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  • तेज धड़कनों का सच

    Mukesh Kumar Sinha

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    तेज धड़कनों का सच
    समय के साथ बदल जाता है

    कभी देखते ही
    या स्पर्श भर से
    स्वमेव तेज रुधिर धार
    बता देती थी
    हृदय के अलिंद निलय के बीच
    लाल-श्वेत रक्त कोशिकाएं भी
    करने लगती थी प्रेमालाप
    वजह होती थीं ‘तुम’

    इन दिनों उम्र के साथ
    धड़कनों ने फिर से
    शुरू की है तेज़ी दिखानी
    वजह बेशक
    दिल द मामला है
    जहाँ कभी बसती थी ‘तुम’

    तुम और तुम्हारा स्पर्श
    उन दिनों
    कोलेस्ट्रॉल पिघला देते थे
    शायद!
    पर, इन दिनों उसी कोलेस्ट्रॉल ने
    दिल के कुछ नसों के भीतर
    बसा लिया है डेरा
    बढ़ा दिया करती हैं धड़कनें
    ख़ाम्ख़्वाह!

    मेडिकल रिपोर्ट्स
    बता रही हैं
    करवानी ही होगी
    एंजियोप्लास्टी
    आखिर तुम व तुम्हारा स्पर्श
    सम्भव भी तो नहीं है!

     

  • भारतीय शूद्रों की विरासत की चोरी और आधुनिक देशभक्त –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    संजय जोठे, लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

    [themify_hr color=”red”]

    भारत के अतीत की जो उपलब्धियां हैं उन पर गर्व करने और उसपर दावा करने वाले लोग बचकाने तर्क देते हैं। कहते हैं क़ुतुब मीनार के पास खड़ा लौह स्तंभ, शून्य का आविष्कार, सुश्रुत द्वारा सर्जरी, सूर्य चन्द्र ग्रहण की गणना, आयुर्वेद आध्यात्म आदि आज के वैदिक, औपनिषदिक परंपरा ने भारत में तब पैदा किया था जब शेष मनुष्यता जंगल में गुफाओं मे रहती थी।

    यह बात ठीक है कि भारत ने यह सब सबसे पहले पैदा किया। लेकिन जिन लोगों ने पैदा किया वे आज के वेदान्तियों, सनातनियों के पूर्वज नहीं थे। वैदिक या औपनिषदिक ब्राह्मणी परम्पराओ ने तो उस ज्ञान को नष्ट करने का दुनिया का सबसे बड़ा षड्यंत्र किया है। आज उन्ही षड्यंत्रकारों की संतानें भारत के लोकायतों, श्रमणों, शूद्रों, तांत्रिकों, जनजातियों और भौतिकवादियों द्वारा पैदा किये ज्ञान पर अपना दावा कर रहे हैं। ये बड़ा मजाक है।

    उपनिषदों में प्राचीन भारतीय भौतिकवादियों और परलोकवादी पोंगा पंडितों के संघर्ष का विस्तार से उल्लेख है। विशेष रूप से उद्दालक और याज्ञवल्क्य का उल्लेख है। उद्दालक एकदम भौतिकवादी और कार्य कारण के तर्क का पालन करते हुए जगत को समझना चाहते है और याज्ञवल्क्य ब्रह्म और आत्मा की हवा हवाई धारणा से समाज को नियंत्रित करना चाहते हैं।

    कालांतर में तर्क हारता है और राजनीति और षड्यंत्र जीतता है। उद्दालक की परंपरा चल नहीं पाती और याज्ञवल्क्य के मानस पुत्र देश को परलोकवादी आत्मा, पुनर्जन्म और ब्रह्म में घसीट ले जाते हैं। भारत के इतिहास की गहरी रिसर्च यह बताती है कि यही वह बिंदु था जब भारत के पतन की शुरुआत हुई थी। आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की जहरीली त्रिमूर्ति ने भारत के मन पर तब से जो कब्जा किया है वह आज तक बना हुआ है।

    ये त्रिमूर्ति भारत का सबसे जहरीला सिद्धांत है जो धर्म और कर्मकांड का रोजगार करने वालों ने तर्कनिष्ठ वैज्ञानिकों, शिल्पकारों और भौतिकवादियों को नीचा दिखाने के लिए विकसित किया है। भाववादी अध्यात्म या धर्म जाहिर तौर पर दुनिया भर में मनुष्यता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र रहे हैं। भारत में इसमें पुनर्जन्म का जो तड़का लगाया गया है वह इतना कारगर षड्यंत्र रहा है कि आज तक उससे भारत की जनता आजाद नहीं हो पाई है।

    इन सिद्धांतो से भारत के असली नायकों का काम छुपाया गया है। भारत के शिल्पी, कारीगर, लोहार, चमार, कुम्हार, जुलाहों आदि ने जिस वैज्ञानिक ज्ञान को विक्सित किया था वह ठोस भौतिकवादी और कार्यकारण सिद्धांत पर खड़ा ज्ञान था। आप अनुमान कीजिये, एक चर्मकार जब चमड़ा पकाता है, गलाता है, साफ़ करता है या ठीक अनुपात में काटकर उसकी सिलाई करता है तक वह रसायन, जीव विज्ञान, ज्यामिति और मौसम विज्ञान की विशेषज्ञता का उपयोग कर रहा है। यह शुद्धतम तकनीक है, विज्ञान है जो ठोस परीक्षणों और आकलनों पर आधारित है। इस ज्ञान से वह चर्मकार, लोहार, कुम्हार या किसान अपने उत्पाद बनाता है और समाज को देकर समाज को असल में जिंदा रहने और तरक्की करने में मदद करता है।

    अब एक भाववादी, परलोकवादी पंडित क्या करता है? वह सिर्फ काल्पनिक और हवा हवाई गप्प सुनाकर कर्मकांड कराता है। कथाएं सुनाता है श्राद्ध कराता है। जिन बातों का जिंदगी से कोई संबन्ध नहीं उनमें समाज को उलझाये रखता है। उलटे सीधे स्वर्ग नर्क पुनर्जन्म और मोक्ष आदि में लटकाए रखकर अपनी दक्षिणा और रोजगार के लालच में पूरे समाज को मंदबुद्धि, भाग्यवादी और कायर बनाकर रखता है। यह पंडित असल में वैज्ञानिक कार्यकारण नियमों के पालन द्वारा समाज की सेवा नहीं करता बल्कि विशुद्ध मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र रचकर समाज के कर्मठ लोगों का शोषण करता है।

    आप खुद सोचिये, कर्मकांड या श्राद्ध, कथा आदि के आचारशास्त्र में कौनसा विज्ञानं छूपा है? दाएं हाथ के अंगूठे से जलधार छोड़नी है या   सात परिक्रमा करनी है या पूर्व की तरफ काले तिल फेंकने हैं या दस ब्राह्मणों को भोज कराना है जैसे कामों का क्या कोई वैज्ञानिक या तार्किक अर्थ है? लेकिन वहीँ जब एक लोहार लोहा बनाता, गलाता, पीटता है तो उसमें विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करता है। भारत के सभी शूद्र जो कि कारीगर, शिल्पी या उत्पादक रहे हैं उन्होंने असल में विज्ञानं और तकनीक को जन्म दिया है।

    अब मजा ये है कि इन लोगों को और इनके ज्ञान को अछूत बनाया गया है। इन्हें नीच और गन्दा कहकर इन्हें समाज की निचली पायदान पर धकेला गया है। और आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म का जहर पिलाकर रोजगार चलाने वालो ने स्वयं को सबसे ऊपर रखा। इस प्रकार भारत में अन्धविश्वास फैलाने वालों ने भौतिकवाद के वैज्ञानिक नियमों पर खड़े तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान को अछूत बनाकर नष्ट कर दिया। और जब तकनीकी ज्ञान बदनाम हो गया तो शिल्पकार गरीब होते गए उनमे आविष्कार करने की या सुधार करने की प्रेरणा मरने लगी। इस तरह विज्ञानं नष्ट हुआ। दूसरी तरफ पठन पाठन का अधिकार भी सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया गया, वे बिना कुछ किये मालदार और ताकतवर बनते गये। न सिर्फ शूद्रों पर बल्कि क्षत्रियों और वैश्यों पर भी उन्होंने अंधविश्वास फैला दिया। व्यापार का मुहूर्त, युद्ध का मुहूर्त, दिशा ज्ञान, वास्तु, सामुद्रिक, प्रेत विद्या आदि में समाज के शासक वर्ग को खुद राजगुरु बनकर उलझा लिया। अब मजा ये कि जब तुर्क, अफगान, मुग़ल आदि ने आक्रमण किये तो ये ब्राह्मणी ज्ञान कुछ काम न आया। भारत में धातु, रसायन, शिल्प, भौतिकी, गणित आदि की रिसर्च बन्द होने के कारण भारत सबसे हारता रहा। जो देवता पहाड़ उठाकर उड़ जाते थे वे काम न आये। लेकिन शूद्रों की बनाई धातु की तलवार या हल ही काम आये। लेकिन इस सबसे भी कोई शिक्षा नही ली गयी। आजादी के बाद फिर से ब्राह्मणी धर्म और परलोक में फंसाया गया है।

    यह भारत को बर्बाद करने का सबसे लंबा, संगठित और कारगर षड्यंत्र रहा है। जिन परलोकवादी और कर्मकांडी लोगों ने ये खेल रचा वे भारत के असली दुश्मन और राष्ट्रशत्रु हैं।

    अब एक नया खेल शुरू हुआ है। जिन लोगों और परम्पराओं ने भारत को पतन के गर्त में पहुँचाया उसी परम्परा के झंडाबरदार अब भारत के शूद्रों के ज्ञान पर दावा कर रहे हैं। शून्य का ज्ञान बौद्धों का था, धातुविज्ञान का या शल्य चिकित्सा का ज्ञान भी शूद्रों और जनजातियों का था जिन्हें अछूत और नीच समझा गया। लेकिन आज जब भारत यूरोप के सामने लाचार खड़ा है तो भारत के पोंगा पंडित एक बार फिर शूद्रों, काश्तकारों और गरीबों की विरासत पर दावा करने को खड़े हो गए हैं। जैसे इनके पूर्वजों ने शिव, बुद्ध आदि महापुरुष चुराए थे, उसी तरह आजकल के स्वदेशी इंडोलॉजिस्ट उन शूद्रों के ज्ञान को भारत का प्राचीन ज्ञान बताकर श्रेय लूटने की तैयारी कर रहे हैं।

    निश्चित ही यह भारत का प्राचीन ज्ञान है लेकिन ये किन्ही दूसरी संस्कृतियों का ज्ञान था। यह भौतिकवादी संस्कृतियों या परम्पराओं का ज्ञान था। आज के वैदिक या उपनिषदिक परम्परा से या इनके पूर्वजों से उनका कोई रिश्ता नहीं था। रिश्ता था भी तो वो विरोध या लड़ाई का रिश्ता था। लेकिन आज हालत बदल रही है। कर्मकांडीय मूर्खता से देश को बर्बाद करने वाले लोग अब शूद्रों, शिल्पियों, किसानों आदि के ज्ञान को वैदिक भारत के ज्ञान की तरह प्रोजेक्ट करके झूठा इतिहास लिखने की तैयारी में हैं।

    इस खेल को ठीक से समझिये और भारत के इतिहास का ठीक से अध्ययन कीजिये। आप समझ सकेंगे कि जिन लोगों ने भारत को बर्बाद किया वे आज भी षड्यंत्र बुन रहे हैं और जिस ज्ञान को उनके पूर्वजों ने नीच घोषित किया था उसी ज्ञान पर आज दावा करने को खड़े हो रहे हैं। इन लोगों में कोई शिष्टाचार या कॉमन सेन्स या सामान्य नैतिकता तक नहीं है। ये परजीवी रहे हैं खुद कुछ पैदा नहीं करते सिर्फ दूसरों की विरासत को अपने खाते में दिखाने वाले पुराण और झूठ लिखते हैं। इनके षड्यंत्र को ठीक से देखिये।

  • पावर का प्रेम आदमी आैर राजनीतिक दलों के नर्व सिस्टम पर सांघातिक प्रहार करता है

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    पावर का प्रेम आदमी आैर राजनीतिक दलों के नर्व सिस्टम पर सांघातिक प्रहार करता है। वे पाॅलिटिक्स की डिग्निटी भूल जाते हैं। ऐसे लोगों की खाली खोपड़ी एमलेस एक्शन और हैफ्हैजर्ड टर्बुलेंस को आमंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती। लोकतंत्र की हत्यारी इंदिरा गांधी की प्रेतात्मा चुपके से सत्ताधीशों की आत्मा में कैसे आकर बैठ जाती है और उनकी सत्ता ऐषणाएं उनके के साथ किस सहजता से घुलमिल जाती हैं, यह पता ही नहीं चलता। सच ही है, स्पेस, प्लेस और मोशन पॉलिटिक्स के मेटाफर को बदलते देर नहीं लगाते।

    ये कैसा चमत्कार है कि आपातकाल के खिलाफ़ लड़ने वाले साहसी लोग ही 1975 की भाषा बोलने लगते हैं। यह भूलकर कि उन दिनों वे जेलों में बैठे अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य पर ठीक वैसे ही विचार रखते थे, जैसे आजकल के गतिशील युवा रख रहे हैं। ये लाेग भूल जाते हैं कि राजनीति एक फैकल्टी है, लेकिन सत्ता को अपने शुद्ध विचारों से चलाना एक आर्ट।

    कितना अचरज़ है, सत्ता का चरित्र नहीं बदलता, स्वतंत्र चैतन्यता रखने वाले लोग अपना चरित्र वस्त्रों की तरह बदलते हैं। कौन भूलेगा कांग्रेस के उस ऐतिहासिक अपराध को। इंदिरा गांधी के उस अलोकतांत्रिक क़दम को। कम्युनिस्टों के एक बड़े खेमे का इमरजेंसी के समर्थन में खड़े होने के पाप को। विनोबा भावे जैसे संत कहलाने वाले साधु स्वभाव व्यक्ति का आपातकाल को राष्ट्रीय पर्व कहने के विचलन को।

    निष्कर्ष ये है कि पॉलिटिकल पार्टियों और उनसे जुड़े लोगों का प्राइमरी एम, आॅब्जेक्ट और पर्पज़ एक ही होते हैं। उनके कॉन्शसनेस में सदा एक ही बात रहती है कि चीज़ों को जितना ज़्यादा नियंत्रित कर सकते हो करो। ये एक ऑटोमेशन जैसा होता है। आप पावर में आए नहीं कि आपकी कॉन्शसनेस लुप्त होने लगती है और सत्ता की कॉन्शसनेस आपकी बुद्धि, चेतना और विवेक का हरण कर लेती है। वे समझते हैं कि वेल-कंट्रोल्ड सिस्टम ही उनका अल्टीमेट एम है।

    आप कह सकते हैं, इंदिरा गांधी निष्कलंक थीं। उन्हें कलंकित और कलुषित किया उनके सत्ता प्रेम ने। सिस्टम को नियंत्रित करने की उनकी ऐषणा ने। वरना तो वे भी आपातकाल थोपकर वैसा राष्ट्रप्रेम ही तो जता रही थीं, जो आप प्रकट करते रहते हैं। वे वैसी ही तो देशभक्ति दिखा रही थीं, जैसी आप प्रकट करते रहते हैं।

    फ़र्क बस इतना सा है कि उन दिनों उनकी बुद्धि वैसी थी, जैसी अाजकल आपकी है। और आजकल इंदिरा गांधी की संतानों की बुद्धि वैसी है, जैसी उन दिनों आपकी थी। लेकिन प्लीज़, सच कहूं तो इंदिरा जी की सच्ची संतान तो आप ही हैं! क्योंकि आप पर ही उनकी वह ओपरी छाया उतरने लगी है, जो इस देश के किसी सत्ताधीश के नहीं उतरनी चाहिए।

    लेकिन सर आप भूल जाते हैं उस लाख टके की बात को कि सत्ता में भी हर फंक्शन का एक ऑर्गन होता है और हर ऑर्गन का एक फंक्शन। और सर ये ऑर्गन आप या इंदिरा गांधी नहीं, इस देश का हर नागरिक होता है, जो मतदाता न भी हो तो भी मदांध सत्ताधीशों को चौकड़ी भुलाते देर नहीं लगाता।

     


    Credits: Facebook wall of Tribhuvan

  • उनका पिरामिड उलट दीजिये

    Amar Tripathi

    [themify_hr color=”red”]

    दुनिया भर के समाजशास्त्रीय और अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों को धूल चटा जाईये और सिर्फ यह सोचिये कि आप अपने लिए कैसी जिंदगी चाहते हैं और अपने लिए कैसी दुनिया ? करेंसी और बैंकिंग के जिस स्कैम ने आज हमें और आपको घेर रखा है और हमारी जिंदगियों को सुविधा पूर्ण बनाने के नाम पर वह हमारी साँसों तक को जिस तरह डिक्टेट कर रहा है, क्या वह आपको पसंद आ रहा है ? क्या आप स्वतंत्र हैं ? अपनी मर्जी की जी पा रहे हैं या फिर दिन रात मेहनत करके, बदले में मिली करेंसी से अपनी जरूरत और विलासिता के लिए चीजें जुटाने वाली एक मशीन बन चुके हैं ? असलियत यह है कि आप और हम उनके बनाये हुए सिस्टम में फिट होकर उत्पादन और उपभोग के चक्करदार क्रम में निरंतर घिसते हुए पुर्जे से ज्यादा हैसियत नहीं रखते !

    मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैसलो ने मनुष्य की जरूरतों का एक पिरामिड बनाया और हमें बताया कि पिरामिड में नीचे से शुरू करके ऊपर की ओर जाते हुए एक एक करके मनुष्य की जरूरतें पूरी होंने पर ही मनुष्य पूर्णता को प्राप्त होता है और उसे उच्च मानवीय मूल्यों के दर्शन होते हैं. चित्र में दिए पिरामिड को ध्यान से देखिये आप खुद-ब-खुद समझ जायेंगे. मोटे तौर पर मैस्लोवेँयन पिरामिड ऑफ़ नीड्स के अनुसार यदि आपकी शारीरिक जरूरतें जैसे–सांस, भोजन, सेक्स और सुरक्षा–नहीं पूरी हुयी हैं तो आप जीवन में उच्च्चतर मूल्यों जैसे प्यार, आत्मसम्मान, ज्ञान और स्वतंत्रता की सोच भी नहीं सकते !

    अब जरा सोचिये अगर ऐसा ही होता तो अभाव और गरीबी में जीने वाला कोई भी कभी किसी उच्चतर अनुभव को प्राप्त ही नहीं हो सकता था. कबीर और रैदास तो होते ही नहीं, भारत ही क्या दुनिया के हर कोने से भयंकर गरीबी और संघर्ष झेलकर और उसी में पलकर, सैकड़ों साहित्यिक, अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और खेल जगत की प्रतिभाओं ने जन्म लिया और उभरीं ही नहीं बल्कि अपनी अपनी जगह से अब्राहम मैसलो के इस सिद्धान्त को मुंह चिढा रही हैं….

    लेकिन आज भी अमेरिका के पांच-पांच विश्वविद्यालयों में दंड पेल चुके मनोविज्ञान के इस प्रकांड पट्ठे की “Maslow’s hierarchy of needs” बाकायदा दुनिया भर में रेफर की जाती है और छात्रों को पढाई जाती है.

    यह पोस्ट जिस बात से शुरू हुयी थी कल उसे इस सिद्धांत में मिलाते हुए इसकी बखिया उधेड़ेंगे और जरा समझेंगे कि इसे कैसे वे लोग अपने हक़ में इस्तेमाल करते हैं और फिर इसी को पकड़ कर हम दूसरे सिरे से कैसे अपने हक़ में इस्तेमाल कर सकते हैं ……..वापस पाने के लिए अपना जीवन, अपनी स्वतंत्रता और ख़ुशी।

    अब्राहम मैसलो का पिरामिड एक सिद्धांत हो या हायीपोथेसिस– इसको कोई भी नाम दे लीजिये सिर्फ एक रेफेरेंस पॉइंट है, जिससे हम चीजों को समझना शुरू करते हैं और हमारे बाजारू शोषक हमें समझाना. कल की पोस्ट के कमेन्ट में सरफराज अनवर ने मैस्लोवियन पिरामिड को चुनौती देने वाले कबीर, रैदास आदि की सफलता को समझने के लिए, black swan phenomenon को समझने की सलाह दी.

    दरअसल black swan phenomenon भी एक तरह का पोंगा सिद्धांत है जिसे स्टॉक ट्रेडर नसीम निकोलस तालिब ने 2008 की अमरीकन तबाही और उसके पीछे अमरीकी फाइनेंसियल सर्विस कंपनियों की धोखेबाजी को छिपाने के लिए गढ़ा. निकोलस ने रोबोटिक ट्रेडिंग के लिए कम्प्यूटर मॉडल बनाने में जिंदगी भर लगे रहे फिर भी न तो जिम्बावे के हाइपर इन्फ्लेशन और न ही 2008 के अमरीकी मेल्ट डाउन को ही समझ पाए थे इसलिए उन्होंने ये नयी थ्योरी पकड़ा दी. इसके अनुसार “black swan is an event or occurrence that deviates beyond what is normally expected of a situation and is extremely difficult to predict.” जब कि कोई भी घटना बिना कारण नहीं होती और न ही नियम का अपवाद होती है, उसके बीज सदा पिछली परिस्थितियों में छिपे होते हैं जिन्हें देखने समझने के लिए कम्प्यूटर की मशीनी इंटेलिजेंस नहीं मानवीय समझ की जरूरत पड़ती है.

    फिलहाल मेरा मानना है कि सभी बेईमान और ईमानदार विद्वानों के सारे सिद्धांत जीवन से ही प्रतिपादित होते हैं और जीवन उनके आधार पर नहीं चलता. मनुष्य लगातार स्थापित सत्य को चनौती देता रहता है और नए सत्य की रचना करता रहता है.

    अब मस्लोवियन पिरामिड को उलटने की बात करते हैं और उस प्रश्न से अपनी बात शुरू करते हैं जो कल की पोस्ट के आरम्भ में की गयी थी.

    आप कैसा जीवन चाहते हैं और वैसा जीवन जीते हुए कैसी दुनिया आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ कर जाना चाहते हैं? कहीं आप अपनी आनंद और संतुष्टि की खोज में जीवन के मूलभूत अधारों को ही तो नहीं नष्ट कर रहे? पृथ्वी नामक ग्रह और उसके संसाधनों का, जिनका उपयोग करते हुए आप बन्दर से आदमी बन गए अभी भी बंदरों की तरह ही क्यों उपयोग कर रहे हैं? यह समय है टटोलने का कि कहीं एक अदद पूँछ अभी भी तो आपके पीछे नहीं चिपकी रह गयी, जो आपको हर चीज की अंधी नक़ल करने के लिए उकसा रही है ?

    मैस्लोवेयन पिरामिड को उलटी तरफ से लागू करना शुरू कीजिये, सभ्यता का व्याकरण बदल जायेगा और जीवन का भी, हाँ लेकिन उसके पहले अपने पीछे चिपकी हुयी पूंछ हटानी होगी. अगली पोस्ट तक सोचिये कि कैसे हटायेंगे?

    कबीर रैदास और दुनिया के हजारो साधारण लोग जो जीवन में ऊच्च्तर अनुभवों को जीते आये हैं उन्होंने ऐसा ही किया है और आज भी करते हैं।

    ***

    अगर जीवन का एकमात्र उद्देश्य मैटेरिअल कम्फर्ट यानि सुविधा भोग ही करना है तो आज औसतन पचास-साठ हजार महीना कमाने वाले जितनी सुविधा भोग पा रहे हैं, उतनी दो सौ साल पहले इंग्लॅण्ड के राजपरिवार को भी नसीब नहीं थी. जरा सोचिये कि तमाम भौतिक सुखों से लैस होने के बावजूद भी दुःख और खालीपन का रोना क्यों रोते हैं लोग? क्या जीवन स्तर (quality of life=the standard of health, comfort, and happiness) सिर्फ वस्तुओं और उपभोग से निर्धारित होता है? अगर ऐसा होता तो वातानुकूलित कमरे में नरम गद्दे पर लेटे हुए मनुष्य सर्वाधिक उल्लास का अनुभव कर सकता. लेकिन ऐसा होता नहीं है, तो जाहिर है कुछ अन्य तत्त्व भी हैं जो हमारे जीवन की सार्थकता और ख़ुशी के वाहक हैं.

    जीवन में सार्थकता और ख़ुशी का अनुभव करवाने वाले तत्त्व हर व्यक्ति के लिए नितांत निजी और अलग-अलग होते हैं जो उस व्यक्ति के अपने जीवन की विकास यात्रा के हिसाब से स्वतः निर्धारित होते चलते हैं. आपने अपना जीवन किस मानसिक और भौतिक मुकाम से शुरू हुआ और आप उसे किधर लेकर चल रहे हैं, आपको होने वाले अच्छे बुरे अनुभव इसी पर निर्भर करेंगे.

    सुख और दुःख का अनुभव जीवन में एकंतारिक है (एक के बाद ही दूसरे का आना) और अनिवार्य भी; ( अन्यथा एक के बिना दूसरे की पहचान भी कैसे होगी?) जो अपनी इस चक्रीय व्यवस्था से जीवन को समृद्ध निरंतर समृद्ध करता चलता है. अपने प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश में स्वतंत्र, स्वस्थ्य, सौहार्दपूर्ण साहचर्य के साथ यह समृद्धि पाना और उसे बांटना ही जीवन का पूर्णकाम होना है.

    स्वतंत्रता भी एक सापेक्ष स्थिति है. किसी व्यक्ति, कुनबे, कबीले या राज्य की स्वतंत्रता तभी तक कायम रह सकती है जब तक कि वह किसी दूसरे व्यक्ति, कुनबे, कबीले या राज्य की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करे. इसलिए अपनी स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए दूसरे की स्वतन्त्रता को बनाये और बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है. प्रकृति से प्राप्त जीवन के साथ प्रकृति का सामंजस्य बनाये रखने की हमारी जिम्मेदारी भी इसी श्रेणी में आती है.

    प्रकृति की स्वतंत्रता में जितना हस्तक्षेप मनुष्य करेगा, प्रकृति भी उसकी स्वतन्त्रता में उतना ही हस्तक्षेप करेगी और यह लड़ाई मनुष्य जीत नहीं सकता क्योंकि वह रचनाकार (creator) नहीं है मात्र अनुगामी है. ध्यान दीजिये हमारा हर आविष्कार आज भी किसी न किसी प्राकृतिक रचना से ही प्रेरित है और निरंतर विकसित होते विज्ञान ने अब तक सिर्फ प्राकृतिक घटनाओं को समझने का ही काम किया है; किसी नयी परिघटना को जन्म नहीं दिया.

    इस संक्षिप्त और प्रवचन जैसे लगने वाले वक्तव्य को हजम करने के बाद ज़रा वर्तमान की ओर लौटिये और प्रकृति का ही एक उदहारण देखिये–

    मधुमक्खी जिस फूल से रस लेती है उस फूल को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाती, उलटे फूलों के पराग की वाहक बनती है जिससे उस पौधे की संतति बढती है. वापस वह शहद बनाती है लेकिन अपनी निजी आवश्यकता से बहुत ज्यादा, इतना कि वह मनुष्य के लिए भी उपलब्ध होता है. संक्षेप में जितना वह प्रकृति से लेती है उससे अधिक देती है और साथ में प्रकृति का काम भी करती है. मनुष्य को मधुमक्खी से कुछ सीखना चाहिए.

    तो वापस मैस्लोवेयन पिरामिड की तरफ आईये, उसे पकड़ कर उलट दीजिये और उस पर मधुमक्खी की तरह बैठ कर अपना छत्ता बुनिए, आपका जीवन अधिक ठंडा, मीठा और सुखदायी होगा.

    हाँ लेकिन आज के समय में, इसके साथ ही आपको अपने चारों तरफ अपनी स्वतंत्रता के विरुद्ध चल रही साजिशों से सावधान रहना होगा, उसका प्रतिरोध भी करना होगा और जाहिर है इसमें कुछ collateral damage तो होगा ही।


    साभार : अर्थसत्ता

  • देशभक्त

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    सुबह सुबह वे तुम्हारे मोहल्ले में
    एक तिरंगा लहराते आयेंगे
    फिर तुम्हारे घर को आग लगायेंगे
    क्या तब भी तुम उन्हें कहोगे
    — देशभक्त !

    एक दिन बीच सड़क पर
    घोंप देंगे पीछे से
    तुम्हारी पीठ में वे चाकू
    क्या तब भी तुम कहोगे उन्हें
    -देशभक्त!

    बहस होगी जब उनसे तुम्हारी
    किसी बात पर
    तुम्हारे बालों को खींच कर
    कर देंगें तुम्हे निर्बस्त्र
    भारत माता की जय कहते हुए
    क्या तब भी तुम कहोगे उन्हें
    -देशभक्त !

    खतरे में था तब भी यह देश
    जब एक भ्रष्ट्रचारी को बता रहे थे
    लोग परम धर्म निरपेक्ष
    लूटेरे को माफ़ किया जा रहा था
    क्योंकि वह समाजवादी था .

    भूखमरी और बेरोजगारी का
    चारों तरफ आलम था
    चुनाव में दिखाए जा रहे थे
    केवल सपने ..

    अपने ही देश के
    अब हम नागरिक नहीं थे
    हर बार छले गए मतदाता थे
    अपने अधिकारों से बंचित थे
    सच पहले भी कहते थे
    लेकिन देश द्रोही नहीं ..थे..

  • तारेक फ़तह और चुप्पी के बारे में

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    किसी ने पूछा मुझसे कभी कि तारेक फ़तह के बारे में आपकी क्या राय है तो मैंने कहा था कि वे कुछ बातें बहुत अच्छी कहते हैं लेकिन थोड़े लाउड हैं.

    लाउड इस आशय में कि वे चौथी जमात के मुस्लिम धर्मावलंबियों को आठवीं जमात का पाठ्यक्रम पढ़ाना चाहते हैं. भारतीय या पाकिस्तानी समाज अभी इतना अधिक लिबरल होने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है. उन्हें धीरे धीरे प्रशिक्षित करना होगा. लाउड इस आशय में भी कि वे पाकिस्तान (और इस प्रकार मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक उपमहाद्वीपीय इस्लाम) के बहुत अधिक विरुद्ध और भारत (और इस प्रकार दक्षिणपंथ) के बहुत अधिक पक्ष-समर्थक प्रकट होते हैं. इस कारण कई बार वे धैल अतार्किक हो उठते हैं. हालांकि पाकिस्तान से उनकी चिढ़ स्वाभाविक भी है. पाकिस्तान ने उन्हें प्रताड़ित किया है और जलावतनी को मजबूर हैं.

    जो लोग सिर्फ फतह से परिचित हैं, उन्हें मैं बताऊँ कि पाकिस्तान में हसन निसार, नज्म सेठी, हुसैन हक्कानी, परवेज हुडबोय, मोईद युसूफ, हामिद बशानी आदि विभिन्न मौकों पर स्वतंत्र और चुनौतीपूर्ण राय प्रकट करते नजर आते रहे हैं और वे भी फ़तह की ही तरह बिरादरी से गाली सुनते रहे हैं. इनमें से कुछ फ़तह की ही तरह भारतीय एजेंट होने के भी आरोप सुनते रहे हैं. इन सब विश्लेषकों की अपनी अपनी शैली है. जैसे हसन निसार बहुत हताशा और लानतों के साथ लाउड बोलते हैं. हक्कानी और हुडबॉय व्यंग्य से टिप्पणी करते हैं.

    तीन घटनाओं पर बात करना आवश्यक है. पहला, कोलकाता में तारेक के कार्यक्रम को रद्द करना, जहाँ सरकार ने अपना पल्ला झाड लिया कि रद्द करने का निर्णय क्लब का निजी निर्णय था, दूसरा, पंजाब विवि में तारेक पर हमला, जहाँ यह तर्क दिया गया कि उन्होंने स्थानीय छात्रों को अपने वक्तव्य और देहभाषा से उकसाया, और तीसरा, जश्न ए रेख्ता कार्यक्रम में दिल्ली में उनका बेजा घेराव व मैनहैण्डलिंग.

    इन घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं आनी चाहिए थी. तारेक पर हमले की आलोचना होनी चाहिए थी. तारेक का लाउड होना भी यह मौका मुहैया नहीं करा सकता कि आप मुर्दा चुप्पी रखें. तारेक जितना कहते हैं और जैसे कहते हैं, उससे अधिक और उससे अधिक खतरनाक वक्तव्यों व दृष्टिकोण के लिए हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तर्क देते रहे हैं.

    आप बौद्धिक अभिव्यक्ति को यूँ वर्गीकृत नहीं कर सकते. मेरा तेरा. मेरा सोना तेरा पत्थर.

    मैं हमेशा यह सोचता हूँ कि बौद्धिकता हर प्रतिगामिता पर अपनी जुबान खोलेगी. मैं उम्मीद रखता हूँ.


    Credits: Facebook wall of Shayak Alok

  • शिवरात्रि का बोध उत्सव

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

     

    मित्रो, फ़ेसबुक पर बहुत तीखी बहसें की हैं। टिप्पणियां की हैं। आपको बहुत बार बुरा भी लगा होगा। किसी ने गाली दी, किसी ने सलाह दी और किसी ने नेकनीयती से लिखने को कहा। किसी ने कहा कि मैं तटस्थ होकर रहूं और किसी हितचिंतक ने परामर्श दिया कि मुझे निष्पक्षता से काम लेना चाहिए।

    मैथ्स का छात्र रहा हूं। इसलिए माना कि से ही काम चलाता हूं। माना कि आप ऐसे हैं, माना कि आप वैसे हैं। लेकिन मैथ्स ने यह भी सिखाया है कि इति सिद्धम या क्यूईडी तभी होता है जब हम दो या तीन फार्मूलों से उस माना कि को सिद्ध कर लें। बीज गणित हो या अंकगणित या त्रिकोणमिति।

    बहुत बार मैंने लिखा भी है कि मेरी वह मान्यता है, जो आप सबसे विचार करने के बाद बनेगी। अभी जो लिख रहा हूं या कह रहा हूं, वह मेरी मान्यता नहीं है। यानी सब तर्क-वितर्क और तथ्य जान लेने के बाद हम जो फ़ैसला करते हैं, वही मान्य होना चाहिए। सिद्धांत भी यही है। विज्ञान भी यही सिखाता है।

    हमें लॉ की क्लास में त्यागी जी कई बार एक जज का किस्सा सुनाते थे। एक महिला बोली : जज साहब, जब मेरी खिलाफ पार्टी के वकील साहब बोले तो आपने कहा, यू आर राइट, जब मेरा वकील बोला तो आपने कहा, यू आर राइट। ये भला कोई कोई न्याय की बात हुई जजसाहब? जज बोले : यू आर आल्सो राइट!

    फ़ेसबुक पर इतनी लंबी बहस और इतनी तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगता है कि मंथन एक निष्कर्ष पर पहुंचा है। और वह निष्कर्ष यह है कि हमें ऐसे नए विकल्प तलाशने बंद करने चाहिए, जो जड़तावाद या यथास्थितिवाद को बढ़ाते हों। हमें अपने प्रतिपक्षी की राय को सुननाचाहिए। चाहे वह कितनी भी कड़वी हो। लेकिन हमें अपनी पार्टियों और उनके आचरण में सुधार की मांग करनी चाहिए।

    यह देश और समाज तब बढ़िया बनेगा, जब एक बेहतर बीजेपी, एक बेहतर कांग्रेस, एक बेहतर कम्युनिस्ट पार्टी, एक बेहतर समाजवादी पार्टी, एक बेहतर बसपा, बेहतर तृणमूल हमारे देश में होगी। आप अपनी नीति के अनुसार चलें, लेकिन ईमानदारी बरतें। पारदर्शिता रखें। सब आपस में एक मर्यादित भाषा में बहस करें। खुलकर बोलें और एक दूसरे से प्रेम रखें।

    यह देश बेहतर और ताकतवर तब बनेगा, जब हम अपने अतीत की गलतियों से सीखेंगे और अपने देश की मौजूदा प्रतिभाओं का, कलाकारों का, साहित्यकारों का, इतिहासकारों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा देश में बहुत पुरानी है। कोई आपके विचार का नहीं है, इसलिए आप उसे सांप्रदायिक या देशद्रोही घोषित कर दें, यह संकीर्णता आपका नहीं, इस देश का नुकसान करती है।

    हमारा देश, हमारी दुनिया और हमारी धरती माता इस समय भयावने खतरों से जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का अजगर जीभें लपलपा रहा है। यह मानव समुदाय के लिए एक बड़ा खतरा है। जनसंख्या अपार ढंग से बढ़ रही है। यह जल्द ही 9.5 बिलियन होने जा रही है और हमारी धरती माता सिर्फ़ और सिर्फ़ आठ बिलियन जनसंख्या को वहन करने की ही क्षमता रखती है।

    कृषि का संकट एक नया खतरा हो गया है। किसान डूबता जा रहा है। पर्यावरणीय, मानवीय और सरकारी फैसलों ने कृषि को ऐसे विकराल दौर में ला दिया है, जहां अन्न उत्पादन गिरने वाला है और जनसंख्या बढ़ने वाली है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति की गोद में अनचाहे ही हमें पटका जा रहा है। खेती का एरिया सिमटता जा रहा है।

    जल संकट एक और विकराल समस्या बनने जा रही है। पीने का जो पानी कभी पवित्र था और जिस शीतल जल के लिए हमारे बड़े-बुजुर्ग प्याऊ खोला करते थे, उस महान् संस्कृति को कार्पाेरेट कल्चर काल कवलित कर गई है और दूषित पानी सड़े हुए प्लास्टिक की दूषित बोतलों में बिक रहा है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस पानी के कारण आपको सबसे ज्यादा बीमारियां होने का डर फैलाया गया, उसका बोतलबंद विकल्प अब हमारे शहरों में अस्पतालों का एक जंगल खड़ा हो चुका है।

    और सबसे बड़ा और पांचवां खतरा यह है कि ऐसी बीमारियां दस्तक दे रही हैं, जिन पर इनसान जीवन भर की कमाई खर्च कर देता है, लेकिन फिर भी स्वस्थ नहीं हो पाता। हमारे विश्वविद्यालय विवादों में लाकर हमारे आत्मसंस्कारों की संस्कृति को विनाश की तरफ धकेला जा रहा है। विकल्प ये है कि हम अपनी महान् रवायतों को और संस्थानों को नष्ट नहीं होने दें, बल्कि उनमें कुछ खराबी है तो उसे दुरुस्त करके और बेहतर बनाएं।

    मित्रो, ये ऐसे ख़तरे हैं और इतने भयावने हैं कि इनका हल किसी कम्युनिस्ट पार्टी, किसी कांग्रेस, किसी आरएसएस, किसी तृणमूल, किसी बसपा, किसी आम आदमी, किसी अभियान, किसी एनजीओ, किसी सरकार या किसी जाति, किसी धर्म या किसी संस्कृति के पास नहीं है। किसी इस्लाम, किसी हिन्दू, किसी बौद्ध, किसी क्रिश्चियनिटी या किसी ताओइज्म के पास नहीं है।

    हल है, लेकिन सब मिलकर करें और एक कॉमन मानव समुदाय के हित को लेकर चलें तो। मिलकर लड़ें तो।

    ये सब दल, सब संस्कृतियां, सब धर्म और सब राजनीतिक दल और उनसे ऊपर के बहुतेरे संगठन, एक कालखंड में लोगों ने उस काल की समस्याओं को लेकर तैयार किए थे। अगर इस्लाम हल होता तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलिम ही मुसलिमों के आपसी संघर्ष में नहीं मारे जाते। ठीक ऐसा ही हिन्दुओं और ऐसा ही अन्य धर्मों के साथ हैं।

    मानव समुदाय को एक होकर ही आगे बढ़ना होगा। अब समय आ गया है कि हम जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्र के नाम पर लड़ना बंद करें। आज राष्ट्रीयतावाद भी एक नया खतरा बन गया है, क्योंकि जितनी भी समस्याएं हैं, उनकी विकरालता ऐसी है कि उनके सामने हमारे राष्ट्रों की क्षमता भी कमतर है। अब इस्लाम को हिंदुत्व के साथ अपनी सकारात्मकताआें के साथ कंधा मिलाकर चलना होगा और हिंदुत्व को इस्लाम के साथ। भारत को पाक के साथ और पाक को भारत के साथ।

    आपके समस्त विश्वास पवित्र और पावन हैं। आपके सब राष्ट्र महान हैं। आप उनका सम्मान करें, लेकिन धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक श्रेष्ठताओं के अहंकारों के विष को शिव की तरह पीकर अपने कंठ में स्थापित कर लें। नीलकंठ बनें। नीलकंठ की पूजा करनी है तो उसकी गगनचुंबी प्रतिमा नहीं बनाएं। धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं करें। धर्म का कार्पोरेटाइजेशन नहीं करें। धर्म को धर्म रहने दें।उस धन को अशिक्षा, गरीबी, दु:ख, तकलीफ़, पिछड़ापन, गुरबत, भेदभाव, अत्याचार और जुल्मोसितम मिटाने के लिए खर्च करें। यही सच्चा शिवत्व है। बाबा लोग जो मूर्तियां बना रहे हैं, वह शिवत्व नहीं है। वह शिवत्व का अपमान है।


    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall

  • बासी पुर्जे

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    अपनी कविताओं के लिए अजूबे बिम्ब ढूंढती उस लड़की से मैंने एक दिन कहा कि देहराग में डूबा एक प्रेम-सना बिम्ब मेरी ओर भी भी उछाल दो तो उसने कहा कि मेरी जंघाओं के संधिस्थल पर तुम अपना मस्तक रखो और मैं तुम्हें जन्म दूंगी ..

    ***

    उसने कविताओं को एक क्षण को विराम कहा और मेरी आँखों में अपनी आँखें उतारते हुए पूछा- और तुम्हारे पास मेरी ओर उछालने को कौन सा बिम्ब है .. मैंने कहा, मैं तरबूज के लाल तिकोन टुकड़े से तुम्हारी नाभि के ग्यारह गोल चक्कर लगाऊंगा ..

    ***

    उसकी नाभि का वह मेरा ग्यारहवां चक्कर था जब उसने भूख की बात की .. फिर मैं अपनी कविता में आग और चुल्हा ले आया, वह ले आई अपनी कविता में स्वर्ण-चमकते गेहूं से भरा खेत ..

    ***

    भूख मिट गई थी जब वह अपनी कुछ पुरानी कविताएं निकाल लाई और उनके सारे बिम्बों पर नए शब्दों में पुनर्विचार करने लगी .. मैंने कहा कि लोकबिम्ब पर विचार करो तो पेट भरने के बाद बिस्तर को पीठ पर डाल आराम करना चाहिए.. वह मुस्कुराई .. कहा- और मेरी आत्मा की भूख का क्या ? .. मैं हँस पड़ा .. मैंने कहा कि यह कविता के बीच में तुम एक चलताऊ बिम्ब ले आई हो .. उसे तुरंत कोई दूसरा बिम्ब नहीं सूझा तो वह गुनगुनाने लगी – सूरज को धरती तरसे, धरती को चंद्रमा .. धरती को चंद्रमा ..

    ***

    पूर्णविराम से हम शुरू करेंगे अपना प्रेमालाप, तुम अपने दांतों से मेरी जीभ पर कोई निशान अंकित करना ..मैं अपनी चीख तुम्हारे कानो की दोनों बालियों पर टांग छोड़ दूंगा.. मेरी ऊँगली के पोर पर अटकी हवा जब तुम्हारे गर्दन पर से गुजरेगी, तुम गुनगुना पड़ना और तुम्हारे गले में घुटी रह गयी इस्स-इस्स-सिसकी मैं तुम्हारे अधरों तक खिंच लूँगा.. | … इसी एक ठहरे हुए पल मैं अपनी आँखों से तुम्हारी आँखों को कहूँगा कि इस प्रेमालाप में आये पहले लौटते अर्द्धविराम पर ही फिर जीभ तुम्हारी होगी .. और दांत मेरे …

    ***

    मेरी हथेली की दो समानांतर रेखाओं के बीच जहाँ तुम अपने अधर छोड़ गयी थी न वहीं एक त्रिभुज उग आया है… उस त्रिभुज की किसी तीसरी दीवार के किसी एक कोने में एक जो सुरंग खाली रह गयी थी न वहीं उसी मुहाने पर दीवार से अपनी पीठ सटा मैं बैठ गया हूँ…सुरंग में जब जब निर्वात बनता है मैं जोर से तुम्हारा नाम पुकार लेता हूँ और तुम्हारी खुशबू से सुरंग भर आती है…जिस दिन तुम भी जोर से पुकार लोगी मेरा नाम उस दिन तुम्हारी गंध मेरी हथेलियों से आने लगेगी …

    ***

    वह जो तुम्हारी पेंटिंग में बर्फ का पहाड़ था, पिघल गया है…पहाड़ के पीछे का ललमुँहा सूरज माथे पर बरस रहा है…तुम्हारी चिट्ठियों पर चीनी के दाने हैं, चीटियाँ सदियों तक यहीं जीने मरने के गीत गायेंगी .. रुमाल पर रखे तुम्हारे बासी लब पर पिछली रात फफूंद उग आये..और मैं.. मैं और मेरी उबासी अब तक खूंटी से टंगे हैं. लौट सको तो ठीक वरना गुजरती हवा के बैरंग से अपनी ज़रा गंध भेजना.

    .

     

  • “इन्तजार”

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    1.

    सह लूँगा
    तुम्हारी हर आलोचना
    गालियाँ भी ….
    आखिर इनके बीच जल कर ही तो
    फिनिक्स की तरह,
    जन्म लूँगा ….. !!
    इन्तजार करना बस !! 

    2.

    ज़िन्दगी की चक्की में
    खुद को इतना पीस दिया
    कि, ‘सच’, कुछ खोते चले गए
    बस कर रहा अब इन्तजार
    पिसने के बाद पाने का….

    3.

    मेरी राख पर
    जब पनपेगा गुलाब
    तब ‘सिर्फ तुम’ समझ लेना
    प्रेम के फूल !!
    इन्तजार करूँगा सिंचित होने का

    .

  • शिवरात्रि का बोध उत्सव

    त्रिभुवन

    [themify_hr color=”red”]

     

    मित्रो, फ़ेसबुक पर बहुत तीखी बहसें की हैं। टिप्पणियां की हैं। आपको बहुत बार बुरा भी लगा होगा। किसी ने गाली दी, किसी ने सलाह दी और किसी ने नेकनीयती से लिखने को कहा। किसी ने कहा कि मैं तटस्थ होकर रहूं और किसी हितचिंतक ने परामर्श दिया कि मुझे निष्पक्षता से काम लेना चाहिए।

    मैथ्स का छात्र रहा हूं। इसलिए माना कि से ही काम चलाता हूं। माना कि आप ऐसे हैं, माना कि आप वैसे हैं। लेकिन मैथ्स ने यह भी सिखाया है कि इति सिद्धम या क्यूईडी तभी होता है जब हम दो या तीन फार्मूलों से उस माना कि को सिद्ध कर लें। बीज गणित हो या अंकगणित या त्रिकोणमिति।

    बहुत बार मैंने लिखा भी है कि मेरी वह मान्यता है, जो आप सबसे विचार करने के बाद बनेगी। अभी जो लिख रहा हूं या कह रहा हूं, वह मेरी मान्यता नहीं है। यानी सब तर्क-वितर्क और तथ्य जान लेने के बाद हम जो फ़ैसला करते हैं, वही मान्य होना चाहिए। सिद्धांत भी यही है। विज्ञान भी यही सिखाता है।

    हमें लॉ की क्लास में त्यागी जी कई बार एक जज का किस्सा सुनाते थे। एक महिला बोली : जज साहब, जब मेरी खिलाफ पार्टी के वकील साहब बोले तो आपने कहा, यू आर राइट, जब मेरा वकील बोला तो आपने कहा, यू आर राइट। ये भला कोई कोई न्याय की बात हुई जजसाहब? जज बोले : यू आर आल्सो राइट!

    फ़ेसबुक पर इतनी लंबी बहस और इतनी तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगता है कि मंथन एक निष्कर्ष पर पहुंचा है। और वह निष्कर्ष यह है कि हमें ऐसे नए विकल्प तलाशने बंद करने चाहिए, जो जड़तावाद या यथास्थितिवाद को बढ़ाते हों। हमें अपने प्रतिपक्षी की राय को सुननाचाहिए। चाहे वह कितनी भी कड़वी हो। लेकिन हमें अपनी पार्टियों और उनके आचरण में सुधार की मांग करनी चाहिए।

    यह देश और समाज तब बढ़िया बनेगा, जब एक बेहतर बीजेपी, एक बेहतर कांग्रेस, एक बेहतर कम्युनिस्ट पार्टी, एक बेहतर समाजवादी पार्टी, एक बेहतर बसपा, बेहतर तृणमूल हमारे देश में होगी। आप अपनी नीति के अनुसार चलें, लेकिन ईमानदारी बरतें। पारदर्शिता रखें। सब आपस में एक मर्यादित भाषा में बहस करें। खुलकर बोलें और एक दूसरे से प्रेम रखें।

    यह देश बेहतर और ताकतवर तब बनेगा, जब हम अपने अतीत की गलतियों से सीखेंगे और अपने देश की मौजूदा प्रतिभाओं का, कलाकारों का, साहित्यकारों का, इतिहासकारों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा देश में बहुत पुरानी है। कोई आपके विचार का नहीं है, इसलिए आप उसे सांप्रदायिक या देशद्रोही घोषित कर दें, यह संकीर्णता आपका नहीं, इस देश का नुकसान करती है।

    हमारा देश, हमारी दुनिया और हमारी धरती माता इस समय भयावने खतरों से जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का अजगर जीभें लपलपा रहा है। यह मानव समुदाय के लिए एक बड़ा खतरा है। जनसंख्या अपार ढंग से बढ़ रही है। यह जल्द ही 9.5 बिलियन होने जा रही है और हमारी धरती माता सिर्फ़ और सिर्फ़ आठ बिलियन जनसंख्या को वहन करने की ही क्षमता रखती है।

    कृषि का संकट एक नया खतरा हो गया है। किसान डूबता जा रहा है। पर्यावरणीय, मानवीय और सरकारी फैसलों ने कृषि को ऐसे विकराल दौर में ला दिया है, जहां अन्न उत्पादन गिरने वाला है और जनसंख्या बढ़ने वाली है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति की गोद में अनचाहे ही हमें पटका जा रहा है। खेती का एरिया सिमटता जा रहा है।

    जल संकट एक और विकराल समस्या बनने जा रही है। पीने का जो पानी कभी पवित्र था और जिस शीतल जल के लिए हमारे बड़े-बुजुर्ग प्याऊ खोला करते थे, उस महान् संस्कृति को कार्पाेरेट कल्चर काल कवलित कर गई है और दूषित पानी सड़े हुए प्लास्टिक की दूषित बोतलों में बिक रहा है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस पानी के कारण आपको सबसे ज्यादा बीमारियां होने का डर फैलाया गया, उसका बोतलबंद विकल्प अब हमारे शहरों में अस्पतालों का एक जंगल खड़ा हो चुका है।

    और सबसे बड़ा और पांचवां खतरा यह है कि ऐसी बीमारियां दस्तक दे रही हैं, जिन पर इनसान जीवन भर की कमाई खर्च कर देता है, लेकिन फिर भी स्वस्थ नहीं हो पाता। हमारे विश्वविद्यालय विवादों में लाकर हमारे आत्मसंस्कारों की संस्कृति को विनाश की तरफ धकेला जा रहा है। विकल्प ये है कि हम अपनी महान् रवायतों को और संस्थानों को नष्ट नहीं होने दें, बल्कि उनमें कुछ खराबी है तो उसे दुरुस्त करके और बेहतर बनाएं।

    मित्रो, ये ऐसे ख़तरे हैं और इतने भयावने हैं कि इनका हल किसी कम्युनिस्ट पार्टी, किसी कांग्रेस, किसी आरएसएस, किसी तृणमूल, किसी बसपा, किसी आम आदमी, किसी अभियान, किसी एनजीओ, किसी सरकार या किसी जाति, किसी धर्म या किसी संस्कृति के पास नहीं है। किसी इस्लाम, किसी हिन्दू, किसी बौद्ध, किसी क्रिश्चियनिटी या किसी ताओइज्म के पास नहीं है।

    हल है, लेकिन सब मिलकर करें और एक कॉमन मानव समुदाय के हित को लेकर चलें तो। मिलकर लड़ें तो।

    ये सब दल, सब संस्कृतियां, सब धर्म और सब राजनीतिक दल और उनसे ऊपर के बहुतेरे संगठन, एक कालखंड में लोगों ने उस काल की समस्याओं को लेकर तैयार किए थे। अगर इस्लाम हल होता तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलिम ही मुसलिमों के आपसी संघर्ष में नहीं मारे जाते। ठीक ऐसा ही हिन्दुओं और ऐसा ही अन्य धर्मों के साथ हैं।

    मानव समुदाय को एक होकर ही आगे बढ़ना होगा। अब समय आ गया है कि हम जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्र के नाम पर लड़ना बंद करें। आज राष्ट्रीयतावाद भी एक नया खतरा बन गया है, क्योंकि जितनी भी समस्याएं हैं, उनकी विकरालता ऐसी है कि उनके सामने हमारे राष्ट्रों की क्षमता भी कमतर है। अब इस्लाम को हिंदुत्व के साथ अपनी सकारात्मकताआें के साथ कंधा मिलाकर चलना होगा और हिंदुत्व को इस्लाम के साथ। भारत को पाक के साथ और पाक को भारत के साथ।

    आपके समस्त विश्वास पवित्र और पावन हैं। आपके सब राष्ट्र महान हैं। आप उनका सम्मान करें, लेकिन धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक श्रेष्ठताओं के अहंकारों के विष को शिव की तरह पीकर अपने कंठ में स्थापित कर लें। नीलकंठ बनें। नीलकंठ की पूजा करनी है तो उसकी गगनचुंबी प्रतिमा नहीं बनाएं। धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं करें। धर्म का कार्पोरेटाइजेशन नहीं करें। धर्म को धर्म रहने दें।उस धन को अशिक्षा, गरीबी, दु:ख, तकलीफ़, पिछड़ापन, गुरबत, भेदभाव, अत्याचार और जुल्मोसितम मिटाने के लिए खर्च करें। यही सच्चा शिवत्व है। बाबा लोग जो मूर्तियां बना रहे हैं, वह शिवत्व नहीं है। वह शिवत्व का अपमान है।


    फेसबुक वाल से साभार