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  • हिंदू महिला बनाम मुस्लिम महिला :: हमारे दोहरे मानदंड

    Tribhuvan


     

    मैं और पूनम रात को “आजतक” पर श्वेतासिंह की रिपोर्ट देख रहे थे। सात मुस्लिम औरतों की कहानी, जो तीन तलाक से पीड़ित हैं।

    भारतीय मुस्लिम महिलाएं जिस कदर पीड़ित हैं, वह पीड़ा बहुत चिंताजनक है और इस समय सर्वाेच्च प्राथमिकता से समाधान की मांग करती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। मुस्लिम समाज को अपने भीतर की ऐसी कालिख को खुद आगे बढ़कर धो-पौंछ डालना चाहिए। वक़्त की चाल और ज़माने की नज़ाकत को समझना चाहिए। वक़्त की मार बहुत ख़तरनाक़ होती है। जो इसे नहीं समझता, वह अगर तलवार से बच जाता है तो फूल से कटना पड़ता है।

    लेकिन . . .
    मैंने कभी नहीं देखा कि श्वेतासिंह ने इस दौर में यह रिपोर्ट भी की हो कि हमारे देश में हर साल 7646 तरुणियों को दहेज-हत्या की बलिवेदी पर बलिदान कर दिया जाता है। तलाक के बहाने छोड़ देना, सताना, ज़ुल्मो सितम करना और अमानुषिक प्रताड़नाएं देना श्वेतासिंह जैसी मेधावी एंकरों के लिए शायद मानीं नहीं रखता। कदाचित इसलिए कि तलाक़-तलाक़ और तलाक़ किसी महिला के लिए दहेज लोभियों के हाथों हत्याएं कर देने से तो कम ही बुरा है।

    यह तो हमारी नैतिकता है। यह हमारा मानदंड है। श्वेतासिंह जैसी तेजस्वी बहनों की यह तो विवेकशीलता है!

    यह आंकड़ा कदाचित् श्वेतासिंह को शायद नहीं चौंकाता, लेकिन घर बैठी मेरी पत्नी को ज़रूर चिंतित करता है कि इस देश के हिन्दू समाज में पति और रिश्तेदार हर साल 1,13,548 युवतियों को क्रूरतापूर्ण ढंग से घरों से बेदखल कर देते हैं। उन्हें सताते हैं और ज़ुल्मोसितम ढाते हैं।

    ये अत्याचार ठीक वैसे ही हैं, जैसे मुस्लिम औरतों के साथ उनके पति करते हैं। छल-कपट और धोखा। इन अत्याचारों की कहानी बहन श्वेतासिंह अपने चैनल पर बहुत नफ़ासत भरे शब्दों में चबा-चबाकर बता रही थीं।

    हमने तथ्यों को देखना शुरू किया और काफी कुछ खंगाल डाला। दहेज हत्याएं हाें, बलात्कार हों या स्त्री की मर्यादाओं को धूल धूसरित करना। हे भगवान्। ऐसा भयावह सच और ऐसी भयावनी चुप्पियां! लेकिन दहेज हत्याओं] रिश्तेदारों से प्रताड़ित हिंदू लड़कियों अौर उनकी मर्यादाओं को तार-तार कर देने वाले ये आंकड़े न तो राष्ट्रद्रोही जेएनयू से आए हैं और न ही किसी गद्दार अलीगढ़ विश्वविद्यालय से जारी हुए हैं।

    ये आंकड़े 2015 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हैं और इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले देश के मेधावी आईपीएस ऑफिसर हैं। इनमें मुसलमान तो न के बराबर हैं। सबके सब हिन्दू हैं। तन-मन और प्राण से।

    अगर हम थोड़ी सी संवेदनशीलता से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पढ़ें तो यह आंकड़ा रुला देता है कि हमारे महान् स्त्री मर्यादा वाले देश में हर साल 34,676 युवतियों से रेप होते हैं।

    मैं जाना नहीं चाहता, लेकिन इसके भीतर नग्न सत्य से अवगत होना शुरू करूं तो पीड़ित बहनें और बेटियां भी हिन्दू ही हैं और उत्पीड़क राक्षस का वैसे तो कोई धर्म होता नहीं, लेकिन जिस तरह आजकल लोग नामों से पहचान करते हैं तो मैं कहना चाहूंगा कि इनमें गैरहिन्दू एक या दो प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं।

    तीन तलाक एक ऐसा जख्म है, जो न केवल मरहम मांग रहा है, बल्कि एक बड़े चीरफाड़ की चाहत भी रखता है, लेकिन साहब आप जो इतने सुसंस्कृतिवादी बने फिरते हैं, अपने घरों की हालत भी एक बार देख लो।

    आप जैसे गोभक्त हैं, वैसे ही आप स्त्री भक्त भी हैं। आप जैसे नारी को महान् बनाते आए हैं, वैसे ही गाय भी हमारे देश में महान् रही है। लेकिन हक़ीक़त पाखंड का पहाड़ है। इसे हर लाख साधु भी नहीं बदल सकते। एक दो की तो बात ही छोड़िए। अगर किसी ने कड़वाहट भरे सत्य आपके सामने रखे तो आप उस साधु को दूध में शीशा घिसकर दे देते हैं और एक सामाजिक क्रांति अधर में ही मर जाती है।

    मैं आज शाम जब प्रतापगढ़ से लौट रहा था तो हमारे तरुण फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित ने कुछ फ़ोटो करने के लिए हमें रुकने को कहा। उस रास्ते पर कोई दस गाएं मेरे पास से गुजरी होंगी, सबके देहों पर लाठियों, गंडासों और अन्य धारदार हथियारों के निशान थे। अंतड़ियां भूख से बाहर आ रही थीं। मानो, कह रही हों ये जीना भी कोई जीना है! शायद हमारे यहां इसीलिए कन्याओं की तुलना गऊ से की जाती है। दोनों की तकदीर है कि वह कसाई के घर जाए कि भूखों मार देने वाले किसान के कि किसी अच्छे परिवार के, जो दूध न भी दे तो खूब खिलाए-पिलाए और सेवा करे। यह कहानी अंदर तक झकझोर देती है।

    आप कानून बनाते हैं और कहते हैं कि गाय को उत्पीड़ित करने वाले को अब आजीवन करावास होगा। आपने ऐसे कानून स्त्री सुरक्षा के नाम पर एक नहीं, हजार बना रखे हैं। आपके यहां कितने ही तो आयोग हैं। पुलिस के महिला थाने हैं। कितनी ही आईपीएस हैं और कितनी ही महिलाएं सबल राजनीतिज्ञ हैं, लेकिन ज़मीनी हालात अब भी बहुत दारुण हैं।

    लेकिन अगर आप गाैरक्षा के लिए आजीवन कारावास का कानून बना रहे हैं तो क्या आप देश की बहन-बेटियों को सताने वाले दहेज लोभियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने का कानून पारित नहीं कर देना चाहिए?

    साहब, एक आंकड़ा है 2125 का।

    ये वे अभागी बेटियां-बहनें हैं, जिनसे हर साल गैंगरेप होता है। इनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू ही हैं और अपराधी 95 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू।

    कहां-कहां आंखें मूंदकर रखेंगी आप श्वेतासिंह।

    औरत को तीन तलाक और परित्यकता, देहज पीड़िता में मत बांटो।

    औरत औरत है। वह सृष्टि का सृजन करती है। उसकी सुरक्षा, संरक्षा और पोषण के लिए एक साथ एक जैसे कानून दो और अपराधियों के लिए एक जैसी सजाएं तय करो। उनमें मत देखो कि कौन हिन्दू और कौन मुसलमान।

    परित्यक्त करने वाले को भी आजीवन कारावास दो, दहेज लेने वाले को भी और तीन तलाक देने वाले को भी।

    हर आैरत को पिता और पति की संपत्ति में अधिकार दो। उसका पति बाहर कमाता है या नौकरीपेशा है और औरत नौकरीपेशा नहीं है तो उसके घर के कामकाज का एक पारिश्रमिक तय करो। पति की तनख्वाह का एक हिस्सा उसे मिले। यह प्रतिशत में ही होना चाहिए। क्या मुसलमान और क्या हिन्दू।

    हमारे ज़हन में न्याय नहीं है। हमारे ज़ेहन मेरी जाति महान, तेरी निकृष्ट और मेरा धर्म महान तेरा धर्म पतित वाली सोच से लबालब भरे हैं।

    अगर हम एक फ़ेयर आैर जस्ट सोसाइटी बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें संवेदनशील और सुसंस्कृत होना होगा। इसकी ज़रूरत महसूस करनी होगी।

    ऐसा नहीं हो सकता श्वेता सिंह कि आपके धर्म में तो कानून बन गया इसलिए दहेज के लिए हत्याओं की खबरों को नीचे पट्‌टी पर भी न चलाओ और तीन तलाक पर वन आवर का पूरा प्रोग्राम करके ऐसे साबित करो कि देखो, मुल्लो तुम्हारा कोई धर्म है! औरतों को घर से निकाल देते हो तलाक-तलाक-तलाक कहकर। देखो, हमारा महान् धर्म! हम हर साल 1 लाख 13 हज़ार 548 औरतों को घर से क्रूरतापूर्वक बेदखल करते हैं, 34 हजार 651 से बलात्कार जैसा पाशविक अपराध होता है, 82 हजार 800 आैरतों की शुचिता को तार-तार करते हैं और 7646 को जीवित जला डालते हैं, लेकिन हमारे यहां कानून बन चुके हैं और हम सबने आधुनिकतावादी सभ्य होने के समस्त सम्मोहक आवरण पहन लिए हैं, इसलिए हम इतना कुछ करके भी तुम अनपढों से बहुत सभ्य कहलाते हैं।

    लेकिन याद रखो कि एक फेयर और जस्ट साेसाइटी लोगों के चैतन्य से ही बन सकती है। कोई कानून, कोई अदालत, कोई दल, कोई धर्म, कोई जाति, कोई समुदाय, कोई आंदोलन, कोई मीडिया औरत के लिए तब तक एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण नहीं कर सकता जब तक कि लोगों के दिलोदिमाग की भूमियों पर न्यायशीलता, विवेकशीलता, समानता, स्वच्छता और निर्मलता की शस्यश्यामलता नहीं लहलहाएगी।

    यह धरती औरत के लिए रहने लायक तभी बनेगी जब आप बलात्कारी मानसिकता से ऊपर उठ जाएंगे और औरत पर किसी तरह की शुचिताओं का बोझ नहीं डाला जाएगा। पुरुष हिन्दू होकर कानून बना लेता है और औरत दग्ध हाेती रहती है। पुरुष इस्लाम और कुरआने-पाक की बात करता है, लेकिन वह औरत को बंदिनी तो बनाना चाहता है, लेकिन वे सब आज़ादियां और अधिकार देने से पीछे हट जाता है, जो कुरआन में दी जाती हैं, लेकिन सामाजिक रूप से पुरुष के खिलाफ़ पड़ती हैं। ठीक ऐसा ही चरित्र अन्य धर्मों का है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आज का अमेरिका है, जहां 46 राष्ट्रपति हो चुके हैं और 226 साल बीत चुके हैं, वहां लोकतंत्र आए, लेकिन मज़ाल कि किसी औरत को वह देश राष्ट्रपति बन लेने दे। दुनिया के इस सबसे ताकतवर देश में ऐसा व्यक्ति तो राष्ट्रपति बन सकता है, जो महिलाओं से याैन दुर्व्यवहार के लिए कुख्यात हो, लेकिन आर्थिक सदाचरण के मामले में थोड़ा संदिग्ध महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकती।


    Credits: Tribhuvan’s facebook wall.

  • ध्यान में सबसे बड़ी बाधा: आत्मा का सिद्धांत –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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    ध्यान एक ऐसा विषय है जिसके बारे में सबसे ज्यादा धुंध बनाकर रखी जाती है और पूरा प्रयास किया जाता है कि इस सरल सी चीज को न समझते हुए लोग भ्रमित रहें. इस भ्रम का जान बूझकर निर्माण किया जाता है ताकि कुछ लोगों संस्थाओं और वर्गों की संगठित दुकानदारी और सामाजिक नियंत्रण बेरोकटोक बना रहे.

    ध्यान को चेतना या होश के एक विषय की भाँती समझना एक आयाम है और ध्यान सहित अध्यात्म को एक मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र के उपकरण की तरह देखना दूसरा आयाम है. अक्सर एक आयाम में बात करने वाले दूसरे आयाम की बात नहीं करते लेकिन मैं दोनों की बातें करूंगा ताकि बात पूरी तरह साफ़ हो जाए.

    पहले हम ध्यान को उसके चेतना और होश वाले अर्थ में समझते हैं. असल में ध्यान का अर्थ शुद्धतम होश से है. ध्यान करना या ध्यान लगाना शब्द मूलतः गलत है और ‘ध्यानपूर्ण होना’ या ‘ध्यान में होना’ शब्द ही सही है लेकिन भाषा की मजबूरी है कि ‘ध्यान करना’ एक प्रचलन बन गया है. इस हद तक ‘ध्यान करने’ की सलाह की भाषागत विवशता को माफ़ किया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से मामला यहीं नहीं रुकता. जो परम्पराएं ध्यान फैलने ही नहीं देना चाहती और ध्यान के, होश के और तर्क के खिलाफ काल्पनिक इश्वर से याचना करते हुए ही जिनका जन्म हुआ है वे आजकल ध्यान की ठेकेदारी लेकर बैठ गयी हैं.

    इन शोषक और अन्धविश्वासी परम्पराओं से जब ध्यान की सबसे बड़ी प्रस्तावनाएँ आती हैं तब जरुरी हो जाता है कि उनकी प्रस्तावनाओं में छुपे षड्यंत्रों और विरोधाभासों की पोल खोली जाए.

    भारत में ध्यान की मौलिक प्रस्तावना श्रमणों (जैनों और बौद्धों) से आई है जो प्रार्थना और याचना की बजाय पुरुषार्थ और तर्कपूर्ण इंक्वाइरी में भरोसा रखते थे. इस प्रकार ध्यान ‘भौतिकवादी’ और ‘मनोवैज्ञानिकों’ की देन है. जिस क्रिया या अभ्यास को साधना या अध्यात्मिक अभ्यास कहकर बोझिल कर दिया गया है वह अपने क्षणभंगुर मन और सांत व्यक्तित्व के निष्पक्ष दर्शन के अलावा और कुछ भी नहीं है. इसमें एक वैज्ञानिक सी अप्रोच चाहिए जो अपने मन को प्रयोगशाला बनाकर उसमे हो रही उठा पटक को बिना निर्णय लिए बिना नाम दिए जानता रहे. इस तरह देखने जानने में समझ आता है कि हकीकत में घटनाओं, मन और व्यक्तित्व सहित जीवन और समय मात्र का भी कोई केंद्र नहीं है. सब कुछ संयोग है और सब कुछ और परिवर्तनशील है. ऐसे में अस्तित्व में खूंटे की तरह गाड़ दिए गये इश्वर की कल्पना भी एक मजाक भर है.

    यह भौतिकवाद की निष्पत्ति है. जैसे शरीर निरंतर वर्धमान है या क्षीण हो रहा है उसी तरह मन भी है, उसमे भी बाहरी संवेदनाएं और संस्कार प्रवेश कर रहे हैं और समय और परिस्थिति के अनुसार फलित हो रहे हैं. इस पूरे प्रवाह में आपके लिए करणीय इतना ही है कि इसे चुपचाप या तटस्थ होकर जानते रहें. यहाँ नोट करना चाहिए कि यह आतंरिक या मानसिक धरातल की तटस्थता है. सामाजिक और दुनियावी आयाम में इस तटस्थता का सीमित उपयोग ही हो सकता है.

    शरीर और मन सहित इनके समुच्चय अर्थात व्यक्तित्व को उसकी पूरी नग्नता में काम करते हुए देखना होता है. हमारी इंच इंच गतिविधि का पूरा होश हमें स्वयं होना चाहिए. जैसे अभी आप कुछ पढ़ रहे हैं, किसी कुर्सी पर बैठे हैं, पंखा चल रहा है, कोई गंध आ रही है, विचार चल रहे हैं, पैरों में जूते या चप्पल है, नाक पर चश्मा रखा है, कोई आवाज आ रही है, श्वास चल रही है कपड़ा बदन को छू रहा है पीठ से कुर्सी चिपकी है इत्यादि सारी घटनाओं को क्या आप एकसाथ इकट्ठे बिना विभाजन किये हुए जान सकते हैं? अगर हाँ तो यही ध्यान है.

    ऐसे सर्वग्राही होश के अर्थ में, ध्यान दुनिया की सबसे सरल चीज है. इसकी आन्तरिक संरचना भी बहुत सरल है. मूल रूप से इसकी केन्द्रीय प्रस्तावना इतनी ही है कि जो कुछ भी जानने में आता है वह क्षणभंगुर और संयोग या प्रवाह है उसे तूल देना और उससे बंधना या उसे किसी निर्णय के खांचे में बैठाना गलत है. अन्य परंपराएं आधी बात मानती हैं और आधी से डरती हैं. बुद्ध कहते हैं कि ज्ञान का विषय तो क्षणभंगुर है ही ज्ञाता भी क्षणभंगुर ही है, इनके बीच ज्ञान की जो ‘प्रक्रिया’ चल रही है वही असली है. उसका कोई केंद्र नहीं है.

    बुद्ध की यह प्रस्तावना ही ध्यान का सार है. और मूलतः यह अनत्ता की बात है. सरल शब्दों में इसका मतलब ये हुआ कि शरीर और मन सहित व्यक्तित्व भी समय के प्रवाह में एक संयोग की तरह उभरा है वह भी खो जाएगा. उसमे भविष्य या अतीत का प्रक्षेपण करना गलत है. अब जब शरीर मन के समुच्चय रूप इस व्यक्तित्व या आत्म का कोई ठोस अस्तित्व ही नहीं है तो इसके पहले और इसके बाद की अवस्था ही वास्तविक अवस्था हुई, मतलब ये कि इस शरीर और मन के संगठित होने या बनने के पहले की और इनके बिखर जाने के बाद की अवस्था ही वास्तविकता या सच्चाई है, और यह सच्चाई एकदम खालीपन या आकाश जैसी है.

    जैसे कमरे में कोई आया और घंटेभर बैठकर चला गया. ऐसे ही समय और आकाश के आंगन में आपका शरीर और मन आया और कुछ समय बाद चला गया. एक खालीपन में सब कुछ आया और चला गया. खालीपन ही बच रहा. यही खालीपन शून्य है. यही ध्यान या समाधी है.

    यह बहुत ही सरल बात है. फिर से देखिये, शरीर की एक एक संवेदना जब होश के घेरे में आ जाए, जब मन की एक एक संवेदना होश के घेरे में आ जाए तब होश एकदम से भभक उठता है. तब होश का कोई केंद्र नहीं होता और तब झूठा व्यक्तित्व या आत्म भी निरस्त हो जाता है तब समय का रेशा रेशा अनुभव होने लगता है. तब पहली बार पता चलता है कि समय भी होश के सामने बौना है और असल में समय बेहोशी में ही काम करता है. बेहोशी ही मन है और बेहोशी ही समय है. इसीलिये श्रमणों ने मन को ही समय कहा है. ये आप करके देख सकते हैं.

    अगर ऊपर बताये तरीके से आप सौ प्रतिशत संवेदनाओं को अभी एक क्षण में जान रहे हैं तो आप समय से या मन से एकदम आजाद हो जाते हैं. हालाँकि यह कहना गलत है कि आप आजाद हो जाते हैं, यह भाषा की दिक्कत है. असल में कहेंगे कि वहां आजादी की प्रक्रिया रह गयी. न कोई आजादी एक लक्ष्य रूप में है न कोई व्यक्ति आजादी के याचक के रूप में है.

    इस प्रक्रिया को एक अभ्यास के रूप में चरणबद्ध ढंग से लिया जा सकता है. जैसे बुद्ध श्वासों पर अवधान को ध्यान की शुरुआत बताते हैं. फिर श्वासों से होते हुए शरीर और मन की संवेदना पर जाते हैं उसके बाद संवेदना को जान रही आभासी सत्ता को भी निशाने पर लेते हैं. इस तरह एक निरंतर जागरूकता का बढ़ता हुआ दायरा बना रहता है. इस होश की अवस्था में तत्काल ही शरीर मन और समय से दूरी बन जाती है.

    यह तत्काल ही मुक्त करने लगता है भविष्य में किसी एकमुश्त निर्वाण की कोई आवश्यकता नहीं, वह होता भी नहीं. अभी आप जितने होशपूर्ण हैं उतने ही आप निर्वाण में हैं. पूरा होश पूरा निर्वाण है. यह अभी इसी जगत की बात है, इसका परलोक और विदेह मुक्ति जैसी मूर्खताओं से कोई संबंध नहीं. इसे अभी आप करके देख सकते हैं. आप हिसाब किताब और योजनाओं के बोझ में जितने दबे हैं उतने डिप्रेशन और तनाव में होंगे यही बंधन है. आप जितने निर्विचार और आकाश की तरह होंगे उतने क्रिएटिव होंगे उतने आजाद होंगे, ये तत्काल मुक्ति है.

    अब आते हैं इसके सामाजिक नियंत्रण वाले पक्ष पर. जैसा ऊपर मैंने लिखा कि कुछ ईश्वरवादी याचक और प्रार्थना वाली संस्कृतियाँ भी रही हैं जो वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ओबजर्वेशन में नहीं बल्कि किसी काल्पनिक इश्वर की शक्ति आशीर्वाद समर्पण और शरणागती आदि आदि में भरोसा रखती हैं. अब तो श्रमण धर्म भी इन्ही के एक रूप में बदल गये हैं. बुद्ध और महावीर भी पूजे जाते हैं. https://www.methanol.org/ modafinil prescription online reddit ये गलत है. ऐसी याचक परम्पराओं को ब्राह्मण पोअर्न्प्रा कहा गया है. ये श्रमणों से विपरीत परम्परा है.

    यह असल में ज्ञान या विज्ञान की परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण की राजनीति है. यह श्रमणों द्वारा निर्मित ज्ञान का इस्तेमाल समाज को कंट्रोल करने में करती है और होशियारी से अपनी चालबाजियों सहित सृष्टि जीवन और जगत के केंद्र में एक काल्पनिक इश्वर और आत्मा को बैठा देती है. इनमे से और जहरीली परम्पराएं हैं जो इनसे भी आगे बढ़कर पुनर्जन्म की भी बातें करती हैं.

    अब ऐसी परम्पराओं के ध्यान की प्रस्तावना पर आइये. ये कहते हैं कि एक विशुद्ध और निर्लिप्त आत्मा होती है जो शरीर मन और विचारों से परे होती है. जब शरीर मन और विचार सहित संस्कारों की परछाई पीछे छुट जाती है तब यह आत्मा स्वयं को जानती है. इसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं. कुछ परंपरायें इसे ही अंतिम बताती हैं और कुछ इससे आगे जाकर परमात्मा को भी खड़ा करती हैं और उसके आधार पर एक और बड़ी राजनीति खेलती हैं. हालाँकि इनकी तथाकथित ‘आत्मसाक्षात्कार’ की टेक्नोलोजी वही है जो श्रमण बुद्ध ने बताई है. लेकिन वे बुद्ध का नाम नहीं लेते.

    बुद्ध के अनुसार शरीर और मन सहित विचार और संस्कार और स्वयं समय भी एक संयोग है इसलिए क्षणभंगुर है इसलिए उनकी कोई सत्ता नहीं है और इसीलिये खालीपन या सबकी अनुपस्थिति ही एकमात्र सच्चाई है. इसकी उपमा बुद्ध ने शुन्य और आकाश से दी है. इस आकाश को चिदाकाश और ओमाकाश और न जाने क्या क्या नाम देकर वेदान्तियों ने अपना जाल फैलाया है.

    अब मजा ये कि इसी आकाश भाव की प्रशंसा ब्राह्मणी और ईश्वरवादी परम्पराएं भी करती हैं लेकिन बड़ी चतुराई से इसे आकाश या शुन्य न कहकर आत्मा और परमात्मा का नाम दे देते हैं. फिर कहते हैं कि आत्मा सनातन होती है. अनंतकाल की स्मृति लिए वह एक से दुसरे गर्भ में घुमती रहती है जब तक कि सारी स्मृतियों और संस्कारों से मुक्त न हो जाए. अब यहाँ खेल देखिये. अगर आपका एक आत्मा के रूप में ठोस अस्तित्व है और आपका लाखों वर्ष का अतीत है जो कभी डिलीट नहीं किया जा सकता तो मुक्ति या आजादी का क्या अर्थ हुआ? तब आप लाखों वर्षों में बने हुए मन के बोझ से कैसे बच सकेंगे? और बचने की प्रक्रिया के दौरान जो कर्म हो रहे हैं उनका हिसाब कब होगा?

    इतनी बड़ी हार्ड डिस्क में इतनी मेमोरी को मेनेज करने के लिए तब एक सुपर कम्प्यूटर की कल्पना करनी पड़ती है. उस सुपर कम्प्यूटर को इश्वर कहा जाता है, जिसके बारे में ये दावा है कि वो गूगल बाबा की तरह सबकुछ जानता है सबकी मेमोरी रोज स्केन करता है और अपना निर्णय भी देता है. इस तरह ये हार्ड डिस्क स्वयं (अर्थात एक आदमी या व्यक्तित्व या आत्मा) एक जीता जागता केंद्र है जिसका अपना ठोस ‘स्व’ है और अतीत और भविष्य है और उसके बाद ये सज्जन हैं जो इश्वर कहलाते हैं ये भी अनंत से अनंत तक फैले हैं और फैसला करते हैं. अब ये दो केंद्र हैं.

    पहली दिक्कत ये कि पहला केंद्र अर्थात आत्मा भी सनातन है और न मिटाई जा सकती है न जलाई जा सकती न सुखाई जा सकती है. ऐसे में उसका एक ठोस अस्तित्व हुआ जिसमे बसी हुई स्मृतियाँ भी ठोस हो गईं जिन्हें अन्कीया या डिलीट करने के लिए ध्यान करना है. ऐसी परम्पराओं का ध्यान असल में उनकी सांसारिक याचना का ही आंतरिक और मानसिक अभ्यास होता है. जैसे ये बाहर याचना करते हैं वैसे ही भीतर भी इश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी हार्ड डिस्क की मेमोरी उड़ा दे या डिस्क फोर्मेट कर दे. इसी को मुक्ति कहते हैं. अब एक और मजा देखिये ये हार्ड डिस्क पूरी तरह संस्कारों स्मृतियों और अस्मिता से मुक्त होने के बावजूद एक व्यक्तिव की तरह मुक्ति को अनुभव करती है. ये बड़ी गजब की जलेबी है जो सिर्फ ब्राह्मणी सिद्धांतकार ही बना सकते हैं.

    आत्मा मुक्त होकर भी एक व्यक्ति के रूप में मुक्ति का आनन्द भोगती है और परमात्मा भी वहीं बगल में जमे रहते हैं. मतलब कि दो केंद्र जो पहले थे वे अब भी उसी ठसक के साथ बने हुए हैं और मुक्ति या आजादी भी घटित हो गयी. ये गजब की जलेबी है.

    हालाँकि ब्राह्मणी परंपरा भी उपर उपर ये जरुर कहती है कि ‘मैं और मेरे’ से या आत्मभाव से मुक्ति ही मुक्ति है. लेकिन ऐसी श्रमण अर्थ की भौतिकवादी मुक्ति की सलाह और टेक्नोलोजी को चुराते हुए भी वे आत्मा को जमीन में खूंटे की तरह स्थिर रखते हैं. जबकि बुद्ध कहते हैं कि आपके व्यक्तिव या स्थाई मन या शरीर जैसा कुछ नहीं है. थोड़ा विश्राम लेकर इसे देख समझ लो. मन को देखो शरीर को देखो कि कैसे रोज बदलता है. इस तरह एक केंद्र का आभास सहज ही टूट जाता है. यही आजादी है या निर्वाण है जो होश के साथ रोज इंच इंच बढ़ता है.

    लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हमारे आसपास के लोग ब्राह्मणी धारणा के प्रभाव में आत्मा और परमात्मा को सनातन मानते हैं और आँख बंद करके इस आत्मा और परमात्मा को खोजते हैं. एक खालीपन या अनुपस्थिति की तरफ ले जाने वाली कोई भी विधि उनपर काम नहीं करती क्योंकि दो दो सनातन सांड उनके मन में दंगल कर रहे होते हैं. इन सांडों को लड़ाने वाली परंपरा भी अंतिम रूप से यही कहती है कि अंत में आत्मा परमात्मा नहीं बल्कि कोरा निराकार बच रहता है वही परम समाधान है.

    लेकिन वहां तक जाने की पहली शर्त ही वे पूरी नहीं होने देते और निराकार की बजाय दो दो आकारों में और लाखों साल के अतीत और भविष्य में इस तरह उलझाते हैं कि आदमी आँख बंद करके निरंतर बदलते शरीर और मन की क्षणभंगुरता की बजाय इन दो सनातन केंद्र को खोजने लगता है.

    इस तरह ब्राह्मणी परंपरा जो ध्यान की जो विधि सिखाती है और इसका जो लक्ष्य बताती है उनमे भारी विरोध है. आत्मा को सनातन बताती है और आत्मभाव से मुक्त होने को मुक्ति बताती है. अब अगर आत्मा सनातन है तो आत्मभाव भी सनातन ही हुआ ना? उससे कैसे छुटकारा होगा? इसी उलझन को कम करने के लिए वे काल्पनिक इश्वर को खड़ा करते हैं कि इसकी कृपा से सब हो जाएगा, श्रृद्धा रखो.

    बुद्ध कहते हैं कि ये दोनों सांड – आत्मा और परमात्मा हैं ही नहीं. शरीर मन और इनके समुच्चय रूप इस आभासी मैं की सत्ता भी निरंतर बदल रही है और इसे जानने वाला यह होश भी निरंतर बदल रहा है इस तरह एक बदलने वाली चीज दूसरी बदलने वाली चीज को जान रही है इसलिए कोई खूंटा या केंद्र है ही नहीं. इनके बीच में ज्ञान की प्रक्रिया चल रही है जो खुद भी बदलती जाती है. इसीलिये तटस्थता या उपेक्षा या आजादी संभव है. इस तरह बुद्ध को ठीक से समझें तो अनत्ता ही ध्यान है, यही शुन्य है और यही मन और शरीर को अपनी ही काल्पनिक कैद से आजाद और निर्भार करने वाली वास्तविक उपेक्षा या आजादी है.

  • अंत की शुरूआत

    Kumar Vikram

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    अंत में उसने कहा था
    कि अंत में सब ठीक हो जाएगा
    अंतत: सबक़ा भला होगा
    मैंने सोचा था
    अंत अंत में ही आएगा
    मुझे यह इल्म नहीं था
    कि अंत दरअसल
    एक रोज़ाना ख़बर थी
    और अंत अंत में नहीं
    बल्कि हर पल
    आने वाले अंत की
    एक बानगी दिखाता जाएगा
    शायद मेरी ही तरह
    उसे भी यह अंदाज़ा नहीं था
    कि वह जिस अंत की बात कर रहा था
    वह दरअसल अंत नहीं
    बल्कि अंत की सिर्फ़ शुरूआत थी।

     

  • जामुन का भूत

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    यह अजब कहानी है. कोई दलित मरा है तो उस दलित के मर कर भूत हो जाने की कहानी उसी वर्ग की तरफ से (कानी बुढ़िया) फैलाई गई है. (प्रतिरोध ने मिथक रच लिया है क्योंकि मिथक अंधाधुंध समर्थन के लिए मनोवैज्ञानिक काम करता है). और अब यह भूत सत्ता के सब प्रतीकों पर हमला कर रहा है. पहले उसने किसी प्रतीक में आर्थिक शोषण तंत्र (साहूकार) को पटका और फिर उसे पवित्र घोषित करने वाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था (राम नारायण पंडित) को, जिसका उससे नेक्सस है. यह नेक्सस न केवल आर्थिक शोषण तंत्र को धार्मिक नैतिकता प्रदान करने में है बल्कि ब्राह्मण वर्ग खुद भी सदियों से आर्थिक शोषण का प्रकट भागीदार है (उसके बाप के बाप ने). यह कविता फिर एक हमला उस विडंबना पर कर देती है जहाँ जिंदा नंगे भूखों का कोई महत्व नहीं, लेकिन मृत पत्थर प्रतीकों को किसी अलौकिक भय से पूजा जाता है (गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत हर शनिवार को खाता है बताशे ). विमर्श का उत्थान यह है कि अफवाह से उभारा गया यह नायक या यह प्रतिरोध केवल हमलों तक सीमित नहीं है बल्कि अपने शोषित वर्ग के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना भी करने लगा है. यह स्थापना उस वर्ग का भय दूर करने और उसे साहस देने में प्रकट है (नहीं डरती चंपा). और अंत में कविता चुनावी लोकतंत्र के संक्रमण पर हमला कर देती है जहाँ यह नग्न खुलासा कर देती है कि एक शोषित वर्ग के उभार के विरुद्ध सामाजिक-आर्थिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता के बीच एक गठजोड़ हो जाता है (भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए). मैंने यहाँ भारतीय संदर्भ का वास्तविक पाठ ही लिया है जहाँ शोषितों के किसी प्रतिरोध आंदोलन को शोषितों के विरुद्ध ही प्रस्तावित कर सरकारें उनके दमन का तर्क ढूंढती हैं. एक अजीब बात और हुई है कि प्रेमचंद की कई कहानियों के विवश व नैसर्गिक व सुरंग-बंद अंत की तरह यह कविता यूँही समाप्त नहीं होती और एक संभावना, एक रौशनी का संकेत देती है कि जामुन का भूत नया जामुन ढूंढ सकता है.

    [themify_hr color=”orange” width=”300px”]

    जामुन का भूत

    किसी गाँव में जब गोबर नाम का दलित मरा तो भूत हो गया
    तो वह भूत रहने लगा उसी गाँव के बँसवारी में
    पहलेपहल तो यह बात कानी बुढ़िया ने कही और
    फिर किस्से शुरू हो गए.

    एक दिन जब गोबर ने उठा पटक मारा बगल गाँव के सुखला साहूकार को
    और उसका बटुआ भी छीन लिया तब तो बड़ा हंगामा हुआ
    सुखला का गमछा पाया गया गाँव से दो कोस दूर
    ऐसा बिछा हुआ जैसे गोबर ही उस पर सुस्ताने दो दम मारा हो.

    तो तय यह पाया गया कि हाथ पैर जोड़ कर बुला लिया जाय रामनारायण पंडित को
    और खूब जोर से कच्चे धागे से बंधवा दिया जाए उस नासपीटे जामुन को
    जामुन जो बँसवारी का अकेला ऐसा पेड़ था जो बांस नहीं था.

    लेकिन उसी रोज रात में घटी एक और घटना
    ‘न देखा न सुना’ – कहती है रामजपन की माई भी
    बिशो सिंह के दरवाजे सत्तनारायण संपन्न करा के लौट रहे रामनारायण पंडित को
    बँसवारी के आगे धर दबोचा गोबर ने
    और ऐसा भूत मन्त्र मारा कि गूंगे हो गए बेचारे
    बोलते हैं तो सिर्फ चक्की के घिर्र घिर्र की आवाज़ आती है.

    कहते हैं कि गोबर के दोमुंहे पुराने घर थी ऐसी ही एक चक्की जो
    उसके बाप ने अपने बाप के श्राद्ध में रामनारायण को गिरवी बेचा था.

    खैर जामुन के भूत को बाँध दिया गया और गोबर से शांत रहने की प्रार्थना की गई.

    गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत
    हर शनिवार को खाता है बताशे
    कभी भूख बढ़ने पर जन्मते ही खा जाता है मवेशियों के बच्चे
    अपने साथी भूतों के भोज के लिए एक दिन जला डाला मुर्गों का दड़बा
    चबाई हड्डियाँ डोभे में फेंक दी.

    गोबर के भूत ने न्याय भी लाया है गाँव में
    मुंह अँधेरे अब शौच जाने से नहीं डरती चंपा
    हर महीने सरसतिया के जिस्म पर आने वाला भूत अब नहीं आता
    गुनगुनाते हुए बड़े दालान से गुजर लेती है अठोतरी.

    सुना है गोबर अन्य भूतों संग रोज रात को बँसवारी में करता है बैठकें
    हंसने और जोर जोर से बतियाने की आवाज़ आती है.

    टीवी पर जब से आई है गोबर की कहानी
    सरकार फिक्रमंद है आम जान माल को लेकर
    भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए
    इसलिए सेना निपटेगी उनसे लोकसभा चुनाव के पहले पहल.

    मजे में जी रहे जामुन के भूत को दूसरा जामुन ढूंढना होगा.

    .

  • समझदारों की समझ

    Bhanwar Meghwanshi
    संपादक – शून्यकाल

    [themify_hr color=”red”]

    एक सेकुलर ने
    दूसरे सेकुलर को
    सेकुलरिज्म समझाया
    दूसरे को समझ में आ गया
    हालाँकि दोनों ही
    पहले से समझे हुए थे ।

    एक लोकतंत्र समर्थक ने
    दूसरे जम्हूरियत पसन्द इंसान को
    डेमोक्रेसी पर सहमत किया
    सहमति बन गयी
    क्योकि उनमे पहले से ही
    सहमति थी ।

    एक साम्राज्यवाद विरोधी ने
    दूसरे फासीवाद विरोधी को
    इंक़लाब भेजा।
    लौट आया तुरंत ही
    इंक़लाब,
    इस तरह देर तक
    गूंजते रहे
    इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे ।

    एक साम्यवादी ने
    दूसरे समाजवादी से की बात
    बात समझ गए दोनों
    बात बन गई
    इस तरह चलती रही
    जीवन भर बातें ही बातें ।

    एक एक्टिविस्ट ने
    दूसरे ग्रासरूट वर्कर से
    साझा किया
    एक्शन प्लान,
    करने लगे वे
    मिल कर काम
    करने के सिवा उन्हें
    कुछ भी नहीं था पता
    इसलिए करते रहे
    जीवन भर काम ।

    एक से दस तक
    दस से पचास तक
    एक ,दो ,तीन दशक
    लगभग आधी सदी तक
    वे सब मिलते रहे
    आपस में,
    करते रहे बातें
    पिलाते रहे भाषण
    एक दूसरे को।

    बेहद समझदार लोग थे
    हद दर्जे के समझदार
    नासमझी की हद तक पहुंचे
    वे समझदार लोग।

    ताज़िन्दगी उन्होंने
    सहमत लोगों को
    और सहमत किया।
    समझे हुओं को
    और समझाया।

    फासीवाद,ब्रह्मनवाद,
    साम्राज्यवाद,अन्धराष्ट्रवाद
    अधिनायकवाद, धर्मनिरपेक्षवाद
    जैसे भारीभरकम शब्द
    अलापते रहे।

    जन के बीच गये ही नहीं
    पर जनता के नाम पर
    किये सारे काम ।

    अंततः
    ड्राईंग रूमो ,सभा ,सम्मेलनों,
    सेमिनारों ,अकादमिक बहसों ,रिसर्चों
    तक सिमट गए।

    फिर वे सिरे से सहमत,
    निरे समझदार लोग
    एक दिन इतिहास बन गए,
    उनके धुर विरोधी
    सत्ता पर काबिज़ हो गए।
    और उन्होंने इतिहास ही
    बदल डाला।
    इस तरह वे स्मृति शेष
    हो गए।

    समझदारों का यह खेल
    आज भी जारी है ।
    उन्हीं पचास लोगों को
    पचास लोगों द्वारा
    पचास वर्षों से
    पचास बातों के ज़रिये
    कन्विन्स किया जा रहा है।
    ऑलरेडी कन्विन्स लोग
    फिर से कन्विंस हो रहे है।

    अन्ततः जब सब समझे हुयों ने
    पहले से ही समझदारों को
    और भयंकर समझा दिया।
    तो जाहिर है कि
    सबको समझ में भी
    आ ही गया।

    हालाँकि जिनको समझना था
    वे आज तक नहीं समझे।
    जिन पर समझाने की
    ज़िम्मेदारी थी
    वे खुद नहीं समझ पाये
    कि समझाना क्या है ?
    तो क्या खाक समझाते वो?

    .

  • बूचड़खाने –

    25-30  साल पहले तक तो किसानों के लिए पशु-पालन कोई मुश्किल काम न था , पशुओं के लिए बड़े चारागाह छोड़े जाते थे, उसी में तालाब भी खुदवाएं जाते थे। पशु चरते, तालाब कीचड़ आदि में आराम फरमाते। दुधारू पशु समय पर अपने खूंटे तक भी पहुँचना समझते थे। किसान ने बाजारों से दूरी बनाई हुई थी। आपसी ताल मेल और निर्भरता इतनी बेहतर थी की मशीनरी आदि की जरुरत भी महसूस न होती थी।  खाने के लिए पैदा किया , पैदा कर के खाया यही क्रम चलता रहता था, पैदा भी जरूरत से बहुत ज्यादा नहीं किया जाता था।

    मुद्रा के बिना  लोगों का काम आराम से चलता रहता था , इन सब में खुद के लिए भी खूब समय बच जाता था लेकिन जिस समाज में बाज़ार  मेहनतकश और उत्पादक वर्ग के शोषण करने के लिए तैयार किया गया हो तो वह वर्ग इसकी चपेट में कैसे न आता। आपको शिक्षा, कपडे, भोजन , चिकित्सा , सुविधाएं आदि सब बाजार से खरीदना है। अगर यही सब आधुनिकता है तो किसान वर्ग क्यों न होड़ करता, आधुनिकता में वह क्यों न फँसता !

    आज की तारीख में घास के मैदान नहीं है, तालाब नाममात्र के बचे है। पशुपालन एक आदमी के दिन रात का काम है उन्हें पानी पिलाना होता है, चारे की व्यवस्था करनी होती है, दूध समय पर दुहना होता है आप किसी भी काम में नागा नहीं कर सकते। खल चौकर की व्यवस्था भी बाहर से ही करनी है। किसानों को खेती से पैसे हाथों हाथ नहीं मिलते उसके लिए फसल पकने व उसके बिकने तक का इंतजार करना होता है। दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वह दुधारू पशुओं पर निर्भर है जिनका दूध बेच कर उसे आय होती रहती है। पशुओं का और उसके परिवार के छोटे मोटे खर्च निकलते रहते है। मोटा मोटा इतना समझ लीजिए आज की तारीख में अगर आप 30-40 हजार की नौकरी करते है, शहर में रहते है आप एक गाय या भैंस जो दुधारू भी हो के रहने-खाने का खर्च नहीं उठा सकते।

    किसान भी जो पशु पुराने हो जाते है, दूध नहीं दे पाते , बीमार हो जाते है उन्हें निकालते रहना होता है। पशुओं की संख्या भी बढ़ती है जगह के हिसाब से उनकी संख्या भी मेंटेन करके रखनी होती है। कई बार अचानक किसी पारिवारिक जरूरत के लिए पशु बेचने होते है।

    अब आप बताइये एक किसान बूढ़े बीमार पशुओं का क्या करेगा, पैसे के बिना नए पशु कहाँ से खरीदेगा। ऐसा तो है नहीं की आप वापिस पुराने तौर तरीकों पर लौटने के लिए किसानों की मदद कर रहे हो। आपकी कोरी धार्मिक भावुकता, चूतियापे में तो पशुओ के रेट गिर जाते है, उन्हें ग्राहक नहीं मिलते लेकिन पहले से ही आधुनिक होने की छटपटाहट , बाजार से ताल मेल करने के सहर्ष में जुटे किसानों की इन क़दमों  से जो कमर टूटती है, मानसिक उत्पीड़न होता है वह क्या करे !

  • स्त्री मातृभूमि और राष्ट्रवाद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    [themify_hr color=”red”]

     

    स्त्री का माता
    माता का मातृभूमि
    और मातृभूमि का
    राष्ट्र बन जाना
    गजब की छलांग है ना?

    जैसे नथनी की नकेल चढ़ी नाक के नीचे
    अचानक मूंछें उग जाएँ
    खाप के ताऊ जैसी

    जैसे सिंदूर की लक्ष्मण रेखा के बराबर से
    अदृश्य सी सीमा खिंच जाए
    लाइन ऑफ़ कंट्रोल जैसी

    जैसे घूंघट के जीने पर्दे से सटकर
    कोई लंबी सी दीवार खड़ी हो जाये
    बर्लिन की दीवार जैसी

    स्त्री की माँ होने की
    या मातृभूमि की राष्ट्र होने की यात्रा
    क्या इसी ढंग से होनी जरूरी है?

    क्या स्त्री का माँ हो जाना
    और मातृभूमि का राष्ट्र बन जाना
    धर्म या भगवान रूपी पिता को
    स्त्री, माता और भूमि तीनों पर
    अतिरिक्त अधिकार नहीं दे देता?

    सच तो ये है कि एक स्त्री से
    उसके स्त्री होने का अधिकार छीनने के लिए ही
    मातृत्व और माँ की महिमा रची जाती है
    भूमि के आँचल पर दावा करने के लिए ही
    मातृभूमि और रक्षा के आदर्श रचे जाते हैं

    और इन आदर्शों को संरक्षण देने के लिए
    राष्ट्र और राष्ट्रवाद का अवतार धरे
    वही सनातन धूर्त – परमात्मा और धर्म
    बार बार साकार होते हैं

    स्त्री, माता और मातृभूमि
    तीनों को काबू रखने के लिए
    हर युग में, हर दौर में …

  • राष्ट्रवाद-देशभक्ति पर जुनून का झंझावत

    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay

    [themify_hr color=”red”]

     

    दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुए विवाद, जिसके चलते उमर खालिद को वहां इस आधार पर भाषण नहीं देने दिया गया कि उन्होंने राष्ट्र-विरोधी नारे लगाए थे, के बाद कई लोगों, जिनमें जानेमाने गायक अभिजीत भट्टाचार्य शामिल हैं, ने अभाविप का समर्थन किया है। पिछले साल की नौ फरवरी से, षासक दल की राजनीति से असहमत व्यक्तियों पर राष्ट्र-विरोधी का लेबल चस्पा करने का सिलसिला जारी है। ऐसे लोग विशेषकर निशाने पर हैं जो ‘कश्मीर-समर्थक’ और ‘भारत-विरोधी’ नारे लगाते हैं। किसी क्षेत्र के लिए स्वायत्तता की मांग करना, अलग राज्य की मांग उठाना या इनके समर्थन में नारे लगाना, हमारे संविधान की दृष्टि में क्या राष्ट्र-विरोध है?

    देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर पूर्व में विचार किया है। खलिस्तान के नाम से एक अलग सिक्ख देश की मांग के समर्थन में नारे लगाने को उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रद्रोह मानने से इंकार कर दिया था। इसके पहले, सन 1962 में, केदारनाथ बनाम बिहार शासन प्रकरण में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि देशद्रोह का अभियोग उसी व्यक्ति पर लगाया जा सकता है, जो ‘‘ऐसा कोई कार्य करे, जिसका उद्देश्य अव्यवस्था फैलाना, कानून और व्यवस्था को बिगाड़ना या हिंसा भड़काना हो।’’

    इसी तरह, उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के अनुसार ‘‘आज़ादी इत्यादि की मांग करना और उसके समर्थन में नारे लगाना तब तक अपराध नहीं है जब तक कि कोई व्यक्ति इससे आगे जाकर 1) हिंसा करे, 2) हिंसा आयोजित करे या 3) हिंसा भड़काए।’’

    स्पष्ट है कि अभाविप-आरएसएस की इस मुद्दे पर सोच, देश के कानून के अनुरूप नहीं है और ना ही भारतीय संविधान के मूल्यों से मेल खाती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के मामले में पुलिस ने कन्हैया कुमार, उमर खालिद और उनके साथियों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार तो कर लिया परंतु आज तक वह न्यायालय में उनके खिलाफ अभियोगपत्र दाखिल नहीं कर सकी है। यह ज़रूरी है कि हमारे पुलिसकर्मी, देश के कानून से अच्छी तरह से वाकिफ हों। आश्चर्यजनक तो यह है कि कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं, जिनमें केन्द्र और राज्य सरकारों के मंत्री शामिल हैं, ने भी इसी तरह की बातें कहीं हैं।

    भारत के सीमावर्ती इलाकों जैसे उत्तरपूर्व, तमिलनाडु, पंजाब और कष्मीर में समय-समय पर इन क्षेत्रों को अलग देश बनाए जाने की मांग उठती रही है। कई राजनीतिक दलों ने भी इस तरह की मांग का समर्थन किया है और उसके पक्ष में नारे बुलंद किए हैं। राज्यसभा में द्रविड़ नायक और द्रविड़ मुनित्र कषगम के सर्वोच्च नेता सीएन अन्नादुरई ने तमिलनाडु को देश से अलग किए जाने की मांग की थी। इस तरह की बातें स्वाधीनता के बाद से ही देश में कही जा रही हैं परंतु हाल के कुछ वर्षों में इन्हें राष्ट्र की एकता के लिए खतरा बताया जाने लगा है।

    इसका मुख्य कारण है संघ परिवार की विचारधारा। यह विचारधारा, भारतीय राष्ट्रवाद की उस अवधारणा से सहमत नहीं है, जो राष्ट्रीय आंदोलन से उभरी। संघ परिवार, हिन्दू राष्ट्रवाद का हामी है। भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा का विकास उस दौर में हुआ जब हम पर अंग्रेज़ों का शासन था। एक ओर था भारतीय राष्ट्रवाद, जो समावेशी था तो दूसरी ओर थे मुस्लिम और हिन्दू राष्ट्रवाद, जो अपने-अपने ढंग से अतीत का प्रस्तुतिकरण करते थे।

    भारतीय राष्ट्रवाद, भारत के भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों को भारतीय मानता है और उनकी सांझा परंपरा और संस्कृति पर ज़ोर देता है। गांधीजी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ और जवाहरलाल नेहरू रचित ‘भारत एक खोज’, भारत के इतिहास को धर्म से ऊपर उठने का इतिहास बताती हैं। मुस्लिम राष्ट्रवादियों का मानना था कि आठवीं सदी ईस्वी में सिन्ध में मोहम्मद-बिन-कासिम के अपना शासन स्थापित करने के साथ भारत में मुस्लिम राष्ट्रवाद का उदय हुआ। उनका कहना था कि मुसलमान इस देश के शासक रहे हैं और वे ही इसके असली मालिक हैं। हिन्दू राष्ट्रवादी इससे कहीं पीछे जाकर अपने को आर्यों का वंशज बताते हैं और यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि यह देश हमेशा से हिन्दू रहा है और हिन्दू ही यहां के मूल निवासी हैं। इसी को साबित करने के लिए शंकराचार्य ने भारत भूमि के चारों कोनों पर मठों की स्थापना की थी। इतिहास के ये दोनों ही संस्करण, समाज को स्थिर और अपरिवर्तनशील मानते हैं। वे उत्पादन के साधनों में परिवर्तन और अलग-अलग साम्राज्यों के उदय के देश पर प्रभाव को नजरअंदाज करते हुए, पूरे इतिहास को एक रंग में रंगने पर आमादा हैं।

    यूरोप में राष्ट्रवाद की अवधारणा की शुरूआत, औद्योगिक समाज के उदय और आधुनिक शिक्षा व संचार के साधनों के विकास के साथ हुई। एक भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोग स्वयं को राष्ट्र-राज्य बताने लगे। भारत का इतिहास, पशुपालक आर्यों से शुरू होकर कृषि-आधारित राज्यों से होते हुए औपनिवेशिक भारत तक पहुंचा। इस दौरान सामाजिक रिश्तों में कई परिवर्तन आए। औपनिवेशिक राज्य ने उस अधोसंरचना का विकास किया, जिससे भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारत एक राष्ट्र बना। इसके राष्ट्र बनने की राह को प्रशस्त किया हमारे स्वाधीनता संग्राम ने, जो दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन था।

    वर्तमान में देश पर हावी सांप्रदायिक विमर्श, सामाजिक परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ करता है। वह शंकराचार्य द्वारा चार मठों की स्थापना और गांधी के लोगों को भारतीय के रूप में एक होने के आह्वान के बीच के अंतर को समझने को ही तैयार नहीं है। वह यह नहीं समझ पा रहा है कि औपनिवेशिक काल के पहले, नागरिकता की कोई अवधारणा नहीं थी और आधुनिक अधोसंरचना के विकास के साथ ही नागरिकता की अवधारणा भी उभरी। हिन्दू राष्ट्रवादी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भौगोलिक क्षेत्र ही राष्ट्र का आधार है। वे यह मानते हैं कि हिन्दू संस्कृति, भारतीय नागरिकता की एकमात्र कसौटी है। वे धर्म को संस्कृति का चोला पहना रहे हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि हिन्दू अप्रवासी भारतीयों को भारत में नागरिक के अधिकार मिलने चाहिए।

    हिन्दुत्ववादियों का अति-राष्ट्रवाद, भारत के ‘‘गौरवशाली अतीत’’ और ‘‘अखंड भारत’’ की उनकी अवधारणाओं से जुड़ा हुआ है। वे यह समझना ही नहीं चाहते कि राष्ट्र-राज्य के विकास की क्या प्रक्रिया होती है। वे देश के कानूनों का भी सम्मान नहीं करना चाहते। उनके लिए राष्ट्रवाद एक भावनात्मक मुद्दा है और वे इसका इस्तेमाल लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए करना चाहते हैं। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि प्रजातंत्र में विविध विचारों और परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लिए जगह होनी चाहिए। जिस राष्ट्र-राज्य में ऐसा नहीं होगा, वह जिंदा नहीं रह सकेगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • शेर

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    शेर अगर तुम्हारे साथ बैठ कर
    नाश्ता करने लगे डाइनिंग टेबल पर
    तो यह मत समझना कि वह आदमी बन गया है

    शेर अगर तुम्हारे साथ
    पिक्चर हाल में बैठकर फिल्म देखने लगे
    तो यह मत समझना कि वह कोई दर्शक बन गया है .
    शेर अगर तुम्हे अपनी बाहों में ले ले
    फिर तुम्हे चूमने लगे तो यह मत समझ लेना कि वह तुम्हारा प्रेमी बन गया है शेर अगर किसी दिन तुम्हारा आंसू पोंछने लगे
    जेब से रुमाल निकाल कर
    तो यह मत समझना कि वह तुम्हारा वाकई हमदर्दबन गया है

    शेर अगर अपने गले में माला डाल ले
    शंख ध्वनि करने लगे मंदिर में
    बजाने लगे घड़ियाल
    तो यह मत समझना कि वह अब पुजारी बन गया है

    शेर अगर किसी दिन चुनाव जीतकर
    देश का
    प्रधानमंत्रीही बन जाये
    देने लगे लोकतंत्र की दुहाई
    तो यह मत समझना कि वह कोई महा पुरुष बन गया है

    शेर को खून का स्वाद लग चूका है
    वह कितना भी विनम्र और शालीन दिखे
    वह कोई दार्शनिक नहीं है एक दिन झपट्टा मार कर
    तुम्हे डकार ही जायेगा

     

  • क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

    [themify_hr color=”red”]

     

    एक महत्वपूर्ण कबीरपंथी सज्जन से मुलाक़ात का किस्सा सुनिए. एक गाँव में किसी काम से गया था, उसी सिलसिले में मालवा के दलितों के बीच फैले कबीरपंथ से परिचय हुआ. एक घर के बड़े से आँगन में कबीर पर गाने वाले और कबीर पर बोलने वाले एक सज्जन बैठे थे और आसपास बैठे गरीब दलित सुन रहे थे. मैं और मेरे एक मित्र कबीर की वाणी में सामाजिक क्रान्ति के सूत्र खोजने के मन से उन सज्जन से प्रश्न पूछ रहे थे. आसपास बैठे दलित गरीब चुपचाप सुन रहे थे. बात निकली तो लोगों ने शेयर किया कि सब पञ्च तत्व के बने हैं, सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और सबमे एक ही खुदा का नूर है आत्मा परमात्मा की ही औलाद है और भेदभाव सब इंसान के बनाये हुए हैं, सबका खून लाल है, सबको मरकर वहीं जाना है… इत्यादि इत्यादि … फिर कुछ जागरूक लोगों ने बताया कि भाई जब तक ये प्रवचन चलता है तब तक सभी यह मानते हैं … उसके बाद आश्रम या सत्संग घर से निकलते ही दीवार के ठीक एक फुट दूर ही एकदूसरे के हाथ का छुआ खाना-पीना बंद हो जाता है और सब वापस कबीरपंथ या राधास्वामी या साहेब या सतनाम या बंदगी छोड़कर वर्णाश्रम के खोल में वापस लौट आते हैं.

    चर्चा के दौरान लोग आते जाते हुए प्रवचनकार सज्जन के पैर छूते रहे और कबीर की वाणी में आये गुरु गोविंग दोउ खड़े काके लागु पांय, मैं तो राम की लुगइया, रस गगन गुफा में अजर झरे, सुन्न महल, कुण्डलिनी और षड्चक्र और न जाने क्या क्या चल रहा था. लेकिन बार बार पूछने पर भी ये बात कोई नहीं करना चाहता कि आप लोगों के इलाके में हैण्ड पम्प क्यों नहीं है? आपके बच्चों को स्कूल में पढने क्यों नहीं दिया जाता? आपके युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? आपके बर्तनों को कुवें से लात मारकर क्यों फेंक दिया जाता है? आपकी स्त्रीयों को आसान शिकार क्यों समझा जाता है? इन प्रश्नों पर कबीर की तरफ से उत्तर दिए गये हैं लेकिन वे उत्तर कबीरपंथ से गायब हैं. कबीरपंथियों ने जिस कबीर को रचा है वह सिर्फ आत्मा परमात्मा और मोक्ष की बात करता है. ठीक उसी तरह जैसे भारतीय ध्यानियों ने जिस बुद्ध को रचा है वह सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण की बात करता है समाज की कोई बात नहीं करता.

    क्या इन कबीरपंथियों ने कबीर को गलत समझा है? या ये सिलेक्टिव ढंग से कबीर को जिस तरह से रख रहे हैं उसमे कोई गलती है? या क्या यह कहा जा सकता है कि कबीर ने खुद ही कुछ गलती की है? ये बड़े प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढना बड़ा मुश्किल है लेकिन एक सावधान नजर से देखें तो इनका उत्तर मिलता है. आइये उस उत्तर में प्रवेश करें.

    कबीर हो या बुद्ध हों, उनकी वाणी में कोई भी बात हो या कैसी भी समझाइश दी गयी हो, उसका अनुवाद या भावार्थ सीधे सीधे क्या जनता तक पहुँच रहा है? क्या उनके साहित्य में मिलावट करने वालों ने मिलावट के बाद उसकी व्याख्या का अधिकार दूसरों को दिया है? या यह एकाधिकार खुद ही अपने पास सुरक्षित रख लिया है? कबीर के बारे में दावे से कहा जा सकता है कि उनके काव्य को जिस तरह से अनुदित किया गया है और उनके चुने गये प्रतीकों और बिंबों में जिस तरह से वेदान्तिक अर्थ डाले गये हैं उससे कबीर अपने ही लोगों के लिए खतरनाक बना दिए गये हैं.

    अगर कबीरपंथी अपनी रविवारीय बठक में आत्मा परमात्मा और बंकनाल, सुन्न महल और राम की भक्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार और राजनीति पर कब बात करेंगे? अपने शोषण के मुद्दों पर या अपने जीवन के जरुरी मुद्दों पर कब बात करेंगे? हफ्ते भर जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक दिन या एक शाम मिलती है जिसमे समाज के असल मुद्दों पर कोई सार्थक बात की जा सकती है. लेकिन उसमे भी आत्मा परमात्मा का भूत छाया रहता है. गाँव के युवा इन बातों को अव्वल तो सुनते ही नहीं या सुनते भी हैं तो वे भक्त बनकर बैठते हैं, हाथ जोड़कर गर्दन हिलाते हुए हुंकारा देते रहते हैं. कबीर के साथ भी समाज में बदलाव की कोई बात नहीं हो रही है. बल्कि समाज में बदलाव की बात को अध्यात्म के जहर में दबाया जा रहा है. यह एक चमत्कार है.

    यही बुद्ध के साथ हो रहा है. भारतीय पंडितों और बाबाओं ने जिस तरह से बुद्ध को “अनुभव” “ध्यान” और “निर्वाण” जैसी बातों में लपेटा है उससे बुद्ध की क्रान्ति लगभग खत्म सी हो गयी है. लोग भूल ही गये हैं कि बुद्ध ने जहर की त्रिमूर्ति – आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारकर एक नयी भौतिकवादी जीवन दृष्टि दी है जो परलोक को खत्म करके समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को संभव बनाता है. स्वयं बुद्ध की परम्परा में घुसे वेदान्तियों ने जैसा महायान खड़ा किया उसने बुद्ध को और बौद्ध धर्म को इस देश से उखाड़ फेंका और फिर से परलोकी अन्धविश्वास का धर्म यहाँ फ़ैल गया. भारत के बाहर भी जो बौद्ध धर्म है वह महायानी अंधविश्वास और स्थानीय समझौतों की खिचडी से बना हुआ है. इस तरह के परलोक्वादी और समझौतावादी बौद्ध धर्म को अंबेडकर ने सिरे से खारिज किया है.

    लेकिन अब सवाल ये है कि क्या अंबेडकर को भी कबीर और बुद्ध की तरह खत्म कर दिया जाएगा? जिस तरह कबीर और बुद्ध की धारा को परलोक और मोक्ष की चादर में लपेटकर खत्म किया गया है, क्या उसी तरह अंबेडकर को खत्म करना संभव है? मेरा उत्तर है कि अंबेडकर को पचाना और उन्हें नष्ट करना असंभव है.
    बुद्ध और कबीर का साहित्य नष्ट कर दिया गया, उनके नाम पर झूठे सूत्र और साखियाँ लिखकर उनके मूल सन्देश को समाप्त कर दिया गया है. ब्रिटिश खोजियों और राहुल सांस्कृत्यायन की खोज के पहले लोग बुद्ध को और उनके साहित्य को जानते भी नहीं थे. https://www.whisperingcreekdentistry.com/ हजारों साल तक बुद्ध और उनका साहित्य लुप्त रहा, जो मिला है उसमे भी वेदांती मिलावट है. इस मिलावट का महिमामंडन करने के लिए ओशो रजनीश और अन्य वेदांती बाबाओं ने बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती बनाकर पेश किया है.

    लेकिन अंबेडकर का पूरा नहीं तो लगभग अधिकाँश साहित्य हमारे पास है. उनकी जीवनी और उनका कर्तृत्व हमारे पास सुरक्षित है. उनके द्वारा महायान और हीनयान दोनों को अस्वीकार करते हुए “नवयान” की रचना करना और हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय हमारे पास है. उनकी बाईस प्रतिज्ञाएँ हमारे पास हैं. अब हमें कोई डर नहीं कि अंबेडकर की वाणी में या उनके लेकहं में मिलावट की जा सके. डर सिर्फ इस बात का है कि हमारे ही लोग उन्हें पढ़ना समझना बंद करके उनकी पूजा न करने लगें. अंबेडकर के दुश्मन यही चाहते हैं कि हम अंबेडकर को पढ़ना छोड़ दें और उन्हें पूजना शुरू कर दें. अगर यह होता है तो अंबेडकर भी हमसे छीन लिए जायेंगे.

    अगर हम बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर को खोने नहीं देना चाहते हो हमें अंबेडकर को घर घर तक उनके मूल साहित्य और विश्लेषण के साथ पहुंचाना होगा. उनकी लिखी बाईस प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले लोगों को समझाना होगा. कम से कम भारत के गरीबों को समझाना होगा कि अंबेडकर ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी गणेश, राम कृष्ण, आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म और इश्वर सहित आत्मा तक को नकारा है और इनसे तथा पूजा पाठ और भक्ति आदि से दूर रहने की सलाह दी है.

    हमारे युवाओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, आज हम उसी दौर में जी रहे हैं जिस तरह के दौर में अतीत में बुद्ध और कबीर को षड्यंत्रकारियों ने खत्म किया था. इस षड्यंत्र में हम अंबेडकर को नहीं फंसने देंगे, आइए यह संकल्प लें और अंबेडकर को खुद समझते हुए दूसरों को भी समझाएं.