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  • नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    इन दिनों कई दलित संगठन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उसके आधिकारिक अभिलेखों में भीमराव अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ शब्द जोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बतौर, अंबेडकर ने संविधान की प्रति पर अपने हस्ताक्षर, भीमराव रामजी अंबेडकर के रूप में किए थे। परंतु सामान्यतः, उनके नाम में रामजी शब्द शामिल नहीं किया जाता है। तकनीकी दृष्टि से उत्तरदेश सरकार के इस निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह निर्णय, अंबेडकर को अपना घोषित करने की हिन्दुत्ववादी राजनीति का हिस्सा है। भाजपा के लिए भगवान राम, तारणहार हैं। उनके नाम का इस्तेमाल कर भाजपा ने समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया – फिर चाहे वह राममंदिर का मुद्दा हो, रामसेतु का या रामनवमी की पूर्व संध्या पर जानबूझकर भड़काई गई हिंसा का। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हम भारत में दो विरोधाभासी प्रवृत्तियों का उभार देख रहे हैं। एक ओर दलितों के विरूद्ध अत्याचार बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अंबेडकर की जंयतियां जोर-शोर से मनाई जा रही हैं और हिन्दू राष्ट्रवादी अनवरत अंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे हैं।

    इस सरकार के पिछले लगभग चार वर्षों के कार्यकाल में हमने दलितों के दमन के कई उदाहरण देखे। आईआईटी मद्रास में पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया, रोहित वेम्यूला की संस्थागत हत्या हुई और ऊना में दलितों पर घोर अत्याचार किए गए। मई 2017, जब योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे, में सहारनपुर में हुई हिंसा में बड़ी संख्या में दलितों के घर जला दिए गए। दलित नेता चंद्रशेखर रावण, जमानत मिलने के बाद भी जेल में हैं क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंसा भड़काई। दलितों के घरों को आग के हवाले करने की घटना, भाजपा सांसद के नेतृत्व में निकाले गए जुलूस के बाद हुई जिसमें  ‘‘यूपी में रहना है तो योगी-योगी कहना होगा‘‘ व ‘‘जय श्रीराम‘‘ के नारे लगाए जा रहे थे। महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काई गई और जैसा कि दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने कहा है, हिंसा भड़काने वालों के मुख्य कर्ताधर्ता भिड़े गुरूजी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। भाजपा की केन्द्र सरकार में मंत्री व्ही के सिंह ने सन् 2016 में दलितों की तुलना कुत्तों से की थी और हाल में एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी ऐसा ही कहा। उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में जब योगी आदित्यनाथ मुशहर जाति के लोगों से मिलने जा रहे थे, उसके पूर्व अधिकारियों ने दलितों को साबुन की बट्टियां और शेम्पू बांटे ताकि वे नहा-धोकर साफ-सुथरे लग सकें।

    मोदी-योगी मार्का राजनीति की मूल नीतियों और चुनाव में अपना हित साधने की उसकी आतुरता के कारण यह सब हो रहा है। सच यह है कि मोदी-योगी और अंबेडकर के मूल्यों में मूलभूत अंतर हैं। अंबेडकर, भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। वे जाति का उन्मूलन करना चाहते थे और उनकी यह मान्यता थी कि जाति और अछूत प्रथा की जड़ें हिन्दू धर्मग्रंथों में हैं। इन मूल्यों को नकारने के लिए अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था। उन्होंने भारतीय संविधान का निर्माण किया, जो स्वाधीनता संग्राम के वैश्विक मूल्यों पर आधारित था। भारतीय संविधान के आधार थे समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य। दूसरी ओर थीं हिन्दू महासभा जैसी संस्थाएं, जिनकी नींव हिन्दू राजाओं और जमींदारों ने रखी थी और जो भारत को उसके ‘गौरवशाली अतीत‘ में वापस ले जाने की बात करती थीं – उस अतीत में जब वर्ण और जाति को ईश्वरीय समझा और माना जाता था। हिन्दुत्ववादी राजनीति का अंतिम लक्ष्य आर्य नस्ल और ब्राम्हणवादी संस्कृति वाले हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। आरएसएस इसी राजनीति का पैरोकार है।

    माधव सदाशिव गोलवलकर व अन्य हिन्दू चिंतकों ने अंबेडकर के विपरीत, हिन्दू धर्मग्रंथों को मान्यता दी। सावरकर का कहना था कि मनुस्मृति ही हिन्दू विधि है। गोलवलकर ने मनु को विश्व का महानतम विधि निर्माता निरूपित किया। उनका कहना था कि पुरूषसूक्त में कहा गया है कि सूर्य और चन्द्र ब्रम्हा की आंखें हैं और सृष्टि का निर्माण उनकी नाभि से हुआ। ब्रम्हा के सिर से ब्राम्हण उपजे, उनके हाथों से क्षत्रिय, उनकी जंघाओं से वेश्य और उनके पैरों से शूद्र। इसका अर्थ यह है कि वे लोग जिनका समाज इन चार स्तरों में विभाजित है, ही हिन्दू हैं।

    भारतीय संविधान के लागू होने के बाद, आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने एक संपादकीय में संविधान की घोर निंदा की। आरएसएस, लंबे समय से कहता आ रहा है कि भारतीय संविधान में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। हाल में केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी यही बात कही। जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया था, तब उसका जबरदस्त विरोध हुआ था। दक्षिणपंथी ताकतों ने अंबेडकर की कड़ी निंदा की थी। परंतु अंबेडकर अपनी बात पर कायम रहे। उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें न केवल शास्त्रों को त्यागना चाहिए बल्कि उनकी सत्ता को भी नकारना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। तुम में यह साहस होना चाहिए कि तुम हिन्दुओं को यह बताओ कि उनमें जो गलत है वह उनका धर्म है – वह धर्म, जिसने जाति की पवित्रता की अवधारणा को जन्म दिया है‘‘।

    आज क्या हो रहा है? आज अप्रत्यक्ष रूप से जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाई. सुदर्शन ने हाल में कहा था कि इतिहास में किसी ने जाति प्रथा के विरूद्ध कभी कोई शिकायत नहीं की और इस प्रथा ने हिंदू समाज को स्थायित्व प्रदान किया। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करना और विश्वविद्यालयों में इन वर्गों व ओबीसी के लिए पदों में आरक्षण संबंधी नियमों में बदलाव, सामाजिक न्याय और अंबेडकर की विचारधारा पर सीधा हमला हैं।

    जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद होती जा रही है उसके समक्ष यह समस्या भी उत्पन्न हो रही है कि वह दलितों की सामाजिक न्याय पाने की महत्वाकांक्षा से कैसे निपटे। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति, जाति और लैंगिक पदक्रम पर आधारित है। इस पदक्रम का समर्थन आरएसएस चिंतक व संघ परिवार के नेता करते आ रहे हैं। उनके सामने समस्या यह है कि वे इन वर्गों की महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं करना चाहते परंतु चुनावों में उनके वोट प्राप्त करना चाहते हैं। इसी कारण वे एक ओर दलितों के नायक बाबा साहब अंबेडकर को अपना सिद्ध करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर, दलितों को अपने झंडे तले लाने की कोशिश में भी लगे हुए हैं। वे चाहते हैं कि दलित, भगवान राम और पवित्र गाय पर आधारित उनके एजेंडे को स्वीकार करें।

    यह एक अजीबोगरीब दौर है। एक ओर उन सिद्धांतों और मूल्यों की अवहेलना की जा रही है, जिनके लिए अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष किया तो दूसरी ओर उनकी अभ्यर्थना हो रही है। और अब तो अंबेडकर के नाम का उपयोग भी हिन्दुत्ववादी शक्तियां, राम की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहती हैं।   


    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा  –Tribhuvan

    अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

    Tribhuvan

    प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘दॅ आइडिया ऑव जस्टिस’ के ‘दो शब्द’ वाले हिस्से में प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ से एक अदभुत उदाहरण दिया है। चार्ल्स डिकंस के उपन्यास में बच्चों की अपनी छोटी-सी संवेदनशील दुनिया है। इसमें एक पात्र पिप कहता है कि अन्याय का एहसास बहुत अंदर तक पीड़ा पहुंचाता है। पिप ने बचपन में अपनी गुस्सैल और बदमिज़ाज बहन के हाथों बहुत अपमान सहा था। हर आदमी जब अन्याय सहता है तो वह पिप की तरह ही सोचता है। ऐसा नहीं होता कि हम व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण बना ही दें; लेकिन यह उम्मीद और प्रत्याशा हर हृदय में स्पंदित होना स्वाभाविक है कि हमारे चारों तरह जो अन्याय का वातावरण बन गया है, उसे समाप्त किया जाए। यह अन्याय कई बार वास्तविक और कई बार छद्म रूप से तैयार किया जाता है।

    हम जिस देश और समाज में जी रहे हैं, वह बहुत ही अदभुत हैं। उसने हम सबको बहुत ही गिरगिटिया बना दिया है। इसे हम सब आए दिन देखते हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करते। हम आए दिन देखते हैं कि शिड्यूल्ड कास्ट्स और शिड्यूल्ड ट्राइब्स विकराल समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन इनका एहसास कथित ऊंची जातियों और उच्च शिक्षित लोगों को नहीं है। आज जिस तरह की डिस्पैरिटीज और जिस तरह के सब्जुगेशंस ये वर्ग भुगत रहे हैं, वह हमें बाहर से सामान्य बात लगती है, लेकिन आप जब इनके हृदय में उतरकर देखेंगे तो वहां आपको एक विकराल झंझावात दिखाई देगा। यह उस मिथकीय रामराज्य का भी कड़वा सच था और यह इस युग के रामराज्य का भी सच है कि यहां वनवासी हनुमान को ही सीना फाड़कर अपने हृदय में बसते राम का ही चेहरा दिखाना होता है। राम राम ही रहते हैं और वनवासी योद्धा हनुमान होकर भी सेवक ही रहता है और राम जी विजय की हुई स्वर्णिम सत्ता विभीषणों को ही सौंपते हैं। भले वह कालकूट विष पीने वाले शिव के आशीर्वाद से ही रची गई हो।

    दुनिया का एक यही देश है, जहां आज भी समाज आदिम तरह से न केवल बंटा हुआ है, बल्कि उसकी भाषिक संवेदनाएं भी आदिकालीन ग्रंथों से अनुप्राणित होती हैं। हमें समझ भी वही आता है। इसलिए वैज्ञानिक सत्य और शोध पर आधारित नई शब्द रचना हमें स्वीकार्य ही नहीं होती। हमारे यहां शिड्यूल्ड कास्ट 16.6 और शिड्यूल्ड ट्राइब 8.6 प्रतिशत हैं। इतना वर्ग इतना सा सरल नहीं है। यह 1108 अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है आैर उनका अपना ऊंच-नीच और छुआछूत है। यह 29 राज्यों में फैला हुआ मानव समाज है। हमारे एसटी 22 राज्यों में फैले हुए हैं और ये 744 तरह के आदिवासी समाज हैं, जिनकी अपनी बहुत समृद्ध और गौरवशाली परंपराएं हैं, लेकिन हमारे विकास की अाधुनिक धारणाओं और कामकाज की शैली ने इन्हें बर्बाद कर दिया है।

    सोशल मीडिया एक तरह का ख़तरनाक़ दर्पण है। यह एक तरह की खुली हुई पैथोलॉजिक लैबोरेट्री है। इसमें हर एक का ब्लड, स्टूल और स्पूटम समुद्र ही तरह से बह रहा है। बायोप्सियों के ढेर लगे हैं। इस विशालकाय पैथोलॉजिकल लैबाेरेटरी से किसी को गंध आ रही है और कोई घृणा में डूबा जा रहा है। कोई मुंह पर कपड़ा बांध रहा है और किसी ने नाक भींच ली है। लेकिन मानव समाज को एक स्वस्थ और विवेकशील समाज के रूप में देखने की कामना करने वाले लोग इसे किसी डॉक्टर की निगाह से देखेंगे। आज के एससी-एसटी वह नहीं हैं जो कल थे। उन्हें शिक्षा और जागरूकता ने सबके बराबर खड़ा कर दिया है। इससे वे कोई विवेकवान या कोई वैज्ञानिक सोच वाले हो गए, यह नहीं है। लेकिन यह सच है कि वे अब उन्हें छोटे-छोटे अन्याय भी उद्वेलित करते हैं। वे एक अब एक ताकत के रूप में गोलबंद हो गए हैं। उनमें सबके सब न तो शंभु हैं कि वे सांप्रदायिक लोगों का गुर्गा बनकर उनकी दमित रक्तपिपासा का शांत कर देे और न ही वे सबके सब प्रतिभा से दिपदिपाते लेखकीय प्रतिभा वाले ऐसे अति संवेदनशील रोहित वेमुल्ला हैं, जो यथार्थ का सामना करने के बजाय आत्महत्या कर लें।

    अब समय आ गया है कि हम हिंसा की मुखर आलोचना करें, लेकिन यह प्रतिज्ञा भी करें कि हम भारतीय समाज से अन्याय को मिटा देंगे। हम अन्याय को खत्म करके ही न्याय का संवर्धन कर सकते हैं। हम अपने घरों में उनका उसी तरह स्वागत सत्कार करें, जैसा हम अपने रिश्तेदारों से करते हैं। हम अपने घरों के अगवाड़े या पिछवाड़े एक-एक अलग से रखे चाय के कपों को हटा दें। हम अपने घरों के बाहर सफाई करने वाले या गंदे नाले में उतरकर सफाई करने वाले से ऐसा ही सलूक करें, जैसा एक आदर सरहद पर लड़ते किसी सैनिक का करते हैं। हमें अपने शब्दकोशों को बदल डालना चाहिए, जिनमें कथित अछूत जातियों के नामों को गालियों के तौर पर प्रयुक्त किया जाता है। हमें अपनी नैतिकता में आ चुकी कलुषाओं को धोना होगा। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारी बस्तियों में वे लोग वैसे ही सम्मान से रहें, जिस सम्मान से एक स्वाभिमानी को रहना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें अपने दिलो-दिमाग को मानवीय और न्यायशील बनाना होगा। हम ऐसे नहीं हैं, इसीलिए हमें अपनी जाति की हिंसा हिंसा ही प्रतीत नहीं होती और किसी अन्य जाति की हिंसा हिंसा दिखाई देती है। इसीलिए हमें गांधी जैसे महानायक की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे आतंकवादी नहीं लगता, लेकिन एक खास इमारत के बाहर गोलियां चला देने वाला देशद्रोही लगने लगता है। हम इमारत के भीतर के देवता की हत्या करने वाले का तो मंदिर भी बनाने लगते हैं, लेकिन इमारत पर बंदूक तानने वाले को फांसी दिए बिना बेचैन हो उठते हैं।

    न्याय की यह पुकार इस महान देश की मिट्‌टी में वैदिक काल से भी शायद सैकडों-हजारों साल पहले की है। हमारी मानवीय चेतना उसी मिट्‌टी से नहाई हुई है। हमें इस धरती पर पल रहे समाज को एक अच्छे मानव समाज का रूप देने के लिए अपनी अपनी संस्कृतियों और अपनी अपनी मानसिकताओं में पल रहे अन्याय को खत्म करना होगा। यह काम हमें ही करना होगा; क्योंकि जिनके भरोसे हमने यह काम छोड़ दिया है, वे बहुत ख़तरनाक़ खेल खेल रहे हैं। वे अपनी सत्ता के लालच में 15 अगस्त 1947 से आज तक बच्चों के हाथों में बासुरियों के बजाय बंदूकें ही शोभित करवाने की संस्कृति को बढा रहे हैं। बच्चे सरदार भगतसिंह ने अंगरेजों को भगाने के लिए खेत में बंदूकें बोई थीं, लेकिन हमें स्वतंत्र भारत में बांसुरियां बोनी चाहिए, न के धनुष और सुदर्शन चक्र! यह राम आैर कृष्ण से भी पहले उन वैदिक ऋषियों का देश है, जिन्होंने मानवता की कोंपलों की रक्षा के लिए अपने आपको होमना सीखा था। यह रक्तपिपासुओं का नहीं, यह ऐसे आम भारतीयों का देश है, जिनके कंठ में राग और विराग पलता है। जहां संतों की वाणियां गूंजती हैं। यह सिर्फ इसी देश को एक परिवार नहीं, पूरी वसुधा को कुटुंब बनाने का स्वप्न रचने वाले लोगों के बच्चों का देश है। यह उन साधुओं और फ़कीरों का वह देश है, जहां एक ऐसे मानव समाज की कल्पना की गई थी, जो निखिल द्यु लोक में प्रेम प्राण, गान गंध और पुलक के झरने की कामना करते हैं। जहां हृदयों में हिंसक भाव नहीं, नीरव आलोक बरसता है। जहां स्वर्णिम उषा की अरुणाई से प्राण आरक्त होते हैं और अलसाई आंखों पर दूर्वादल के आेसकण नव जागृति लाते हैं।

    इसलिए स्वतंत्रता का स्वप्न तभी पूरा होगा जब अन्याय का अंधकार हम सबके हृदयों से हम स्वयं दूर देंगे।

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  • चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

    चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

    Pankaj Mishra

    क्या पूछना है , तीस बरस की उम्र में हाउस लोन मिल गया …. और तीस ही बरस की क़िस्त , चुकाए जाओ मियाँ , किराए के घर में तो न रहना पड़ेगा , लाइफ में क्वालिटी तो होना ही मांगता है ….चुकाइये ..क्वालिटी !! तो भइये , घर में सब कुछ मोड्यूलर होना चाहिए तब न बात बनेगी , रह तो सब लेते है तो करना कुछ नही एक फॉर्म ही तो भरना है , किस्तें टाइमली …. यस बॉस

    अब एक बड़ी गाड़ी तो होनी चाहिए , तो हाज़िर है कल दरवाज़े पर खड़ी हो जायेगी , दस बरस तक लो इंटरेस्ट पर किस्तें भरिये , बिलकुल भरूंगा चाबी दीजिये , थैंक्यू …

    बड़ा वाला टीवी चाहिए , कहां मिलेगा , अरे on line ले लीजिए किस्तो पे , महंगा मोबाइल , फ्रिज ऐसी सब क़िस्त पे मिल तो रहा है , देर किस बात की पट्ठे ले लो , चुकाते रहना …

    इस गर्मी में क्या करूँ , क़िस्त पे इन्वर्टर लिया था तो उससे एसी कहां चलता है , क़िस्त वाला एसी बिजली से चलता है लेकिन अभी बिजली क़िस्त पे नही मिलती , लानत है ऐसे सिस्टम पे ….

    चलो कहीं पहाड़ों पर , गर्मी भर , मिसेज़ त्रिपाठी ठीक कह रही थी , भुवाली में क़िस्त पे फ़्लैट ही ले लिया होता तो अच्छा था , लेकिन कोई बात नही क़िस्त पे टूर पैकेज है न .. अलग अलग डेस्टिनेशन होना चाहिए वरना घूमने का मजा क्या …..

    क्या हुआ बेटा , सेलेक्शन हो गया न , कहता था मैं , कोटा महंगा है तो क्या हुआ … लेकिन IIIIIT ….के लिए बेस्ट है , इंस्टालमेंट में न लेते तो नही पढ़ा पाता … जरा FEE STRUCTURE पे क्लिक करो बेटा …
    बाप रे इत्ती फीस … ये फोटो ज़ूम करो ….थैंक गॉड ….. अच्छा है एजुकेशन लोन की सुविधा कालेज गेट पर ही उस लाल वाले टेंट में है … अरे तो कालेज भी तो एवन है …. कोइ पागल दास महाविद्यालय में , हिस्ट्री जाग्रफी संस्कृत से बीए थोड़ी करने जा रहा है बेटवा ….

    क्या हुआ जी , तुम्हारा मुंह क्यों टेढ़ा रहता है हमेशा , अभी उमर बीत नही गयी मेरी जोहराजबीं ..आज शाम को ही तनिष्क से डायमंड ज्वेलरी की बरसो की साध पूरी हो जायेगी ….. चुपचाप 11 + 1 वाले ऑफर में पांच साल से पैसा जमा कर रहा हूँ जानेमन ….. अब जरा मुस्कुरा दो ….मुस्कुरा दो प्लीज़ , वो तो अच्छा हुआ जो तीन साल से साहब ने स्टोर का चार्ज अकेले मुझे दे रखा है ….. वर्ना इतनी किस्तों को बोझा कैसे सम्भलता …..एक डायमंड रिंग साहब की मिसेज़ के लिए भी लेना था कल उनका बड्डे है , लोवर स्टाफ में सिर्फ मुझे ही बुलाया है …बहुत मानते है साब मुझे …सुबह कथा होगी , धार्मिक आदमी है , परिवार भी संस्कारी है …. सारा इंतज़ाम देखना है , सुबह पंडी जी को भी मुझे ही ले जाना है …उधर दुनिया को देखो सब संस्कार भूलते जा रहे है ..

    अरे ये पंडितवे सब राजनीतिक पंडित हो या धार्मिक ये सब तो और महान है , ये ससुरे उस महान भौतिकवादी का मजाक उड़ाते थे …पता नही कहां से ढूंढ के लाये और उसके मुंह में ठूंस दिए ” ऋणं क्रित्वा घृतम पीवेत …” अब देखो इन्हें , अब खुद क्या कर रहे है , किधर ले जा रहे है देस को ….. देखा जाए तो उसका उपहास उड़ाने के लिए बोले गये बोल आज वेदव्यास के मुंह से निकले बोल हो गए है ..सनातन संस्कृति के निवृत्ति मार्ग के संस्कारों की कैसे वाट लग रही है …..बस , इतना समझ लो भागवान , कि ये जो नेताओं की भाषणबाज़ी है न , ये सब के सब दोगले है , जो कहेंगे उसका उल्टा करेंगे , जिसका मजाक उड़ाएंगे उसी का एजेंडा चुपचाप लागू करेंगे , जो ज्ञान देंगे उसका उल्टा अभ्यास करेंगे , ये सा सा ह ह … आह आह … क्या हुआ …

    क्या हुआ जी …..

    कुछ नही थोड़ा दर्द है इधर ..

    अरे …बायीं तरफ … पसीना भी आ रहा है , हार्ट अटैक के लक्षण है , लेट जाओ …..अरे गुड्डू बेटा देखो तो जरा पापा को क्या हुआ है … बीपी की दवा तो खाई थी न जी आज …

    दवाई व्वाई छोडो , पहले वो अलमारी खोलो …, अरे वो नही वो मैरून वाली , अरे ट्रिपल डोर वाली , जो अमन स्टील वाला उधार दे गया था ….. देखो उसमे वो मेडिकल इंश्योरेंस वाली फ़ाइल रखी होगी , चेक करो .. पता नही रिन्यू कराया था या नही …

    oh my god …. ये तो लैप्स हो गयी है ….

    आं …..तब अपोलो में नही , मेडिकल कालेज चलो …

    कितनी बार कहा …मेडिकल इंश्योरेंस लैप्स न हो ….. लेकिन ..

    अब बड़ बड़ न करो …. दर्द कम हो रहा है ….राहत है …..angina लगता है … राजेश को फोन करो …आये तो पालिसी रिन्यू करा लूँ ……कल सारा चेकप करा लूँगा , लाल पैथोलॉजी वाले कम्प्लीट बॉडी चेकप पर डिस्काउंट दे रहे अपने मेम्बर्स को , लाइफ मेम्बरशिप ले लूँगा उसके बाद कराऊंगा तो चीप पड़ेगा … अब समझ में आ गया , जान है तो जहान है ….

    नही जी …..क़िस्त है , तो जान है , जान है , तो जहान है , मेरा भारत महान है …..

    ठीक कहती हो ….क़िस्त है तो जान है , जान है तो जहान है , मेरा भारत महान है …

    कतरा कतरा मिलती है 
    कतरा कतरा जीने दो 
    जिंदगी है बहने दो …… प्यासी हूँ मैं प्यासी रहने दो 
    रहने दो ……ना …

    बेटा जरा वॉल्यूम बढा दो …

    प्यासी हूँ मैं … प्यासी रहने दो ….ठीक है ठीक है , रहने दो …..अब जरा , पॉप मोड से स्टैण्डर्ड मोड पे कर दो …. फिर जाओ नहाओ , गर्मी बहोत है ….और खाना वाना खाओ , रात गहरा गयी है ….

    Pankaj Mishra

  • प्रेम को क्यो मार दिया है संसद मे बैठने वालो ने –Abhimanyu Bhai

    प्रेम को क्यो मार दिया है संसद मे बैठने वालो ने –Abhimanyu Bhai

    Abhimanyu Bhai

    मोदी जी !
    प्रेम को क्यो मार दिया है संसद मे बैठने
    वालो ने !इसीलिए इनकी पगार और 
    सांसद निधि आप बढाते है !
    मन कितने गंदे हो चुके है समाज मे !
    मन दुखी है !
    तो मन की बात लिख रहा हूं।

    अब ऐसा आरक्षण का कार्यक्रम बनाइए जिसमे
    हर जाति का दलित गरीबी की त्रासदी से बाहर निकले
    और शोषण कारी अन्यायी गरीबी की रेखा की परिभाषा को बदलिए !सहभागिता आधारित योजना क्रियान्वयन को लागू कराइए!

    सोचिए कि हिंसक आन्दोलन क्यो प्रभावी है ?
    क्योकि सरकार हिंसा के बाद सुनती है !
    चित्रकूट के कोल आदिवासी हिंसक आन्दोलन नही कर सके इसलिए आजादी के बाद से आज तक
    उनकी नही सुनी गई!

    चित्रकूट मे एक भी दलित आदिवासी गांव खुशहाल
    नही है -उसे आपकी संसद के आरक्षण का
    लाभ नही मिला !
    यहां आदिवासी बच्चे स्कूल की
    जगह भूख की जुगाड मे रहते है।

    बुन्देलखण्ड मे दलित विकास का
    काम करने वाली संस्था और नेताओ ने भी
    केवल आरक्षण पर अपनी लाठी पीटी है !
    और कोलो को कलम पकडाने की जगह 
    बन्दूक थमा दी।

    यही हाल चमार भंगी पासी तथा गधालादो की जमात मे रहने वाले बच्चो का भी है वह स्कूल छोड के केवल पैसे खोज मे लगे रहते है !

    दलित -हिंदू नेता अपनी अपनी
    सरकारो मे मालामाल हो गये !
    आज कुछ जेल मे है या सत्ता से दूर है!
    जो सत्ता मे है वह केवल फेसबुक तक है !
    उन्होने ने कुछ नही किया दलित विकास मे!
    आपकी सरकार भी ऐसा कुछ नही पा कर रही
    जिससे दलित चाहे जिस जाति का वह गरीबी की त्रासदी से ऊपर आजाए !
    आज सरकार आप की है तो लाजिम है कि 
    कल जो कुछ देश /प्रदेश मे हुवा उसके जिम्मेदार आप तथा राज्य के मुख्यमंत्री जिलाधिकारी पुलिस 
    अधीक्षक सबसे पहले जिम्मेदार है!

    जरुरत है
    आज ऐसे आन्दोलन की जिनके हांथ मे तलवार 
    डंडे की जगह प्रेम की पुस्तक हो !
    आन्दोलन कारियो 
    से ऐसे एग्रीमेंट होने चाहिए! 
    पहले तो सरकार को ऐसे 
    काम करना चाहिए कि लोग आंदोलित ही न हो !
    देश विभाजन की नीव न पडे इसे रोकिए ।

    दलित गरीब को
    उसकी नदी जंगल हवा स्कूल 
    और उसकी जमीन लौटा दीजिए और इन जगहो से 
    सरकारी हस्ताक्षेप बंद करा दीजिए !
    यह अपना आरक्षण 
    अपनी संसद के पास रखिए !
    मान लीजिए सब आपस मे जीना सीख लेगे 
    और जंगल नदियो पशु पक्षी सब प्रेम सीखा देगे?

    कल देखा कि दलित आदोलन मे
    बेचारे भोले भाले युवाओ को -आंदोलन के नेताओ ने 
    बुद्ध की तस्वीर न देकर हांथो मे डण्डे 
    पकडा दिए जैसे हिन्दू -मुस्लिम संगठन 
    तलवार हांथ मे लेकर चलते है!

    बेचारे न समझ उत्साही दलित गरीब निर्दोष युवाओ
    की पिटाई तथा रास्ते चलते निर्दोष आम नागरिको के साथ आन्दोलन कारी उन्माद ने जो कृत्य किया यह सब
    देख कर मन बहुत दुखी है व्याकुल है?
    बेशरम राजनैतिको 
    मत बाटो समाज को
    एक साथ लोग सहजता समरसता से रह सके 
    ऐसा माहौल दो।

    क्यो एक दूसरे के आस्था पर जूते चलाते हो ।
    जैसा बोया हो वैसा ही तुम पा रहे हो –
    इसके बाद भी हाय कुर्सी हाय कुर्सी 
    लगी है !वोट लेने के बाद कभी पलट कर देखते हो
    दलित गरीब किस हालत मे जीता है!
    कौन सा न्याय तुम उसे दिलाते हो!

    तुमने उसका शुद्ध निशुल्क पानी तक छीन लिया
    उसका विचार छीना अब हवा भी छीन रहे हो 
    और लोगो को बीमार बना कर दवा कम्पनीयो को तैनात कर गरीब के घरो मे बडी डकैती डलवाते हो 
    तुम्हारा cmo से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक 
    गरीब को लूटता है –फिर अपना आलीशान मकान बनवाता है —स्कूल चलवाता है !
    जब उसने हिस्सा सही नही दिया तब उसका स्थांतरण करा देते हो !

    हर जाति- धर्म के अन्दर की गरीबी नौकरी सी नही
    दूर होगी –उसकी गरीबी को भारत की गरीबी 
    रेखा की परिभाषा भी दूर नही कर सकती!

    आज तक सबसे दलित जातियो के बच्चे स्कूल
    मे ठहर नही पा रहे और देश की शिक्षा उन्हे 
    न तो आत्मनिर्भर बना रही है न प्रेम शिखा पा रही है केवल उन्माद और नशा शिखा रही है ।
    विपक्ष तो केवल शाखंडी है।

    सरकारो ने केवल वोटर को ठगा
    है लडाया है?
    चाहे वह किसी की सरकार रही हो
    सबकी संस्कृति एक है ।

    बुद्ध महावीर गुरुनानक गांधी अम्बेडकर के समाजिक प्रेम को
    आज संसद के अन्दर बैठने वाले तथा संसद मे जाने की इच्छा रखने वालो ने क्यो मार दिया ?
    आज मै बहुत दुखी हूं।

    Abhimanyu Bhai

  • रोहतास जिले के भईसाहां पंचायत की आशा देवी –Santosh Kumar Singh

    रोहतास जिले के भईसाहां पंचायत की आशा देवी –Santosh Kumar Singh

    Santosh Kumar Singh

    ये हैं रोहतास जिले के भईसाहां पंचायत की आशा देवी। स्वच्छाग्रह की कार्यकर्ता हैं। स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर की उपस्थिती में टूटी फूटी भोजपुरी हिंदी में स्वच्छता अभियान की अईसन खाका खिचिन की लगभग उपस्थित सबलोगों का आंख कमोबेश नम होई गवा।

    किस्सा यू हैं कि आशा देवी का दो बच्चा है एक मानसिक रूप से परेशान और दूसरा विकलांग। गांव गांव घूम के चूड़ी बेच के घर का काम चलाती हैं। संयोग से जब ये स्वच्छता अभियान से जुड़ीं तो इनको समझ में आया कि जिस बच्चे को लेकर परेशान है उसकी बीमारी का कारण शौचालय का अभाव, साफ सफाई की कमी भी हो सकता है। तो इन्होंने ठाना कि अब लोगों को शौचालय बनवाने के लिए जागरूक करेंगी।

    लेकिन समाज इतना जल्दी कहां मानता है जिसके घर जातीं और शौचालय बनवाने को कहतीं वो कहता कि आपके घर में शौचालय है। आशा को भी बात समझ में आया कि बात तो सही है जब अपने घर में ही नहीं है तो दूसरे को क्या उपदेश दें। इन्होने शौचालय बनवाने के लिए पती को कहा। पती का कहना था कि पैसा तो है नहीं। लेकिन आशा को भरोसा था कि बाली रखके उनका भाई पैसा दे देगा। लेकिन भाई ने साफ मना कर दिया। भाई के घर से वापस आ रही थीं तो रास्ते में वो बाली भी हेरा गया। पती के डर से चुप रहीं लेकिन औरत का श्रृंगार तो गहना है।

    लेकिन आशा ने ठान लिया था कि जब तक शौचालय नहीं बनेगा तब तक चुप नहीं बैठेगा। तो उन्होंने किसी से 5000 हजार रूपया उधार लेकर शौचालय बनवाया। अब वो लोगों को समझाती हैं इज्जत चाहिए तो बाजार से इज्जत खरीद लाईये लेकिन बाजार में इज्जत थोडूए न मिलता है..इज्जत तो शौचालय है।

    तो आशा देवी जईसन 20,000 हजार स्वच्छता कार्यकर्ता का जुटान अगले एक सप्ताह तक बिहार के अलग-अलग पंचायत में होने वाला है। 3 से 8 अप्रैल तक बिहार के हर पंचायत में अईसे स्वच्छाग्रहियों द्वारा स्व्च्छता संदेश दिया जायेगा। आपतो जानते ही हैं कि सब लोग चंपारण जा रहा है तो अपने प्रधानमंत्री भी 9 अप्रैल को चंपारण जायेंगे। वहां इन स्वच्छाग्रहियों का सम्मान होगा। लेकिन आशा देवी का किस्सा सुन मंगरूआ कहां चुप रहने वाला था। मंगरूआ ने परमेश्वरण अय्यर से पूछ ही लिया कि आप तो कहते हैं कि शौचालय बनवाने के लिए 12,000 रूपया मिलता है तो ई रूपया मिलता कब है क्या बाली बेचने के बाद या फिर बाली के हेराने का इंतजार है।

    Asha Devi

    Asha Devi with Santosh Kumar Singh

    Santosh Kumar Singh

  • रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

    रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    रजनी तिलक जी का अचानक चले जाना अम्बेडकरवादी महिलावादी आन्दोलन के लिए गहन धक्का है क्योंकि उन्होंने जीवन प्रयत्न इन सवालों पर कोई समझौता नहीं किया और महिलाओं के अधिकारों के लिए वह संघर्षरत रही. आज ये कठिन दौर में साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विरुद्ध सीधे खड़े होने के लिए बहुत वैचारिक निष्ठां चाहिए होती है . रजनी तिलक उन गिने चुने लोगो में थी जो बिना किसी ईगो के ऐसे किसी भी प्लेटफार्म पर जाने के लिए तैयार रहती थी जहा जनता के प्रश्नों पर लोग लड़ रहे थे. इसलिए दिल्ली के जंतर मंतर पर हम उन्हें भगाना उत्पीडित लोगो के साथ खड़े देखते थे तो निर्भया आन्दोलन के वक्त भी उन्होंने औरो के साथ जुड़ने में कोताही नहीं की लेकिन समय समय पर लोगो को चेताते रहना के दलित महिलाओं के उत्पीडन के प्रश्नों पर तथाकथित प्रगतिशील और जनवादी लोगो को उतना ही बेचेन दिखना पड़ेगा जैसे वो निर्भया के लिए कर रहे थे लेकिन उनकी उन लोगो से कोई हमदर्दी नहीं थी जो इन आंदोलनों में न शामिल होने के लिए अलग अलग तर्क गढ़ रहे थे. वह कहती थी के बदलाव और न्याय के लिए संघर्ष करना जरुरी है और मात्र सोशल मीडिया में ही क्रांति करने से बदलाव नहीं आएगा जब तक हम अपने प्रश्नों के लिए जन संवाद नहीं करेंगे और संघर्षरत लोगो के साथ नहीं जुड़ेंगे.

    रजनी तिलक जोड़ने वाली महिला थी. वो ऐसी अम्बेडकरवादी संघर्षशील महिला थी जो किसी भी संन्घर्ष में तत्पर थी. वैचारिक रूप से सशक्त अम्बेडकरवादी होने के बावजूद संघर्षो में उन्होंने बहुत ही व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाया. इस समय भी उनका येही कहना था के हिंदुत्व की कट्टरपंथी ताकतों को हराने के लिए हमें सभी प्रगतिशील शक्तियों के साथ आना पड़ेगा. यही कारण था वह हर जगह मौजूद रहती ताकि कोई ये न कहे के अम्बेडकरवादी अन्य आन्दोलनों और मुद्दों पर दूसरो के साथ खड़े नहीं होते. उन्होंने वामपंथी साथियो के साथ भी अपने को जोड़े रखा लेकिन जाति के प्रश्नों को गौण करने के लिए उनकी आलोचना भी की. समाज के लिए काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ वह आसानी से जुड़ जाती थी. रजनी जी को मै पिछले वीस से अधिक वर्षो से जानता था और हमने कई प्रश्नों पर साथ साथ कार्य किया. दरअसल दलित महिलाओं के प्रश्नों पर वह ग्रामीण क्षेत्रो की महिलाओं को वैचारिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए साथ साथ कई बातो पर विचार कर रही थी. इतने वर्षो में उनको समझने के बाद ही मेरा उनके प्रति सम्मान बहुत गहरा था क्योंकि उन्होने सुलझे हुए साथियो को आगे बढाया और केवल जुमले बाजी की राजनीती नहीं की. वह एक नयी पौध को तैयार कर रही थी और शायद यही बात उन्होंने मुझमे देखी के उत्तर प्रदेश के अलग अलग इलाको में हमने कैसे अम्बेदार्वादी नौजवानों को राईट बेस्ड काम करने से जोड़ा.

    रजनी जी के लेखन में उनके संघर्षो का प्रभाव है. उनका लेखन केवल किताबी पाठशाला का ज्ञान नहीं था जो उनके जीवन संघर्षो और आन्दोलनों में भाग लेने के बाद पैनी हुई समझ से बनता है. हालाँकि एक कवियित्री और लेखिका के तौर पर वह अच्छे से स्थापित हो चुकी थी लेकिन उन्होंने कभी इस बात का पाखंड नहीं किया और हमेशा से संघरशील साथियो के साथ ही जुडी रही. क्योंकि वह सामाजिक आन्दोलनों से जुडी रही और नैक्डोर और कदम जैसी संगठनों के साथ लगकर काम कर रही थी तो बहुत से लोगो को नाराज भी की लेकिन उनकी निष्ठां काम में थी इसलिए उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कोई क्या कहता है. हालाँकि ये भी हकीकत है के वह अपने को अन्दोलानात्मक संगठनो से जोड़े रखना चाहती थी और पिछले दो वर्षो से उन्होंने राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन को मजबूत करने का प्रयास किया और इस सिलसिले में वह देश के विभिन्न भागो में दलित महिलाओं के प्रश्नों पर नए युवा साथियो को जोड़ रही थी और उन्हें अम्बेडकरवादी विचारधारा, सावित्रीबाई फुले और ज्योति बा फुले के संघर्षो से भी रूबरू करा रही थी.

    संघर्ष के पथ पर कार्यकरते कई युवा साथियो के व्यक्तिगत प्रश्नों को भी बहुत ध्यान और गंभीरता से उन्होंने देखा. मुझे ऐसे कई मौको पर उनके साथ जाने और सीखने का मौका मिला जब साथी अपने रिश्तो के कारण परेशान होते है, जब समाज में अपने ही लोग आपके साथ नहीं होते. वो बहुत मुश्किल क्षण होते है. हकीकत ये है के हम सभी जो समाज बदलाव की लड़ाई लड़ते है तो व्यक्तिगत जिन्दगी में अक्सर स्वयम से भी संघर्ष कर रहे होते है. ऐसे वक़्त में बहुत की कम लोग होते है जो साथ खड़े होते है. मनुवाद या ब्राह्मणवाद को फेसबुक या किताबो में लेख लिखकर ख़त्म करदेना तो बहुत आसान होता है लेकिन ये हमारे अन्दर से निकलना तब तक नहीं हो सकता जब तक स्त्री पुरुष संबंधो पर हमारा नजरिया खुला हुआ न हो और यदि हम  वैयक्तिक स्वतंत्रता का समर्थक न हो तो हमारा मनुवाद विरोधी भाषण मात्र जुमला रहेगा. बाबा साहेब आंबेडकर ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था कि हमारा समाज अभी समाज ही नहीं बना क्योंकि यहाँ वैयक्तिक रिश्तो का कोई सम्मान नहीं है. रजनी जी दूसरो की तो पूरी मदद की लेकिन स्वयं की जिंदगी में वह इन संघर्षो से झूझती रही. कई बार अपने विषय में सुनी सुनाई बातो का अपमान भी झेला लेकिन इसके बावजूद भी उनके चेहरे पे हमेशा मुस्कान होना और फिर भी समाज के लिए सोचना उनकी असीमित ताकत को दर्शाता है.

    वह ग्रामीण महिलाओं के संघर्षो की कहानी लिखना चाहिती थी. पिछले बीस वर्षो में मैंने जैसे जैसे अम्बेद्कर्वादियो के अनुभवों को विडियो रिकॉर्ड किया और लिपिबद्ध किया उससे वह बहुत प्रभावित थी और बार बार मुझे लोगो के पास जाने के लिए कहती. आर पी आई के सबसे पुराने साथी ब्रह्मदेव जी के साक्षात्कार के लिए वह मुझे शाहदरा में उनके निवास स्थान के ले के गयी. उनका कहना था के ये सभी आन्दोलनों के लोग है जिन्होंने अपनी जिंदगी बाबा साहेब के मिशन के लिए लगा दी इसलिए उनके जीवन के अंशो को जानना जरुरी है. उन्होंने स्वयं एक छोटी से पुस्तिका ब्रह्मदेव जी के ऊपर भी लिखी. फिर उन्होंने श्री महरोल जी से बातचीत की व्यवस्था की और वजीराबाद स्थित उनके निवास स्थान पर ही इसकी व्यवस्था की. दोनों की स्थानों पर मेरे पास कोई कैमरा हैंडल करने वाला नहीं था और उन्होंने ही इसे हैंडल किया ताकि मै आराम से इंटरव्यू कर सकू. नागपुर में कुमुद पावडे जी से उन्होंने मेरा संपर्क करवाया और नतीजा यह हुआ के अम्बेडकरी आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण महिला से हमने साक्षात्कार किया. हमारे लिए संतुष्टि के बात ये होती है के उनके जीवन के बेहद महत्वपूर्ण सवाल लोगो के सामने आते है. महिलाओ के अपने संघर्षो की कहानिया और फिर बाबा साहेब का उनके जीवन में प्रभाव भी समाज में चेतना जगाने के लिए जरुरी है इसलिए के ये पहले की पीढ़ी है जिसके पास अपने को व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया नहीं था, न ही खुद को प्रमोट करने वाली बाते. उन्होंने संघर्ष किया और समाज के साथ जुडी रही इसलिए हमारे लिए ये आवश्यक है ऐसे लोगो की कहानियो को कलमबद्ध किया जाए या उनको विडियो रिकॉर्ड किया जाए. रजनी जी इस सन्दर्भ में मुझसे बिलकुल सहमत थी और इसलिए उन्होंने इतने प्रयास किये. मेरे जीवन में ये दर्द हमेशा रहेगा के सबके इंटरव्यू करते वक़्त उनकी बाते रिकॉर्ड नहीं कर पाया. इसका कारण यही था के वह हमेशा टालती रही के पहले बुजुर्ग लोगो के इंटरव्यू कर लो, हमारा तो हो जाएगा. जिंदगी कितनी अनिश्चित है ये साफ जाहिर हो जाता है. दिसंबर के महीने में मैंने एक प्रश्नावली भेजी थी जो उनकी नयी पुस्तक सावित्री बाई फुले रचना समग्र के बारे मे और अम्बेदारकरवाड़ी आन्दोलन के समक्ष चुनातियो के लेकर था लेकिन उसके उत्तर नहीं आ पाए हालाँकि लगभग दो हफ्ते पूर्व जब मैंने उनसे बात की थी तो उनका कहना था के उन्होंने उस पर काम कर लिया है और और वह उसे भेज देंगी क्योंकि वह टाइप करने की स्थिति में नहीं थी. मार्च आखिर में उन्होंने अम्बेद्कर्वादियो के साथ मेरे साक्षात्कारो पर आधारित पुस्तक पर परिचर्चा करने की बात कही. अकसर वह मुझसे कहती के हिंदी में लिखो ज्यादा लोगो तक पहुंचोगे.. मैंने कहा मै समय समय पर हिंदी में लिख भी रहा हूँ और अब ज्यादा लिखूंगा.

    रजनी जी के साहित्य को मैंने पढ़ा. उनकी कविताओं के पहली पुस्तक पदचाप की कई प्रतियों के मैंने नौजवान साथियो में वितरित भी किया और उनकी कई कविताओं के हमने अपने आन्दोलन में महिलाओं को प्रेरित करने के लिए बैनर पर भी छपवाया. आज भी उन बैनरों को हम अपने विभिन्न कार्यक्रमों में इस्तेमाल करते है. उनकी आत्मकथा ‘अपनी जमी अपना आसमा’ की पहली प्रति उन्होंने मुझे दी. पिछले वर्ष तीन जनवरी को हम दोनों सावित्री बाई फुले के जन्मदिवस से सम्बंधित कार्यक्रम में भाग लेने हरियाणा राज्य के मेवात क्षेत्र में स्थित स्थान नुहू गए थे और वहा से लौटने पर जब  हम स्वराज प्रकाशन में गए तो पता चला के पुस्तक आ चुकी है. उनके चहरे की मुस्कराहट दिखा रही थी के उन्हें इसका इतना इंतज़ार था लेकिन उन्होंने कहा के ये तो भाग १ है और अभी अन्य भागो की तैय्यारी कर रही थी. इस भाग में उनके जीवन सघर्ष की वह कहानी थी जिसमे परिवार में साधारणतः होता है के महिलाओं को पारंपरिक कार्यो में ही उत्तम समझा जाता है. उनकी जीवटता को सलाम करना पड़ेगा के कैसे उन्होंने इतने संघर्ष किये और अपनी शर्तो पर जिन्दगी जी जो बेहद मुश्किल काम है क्योंकि अधिकांशतः छोटी सुविधाओं की खातिर, संघर्षो से डरकर हम समझौता कर लेते है.

    उनकी पुस्तक ‘बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ’ में उन्होंने हमारे समाज में व्याप्त दोगलेपन का पर्दाफाश किया है. मुझे उन छोटी छोटी कहानियो को पढने में इतना मज़ा आया के पुस्तक शीघ्र ख़त्म कर मैंने तुरंत उसका रिव्यु भी लिख दिया जिसका शीर्षक मैंने ‘कामरेड का करवाचौथ’ दिया क्योंकि कहानिया दिखा रही थी के कैसे बड़े बड़े कामरेड भी समय पड़ने पर अपनी पत्नियों से करवाचौथ की अपेक्षा रखते है. ब्राह्मणवाद की यही बड़ी ताकत है के उसके सामने बड़े बड़े विचारशील और क्रन्तिकारी लोग भी घुटने टेक देते है. शायद ब्राह्मणवाद में जो पित्र-सत्ता है उसको कोई सुविधाभोगी नहीं छोड़ना चाहता चाहे वह राजनैतिक तौर पर कोई भी विचारधारा की बात कहता हो.

    रजनी जी के जाने की ये उम्र नहीं थी क्योंकि बहुत से कार्यो के लिए वह स्वयं को तैयार कर रही थी. जिस फुर्ती से उन्होंने पिछले एक वर्षो में सामाजिक कार्यो के अलावा साहित्य सृजन किया वह बेहद महत्वपूर्ण है और मेरा सर इस बात के लिए उनके समक्ष झुकेगा. आज उनकी और शेकर पवार जी की मेहनत के कारण सावित्री बाई फुले रचना समग्र निकालने में कामयाब हुई जो इस दौर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है. मै तो सामाजिक संघर्षो के सभी अम्बेडकरवादी, बहुजन साथियो से अनुरोध करूँगा के वे इस पुस्तक को जरुर पढ़े और इमानदारी से अगर वे चले तो सामाजिक बदलाव अवश्यम्भावी है. बदलाव तो होना ही है लेकिन वो कैसा हो इसे समझने के लिए माँ सवित्ग्री बाई फुले के संघर्षो को और उनकी कविताओं, भाषणों और ज्योति बा को लिखी उनकी चिट्ठियों को पढ़ लेंगे तो पता चल जाएगा के हमारी सामाजिक सरकार कैसे होने चाहिए. ज्योति बा और सावित्री बाई इस सन्दर्भ में एक क्रांतिकारी युगल है जिनसे इस समाज के सोचने की दिशा बदल सकती है.

    एक सन्दर्भ में रजनी जी भी सावित्री बाई के सच्ची उत्तराधिकारी थी क्योंकि उनकी साहित्य सृजन में कोई दंभ नहीं था. भाषा बिलकुल आप बोलचाल वाली और संघर्षो से निकले अनुभव की थी. वह सावित्री बाई के साहित्य को मराठी से निकालकर हिंदी की विशाल जनता के समक्ष लाने वाली महिला थी और कम से कम उन गिने चुने लोगो में थी जिन्होंने ३ जनवरी को सावित्री बाई फुले के जन्मदिन को शिक्षक दिवस में मनाने वाली परंपरा का निर्वहन लगातार किया. ये कैसा अजीब संयोग के उनकी मेरी अंतिम मुलाकात आन्ध्र भवन में सावित्रीबाई फुले रचना समग्र के विमोचन के समय पर २७ जनवरी को हुइ हालाँकि फ़ोन पर उनसे लगातार बात होती रही. मुझे दुःख है के पूरे मार्च में दिल्ली से बहुत दूर था और २९ मार्च को शाम जब में सिलीगुड़ी दार्जीलिंग क्षेत्र में था तब अनीता भारती जी की फेसबुक पोस्ट से पता चला के उनकी तबियत बिगड़ गयी है. मुझे रात भर नींद नहीं आये क्योंकि एक भय सा मन में आ गया. लगभग तीन बजे रात मेरी नींद खुले तो अपने मोबाइल पर फेसबुक अपडेट जानने लगा तो शबनम हाश्मी जी की पोस्ट से इस दुखद खबर की जानकारी मिली. यकीं नहीं हुआ, बहुत कोशिश की भरोषा न करने का. ये ऐसी घटना थी जिसने एक प्रकार से तोड़ के रख दिया क्योंकि रजनी जी के साथ जिसने भी काम किया उसे उन पर भरोषा था, वो हमारी एक मज़बूत स्तम्भ थी जो हर जगह हर उस व्यक्ति का साथ देने के लिए तैयार खड़ी थी जो समाज के लिए लड़ रहा था या जिसके अधिकारों का हनन हुआ हो. दिल्ली की विषाक्त हवा में बहुत की कम ऐसे साथी है जिनसे मिलकर आपको ताकत मिलती हो और मेरा ये मानना है के रजनी जी वो शक्शियत थी जिसने आपको गलती पर डांटने में कोई परहेज नहीं किया लेकिन आपकी जरूरतों के समय पर वह मजबूती के साथ खड़ी रही .

    रजनी तिलक के असमय जाने से सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे अम्बेडकरवादी साथियो का तो बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है. मेरे लिए यह एक व्यक्तिगत क्षति है क्योंकि मैं तो उनसे लगातार बात करता रहता था और बहुत सी बातो में उनकी आवश्यकता महसूस होती थी तो वह हमेशा मदद के लिए तैयार रहती. उनके निधन पर जिस प्रकार से देश भर से अम्बेडकरवादी, मानवाधिकारवाड़ी, महिलावादियों और वामपंथी साथीयो के शोक सन्देश आये है उससे जाहिर होता है के उनका दायरा कितना विस्तृत था और किस प्रकार इन संपर्को को उन्होंने सींचा. मुझे उम्मीद है के रजनी तिलक जी के संघर्ष और उनके विचारों को सभी साथी लोग आगे बढ़ाएंगे. ख़ुशी की बात यह है के वह अपने जीवन से हम सबको प्रेरणा देकर गयी है, वह लड़ी तो एक योद्धा बनकर. उनका साहित्य और उनके समर्पित सामाजिक कार्य हमेशा हमें मजबूती प्रदान करते रहेंगे.

    Vidya Bhushan Rawat

  • क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

    क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

    Tribhuvan

    इस देश के लोगों की बातें सुनें तो लगता है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य इसी धरती पर वास करते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लोगों ने एससी एसटी एक्ट में संशोधन करने वाले सुप्रीमकोर्ट के एक अवांछित हस्तक्षेप के विरोध को लेकर जिस तरह आंदोलन किया, वह शांतिपूर्ण अांदोलनों की आवाज़ों को नोटिस न करने वाले नेताओं की खोपड़ियों को झकझोरने के लिए काफ़ी है।

    आज़ादी से पहले सरदार भगतसिंह ने बहरों की सरकार को सुनाने के लिए कम नुक़सान करने वाले बम फोड़े थे। आज़ादी आकर छीज भी गयी। और राजनेता वैसे के वैसे और वहीं के वहीं। ढीठ शब्द ही शर्मसार है। काठ के कानों, प्लास्टिक की आंखों और अमेज़ॉन से आयातित दिलों वाले इन राजनेताअों और आम लोगों की विवेक बुद्धि के लिए एक-दो छोटे उदाहरण काफ़ी होंगे। सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम महिलाओं ने बेहद शालीन और शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन सरकारों, मीडिया और प्रशासनिक मशीनरी ने ध्यान ही नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट तक तो आवाज़ भी नहीं पहुंची। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन उन्हें काग़ज़ी भुलावे देकर वापस भेज दिया गया।

    आतंकित कर देने वाले और पूरे देश में भय फैला देने वाले आंदोलन करना जैसे भारत मां के सच्चे सपूत होने का प्रमाण है। जैसे घर का सबसे लाड़ला सबसे ऊधम भरे आंदोलन करने का अधिकार रखता है। बर्तन तोड़ेगा, घड़े फोड़ेगा, कपड़े फाड़ेगा और सपूत का सपूत रहेगा। मां भी चुपचाप सुनेगी। बाप भी। बाकी बहन-भाई टुकुर-टुकुर देखेंगे कि उन्हें यह अधिकार कहां है! इसका आंदोलन-उसका आंदोलन। जिन्हें आपने कमज़ोर देखा या लगा कि इनका वोट तो मिल ही जाएगा या जिनका वोट मिलना ही नहीं है तो बंदूक भी चलाई और टैंक भी दौड़ाया। ठांय-ठांय। कितने सुसंस्कृत लोगों का यह अरुण मधुमय हमारा देश है। हम अपने इस देश में हर साल एससी कहे जाने वाले भारतीय नागरिकों पर 40,000 से ज्यादा अत्याचार करते हैं। और इनमें सज़ाएं होती ही नहीं हैं। सिर्फ़ पकड़-धकड़ करके छोड़ दिया जाता है।

    कितनी हैरानी की बात है कि इस देश के सुप्रीम कोर्ट में आजादी के बाद से आज तक अनुसूचित जनजाति का कोई जज ही नहीं बना है। शिड्यूल कास्ट न्यायाधीश भी अभी सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। आप कत्लेआम भी करेंगे और यह भी दावा करेंगे कि आपकी तो पुश्तों में भी किसी को तेग़बाज़ी का शौक नहीं है। आप सत्ता में बैठे रहते हैं, कभी बाबरी मस्जि़द ढह रही होती है और कभी सड़कों पर उतरा आंदोलनकारी आपकी कानून और व्यवस्था के रामलला को बंधक बनाकर छोड़ देता है। और इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की बेचारगी का आलम ये होता है कि वह हिंसक समूहों को सलाम करने के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। बस यह जुमला जुबान पर रहता है कि ये सब हमारे धर्म के रक्षक भाई हैं और ये तो ऐसा नहीं कर सकते।

    इस देश के राजनेताओं की इससे बदतर तसवीर और क्या होगी कि वे पड़ोसी देश के साथ बैठकर समस्या का राजनीतिक हल नहीं निकाल सकते और इस देश के आम जवान को मरने के लिए हवि बनने देते रहेंगे। सरहद पर कभी अपना बेटा नहीं भेजेंगे। क्योंकि हमारे यहां किसान जातियां हैं और उनके बेटे जय जवान जय किसान सुनकर आ ही जाएंगे। क्या पुलिस के जवान इसी तरह पिटने और मारखाने के लिए बने हैं? हिंसक आंदोलनों में हमारे अपने ही बेटे कब तक पुलिस की वर्दी पहनकर अपने ही भाइयों के हाथों नृशंसता से पीटे और मारे जाते रहेंगे? आप समस्याएं सुलझाएंगे नहीं, बल्कि चुनावी जीत के लिए इस तरह के हिंसक प्रदर्शनों और खून सने रास्तों से अपनी चुनावी जीत के रथों में जुटे हुए घाेड़ों के लिए ऊर्जा जुटाएंगे और इस देश का आम नागरिक तमाशबीन बनकर आपको सत्ता का भोग लगाता रहेगा। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी कम्युनिस्ट, कभी समाजवादी! कभी आम आदमी और कभी खास आदमी।

    यह कितनी अजब बात है कि सभी राजनेता उस कूचे में बे-सबब धूम-धाम कर रहे हैं, जहां अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, निर्धनों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की हालत रुला देने वाली कर दी जाती है। इस अरुण मधुमय देश में हर साल तीस हजार से ज्यादा हत्याएं की जाती हैं। 2014 में 33,981, 2015 में 32,127 और 2016 में 30,450 हत्याएं हुईं। किसी साल 77,237, किसी साल 82,999 और किसी किसी साल 88,008 अपहरण होते हैंं। हर साल 48 लाख से ज्यादा अपराध होते हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र देश में नागरिकों के लिए सबसे असुरक्षित इलाके हो गए हैं। हम महिलाओं को देवियां मानते हैं और बेटियों को अपना गर्व घोषित करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि हर साल महिलाओं के खिलाफ तीन लाख से ज्यादा अपराध घटित होते हैं। कभी 3,39,457 तो कभी 3,29,243 और कभी 3,38,954 अपराध। महिलाओं के प्रति क्रूरता के मामले में पश्चिम बंगाल, राजस्थान और उत्तरप्रदेश बहुत आगे हैं। ख़ासकर पति और उसके रिश्तेदारों की क्रूरता के मामले में। हर साल देश में 1,10,378, पश्चिम बंगाल में 19,302, राजस्थान में 13,811 और उत्तरप्रदेश में 11,156 महिलाएं पति और पति के रिश्तेदारों की हिंसा का शिकार होती हैं।

    जौन एलिया ने एक बहुत ख़ूबसूरत बात कही है : नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम। बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम! लेकिन मेरा कहना है कि जब हम सबको साथ ही रहना है तो झगड़ा क्यूं करें हम? हम अपनी बात ख़ामोशी से भी तो कह सकते हैं और राजनेता ख़ामोश बातों को भी तो गंभीरता से ले सकते हैं। क्यों इतनी हिंसा और क्यों इतना हंगामा? क्यों बार-बार वफ़ादारी के दावे और क्यों बार-बार अग्निपरीक्षाएं? अगर अग्नि परीक्षाएं सीता माता को न्याय नहीं दिला सकतीं और वह भी भगवान राम जैसे शासक के होते हुए तो आज के शासक तो उनके सामने धूल का कण भी नहीं हैं। ख़ामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम। ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम! वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम! हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम? किया था अहद जब लम्हों में हमने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम! नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी तो फिर दुनिया की परवाह क्यूँ करें हम। लेकिन ख़ामोश और शालीनता भरी आवाज़ों को आप नहीं सुनेंगे तो आपको वही मिलेगा, जो आज सड़कों पर मिला है, जो कल हरियाणा में जाटों और परसों राजस्थान में गुर्जरों से मिला था। लेकिन ये अब कटु सच स्थापित हो गया है कि इस देश की धरती पर सिख और मुसलमान कभी दलितों, जाटों, गुर्जरों और हिंदुत्ववादियों जैसे आंदोलन का अधिकार नहीं रखते! क्योंकि अब एक ही तरह के राजनीतिक आचरण की चदरिया को देशद्रोह और देशभक्ति की इड़ा और पिंगला में बीन दिया गया है। लेकिन आसनसोल हो या नक्सलवाड़ी, जेतारण हो या जम्मू कश्मीर-हिंसा को हिंसा ही समझा जाना चाहिए। हिंसा का रंग देखेंगे तो आपकी आंख प्लास्टिक की, कान काठ के, दिल खंगर ईंटों का और चेतना भुस से भर जाएगी!

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  • मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

    मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani, Rtd
    IIT Bombay

    हर्ष मंदर के लेख (द इंडियन एक्सप्रेस, मार्च 7, 2018) “सोनिया सेडली” और रामचंद्र गुहा के उसके प्रतिउत्तर में इसी समाचारपत्र में प्रकशित आलेख “लिबरल्स ओ” ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर नए सिरे से एक बहस शुरू कर दी है।  यद्यपि इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं तथापि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – एक, समुदाय के अन्दर और दूसरा, समुदाय के बाहर – और इन दोनों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। इन दोनों के जटिल संयुक्त प्रभाव से ही समय के साथ किसी भी समुदाय में परिवर्तन आते हैं। जहाँ मंदर का फोकस मुस्लिम समुदाय पर पड़ने वाले बाहरी नकारात्मक प्रभावों पर है वहीं रामचंद्र गुहा, समुदाय के भीतर के कारकों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। 

    पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम समुदाय में आंतरिक तौर पर जो कुछ हो रहा है, उसे समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह जान सकें कि हामिद दलवई और आरिफ मोहम्मद खान जैसे सुधारक क्यों कुछ विशेष नहीं कर सके। समुदाय में सुधार की प्रक्रिया, मुख्यतः उसमें व्याप्त असुरक्षा के भाव के कारण बाधित हो रही है। इस भाव के बढ़ने के दो कारण हैं – पहला, राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा, जिसके कारण इस समुदाय को जान-माल और रोज़गार का बहुत नुकसान हो रहा है। दूसरा, कई तरीकों से इस समुदाय को आर्थिक दृष्टि से हाशिए पर धकेला जा रहा है। इन दोनों कारणों से यह समुदाय दकियानूसी विचारों को गले लगा रहा है और रूढ़िवादी मौलानाओं का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

    वैश्विक स्तर पर तेल के संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति के चलते, इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का उदय हुआ और उससे उभरा वैश्विक स्तर पर इस्लाम के प्रति भय का भाव और मुसलमानों का दानवीकरण करने की प्रक्रिया। आज मुस्लिम पहचान को समाज के लिए एक खतरे की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दोनों के कारण हमारे देश में भी कट्टरपंथी नेतृत्व का मुस्लिम समाज पर नियंत्रण और प्रभाव बढ़ा है। बहुत पहले, सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद, मैंने अचानक पाया कि मेरे मार्गदर्शन में शोध कर रहे अध्येता, दिन में कई बार मस्जिद जाने लगे और मेरे एक साथी शिक्षक ने अपने उपनाम, जो पहले उनके धर्म को इंगित नहीं करता था की जगह ऐसे उपनाम का प्रयोग करना शुरू कर दिया जिससे यह साफ हो जाता था कि वे मुसलमान हैं। आईआईटी मुंबई के परिसर में निवास करते हुए मैंने देखा कि गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम के बाद केम्पस में मुस्लिम लड़कियां जो तब तक सलवार-कमीज या पेंट और शर्ट पहनती थीं, अचानक बुर्का ओढ़ने लगीं।

    मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर में हुए बम विस्फोटों के बाद, पुलिस ने तुरत-फुरत बड़ी संख्या में मुसलमान युवकों को हिरासत में ले लिया और अदालतों से बरी होने के पूर्व, उन्हें कई साल सीखचों के पीछे गुजारने पड़े। इससे भी सुधार की प्रक्रिया बाधित हुई। शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बहुत आतुर था परन्तु बाटला हाउस मुठभेड़ और आजमगढ़ और भटकल जैसे स्थानों के दानवीकरण ने शिक्षा को उनकी प्राथमिकता नहीं बनने दिया।

    इस परेशानहाल समुदाय में सुधार की प्रक्रिया कैसे सफल हो सकती है? जैसा कि हर्ष मंदर ने लिखा है, इस समुदाय का संपूर्ण राजनैतिक हाशियाकरण हो चुका है। सांप्रदायिक दंगों के चलते वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। सन 1992-93 की हिंसा के बाद मुंबई के नज़दीक मुम्बरा अस्तित्व में आया तो 2002 के बाद, जुहापुरा। किसी डरे-सहमे और अपने में सिमटे समुदाय में किस हद तक सुधर लाया जा सकता है? कई विवेकशील और प्रबुद्ध मुसलमानों ने अपने समुदाय में शिक्षा को प्रोत्साहन देने के सघन प्रयास किए। अपनी एक अमरीका यात्रा के दौरान मुझे कई ऐसे मुसलमानों से मिलने का मौका मिला जो वहां अलग-अलग पेशों में थे। वे सब इस बारे में एकमत थे कि भारतीय मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन दिए जाने के ज़रुरत है और वे इसके लिए भी तैयार थे कि वे भारत में इस समुदाय के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना में आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाएं और युवा मुसलमान लड़कों व लड़कियों के लिए वजीफों की व्यवस्था करें। इससे उन प्रयासों को मजबूती मिलेगी जो गुजरात में जेएस बंदूकवाला और देश भर में मुसलमानों की कई संस्थाएं कर रहीं हैं।

    आज देश में दक्षिणपंथ का जोर बढ़ रहा है और चुनाव जीतने के लिए नेताओं को अपने हिन्दू होने का दंभ भरना आवश्यक हो गया है। इसके साथ ही, “जो लोग भारत में रह रहे हैं, वे सब हिन्दू हैं” (मोहन भगवत) जैसे दावे, मुसलमानों को आतंकित कर रहे हैं। इसी के चलते असगर अली इंजीनियर जैसे लोग, जिन्होंने इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया और समुदाय में सुधार की नींव रखी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया। मुस्लिम समुदाय आज एक दुविधा में फंसा हुआ है। उसका केवल राजनैतिक हाशियाकरण ही नहीं हुआ है बल्कि उसे घृणा का पात्र बना दिया गया है। इसके लिए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण का उपयोग किया गया और यह दिखाने का प्रयास किया गया कि हिन्दू, मुस्लिम राजाओं के हाथ प्रताड़ित हुए थे।

    जहां तक हामिद दलवई या आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों का सवाल है, उनके प्रयासों की सराहना करने में हम गुहा के साथ हैं परंतु हम सबको यह भी समझना होगा कि मुस्लिम समुदाय को एक कोने में ढकेला जा रहा है। आज भी देश के विभाजन और कश्मीर की समस्या के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाता है। पिछले एक दषक में मेरे कई मुस्लिम मित्र, जिन्हे मैं कभी उनके धर्म की दृष्टि से देखता ही नहीं था, भी यह सवाल उठाने लगे हैं कि आज भारत में मुसलमान होने का क्या अर्थ है। मुसलमानों की उदारवादी परंपरा, जिसमें खान अब्दुल गफ्फार खान से लेकर जाकिर हुसैन, उस्ताद बिस्मिल्ला खान, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और जावेद अख्तर जैसे लोग शामिल हैं, आज भी जिंदा है परंतु समस्या यह है कि उनके समुदाय में उनकी सीमित स्वीकार्यता है।

    आज भी ’मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी’ और ’माडरेट मुस्लिमस’ जैसे संगठन, इस्लाम के मुल्ला संस्करण के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। जिस सवाल पर हमें विचार करना चाहिए वह यह है कि सज्जनता, विवेक और तर्क की इन आवाजों को मुस्लिम समुदाय में तव्वजो क्यों नहीं मिल रही है। क्या कारण है कि यह समुदाय अब भी रूढ़िवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह भी दिलचस्प है कि आज हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में आकर और वर्तमान सत्ताधारियों की सोच के चलते,बहुसंख्यक समुदाय भी आस्था और सच, मिथक और यथार्थ के बीच का भेद भुलाता जा रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हामिद दलवई जैसे लोग जो सुधार के प्रति प्रतिबद्ध थे और असगर अली इंजीनियर जैसे व्यक्तित्व जो इस्लाम का मानवतावादी चेहरा लोगों के सामने ला रहीं थीं, की आवाज सुनी और समझी जाएगी। यह भी आवश्यक है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के बढ़ते कदमों को रोका जाए क्योंकि वही समाज में इस समुदाय के प्रति घृणा उत्पन्न कर रहा है और इसे हाशिए पर ढकेल रहा है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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  • हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए

    हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए

    Atul Kumar Rai

    गाँव में सुबह उठते ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है और पता चलता है कि रात का बिछौना सुबह ओढ़ना हो जाए उसे चैत का महीना कहतें हैं। खटिया पर ऊंघते हुए देखता हूँ सात बज रहे हैं। सभी लोग अपने काम में लगे हैं। जैसे एक बहन खाना बना रही है। छोटी वाली पढ़ाई कर रही है। भाभी अंचार सूखा रहीं हैं। बड़का बाबू गाय को लेहना दे रहें हैं।

    मन में आता है कि बनारस के स्टैंडर्ड टाइम के अनुसार एक घण्टा और सो लेना चाहिए। लेकिन माताजी इन अरमानों का धूप जलाकर दुर्गासप्तशती का पाठ रोकते हुए धीरे से कहती हैं…

    “जइबs खेतवा में हो.बनिहार आ गइल बाड़े सs.”

    मैं सर हिलाकर सहमति प्रदान करता हूँ.

    उसके बाद दोनों ओर कुछ देर तक एक गहरी खामोशी रहती है…मन में आता है कि क्यों न आदत के अनुसार मोबाइल में नोटिफिकेशन चेक कर लिया जाए…बारी-बारी से सभी को देखने लगता हूँ.. फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर, इंस्टाग्राम.

    माँ हाथ में मोबाइल देख एक बार और रुक जाती है..इस बार स्वर और लय में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है…

    “उठबs की ना हो..”

    मैं फिर सहमति में सर हिलाता हूँ.तब तक माँ का भाषण तार सप्तक के पंचम में पढ़ा जाने लगता है..और देखते ही देखते उससे जो सुमधुर और अत्यंत ही अझेलनीय ध्वनि निकलती है उसका मतलब ये होता है कि…

    “खेती नामक कार्य मेरे जैसे शहराती लोगों के बस की बात नहीं है. क्योंकि हमारी आदत को मोबाइल ने माटी में मिला दिया है..और आजकल के लड़के पता न अपनी किस नवकी माई को सुबह से लेकर शाम तक निरेखते रहतें हैं. रात को दो बजे सोएंगे तो उठेंगे कब. मेरा बस चले तो मोबाइल को चूल्हे में झोंककर उस पर खिचड़ी बना दूँ”

    हाय! मेरा दिल बैठ जाता है..”बस करो माई..’

    तब तक इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञान छोटी बहन दे देती है कि “ए मम्मी जब इहाँ सात बजे उठ रहा तो बनारस कs बजे उठता होगा हो”?

    मुझे गुस्सा नहीं आता है, न मां पर, न बहन पर। सोचता हूँ कि इसके पहले मां दुर्गासप्तशती का पाठ छोड़कर शिवतांडव पढ़ना शुरू करे, उठ जाने में ही भलाई है।

    इधर कमरे से बाहर कदम रखते ही एक दूसरे दृश्य से सामना होता है. लोग खेतों की ओर चले जा रहें हैं. सबके जबान पर खेती की बातें हैं और हवा में चैत की महक। कुछ देर खड़े होकर सोचता हूँ कि पता न ये वाली हवा किस एयर प्यूरीफायर और किस एसी से निकल के आ रही होगी.. इतनी शीतलता और इतनी ताज़गी कि मन भीग उठता है। सुबह का सूरज चमक रहा है…किसी सितार के तार की तरह गेंहू हिल रहें हैं..चना अधपका है…जिसे मुंह में डालते ही एक अनजानी सी मिठास रोम-रोम में फैल जाती है.

    सरसों पक के झुनझुने की तरह बज रहे हैं. उधर मेढ़ लगा रहे.. खेत काट रहे, पानी चला रहे चाचा, बाबा, भइया लोगों को प्रणाम करते, हाल-चाल लेते हुए बगीचे के आखिरी आम के नीचे वाले बरम बाबा को गोड़ लागते, सूख चूके महुआ के अंतिम पेड़ पर अफ़सोस करते हुए जब अपने खेतों में पहुंचता हूँ तो देखता हूँ कि अभी तो कोई आया ही नहीं यार…

    “ई हमार माई भी न..?

    क्या कहें..बदन को सिहराती हवा में मन तो करता है कि अतुल बाबू कुछ देर यहीं बिछाकर सो लिया जाए. मां यहां देखने थोड़े आएगी..लेकिन मन विद्रोह कर जाता है..”कि तुम बनारस से सोने आए हो कि दँवरी करवाने आए हो”..?

    तब तक चाचा ये कहकर इस चिंतन पर विराम दे देते हैं कि “खाली बैठकर क्या करोगे…सरसो ही काट दो. घूरन बो आती ही होंगी”।

    ये सुनकर अपने निठल्लेपन पर आंशू आने लगता है. लेकिन एक उत्साह से हाथ में हंसुआ उठाता हूँ.. मानों आज कीम जोंग के सगे फूफा किसी नई मिसाइल का टेस्ट करने जा रहें हों..

    मन करता है हँसुआ का दाँत गीन लें. तब तक चाचा मेरे कपड़े को देखकर ताना मारतें हैं… जिसका मतलब ये होता है कि..”सूट पहन लिए होते या शेरवानी.लोअर और टी शर्ट में कुछ मजा नहीं आ रहा है..”

    मैं हंसना छोड़कर सरसों काटने लगता हूँ..इधर चाचा से बगल वाले खेतों में काम कर रहे कुछ लोग पूछते हैं..”ई नया किसान के ह हो” ?

    चाचा अत्यंत ही व्यंगात्मक आवाज में जबाब देते हैं..”अरे! जीतन भाई ई किसान जो है न कि हॉलैंड में रहता है, और वहाँ बावन बीघा पुदीना बोकर सीधे यहीं आ रहा है”

    मैं अपनी इस बेइज्जती पर झेंपता हूँ.. तब तक पता चलता है कि घूरन बो बड़की माई अपने लाव-लश्कर के साथ बोझा बांधने आ गई हैं. साथ में बीसराम बो चाची और नमूना बो भौजी, उनके बेटा-पतोह सबके हाथ में बोझा बांधने वाला बांस का कोइन है, दूसरे हाथ में हंसुआ, तेतरा और सनीसवा के हाथ में मोबाइल और मोबाइल में गाना..

    “तू तs बहरा में करेलs आराम
    चइत में हमरा घाम लागsता’

    इधर घूरन बो बड़की माई मुझे सरसो काटता देख चाचा पर खिसियाती हैं..”काहें हेह घामा में हमार लइका के जान लेत बाड़s हो”

    बड़की माई की इस बात को सुनकर मन श्रद्धा से भर जाता है..वो हमारी बनिहार हैं,और कहतें हैं माँ-पापा की शादी से दस दिन पहले उनकी शादी हुई थी..और तेइस-चौबीस साल पहले मेरे संयुक्त परिवार वाले घर के पवनीयों में एक वहीं थीं, जिससे मां बिना घूंघट काढ़े भी घण्टो बतिया सकती थी. घर वालों से छिपाकर उनको कुछ दे सकती थी.और हर महीने दिल्ली रहने वाले उनके पति घूरन को चिट्ठी लिख सकती थी. यही कारण है कि हम सब भाई-बहन उनको बड़की माई कहतें हैं.

    वो मुझसे जब मिलतीं हैं तो बताती हैं कि मैं पैदा हुआ तो मेरी आजी ने उनको पायल दिया था. अब मेरी माँ ने कहा है कि बेटे की शादी में कुछ बढ़िया देगी. यही कारण है कि मुझे देखते ही उनका पहला सवाल होता है कि “कहिया बियाह करबा बबुआ..” ?

    मैं बबुआ नामक प्राणी बियाह के नाम पर बड़े ही रस्मी तरीके से मुस्कराता हूँ. तब तक पता चला है धूप तेज हो चली है और उधर बोझा बांधना शुरू हो गया है. मैं खेत की मेढ़ पर बैठ जाता हूँ.इधर पापा मुम्बई से फोन कर रहे…”ठीक से बोझा गीन लिहs..”

    मैं गिनती भूल गया हूँ.. देख रहा बनिहारों के हाथों को, उनकी अदम्य जिजीविषा को, कर्मठता और धैर्य को, वो ऐसे डूबे हैं जैसे डूब जाता है अलाप में खोया कोई ख्याल गायक, किसी नृत्य के साधक की साधना जैसे अचंभित कर जाती है..वैसे ही अचंभित कर जाता है उनका आपसी सामंजस्य..

    इधर नमूना बो भौजी को तेतरा छेड़ता है. सुना है नमूना भइया खेदन के संगे लोधियाना रहतें हैं. फगुआ में नहीं आए की एक्के बार अपने सार के बियाह में आएंगे. सनीसवा मोबाइल की आवाज़ बढ़ा देता है.और गाना बज उठता है..

    “तू तs लोधियाना में करs तारs ड्यूटी
    पछुआ के हवा मोर बिगाड़ देता ब्यूटी”

    घरवा रहितs तs पका के देहतs आम
    चइत में हमरा घाम लागs ता”

    हाय! नमूना बो भौजी ये गाना सुनकर किसी नवकी बहुरिया जैसा शरमाती हैं और देखते ही देखते दो घण्टे में पौने डेढ़ बीघे की मंसूरी बांध दी जाती है. खेत में ही बोझा बांधकर रख दिया जाता है.

    बारह बजने को होते हैं. तापमान चालीस हो चला है. पता चला ट्रैक्टर तीन बजे आएगा. तब तक खेत की मेढ़ पर बैठकर आराम करना चाहिए. माँ ने खेत में ही खाना और पानी भेजवा दिया है।

    आज पहली बार खेत में पराठा-भूजिया-अंचार खाते हुए एक ऐसे स्वाद से सामना होता है, जो महंगे से महंगे रेस्टुरेंट में खाकर कभी न हुआ।

    शाम को थ्रेसर लेकर ट्रैक्टर आता है. और देखते ही देखते सभी मंसूरी के बोझा को भूसा और अनाज में तब्दील कर देता है. अनाज घर आता है. मंसूरी को हाथ में लेते ही मां की आंखें चमक उठती हैं. मानों माँ अनाज को नहीं, सोने से जड़ी कोई बहुत खूबसूरत चीज़ को छू रही हो…बहन मंसूरी को मुंह में डाल लेती है।

    मां खिसिया जाती है..जिसका मतलब ये होता है कि “पागल कहीं की पहले अनाज देवता-पीतर और डीह बाबा काली माई को जाएगा..आखिर उन्हीं के आशीर्वाद से तो आंधी-तूफान और बारिश से बचकर अनाज किसान के घर में आता है’

    इधर मेरी हालत पस्त हो जाती है. और उस समय पता चलता है कि खेत मे जाकर खेती करने और कमरे में बैठकर खेती के बारे में लिखने में बड़ा भारी अंतर है.

    और हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए..

    रात को कब नींद आ जाती है. समझ में नहीं आता है..आधी रात को नींद खुलती है. तो देखता हूँ किसी ने तेल रख दिया है कपार पर. पैर में.. माथे पर.. बदन टूट रहा है. उसी समय उन मजदूरों और खेतों में रोज मेहनत कर रहे लोगों को नमन करने का मन होता है।

    मोबाइल देख रहा तो डेढ़ बजे रहें हैं. आज नवमी का कलशा रखा गया है.. घर धूप-बाती अगरबत्ती से महक उठा है.. समूचा गाँव सो रहा है. और चारों ओर से पचरा की आवाज़ आ रही है. माँ किसी साध्वी जैसी कलश के सामने बैठकर गा रही है.

    “जवनी असिसिया मइया मलीया के दिहलु
    उहे असीसिया ना।
    हमारा अतुल बाबू के दिहतु कि उहे असिसिया ना”

    ये सुनते ही मेरा मन लोक की इस सुगन्ध में तैरने लगता है. और उस दिन पता चलता है कि अपने गाँव आना, अपने घर आना, अपनी टूट रही जड़ों को सींचना हैं।

    सुबह उठता हूँ.. भारी मन हल्का हो चला है..और लग रहा जैसे कि शहर माथे पर रखा एक तनाव है. और गाँव थाती में मिला एक सुकून. जिसे सम्भाला है खेतों ने, खलिहानों नें. गांव की टूटती पगडंडियों नें..मां के गीतों और बिना मतलब आपसे घँटों बतियाते लोगों नें..

    आखिर घर से बनारस चलते समय मन उदास हो जाता है. रह-रहकर कुछ ही दिन पहले गुज़र चूके प्रिय कवि केदार नाथ सिंह याद आतें हैं. याद आतीं हैं उनकी कई कविताएं..उनकी कई बातें..

    जब देखता हूँ कि गांव के सारे बगीचे वीरान हो चुके हैं..खेतों में पहुंच जाने वाला टैक्टर और थ्रेसर ने खलिहान नामक शब्द को लील लिया है..खलिहान में बचा गांव का आखिरी कुँआ झाड़-झंखाड़ से भर चुका है..और पानी के शीलबन्द बोतल घर-घर आने लगे हैं. लोगों में पहले वाला उत्साह नहीं है. कोई खेती करके खुश नहीं है..सब शहर भाग जाना चाहतें हैं.

    जैसे शहर केंद्रित विकास ने शहर को हमारी नियति में तब्दील कर दिया है…लेकिन इन विडम्बनाओं के बावजूद गाँव ने अपने किसी कोने में इतनी खूबियों को बचाकर रखा है कि बार-बार गाँव लौट जाने का मन होता है..डीह बाबा को गोड़ लागते समय एक बार फिर केदारनाथ सिंह याद आतें हैं.

    “अभी गाँव ही एक ऐसी जगह है,जहां कोई किसी के घर बिना काम के भी जा सकता है।

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    Atul Kumar Rai


  • कथा कामरेडों की….

    कथा कामरेडों की….

    Sunny Kumar Choudhary

    भारतीय फेसबुक समाज में एक विशिष्ट प्रकार का जीव पाया जाता है जो आपस में अपने को कॉमरेड बुलाते हैं. ये सभी एक दूसरे को प्रगतिशील मानते हैं और जो ठीक इनके टाइप के लाल नाक वाले नहीं हैं उनको ये तिरस्कृत करते हैं. गजब का गिरोह है. कहीं भी एक साथ टूटते हैं. इनके पास ढेर सारे सर्टिफिकेट होते हैं. मौका मिलते ही मुहर मारकर आपको पकड़ा देंगे. खैर,इनकी प्रगतिशीलता कुछ नमूने देखिये.

    एक कॉमरेड ने किसी की फेसबुक वॉल पर टिप्पणी की कि ‘संघी लड़के- लड़के में मजा लेकर खुश रहते हैं’. एक अश्लील आत्मविश्वास के साथ. मैंने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अभी आपको ‘गे-राइट’ पर लिखने दे दिया जाए तो पन्ना लाल कर देंगे लिख लिख के?गुस्सा गए कॉमरेड. बद्तमीज कहा और ताकीद कि तुम मुझे जानते नहीं इसलिए ऐसा कह रहे हो. मैं उनकी वॉल पर गया तो ‘तालाब सूखा’ और ‘झील में पानी कम हुआ’ टाइप के कुछ लेख ,जो अखबारों में छपे थे, दिखाई पड़े. मैं देखकर वापस आ गया कुछ कहा नहीं लेकिन उतना पर्यावरण पर ज्ञान मुखर्जीनगर में फोटो स्टेट वाला भी दे देता है. खैर, बुजुर्ग थे तो दुआ सलाम करके बात खत्म कर दी.

    फेसबुक पर कुछ कॉमरेड दिनभर फेमिनिज्म का झंडा बुलंद किये रहते हैं.ऐसा लगता है ये न हों तो महिलाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा. कुछ दिन पहले कन्हैया से जाने अनजाने एक डिबेट में गाली निकल गई.अब बेगूसराय के भूमिहार से ऐसा हो जाना कोई अचरज की बात नहीं पर आश्चर्य की बात यह कि किसी फेमिनिस्ट कॉमरेड ने इस पर आपत्ति नहीं जताई कि आखिर स्त्रीसूचक गाली का प्रयोग करते हुए कन्हैया प्रगतिशील कैसे बने रह सकते हैं? यह काम अगर किसी गैर कॉमरेड नेता ने की होती तब आप फेसबुक पर स्त्री विमर्श देख रहे होते.लेकिन गिरोह चुप रहा अपने बिरादरी की बात थी.

    गुजरात में इस बीच ‘एंटी मुस्लिम रायट’ को बदलकर ‘रायट’ के नाम से पढ़ाने का हुक्म आया. अब सेकुलर कामरेड परेशान कि ऐसा अनर्थ कैसे? भाई भोले, क्या सोचते हैं एंटी मुस्लिम का मुहावरा खेलते रहेंगे आप और एंटी हिंदू का जुमला आते ही सेकुलरवाद की केंचुल में घुस जाएंगे? आतंकवाद का धर्म नहीं होता कहेंगे और कोई ‘हिंदू आतंकवादी’ पकड़ में आ जाए तो उसका नाम घुमाएंगे. बिहार की हिंसा से दुखी हो जाएंगे और बंगाल पर मौन साध लेंगे. यकीन मानिये सेकुलरवाद की आपकी ये सुविधाजनक परिभाषा साम्प्रदायिकता को बढ़ाती ही है. हां, आप मुहर मारकर सर्टिफिकेट देते रहिये कि कौन सेकुलर और कौन कम्युनल.

    बाकी विद्वान तो कॉमरेड फेसबुक अकाउंट बनाते ही हो जाते हैं. क्या इतिहास क्या राजनीति विज्ञान सबपर एक समान पकड़. विज्ञान से लेकर रहस्यवाद तक पर विशेषज्ञता हासिल. और किसी पर भी टिप्पणी नहीं करते बल्कि उनका आग्रह होता है इसे शोध निष्कर्ष की तरह लिया जाए.सवर्ण कामरेडों को जाति विमर्श बहुत लुभाता है. जब मौका लगे बाभन ठाकुर का लाभ ले लीजिये बाकी समय डी-कास्ट होने का सुख भोगिये.

    आज इतना ही. शेष कथा इंटरवल के बाद सुनाई जाएगी. तब तक के लिए लाल सलाम.

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    Sunny Kumar Choudhary