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  • मीडिया में महिला — Vandana Dave

    मीडिया में महिला — Vandana Dave

    Vandana Dave

    वैसे तो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखना चाहिए कि मीडिया महिला और पुरूष में बँटा हुआ हो। मीडिया का काम लिंगभेद को समाप्त करना है न कि इसको बढ़ावा देना।

    महिलाओं को लेकर विश्वभर में अनेकों पत्र पत्रिकाएँ निकलती हैं। इनके कंटेंट को देखा जाए तो सालों से वही घिसापिटा चला आ रहा है। खूबसूरती, फैशन,पति, परिवार, घर, खाना आदि।

    अखबारों में भी इन्हीं विषयों के इर्द गिर्द नारी परिशिष्ट लगभग हर अखबार निकालता है। 

    अब प्रश्न उठता है कि यदि हम लिंगभेद समाप्त करना चाहते हैं तो क्या महिलाओं की अलग से पत्र पत्रिकाएँ निकालना आवश्यक है ? कोई भी अखबार या पत्रिका पाठको के लिए होना चाहिए। नर या नारी के लिए नहीं। यदि ऐसा होता है तो पुरूष व स्त्री को लेकर जुगुप्सा की भावना भी धीरे धीरे खत्म होती जाएगी। अकसर देखा गया है कि पुरूष स्त्रियों की पत्रिकाएँ बङे चाव से पढ़ते हैं। स्त्रियों से जुङे मुद्दे उनके लिए चटपटे होते हैं। 

    अखबार या पत्रिकाएँ आम पाठक के लिए होंगी तो दोनों के व्यवहार या उनकी समस्या को लेकर समान प्लेटफार्म पर बात होगी। इससे महिला पुरूष के बीच रहस्य की दूरी समाप्त होगी और समाज में सहज और स्वस्थ वातावरण निर्मित होगा।

    स्त्री सौंदर्य के बहुत बङे बाज़ार ने  मीडिया में स्त्री व पुरूष के भेदभाव को बढ़ाया है। वे कभी नहीं चाहते कि औरतें मेकअप की दुनिया से बाहर आकर अपने असली स्वरूप को जाने। इन कम्पनियों से मिलने वाले विज्ञापनों  के कारण मीडिया में स्त्री विशेष पर अलग से सामग्री छापी जाती रही है। मीडिया को स्वहित के बजाय समाज हित में इस सोच को बदलना होगा साथ ही पढ़ी लिखी महिलाओं को भी चाहिए कि वें स्त्रियों पर आधारित ऐसी पत्रिकाएँ लेने से बचें जो सिर्फ पति को खुश कैसे रखें या सास बहू का रिश्ता कैसे अच्छा हो या फिर लिपिस्टिक का कौन सा शेड आपकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देगा जैसी बातों से आपके  प्रति अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं। 

    लङकियाँ हर क्षेत्र में दखल दे रही हैं। बाहरी जगत से लगातार जुङती जा रही है ऐसे में इनके लिए जरूरी है कि ससुराल के परम्परागत तौर तरीकों में बदलाव हो। उसे पत्नी, बहू या अन्य रिश्तों में  बाँटकर उसके व्यवहार को परखा न जाए। रिश्ते थोपने का सिलसिला बंद होना चाहिए। यूँ भी पढ़ाई लिखाई हर रिश्ते को निभाने का सलीका देती है न कि ऐसी पत्रिकाओं में छपे आलेख। एक लङकी का जीवन विवाह के बाद प्रभावित न हो। उसे स्वाभाविक जीवन जीने की स्वतंत्रता मिल सके। इस दिशा में  मीडिया की भूमिका ऐसे माहौल को निर्मित करने में काफी कारगर सिद्ध हो सकती है। स्त्री पुरूष से जुङे असली मुद्दों पर समानरूप से चर्चा करनी आवश्यक है।

    आश्चर्यजनकरूप से अखबारों की पौरुष सोच गाहे बगाहे नज़र आती है। पत्रकारों द्वारा महिला हस्ती से किए जाने वाले प्रश्न इस माध्यम की संकीर्ण सोच को दर्शाती है

    यदि हम रोजमर्रा के संचार माध्यमों की नज़र से स्त्री को देखें तो वो कमज़ोर, बेबस, पीङित या उत्पीड़ित ही नज़र आती है

    बङा ताज्जुब होता है इस तरह की खबर पढ़ते हुए की मरने वालों में महिला, बच्चे और बुजुर्ग भी थे। इसका क्या मतलब है ये क्या कहना चाहते हैं। क्या औरतें भी बच्चों और वृद्धों के समान कमज़ोर होती है इसलिए उन्हें इनके साथ रखा जाता है। माना कि महिलाओं की शारीरिक बनावट पुरूष की तुलना में नाजुक प्रकृति की होती है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वें कमज़ोर होती हैं। समय आने पर वें अपनी शारीरिक ताकत का अहसास करा देती है। रानी  लक्ष्मीबाई, दुर्गावती जैसी अनेकों नारियाँ यौद्धा के रूप में इतिहास में दर्ज है।

    पिछले ओलम्पिक में हमारे देश की साक्षी, सिंधु, सानिया ने पुरूष प्रधान खेलों में जीत हासिल कर सबको चकित कर दिया था। स्त्री की सबसे बङी ताकत उसका मनोबल होता है। 

    ऐसे ही एक और खबर अकसर पढ़ने में आती है अकेली महिला पाकर वारदात को अँजाम दिया।

    इस तरह की खबरें पढ़कर हर महिला को अपने स्त्री होने का भय सताने लगता है उसका आत्मविश्वास कमज़ोर होता है। अकेले पुरूष के साथ भी घटना घटित हो सकती है किन्तु अखबारी नजरिया पूर्वाग्रह से ग्रसित होने से महिला के कमजोर होने को सार्वजनिक स्वीकारोक्ति प्रदान करता है। ऐसे में अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं और वे इस प्रकार के शिकार की फिराक में रहते हैं।

    मीडिया को ऐसी खबरें देने से रोकना होगा जो स्त्री को कमज़ोर करती है।

    अब कुछ मीडिया की संकीर्णता के नमूने 

    पिछले दिनों न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री माँ बनी। तब पत्रकारों ने उनसे प्रश्न किया कि आप नवजात बच्चे की माँ होने के साथ प्रधानमंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को कैसे निभाएंगी। इसके जवाब में वहाँ की प्रधानमंत्री ने औरतों में मल्टीटास्किंग जैसी खूबियों की बात कही। ऐसे ही कुछ समय पूर्व  भारत की महिला क्रिकेट की एक पूर्व कप्तान से पत्रकार ने जब यह पूछा कि आप किस पुरूष क्रिकेटर से प्रभावित है तो उसने जवाब दिया आपने कभी किसी पुरूष क्रिकेटर से इस तरह का प्रश्न किया कि वो किस महिला क्रिकेटर से प्रभावित है।

    एक ऐसा ही वाकया इन्दिरा गाँधी के साथ भी हुआ था जब उनसे पत्रकारों ने पूछा एक स्त्री होने के नाते आप प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी कैसे निभाएंगी। तब श्रीमती गाँधी ने कहा था हमारे देश में पीएम, सीएम और डीएम होना महत्वपूर्ण हैं। इस पद पर स्त्री है या पुरूष मायने नहीं रखता। कहने का तात्पर्य यह है कि आज का मीडिया भी औरतों  की शीर्ष स्तर पर सामाजिक भागीदारी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा। इनके लिए वे खबरें ही महत्वपूर्ण होती है जिसमें महिला उत्पीड़न हो। ऐसी खबरों की अखबारों में तादाद इतनी ज्यादा होती है कि लगता है समाज में महिला अत्यधिक असुरक्षित है।

    मीडिया को स्त्री के प्रति हिंसा, दुराचार, दुर्व्यवहार के प्रति संवेदनशील होना चाहिए न की इसे सनसनीखेज बनाकर लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

    संचार माध्यमों को सामाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए भूमिका तय करनी होगी व लिंगात्मक भेदभाव से मुक्त लेखनी द्वारा समाज को भी इस कोङ से मुक्त करना होगा।

    Vandana Dave

    पेटलावद (झाबुआ) मप्र में जन्म। ग्रामीण जीवन जिया इसलिए कुछ फकीराना अँदाज है जीने का व सोचने का। इन्दौर के कस्तूरबा ग्रामीण संस्थान से ग्रामीण विकास एवं विस्तार में एमए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक। वर्तमान में भोपाल में निवासरत।

    फेसबुक पर मुण्डेर पेज संचालित 
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  • इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

    इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

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    बहुत साल पहले की बात है। उन दिनों में स्कूली छात्र था और कम्युनिस्ट शब्द पहली बार कानों में पड़ा था। यह शब्द प्रयुक्त किया था एक सरदार साहेब ने, जिन्हें मैं नानाजी कहा करता था।

    वे दिखने में साधु जैसे थे, क्योंकि वे सिख वेशभूषा में रहने के बावजूद बालों को अक्सर खुला रखा करते और गले में होती सफेद मोतियों की एक सुंदर माला। घर में कारें-जीपें बहुत थीं, लेकिन मेरे बाबा से मिलने के लिए वे घोड़े पर आते थे। दोनों की दोस्ती की वजह घोड़े, उपनिषद चर्चा और सिख-इस्लाम या दार्शनिक विषय हुआ करते थे। वे उपनिषदों की बहुत सी कहानियां बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया करते थे।

    मैं अभी उनका नाम भूल गया हूं, लेकिन वे बानियावाला गांव से आया करते थे। उस गांव के सरदार मस्तानसिंह मुझे आज भी बहुत याद हैं। गांव का नाम बानियावाला था, लेकिन गांव पूरी तरह सिखों का था। उस गांव में मैंने कभी कोई बानिया नहीं देखा। बानिया यानी बनिया। यह गांव कई कारणों में मेरे दिलोदिमाग़ में है। वह सरदार साहब ही थी, जिन्होंने मुझे छठी कक्षा में “भोजप्रबंध” लाकर दिया था और कहा था कि मैं इसे कंठस्थ कर लूं। कपड़े की ज़िल्द और ख़ास गंध वाले पीले पन्ने वाली वह किताब आज भी हमारे घर की थाती है।

    “भोजप्रबंध” संस्कृत साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति है। यह लोककवि बल्लाल की अनुपम रचना है। इसमें राजा भाेज की राजसभा के बहुत से सुंदर और सम्मोहक कथानक हैं। यह कृति बताती है कि शासकों को क्यों साहित्य में पारंगत होना चाहिए। लेकिन एक विद्या व्यसनी किसान सिख को जब मैं इस तरह देखता था तो ऐसा लगता था कि किसी पुराने कालखंड से कोई ऋषि चला आया है।

    इस ग्रंथ का वह श्लोक मुझे आज भी कंठस्थ है, जिसमें राजा भोज ने टटं टटंटं टटटं टटंटम् बोला और कालिदास ने समस्यापूर्ति यों की : राजाभिषेके मदविह्वलाया, हस्ताच्युतो हेमघटो युवत्या:; सोपानमार्गेषु करोति शब्दं टटं टटंटं टटटं टटंटम्!

    ख़ैर, बातचीत चल रही थी, कम्युनिज्म की। मेरे बार-बार प्रश्नों पर वे समझाने लगे : जैसे ये आंगन है। ये वेहड़ा है। तुहाडा ते साडा खेत है। ए घोड़ेे ऐं। ए मज्झां ते गाइयां ऐं…ये सबके सांझे हैं। मेरे बात पल्ले नहीं पड़ी। मुझे ये लगता था कि पूरे गांव का सब कुछ साझा ही है, क्योंकि हमारे घर से दूध और मक्खन मेरे दोस्त आकर ले जाते हैं और मैं किसी भी घर से जाकर गन्ने, फल और सब्जियां ले आता हूं या दे आता हूं। हमारा खेत दूर था। इसलिए चार क्यारे लूसण और दो क्यारे बरसीम पड़ोस के किसी खेत में बो लेते थे। बाबा ने कई लोगों को साथ लेकर आंदाेलन चलाया और गांव में स्कूल खुल रहा था; लेकिन वह बना उस जगह जो पांच-छह गांवों के बीच समान दूरी पर थी।

    लेकिन मुझे उनकी एक बात बहुत आसानी से समझ आ गई : सभी रिश्ते बहुत साफ़ सुथरे और इनसाफ़ की बुनियाद और न्याय की अाधारशिला पर टिके होते थे। (हां-हां, दोनों का मतलब एक ही होता है!) लेकिन वे ऐसे ही बोला करते थे। वे आैम प्रकाश चौटाला की तरह, लेकिन चौटाला से भी बहुत पहले से “यक़ीन, भरोसा और विश्वास” बोला करते थे। हर किसी से योग्यता और क़ाबिलियत के अनुसार काम और हर किसी को उसकी ज़रूरत और अावश्यकता के अनुसार पैसा। अब तुम चाहो तो मेहनत-मज़ूरी कर लो और चाहो तो हवाई जहाज उड़ाओ या फिर किताबें लिखो। कालिदास बनकर समस्या पूर्ति करो। मेरे ये बात बिलकुल पल्ले नहीं पड़ी। उनके शब्द आज भी वैसे के वैसे याद हैं।

    आख़िर में उन्होंने समझाया : देखो, मान लो तुम चार भाई हो। सब काम करेंगे अपनी क़ाबिलियत और जुगत से, लेकिन जो खेत में होगा, वह सबको बराबर मिलेगा। इस तरह वे कई चीज़ें समझा रहे थे। यह सही है कि न तो वे कम्युनिस्ट थे और न ही मेरे बाबा। न ही मैं कभी कम्युनिस्ट बना और न ही सरदार साहब की संतानें। सबके भीतर पता नहीं कौन कौन आवाज़ें लगाता है। लेकिन कभी किसी सांप्रदायिक, मताग्रही, जातिवादी या राष्ट्रवादी को उन्होंने न पसंद किया और न कभी अपने आसपास फटकने दिया। कई संकीर्ण मुल्ला-मौलवियों, पंडितों-ज्योतिषियों, मिशनरियों, ग्रंथियों आदि से दो-दो हाथ करते ही देखा। हमारी रगों में भी वही लहू बहुत जीवंत होकर बह रहा है।

    लेकिन कुछ समय बाद जब उन सरदार साहब की मां का देहांत हुआ तो मैं भी बाबा के साथ घोड़े पर बैठकर गया। उस दिन वे बोले : बेटा, आज तेरे उस दिन वाले प्रश्न का उत्तर मेरे पास बहुत ज़ोरदार है। हर मां होती है सच्ची कम्युनिस्ट! तुम मां को समझ लो तो कम्युनिज्म समझ आ जाएगा। देख, मैं नकम्मा (निकम्मा) कोई काम नहीं करता। सारा दिन वेहला (बेकार) घूमता रहा। किताबें पढ़ता। साधु बना। मेरे भाई खेत में खटते। लेकिन मां ने सदा सबको एक जैसी रोटी दी, मक्खन में लिबड़-लिबड़ के। सरों का साग दिया घ्यो से तर करके। मैंनूं भी वही दूध का बड़ा छन्ना और खेत में खटने वालों को भी वही सब। एक जैसा पैसा, एक जैसा प्यार।

    वे बोले : हमारे घरों में जो जमाईं ऊंचे पदों पर थे उनको भी वही शगुन और सम्मान दिया। जैसा उनको वैसा ही सरीके-कबीले के कम पढ़े लिखे दामादों को। सबके साथ बराबर। एक भाई ने बड़ी पैळी (खेत) बना ली और एक के पास कम रही तो भी मां के लिए दोनों बराबर रहे। न प्यार में फर्क, न दूध के गलास में और दही के कटोरे में। मुझ नकम्मे को अगर मक्खन बिना रोटी चंगी नहीं लगती थी तो वह हमारे बड़े भाई के हिस्से का भी मक्खन हमें देती थी।

    वे कह रहे थे : और वेखो तुम, तुम्हारी मां भी ऐसी ही होगी और तुम्हारे प्यो की मां भी वैसी ही हाेगी। मां की मां भी और दुनिया की हर मां। हर मां की नीति fairest of all principles होती है : from each according to his ability, to each according to his needs! एबिलिटी के अनुसार काम और ज़रूरत के अनुसार अवदान!

    और कमाल वेखो : मां के इस फै़सले पर न कभी बाप की घुड़की चली और न कभी ताए की गालियां कुछ कर पाईं! बाप तो पूरी हिटलरशाही चलाता है। एक ही घर हिटलरशाही भी तब कुछ ठीक कर पाती है अगर मां का कम्युनिज्म साथ हो। मां भी अगर हिटलर हो जाए तो फिर आंगन का तो हिरोशिमा बनना तय ही है, वेहड़ा भी नागसाकी हो ही जाऊगा!

    वे बोले : देख, घर से मां चली गई, कम्युनिज्म चला गया! बस हिटलरशाही रह गई। वह रुआबदार आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंज रही है आैर सिख वेशभूषा के कारण उनका ऋषितुल्य चेहरा मेरी आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। मानो, वे कह रहे हों : कम्युनिज्म चला गया, मां चली गई! (कम्युनिज्म का अर्थ यहां सीपीआई-सीपीएम आदि के शासन से नहीं लगाया जाए। जैसे कि आरएसएस ब्रैंड विचारधारा या इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट या भोलेभाले लोगों को ठगने वाले ईसाइयों की गतिविधियों को हम धर्म नहीं कह सकते।)

    Tribhuvan


  • पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य – सिंह साहब दी ग्रेट

    पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य – सिंह साहब दी ग्रेट

    Bhanwar Meghwanshi

    पाखंड की पाठशाला के प्राचार्य सिंह साहब दी ग्रेट !

    लल्लू लाल पैदा तो गांव में ही हो गये थे ,पर मजाल कि गामड़पन उनको छू भी ले ।

    अपनी ग्रामीण पहचान से पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने उस जमाने में जैसे तैसे आठवीं पास की ,हुनरमंद इतने थे कि मास्टर के लिए पड़ौसी के खेत से ककड़ी ,भिंडी ,भुट्टे और बालियां चुराकर खुद के खेत की बता कर गुरुदक्षिणा दे आते थे।

    बालक लल्लू की इस दक्षता से प्रभावित मास्टरजी ने उसे 8 वी तक पास किया, बाद में महकमा ए पुलिस ऑफ राजस्थान में लल्लूजी को रंगरूट बनने का अवसर मिल गया।

    जब लल्लूजी बावर्दी हो गए, मूंछे बढ़ा ली ,तनख्वाह भी आने लगी ,शादी भी हो गई, हर चीज़ बदली तो लल्लू लाल जी ने ललन सिंह नाम रख लिया।

    ज़िंदगी बड़ी शान से कटने लगी,जल्दी ही पुलिसिया दांव पेंच और जरूरी कमीनगी उनमें आ गई, सब ठीक चल रहा था, पर घर जाने के मौके कम थे, पुलिस की सर्विस में नये नये भर्ती होने वाले रंगरूटों की शारिरिक भूख की चिंता किसे रहती है, ऊपर से इकहरे बदन के नवजवान ललन सिंह की ड्यूटी अक्सर अफसरों के घरों में लगाई जाने लगी।

    ललन सिंह जल भुनकर राख हो गये, ये भी कोई नौकरी है भला ,जिसमें अफसरों और ऊनकी बीबियों तक के चड्डी बनियान धोने सुखाने पड़ रहे हैं ।

    ललन सिंह ने विद्रोह कर दिया, पुलिस की हड़ताल में शामिल होने का विचार कर लिया,आला अधिकारियों तक बात पहुंची तो उनकी फील्ड पोस्टिंग हो गई, थाने में लगा दिया गया।

    ललन सिंह अफसरों के घरों की बेगारी से मुक्त होने की खुशी से सरोबार ही थे कि उनके जीवन में वो घटित हो गया जो घटना ही नही चाहिये, पर हो गया तो हो गया ,क्या कर सकते थे ।

    तो संतों ,कथा उस रात की है ,जब वर्दी लगाये, टोपी चढ़ाये, जूतों की फ़ीते कसकर बांधे, कांस्टेबल ललन सिंह हाथ में डंडा लिये रात्रि गश्त पर निकले, उनमें देशभक्ति और पत्नी से आसक्ति दोनों ही भाव हिलोरें मार रहे थे, पर वो संस्कारों के वशीभूत होकर आमजन की सुरक्षा में सन्नद्ध हुये एक गली में यहाँ वहाँ विचर रहे थे। तभी किसी सुघड़ गृहस्थ युगल ने रात्रि के प्रथम प्रहर का पहला राष्ट्रीय कार्यक्रम सम्पादित किया और स्वच्छ भारत की समझ से अनजान व्यक्ति की भांति सहायक सामग्री को खिड़की खोलकर गली में फेंक दिया, वो क्या जाने कि सड़क पर ललन सिंह की क्रांतिकारी रूह सदेह विचरण कर रही है।

    पुराना जमाना था, आज जितने फ़्लेवर की सहायक सामग्री कहाँ उपलब्ध होती थी, एक मात्र उपलब्ध साधन परिवार नियोजन वालों द्वारा प्रदत्त गुब्बारा ही था , जो बच्चों के हाथ लगता तो वे मुंह से फुला कर मनोरंजन कर लेते थे,बड़ो के हाथ लगता तो वे अपनी तरह से उसका उपयोग उपभोग करते थे ..

    …. तो महानुभावों, काम मे आया सफेद मटमैला लिजलिजा सा गुब्बारा सीधे ललन सिंह की टोपी पर गिरा और वहीं स्थिर हो गया, ललन शर्म और क्रोध के मारे थर थर कांपने लगे ,उन्होंने बगावत करने की ठान ली।

    वे इससे ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, सो अनुशासन फ़ासन को धत्ता बताते हुए सीधे हड़ताल में शरीक हो गये, सस्पेंड हुये और जल्दी ही टर्मिनेट भी हो गए, हालांकि जब समझ आई तो लिखित में माफी मांगी, टेसुए बहाये, नाक रगड़ी ,भीख मांगी ,दया की याचना की, पर कोई करतब काम न आया ,घर बैठना पड़ा।

    गांव लौटे तो खाने कमाने का संकट खड़ा हो गया,हराम की कमाई बन्द हो चुकी थी ,तब तक दो तीन शादियां कर चुके ,पहली छोड़कर भाग गई, दूसरी बीमारी से चल बसी ,उसकी मौत को 15 दिन भी नहीं बीते कि तीसरी औरत घर ला बिठाई ,दरअसल विषय भोग के मामले में ललन सिंह खुले सांड ही थे ,उन्हें बिना पत्नी जीवन सारहीन लगता था।

    वैसे भी पुलिस की नौकरी छोड़कर वे साईकल पर दूध बेचने वाले ‘कान्हा’ हो चुके थे ,ऐसे में शादी तो जरूरी थी,सो कर डाली ।

    दूध से भी भला कोई घर चलता है ? कितना ही पानी मिलाओ पानी का पैसा पानी में ही चला जाता है, इसलिये मजदूरी का काम भी करना शुरू कर दिया ,इसी दौरान किसी संस्था के सम्पर्क में आ गए ।

    अचानक ललन सिंह बड़ी बड़ी महान महान बातें करने लगे ,वो किसान नेता हो गये और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भाषण पेलने लगे, हारमोनियम तो बजा लेते ही थे ,भजन और गाने लगे ,इस तरह वे पुलिस, दूधिया ,कारीगर ,मजदूर ,किसान और आध्यात्मिक ,वैचारिक महापुरुष के रूप में स्थापित हो गये ।

    ओशो के एक्टिव मेडिटेशन से शुरू हो कर यू जी कृष्णमूर्ति तक होते हुये गोयनका जी की विपश्यना तक पहुंच गयेे। हालांकि इन सबके बावजूद भी ललन सिंह पक्के खल ,कुटिल और कामी तो बने रहे ।

    उन्होंने अपनी हर उद्दंडता को सिद्धांतों का सुंदर जामा पहनाना सीख लिया, अब वे लाल बाबा हो गये, प्रेम की विशुद्ध व्याख्या करने लगे ,उम्र 60 को पार कर रही थी, पर दैहिक ताप बढ़ता जा रहा था,प्रोटेस्ट ग्रंथि भी बढ़ रही थी, अनायास ही उनमें ‘काम गुरु’ बनने का भाव अत्यंत सघन हो गया, सामाजिक बदलाव के सपने को साकार करने आई मध्यवर्ती युवक युवतियों से वे काम गुरु के रूप में बर्ताव करने लगे,धीरे धीरे उनकी कामुक छवि काफी मजबूत हो गई तो संस्था ने उनसे पिंड छुड़ाने की तरकीब निकाली और ऐसे स्थान पर भेज दिया जहाँ पर वे अपनी ढलती उम्र के प्यार के साथ पूरी बेशर्मी से वक्त गुजारने लगे।

    लल्लू लाल जी उर्फ ललन सिंह उपाख्य लाल बाबा सदैव गांव, गरीबी , किसान ,मजदूरी ,धर्म अध्यात्म और निस्वार्थ भाव की करते पर साथ ही साथ कमीशन मिलने वाले बिजनेस भी कर लेते ,सरकार की हर योजना का फायदा गरीब से पहले उन्होंने उठाया ,खुलकर राजनीति की, समानता, संविधान और लोकतंत्र का हर बात में जिक्र करते,पर व्यवहार में पक्के जातिवादी तत्व थे, पूरी ज़िंदगी उन्होंने बहुत चालाकी से दोहरा जीवन जिया।

    इतना दोगलापन कि लोग उनके मुंह पर ही उन्हें पाखंड की पाठशाला का प्राचार्य कहने लगे पर उन्होंने इस बात का कभी बुरा नहीं माना, वे सतवादी हरिचन्द बन चुके थे ,झूठ को भी सच की भांति बोलने लगे थे और महिलाओं का यौन शोषण भी दैहिक स्वतंत्रता के नाम पर करते थे।बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम के वे जीवंत प्रतीक बन चुके थे।

    लाल सा इस सदी के सबसे महान सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक पाखंडी पुरुष साबित हुये, हालांकि इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया ,उनकी करतूतों पर कोई किताब नहीं लिखी गई।

    संतों ,वैसे तो इस काल्पनिक कथा का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से सीधे सीधे कोई संबंध नहीं है ,पर ऐसे लाल बुझक्कडों से सम्पूर्ण भारत भरा पड़ा है।

    Bhanwar Meghwanshi


    Bhanwar Meghwanshi

  • हीरे जैसा मोती लाल-लाल

    हीरे जैसा मोती लाल-लाल

    Bhanwar Meghwanshi

    हीरे जैसा मोती – लाल लाल !!

    सुना है कि भीलवाड़ा में कोई लाल मोती है ,आर टी आई का धंधा करता है ?

    उसका नाम ,पता और नम्बर किसी के पास हो तो मुहैया करवाएं ,किसी गैंडा स्वामी का पट्टशिष्य बताया जाता है ।

    वैसे तो बेचारा कट्टर अम्बेडकरवादी है ,पर अपनी निजी सगी पत्नी को भूत प्रेत से निजात दिलाने के लिए हर रोज पीर बाबजी की मजार पर धोक लगाता है ।

    क्रांतिकारी इतना कि एक बार टेशन पर भगवा जला दिया, पुलिस केस हो गया ,फिर थानेदार के पांव पकड़कर रोया ,तब जा कर छूटा।

    कभी कभी दलित आंदोलन चलाता है, जय मूलनिवासी भी करता है पर माइन्स में पार्टनर जैन को रखता है ।

    पक्का महिलावादी है ,पहली पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया, केस चला ,दोस्तो की मदद से किसी तरह मुक्त हुआ, दूसरी लड़की को फांसा,शादी का झांसा देकर कुछ समय उसका देह लाभ लिया ,अंत में उसे भी छोड़ा और किसी और का पार्टनर बना ,जिससे सात फेरों के चक्कर लगाये, उसका चक्कर यह है कि उसे भूत बाबजी आते हैं।

    मार्केट में मोती बड़ा क्रांतिकारी है, मिशन की बात करता है, बाबा साहब के कारवां को आगे ले जाने का संकल्प करता है, पर व्यस्त रहता है, क्योंकि ज्यादातर टाईम घर मे भूत बनी पत्नी की चरण सेवा में लगा रहता है।

    यूँ बड़ा अच्छा लड़का है ,बड़े सामाजिक ठेकेदार का घोषित वारिस है ,आज तक जहां जहां से भी सूचना मांगी ,कार्यवाही नहीं करवाई, तोड़ बट्टा कर लिया ,इसीसे रोजी रोटी चलती है मोती की ।

    यह होनहार क्रांतिकारी युवक 7 मई शाम से करेड़ा कस्बे से गायब है, निकटवर्ती गोरधनपुरा के लोग उसकी खोज में लगे हैं, कहीं नजर आये तो जानकारी दीजियेगा।

    भैया मोती ,इस तरह नाराज़ नहीं होते ,तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा ,तुम जिले में अपना ” आर टी आई से कमाई ” का धंधा आराम से चला सकते हो।

    लौट आओ !!

    डिस्क्लेमर – इस कथा का किसी भी जीवित ,मृत या मूर्छित ,अर्धमूर्छित मोती लाल नामक व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है, मोती भक्त नाराज होकर खुद को और अपने आका को एक्सपोज न करें ।

    Bhanwar Meghwanshi


  • घिसी हुई चप्पल

    घिसी हुई चप्पल

    Mukesh Kumar Sinha

    घिसी हुई चप्पल 
    पड़ी थी पायताने में 
    थी एक उलटी पड़ी 
    एक थी सीधी

    औंधा पडा था चेहरा मेरा 
    तकिये में दबी पड़ी थी आँखे 
    था आँखे मीचे 
    सोच रहा था देखूं कोई हसीं सपना 
    पर बंद आँखों के परिदृश्य में 
    नीचे पड़ी 
    घिसते चप्पल की बेरुखी 
    दिख ही जा रही थी 
    बता दे रही थी, अपने तलवे के प्रति बेरुखापन

    तभी खुल गयी आँख 
    खुद से खुद ने कहा 
    लगता है जाना है किसी यात्रा पर 
    तभी तो दिख रही है चप्पल 
    पर ये टूटी चप्पल ही क्यों 
    क्योंकि बता रही मुझे 
    मेरे स्थिति की परिस्थिति

    साम्राज्यवाद के प्रतीक पलंग पर लेटे हुए 
    मजदूरवाद को जीवंत करता हुआ 
    घिसा हुआ चप्पल 
    बार बार मस्तिष्क में डेरा जमा कर 
    खुलते बंद आँखों में पर्दा हटाते हुए 
    बता रहा था 
    कि चलो किसी यात्रा पर 
    झंडे का डंडा पकडे 
    ताकि सार्थक क़दमों के 
    एक दो तीन चार के कदमताल के साथ 
    हम भी समझ पायें
    चप्पल की अहमियत

    एक पल को मुस्काते हुए 
    हुई इच्छा कि खुद को कहूँ 
    मत चलो नंगे पाँव 
    चुभ जायेंगे कील या कोई नश्तर 
    पर 
    वीर तुम बढे चलो – के देशभक्ति शब्दों से 
    मर्द के दर्द को पी जाने व्यथा 
    आ गयी चेहरे पर

    नींद टूट चुकी थी
    पहन ली थी चप्पल
    जा रहा था ………!
    नए चप्पल को खरीदने
    ताकि
    चेहरे की इज्जत बरकरार रहे पांवों में !

    Mukesh Kumar Sinha


    Mukesh Kumar Sinha

  • ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है

    ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है

    Akhilesh Pradhan 

     रोज की तरह कल नंदा देवी मंदिर परिसर जाना हुआ। नंदा देवी मंदिर मुनस्यारी के डानाधार क्षेत्र में अवस्थित है। तो जब मैं मंदिर से नीचे उतर रहा था तो मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर एक पोस्टर लगा हुआ था, वह पोस्टर सप्ताह भर पहले हुए किसी इवेंट से संबंधित था। उस पोस्टर को वहाँ चिपका देखकर मेरे मन में दो ख्याल आए, पहला यह कि ये कार्यक्रम तो कब का समाप्त हो चुका है, तो इसे यहाँ से निकाला जा सकता है, दूसरा यह कि मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर ये कहीं से भी सही नहीं लग रहा है, यूं कहें कि अशोभनीय सा लगा।
     
    अब जैसे ही मैं उस पोस्टर को वहाँ से निकाल‌ रहा था, उतने ही समय वहाँ से दो महिलाएँ गुजर रही थी, उन्होंने मुझे आश्चर्य भाव से कहा – भैया आप पोस्टर को क्यों निकाल रहे हैं। वैसे पहाड़ के लोग आश्चर्य भाव से ही पूछते हैं, गुस्से या धमकाने का भाव आपको मिलेगा ही नहीं।
    मैंने उन्हें जवाब में कहा – दीदी ये प्रोग्राम तो हो चुका है।
    फिर उन्होंने कहा – फिर भी क्यों निकाला भैया।
    मैं उनके इस सवाल‌ से चुप सा हो गया, मैंने आंखे फेर ली और वहीं हमारे एक दोस्त की गाड़ी में बैठकर वहाँ से निकल गया।
     
    गाड़ी एक किलोमीटर से अधिक चल चुकी थी, मुझे अचानक महसूस हुआ कि ये मैंने क्या कर दिया। मुझे उनका बोलने का तरीका,उनके चेहरे के भाव याद आने लगे। फिर मैंने अपने दोस्त को बहाना मारकर गाड़ी रोकने को कहा और उसे आगे जाने को‌ कह दिया। अब वहाँ से मैं पैदल वापस उन दो महिलाओं के पास गया। मुझे पता नहीं क्यों ऐसा महसूस हो रहा था कि शायद मेरे द्वारा उन्हें चोट पहुंची है। मैं जब उनके पास पहुंचा तो मैंने उन्हें पहाड़ी परंपरा के अनुसार दोनों हाथों से नमस्ते करते हुए कहा – दीदी, मैं कोई बाहर से आने वाला टूरिस्ट जैसा नहीं हूं, पिछले चार साल से यहां आ रहा हूं, यहाँ बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता भी हूं, यहाँ के लोगों के जीवनस्तर को सुधारने के लिए प्रयास भी कर रहा हूं, मुझे टूरिस्ट मत समझना दीदी, मैं तो अब यहीं का‌ हो गया हूं। शायद मेरे पोस्टर निकालने से आपको अच्छा नहीं लगा होगा, मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं उसे वापस फिर से वहीं चिपका देता हूं, इसलिए मैं वापस लौटकर आया हूं।
     
    दीदी ने मुस्कुराते हुए जवाब में कहा – अरे! नहीं भैया, वो तो पुराना हो चुका है, उसको और क्या चिपकाना हुआ, रहने दो। फिर उन्होंने चिंता जाहिर करने के भाव से कहा – लोग तो इन पहाड़ों का पता नहीं क्या क्या कर जाते हैं भैया। बाहर से लोग आकर फूल, पौधे तहस नहस करते हैं, तोड़कर ले जाते हैं। पता नहीं क्या क्या उल्टा पुल्टा जो करते हैं लोग, कैसा जो मजा आता होगा उनको ऐसा करके। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक‌ विस्मयकारी मुस्कुराहट फेरी और उतने ही समय वहाँ सामान जोहने वाली मैक्स की एक गाड़ी आ रही थी, उन्होंने हाथ फेरते हुए उस गाड़ी को रोका और दौड़ते हंसते उसमें लिफ्ट लेकर वो चली गईं। उस मैक्स की गाड़ी के ठीक पीछे से जो एक टूरिस्ट गाड़ी आ रही थी, उसमें बैठे कुछ लोग इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे, मुझे पता नहीं क्यों उन टूरिस्ट लोगों के इस तरीके को देखकर हंसी आ गई।

    आपको लग रहा होगा कि एक पुराने पोस्टर फाड़ने को लेकर, यानि इतनी छोटी सी बात के लिए कौन इतनी मेहनत करे। ये भी कोई बात हुई क्या। लेकिन आप पहाड़ को समझने की कोशिश करेंगे तो लगेगा कि ये ध्यान देने योग्य बात है। मैंने पहाड़ी लोगों के मन को देखा है, वे अपने में मस्त रहते हैं, वे आपसे कभी नाराज नहीं होंगे, वे आपको बस प्रेमभाव से बोल देंगे, अब वो हम पर होता है कि हम सही गलत समझ पाते हैं या नहीं। काश, काश मुझमें ये क्षमता होती कि दीदी के उस अपनेपन और सरलता से परिपूर्ण भाषायी अंदाज, उस बोलने के तरीके को आपके सामने लिख कर बता पाता, काश मैं भाषायी विस्तार दे पाता उनके चेहरे की उस मासूमियत को। आप भी कहते कि दुनिया में आज भी ऐसी चीजें बची हुई हैं क्या? खैर..।

    उस दीदी ने जब मुझसे कहा कि पोस्टर का डेट जा चुका है, फिर भी आपने क्यों फाड़ा भैया? इसका सीधा सा अर्थ यह था कि मुझे कोई हक नहीं बनता है कि मैं उस पोस्टर को‌ वहाँ से हटाऊं। यानि उन्होंने तो मुझे अन्य लोगों की तरह एक बाहरी असभ्य टूरिस्ट ही समझा होगा। उनके ऐसा सवाल करने का सिर्फ और सिर्फ यही अर्थ हुआ कि उस पोस्टर को निकालना कम‌ से कम मेरे अधिकार क्षेत्र में तो नहीं था। यानि मैं कौन हुआ उनके सही गलत का निर्धारण करने वाला। असल में बात सिर्फ उस टुच्चे से पोस्टर को हटाने की नहीं है, पिछले कुछ सालों से जो बाहर से यहाँ टूरिस्ट आते थे, उन्होंने खूब उत्पात मचाया हुआ है, कोई खेतों में राजमा, जड़ी बूटी आदि की पौध को उखाड़ कर ले जाते, फल हुआ नहीं रहता था और तोड़ देते। बाहरी लोगों के स्वार्थ और लिप्सा की वजह से ऐसी चीजें लगातार होती आई है तो लोगों के मन में भी यही बैठ गया है कि अधिकतर बाहर मैदानों से आने वाले टूरिस्ट तो ऐसे ही होते हैं।

    मैं पूरे भरोसे से कहता हूं कि अगर इतिहास में ऐसी बदमाशियां नहीं हुई होती तो उस दीदी को मेरे पोस्टर फाड़ने पर सवाल नहीं करना पड़ता। उनका मुझे सवाल करना इस बात का संकेत था कि – –
    -आप कैसे से जो हो गये हैं,
    -पहाड़ को भी अपने शहरों की तरह समझने लगते हैं,
    -आपके बस का नहीं हुआ हम‌ पहाड़ी लोगों के मन को समझना।

    Akhilesh Pradhan


    Akhilesh Pradhan

  • सदफ़

    सदफ़

    Mohd Zahid

    सदफ़ उस सुबह बहुत बेचैन थी , कुछ देर बाद ही उसका तलाक होने वाला था , उसकी सारी खुशियाँ ज़िंदगी भर “बाँझ” के उलहने में दब कर मर जाने वाली थी।

    वह अपनी अम्मी के यहाँ कमरा बंद करके रात भर रोती रही , खुदकुशी का ख्याल आया पर इस्लाम में खुदकुशी “हराम” है , ज़िन्दगी के इस हालात में आकर सदफ़ के अंदर मौत का डर खत्म हो चुका था पर वह हराम मौत नहीं मरना चाहती थी।

    चार साल की शादी , लड़के की माँ ने एक नज़र कहीं देखा और रिश्ता भेज दिया , सदफ़ की उम्र भी नहीं थी परन्तु एक शानदार रिश्ते के लालच में सदफ़ के माँ बाप ने सदफ़ को शादी के लिए मना लिया।

    शादी के 2 साल बाद तक , सदफ़ की ज़िन्दगी में बहार ही बहार , गुलशन ही गुलशन पर सदफ़ की सास को सदफ़ अब खटकने लगी।

    दो साल में कोई बच्चा नहीं हुआ और सदफ़ की सास के मुताबिक यह सदफ़ की कमी थी।

    सदफ़ का शौहर “रेहान” , यूं तो सदफ़ को बहुत मानता परन्तु अपनी माँ के सामने उसकी आवाज़ नहीं निकलती। एक शानदार नौकरी छोड़ कर अरबों की खानदानी संपत्ती देखने “रेहान” घर आ गया और सदफ़ की मुसीबतें शुरू हो गयीं।

    रोज़ बच्चे का ताना , दिन गुज़रता गया , हफ्ते और महीने गुज़रते गये , और सास की सदफ़ पर नफरतें बढ़ती गयीं , वजह वही कि चार साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ।

    सास के मानसिक उत्पीड़न से थकहार कर सदफ़ अपने माँ बाप के घर आ गयी और दो दिन बाद ही सास ने बेटे को सदफ़ को तलाक देकर दूसरी शादी का हुक्म सुना दिया।

    “सदफ़ बाँझ है , तलाक देकर विदा करो , दूसरी शादी ही अब एक वाहिद उपाय है।

    उस शाम “तलाक” की खबर से सदफ़ के घर कोहराम मच गया , बाप भाई भागे हुए सदफ़ के ससुराल गये परन्तु नतीज़ा वही ज़ीरो।

    और अब वह सुबह सदफ़ के सामने थी।

    तलाक हो गया , रेहान की चंद दिनों में धूमधाम से दूसरी शादी हो गयी और सदफ़ बाँझ बन कर समाज की नज़रों में घृणा की पात्र हो गयी।

    कुछ वक्त गुज़रा , सदफ़ की खाला अपनी बहन की इस तकलीफ़ को देख ना सकीं , जो सदफ़ उनके हाथों पली बढ़ी वह सदफ़ आज टूट रही है बिखर रही है।

    सदफ़ की ख़ाला ने अपने बेटे “अनवर” से अपनी ज़िन्दगी की एक वाहिद खुशी माँगी , अनवर ने सदफ़ से निकाह कर लिया।

    वक्त फिर गुज़रता गया , सदफ़ को इस शादी से जुड़वा बच्चे हुए और दोनों बेटे। सदफ़ की ज़िन्दगी फिर खुशियों से भर गयी , शान शौकत वैसी नहीं पर खुशियाँ उससे कहीं अधिक।

    2 साल बाद एक शादी में अचानक सदफ़ “रेहान” के सामने आ गयी , हड़बड़ाहट में उसकी नज़र रेहान की माँ पर पड़ी , दोनों अभी तक अकेले थे।

    रेहान दूसरी शादी के तीन साल बाद भी बाप बनने के लिए तरस रहा है , सदफ़ उनसे किनारा करते हुए हाल में अपने बच्चों के साथ बैठी , वहाँ भी रेहान की माँ पहुंच गयी , वह बात करना चाहती थीं।

    पर सदफ़ हमेशा खामोश थी , अब भी खामोश थी। पर दूसरी शादी के बावजूद रेहान के औलाद ना होने से वह मायूस थी।

    मेरी बचपन की दोस्त वर्षों बाद आज मिली तो उसकी यह कहानी उसकी ही ज़ुबानी आज सुनी , उसके दिल में है कि वह अपनी एक औलाद “रेहान” को सौंप दे।

    सोचा उसकी कहानी नाम बदलकर आप सब दोस्तों से शेयर कर लूं और सदफ़ के फैसले पर आपकी राय भी जान लूं फिर आपको सदफ़ का लिया फैसला बताउंगा।


    Mohd Zahid


    Mohd Zahid

  • ईमानदारी से जीना मुश्किल

    ईमानदारी से जीना मुश्किल

    Vijendra Diwach

    गरीब आदमी की गरीबी भी उसका मजाक उङाती,
    उसकी रूखी सूखी रोटी भी कहती है मुझे खा के दिखा,
    मन कहता है रोटी तु रूखी सूखी है तेरे को कैसे खाऊंगा,
    आमाश्य कहता है आने दे मै भूखे पेट में तो पत्थर भी पचा लूंगा।
    गरीब रूखा सुखा खाकर इसे ही संतुलित आहार मान लेते हैं,
    बस अपने परिश्रम के बल पर जो मिल जाये उसे ही छप्पन भोग जान लेते हैं।

    गरीब आदमी मेहनत करके भी फाकाकशी का जीवन जीता है,
    ईमानदार हो के भी इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में अजनबी बन के रहता है।

    गरीब के नाते रिश्तेदार उससे दूर ही रहते हैं,
    कभी बातचीत हो जाये या फिर कहीं मुलाकात,
    बिना हाल चाल जाने ही अपनी पचासों समस्यायें सुनायेगें की ये कहीं हम से कुछ मदद ना मांग ले
    और इस तरह उस गरीब से भी गरीब होने का नाटक कर पीछा छुटाते हैं।

    सरकारें ये कैसा डवलपमेन्ट कर रही हैं,
    मेट्रो ट्रेने तो चल रही हैं
    लेकिन इन्हीं मेट्रो के पूलियों के नीचे इंसानी जिन्दगियां नरकीय जीवन जी रही है,


    इंसान अपनों को ही भूलाकर कहां जा रहा है?
    इक दिन सब को मरना है
    फिर क्यों इस दुनिया में ये तेरा ये मेरा फैलाया जा रहा है।

    इस चालू चपंडर दुनिया में झूठे,धोखेबाजों और बेइमानों का का बोलबाला बढता जा रहा है, 
    इस दुनिया में शरीफ होकर जीना धीरें धीरें मुश्किल होता जा रहा है।

    Vijendra Diwach


    Vijendra Diwach

  • गाँव बंद

    गाँव बंद

    Nishant Rana

    भारत में अधिकांश बंद राजनैतिक पार्टियों द्वारा दूसरी पार्टियों के विरोध में लगाए जाते रहे है या फिर व्यपारियों द्वारा अपने हित को साधने के लिए। व्यपारी वर्ग भले ही जीवन भर एक ही राजनैतिक पार्टी को वोट देता रहे लेकिन सरकारी नीतियों में अपने हितों में जरा भी चूक देखता है तो हड़ताल या बंद के द्वारा अपनी बात रखता है।

    उस भारत बंद का मतलब होता है केवल शहर बंद गांवों में इस तरह की बंद की खबरे भी पहुँच जाए तो वह बहुत है। गांवों में राजनैतिक पार्टियों या व्यपारियों के आह्वान पर बंद नहीं होते आए है।

    यहां व्यापारी वर्ग से मतलब उत्पादन करने वाले वर्ग से नहीं है। किसान-मजदूर वर्ग उत्पादन से सीधा जुड़ा है लेकिन इन्हें व्यापारी ही नहीं माना जाता रहा क्योंकि हमारे यहां किसान प्राकृतिक संसाधन, घर , सोंझ , पशु धन, खाने पीने के मामले में बहुत समर्द्ध हो सकता है लेकिन रुपए वाले बाजार में उसे लगातार कमजोर और लूटा ही गया है। और हमारे समाज के अनुसार व्यापारी वह होता है जो लोगों को मूर्ख बना सके, शोषण कर सके तिगड़म बाजी कर के रुपए बना सके।

    इस तरह के शोषण एवं लूट के लिए हमारे समाज बाकायदा प्रशासन वर्ग और पूंजीपति वर्ग का मिला जुला सिस्टम दिखाई पड़ता है। खास जाति वर्गों के लिए इस सिस्टम में एंट्री जल्दी है बाकी जातियों के लिए वह थोड़ी दुश्वर है। (फिलहाल लेख का विषय यह नहीं है।) सिस्टम के अंदर कोई भी हो अंततः वह उस तंत्र के हिसाब से ही कार्य करता है, जिसके लिए तंत्र बनाया गया है। इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि फांसी लगाने वाला जल्लाद कितना भी अच्छे मन का व्यक्ति लेकिन उसे उस सिस्टम का हिस्सा रहना है तो उसे अपनी संवेदंशीलता लगातार खत्म करते हुए तंत्र के कहने पर बिना सोचे समझे तख्ते पर आए व्यक्ति को फांसी देनी ही देनी है।

    किसान और मजदूर यह सब नहीं करता वह बाजार को उत्पाद बेचते हुए भी हाथ जोड़ता है और खरीदते हुए भी शोषण ही करवाता है। चूंकि वह लगातार उत्पादन करता है। बाजार जाता है इसलिए उसके शोषण की गति कम दिखाई देती है जबकि व्यापारी वर्ग तेजी से फलता फूलता जाता है।

    दूसरी हड़ताल अधिकतर सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने वेतन-भत्ते, सुविधाओं आदि को बढाने के लिए की जाती है।

    सरकारी नौकरी हमारे यहां कैरियर का ही पर्याय हो चुकी है क्योंकि किसान-मजदूर लोगों की सेवा नीति निर्धारण के लिए, कामों के प्रबंधन के लिए रखा जाता है उनके पास अनन्तः कुछ नहीं बचता लेकिन जिन्हें उन्हीं के उत्पादों से निकली तनख्वाह पर रखा जाता है वह उसी किसान मजदूर वर्ग को गांव के आदमी को कीड़ा मकोड़ा समझते है। एक अदना सा कर्मचारी भी किसान को गरियाने एवं शोषण करने के अधिकार रखता है। तनख्वाह के मामले में भी वह कंपनी के मुख्य मालिक (किसान-मजदूर) वर्ग से तुलनात्मक रूप से कई गुना का अंतर है। सुविधाओं में कई गुना का अंतर है। जबकि जिनके लिए इन्हें मुख्यत: काम पर रखा जाता है वह सब लगातार उत्पादन एवं लाभ के मामले में माइनस की स्थिति है।

    चलते-चलते :

    इस तरह के कुतर्क लगातार दिए जाते है कि देश की अर्थव्यस्था पूंजीपतियों , व्यापारी वर्ग के टैक्स आदि से चलती है। तुर्रा यह है कि देश को यहीं चला रहे है।
    गांव बंद का समर्थन सबसे अधिक इन्ही कुतर्कों की वजह से है यदि देश की अर्थव्यस्था की इनके टैक्स से चल रही है तब इनका पूरा का पूरा व्यपार ही गांवों की लूट पर खड़ा है उसका क्या ! किसान मजदूर वर्ग भी अपनी सभी खरीद पर डायरेक्ट नहीं तो इनडायरेक्ट टैक्स चुकाता ही है। व्यपारी वर्ग अपने चुकाने वाले टैक्स को भी इन्हीं लोगों से अपने लाभ रूप में वसूलता है जबकि किसान को ऐसी कोई सुविधा नहीं है।
    लूटतंत्र में शामिल लोग मोटी चमड़ी के लोग है अपने पूर्वाग्रहों में मस्त रहते है। उनके लिए लोगों की जागरूकता का मतलब है कि जिन राजनैतिक पार्टियों को लाभ के लिए वह वोट देते है लोग भी जाग्रत हो कर उनकी इसी बात का अनुकरण करे एवं उन्ही नीतियों का समर्थन करे जिनसे केवल उन्हें लाभ पहुँचता हो। कभी वह इस पक्ष के बारे मे सोच ही नहीं सकते कि जो निर्माता है वह सबसे अधिक लाभ की स्थिति में होना चाहिए।
    गांव बंद इसलिए ही होने चाहिए ताकि यह स्थिति साफ हो कि आप गांवों की वजह से है न कि गांव आपके वजह से।
    शहरी चकाचौंध में मुंदी हुई आंखों को खोलने का और कोई रास्ता भी नहीं है। भूखें मरने की चिंता न कीजियेगा किसान आपको अपनी न्यूनतम संवेदनशीलता में भी भूखा नहीं मरने देगा।

    Nishant Rana

    Nishant Rana


  • समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुज़ूर की बेबाक बातचीत

    समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुज़ूर की बेबाक बातचीत

    शीर्षक

    अपने संगठनात्मक कौशल से समाजवादी पार्टी की नीव को अटूट मजबूती देने वाले शिवपाल सिंह यादव (उम्र, 63) को 1996 में पहली बार जसवंत नगर की जानते ने अपना प्रतिनीधि चुनकर विधानसभा में भेजा। इसी जसवंत नगर विधानसभा से नेताजी ने अपने राजनैतिक सफ़र की शुरुवात की थी, फिर केंद्र की राजनीति में दस्तक देने के बाद प्रदेश की राजनीति को बतौर उत्तराधिकारी जसवंत नगर की सीट से शिवपाल के राजनैतिक सफ़र की शुरुआत करायी। जिस तरह से भारतीय राजनीति मुलायम सिंह यादव को नेताजी और अखिलेश यादव को भईयाजी के नाम से जानती है उसी तरह शिवपाल सिंह यादव को चाचाजी के नाम से जाना जाता है। देश के समाजवादियों के कतार में खांटी समाजवादी की पहचान को बनाये हुए जनहित के मुद्दों को लेकर कभी कलेक्ट्रेट तो कभी ब्लॉक पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रहते थे।

    Shivpal Singh Yadav and Frank Huzur

    फ़्रैंक हुज़ूर: मेरा पहला सवाल है कि सैफई, जिस गाँव में आपका जन्म हुआ है, आज भारत में जब भी समाजवाद की बात होती है तो उसे सैफई से भी जोड़ कर देखा जाता है।आपने नेता जी में पहली बार राजनीति को कब महसूस किया? और पहली बार आप में राजनीति करने की इच्छा कब जगी?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! पहले तो आपने सैफई का ज़िक्र किया तो सैफई एक छोटा सा गाँव है जो अब बड़ा हो गया है वहाँ बहुत सी सुविधायें हो गई हैं जैसे रोड़ की सुविधा हो गई, तहसील की सुविधा को गई अस्पताल की सुविधा हो गई है। लेकिन पहले तो एक छोटा सा गाँव ही था।

    हम लोग वही पैदा हुए, वही पढ़ाई किये। प्राइमरी स्कूल में पढ़े हैं, उस समय प्राइमरी स्कूल में सिर्फ़ एक कमरा हुआ करता था, उसी एक कमरे में एक से लेकर पाँचवी क्लास तक की पढ़ाई होती थी।

    वही से शुरूआती पढ़ाई लिखाई शुरू हुई थी फिर कक्षा पाँच पास करने के बाद छठी कक्षा में हमारा एडमिशन जैन इंटर कॉलेज करहैल में हुआ, जहाँ नेता जी लेक्चरर थे, तो छठी से लेकर बारहवाँ तक वही पढ़े, गाँव से स्कूल तक पैदल जाते थे तब तो साइकल भी नही थी।

    हमारे गाँव के सभी बच्चे स्कूल तक पैदल ही जाते थे। नेता जी पढ़ाने के लिये साइकल से जाते थे। तब तो वैसा कोई रास्ता भी नही था स्कूल तक जाने के लिये, बारिश के समय पर तो हम लोग खेतों की मेड़ों से होकर जाते थे। वहाँ एक बम्मबा नहर था जिसमें पानी भरा रहता था तो स्कूल तक जाने में दिक़्क़तें होती थी।

    नेताजी 1967 में जब पहला चुनाव लड़े थे तब हम बारह-तेरह साल के बच्चे थे तो ज़्यादा कुछ पता नही था। नेता जी पहला चुनाव जीत कर सदन में पँहुचे।

    हम लोग बचपन में नेताजी के चुनाव प्रचार के लिए गाँव गाँव जाकर पोस्टर लगाते थे, उनके लिए नारे लगते थे….

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब पहला चुनाव नेताजी लड़े तो उनके चुनाव प्रचार में आपकी क्या भागीदारी थी?

    शिवपाल सिंह यादव: हम लोग उस समय बच्चे ही थे तो क्या चुनाव प्रचार करते, जहाँ तक मुझे याद है कि सत्तर के बाद जब हम हाईस्कूल में पहुँच गये थे तो उसके बाद जो भी चुनाव आता था हम लोग नारे लगाते थे। जब भी किसी समाजवादी की गाड़ी आती थी तो हम नारे लगाते थे और किसी दूसरे पार्टी की गाड़ी आती थी तो उसका विरोध करते थे। गाँव गाँव पोस्टर लगाते थे। ये सारे काम आज भी चलते हैं, हम जब भी गाँव जाते हैं छोटे छोटे बच्चे नारे लगाने लगते हैं।

    फ़्रैंक हुज़ूर: 1971 के उस दौर में पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध भी हुआ था, उस समय नौजवानों में, गाँव के लोगो में किस तरह का माहौल हुआ करता था? उस दौर की कोई बात जो आपके ज़ेहन में हो?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1971 में तो हमारे गाँव से कई लोग सेना में भर्ती हो गये थे। जब युद्ध हुआ तो हमारे सबसे बडे़ भाई रतन सिंह भी जाकर सेना में भर्ती हो गये थे। हमारे पड़ोस के रामशरण यादव भी सेना में भर्ती हो गये थे और नेता जी के जो बार्बर थे राममूर्ती वो भी भर्ती हो गये थे। एक ड्राइवर हुआ करते थे बेंचे वो भी भर्ती हो गये थे, तो उस समय जब भर्ती हो रही थी तो ये सब लोग जाकर सेना में शामिल हो गये थे। उस समय का इतना ही याद है। ये लोग छूट्टी लेकर गाँव आते थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब ये लोग सेना से लौटकर गाँव आते थे तो क्या बताते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: वही सब बातें बताते थे कि चाइना से कैसे युद्ध लड़े, पाकिस्तान से कैसे युद्ध लडे़। सीमा पर की कहानियाँ सुनाते थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: उन लोगो की बातें सुनकर कभी ऐसा लगा कि हमें भी सेना में जाना चाहिये? या फिर सियासत मे आने की वजह सिर्फ़ नेताजी बने?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब नेताजी चुनाव लड़ने लगे तो हम सब उनके लिये काम करते थे, उस समय पर्चियाँ काटी जाती थी। चुनाव के एक महीने पहले से पर्चियाँ काँटना शुरू कर देते थे। वोटर लिस्ट लेकर के हम लोग पर्चियाँ तैयार करते थे और चालिस-पचास लोग मिलकर के साइकल से गाँव गाँव प्रचार करने जाते थे, पोस्टर लगाते थे, नारे लगाते थे।

    तो यही सब काम चलता था। ये तो हम लोगो ने 1972 में शुरू कर दिया था। 1974 में फिर से नेताजी विधायक बन गये थे और 1975 में एमरजेंसी लग गई थी। जब एमरजेंसी लगी तो हम के.के. डिग्री कॉलेज, इटावा में पढ़ते थे। जहाँ हम लोग रहते थे वहां कभी कभी नेताजी भी वही आ जाते थे। नेताजी जब भी लखनऊ से लौटते थे तो हम लोगो के पास इटावा में रूक जाते थे। हम लोग एक ही मकान में रहते थे।

    जब एमरजेंसी लगी तो हम वही इटावा में थे, नेताजी भी थे। हमारे पास एक फ़िलिप्स का ट्रांजिस्टर था उस पर सुना था कि एमरजेंसी घोषित हो गई है। पुलिस घूमने लगी मोहल्ले में, तब तो शायद लोकदल हुआ करता था या जन संघ पार्टी हुआ करता था, इनके लोगो की गिरफ़्तारियाँ शुरू हो चुकी थी ट्रांजिस्टर पर हम लोग सुनते थे। तब तो हमें एमरजेंसी का मतलब भी नही पता था, हमारे पड़ोस में एक कांग्रेस के नेता थे रामाधिन शर्मा,उनका हमारे यहाँ उठना बैठना होता था तब हमने उनसे बात की, उनसे पूछा कि एमरजेंसी का मतलब क्या है? तब उन्होंने बताया कि एमरजेंसी लग चुकी है गिरफ़्तारियाँ शुरू है।

    उस समय हमारे घर पर भी पुलिस आती थी। पुलिस वाले पुछते थे कि विधायक जी कहाँ हैं, उस समय नेताजी को विधायक जी कहा जाता था। तब तक तो हम लोगो को पता चल ही चुका था कि गिरफ़्तारियाँ शुरू हो चुकी है। उस समय नेताजी भर्तना की ओर किसी शादी में गये हुए थे, तो हम लोगो ने पुलिस को उसके उल्टी तरफ़ सिकोहाबाद की ओर बता दिया कि नेताजी उधर गये हैं। तो नेताजी जब रात में लौटे तो हम लोगो ने घर में बाहर से ताला लगा दिया और पुलिस आई तो उसको बता दिये कि घर पर कोई है हि नही, फिर सबेरे चार बजे नेता जी को मोटरसाइकिल से गाँव तक छोड़ आये।

    उस समय एक नेता हुआ करते थे राम सेवक जो अभी भी हैं, वो किसी की मोटरसाइकिल लेकर आये और नेता जी को सुबह चार बजे गाँव छोड आये। तब उस समय नेता जी की गिरफ़्तारी नही हो पाई। उसके बाद नेता जी गाँव गाँव जाते रहे लोगो से मिलते रहे, एक महीने के बाद नेताजी की गिरफ्तारी हुई। नेता जी 18-19 महीने तक जेल में रहे।

    जब नेताजी एमरजेंसी के समय जेल में बंद थे तो मैं हर रोज उनसे मिलने जेल में जाता था….

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप नेताजी से मिलने जेल में जाते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, एक दिन में दो बार तो अनिवार्य रूप से रोज मिलने जाते थे। नेताजी को जिस भी सामान की ज़रूरत पड़ती थी हम पहुँचा आते थे। उस समय के एक जेलर थे वाजपेयी जी जिनसे हमारी दोस्ती भी हो गई थी। जब कभी जेल में नेताजी से मुलाक़ात नही हो पाती थी तो जेलर साहब को ही सामान दे आया करते थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब आप नेताजी से जेल में मुलाक़ात करके वापस गाँव, घर, परिवार के बीच लोटते थे तो लोग क्या पुछते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: अरे! उस एमरजेंसी के समय तो हम लोग लड़के ही थे। जब हम लोग जेल के गेट तक पहुँचते थे तो पुलिस खदेड़ती थी, हम लोग भाग जाते थे। एमरजेंसी लगने के एक-दो महिने तक तो पुलिस का आतंक था। लेकिन हम लोगों को क्या ही फ़र्क़ पड़ता था, पुलिस खदेड़ती थी हम लोग भाग जाते थे। जेल के पास में ही स्टेशन था तो उधर की भाग जाते थे। और जब भी कभी नेताजी से मुलाक़ात होती तो नेताजी जो भी पत्र लिख कर देते थे उसे गाँव तक हम लोग पहुँचा आते थे। फिर हम लोग चुनाव की तैयारी भी करते थे, तो वहीं से हमारी राजनीति शुरू हो गई थी, एमरजेंसी के बाद।

    फ़्रैंक हुज़ूर: एक नेता के रूप में आपने पहला भाषण कब दिया था?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! हम लोग तो अपना काम करते रहे, उस समय केवल हम लोगो का काम था कि नेताजी की मीटिंग बडे़ नेताओं से करायें जैसे जनेश्वर मिश्राजी थे, रामनारायण जी थे, अनंत जायसवाल जी थे।

    ये सभी बडे़ समाजवादी नेता हुआ करते थे। इनकी जब मीटिंग होती थी तो हम लोग कराते थे। गाँव में छोटे छोटे पंचायत के स्तर पर इन नेताओं की मीटिंग कराते थे। फिर हम 1988 में ज़िला सहकारी बैंक के चेयरमैन हो गये। मुझे याद है कि हरदोई में नेताजी की एक मीटिंग होनी थी, वहाँ मैने अपना पहला भाषण दिया था। हमारे यहाँ समाजवादी पार्टी के जिले के महासचिव गया प्रसाद वर्मा जी थे जो तीन बार विधायक बने थे तो उनके साथ कई मीटिंग हमने अटेंड की फिर तो धिरे धिरे एक महराज सिंह हुआ करते थे पार्टी के अध्यक्ष, वो भी पाँच बार भर्तना से विधायक बने। कोऑपरेटिव मूवमेंट से इसकी शुरूआत हुई।

    जब उत्तर प्रदेश को पहली बार कोई पिछड़ा मुख्यमंत्री मिला तो गाँव गाँव लोगो में बहुत उत्साह था…….

    फ्रैंक हुज़ूर: उस दौर में कांग्रेस की जो राजनीति थी, जो भी उस पार्टी के मुख्यमंत्री पद के नेता बनते थे वो भी ज़्यादातर सवर्ण समाज के होते थे। जिस तरह से आज भाजपा पर सवर्णपरस्ती का आरोप लगता है वैसे ही उस समय कांग्रेस पर भी लगता था तो उस समय जब पहली बार रामनरेश यादव उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं और वो उस समय पिछड़ो के प्रतिनिधित्व/अधिकार की बात करते हैं जिसके चलते गाली भी खाते हैं। क्या उस समय समाज में किसी तरह का विरोधाभास पैदा हुआ था? जिस तरह से मंडल कमीशन के बाद हुआ था।

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! एमरजेंसी के बाद जब सरकार बनी, सबकी मिली जुली जनता पार्टी बनी। सभी लोग कांग्रेस के विरोध में हो गये थे। और यहाँ मुख्यमंत्री रामनरेश यादव बने उनके बाद बनारसी दास भी मुख्यमंत्री बने। जब  रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने तो पिछड़ो में ख़ुशी का माहौल था। पहली बार जब कोई यादव मुख्यमंत्री बना तो गाँव गाँव लोगो में बहुत उत्साह था क्योंकि इसके पहले तो केवल सवर्ण ही मुख्यमंत्री बनते थे।

    नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे……

    फ़्रैंक हुज़ूर: जब नेताजी पहली बार कोऑपरेटिव मिनिस्टर बने थे तब लखनऊ से आपका जुड़ाव ज़्यादा हो गया रहा होगा?

    शिवपाल सिंह यादव: उस समय भी हम पढाई ही कर रहे थे। एमरजेंसी के पहले ही हमने बी ए कर लिया था उसके बाद एम ए किया फिर 1978 में लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से ही बीपीएड किया तब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे। पहले नेताजी 16, गौतमपल्ली में रहते थे हम भी उनके साथ ही रहे और विक्रमादित्य में जब नेता जी रहे तब भी हम कुछ दिनों तक उनके साथ ही रहे। इसके बाद ही हम राजनीति में सक्रिय हो गये थे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: आप पर नेताजी की राजनीति का असर लगातार हो रहा था तो क्या आप कह सकते हैं कि नेताजी आपके राजनैतिक गुरू हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, नेताजी के साथ ही हमेशा काम किया है और हमारे जिले के जो गया प्रसाद वर्मा जी थे, महराज सिंह जी थे इनके साथ भी काम किया है।

    फ़्रैंक हुज़ूर: कहते हैं कि गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी जी के भी गुरू थे, कुछ लोग कहते हैं कि वो जिन्ना के भी गुरू थे तो उसी तरह आपका राजनैतिक गुरू किसे कहा जाय?

    शिवपाल सिंह यादव: तब तो नेताजी को ही कहा जायेगा। नेताजी ने पढ़ाया भी है, मेरा विषय पॉलिटिकल साइंस भी था। पहला पीरियड नेताजी का ही लगता था वही पढ़ाते थे। तो नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे।

    अखिलेश (टीपू) हमारे साथ ही रहते थे…..

    फ़्रैंक हुज़ूर: उसी समय में अखिलेश जी का जन्म होता है और नेताजी पिता भी बन जाते हैं, तो उस दिन के बारे में कुछ बतायेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, उस समय तो मैं गाँव में ही था, जिस दिन इनका जन्म हुआ 1972 में लोगो ने ख़ुशी ज़ाहिर की थी। जिसको हम लोग बड़ी माँ बोलते थे, जो प्रोफ़ेसर की माँ थी उन्होंने सबसे पहले आकर हमें बताया सुबह सुबह जब अखिलेश जी का जन्म हुआ। फिर ख़ुशी का माहौल था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: अखिलेश जी ने अपना ज़्यादातर समय आपके परिवार के साथ बिताया, मिलेट्री स्कूल से लेकर हर जगह आप गार्जियन के रूप में मौजूद रहे। क्या आपने उस समय कभी ऐसा महसूस किया कि ये लड़का आगे चलकर राजनीति में जायेगा?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! शुरूआत में जब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे तब ये बहुत थे चार साल के रहे होंगे। तब मेरे साथ ही गाँव से लखनऊ आकर के पंद्रहदिन तक रहे थे, तक तक उनका एडमिशन नही हुआ था। उसके बाद ही उनका एडमिशन इटावा सेंट मैरी में कराया गया था। सेंट मैरी स्कूल सेचौथी क्लास पास करने के बाद ही मिलिट्री स्कूल, धौलपुर में एडमिशन कराने मैं ही ले गया था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: अखिलेश के साथ कुछ ऐसी बातें या कोई यादगार पल जो आप साझा करना चाहें?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब हमारे साथ ही रहे तो यादगारे तो बहुत सी हैं, अब जो चाहे लिख लेना।

    फ़्रैंक हुज़ूर: बचपन में अखिलेश जी का व्यवहार कैसा था? जैसे सीधे थे, शरारती थे या शर्मीले थे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! शर्मीले तो नही थे। खेल कुद में ज़्यादा मन लगता था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: किस खेल में इनका ज़्यादा मन लगता था? कौन सा खेल खेलते थे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! मोहल्ले में जहाँ हम लोग रहते थे किराये के मकान में, तो मोहल्ले के लड़के इकट्ठे हो जाते थे उनके साथ खेलते थे और जब बडे़ हुए तोक्रिकेट, फ़ुटबॉल ज़्यादा खेलते थे। फ़ुटबॉल में उनका ज़्यादा मन लगता था।

    बाबरी विध्वंस के समय मैं इटावा में था फिर भी मुझपर मुक़दमे किये गये, मैं 6 महीने तक अंडरग्राउंड था…..

    फ़्रैंक हुज़ूर: अब लौटते हैं आपकी राजनीति पर, 1988 में आप ज़िला कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन बने और 1989 में नेता जी मुख्यमंत्री बन गये। नेता जी ने 1987 से 89 तक पूरे प्रदेश में क्रांति रथ लेकर चले तो उसके बारे में कुछ बताइये?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1989 में केंद्र में दोबारा सरकार बन गई थी लेकिन सरकार बनने के बाद ज़्यादा दिन तक सरकार नही चल पाई थी। बाबरी मस्जिद प्रकरण के वजह से सब लोग अलग हो गये थे। इसे लेकर पहले केंद्र सरकार में झगड़ा हुआ फिर उसके बाद नेताजी ने इस्तिफा दिया था फिर चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने फिर उन्होंने भी इस्तिफा दिया उसके बाद नेताजी ने यहाँ से इस्तिफा दिया फिर चुनाव के मैदान में गये उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।

    उसी दौर में कारसेवा निकली, कार सेवा में अधिकारियों ने गोली चलाई और मुझ पर भी उस केस में एफ़आइआर हुआ। जब पहली बार कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो उस सरकार में मुझपर बहुत से झूठे मुक़दमे हुए जिसके चलते 6 महिने तक मैं अंडरग्राउंड भी रहा फिर कोर्ट से स्टे आर्डर लिया। कार सेवकों पर जो भी लाठी चार्ज हुआ ,गोलियाँ चली वो अधिकारियों ने किया था उस समय तो मौक़े पर हम थे ही नही फिर भी फ़र्ज़ी मुक़दमे मुझपर कराये गये।

    फ़्रैंक हुज़ूर: कारसेवकों पर गोलियाँ चली, संविधान को, सामाजिक न्याय को और इस देश की धर्मनिर्पेक्ष राजनीति को बचाने के लिये नेताजी ने बहादुरी से क़दम उठाया, जिसका स्वागत देश की धर्मनिर्पेक्ष व सामाजिक न्याय पसंद आवाम ने किया और दूसरे तरफ़ भाजपा के लोगो ने मुल्ला मुलायम जैसे नारों को उछाला उसका ख़ूब प्रचार प्रसार किया गया। उस समय आपका कहाँ खड़े थे? आप क्या सोच रहे थे?

    शिवपाल सिंह यादव: हम तो पार्टी का काम करने लगे थे। इटावा और उसके आसपास के इलाक़ों में पार्टी का काम कर रहे थे। 1991-92 में जब बाबरी मस्जिद पर हमला किया तो भाजपा की सरकार चली गई उसके बाद 1993 में जब फिर से चुनाव हुआ तो नेताजी मुख्यमंत्री बने, कांशीराम से समझौता होने के बाद सरकार बनी थी। फिर वो सरकार 18 महिने चली कांशीराम ने समर्थन वापस ले लिया था तो सरकार गिर गई उसके बाद कुछ समय के लिये मायावती मुख्यमंत्री बनी फिर कल्याण सिंह कुछ दिन के लिये मुख्यमंत्री बने।

    नेताजी ने बाबरी मस्जिद को बचाने के लिये सारा पुलिस फ़ोर्स लगा दिया था……

    फ़्रैंक हुज़ूर: बाबरी विध्वंस के दिन आप नेताजी के साथ बैठे होंगे तो उस घटना को लेकर क्या बात हो रही थी?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उस समय जब बाबरी मस्जिद टूटी तो मैं इटावा में था। नेताजी के समय में जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद पर हमला किया तब मैं लखनऊ में था। नेताजी ने तब भी बचा लिया था, पूरी पुलिस फ़ोर्स बाबरी मस्जिद को बचाने के लिये लगाई थी। उसके बाद जब 1992 में मस्जिद गिराई गई तब मैं इटावा में था प्रदेश के लोग सहमे दिखाई दे रहे था, बाबरी विध्वंस के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन शुरू हो गया था और भाजपा वाले बाबरी विध्वंस के समर्थन नारे लगा रहे थे। उस समय पूरे प्रदेश में हमारी पार्टी के लोगो ने भाजपा के खिलाफ ज़िलाधिकारियों को ज्ञापन दिया था और हम लोगो ने भाजपा का विरोध किया। उस समय सड़कों पर समाजवादी पार्टी के लोगों का भाजपा के लोगो से बहुत जगह तकरार भी हुआ, मुक़दमे भी लिखे गये।

    जैसे नेताजी ने बाबरी मस्जिद को बचाया था वैसे ही कांग्रेस भी चाहती तो बचा लेती….

    फ़्रैंक हुज़ूर: बाबरी मस्जिद पर जब हमला हुआ तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, नरसिम्हा राव तात्कालिक प्रधानमंत्री थे। आपको क्या लगता है कि बाबरी मस्जिद गिराने में कांग्रेस की भी मिली भगत थी?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उस समय बचाया जा सकता था, वो प्रधानमंत्री थे। अगर चुप नही बैठे होते तो बचाया जा सकता था, जब संविधान की धज्जियाँ उड़ रही थी तब अगर चुप नही बैठते तो बचाया जा सकता था, देश के प्रधानमंत्री थे। जिस तरह से 1990 में नेताजी ने बचाया था उस तरह से बचाया जा सकता था।

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या कांग्रेस ने मंडल-कमंडल की राजनीति में कमंडल की राजनीति को हवा दी और देश में भाजपा की राजनीति को बढ़ने का मौक़ा दिया?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! चुप रहना ही एक तरह का समर्थन ही था, जब संविधान की धज्जियाँ उड़ रही थी कोर्ट में मामला पहुँच चुका था तो फिर प्रधानमंत्री को रक्षा करना चाहिये था।

    “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी”

    फ़्रैंक हुज़ूर: उसी दौर में मंडल आयोग लागू हुआ था। उस समय मंडल, कमंडल की राजनीति जैसे मुहावरे गढ़े जा रहे थे जिसमें मंडल की राजनीति नेता जी की राजनीति का मुख्य केंद्र था। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में भी मंडल कमीशन को शामिल किया गया था। आज सबसे ज़्यादा हमले दलित-पिछड़ो के अधिकारो पर हो रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! आरक्षण के मामले में जैसे इस समय पिछड़ो की संख्या 54 प्रतिशत से ज़्यादा हो गई है और पिछड़ो को अभी भी 27 प्रतिशत ही आरक्षण मिल रहा है। हमारी माँग है कि हर वर्ग, जाति को उसके जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दो। पिछड़े हैं, अति पिछड़े हैं दलित हैं अति दलित हैं सबकी गिनती करके उनका हक दे दो। “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी”

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप लोग “संख्या के हिसाब से भागीदारी” के आंदोलन को तेज करने जा रहे हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: हाँ, इस मुद्दे को लेकर हम अभी पिछड़ो की एक बैठक बुलायेंगे फिर निर्णय लेंगे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: नवउदार नीतियों के बाद सरकारी कम्पनियों का भी नीजिकरण हुआ जिसका ख़ामियाज़ा दलित-पिछड़ो को भुगतना पड़ा क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण नीति को नहीं किया गया है। तो क्या आप प्राइवेट सेक्टर में भी प्रतिनिधित्व की बात करेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! प्राइवेट और सरकारी सभी में हिस्सेदारी मिलनी चाहिये जिसे लेकर हम लोग जल्द ही बैठक करेंगे और बड़ा सम्मेलन बुलायेंगे जिसमें हमारी यही माँग होगी।

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या जब आपकी पार्टी सत्ता में वापस आयेगी तो आप लोग इस प्रतिनिधित्व के मुद्दे को लेकर कोई क़ानून बनायेंगे जिससे सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों में सबको आबादी के हिसाब से हक़ मिले?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! ये हमारे हाथ में तो नही है लेकिन ये हमारा मुद्दा है और हम अपने राष्ट्रीय नेतृत्व को इस मुद्दे पर राय देंगे कि सरकार इसे लेकर क़ानून बनाये।

    फ़्रैंक हुज़ूर: आप अपने पहले चुनाव के बारे में कुछ बताईये?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1996 में जब नेताजी संसद में चले गये तो उसके बाद जसवंतनगर की सीट ख़ाली हो गई। उस समय मैने जसवंतनगर से पहला चुनाव लड़ा। पहली बार हम 13000 से जीते फिर जब दूसरा चुनाव हुआ तो वो चुनाव हम 52000 वोट से जीते इसी तरह तीसरा चुनाव लगभग 32000 से और चौथा चुनाव 81000 से जीते थे। इसमें दो बार हम मंत्री भी रहे। 2012 में मुझे मंत्री पद से बर्खास्त भी किया गया।

    मुझे जिस भी मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली उस विभाग में मैंने सबसे बेहतर काम किया। मुझपर एक भी आरोप नहीं है….

    फ़्रैंक हुज़ूर: परिवार में हुए विवाद को लेकर कुछ कहना चाहते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उसमें तो मुझे कुछ नही कहना है बस इतना कहना चाहूँगा कि 2012 में जब हम मंत्री बने जो भी हमें विभाग मिले मैने उसमें सबसे बेहतर काम किया। आजतक मुझपर कोई आरोप भी नही लगा है।

    पीडब्ल्यूडी में इतनी चौड़ी चौड़ी सड़के बना दी जो कभी नही बन सकती थी। पचास कोऑपरेटिव बैंकों में से पच्चीस बैंकों बंद होने कगार पर थी, मैने सभी बैंक चला दिये। कोऑपरेटिव का चुनाव मैने पूरी निष्पक्षता से करा दिया था कही से एक भी शिकायत नही मिली थी।

    राजस्व सहिंता राजस्व विभाग में 36 वर्षों से लागू नही हो पा रहा था मैने उसे लागू कराया जिससे किसानो को उनके दरवाज़े पर न्याय मिल जाय कही पर भी उसे भागना न पड़े। मैने बुंदेलखंड में कई बाँध बनाये थे वहाँ पारिछा में पानी पीने वाला बाँध भी बनाया था जिसका उद्घाटन अखिलेश ने किया।

    नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे व्यापार खत्म कर दिए, किसानो को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया…..

    फ़्रैंक हुज़ूर: उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानो के आत्महत्या की परम्परा कभी नही रही लेकिन हाल के दिनों में यहाँ किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। अभी अखिलेश यादव ने महोबा का दौरा किया, वहाँ एक किसान ने आत्महत्या कर लिया था तो उस परिवार से मिलने गये थे। किसान बहुत ज़्यादा तनाव के दौर से गुज़र रहा है ऐसे में भारत सरकार इज़रायल के किसानी के मॉडल को यहाँ लागू करना चाहती है जोकि पूरे तरह मशीन पर आधारित है जबकी हमारे देश में अभी किसानो की स्थिति इतनी अच्छी नही है कि वो महँगे मशीनों को ख़रीद सके। किसानो की इस स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे आप?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब मैं सिंचाई मंत्री था तो एक बार इज़रायल का दौरा किया था। इज़रायल मे तो बहुत ज़्यादा पानी की कमी है लेकिन हमारे यहाँ तो पानी की नही है। हमारे यहाँ मैनेजमेंट बहुत ख़राब है अगर हम बारिश के पानी को संग्रहित कर लेने में सफल हो जाएँ तो हमें कभी पानी की समस्या से नही जूझना पड़ेगा। हमारे यहाँ बारिश होती है तो बारिश का पानी नालों और नहरों के माध्यम से सीधा समुद्र में चला जाता है।

    मैने तो इज़रायल में देखा है कि जितना भी नाले का गंदा पानी होता है उसको पहले साफ़ कर लेते हैं फिर तालाब बनाकर उसमें डाल देते हैं जो सिंचाई के काम आ जाता है। हमारे यहाँ तो नदियों में बहुत समस्या है जैसे गंगा नदी ही गंदी होती जा रही है, भाजपा सरकार ने तो सफ़ाई अभियान भी चलाया है जिसका बजट बीस हज़ार करोड़ रखा है, चार साल को गये कुछ नही हुआ अभी तक।

    जब उमा भारती जल संसाधन मंत्री थी तब मैने उनसे कहा था कि हमें पाँच सौ करोड़ ही दे दो हम नदियों को साफ़ कर देंगे। अगर नदियाँ गहरी कर दि जाय, नाले के गंदे पानी को नदियों में डालने के बजाय बडे बडे तालाब बनाकर उसमें डाला जाय तो किसानो के लिये पानी की समस्या ही खत्म हो जायेगी। मैने मैनपुरी में दो और इटावा में तीन नदियों को गहरा किया है। पहले वहाँ एक भी फ़सल पैदा नही हो पाती थी अब तो दो फ़सल हो जाती है। अगर इस तरह से काम किया जाय तो समस्या खत्म हो जायेगी लेकिन इसके लिये सरकार को निर्णय लेना होगा। यहाँ तो सरकार निर्णय क्या ले रही है? नोटबंदी का निर्णय ले रही जिससे व्यापार खत्म हो गया। अब किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? पहले तो किसान को पानी नही दे पाती सरकार फिर खाद महँगा हो गया है जिसके चलते किसान क़र्ज़ में डूबा हुआ है। अगर किसी तरह किसान फ़सल पैदा कर भी देता है तो उसके लिये बजार में अच्छे दाम नही मिलते क्योंकि बिचौलियों की लूट मची हुआ है। किसानो को इस बार भी समर्थन मूल्य न मिल सका क्योंकि अधिकारी और दलाल पैसे लूट लिये। अब किसान के परिवार भी चलाना है अपने बेटे, बेटी की शादी भी करनी है तो यह सब कैसे करेगा किसान इस हालात में, बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाना भी है क्योंकि सरकारी स्कूल बर्बाद हो चुके हैं। यही सारी वजहें किसानो में तनाव का कारण है।।

    फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप अगले लोकसभा में चुनाव लड़ेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी तो मैं विधायक हुँ, अभी मेरे पास चार साल का समय है लेकिन जो फ़ैसला या जो आदेश होगा करेंगे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: अगर राष्ट्रीय नेतृत्व आपको लोकसभा चुनाव लड़ने को कहते हैं तो आप चुनाव लड़ेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! वैसे तो मेरा मन नही है सांसद बनने का क्योंकि परिवार में बहुत से सांसद हैं तो हम विधानसभा ही पसंद करेंगे।

    मेरा तो हमेशा प्रयास रहा है कि सब लोग एक साथ आयें….

    फ़्रैंक हुज़ूर: बसपा सपा के गठबंधन को लेकर क्या कहना चाहेंगे? क्या कांग्रेस भी शामिल होगी इस गठबंधन में? सीटों के बँटवारा का आँकड़ा क्या होगा?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी सीटों के बँटवारे को लेकर हमने कोई विचार नही किया है। गठबंधन में तो सभी को शामिल होना चाहिये। मेरा तो हमेशा प्रयास रहा है कि सब लोग एक साथ आयें। जब हमारी सरकार थी तब भी हमने प्रयास किया था, लालू,नीतीश, देवेगौड़ा, शरद, ओम प्रकाश चौटाला, कमल मोरारका, अंसारी बंधु और जितने भी छोटे छोटे विभिन्न जातियों के दल थे उन सबसे हमारी बात हुई थी। मैं तो पहले से ही जोड़ने की बात कर रहा था अगर हम सबको जोड़ लिये होते तो आज हम सरकार में होते। लेकिन अच्छा है अगर भाजपा को हराना है तो सबको एक साथ रहना चाहिये।

    फ़्रैंक हुज़ूर: इस चुनाव में कांग्रेस की भूमिका को कैसे देखते हैं? पिछले चुनाव में तो गठबंधन में थे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! कांग्रेस से हमारी बात कभी नही हुआ न तब हुई थी न अब हो रही है बाकि पार्टी के जो ज़िम्मेदार लोग हैं वो बात कर रहे हैं वो करें। हमारी सहमती रहेगी।

    फ़्रैंक हुज़ूर: राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच कुछ वर्षों में जो नज़दीकियाँ बढ़ी हैं उसको आप कैसे देखते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! इस समय अगर भाजपा तो हराना है तो सब लोगो को एक साथ आना पड़ेगा। अब ये सब वो लोग समझे कि एक दूसरे से कैसे गठबंधन हो सीटों का बँटवारा कैसे हो, बाकि अगर शिर्ष नेतृत्व मुझसे सलाह लेना चाहेगा तो हम ज़रूर देंगे। अगर सलाह की ज़रूर नही होगी तो वो जो भी फ़ैसला लेंगे उसमें हमारी सहमती होगी।

    फ़्रैंक हुज़ूर: फूलपुर व गोरखपुर चुनाव में बसपा के सहयोग से जीत मिली। क्या इस सपा बसपा गठबंधन को लेकर आपसे भी कुछ बात हुआ था?

    शिवपाल सिंह यादव: नही, हमारी कोई बात नही हुई थी। इधर बीच दो बार प्रोफ़ेसर साहब से बात हुई है। अब अगर राष्ट्रीय नेतृत्व कोई सलाह लेना चाहेगा तो ज़रूर देंगे।

    फ़्रैंक हुज़ूर: लोहिया जी के ज़माने में जब समाजवाद का उदय हुआ तो उस समय ग़ैर कांग्रेसवाद के लिये लोग एकजुट हो रहे थे। उसी आधार पर नेताजी ने अखिलेश को कांग्रेस से गठबंधन न करने को कहा था और आज भाजपा के विरोध में ऐसी स्थिति बन गई है कि कांग्रेस को साथ लेकर चलना पड रहा है। इस पर क्या कहना चाहेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! आचार्य नरेंद्र देव, लोहिया और जय प्रकाश जी के समाजवादी आंदोलन की राह पर चलकर नेता जी ने राजनीति की है। एक समय था जब ग़ैर कांग्रेसवाद चला था तब ये सब मिले था फिर कांग्रेस को हटाया था और जो इस समय भाजपा के खिलाफ एकजुटता का माहौल चल रहा है वो इसलिये हो रहा क्योंकि भाजपा ने जनता से जो भी वादे किये थे उसे पूरा कर पाने में असफल रही, वो चाहे किसानो का सवाल हो या नौजवानों का, सबको पंद्रह लाख देने की बात कही थी, हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने का वादा किया था।

    एक भी वादा न पूरा कर सकी भाजपा। सौ दिन के अंदर भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कही थी लेकिन हम तो देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार पाँच गुना बढ़ गया। इस समय थाने में जो व्यक्ति केस लिखवाने जाता है उससे भी पैसा लेता है थानेदार और अगर अज्ञात के नाम से केस दर्ज हो जाता है तो पुलिस उस पूरे इलाक़े से पैसा वसूलता है। मेरी तो सरकार से माँग है कि इस चार साल के अंदर जितने भी अधिकारी हैं उन सबकी सम्पत्ति की जाँच करा लें।

    नोटबंदी के समय का भ्रष्टाचार देखना हो तो बैंक कर्मचारियों के बैंक खाते चेक करा ले, इनकम टैक्स अधिकारियों के खाते चेक करा ले। अब जीएसटी को देख लीजिये जब जीएसटी लागू करना था तब बोला गया कि केवल एक टैक्स लगेगा लेकिन यहाँ तो हर चिज पर अलग अलग टैक्स लग रहा है।

    छोटे व्यापारी रोज का सौ पाँच सौ कमाते हैं उनपर जिएसटी का नियम लगा दिया वो गरीब अब कहाँ से चार्टर एकाउंटेंट लायेगा? कहाँ से वक़ील लायेगा?

    योगी जी ईमानदार हैं लेकिन उनके निचे के लोग भ्रष्ट हैं….

    फ़्रैंक हुज़ूर: उत्तर प्रदेश के सरकार के कार्यशैली पर क्या कहना चाहेंगे?

    शिवपाल सिंह यादव: केंद्र और प्रदेश दोनो के बारे में मैने सब कुछ तो बता हि दिया है, कोई व्यक्ति टिप्पणी मही करूँगा। हम ये तो जानते हैं कि योगी जी ख़ुद तो इमानदार हैं लेकिन निचे कितना भ्रष्टाचार है, उसपर तो अंकुश लगायें।

    Shivpal Singh Yadav

    पूरा प्रदेश जानता है कि अगर मुझे  मुख्यमंत्री बनना होता तो मैं 2003 में बन गया होता……

    फ़्रैंक हुज़ूर: एक आखिरी सवाल। बहुत से लोग कहते हैं कि शिवपाल सिंह यादव के अंदर मुख्यमंत्री बनने की चाह है, आप इसको किस तरह से देखते हैं?

    शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी तक तो मेरे अंदर कभी भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा नही रही है। पूरा प्रदेश जानता है कि अगर मुझे  मुख्यमंत्री बनना होता तो मैं 2003 में बन गया होता।

    उस समय हमारे 144 विधायक थे, चाहे कल्याण सिंह के विधायक हो या अजीत सिंह के विधायक हो सब हमारे साथ था बाकि जो 40 विधायक टूट कर आये थे वो भी हमारे साथ थे।

    उस समय नेताजी दिल्ली थे और नेताजी मना भी कर रहे थे कि सरकार नही बनेगी क्यों बना रहे हो? तो हमें बनना होता तो उसी समय मुख्यमंत्री बन गये होते। अभी तक तो मेरे मन में कभी नही आया लेकिन मौक़ा आयेगा तो देखेंगे। मेरे नसीब में नही है तो नही है। हमने देखा है बहुत से लोगो की ज़िंदगी निकल जाती है काम करते करते लेकिन विधायक तक नही बन पाते और बहुत से ऐसे लोग हैं नसीब वाले जिन्होंने कोई काम नही किया है वो एमएलसी, विधायक, मंत्री तक बने बैठे हैं।

    (इंटरव्यू का अनुवाद- रत्नेश यादव )