते हुए जूते 
    दिल कह रहा था 
    मर्द वाली फ़ीलिंग के लिए 
    ज़रूरी है 
    4 नंबर के सैंडल के बदले 
    7 नंबर के लेस वाले 
    पिता के या पिता जैसे जूते पहने ही जाएं

    चमकते पुराने जूते और 
    अॉल्टर करवाए हुए पुरानी पैंट पहने 
    साईकल पर 
    उनके साथ 
    करते हुए सफ़र 
    उनसे ही बतियाते हुए बता रहा था 
    पहली बार
    घर के खर्चे कम करने की जरुरत और तरीके 
    अपनी परचून की दुकान की लाभ-हानि 
    स्वयं के पढ़ाई की अहमियत और पढने के सलीके

    पिता की हूँ-हाँ से बेखबर 
    7 नंबर के जोड़े ने शुरू जो कर दिया था दिखाना असर 
    तभी तो चौदह-पंद्रह वर्षीय छोकरे को 
    पहली बार समझ में आई थी 
    अहमियत पिता की 
    उनके मेहनत की 
    और इन सबसे ऊपर 
    उनके होने की

    तब से
    ज़िंदगी भी जूते और जूते के लेस के साथ 
    भागती रही 
    बिना उलझाए, बिना रुके 
    उसी सात नंबर में 
    कभी कभी पिता के साथ
    पर, अधिकतर समय उनसे दूर
    बहुत-बहुत दूर

    वो अंतिम दिन भी आया जब 
    उनकेे चले जाने के बाद 
    पिता के जूते देख 
    माँ से पूछा क्या, बस कह डाला
    मैं ही पहन लूं इसको अब…… !!

    एक बार फिर 
    पैर को जूते में डाल 
    खुद को पिता सा महसूस कर 
    नज़रे दौड़ा रहा था दूर तलक

    है अब अजब सी सोच 
    जिस दिन भी भीतर
    मन होता है डाँवाडोल
    पिता के जूते पहन 
    दिल की धडकनों के ऊपर हलके से हथेली को रख कर 
    कह उठता हूँ 
    आल इज़ वेल, आल इज़ वेल 
    लक्की चार्म की तरह

    शायद होता है एक संवाद
    स्वर्गवासी पिता के स्नेह के साथ 
    जो बेशक है पूर्णतया आभासी 
    पर होती है आत्मिक संतुष्टि 
    होगा सबकुछ बेहतर 
    कहीं प्लेटोनिक आशीर्वाद तो नहीं
    जिसका माध्यम भर है ये ख़ास जूता

    हाँ 
    आज फिर 
    पॉलिश्ड, चकमक
    पिता के जूते पहन
    बढ़ता जा रहा हूं

    जल्दी पहुँचना जो है काम पर।

    Mukesh Kumar Sinha


    Mukesh Kumar Sinha

  • सॉरी बेटा मैं आपको प्यार नहीं करता

    सॉरी बेटा मैं आपको प्यार नहीं करता

    Sanjiv Kumar Sharma

    (एक बाप का बेटे को आखिरी खत)

    उम्मीद है तुम खुश होगे और अपनी नयी नौकरी में आराम से होगे। मेरी पोती तान्या और बहु कैसे हैं? तान्या तो अब काफी बड़ी हो गयी होगी बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए भी। जब से तुम मुंबई गए हो उससे मिलना ही नहीं हुआ।

    मेरी तबियत काफी बिगड़ चुकी है और किडनी के साथ अब दिल भी जवाब दे रहा है। कुछ दवाएं और नलियां मुझे किसी तरह जिन्दा रखे हुए हैं। हॉस्पिट्ल में लेटे हुए रोज मौत, दर्द और हताशा से दो-चार होते हुए मेरी जिंदगी के समझ बहुत गहरी हो गयी है। मुझे अहसास हो रहा है की जिन चीजो को जरूरी समझ कर भागता रहा उनकी असलियत में कोई कीमत नहीं थी। और जो जरूरी चीजें थी उनको भुला दिया। तुम्हारी माँ मर भी गयी और मैं कभी उसके साथ प्यार को ठीक से जी भी नहीं सका।

    हो सकता है मैं शायद अब ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहूँ इसलिए तुमको ये खत लिख रहा हूँ। फ़ोन पर ये बातें नहीं कर सकता इसलिए मैंने ये तरीका अपनाया है। मेरी विनती है कि इसे पढ़ना जरूर भले ही तुम्हारे पास समय हो या नहीं हो। ये मेरी असली पूँजी है जो मैं तुम्हारे नाम छोड़ना चाहता हूँ।

    सबसे पहले मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि ये खत मैं खुद नहीं लिख पा रहा हूँ। मैं लिख ही नहीं सकता। इसे बोल कर लिखवा रहा हूँ। और जो इसे लिख रहा है वो एक नवयुवक है। मुझे मालुम है कि वो मेरी बात से असहज होगा फिर भी उसके बारे में बताना बहुत जरूरी है। वो शायद किसी ऐतिहासिक इमारत में फोटो खींचने का काम करता है ज्यादा नहीं कमाता लेकिन गुजर-बसर हो जाती है। फिर भी जब उसे समय मिलता है तो यहाँ सरकारी हॉस्पिटल में आ जाता है। किसी से दो बातें कर लेता है, किसी को ढांढस बंधा देता है, किसी की हाथ पैरों से मदद हो जाती है तो कर देता है। लेकिन सब कुछ यूँ ही बिना किसी फायदे के, बस यूँ ही अपनी मौज में।

    इससे मिल कर मुझे पता चला कि एक बाप के तौर पर मैं तुमको एक बहुत बड़ी बात सिखाना भूल गया कि जिंदगी की महक, उसकी ख़ूबसूरती उन चीजों में समाई है जो यूँ ही की जाती हैं, बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी सौदेबाजी के; सिर्फ उस क्षण को जीने के लिए न कि ललचाई हुई निगाहों से भविष्य की और ताकते हुए। सच तो ये है कि मैंने तुम्हारी शुरुआत ही गलत कर दी। पढाई की शुरआत ही कराई इस शर्त पर कि डांट से बचना हो तो पढ़ो, फिर इनाम चाहिए तो पढ़ो, नंबर के लिए पढ़ो, फलानी चीज के लिए पढ़ो, ढिमका चीज के लिए पढ़ो। हर चीज इसलिए करो क्योंकि कुछ हासिल करना है, कुछ पाना है। हर काम इसलिए करो कि किसी से से तुलना करनी है या किसी को दिखाना है।

    तुम्हारे मन की जमीन तो खाली थी उस पर महत्वाकांक्षा के बीज मैंने ही बिखेरे। बच्चों के मन की जमीन बड़ी उपजाऊ होती है और उस पर बिखेरे हुए बीज बड़ी आसानी से उगते हैं। सोचा था जब ये फसल पकेगी उसे काट लूँगा। लेकिन मैं भूल गया था कि मैं जहरीली नागफनी बो रहा हूँ। नागफनी बड़ी आसानी से उगती है, फसल खूब होती है लेकिन उसमे कभी फूल नहीं खिलते और जो भी उसके पास आता है उसे जहर और काँटों के सिवा कुछ नहीं मिलता। महत्वाकांक्षा अकेली ही इंसान को खत्म करके उसे एक खतरनाक रोबोट में बदल देने के लिए काफी है, उसे किसी साथ की जरूरत नहीं है। महत्वाकांक्षा के विष से भरा इंसान भष्मासुर होता है वह जिस चीज को हाथ लगाता है राख कर देता। उसके रिश्ते छीना-झपटी से ज्यादा नहीं होते। उसके लिए जीविका जीवन चलाने का साधन या अपने शौक की पूर्ति नहीं होती बल्कि अपने भीतर लगातार टीस देती अपने कुछ न होने की खरोंचों से भागने का जरिया होती हैं और जब किसी तरह उसकी बेचैनी कम नहीं होती तो वह दूसरे को भी खरोंच मारने से बाज नहीं आता।

    मैं ये सारी बातें तुम्हें इसलिए नहीं बता रहा हूँ कि मैं तुमसे कुछ चाहता हूँ बल्कि इसलिए बता रहा हूँ कि तुम मेरी वाली गलती न दोहराओ। मैंने साफ़-साफ़ देख लिया है कि मैं तुम से प्यार नहीं करता था बल्कि तुम्हे अपनी सम्पत्ति समझता था। जो कुछ और तरीकों से नहीं मिल रहा था उसे तुम्हारे जरिए हासिल करना चाहता था। अपने सभी डर मैंने जाने-अनजाने तुम्हारे अंदर डाल दिए। शायद चाहता था कि तुम मेरे जैसे बन जाओ ताकि मैं तुम्हारे साथ चैन से जिंदगी काट सकूँ। मेरा ऐशो-आराम बुढ़ापे में भी चलता रहे, ये शरीर ज्यादा से ज्यादा समय तक बना रहे, भोग करता रहे। लेकिन तुम अपनी बेटी तान्या को सच में प्यार करने की कोशिश करना। ये मत समझना कि वो तुम्हारे किसी भी तरह के मानसिक या शारीरिक इस्तेमाल की कोई चीज है। बल्कि वो एक उपहार है जो तुमने खुद अपनी इच्छा से माँगा है। उसे मौका देना कि वो खिल सके, अपनी तरह से बढ़ सके। तुम बस उसे जीवन को महसूस करने देना, बिना किसी डर के अपनी समग्रता में। कोशिश करना कि वो हमारे अंदर भरे हुए डरों के जाल में कम से कम फंसे। धर्म, ईश्वर और मौत बहुत डर फैलाते हैं, इनके डर से उसे यथासंभव बचाना। तथाकथित धर्म और ईश्वर से उसके पवित्र मन को दूर रखना जब वह वयस्क होगी अपने आप समझ लेगी। मौत से उसका परिचय कराना डराना नही। उसे बताना मौत बड़ी मामूली चीज है जो हर पल घट रही है। उसे शमशान या कब्रिस्तान ले जाया करना और दिखाना कि वहां डरने के लिए कुछ है ही नहीं।

    और सबसे बड़ी बात उसे बताना कि वो यूनिक है उसे न किसी से प्रतिस्पर्धा करनी है न किसी को कुछ साबित करना और न ही वो कोई शो पीस है जो तुम्हारी या किसी और की शान के लिए इस्तेमाल होना है। वो बस पता लगाए कि उसे क्या करना अच्छा लगता है और फिर उसी में डूब जाए। उसे मौका देना कि वो जिंदगी को वर्तमान में जीना सीखे। चीजों को मौज में करना सीखे, इंसानो से, पेड़ों से, परिंदों से, बारिश की बूंदो से, फूलों पर मंडराती तितलियों से उसका रिश्ता बना रहे।

    बस अब विदा !
    अपना ख्याल रखना।
    तुम्हारा अभागा पिता

    Sanjiv Kumar Sharma

    Editor, Ground Report India

    An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

    Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

  • क्या कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है, क्या वह हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा करती है?

    क्या कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है, क्या वह हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा करती है?

    Prof Ram Puniyani

    इन दिनों भाजपा और उसके संगी-साथियों द्वारा अनवरत प्रचार किया जा रहा है कि कांग्रेस हिन्दू-विरोधी पार्टी है। हर संभव मौके पर यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस, हिन्दुओं को अपमानित करती आई है। मक्का मस्जिद मामले में अदालत द्वारा सभी आरोपियों को बरी कर देने के बाद, भाजपा प्रवक्ताओं ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने हिन्दू धर्म को बदनाम किया और उन्हें इसके लिए क्षमायाचना करनी चाहिए। इसी साल कर्नाटक में होने वाले चुनाव के सिलसिले में भाजपा ने राज्य में कांग्रेस की कथित ‘हिन्दू-विरोधी‘ नीतियों का भंडाफोड़ करने के लिए यात्रा निकालने की घोषणा की है। यह प्रचार इस हद तक बढ़ गया है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को हाल में कहना पड़ा कि कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी की तरह देखा जा रहा है।

    किसी विशिष्ट धार्मिक समुदाय के संदर्भ में किसी पार्टी की नीतियों को हम किस तरह देखें? भाजपा यह प्रचार करती आई है कि वह हिन्दुओं के हितों की रक्षक है। क्या यह सही है? पार्टी ने राममंदिर,पवित्र गाय, धारा 370, लव जिहाद आदि जैसे मुद्दे उठाए। क्या एक आम हिन्दू को इससे कोई लाभ हुआ? क्या इससे हिन्दू किसानों और श्रमिकों व दलितों की हालत सुधरी? क्या इससे हिन्दू महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आई? यह दावा कि इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को उठाने से हिन्दुओं को लाभ होगा, पूरी तरह से खोखला है। उल्टे, इन मुद्दों ने समाज के साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया,  समाज में नफरत का जहर घोला और हिंसा भड़काई। इस ध्रुवीकरण और हिंसा से मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी नुकसान हुआ।

    कांग्रेस के हिन्दू-विरोधी होने के दावे में कितनी सच्चाई है? आईए, हम मक्का मस्जिद बम धमाकों का उदाहरण लें।

    इसी घटना से जुड़े मालेगांव बम धमाकों की शुरूआती जांच, आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे ने की थी, जो मुंबई पर 26/11 को हुए हमले में मारे गए। स्वामी असीमानंद, जो कि इस मामले में प्रमुख आरोपी थे, ने मजिस्ट्रेट के सामने इकबालिया बयान दिया था। यह बयान किसी दबाव में नहीं दिया गया था और कानून की निगाहों में पूरी तरह से वैध था। जांच में भी यह सामने आया था कि असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित आदि इन धमाकों के पीछे थे। भाजपा सरकार के पिछले चार वर्षों के कार्यकाल के दौरान, संबंधित एजेंसियों ने इस प्रकरण की पैरवी कुछ इस ढंग से की कि ये सब दोषमुक्त घोषित कर दिए गए और महाराष्ट्र एटीएस पर गलत जांच करने का आरोप जड़ दिया गया। जिस समय करकरे मालेगांव विस्फोटों की जांच कर रहे थे, उस समय वे इतने दबाव में थे कि उन्होंने अपने पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जूलियो रिबेरो से यह सलाह मांगी थी कि वे इस दबाव का सामना कैसे करें। रिबेरो ने उन्हें यह सलाह दी थी कि वे दबाव को नजरअंदाज करते हुए ईमानदारी से अपना काम करते रहें।

    जहां कांग्रेस की हिन्दू-विरोधी छवि बनाने के लिए इस तरह के मुद्दों का इस्तेमाल किया गया, वहीं उसकी मुस्लिम-समर्थक छवि, पिछले कुछ दशकों में निर्मित हुई, विशेषकर, कांग्रेस सरकार द्वारा शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय केा निर्णय को पलटने से। यह निश्चित रूप से एक गलत कदम था। परंतु इस मामले में भी कांग्रेस ने केवल मुसलमानों के दकियानूसी और कट्टर तबके के आगे समर्पण किया था। इससे आम मुसलमानों को कोई लाभ नहीं हुआ। डॉ मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य कि ‘‘मुसलमानों का राष्ट्रीय संसाधनों पर पहला दावा है‘‘ को भी बार-बार दुहराकर यह कहा जाता है कि कांग्रेस, मुसलमानों की पिट्ठू है। जो नहीं बताया जाता, वह यह है कि यह वक्तव्य सच्चर समिति की रपट के संदर्भ में दिया गया था। सच्चर समिति ने इस धारणा को चूर-चूर कर दिया था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जा रहा है। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि स्वाधीनता के बाद से मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में भारी गिरावट आई है और साम्प्रदायिक हिंसा से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही हुआ है।  एकमात्र स्थान जहां मुसलमानों को आबादी में उनके प्रतिषत से ज्यादा प्रतिनिधित्व प्राप्त है, वह है जेल।

    हमारे देश ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के कारण बहुत कुछ भुगता। इस देश को धर्मनिरपेक्षता की राह पर आगे ले जाना कभी आसान नहीं रहा है। भारत मे जनजागरण के साथ भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जन्मी, जो सभी धर्मों के भारतीयों की प्रतिनिधि थी। कांग्रेस के सन् 1887 के अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैय्यबजी ने की थी। कांग्रेस के अध्यक्षों में पारसी, ईसाई और हिन्दू शामिल थे। उस समय मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व (जैसे सर सैय्यद अहमद खान) कांग्रेस पर हिन्दू पार्टी होने का आरोप लगाते थे। दूसरी ओर, हिन्दू साम्प्रदायिक नेता (जैसे लाला लालचंद) कहते थे कि कांग्रेस, हिन्दुओं के हितों की कीमत पर मुसलमानों का तुष्टिकरण कर रही है। कांग्रेस को हमेशा हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों के हमले का शिकार होना पड़ा क्योंकि वह भारतीय राष्ट्रवाद की हामी थी। कुछ कमियों के साथ, मोटे तौर पर उसने धर्मनिरपेक्षता की नीति का पालन किया।

    मुस्लिम सम्प्रदायवादियों, जिनमें मुस्लिम लीग शामिल थी, के कांग्रेस पर हमलों का अंतिम नतीजा था पाकिस्तान का निर्माण। हिन्दू सम्प्रदायवादी संगठन जैसे हिन्दू महासभा और आरएसएस यह दावा कर रहे थे कि गांधीजी द्वारा मुसलमानों के तुष्टिकरण के कारण ही मुसलमान अपना सिर उठा सके और पाकिस्तान का गठन हुआ। इसी सोच के नतीजे में नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। नाथूराम गोड़से एक प्रशिक्षित आरएसएस प्रचारक था और सन् 1936 में हिन्दू महासभा की पुणे शाखा का सचिव नियुक्त किया गया था। अदालत में अपने बयान (‘मे इट प्लीज योर आनर‘) में उसने कहा था कि गांधी, पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने हिन्दुओं के हितों के साथ समझौता किया और मुसलमानों को सिर पर चढ़ाया।

    आज कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताकर उस पर जो हमले किए जा रहे हैं, वे उसी सिलसिले का हिस्सा हैं, जो हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने शुरू किया था। हिन्दू महासभा-आरएसएस-गोड़से की सोच, पिछले कुछ दशकों में और मजबूत हुई है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि स्वाधीनता के बाद से मुसलमानों की आर्थिक-शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति में गिरावट आई है और पिछले चार दशकों में इस गिरावट की गति और तेज हुई है। सत्ताधारी दल केवल भावनात्मक मुद्दे उठा रहा है जिनसे अन्य समुदायों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी नुकसान हो रहा है।

    भारत में धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलना अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। गांधी को अपने धर्मनिरपेक्ष होने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनके समर्पित शिष्य पंडित नेहरू को धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलने के कारण आज बदनाम किया जा रहा है। मुस्लिम सम्प्रदायवादियों ने पाकिस्तान के निर्माण का जश्न मनाया था परंतु आज उस देश में न विकास है और ना ही शान्ति। नेहरू, कांग्रेस और गांधी के नेतृत्व में भारत कुछ हद तक देश में बंधुत्व की स्थापना करने में सफल रहा और प्रगति की राह पर आगे बढ़ा। कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी और हिन्दू विरोधी बताने वाले लोग, वे साम्प्रदायिक तत्व हैं जिन्हें ऐसा करने में अपना लाभ दिखता है। अपनी सारी सीमाओं और कमियों के बावजूद, कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा करने का प्रयास करती आई है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • बलात्कारी को आख़िरी सांस तक तड़पाओ, लेकिन पीड़िताओं को उनकी खनकती भोर लौटाने की व्यवस्थाएं किए बिना आपके कानूनी संशोधन धूल हैं!

    बलात्कारी को आख़िरी सांस तक तड़पाओ, लेकिन पीड़िताओं को उनकी खनकती भोर लौटाने की व्यवस्थाएं किए बिना आपके कानूनी संशोधन धूल हैं!

    Tribhuvan

    इस धरती पर मानवता के ख़िलाफ़ जितने भी घृणित अपराध हैं, उनमें बलात्कार सबसे घिनौना और भयानक है। इसके ख़िलाफ़ अभी भारत सरकार ने जो कानून बनाया है, उसके एक हिस्से को पढ़ें तो लगता है कि हमारी सरकारों में संवेदना नामकी कोई चीज़ ही नहीं है। क्या किसी 30 साल या 40 साल की महिला के लिए बलात्कार 20 साल की उम्र से कुछ कम पीड़ादायी है? बलात्कार बलात्कार है और यह समान रूप से घृणित है। क्यों कानून बनाने वाले हमारे नेता बलात्कार को महिला की उम्र के हिसाब से टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटते हैं? वे क्यों भूल जाते हैं कि सबसे ज्यादा बलात्कार की शिकार महिलाएं 16 से 45 साल की उम्र की होती हैं और आत्मा की कराहों में उम्र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बशर्ते नन्हीं बच्चों को अलग रखें।

    ये ठीक है कि हम सुकुमार बच्चियों के मामले में फांसी का प्रावधान करने जा रहे हैं, लेकिन 16 या 20 साल की उम्र के मामले में सज़ा को 10 साल और 20 साल में करने से हमारी सरकार के राजनेताआें और विधिवेत्ताओं की हृदयहीनता और अदूरदर्शिता साफ़ दिखती है। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि बलात्कार की शिकार महिला अपने त्रासद दु:ख को भूलने की कोशिशें करते हुए या तो कोमा में चले जाना पसंद करती है या फिर ऐमनेशिया की शिकार होना। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक बलात्कार पीड़िता निर्णय होेने तक झूठी ही मानी जाती है, जबकि न्यायाधीश के फ़ैसले में अपराधी ठहरा दिए जाने से पहले तक बलात्कार का अपराधी निर्दाेष या फिर आरोपी ही माना जाता है।

    किसी भी महिला के जीवन में यौवन के दिन एक खनकती भोर लेकर आते हैं। लेकिन घृणित मानसिकता वाले अपराधी उसके जीवन के सबसे सुखद क्षणों को रौंद डालते हैं। हमारी संस्कृति में आए दिन बच्चियों को शिक्षाएं दी जाती हैं, लेकिन लड़कों को सुसंस्कारवान बनाने की तरफ़ लोग ध्यान नहीं देते हैं। इसीलिए तो बलात्कार तरह-तरह से होता है। शारीरिक न सही, वह मानसिक भी होता है। हम देखते हैं कि बलात्कारी मानसिकता कभी आंख से, कभी हाथ से, कभी जिह्वा से और कभी कानून और संहिताओं के सहारे से बलात्कार करती है। कभी वह धर्म और जाति का सहारा लेती है तो कभी पद और प्रभाव का।

    कई बार तो यह भी होता है कि महिला को ही दाेषी ठहरा दिया जाता है। वे कहते हैं, आपने पारदर्शी वस्त्र पहन रखे थे। या उन्होंने पी रखी थी या फिर ड्रग्स ले रखी थीं। वे इसलिए रेप का शिकार हो जाती हैं कि वे पर्याप्त सावधानी नहीं बरततीं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि बलात्कार इसलिए होता है, क्योंकि कोई बलात्कारी होता है। यहां तक तर्क दिया जाता है कि यौनाकर्षण वाला सौंदर्य बलात्कार को जन्म देता है। लेकिन पिछले कुछ साल से बालिकाओं से बलात्कार की घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर डाला है। ऐसा लगता है कि हम एक अंधे कुएं पड़े समाज हैं और हमारी संस्कृति और सभ्यता किसी नींद में सोई हुई है। हमारे हौसले पस्त हैं और हमारे दिलोदिमाग़ में खामोश चीखें भर गई हैं। अपराधियों में न शासन का भय है और न ही पुलिस का ख़ौफ़। अपराधी किसी बालिका को निधड़क ले जा सकता है, क्योंकि हम बच्चियों से बचाने से ज़्यादा गाय को ले जा रहे व्यक्ति को मारने में दिलचस्पी रखते हैं और गाय वैसी की वैसी और उतनी ही तादाद में सड़कों पर भूखी रंभाती रहती है।

    यह देश ही ऐसा है। यहां न गाय के लिए कोई ठौर ठिकाना है और न ही बेटियों के लिए। ख़ासकर गु़रबत में जी रहे लोगों की हालत तो एक जैसी है। हमारी सरकारों के होश गुम हैं और बांहों का दम एकदम खत्म है। हम उनींदी आंखों वाले लोग सोए हुए पांवों के साथ कानून बनाते हैं और बलात्कारी को फांसी दिलाने की बातें करते हैं, लेकिन हमारी व्यवस्था की लौ इतनी बुझी हुई है कि बलात्कार के मामले की एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाती। हमारी राजनीतिक पार्टियां और सरकारें एक नुमाइशी व्यवस्था सजा कर बैठी हैं और ऐसा आभास देती हैं कि वे एक मंतर फूंकेंगी तो सब कुछ बदल जाएगा।

    ये इस पीड़ा को समझने को ही तैयार नहीं है कि बलात्कार के बाद पीड़िता को जिस आंसू, सिसकी, पीड़ा, अवसाद, प्रतिहिंसा और आत्महीनता के मिलेजुले नारकीय लैबरिंथ से निकलना पड़ता है, वह एक बहुत जटिल, मुश्किल और असहनीय प्रक्रिया है। क्या इस पीड़ा के बाद किसी अपराधी को फांसी पर चढ़ा देने से भर से आप किसी महिला या बालिका को वैसा का वैसा जीवन दे सकते हैं? क्या वही हंसी उसके भीतर गूंजेगी? क्या उसकी रगों में दौड़ते लहू में थिरकने की आवाजें उसी तरह आएंगी? क्या वह फिर वैसी चुहल कर पाएगी?

    कई बार तो ऐसा होता है कि सरकारें और व्यवस्थाएं खुद बलात्कारों का आयोजन करती हैं। युद्ध क्या हैं‌? बार-बार सेना और अर्धसैनिक बलों का लगाया जाना क्या है? जहां सेनाएं और अर्धसैनिक बल तैनात होते हैं, क्या वहां बहुत ही सुनियोजित तरीके से बलात्कार नहीं करवाए जाते हैं? क्या इसीलिए स्थानीय समाजों में इन बलों के प्रति प्रतिहिंसा और घृणा के भाव नहीं होते हैं? दुनिया का कौनसा हिस्सा इस तरह के घृणास्पद पापों से बचा है?

    लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि पीड़िताएं चुप रह जाएं? बलात्कार जिस पावर के बल पर होता है, दरअसल यह लड़ाई उस पावर के ही खिलाफ़ है। बलात्कार करके अपराधी भी तो पावर ही दिखाता है। बलात्कारी से तो कोई महिला बचकर भी भाग सकती है, लेकिन जब बल एकत्र होकर सुनियोजित नृशंसता दिखाता है तो यह त्रासद कोरस होता है।

    मेरा प्रश्न इतना सा है कि बलात्कारी को फांसी देने के बजाय उसकी आखिरी सांस तक नारकीय ढंग से सड़ाया जाना चाहिए, क्योंकि किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह किसी अन्य को ऐसी पीड़ा पहुंचाए। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि हमारी सरकार पीड़िता के लिए कोई ऐसी व्यवस्था करे, जिससे वह अपनी पीड़ा और त्रासद अनुभव को विस्मृत कर सके। उससे मुक्त हो सके। वह अवसाद के भंवर से बाहर निकल सके। वह ऐसा जीवन जिए कि कभी भी उसकी यादों की तहों में दर्द का कोई कांटा न उगे। उसे एक खुला और हवादार जीवन मिले। उदासियां उसकी हदों से दूर रहें। वह एक अच्छे जीवन के तारों तले झूम सके और अपनी उमंगों को लहरा सके। वह प्रसन्नताओं के समंदर में डुबकियां लगा सके और जब मन चाहे तो दमकती रेत पर जिजीविषा की रेत में अपनी आत्मा को सेक सके।

    हर पीड़िता को हक़ और अधिकार है कि वह खनकती भोर को अपने भीतर फिर लौटा सके। और इसका एक मात्र तरीका यह है कि उसके जिस्मानी घावों के साथ-साथ उसकी आत्मा पर लगे अनचीन्हे घावों पर प्रेम की मरहम लगा सकें। हम प्रेम की ऊष्मा के बिना यह सब प्राप्त नहीं कर सकते।

    Tribhuvan’s facebook wall


  • देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए –Firdaus Khan

    देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए –Firdaus Khan

    किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता।  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है। ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है। सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है। अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है। जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है। अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है। आज देश की यही हालत है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए। सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है। यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का। इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है। कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है।

    देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है। जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं। उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए। ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी। जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे। उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए। ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे।

    संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं। सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं। इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है। दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी। साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है।

    राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला।

    ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया। सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए। कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की।

    सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं। देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं। देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने डॊ। मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा। 

    राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं। अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी। राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे। लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है। फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं।  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं।  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी। उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे। आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी। उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई। लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे। साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी। 

    अगले साल आम चुनाव होने हैं। उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है। सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है। अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है।

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • नक्सलवाद को हराती सरकारी नीतियां –Dr Neelam Mahendra

    नक्सलवाद को हराती सरकारी नीतियां –Dr Neelam Mahendra

    Dr Neelam Mahendra

    24 अप्रैल 2017 को जब “नक्सली हमले में देश के 25 जवानों की शहादत को व्यर्थ नहीं जाने देंगे” यह वाक्य देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, तो देशवासियों के जहन में सेना द्वारा 2016 में  की गई सर्जिकल स्ट्राइक की यादें ताजा हो गई थीं। लेकिन नक्सलियों का कोई एक ठिकाना नहीं होना, सुरक्षा कारणों से उनका लगातार अपनी जगह बदलते रहना और सुरक्षा बलों के मुकाबले उन्हें  स्थानीय नागरिकों का अधिक सहयोग मिलना, जैसी परिस्थितियों के बावजूद ठीक एक साल बाद 22 अप्रैल 2018,को जब महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र में पुलिस के सी-60 कमांडो की कारवाई में 37 नक्सली मारे जाते हैं तो यह समझना आवश्यक है कि यह कोई छोटी घटना नहीं है, यह वाकई में एक बड़ी कामयाबी है। इन नक्सलियों में से एक श्रीकांत पर 20 लाख और एक नक्सली सांईनाथ पर 12 लाख रुपए का ईनाम था।

    आज सरकार और सुरक्षा बलों का नक्सलवाद के प्रति कितना गंभीर रुख़ है इससे समझा जा सकता है कि 29 मार्च 2018 को सुकमा में 16 महिला नक्सली समेत 59 नक्सलियों ने पुलिस और सीआरपीएफ के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसी क्रम में पिछले दो सालों में सरकार द्वारा 1476 नक्सल विरोधी आपरेशन चलाए गए जिसमें  2017 में सबसे ज्यादा 300 नक्सली मारे गए  और 1994 गिरफ्तार किए गए। लेकिन इस सब के बीच नक्सलियों का आत्मसमर्पण वो उम्मीद की किरण लेकर आया है कि धीरे धीरे ही सही लेकिन अब इन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में  सक्रिय नक्सलियों का नक्सलवाद से मोहभंग हो रहा है।

    वर्तमान सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों में कहा गया है कि उसकी नीतियों के कारण 11 राज्यों के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की संख्या 126 से घटकर 90 रह गई है और अत्यधिक प्रभावित जिलों की संख्या भी 36 से कम होकर 30 रह गई है। सरकार के अनुसार भौगोलिक दृष्टि से भी नक्सली हिंसा के क्षेत्र में कमी आई है, जहाँ 2013 में यह 76 जिलों में फैला था वहीं 2017 में यह केवल 58 जिलों तक सिमट कर रह गया है।

    देश में नक्सलवाद की समस्या और इसकी जड़ें कितनी गहरी थी यह समझने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी का वो बयान महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए “सबसे बड़ी चुनौती” की संज्ञा दी थी। उनका यह बयान व्यर्थ भी नहीं था। अगर पिछले दस सालों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो 2007 में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में पुलिस कैंप को निशाना बनाया था जिसमें 55 जवान शहीद हो गए थे। 2008 में ओड़िशा के नयागढ़ में नक्सली हमले में 14 पुलिस वाले और एक नागरिक की मौत हो गई थी।2010 में इन्होंने त्रिवेणी एक्सप्रेस और कोलकाता मुम्बई मेल को निशाना बनाया था जिसमें कम से कम 150 यात्री मारे गये थे। 2010 में ही पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के सिल्दा कैंप पर हमले में पैरामिलिटरी फोर्स के 24 जवान शहीद हो गए थे। इसी साल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में अब तक के सबसे बर्बर नक्सली हमले में 2 पुलिस वाले और सीआरपीएफ के 74 जवान शहीद हो गए थे। 2011 में छत्तीसगढ़ के गरियबंद जिले में एक बारूदी सुरंग विस्फोट में एक एसएसपी समेत नौ पुलिस कर्मी मारे गए थे। 2012 में झारखंड के गरवा जिले में नक्सलियों द्वारा किए गए ब्लास्ट में एक अफसर सहित 13 पुलिस वालों की मौत हुई थी। 2013 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की दरभा घाटी में नक्सली हमले में काँग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और छत्तीसगढ़ के काँग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल सहित 27 लोगों की मौत हुई थी। सिलसिला काफी लंबा है।

    लेकिन अप्रैल 2017 में जब सुकमा में नक्सलियों ने घात लगाकर खाना खाते हमारे सुरक्षा बलों को निशाना बनाया तो सरकार ने नक्सलियों को मुँहतोड़ जवाब देने का फैसला लिया और आरपार की लड़ाई की रणनीति बनाई जिसमें इस की जड़ पर प्रहार किया।

    इसके तहत न सिर्फ शीर्ष स्तर पर कमांडो फोर्स और उनके मुखबिर तंत्र को मजबूत किया गया बल्कि नक्सल प्रभावित इलाकों के जंगलों को खत्म करके वहाँ सड़क निर्माण स्कूल एवं अस्पताल, मोबाइल टावर्स, अलग अलग क्षेत्रों में पुलिस स्टेशनों का निर्माण, सभी सुरक्षा बलों का आपसी तालमेल सुनिश्चित किया गया और यह सब हुआ केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के समन्वय से। इसके अलावा मनरेगा द्वारा इन नक्सल प्रभावित आदिवासी इलाकों के नागरिकों को न सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाया गया बल्कि विकास कार्यों से उन्हें मुख्य धारा में जोड़ कर उन्हें नक्सलियों से दूर करने का कठिन लक्ष्य भी हासिल किया।

    जी हाँ, लक्ष्य वाकई कठिन था क्योंकि जब 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी जिला दार्जिलिंग नामक स्थान से इसकी शुरुआत हुई थी तब चारू मजूमदार और कनु सान्याल जैसे मार्क्सवादियों ने भूस्वामियों की जमीन उन्हें जोतने वाले खेतिहर मजदूरों को सौंपने की मांग लोकर भूस्वामियों के विरुद्ध आंदोलन शुरु किए जिसे तत्कालीन सरकार ने 1500 पुलिस कर्मियों को नक्सलवाड़ी में  तैनात कर कुचलने का प्रयास किया। यही से वंचितों आदिवासियों खेतिहर मजदूरों के हक में सरकार के खिलाफ हथियार उठाने की शुरुआत हुई। धीरे धीरे यह आंदोलन देश के अन्य भागों जैसे ओड़िशा झारखंड मप्र छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र समेत देश के लगभग 40% हिस्से में फैलता गया। तत्कालीन सरकारों सुरक्षा बलों और सरकारी अधिकारियों के रवैये से एक तरफ इन इलाकों के लोगों का आक्रोश सरकारी मशीनरी के खिलाफ बढ़ता जा रहा था तो दूसरी तरफ उनका यह क्रोध नक्सलियों के  लिए सहानुभूति भी पैदा करता जा रहा था। स्थानीय लोगों के समर्थन से यह समस्या लगातार गहराती ही जा रही थी। लेकिन यह मोदी सरकार की बहुत बड़ी सफलता है कि अपनी नीतियों और विकास कार्यों के प्रति वह आज इन नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोगों का न सिर्फ विश्वास एवं समर्थन हासिल कर पाई बल्कि उन्हें नक्सलवाद के खिलाफ सरकार के साथ खड़ा होकर देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ने के लिए भी तैयार कर पाई।

    उम्मीद की जा सकती है कि अब वो दिन दूर नहीं जब जैसा कि देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी ने कहा कि 2022 तक कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद और नार्थ ईस्ट में जारी विद्रोह भारत से पूर्ण रूप से साफ हो जाएगा।

    Dr Neelam Mahendra

  • आंदोलन और सरकार की नाकामी –Firdaus Khan

    आंदोलन और सरकार की नाकामी –Firdaus Khan

    जनतंत्र में, लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार होता है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन कर सकती है,  सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है। लेकिन आंदोलन के दौरान, प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती। सरकार को भी ये अधिकार नहीं है कि वे शांति से किए जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल करे। बल्कि सरकार की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वह आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मुहैया कराए। इस बात का ख़्याल रखे कि कहीं इस आंदोलन की आड़ में असामाजिक तत्व कोई हंगामा खड़ा न कर दें। अगर आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा होती है, तो उस पर क़ाबू पाना, उसे रोकना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है। लेकिन केंद्र की बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी की मज़बूत सरकार इस मामले में बेहद कमज़ोर साबित हो रही है।

    हाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर पहले दलितों ने भारत बंद किया था। उसके बाद सर्वणों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ जवाबी आंदोलन शुरू कर दिया। ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए गिरफ़्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किए जाने पर रोक लगा दी थी। क़ाबिले-ग़ौर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम लाया गया था। संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर, 1989 को पारित किया था। इसे 30 जनवरी, 1990 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे में लागू किया गया। यह अधिनियम उस हर व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और वह इस तबक़े के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं। इस अधिनियम में पांच अध्याय और 23 धाराएं शामिल हैं।  इस क़ानून के तहत किए गए अपराध ग़ैर- ज़मानती, संज्ञेय और अशमनीय हैं। यह क़ानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों पर अत्याचार करने वालों को सज़ा देता है। यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है और मामलों के जल्द निपटारे के लिए अदालतों को स्थापित करता है। इस क़ानून के तहत भारतीय दंड संहिता में शामिल क़ानूनों में ज़्यादा सज़ा दिए जाने का प्रावधान है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव को अपराध माना गया है।  इनमें उन्हें जबरन अखाद्य पदार्थ मल, मूत्र इत्यादि खिलाने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य से कारोबार करने से इनकार करता है, तो इसे आर्थिक बहिष्कार माना जाएगा।  इसमें किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य के साथ काम करने या उसे काम पर रखने/नौकरी देने से इनकार करना, इस तबक़े के लोगों को सेवा प्रदान न करना या उन्हें सेवा प्रदान नहीं करने देना आदि इसमें शामिल हैं।

    लेकिन सर्वोच्च न्यालाय के फ़ैसले से दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी बेहद मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता की मज़ूरी लेना ज़रूरी है। अगर दोषी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है,  तो एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी की सहमति के बाद ही उसकी गिरफ़्तारी हो सकेगी। इतना ही नहीं, अदालत ने अग्रिम ज़मानत का भी प्रावधान कर दिया है और एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच को भी ज़रूरी कर दिया है। यानी दलितों पर अत्याचार के मामले में आरोपी की गिरफ़्तारी और उन पर कोई मामला दर्ज करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। ऐसी हालत में दलितों पर अत्याचार के मामलों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। सख़्त क़ानून होने के बावजूद आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव करने के मामले सामने आते रहते हैं। अब जब क़ानून ही कमज़ोर हो जाएगा, तो हालात बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी।  

    ये भी बेहद अफ़सोस की बात है कि आंदोलन न सिर्फ़ उग्र रूप धारण कर रहे हैं, बल्कि अमानवीयता की भी सारी हदें पार कर रहे हैं। बंद के दौरान कई जगह हिंसा की वारदातें हुईं। आगज़नी हुई, दुकानें जलाई गईं, वाहन फूंके गए, फ़ायरिंग हुई। लोग ज़ख़्मी हुए, कई लोगों की जानें चली गईं।  मरने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे। जगह-जगह रेलें रोकी गईं, पटरियां उखाड़ दी गईं।  चक्का जाम किया गया। रास्ते बंद कर दिए गए। किसी को इस बात का ख़्याल भी नहीं आया कि बच्चे स्कूल से कैसे सही-सलामत घर लौटेंगे ? जो लोग सफ़र में हैं, वे कैसे अपने घरों को लौटेंगे या गंतव्य तक पहुंचेंगे? इस झुलसती गरमी में रेलों में बैठे यात्री बेहाल हो गए। बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे। जो लोग बीमार थे, अस्पताल तक नहीं पहुंच पाए। अमानवीयता की हद ये रही कि बिहार के हाजीपुर में एंबुलस में बैठी महिला अपने बीमार बच्चे की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही, प्रदर्शनकारियों के आगे हाथ जोड़ती रही, मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी को उस पर तरस नहीं आया। किसी ने एंबुलेंस को रास्ता नहीं दिया, नतीजतन इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गई, एक मां की गोद सूनी हो गई।

    देश में बंद के दौरान हालात इतने ख़राब हो गए कि सेना बुलानी पड़ी। कई जगह कर्फ़्यू लगाया गया, जिससे रोज़मर्राह की ज़िन्दगी बुरी तरह मुतासिर हुई। आंदोलन के दौरान न सिर्फ़ सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया, बल्कि निजी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया गया। आंदोलनकारी जिस सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं, वे जनता की अपनी संपत्ति है। ये संपत्ति जनता से लिए गए कई तरह के करों से ही बनाई जाती है। यानी इसमें जनता की ख़ून-पसीने की कमाई शामिल होती है। सरकार इस नुक़सान को पूरा करने के लिए जनता पर करों का बोझ और बढ़ा देती है। जिन लोगों की निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचता है, वे ताउम्र उसकी भरपाई करने में गुज़ार देते हैं। आबाद लोग बर्बाद हो जाते हैं। ये सच है कि कोई भी आंदोलन एक न एक दिन ख़त्म हो ही जाता है।  उस आंदोलन से हुई माली नुक़सान की भरपाई भी कुछ बरसों में हो ही जाती है, लेकिन किसी की जान चली जाए, तो उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती। 

    दरअसल, देश में किसी भी तरह की हिंसा के लिए सरकार की सीधी जवाबदेही बनती है। देश में चैन-अमन क़ायम रखना, जनमानस को सुरक्षित रखना, उनके जान-माल की सुरक्षा करना सरकार की ही ज़िम्मेदारी है। सरकार के पास पुलिस है, सेना है, ताक़त है, इसके बावजूद अगर हिंसा होती है, तो इसे सरकार की नाकामी ही माना जाएगा। शासन और प्रशासन दोनों ही इस मामले में नाकारा साबित हुए हैं। केंद्र सरकार न तो दलितों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है और न ही क़ानून व्यवस्था को सही तरीक़े से लागू कर पा रही है। ऐसी हालत में जनता किसे पुकारे?

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • प्यारी बर्फ़ तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो

    प्यारी बर्फ़ तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो

    Dharamraj Singh

    कहो धूप
    मैं हूँ जमी बर्फ़
    ठंडी पत्थर सी
    ऊब गई हूँ बिना हिले डुले
    छुपी लुकाई अपनी ही खोह में
    तुम छितराए हो दूर दूर तक
    क्या कोई जीने का और ढंग है
    एक रंग भर जाना मैंने
    क्या मेरा कोई और रंग है
    घेरे रहती मुझको मृत सी चुप्पी
    क्या मेरे कंठ में भी छुपा कोई राग है
    क्षण भर को भी होता क्या खिलना कोई
    किसी स्वाद का इतराना
    प्राणों सा उतरना किसी में
    किसी हृदय को छका पाना
    कहो धूप
    क्या मेरा परिचय मेरे जीवन से
    तुम दे सकते हो

    प्यारी बर्फ़
    तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो
    जस की तस तुम्हें
    मेरे सम्मुख रहना होगा
    क्या छिपा है तुम्हारे होने में
    हो जानना
    तो तुम्हें गलकर मिटना होगा
    तुम्हारा आपा जब गल जाएगा
    कुछ होगा
    जिसका तुमको कोई बोध नहीं

    तुम्हारा अपना रंग छिन जाएगा
    पर धान के खेत में तुम धानी होगी
    तुम्हारे अपने गीत न होंगें
    पर तुम्हारे गुज़रने भर से
    घाटियों में कलकल होगी
    बुरुँश के पेड़ों की जड़
    जब तुम छू दोगी
    उनके सुर्ख़ फ़ूल आकाश में खिलेंगें
    भले तुम्हारा अपना स्वाद न हो
    तुमसे सींचे जाने पर ही तो
    कैंथ कसैला होगा
    तुम्हारा अपना ठौर हो न हो
    तुम्हारी बिछाई गीली रेत पर
    मीठे तरबूजों की बेल पसरेगी

    हिरन के बच्चों के प्यासे गलों को तर कर
    जब तुम उनके भीतर जाओगी
    उनकी कुलाँचें बाहर आएँगी
    और शाख़ों से जब चिड़ियाँ भर्र भरेंगी
    उनके डैनों को ताक़त
    उनके पेट में तुम्हारे हिंडोले से आएगी
    कछुआ मछली घड़ियाल
    न जाने कितने जीव जंतु
    तुमसे अनभिज्ञ होकर भी तुममें होंगे
    तुम उनका प्राण रहोगी
    महुए के फूल की मादक रस सुगंध
    महुए के पोरों में बसी तुम्हारी ही छलाँग होगी
    कितने भी सूखे पत्थर हों
    तुम उनको भी गीला कर पाओगी
    तुम्हें अपनी क़ीमत की ख़बर तब सबसे ज़्यादा होगी
    जब तुम इंसान को देखोगी
    जिसकी आँखों के कोरों तक में
    पानी सूख गया है

    अपना पूरा जीवन जीकर एक दिन तुम
    उस महासागर से मिलोगी
    जिसकी तुम्हें अभी ख़बर नहीं
    और कौन जाने
    तुम हवाओं पे सवार बादल बन
    अनंत उड़ान को ही निकल पड़ो
    तुम मानो न मानो मैं देखता हूँ
    तुम्हारा वह जीवन भी है
    जो पूर्णतया मुक्त और अकलुषित है
    बहुत कुछ होगा पर प्यारी बर्फ़
    तुम न होगी

    शिक्षाएँ कहती हैं
    क्या तुम मेरे समक्ष ऐसे हो सकते हो
    बिना व्याख्या
    जैसे होती है बर्फ़ धूप के
    क्या मुझे अनुमति है
    तुम्हारे हृदय में उतरने की
    जैसे उतरती है धूप बर्फ़ में
    मेरी उपस्थिति पर
    तुम्हारे हृदय में उपजी कीमिया
    क्या तुम्हें बूँद मात्र भी द्रवित कर गई हैं
    और तुम्हें अंतर्दृष्टि है
    उस अनपेक्षित महारास की
    जो समूल मिटने पर पसरता है
    यदि तुम सहर्ष तैयार हो मिटने को
    तो तुम्हारी धन्यता की तो कौन कहे
    तुम बड़वानल होगे
    मनुष्य मात्र के दुःख समुद्र का

    Dharamraj Singh