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  • क्या यह पूरा न्याय है

    डा० नीलम महेंद्र

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    ‘व्यापम’ अर्थात व्यवसायिक परीक्षा मण्डल, यह उन पोस्ट पर भर्तियाँ या एजुकेशन कोर्स में एडमिशन करता है जिनकी भर्ती मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन नहीं करता है जैसे मेडिकल इंजीनियरिंग पुलिस नापतौल इंस्पेक्टर शिक्षक आदि। साल भर पूरी मेहनत से पढ़कर बच्चे इस परीक्षा को एक बेहतर भविष्य की आस में देते हैं। परीक्षा के परिणाम का इंतजार दिल थाम कर करते हैं। वह बालक जो अपनी कक्षा और कोचिंग दोनों ही जगह हमेशा अव्वल रहता है  तब निराश हो जाता हैं जब पता चलता है कि मात्र एक नम्बर से वह अनुत्तीर्ण हो गया लेकिन उसे आज पता चला कि वह एक नम्बर नहीं बल्कि चन्द रुपयों से अनुत्तीर्ण हुआ था। यह परीक्षा बुद्धि बल की  नहीं धन बल की थी। आज ऐसे अनेकों बच्चे यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि जिस डिग्री के लिए वे सालों मेहनत करते हैं  वो पैसे से खरीदे गए एक कागज के टुकड़े से अधिक क्या है जिस पर कुछ खरीदे गए शब्द लिखे जाते हैं। जब एक होनहार बालक को उसके हक से महरूम किया जाता है तो केवल वो बालक नहीं बल्कि पूरा देश पीछे चला जाता है क्योंकि जो योग्य है वो परिस्थितियों के आगे हार जाता है और जो अयोग्य है वो परिस्थितियों को खरीद लेता है लेकिन इस खरीद फरोख्त में देश का विकास रुक जाता है। आप खुद सोचिए कि आपका इलाज ‘व्यापम’ की देन एक अयोग्य डाक्टर बेहतर करता जिसने अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए डिग्री खरीदी या फिर वो योग्य बालक जो अपने स्वप्न को पूरा करने के लिए डाक्टर बनना चाह रहा था लेकिन बन न सका।

    कहते हैं सच्चाई की हमेशा जीत होती है तो शिक्षा के क्षेत्र में देश के इस सबसे बड़े घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आखिर आ ही गया। फैसले में 2008 से 2012 के बीच प्रवेश पाने वाले 634 मेडिकल छात्रों के दाखिले निरस्त किए गए हैं और जो डाक्टर बन चुके हैं उनकी डिग्री छीन ली जाएगी। जस्टिस खेहर की अगुवाई वाली पीठ का कहना है कि विद्यार्थी जालसाजी को स्वीकार कर चुके हैं इसलिए वे किसी राहत की पात्रता नहीं रखते।

    सही भी है आखिर किसी योग्य छात्र का हक मारा गया होगा, किसी होनहार विद्यार्थी का भविष्य दांव पर लगा होगा, किसी पिता के अपने पुत्र के लिए देखे गए सपने को कुचला गया होगा, किसी माँ का अपने बच्चे के लिए माँगी गई मन्नतों पर से विश्वास उठा होगा, कुछ मुठ्ठी भर रसूखदार और पैसे वालों के द्वारा कितने होनहारों और देश दोनों के भविष्य से खेला गया।

    लेकिन चूंकि  “बुरे काम का बुरा नतीजा  ” होता है तो कल तक पैसे के दम पर  किसी के सपनों की लाश पर अपने भविष्य का महल बनाने वालों का खुद का भविष्य आज दांव पर लग गया है। कहने को न्याय हुआ लेकिन क्या यह पूर्ण न्याय है? जिस सिस्टम में यह सब सम्भव हो पाया उस सिस्टम का क्या? जिन अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया उनका क्या? जिन नेताओं के सरंक्षण में इस घोटाले को अंजाम दिया गया उन नेताओं का क्या? क्या इन सभी की सन्लिप्तता के बिना इतना बड़ा घोटाला 1990 के दशक से लेकर 2013 तक इतने सालों तक संभव है?

    बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी क्योंकि अगर सरकार की जानकारी के बिना यह प्रवेश हुए तो फिर सरकार क्या कर रही थी और अगर सरकार की जानकारी में हुए तो वो होने क्यों दे रही थी? दोनों ही स्थितियों में सरकार सवालों के घेरे से बच नहीं सकती। तो जिस दोषी सिस्टम और सरकारी तंत्र के सहारे पूरा घोटाला हुआ उस का कोई दोष नहीं उसे कोई सजा नहीं लेकिन जिसने इस सिस्टम का फायदा उठाया दोषी वो है और सजा का हकदार भी।

    तो यह समझा जाए कि सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है न तो सिस्टम के प्रति न लोगों के प्रति, उसकी जवाबदेही है सत्ता और उसकी ताकत के प्रति यानी खुद के प्रति। लेकिन हम लोगों को भी शायद भ्रष्टाचार और उसकी देन घोटालों की आदत हो चुकी है तभी तो बड़े से बड़े घोटाले भी इस देश के नागरिक की तन्द्रा भंग नहीं कर पा रहे । अगर व्यापम घोटाले की ही बात करें तो इसमें 2000 से ज्यादा गिरफ़्तारियाँ हुई, 55 एफआईआर,26 चार्ज शीट दाखिल हुई, 42 संदिग्ध मौतें इस मामले से जुड़े लोगों की हुई और 2500 से ज्यादा आरोपी हैं।

    बात सिर्फ घोटाले तक सीमित नहीं है बात यह  है कि जिस परीक्षा की तैयारी के लिए ही छात्रों के माता पिता द्वारा स्कूल फीस के अलावा कोचिंग सेन्टर वालों को मोटी फीस दी जाती है, पहली बार में सेलेक्शन नहीं होने पर ड्राप लिया जाता है और छात्रों द्वारा जी तोड़ मेहनत की जाती है उस परीक्षा की विश्वसनीयता क्या रह जाती है। जो छात्र 25 से 40 लाख खर्च करके डाँक्टर या इंजीनियर बनता है क्या वह नौकरी लगने पर अपने द्वारा की गई इन्वोस्टमेन्ट वसूलने पर नहीं लगाएगा? तो फिर यह भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह टूटेगा कैसे? और बात यह भी है कि जब तक योग्य व्यक्ति पदों पर नहीं होंगे तो देश आगे बढ़ेगा कैसे?

    हमारी ये परीक्षाएँ और इनमें बिकने वाली डिग्रियाँ माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘मेक इन इंडिया ‘ और स्किल्ड इंडिया जैसे प्रोजेक्टों को आगे बढ़ाएँगीं ? किसी भी देश की तरक्की में शिक्षा और शिक्षित युवा का महत्वपूर्ण योगदान होता है लेकिन जब शिक्षा विभाग में ही भ्रष्टाचार की दीमक लग जाए तो युवा नहीं देश का भविष्य दांव पर लग जाता है।

    न्यायालय के फैसले से जिन छात्रों ने गलत तरीके से परीक्षा उत्तीर्ण की उन्हें सजा मिली लेकिन पूर्ण न्याय तभी होगा जब इस प्रकार के कदम उठाए जाएं जिससे भविष्य में न तो किसी छात्र के साथ अन्याय हो और न ही कोई छात्र अनुचित तरीके से डिग्री हासिल कर पाए क्योंकि भविष्य तो दोनों का ही दांव पर लगता है किसी का उसी समय किसी का कुछ समय बाद जैसे कि ये 634 छात्र।

     

  • बुद्ध की अनत्ता के सिद्धांत की चोरी और आत्मा का वेदांती भवन –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।


     

    वेदान्त या किसी भी अन्य आस्तिक दर्शन के अंधभक्तों से बात करते हुए बड़ा मजा आता है. कहते हैं ध्यान एक अनुभव है, इन्द्रियातीत अनुभव है. इसकी चर्चा नहीं की जा सकती इसे अनिर्वचनीय और अगम्य अनकहा ही रहने दो. अभी कल से एक प्रौढ़ और सुशिक्षित बुजुर्ग सज्जन से चर्चा चल रही थी. अंत में वे अपने सारे कमेंट्स डिलीट करके विदा हो गये और कह गये कि मैं कहता आंखन देखि, तुम शब्दों को संभालते रहो. कितनी ऊँची लगती है न उनकी बात ? लेकिन कितनी षड्यंत्रपूर्ण और बचकानी है असल में इसे देखिये. पहली बात तो वे कहते हैं कि इन्द्रियातीत अनुभव की चर्चा हो ही नहीं सकती, अब यहाँ गौर से देखिये अनुभव का मतलब ही इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान है, इन्द्रियातीत अनुभव नाम का वेदांती शब्द स्वयं वेदान्त की तरह असंभव शब्द है. वेदांत का अर्थ होता है ज्ञान का अंत – यह अर्थ है तो अनर्थ कि क्या परिभाषा हो सकती है? विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि ज्ञान या इन्फोर्मेशन या अनुभव या समझ (इस अर्थ में इन्फोर्मेशन) का कोई नाश नहीं होता. वेदान्त का अर्थ ही वेद (ज्ञान) का अंत है, इस तरह ज्ञान को नष्ट करने वाले दर्शन के रूप में वेदान्त का पूरे भारत पर क्या असर हुआ है वह समझ में आता है. हजारों साल तक अज्ञानी अन्धविश्वासी और गुलाम भारत तभी संभव है जब ज्ञान का सच ही में अंत कर दिया गया हो.

    तो, वे सज्जन कह गए कि इन्द्रियातीत अनुभव या ज्ञान की चर्चा असंभव है. यह रसगुला चखने जैसा है कोई व्याख्या नहीं हो सकती. कुछ हद तक ये ठीक है लेकिन रसगुल्ले और मिठास के अनुभव को आधार बनाकर बहुत ठोस तर्क और तर्कपूर्ण अनुमान से बहुत कुछ जाना जा सकता है. इसी पर कोमन सेन्स और विवेक सहित कल्पनाशीलता टिकी हुई है जो कि किसी भी तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है.

    कोई भी आध्यात्मिक ज्ञान या अनुभव कामन सेन्स से बड़ा नहीं होता. हो ही नहीं सकता. कामन सेन्स ने ही वह विज्ञान तकनीक, सभ्यता, नैतिकता और सौन्दर्यबोध दिया है जिसने हमें इंसान बनाया है. अब इन इंसानों को गुलाम और अन्धविश्वासी बनाकर उलझाए रखने के लिए सबसे जरुरी काम क्या होगा?

    निश्चित ही तब सबसे जरुरी काम होगा कि ज्ञान के आधार और उसकी संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए. सभी आस्तिक दर्शन और खासकर हिन्दू वेदान्त यही करता है. आजकल के बाबाओं को ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव, श्री श्री या मोरारी बापू जी या आसाराम बापूजी को देखिये. वे इन्द्रियों से हासिल ज्ञान को नाकाफी बताते हुए किसी अदृश्य अश्रव्य और अगम्य को अत्यधिक महत्व देते हैं और इस एक मास्टर स्ट्रोक से वे उस तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान, समाधी और निर्विचार सहित आनंद और अनुभव मात्र की व्याख्या का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं. इस तरह ज्ञान अनुभव और इनपर खडी सभी संभावनाओं की चाबी वे अपने पास रख लेते हैं और न सिर्फ अपना रोजगार बल्कि इस देश की जड़ता को भी सदियों सदियों तक बनाये रखते हैं.

    क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि भारत में षड्दर्शन के बाद सातवाँ दर्शन क्यों पैदा नहीं हुआ? क्या दिक्कत है? यूरोप में तो हर दार्शनिक अपना नया स्कूल आफ थॉट आरंभ कर सकता है लेकिन यहाँ अरबिंदो, विवेकानन्द, शिवानन्द, योगानन्द सहित ओशो जैसे बाजीगरों को भी इन छः डब्बों में से कोई एक डब्बा पकड़ना होता है वरना वे भारतीय ज्ञान और दर्शन की छोटी सी और उधार ट्रेन से बाहर निकाल दिए जायेंगे.

    लेकिन यूरोप में यह ट्रेन बहुत लंबी है. जितना चाहे उतना डब्बे जोड़ते जाइए. इसी से वहां नये ज्ञान विज्ञान तकनीक और सौंदर्यशास्त्र जन्म लेते ही रहते हैं. भारत की पूरी कहानी चार वर्ण और छः दर्शनों पर खत्म हो जाती है. यहाँ हाथ के पंजों की दस उँगलियों के परे कोई गिनती जाती ही नहीं. दस पर बस आ जाता है.

    यह अगम्य और अनुभवातीत क्या है? अगर यह है तो आप या मैं या कोई और इसकी चर्चा कैसे कर रहा है? अगर यह इतना ही दूर और अगम्य है तो इसकी चर्चा क्यों करते हैं? ये आत्मा परमात्मा और समाधि की रात दिन की बकवास क्यों पिलाई जाती है? फिर जब कोई इनके बारे में सच में ही जिज्ञासा करे तो घबराकर कहेंगे कि ये सब अगम्य अगोचर है. अरे भाई जब ये अगम्य अगोचर अनिर्वचनीय है तो उसकी रात दिन मार्केटिंग और बकवास करते ही क्यों हो?

    और ध्यान रखियेगा उसकी मार्केटिंग इस तरह की जाती है जैसे अभी ये बाबाजी आपके हाथ में निकालकर रख देंगे “अभी और यहीं” की भाषा में बात करेंगे और हजारों जन्म की साधना की बात भी करेंगे, गुरु की महिमा, शरणागती और गुरु शिष्य परम्परा की बात भी करेंगे.. ये ओशो रजनीश का सबसे मजेदार खेल रहा है. अमन और अनात्मा की संभावना पर जो ध्यान का अनुभव खड़ा है उसे आत्मा की बकवास के साथ सिखाते हैं. जब व्यक्ति सनातन आत्मा की चर्चा सुनकर “मैं” को मजबूत बना लेता है तब कहते हैं कि मैं से मुक्त होना ही सच्ची मुक्ति है.

    अब यहाँ खेल देखिये एक तरफ आत्मा की सनातनता का सिद्धांत देकर आत्मा (मैं, मेरे होने के भाव) को मजबूत कर रहे हैं. फिर साधना सिखा रहे हैं कि इस मैं को विलीन कर दो, ये वेदान्त की जलेबी है. दूसरी तरफ बुद्ध को देखिये वे कहते हैं कि यह मैं होता ही नहीं इसे जान लो. तब इस मैं से मोह और आत्मभाव पैदा ही नहीं होगा. तब ध्यान समाधि या तादात्म्य हीनता एकदम आसान हो जाती है. लेकिन वेदान्त यह नहीं होने देता. वह सनातन आत्मा या मैं के भाव को ठोस खूंटे की तरफ गाड़ देता है फिर इसे विलीन करने का इलाज भी बता है. मतलब पहले कीचड में पाँव डलवाता है फिर स्नान भी करवाता है. इस प्रकार वेदांती हमाम और इसके ठेकेदारों का रोजगार बना रहता है.

    अब ध्यान दीजिये मैं को विलीन करने की टेक्नोलोजी असल में बुद्ध की अनत्ता की या अनात्मा की टेक्नोलोजी हैं जिसे ये चुराकर आत्मा की टेक्नोलोजी के नाम से मार्केटिंग कर रहे हैं. ऊपर से तुर्रा ये कि अनत्ता या मैं के विलीन होने पर जो शून्य बच रहता है उसे ये “आत्मज्ञान” कहते हैं. हद्द है मूढ़ता की.

    मतलब समझे आप? आत्मा को मिटाने पर जो ज्ञान हुआ उसे बुद्ध की तरह अनात्मा का ज्ञान कहने में ये डरते हैं कि कहीं चोरी न पकड़ी जाए. उसे ये अनात्मा न कहके आत्मा का ज्ञान कहते हैं. हालाँकि ये भली भाँती जानते हैं कि आत्मा या स्व के विलीन होने पर ही इनका मोक्ष या बुद्ध का निर्वाण घटित होता है और इसीलिये तःताकथित अध्यात्म या धर्म की सारी सफलताएं असल में अनात्मा की सफलता हैं. फिर भी इनका षड्यंत्र देखिये कि इसके बावजूद भी आत्मा और उसकी सनातनता का ढोल बजाना बंद नहीं करते. यह कितना शातिर और गहरा खेल है आप अनुमान लगाइए.

    इतना स्पष्ट सा विरोधाभास क्या इन्हें नजर नहीं आता? बिलकुल नजर आता है. लेकिन दिक्कत ये है कि अगर ये समाधि या ध्यान के अनुभव को अनात्मा के अनुभव या स्व (मैं/मेरा) के निलंबित हो जाने के अनुभव की तरह प्रचारित करने लगें तो इनमे और बुद्ध में कोई अंतर नहीं रह जाएगा. तब पूरे हिन्दू धर्म और वेदान्त को चोरी पकड़ी जायेगी.

    इस खेल को गौर से देखिये और समझिये मित्रों. इस देश के शोषक धर्म पर इस स्तर से हमला करेंगे तो यह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा और बहुत प्रकार से हम शोषण और अंधविश्वासों को चुनौती दे सकेंगे. तब भारत में नैतिकता, विज्ञान, न्यायबोध और धम्म का मार्ग आसान हो सकेगा.


    (लिखी जा रही और शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)
    – © संजय जोठे

  • प्यार में बाजार

    Amar Tripathi

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    चारों तरफ प्रेम का परनाला बह रह रहा हैं—सोशल मीडिया में, रेडियो-टेलीविजन में, अखबारों में. युवाओं को फ़िल्मी गानों के माध्यम से प्रेम करने के लिए उकसाया जा रहा है, जिससे कहीं वे इस पचड़े में पड़े बिना ही 14 फरवरी न निकाल दें.

    इस सबका वास्तव में वाजिब असर भी हुआ है, और इतना हुआ है कि वे अब जाग गए हैं और लगता है कि प्रेम करके ही मानेंगे और वह भी पूरे विधिविधान से. जो नौजवान अभी भी इस हल्ले में नहीं आ पा रहे हैं वे दूसरी तरफ जाकर “सस्कृति” नामक भैंस दुहने में लग गए हैं. वे इस बात से भी रुष्ट हैं कि बाजार उनके प्रतीकों जैसे लाठी, त्रिशूल और परदे को वैलेंटाइन वीक के आयोजनों में सही जगह नहीं देता.  इसलिए वे प्रेमियों  के साथ वही सुलूक करने में लग जाते हैं जो आज के लगभग १८०० साल पहले सेंट वैलेंटाइन के साथ तत्कालीन रोमन सम्राट ने किया था–यानी पिटाई.

    बाजार की मार्फ़त ही पता चला है कि प्रेम करना और उसे जाहिर करना खासा खर्चे वाला काम है और यह सात दिन में स्टेप-बाई-स्टेप ही किया जा सकता है. गुलाब, चॉकलेट, टेडी और अन्य उपहारों के जोर से आप प्रस्ताव को गौर करने लायक बनाते हैं और फिर स्वीकृत हो जाने पर ‘हग’ या ‘किस’ करते हैं तब कहीं जाकर मामला जमता है, और प्रेम, जो अब तक शायद कहीं अटका हुआ था, अचानक हो बैठता है और बात आगे बढती है. अगर ये सब आपकी हैसियत के बाहर बैठता है तो आप और चाहे जो कर सकते हों, प्रेम तो बिलकुल नहीं कर सकते.

    मगर इतना कर सकने की हैसियत के साथ आप चाहें तो “मेरी जां, जाने जिगर, इकरार, बेकरार, प्यार, यार, दिलदार, बहार, चन्ना  जैसे बीस तीस शब्द जो बार-बार अलग अलग फ़िल्मी गानों में आकर आपको बचपन से परेशान करते रहे हैं उनको आपस में लपेट कर, कुछ कविता या शायरी टाइप के एक नये  टॉप-अप वाउचर से अपने प्रेम की रिचार्ज वैल्यू बढ़ा सकते हैं.

    यकीन न  हो तो अपने यार/दिलदार से प्यार और पैसा में से किसी एक को  चुनने को कहिये  तो वह निश्चित रूप से आपको ही छोड़ देगा/देगी क्योंकि प्यार और पैसा आपस में कुछ इस तरह गुत्थम गुत्था हैं कि समझ में नहीं आता कि भला उनमें कुश्ती हो रही है या प्यार. हालाँकि दोनों में ख़ास फर्क भी नहीं है.

    और ऐसा क्यों न हो? can you buy modafinil online legally www.guardianfueltech.com आखिर इसी काम के लिए और इसी मौसम में, अमेरिका में २० अरब डॉलर और इंग्लॅण्ड में डेढ़ अरब पौंड और इससे कुछ ही कम फ़्रांस में प्रेमी जन हर साल फरवरी में खर्च करते हैं तो हम क्यों पीछे रह जाएँ ?

    वैसे बड़े धीरज का काम है कि अगर आप को प्यार हो जाए और आप उसके इजहार के लिए फरवरी का इंतज़ार करें… कम से कम ये मुझ जैसे नकारा आदमी के बस की बात तो नहीं.


    Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2017/02/blog-post.html

  • गौतम बुद्ध का अमृत और वेदांती पाखण्ड का जहर –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

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    गौतम बुद्ध ने जिस तरह से अनत्ता (अनात्मा) और निर्वाण की परिभाषा दी है उसे चुराकर हिन्दू वेदान्त ने एक उधार धर्म निर्मित किया है. यह दुनिया की सबसे बड़ी और खतरनाक दार्शनिक चोरी है. इस षड्यंत्र को समझना और इस चोरी को पकड़ना बड़ा कठिन है. लेकिन थोड़ा विचारपूर्वक विश्लेषण किया जाए तो इसे पकड़ा जा सकता है और समझा जा सकता है. इसके लिए हमें वेदांती रहस्यवाद का पोस्टमार्टम करना होगा. आइये ये पोस्टमार्टम करते हैं.

    हिन्दू धर्म या किसी भी अन्य धर्म की आत्मा और परमात्मा की धारणा पर खड़े रहस्यवाद को गौर से देखिये. उसका आत्यंतिक चमत्कार या उसकी अंतिम उंचाई जिस तरह से अभिव्यक्त होती है और इस उंचाई तक आने की जो प्रस्तावना या मार्ग बताया गया है वह परस्पर विरोधी है. विशेष रूप से भारतीय वेदान्त में जिस अर्थ में रहस्यवाद के आत्यंतिक शिखर परिभाषित किये गये हैं वे परिभाषाएं विरोधाभासों से होती हुई पाखण्ड और षड्यंत्र में प्रवेश कर जाती हैं. असल में अध्यात्म या रहस्यवाद द्वारा जिस तरह की व्यक्तिगत और सामूहिक मुक्ति (मोक्ष या साल्वेशन नहीं बल्कि निर्भार होने या खुश रह सकने के अर्थ में) की संभावना दिखाई जाती है, उसी संभावना की वेदांत द्वारा ह्त्या भी की जाती है. यह बहुत बड़ा खेल है जो हर आस्तिक धर्म में बहुत गहराई से चलता रहा है और आजकल बढ़ रहा है. खासकर हिन्दू वेदान्त ने इस पाखण्ड और षड्यंत्र में चार चाँद लगा दिए हैं.

    आजकल की युवा पीढ़ी को इस बात को बहुत गहराई से समझना चाहिए. शहरी मध्यम वर्ग की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक असुरक्षाओं का शोषण करने वाले इस अध्यात्म को समझना बहुत जरुरी है. आइये इस विषय में प्रवेश करें.

    वेदान्तिक या आत्मा-परमात्मा- पुनर्जन्म वादी रहस्यवाद की यह उंचाई क्या है? बहुत सरल शब्दों में कहें तो शरीर, मन और समय मात्र से जागृत दूरी बन जाना ही समस्त रहस्यवादी अभिव्यक्तियों का कुल जमा सार है. इसे और सरल करें तो कहेंगे कि जब शरीर, स्मृतियों, कल्पनाओं, अभीप्साओं सहित इन सबसे जन्मने वाले आत्मभाव (मैं के होने के भाव या खुदी के अहसास) पर विराम लग जाता है तब वह अवस्था आती है जिसे समाधि या तुरीयावस्था कहते हैं. इस तरह के ‘नाम रूप और अस्तित्व की हीनता’ ही वह निर्भार होना या मुक्ति है जिसे अतिरंजित ढंग से महत्त्व दिया गया है. इसे बहुत बढ़ा चढाकर बखान किया जाता है और इसी की प्रशंसा में सारे धर्मों के सब शास्त्र भरे हुए हैं. https://littlescholarsnyc.com

    निश्चित ही ये अवस्था बहुत आनंददायक या समाधानकारी है, इसका अनुमान हर व्यक्ति को होता ही रहता है. ये कोई ख़ास बात या दुर्लभ चमत्कार नहीं है. आप दैनिक जीवन में इस मोक्ष या निर्वाण से रोज गुजरते हैं. किसी आनन्द या भय या सावधानी के क्षण में शरीर, मन, समय आदि पीछे छूट जाते हैं तब निर्वाण साकार हो उठता है. निर्वाण का अर्थ है “कोई दिशा न होना” निर्वाण शब्द नि+वाण से बनता है. वाण का अर्थ है – दिशा. इस तरह निर्वाण का सरल अर्थ है कि आपके शरीर और मन दोनों की स्थान या समय में कोई दिशा न रही, दोनों निर्विकल्प अवधान की स्थिति में शुद्धतम वर्तमान में आ गये. चेतना किसी दिशा में कुछ खोज नहीं रही बल्कि निर्विकल्प रूप से सब चीजों का जागृत संज्ञान ले रही है, मतलब कि होश है लकिन इस होश का मालिक कोई नहीं है. जैसे कि कोई पर्वत पर खड़े होकर समंदर के विस्तार को बिना नाम दिए या पसंद नापसंद का निर्णय दिए बिना चुपचाप देखता/देखती हो ऐसे में भूत भविष्य, शरीर, मन सब शून्य हो जाता है. यही बौद्धों का ध्यान है. लेकिन श्रमणों के इस ध्यान या सामायिक को हिन्दू वेदान्तियों ने ‘धारणा और योग’ के मायाजाल की बाढ़ में डुबाकर बर्बाद कर दिया है, बुद्ध द्वारा दी गयी निर्वाण की टेक्नोलोजी को सामाजिक नियंत्रण का हथियार बनाकर बर्बाद कर डाला है.

    हिन्दू वेदान्त के अनुसार यह निर्विकल्प अवधान या जागृत चेतना का एक ख़ास व्यक्तित्व है. बौद्ध दर्शन और बौद्ध व्यवहार में इस चेतना का कोई व्यक्तित्व नहीं होता, बौद्धों के लिए यह चेतना “अनात्मा” है. लेकिन हिन्दुओं के लिए यह सनातन शाश्वत और ठोस “आत्मा” है. आत्मा का कुल जमा अर्थ “व्यक्तित्व” या “सेल्फ” या “स्व” होता है. हम अक्सर आत्मा की हिन्दू परिभाषा को ऊर्जा या प्राण से कन्फ्यूज करते हैं, लेकिन हिन्दू अर्थ में आत्मा का अर्थ ऊर्जा या चेतना नहीं होता है बल्कि एक ठोस व्यक्तित्व से होता है जो एक से दुसरे गर्भ में अनंत काल तक छलांग लगाता रहता है. बौद्ध दर्शन के अनुसार यह बात बिलकुल गलत है, बौद्धों के लिए न तो ऐसी आत्मा होती है न ऐसी छलांग (पुनर्जन्म) होता है और इसीलिये इस आत्मा और इसकी उछलकूद (पुनर्जन्म) को नियंत्रित या संचालित करने वाला कोई परमात्मा भी नहीं होता है. गौतम बुद्ध के अनुसार यही समझ अनत्ता और शून्य का सार है.

    यहाँ मैं क्यों कह रहा हूँ कि मुक्ति की वेदान्तिक परिभाषा और उसका प्रायोगिक मार्ग परस्पर विरोधी हैं? इसका एक बहुत आसान सा कारण है. वह कारण समझा जा सकता है. वेदान्त के अनुसार मुक्ति की पूरी टेक्नोलोजी का और उसके पूरे प्रेस्क्रिप्शन का विश्लेषण कीजिये आपको वेदान्त का पाखण्ड और षड्यंत्र तुरंत समझ में आ जाएगा. आइये शुरू करते हैं.

    वेदान्तिक अर्थ में बंधन का अर्थ है मोह, माया. अब मोह का अर्थ है अपने शरीर, वस्त्रों, सम्पत्ति, सम्बन्धियों, पुत्र, पत्नी, जमीन जायदाद इत्यादि से राग इसी तरह अपनी खुद की पहचान, ज्ञान, श्रेष्ठता, संस्कार, अतीत, स्वप्न, योजनाओं, कल्पनाओं और भविष्य से राग. इसी क्रम में माया का अर्थ है जो नहीं है उसको होता हुआ जानना माया है. इस प्रकार वेदान्त के लिए शरीर और मन को सुखी करने वाली हर चीज से राग या लगाव रखना बंधन है, या स्वयं को किसी अन्य विधा वस्तु या तथ्य को अनावश्यक रूप से अस्तित्ववान, श्रेष्ठ अश्रेष्ठ या विशिष्ठ जानना माया है. अब ये मोह और माया ही मिलाकर बंधन अर्थात “तादात्म्य” अर्थात “अटेचमेंट” का निर्माण करते हैं और हम उसमे अपनी मर्जी से उलझे रहते हैं. यही मर्जी से उलझे रहना ही बंधन है. बुद्ध और वेदांत दोनों के लिए इस बंधन से क्रमशः छूटने का अभ्यास ही साधना है. और इससे पूरी तरह छूट जाना मुक्ति या मोक्ष या निर्वाण है. यहाँ तक बात एकदम आसान है. सभी समझते हैं.

    इसका मतलब ये हुआ कि शरीर और मन के सुख के जितने साधन हैं उनसे एक दूरी निर्मित हो जाना ही मोक्ष है. यहाँ ध्यान दीजिये अगर यह दूरी अस्तित्वगत रूप से संभव है तभी यह दूरी पैदा की जा सकती है या बढाई जा सकती है. अगर अस्तित्वगत रूप से यह दूरी संभव नहीं है तो न तो पैदा की जा सकती है न बढाई जा सकती है. अगर हिन्दू वेदान्त और बौद्ध धर्म मोक्ष या निर्वाण को मानता है तो इसका अर्थ है कि दोनों के लिए यह दूरी संभव है इसीलिये वे इसे बढाते जाने की बात करते हैं. अब ध्यान से देखिये कि इसका क्या अर्थ है.

    अगर दूरी संभव है तो इसका अर्थ हुआ कि चेतना या होश (जो कि आपमें अभी काम कर रहा है) वह न तो शरीर है न ही मन है. अगर वह शरीर और मन ही होता तो शरीर और मन से उसकी दूरी नहीं निर्मित की जा सकती थी, उदहारण के लिए मिट्टी ही ईंट है तो मिट्टी कभी ईंट होने की पहचान से मुक्त नहीं हो सकती. लेकिन मिट्टी ईंट नहीं है तो ही वह ईंट होने के झमेले से मुक्त होकर वापस मिट्टी बन सकती है. इसका मतलब हुआ कि मोक्ष या निर्वाण की संभावना ही तब है जबकि चेतना को शरीर और मन द्वारा दिए गये व्यक्तित्व या स्व से दूर किया जा सके. अर्थात शरीर और मन द्वारा दिए गये व्यक्तित्व या स्व या आत्म से दूर होना ही निर्वाण या मोक्ष की संभावना का आधार है. यह बात बौद्ध दर्शन में विस्तार से समझाई गयी है और इसी को लक्ष्य के रूप में वेदान्त ने भी चुराया है. बौद्ध दर्शन में इस लक्ष्य के संधान का जो मार्ग है वह एकदम इसी तर्क पर आधारित है और सीधा है. लेकिन वेदान्त का मार्ग एकदम उलटा और पाखण्ड पूर्ण है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि वेदान्त ने बुद्ध के इस लक्ष्य और इसकी टेक्नोलोजी को चुराते हुए बौद्ध दर्शन से उलटा मार्ग बुना ताकि वेदांती हिन्दू धर्म पर चोरी का आरोप न लगे. लेकिन इस चोरी को पकड़ना आसान है. इसे कैसे पकड़ा जा सकता है?

    ये बहुत आसान है. समझिये, निर्वाण या मोक्ष की तरफ बढ़ते जाने का अर्थ है भौतिक शरीर और मन सहित भौतिक और मानसिक संपत्तियों या परिग्रह (मैं और मेरा) से दूर होते जाना. उन पर अपनी मालकियत को कम से कम करते जाना. मतलब कि सुख/दुःख और सुख/दुःख के साधनों पर अपनी मालकियत और चाह को कम करते जाना. इसका ये अर्थ नहीं है कि सुख को नकार देना बल्कि हकीकत ये है कि ‘मालकियत’ नकारते हुए ही सच में सुखी रहा जा सकता है. जैसे पक्षी किसी पेड़ पर मालकियत का दावा किये बिना भी उसके सौन्दर्य और फलों का सुख ले सकता है वैसा ही हम भी कर सकते हैं. लेकिन हम पक्षियों की तरह ऐसा क्यों नहीं कर सकते? इसके दो बड़े कारण हैं. पहला ये कि हम उस पेड़ और उसके सौंदर्य पर मालकियत चाहते हैं और उससे भी बड़ा कारण ये कि इस मालकियत को संभव समझने वाली सत्ता या व्यक्तित्व को हम एक ठोस रचना या आत्मा मानते हैं. मतलब ये कि न सिर्फ हम मालकियत का दावा करते हैं बल्कि मालिक को भी सनातन या शाश्वत मानने की भूल करते हैं. इस बिंदु पर आकर वेदान्तिक पाखण्ड एकदम नंगा हो जाता है. आइये इसे भी समझें.

    बौद्ध दर्शन के अनुसार वह पक्षी जो पेड़ के फलों और उसकी सुरक्षा का आनन्द ले रहा है उसका कोई सनातन या ठोस व्यक्तित्व नहीं है. उसका शरीर और मन दोनों ही क्षणभंगुर है. जैसे पेड़ का फल या पत्ता मौत/पेड़ से गिरने के बाद मिट्टी में मिलकर दूसरे पेड़ों या जंतुओं का चारा/भोजन/शरीर बन जाता है उसी तरह उस पक्षी का मन भी है जो मरने के बाद आसपास के वातावरण में धुवें की तरह फ़ैल जाता है और अगले आने वाले मनों के लिए चारा/भोजन बन जाता है. इस तरह शरीर और मन दोनों की समानांतर “फ़ूड चेन” होती हैं. इसमें आपका शरीर करोड़ों मर चुके लोगों, पेड़ों, जंतुओं के शरीर के टोकरी भर अवशेषों से बना है और आपका मन भी ऐसे ही करोड़ों लोगों के बिखर चुके मनों/विचारों के धुंवे के बादल से एक मुट्ठी धुंआ इकट्ठा करके बना है. इस तरह आपका शरीर भी प्रकृति से आया है और मन भी, आपका अपना कुछ नहीं, आप खुद भी कहीं नहीं हैं. इन दोनों बाहरी चीजों के मिलने से जो शरीर-मन का समीकरण बना है उसमें भी आपका समाज, धर्म, राज्य और परिवार एक ख़ास ढंग से रंग भरता है और एक झूठा व्यक्तित्व पैदा करता है. यही वह ‘व्यक्तित्व’ या ‘स्व’ है जिसे हम अपने होने के रूप में परिभाषित करते हैं. लेकिन सनातन या शाश्वत बिलकुल नहीं है.

    यह एकदम सांयोगिक है. आप अगर अभी हिन्दू घर में पैदा हुए हैं तो आपका ‘स्व’ या ‘व्यक्तित्व’ हिन्दू का है, आपको बचपन से ही मुसलमान परिवार रख दिया जाता तो आप मुसलमान का ‘स्व’ या ‘व्यक्तित्व’ बनाकर बैठ जाते. इस तरह कोई सनातन स्व या “आत्मा” या व्यक्तित्व नहीं है. सब क्षणभंगुर, परनिर्भर और संयोग से बना हुआ है ऐसे व्यक्तित्व की कोई ठोस या अनिवार्य या अनंताकालिक पहचान नहीं होती जो सदियों सदियों तक निरंतरता बनाये रखे. ऐसी निरंतरता (पुनर्जन्म) एक झूठ है. ऐसा व्यक्तिव सांयोगिक और क्षणभंगुर है, ये न सिर्फ जन्म और मृत्यु के बीच बदलता है बल्कि यह जीवन के दौरान भी तेजी से बदलता है. आप कोई ट्रेनिंग लेते हैं या किसी से बातचीत करते हैं या कोई नया अनुभव लेते हैं तो ये “आत्म” या “स्व” बदलता है. इसी को सेल्फ इम्प्रूवमेंट कहते हैं. यही व्यक्तित्व विकास या शिक्षा का आधार है. अगर स्व सनातन और अपारगम्य है तो शिक्षा और आत्मा विकास असंभव है तब सीखना सिखाना असंभव है. जैसे शरीर का भोजन बदलकर शरीर बदला जा सकता है वैसे ही मन का भोजन बदलकर मन (व्यक्तित्व, आत्म) को भी बदला या सुधारा जा सकता है.

    इस अर्थ में चूँकि शरीर भी बाहर से आ रहा है और मन या स्व भी बाहर से आ रहा है और उनमे समाज भी बाहर से रंग भर रहा है इसलिए इस व्यक्तित्व का अपना कुछ भी नहीं है. सब उधार और बाहरी है. उसका अपना कोई सनातन या शाश्वत गुण या अस्तित्व नहीं है. वह जिस भी परिस्थिति में फंस जाए वैसा ही मन या शरीर बना लेगा. इसीलिये ऐसे मन या शरीर से और इसके समुच्चय स्वरुप “स्व या आत्म व्यक्तित्व” से दूरी बनाना संभव है. अगर ऐसा मन शरीर और व्यक्तित्व सनातन या शाश्वत है तो ये दूरी असंभव है, तटस्थता या निर्भार होना असंभव है.

    अब दुबारा देखिये. बौद्ध दर्शन कहता है कि यह शरीर मन और इसका मिला जुला ढेर यानी यह व्यक्तित्व सब बाहरी और उधार माल है इसीलिये इसे और इसे सुख दुःख देने वाली चीजें भी बाहरी हैं. तब भीतर क्या है? बुद्ध कहते हैं कि भीतर शून्य है. यह बहुत बारीक बात है. असल में जो चेतना या होश इन सबको जान रहा है वह स्वयं में निर्वाण है. वह चेतना साक्षी या दृष्टा नहीं है बल्कि वह कोरा होश है. और यह होश पेड़ों में भी है जानवरों और इंसानों में भी है. उस चेतना या होश की संभावना के स्तर पर पूरे जीव जगत में कहीं कोई अंतर या भेदभाव नहीं है. इसीलिये बुद्ध और बौध दर्शन मनुष्य-मनुष्य ही नहीं बल्कि मनुष्य-पशु और मनुष्य-पादप विभाजन को भी खत्म कर देते हैं और एक सर्वसमावेशी एकता बनाकर सिद्ध कर देते हैं. इस प्रकार चूँकि बुद्ध के लिए कोई आत्मा या व्यक्तित्व (शरीर+स्व) है ही नहीं इसीलिये निर्वाण संभव है. न केवल संभव है बल्कि वही सच्चाई है और ‘निर्वाण हीनता’ एक झूठ है. इसीलिये बुद्ध निर्वाण को मानव का स्वभाव कहते हैं.

    लेकिन हिन्दू वेदान्त क्या कहता है? वेदान्त बुद्ध की आधी बात स्वीकार करता है और शेष आधी बात को नकारता है. हालाँकि नकार दी गयी शेष आधी बात से आने वाली टेक्नोलोजी को चुराकर उस पर अपना महल जरुर बनाता है लेकिन अपनी विशिष्ठता और मौलिकता की घोषणा करने के लिए एक षड्यंत्र भी बुनता है. वह षड्यंत्र क्या है? वह षड्यंत्र यह है कि अनत्ता या “अनात्मा” के दर्शन से आए वाली टेक्नोलोजी को इस्तेमाल करो और उसे “आत्मा” का नाम दे दो. मतलब ये कि शरीर और मन सहित आत्मा की क्षणभंगुरता के आधार पर शरीर और मन से दूरी बनाने वाले अभ्यास बौद्धों से सीख लो लेकिन उन्हें नाम ऐसा दो कि ये “अनात्मा की अनुभूति” का नहीं बल्कि “आत्मा के साक्षात्कार” करने का अभ्यास है.

    इसे ठीक से समझिये, जब अष्टावक्र, ओशो रजनीश, मोरारी बापू, रविशंकर, जग्गी वासुदेव, आसाराम बापू जैसे वेदांती बाबा ध्यान करवाते हुए ये कहते हैं कि शरीर को शिथिल करो, मन को शिथिल करो, मन और शरीर दोनों को भूल जाओ और विश्राम में प्रवेश करो तब असल में वे बौद्ध टेक्नोलोजी का ही प्रयोग कर रहे हैं. वे असल में प्रेक्टिकली यही कह रहे हैं कि शरीर तुम्हारा नहीं और व्यक्तित्व भी तुम्हारा नहीं है. और इसी क्रम में तुम भी तुम्हारे नहीं हो तो फिर झंझट क्या है? इन्हें भूल जाओ और सुखी हो जाओ. यही अष्टावक्र का महावचन है जो कि असल में बुद्ध की टेक्नोलोजी से चुराया गया है. “तू शरीर नहीं है, मन नहीं है, संस्कार नहीं है, स्मृति, कल्पना, भूत भविष्य और व्यक्तित्व नहीं है, – ऐसा जान ले और मुक्त हो जा” यही अष्टावक्र का जनक को उपदेश है. लेकिन अष्टावक्र या ओशो या आसाराम बापू जब ऐसे वेदान्त का पाठ पढ़ाते हैं तो एक भयानक गलती भी करते जाते हैं. उसी गलती से पकड में आता है कि पूरा वेदान्त बौद्ध दर्शन से चुराया गया है. आइये इस गलती को पकड़ते हैं. ये गलती क्या है?

    बुद्ध कहते हैं कि शरीर, मन, व्यक्तित्व और यह झूठी सत्ता (आत्मा) सब उधार हैं और बाहर से आये हैं इसीलिये इनको निरस्त कर देना संभव है. वेदान्त भी आधी बात मानता है कि शरीर और मन को निरस्त किया जा सकता है. लेकिन बुद्ध इसके आगे जाकर कहते हैं कि इस निरस्तीकरण के बाद कुछ शेष नहीं रहता, न अनुभव न ही अनुभोक्ता सब कुछ शून्य हो जाता है. यहाँ आकर वेदांती पंडित घबरा जाते हैं. हालाँकि वे निर्वाण की बाकी टेक्नोलोजी को चुराकर प्रयोग जरुर करते हैं लेकिन उसके तर्क की ह्त्या करके लोगों को उलझा देते हैं. इसी उलझन का नाम हिन्दू धर्म है. ये उलझन क्या है? गौर से देखिये. वेदांती पंडित कहते हैं कि यह मुक्ति संभव है और इस मुक्ति का आनंद लेने वाली सत्ता या आत्मा अजर अमर है. अब यह भयानक पाखंडी और विरोधाभासी बात है.

    असल में वेदान्त भी मानता है कि मैं और मेरे से मुक्ति ही असल मुक्ति है. लेकिन जब वे साधना, योग, तंत्र, मन्त्र आदि की शिक्षा देते हैं तो “मेरे” से मुक्ति की बात तो जरुर करते हैं लेकिन “मैं” से मुक्ति की असली बौद्ध सलाह को छुपा देते हैं. यही उनका षड्यंत्र है. वेदांती पंडित “मेरे” अर्थात “भौतिक मानसिक परिग्रहों” से मुक्त होने की सलाह और अभ्यास जरुर सिखाते हैं लेकिन “मैं” से मुक्त होने की सलाह नहीं देते, यह बौद्ध सलाह है जिसे वे छुपा देते हैं. वे इस मैं को एक सनातन आत्मा का नाम देकर खूंटे की तरह गाड़कर अमर कर देते हैं. हालाँकि फिर भी “मैं और मेरे” से मुक्ति की ढपली जरुर बजाते हैं ताकि उनकी प्रस्तावना बुद्ध की प्रस्तावना की तरह महान नजर आ सके. लेकिन आप सावधानी से देखें तो पकड लेंगे कि यहाँ क्या पाखंड चल रहा है.

    बुद्ध इस मुक्ति या निर्वाण को “मैं और मेरे” से सच्ची मुक्ति की तरह स्वीकार करते हैं और इसी स्वीकार से जन्मी टेक्नोलोजी बनाते हुए “मैं” (आत्मा या मन) और मेरे (शरीर, संबंध, संपत्ति आदि) को क्षणभंगुर और बाहरी करार देते हैं. इस प्रकार बंधन की शारीरिक या मानसिक संभावना पर पूरा विराम लगा देते हैं. लेकिन वेदान्त क्या करता है? वेदान्त “मेरे” से मुक्ति का खूब शोर मचाता है और उस “मेरे” का दलदल या भूसा पैदा करने वाले “मैं” (गेहूं) अर्थात आत्मा को सनातन, शाश्वत और परमात्मा का अंश बनाकर एकदम खूंटे की तरह गाड़ देता है.

    यही वेदान्त का असल षड्यंत्र, कन्फ्यूजन और चालाकी भी है. जब आप आत्मा या स्व को मानकर “मैं” को मजबूत करेंगे तो “मेरा” का दलदल अपने आप पैदा होगा ही. ये एकदम स्वाभाविक है. इस तरह आप अंदर से अधिक परिग्रही और मोही होते जायेंगे. अब जैसे जैसे ये परिग्रह भाव और मोह बढेगा वैसे वैसे आपकी आत्मग्लानि बढ़ेगी, इसी क्रम में आप दुखी और कन्फ्यूज होते जायेंगे और इस तरह आप संशय ग्रस्त होकर कमजोर होंगे और वेदांती पंडित इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए आपका शोषण करेगा. तब वह अपना असली खेल शुरू करता है. इस कमजोरी और संशय की हालत में वह अपना रोजगार और अधिसत्ता को कायम रखने का असली जुगाड़ बनाता है और आपको इसकी भनक भी नहीं लगती.

    लेकिन इस संबंध में बुद्ध क्या करते हैं? बुद्ध कहते हैं कि “मेरा” तो उधार है ही “मैं” (स्व,आत्मा, मन) भी उधार और बाहरी ही है. इसे जान लेने के बाद “मैं” को बचाने की हवस ही खत्म होने लगती है और मजे की बात ये कि “मेरा” को मिटाने या नकारने की तब कोई जरूरत नहीं रहती. अगर “मैं” (आत्मभाव/ खुदी का अहसास) नाम का गेंहू ही कमजोर होने लगे तो उससे पैदा होने वाला भूसा (अर्थात “मेरा”) कितनी देर टिकेगा और कैसे पैदा होगा? इस तरह बुद्ध मैं और मेरे से मुक्ति का जो दर्शन और लक्ष्य बताते हैं उसे अपनी प्रस्तावना और साधना की टेक्नोलोजी में इमानदारी से अंजाम तक पहुंचाते भी हैं. बीच में कोई कन्फ्यूजन पैदा नहीं करते. इसीलिये उनकी टेक्नोलोजी “आत्म के विश्लेषण” की टेक्नोलोजी है “आत्मसाक्षात्कार” की टेक्नोलोजी नहीं है. आत्मसाक्षात्कार दुनिया का सबसे झूठा जहरीला और पाखंडी शब्द है, ठीक ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की तरह.

    लेकिन ओशो, जग्गी वासुदेव या आसाराम बापू जैसे वेदांती गुरु आधी बात में उलझाकर संशय में डाले रखते हैं और इस संशय में असल सोशल-इंजीनियरिंग और वर्णाश्रम का खेल खेलते हैं और एक ख़ास तरह की धर्मसत्ता और राजनीतिक सत्ता को बनाये रखते हैं. इस तरह गौर से देखें तो वेदान्तिक अध्यात्म असल में ब्राह्मणवादी सत्ता को बनाये रखने का सबसे सूक्ष्म और परिष्कृत हथियार या जाल है. इसमें फंसने वाले को जिन्दगी भर ये समझ नहीं आती कि “मैं और मेरे” से मुक्ति की बात करने वाले “मैं” को सनातन क्यों बता रहे हैं? ये सवाल ही पैदा नहीं होने दिया जाता उनके मन में. वे सोच ही नहीं पाते कि अगर कोई चीज सनातन या शाश्वत है या सर्वय्व्यापी परमात्मा का अंश है तो उससे मुक्ति भी संभव नहीं है. मुक्ति या दूरी उसी चीज से संभव है जो क्षणभंगुर है, सीमित और परिवर्तनशील है.

    इस समझ को पैदा होने से रोके रखने के लिए जो षड्यंत्र रचा गया है वही वेदान्त और उसका मायावाद है. इसे सभी लोगों को और खासकर दलितों, आदिवासियों, शूद्रों (ओबीसी) और स्त्रीयों को ठीक से समझ लेना चाहिए.

    (लिखी जा रही और शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)

    – © संजय जोठे 

  • अतीत का साम्प्रदायिकीकरण : ‘पद्मावती’ फिल्म यूनिट पर हमला

    Sanjay Leela Bhansali & Padmavati movie

    संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक फिल्म पद्मावतीकी शूटिंग के दौरान, हाल (जनवरी, 2017) में जयपुर में फिल्म यूनिट पर हमला हुआ। बहाना यह था कि फिल्म में एक स्वप्न दृश्य है, जिसमें मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी और राजपूत राजकुमारी पद्मावती को एक साथ दिखाया गया है। यह हमला करणी सेनानामक एक संगठन ने किया, जो राजपूतों के गौरवकी रक्षा के लिए काम करता है। उसका मानना था कि यह फिल्म राजपूतों की शान में गुस्ताखी है। यह दिलचस्प है कि फिल्म की शूटिंग अभी शुरू ही हुई है और करणी सेना के पास फिल्म की पटकथा उपलब्ध नहीं है। इस मामले में राज्य सरकार चुप्पी साधे रही और उसने इस हमले की निंदा करने तक की जरुरत नहीं समझी। हमले के बाद, भंसाली ने शूटिंग बंद कर दी और घोषणा की कि अब वे राजस्थान में कभी शूटिंग नहीं करेंगे। इसके बाद कुछ भाजपाविहिप नेताओं ने यह धमकी दी कि वे देश में कहीं भी इस फिल्म की शूटिंग नहीं होने देंगे। इसी करणी सेना ने कुछ समय पहले उन सिनेमाघरों पर हमले किये थे, जहाँ ‘‘जोधा अकबर’’ फिल्म दिखाई जा रही थी। यह फिल्म एक अन्य राजपूत राजकुमारी जोधाबाई पर आधारित थी।

    अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कथा कपोलकल्पित बताई जाती है, यद्यपि कुछ लोगों का मानना है कि चूँकि अलाउद्दीन खिलजी ऐतिहासिक चरित्र था, इसलिए यह कथा भी सही होनी चाहिए। सच यह है कि पद्मावती और उनके जौहर की कहानी खिलजी के शासनकाल के लगभग दो सदियों बाद, 16वीं सदी में सूफी संत मलिक मोहम्मद जायसी की एक रचना का भाग है। यह कहानी चित्तौड़ के शासक रतन सिंह और काल्पनिक सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा पर आधारित है। पद्मावती का तोता हीरामन, रतन सिंह को राजकुमारी की सुंदरता के बारे में बताता है। हीरामन, रतन सिंह को पद्मावती तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है और फिर दोनों प्रेमी एक हो जाते हैं। इस कहानी के अनुसार, रतन सिंह को राघव पंडित नामक एक व्यक्ति धोखा दे देता है और उस पर कुंभलनेर का राजा हमला कर देता है। इस हमले में रतन सिंह मारा जाता है। कुंभलनेर का राजा भी पद्मावती को पाना चाहता है। खिलजी भी राजकुमारी के सौन्दर्य पर मोहित है और उसे पाने के लिए रतन सिंह के राज्य पर हमला करता है परंतु खिलजी के वहां पहुंचने के पहले ही पद्मावती किले की अन्य महिलाओं के साथ जौहर कर लेती है। जिस सूफी संत ने यह अमर प्रेम कहानी लिखी थी, उसने इस कथा को सत्ता की निरर्थकता और मनुष्य की आत्मा की मुक्ति की चाहत के रूपक बतौर प्रस्तुत किया था। 

    Padmavati movie

    समय के साथ, पद्मावती, राजपूती शान का प्रतीक बन गई और खिलजी, एक हवसी मुसलमान आक्रांता का। विभिन्न समुदाय, अतीत को किस रूप में देखते हैं, यह काफी हद तक वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। इस कहानी का उपयोग इतिहास को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है, जिसमें राजाओं को अपनेअपने धर्मों के प्रतिनिधि के रूप में दिखाया जाता है। सच यह है कि राजाओं का उद्देश्य केवल अपने साम्राज्य का विस्तार करना रहता था। वर्तमान समय में इस तथ्य को भुलाकर, राजाओं द्वारा किए गए युद्धों को सांप्रदायिक चश्मे से देखा जा रहा है। यह बताया जा रहा है कि राजपूतों ने मुस्लिम आक्रांताओं के खिलाफ बहादुरी से युद्ध किया और ‘‘अपनी महिलाओं’’ के सम्मान की रक्षा की। इन महिलाओं ने मुस्लिम राजाओं के हाथों अपवित्रहोने से मर जाना बेहतर समझा। इस कहानी का इस रूप में प्रस्तुतीकरण, इतिहास को झुठलाने का प्रयास है। इतिहास में राजपूतों और मुगल राजाओं के गठबंधन के कई उदाहरण हैं और कई बार इस तरह के गठबंधन बनाने के लिए विवाहों का प्रयोग भी किया जाता था। ‘‘जोधा अकबर’’ फिल्म भी एक मुस्लिम राजा और हिन्दू राजकुमारी की कथा पर आधारित है। 

    समस्या यह है कि हम इतिहास और कल्पना में भेद नहीं कर पा रहे हैं। भारत में मुगल राजाओं ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के प्रयास में युद्ध और गठबंधन दोनों किए। अकबर और राणा प्रताप में लंबे समय तक युद्ध चला परंतु राणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने अकबर के पुत्र जहांगीर के साथ गठबंधन कर लिया। मुगल प्रशासन में कई राजपूत उच्च पदों पर थे। मध्यकालीन भारत में मुगल और राजपूतों के परस्पर संबंधों के कई उदाहरण हैं। 

    राजपूत राजकुमारियों के बारे में दो तरह की धारणाएं प्रचलित हैं। पहली, जिस पर अधिकांश लोग विश्वास करते हैं, वह यह है कि इन राजकुमारियों ने अपने सम्मान की रक्षाके लिए अपने जीवन की बलि दे दी और दूसरी यह कि राजघरानों ने अपनीअपनी सत्ता को मजबूत करने के प्रयास में परस्पर विवाह किए। पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले लोग ‘‘अपनी पुत्री किसी को देने’’ को अपने समुदाय की हार के रूप में देखते हैं और इसी कारण इतिहास के सच को भुलाकर जौहर का महिमामंडन किया जा रहा है। ‘‘जोधा अकबर’’ फिल्म बताती है कि किस तरह दो शासक परिवारों ने अपने गठबंधन को मज़बूती देने के लिए एक राजपूत राजकुमारी का विवाह मुगल बादशाह से कर दिया। आज समुदाय के सम्मान की जो धारणाएं प्रचलित हो गई हैं, उनके कारण इन ऐतिहासिक तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया जा रहा है। 

    ‘‘पद्मावती’’ फिल्म का मामला इससे भी एक कदम आगे बढ़कर है। राजपूतों के गौरव के स्वनियुक्त रक्षकों ने केवल अफवाह के आधार पर फिल्म यूनिट पर हमला कर दिया। हम नहीं जानते कि फिल्म के निदेशक फिल्म में क्या दिखाना चाहते हैं परंतु करणी सेना को एक स्वप्न के दृश्य में भी राजपूत राजकुमारी और मुसलमान बादशाह का साथ दिखाया जाना मंजूर नहीं था। इस तरह की असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी, कलात्मक स्वतंत्रता पर हमले कर रहे हैं और हिन्दुत्व की राजनीति उन्हें बढ़ावा दे रही है। फिल्म निर्माताओं और निदेशकों को इस तरह की ताकतों की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ रहा है। हमारी सरकार, जिसे अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करनी चाहिए, मूक होकर इस तरह की घटनाओं को देख रही है। इससे यह स्पष्ट है कि हिन्दुत्व की विचारधारा में कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं है और ना ही वह अतीत को किसी भी ऐसे रूप में दिखाए जाने के पक्ष में है, जो उसे नहीं भाता। हमारा राज्य, प्रजातंत्र की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है।


    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया

  • भारतीय अध्यात्म, प्रतिक्रांति का सनातन अस्त्र –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।


    भारत में सामाजिक राजनीतिक बदलाव को रोकने के लिये सबसे कारगर हथियार की तरह जिस उपकरण को सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है वो है भारत का धर्म और अध्यात्म। भारत का धर्म और इसका पलायनवादी अध्यात्म भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है लेकिन दुर्भाग्य ये कि इसे ही भारत की केंद्रीय संपदा के रूप में प्रचारित किया जाता है। ये हजारों साल से चला आ रहा षड्यंत्र है और जब तक भारत अकेला था, तब तक ये षड्यंत्र सफल भी होता रहा। लेकिन जैसे ही व्यापार, राजनीति और सामरिक समीकरणों में अन्य सभ्यताओं और मुल्कों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई वैसे ही इस षड्यंत्र की पोल खुल गयी और भारत हर सदी में किसी न किसी का गुलाम होता गया।

     

    पौराणिक कहानियों में हम जिस भारत या समाज को पाते हैं वो कभी जमीन पर रहा ही नहीं। असल में भारत का पुराण और मिथकशास्त्र भारतीय आध्यात्मिक षड्यंत्र का स्वाभाविक परिणाम हैं, जिसने इतिहास बोध, न्याय बोध और सभ्यता बोध को पनपने ही नहीं दिया। आद्यात्म पढ़े लिखे वर्ग को बाँझ बनाता है और मिथक या पुराण गरीब अनपढ़ वर्ग की गर्दन कसता है, और इस खेल का नियंत्रण ब्राह्मणवाद के हाथ में उनके शास्त्रों के और व्याख्याओं के जरिये होता है। ये तरीका हर दौर में आजमाया गया है और कामयाब रहा है। क्षत्रियों को परशुराम के द्वारा से और वैश्यों को सत्यनारायण के द्वारा काबू किया गया और शूद्रों को पुनर्जन्म से कसा गया। ऐसे हर दौर में भारत के भीतर ही भीतर चार वर्णों की व्यवस्था में एक वर्ण का आधिपत्य बनाये रखने में ये सबसे सफल रणनीति रही है।

     

    जब क्षत्रियों वैश्यों शूद्रों और जनजातीय समाजों को काबू में रखना था तब तक ये आद्यात्मिक पौराणिक षड्यंत्र बहुत सफल रहा। जब तक “काबू किये जाने योग्य” जनसँख्या भारतीय ढंग के आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म में भरोसा करती रही और इन चीजों से डरती रही तब तक ये व्यवस्था बेहतरीन ढंग से चलती रही। यहां तक सफल रही कि धर्म की रक्षा को ही जीवन और विकास की गारंटी मान लिया गया। वर्ण और आश्रम का पालन ही धर्म बन गया। और धर्मो रक्षति रक्षते जैसी उक्तियाँ और अहम ब्रह्मास्मि जैसे निहायती षड्यंत्रपूर्ण और तर्कविरोधी वक्तव्य इसी दौर में उभरे और छा गए, इनका प्रकोप अभी भी बना हुआ है।

     

    भारतीय धर्मभीरु जनसँख्या को काबू करने में मिली यह सफलता ज्यादा देर टिक न सकी। जब यवनों, अफ़ग़ानों, तुर्कों, मुगलों, ब्रिटिशों का प्रवेश हुआ तो उन्हें भारतीय ढंग के धार्मिक भयों की कोई चिंता नहीं थी वे एक तुलनात्मक रूप से सभ्य और संगठित समाज से आये थे और इसी कारण उन्होंने भारत को तुरंत गुलाम बना लिया और भारत के धर्मभीरु और उनके वेदांती आका समझ ही न सके कि ये क्या हो गया? वेदांती आका तो फिर भी इस गुलामी में अपनी सत्ता बहुत ढंग से बचाकर रख सके लेकिन क्षत्रियों, राजपूतों, वैश्यों, शूद्रों को बहुत अपमान और पीड़ा से गुजरना पड़ा। इस एक हजार साल से लंबी गुलामी में वेदांती पुरोहित वर्ग ने गुलाम बनाने वाली कौमों से भी समझौते कर लिए और गुलाम हुई भारतीय धर्मभीरु जनता पर धार्मिक अंधविश्वासों, मिथकों, पुराणों और जाति व्यवस्था का शिकंजा और अधिक कस दिया ये आजकल और तेज हो गया है।

    मुसलमानों की हुकूमत में ब्राह्मणी आधिपत्य को बहुत व्यवस्थित चुनौती नहीं मिली लेकिन ब्रिटिश आधिपत्य में ब्रिटशों ने शिक्षा, भाषा, धर्म आदि में सीधा हस्तक्षेप शुरू कर दिया इससे ब्राह्मणवाद तिलमिला उठा और यूरोपीय पुनर्जागरण के ही तत्वों से प्रभावित होकर छुटपुट सुधार और बदलाव भी करने लगा। तब तक चूँकि आधुनिकता, विज्ञानवाद और औद्योगीकरण की हवा बन चुकी थी जिसका अंग्रेजी शिक्षा द्वारा लाभ उठाकर भारतीय मध्यमवर्ग समाज बदलाव के लिए तैयार होने लगा।

    लेकिन आजादी के काफी पहले विश्वयुद्धों और आर्थिक मन्दियों के परिणाम में ये तय हो चुका था कि ब्रिटिश सत्ता ज्यादा देर भारत को गुलाम नहीं रख सकेगी तब भारतीय वेदान्तियों ने अपनी सनातन कला को फिर से चमकाना शुरू किया। जिन शास्त्रों कर्मकांडों रहस्यवादी शिक्षाओं ने इस मुल्क को गरीब गुलाम और बुजदिल बनाया था उन्ही शास्त्रों, धर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को फिर से प्रचारित करने का काम शुरू हो गया। यूरोपीय सभ्यता में रचे बसे थियोसोफिकल सोसाइटी, अरबिंदो घोष, विवेकानन्द, राममोहन रॉय, केशब चन्द्र, देबेन्द्रनाथ और अन्य अनेक लोगों ने ईसाई धर्म की नकल में एक नया धर्म बुना जो सामाजिक सुधार और ईसाई मिशनरी सेवा से प्रेरित था। यह नियो वेदांत या नियो हिंदूइस्म है जिसे हम आज देख रहे हैं। विवेकानन्द ने तो आयरलैंड की एक प्रशिक्षित कैथोलिक नन को बाकायदा ऐसा धर्म और मिशनरी काम सिखाने के लिए भारत बुलाया था। उन्हें भगिनी निवेदिता कहा जाता है।

    आजादी के बाद, देश के विभाजन के बाद वेदांती हिंदूवादी सत्ता को अपनी सुरक्षा की चिंता बराबर बनी रही। इसी दौर में धीरे धीरे ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण उभरा और बाद में शिखर पर पहुंचा। 50, 60, से लेकर 90 के दशक तक भारतीय पोंगा पंडितों ने इस नियों हिंदुइज्म को पश्चिमी मापदण्डों के अनुरूप और विज्ञान के अनुरूप ढालने का व्यवस्थित ढंग से काम किया लेकिन इस जाति व्यवस्था ने उनकी फांसी लगा दी। वे जितना ही महान बनने की कोशिश करते उतना ही भारत की गरीबी गन्दगी और सामाजिक छुआछूत के सवाल उनसे टकराने लगते। ऐसे में हिन्दू धर्म को ईसाई मिशनरी समाजसेवा प्रधान धर्म की फोटोकॉपी में बदल देने का जो प्रोजेक्ट हाथ में लिया वह असफल होने लगा।

    हालाँकि तब तक स्वतंत्र भारत में वर्ण व्यवस्था के शिखर पर बैठे लोगों ने फिर से सत्ता कायम कर ली और वे देख सके कि ईसाई धर्म की सभ्यता और समाज सेवा भारत में फ़ैल गयी तो उनकी सत्ता को शुद्र, आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों की टक्कर मिलने लगेगी। अंबेडकर, फुले, पेरियार ने तब तक यह हकीकत में करके दिखा भी दिया था।

    ऐसे में बड़ा संकट पैदा हुआ, नेहरू के सुधारों ने जिस समता और सबलीकरण की इबारत लिखी वह कुछ हद तक ही लेकिन सही दिशा में सफल रही और पिछड़ी जातियों और स्त्रियों में विराट शक्ति पैदा हुई। इन “पापयोनियों” की शक्ति बढ़ते देख पोंगा पंडितों को बड़ी चिंता हुई। अब ऐसे धर्म की जरूरत थी जो आभासी जगत में शुध्द बुद्ध होने और सबके समान होने की बात करे और सामाजिक बदलाव को भी एकदम असंभव कर दे। मतलब आश्रम की दीवार के अंदर भाईचारा, प्रेंम, सहभोज और फ्री सेक्स तक दे सके लेकिन आश्रम की दीवार के ठीक बाहर जाति और लिंग का विभाजन तुरन्त शुरू हो जाए।

    अब यह काम कैसे हो और कौन करे?

    यह काम अरबिंदो, विवेकानन्द, ओशो, आसाराम बापू जैसे लोगों ने किया। अध्यात्म और परलोक का ऐसा जाल बुना गया जिसमें कहा गया कि समाज कैसा भी सड़ता रहे तुम ज्ञान ध्यान और मोक्ष में लगे रहो। अद्वैत का प्रचार हुआ कि कण कण में ब्रह्म है, “तत्वमसि” तुम वही ब्रह्म हो, सब पंचतत्व के पुतले हैं कोई भेद नहीं। साथ ही जाति, वर्ण और लिंग के भेद और दान इत्यादी भी चलता रहा।

     

    बाद में शहरी जीवन में जाति और लिंग के भेदभाव ने शहरी मध्यम वर्ग को और अधिक डरा दिया। पहले ही भारतीयों में आपस में सहयोग, संबन्ध और प्रेम नहीं था ऊपर से शहरी जीवन की असुरक्षाओं ने मध्यम वर्ग को और डरा दिया। युवा वर्ग यूरोपीय सभ्यता, मुक्त मित्रता और मुक्त प्रेम के वातावरण से मोहित हो ही चूका था और भारतीय बाबाओं ने इसी सम्मोहन और प्यास को आटा बनाकर धर्म के कांटे पर लगाकर तीन पीढ़ियों का शिकार किया। जो मैत्री, प्रेम, सहकार, सहभोज, सुरक्षा और अपनापन समाज में युवाओं को नहीं मिलता वह आश्रमों में परोसा जाने लगा। कामकाजी वर्ग भी इस “आसान और आभासी” इंसानियत से प्रभावित होने लगा और इन बाबाओं योगियों ने बड़ी कुशलता से आध्यात्मिक पलायनवाद में शहरी कामकाजी युवावर्ग को फंसा लिया, इसी युवावर्ग में सामाजिक बदलाव की ललक उठती है, उसे नियों वेदान्तिक अध्यात्म में फंसाकर बाँझ बना दिया। 

     

    अब मजा ये कि उस धर्म और अध्यात्म के ठीक समानांतर धर्म और कॉरपोरेट का नया समीकरण बन गया जिसने राजनीति को अपने ढंग से चलाना शुरू किया। अद्वैत और छुआछूत की समानांतर पटरियों पर  पर ब्राह्मणवाद की ट्रेन फिर चलने लगे और राजनीति और कॉरपोरेट का ईंधन उन्हें तेजी से धार्मिक राष्ट्रवाद की तरफ खींचने लगा। भारतीय बाबा कारपोरेट और राजनेता अपने काम में सफल रहे। इस काम में उन्हें सबसे बड़ी चुनौती कबीर, गोरख और बुद्ध से मिली। लेकिन उसका इलाज भी ढूंढ लिया गया। बुद्ध को विष्णु, कबीर को वैष्णव और गोरख को शिव अवतार बनाकर खत्म कर दिया और उनकी शिक्षाओं को वेदान्तिक शिक्षा की तरह पुनर्जन्म और सनातन आत्मा में लपेटकर पेश कर दिया गया। अब कोई समस्या नहीं रही।

    अब इसके बाद का भारत आपके सामने है। अभी जितने बाबा योगी और गुरु हैं उन्हें और उनकी शिक्षाओं को कॉर्पोरेट और राजनीति के साथ मिलाकर इस नजर से देखिये, तब आप समझ सकेंगे कि भारतीय धर्मगुरु कितने खतरनाक मिशन में किस योजना से लगे हुए हैं। और इन गुरुओं में सबसे प्रभावशाली गुरु रहे हैं ओशो उन्होंने इस पतन में चार चांद लगा दिया। आज के पोंगा पंडितों की पूरी फ़ौज के भीष्म पितामह वे ही हैं।  आज ओशो रजनीश का जन्मदिन है। आज उन पर गहराई से विचार करें और सोचें कि इन बाबाओं, नेताओं और उद्योगपतियों के षड्यंत्रों से भारत की जनता को कैसे बाहर निकाला जाए।

     

  • कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है –Sanjay Jothe


     

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

     

         

    कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है। ऐसा क्यों है? ऐसा होना नहीं चाहिए, लेकिन है। सृजनात्मक लोगों के बीच इस तरह मेलजोल और एकता क्यों नहीं है? एकता एक नैतिक प्रश्न है अगर आपकी नैतिकता विखण्डन और विभाजन के चारे से बनी है तो सृजनात्मक आयामों में भी एकता नहीं बन पाएगी।

     

    इतिहास में देखें समाज के सबसे शक्तिशाली आयाम – राजनीति के प्रति भी हमारी जनता में एक उपेक्षा फैलाई गई थी जो अभी भी बनी हुई है- “कोउ नृप होय हमे का हानि”, ये वक्तव्य सभ्यता और एकता वाले समाज में असंभव है हाँ विभाजन वाले और असभ्य समाज में ये न केवल संभव है बल्कि यही उसके सार्वजनिक और सामाजिक जीवन का एकमात्र नियम भी है। कोई भी राजा हो हमें क्या मतलब – इसका अर्थ है कि आपके राजा और राजगुरु, राजसत्ता आपके हितैषी नहीं हैं और आपको उनसे कोई लगाव नहीं है। मतलब कि देश, इतिहास, भूगोल सहित धर्म और समाज की धारणा ही यातो अभी यहां जन्म नही ले पायी है या मिटा दी गयी है।

     

    ये धारणा क्यों जन्म नहीं ले पायी? या क्यों मिटा दी गयी? इस प्रश्न के उत्तर में भारत के पूरे इतिहास और मनोविज्ञान का सार छुपा हुआ है। अभी किसी गाँव में जाइये किसी हेण्डपम्प या तालाब या कुवें के पास खड़े हो जाइये अगर वो सूख रहा है तो पूरे गाँव को एक जैसा दुःख नहीं होता। समाज के एक बड़े वर्ग के लिए पानी का ये स्त्रोत उपलब्ध ही नहीं, उसे इस स्त्रोत के पास फटकने ही नहीं दिया जाता। ये ताल या हेण्डपम्प सूख मरे तो वे लोग कहेंगे हमे क्या मतलब सूखे तो सूख जाए। इसी तरह जिन व्यापारों, व्यवसायों में आपका या आपके परिवार, रिश्तेदारों का दखल या हित नहीं है उनके बन्द हो जाने पर या उन पर हमला हो जाने पर आप कह सकते हैं कि हमें क्या मतलब आपका बिजनेस डूबता है तो डूबे। इसी तरह जिन जातियों में आपके लोगों का भोजन या विवाह नहीं होता वे गुलाम हों या दंगे में मरें, आपको कोई फर्क नही पड़ता। अगर आपके रिश्तेदार और हितैषी हर जाति हर वर्ग में हों तो आपको उन जातियों वर्गों की ख़ुशी या सुख से सहानुभूति होगी।

    लेकिन भारत में एक किस्म का “सामाजिक वैराग्य” बनाकर रखा जाता है ये वैराग्य नहीं बल्कि पलायन और छुआछूत है, जिम्मदारी से भागने का दूसरा नाम है। इससे समाज विभाजित कमजोर और जातिवादी बना रहता है। इसीलिये गौर से देखिये तो साफ़ समझ में आएगा कि ओशो, रविशंकर, जग्गी वासुदेव जैसे भारतीय धर्मगुरु, योगी, बाबा आदि ऐसे वैराग्य और मोक्ष की धारणा से भरा जहरीला अध्यात्म हर एक पीढ़ी को पिलाते रहते हैं। ये बाबा हर पीढ़ी को पलायनवादी वेदांत सिखाते चलते हैं। इनका एकमात्र फायदा इस बात में है कि भारत की गरीब दलित दमित जनता इस सामंती और पुरुषसत्तावादी धर्म से आजाद न हो जाए। कर्मकांड न सही तो अध्यात्म की रस्सी से ही ये धर्म के खूंटे से बंधी रहे। ताकि उनका कुआँ न सूखे।

    इसी तरह आज के फ़िल्मकार साहित्यकार चित्रकार और सृजनधर्मी लोग हैं। सबके अपने कुवें और हेण्डपम्प है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। यहां अपनी झोली भर जाए तो मोक्ष मिल जाता है बाकी समाज और दुनिया जाये भाड़ में अपना कुटुंब ही वसुधैव कुटुंब है।

    हसन निसार ने एक चर्चा में थॉमस रो का उदाहरण देते हुए कहा है कि अंग्रेजी अधिकारियों ने जब भारत में पैर फ़ैलाने शुरू किये तो मुगल दरबार में किसी बादशाह के बीमार बेटे का उन्होंने एलोपैथी से इलाज किया बेटा स्वस्थ हुआ तो बादशाह ने खुश होकर कहा कि इस अंग्रेज के वजन के बराबर सोना तौलकर इसे दिया जाए। अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि बादशाह मुझे ये सोना नहीं चाहिए बस मुझे और मेरी कौम को हिंदुस्तान से व्यापार की इजाजत दे दीजिए।

    इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। हालाँकि इसका ये अर्थ नहीं कि उन अंग्रेजो की लूटमार भरी नैतिकता सर्वथा प्रशंसनीय है। लेकिन फिर भी कुछ श्रेष्ठता का तत्व तो उनमें है ही। उसी श्रेष्ठता ने भारत को आधुनिकता और सभ्यता दी है।

    अब देखिये, भारत में जब साहित्यकारों पर हमले होते हैं तो फिल्मकार बिरादरी को फर्क नहीं पड़ता। फिल्मकारों पर हमले होते हैं तो खिलाडियों को फर्क नहीं पड़ता। वो तो आजकल फिल्मकारों और खिलाड़ियों में प्रेम विवाह और अंतर्जातीय अंतरधार्मिक विवाह होने लगे हैं इसलिए उनके बीच एकता जन्म ले रही है। डॉ. अंबेडकर ने इसीलिये अंतर्जातीय विवाह की सलाह दी थी, बॉलीवुड और क्रिकेट के बीच वह सलाह बढ़िया काम कर रही है। लेकिन साहित्य, संगीत कला आदि में अभी भी मनुस्मृति ही चल रही है।

    अब बड़ा प्रश्न ये है कि साहित्य और खेल या साहित्य और फिल्म के बीच ये प्रेम क्यों नहीं पनप रहा है?

    इसका बहुत गहरा कारण है। साहित्य और फिल्म इतने गहराई से और सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं कि उनके सन्देश से बड़ा बदलाव आ सकता है। इसीलिये इस देश के धर्म संस्कृति के ठेकेदारों को पता है कि साहित्यकार और फिल्मकार तबकों को कंट्रोल करके रखना है वरना यहां की जनता कला के सृजनात्मक आयामों की शक्ति से परिचित हो गयी तो इस देश पर शोषक धर्म की सत्ता खत्म हो जायेगी।

     

    इसीलिये बहुत सोच समझकर साहित्य में भी जन विमर्श को अदृश्य बनाकर देवी देवता, भक्ति, राजे रजवाड़े, मिथक, महाकाव्य आदि की चर्चा चलती रही है। हजारों साल से इस मुल्क के साहित्य में आम आदमी की कोई बात नहीं हो रही थी, 1935 तक मुख्यधारा के साहित्य में जिस तरह का नायिका विमर्श और श्रृंगार वर्णन चला उसे देख लीजिये। वो तो भला हो कार्ल मार्क्स और अन्य दार्शनिकों का जिन्होंने भारतीय विद्वानों को पहली बार जन हितैषी साहित्य रचना सिखाया। वरना आज तक नख शिख वर्णन और भजन कीर्तन स्तुतियाँ इत्यादि ही चलती रहती।

    हालाँकि मार्क्स के आने के बाद भी भारतीय भक्ति का आभामण्डल कम नहीं हुआ है। आज भी कला, संगीत, साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र उसी परलोकी, आत्मघाती अध्यात्म में जड़ जमाये हुए है। आज भी कला के आनन्द की उपमा ‘विदेही भाव, समाधी भाव और समय की स्तब्धता’ से दी जाती है। मतलब इस लोक से हटकर परलोक में ले जाने वाली कला ही महान कला है। बाकी सब बेकार है। ये सब उसी जहरीले कुवें से निकलने वाली शब्दावली है जिसने स्त्री अधिकार और स्त्री विमर्श की बजाय नायिका विमर्श पैदा किया था। या जिसने दलित साहित्य की बजाय “दास्य भक्ति साहित्य” पैदा किया था।

    साहित्य के बाद जब फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो भारत का यही देवता विमर्श या नायिका विमर्श भक्ति में और इश्क मुहब्बत की छिछोरी रंगीनियों में ट्रांसलेट हो गया। हालाँकि यूरोप में भी फ़िल्मी सफर ऐसे ही शुरू हुआ था। पहले धर्म फिर इश्क मुहब्बत। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने अन्य विषय भी सीख लिए। बायोग्राफ़िकल, हिस्टोरिकल, डॉक्यूमेंट्री स्टाइल फिल्में वहां खूब सराही जाती हैं। इधर भारत में इसकी कल्पना ही असंभव है। यहां अभी भी रामलीला चल रही है। स्त्री विमर्श सास बहू विमर्श बना हुआ है। एक सभ्य और इंसानी समाज होने के नाते यूरोप में उन्होंने इंसानी अधिकारों की परिभाषा जल्द सीख ली और अपने साहित्य औऱ फिल्मों में उसे अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। लेकिन हमारा देश धर्मप्राण होने के नाते आज भी देवी देवताओं और मिथकों महाकाव्यों में ही घुसा जा रहा है, बहुत हुआ तो इश्क मुहब्बत और शादी के वीडियो चला देते हैं या चलताऊ देशभक्ति के हैंडपंप उखाड़ने वाले “गदरीले नायक” रच देते हैं।

    भारत का साहित्य और फिल्म आज भी पूरी तरह जन विमर्श में नहीं उतर सका है। अभी भी पुराने सौन्दर्यशास्त्र का मोह ऐसा बना हुआ है कि समानता, प्रेम, स्त्री अधिकार, दलित अधिकार की प्रस्तावनाओं से डर लगता है। और तो और बच्चों को भी वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा देने से डर लगता है कि कहीं वे अधर्मी न हो जाएं। इसीलिए सारे बाबा योगी और पंडित मिलकर बच्चो को ध्यान योग और प्राणायाम के नाम पर विभाजन और इंसानियत के विरोध के “संस्कार” सिखाते हैं।

    ये विभाजक संस्कार असल में भारत को पुराना भारत बनाये रखने की सनातन साजिश है। इसलिए सिनेमा, साहित्य, पत्रकारिता और सभी कलाओं में ठीक राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका की ही तरह सवर्ण द्विजों का ही आधिपत्य बना हुआ है। वे तय करते हैं कि किस गुण को किस भाषा में सद्गुण सिद्ध करना है। किस गुण को मानव हितैषी और “वसुधैव कुटुंब” के “अनुकूल” सिद्ध करना है या “प्रतिकूल” सिद्ध करना है। इन परिभाषाओं से अंततः वे कहाँ और कैसे पहुंचना चाहते है ये वे बहुत सावधानी से तय करते हैं। वे एक ऐसे सर्वोदय या रामराज्य की रचना करते हैं जिसमे वर्ण व्यवस्था भी जारी रहे और वर्णानुकूल कार्य करते हुए “स्वधर्म” पालन करने वाले “संस्कारी पुरुष” और “सुशीला स्त्री” सहित सभी बच्चे तर्क और मानव अधिकार भूलकर संस्कारी भी बनी रहें और यूरोपीय कला, साहित्य, सिनेमा, विज्ञान तकनीक आदि को ऊपर ऊपर सीखकर प्रगतिशील भी बने रहे। भीतर हनुमान चालीस चलती रहे और ऊपर ऊपर “वी शल ओवरकम” या “तुंकल तुंकल लिटिल इश्टार” भी चलता रहे। ऊपर टाई और भीतर जनेऊ चलती रहे। काउबॉय हैट के नीचे संस्कारी चोटी सरकती भी रहे।

    जब कला और कलाओं के प्राप्य या करणीय के प्रति आपके विद्वानों और “विद्वान षड्यंत्रकारियों” का ये रुख है तो आपकी कला और साहित्य भी विभाजन ही पैदा करेंगी और खुद भी विभाजित होंगी। उनमे आपसी मेलजोल से अंतर्जातीय विवाह नहीं होंगे बल्कि छुआछूत पैदा होगी इंटेरडीसीप्लिनरिटी या इनोवेशन का पुरस्कार या प्रेरणा नहीं होगा बल्कि व्यभिचार की टीस और “नीच वर्णसंकर” पैदा होने का भय होगा।

    ऐसी भयभीत और अनैतिक कौम से आप कैसे उम्मीद करेंगे कि वे कला या सृजन के नाम पर एकदूसरे के साथ खड़े हों? क्यों उम्मीद करेंगे? साहित्य, कला, सिनेमा और पत्रकारिता में भी जिन लोगों का दबदबा बना हुआ है क्या वे इन सृजनात्मक आयामों में कोई सार्थक एकता सिद्ध होने देंगे? क्यों होने देंगे? जबकि वे बखूबी जानते हैं कि इन आयामों में एकता का अर्थ होगा भारतीय शोषक संस्कृति का निर्णायक अंत। क्या वे इतने मूर्ख हैं कि अपनी परम्परागत सत्ता, आजीविका और भविष्य को नष्ट कर दें?

    इसीलिये भारतीय फिल्मकार पत्रकार और खिलाड़ी भारतीय समाज की समस्याओं पर कुछ नहीं बोलते। वे किस जाति या वर्ण से आते हैं ये देख लीजिए आपको उनकी चुप्पी और तटस्थता का कारण समझ में आ जायेगा। मुहम्मद अली ने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बोलते हुए सरकार से और धर्म से कड़ी टक्कर ली थी, कई हॉलीवुड सितारों ने भी इसी तरह हिम्मत दिखाई। तत्कालीन यूरोप में चार्ली चैपलिन ने और सैकड़ों साहित्यकारों रंगकर्मियों ने ये साहस दिखाया था। लेकिन हमारे क्रिकेट के भगवानों और महानायको ने क्या किया? इन्होंने कभी गरीब मजलूम और स्त्री अधिकार की बात नही की। बल्कि हर दौर में बदलते राजनितिक आकाओं के सामने इन्होंने सकर्वजनिक रूप से साष्टांग प्रणाम किये हैं। इसका क्या मतलब है?

    धर्म सत्ता अर्थसत्ता और राजसत्ता के समीकरण की एक ही चाबी है उस चाबी को सब मिल जुलकर संभालते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे सौंपते जाते हैं। इस प्रवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। इस बीच “शुद्रा दी राइजिंग” या “शरणम गच्छामि” जैसी फिल्में बनें या ऐसा साहित्य लिखा जाने लगे तो उसे बैन कर दिया जाता है। समाज के लिये घातक सिद्ध करके सेंसर कर दिया जाता है। लेकिन घर घर में मूर्खता और अनैतिकता फ़ैलाने वाले मिथक और महाकाव्यों आधारित सीरयल लगातार बढ़ते ही जाते हैं। ये सब अपने आप ही नहीं होता, इसके पीछे बहुत निर्णयपूर्वक सचेतन ढंग से कोई यांत्रिकी काम करती है।

    तो अंततः यह लिख कर रख लीजिए कि जब तक भारत में कला, संगीत, पत्रकारिता और सृजन के आयामों में स्वर्ण द्विजों और ब्राह्मणवादियों का कब्जा है तब तक साहित्य, गीत, संगीत, सिनेमा पत्रकारिता और खेल भी आम भारतीय के विरोध में ही काम करेंगे। जैसे भक्तिकाल और नायिका विमर्श को मार्क्स ने टक्कर दी थी उसी तरह संस्कृति और धर्म के विमर्श को अब अंबेडकर टक्कर दे रहे हैं। मार्क्स से बहुत कुछ सीखा है इस मुल्क ने, अब अंबेडकर से सीखने की जरूरत है। तभी भारत सच में सृजनशील और सभ्य बन सकेगा।

     

     

  • घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब

    डा० नीलम महेंद्र

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    भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव किसी भी लोकतंत्र का महापर्व होते हैं ऐसा कहा जाता है। पता नहीं यह गर्व का विषय है या फिर विश्लेषण का कि हमारे देश में इन महापर्वों का आयोजन लगा ही रहता है । कभी लोकसभा  कभी विधानसभा तो कभी नगरपालिका के चुनाव। लेकिन अफसोस की बात है कि चुनाव अब नेताओं के लिए व्यापार बनते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों के चुनावी मैनाफेस्टो व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार के प्रोमोशन के लिए बाँटे जाने वाले पैम्पलेट ! और आज इन पैम्पलेट , माफ कीजिए चुनावी मैनिफेस्टो में  लैपटॉप स्मार्ट फोन जैसे इलेक्ट्रौनिक उपकरण  से  लेकर प्रेशर कुकर जैसे बुनियादी आवश्यकता की वस्तु बाँटने से शुरू होने वाली बात घी , गेहूँ और पेट्रोल  तक पंहुँच गई।

    कब तक हमारे नेता गरीबी की आग को पेट्रोल और घी से बुझाते रहेंगे? सबसे बड़ी बात यह कि यह मेनिफेस्टो उन पार्टीयों के हैं जो इस समय सत्ता में हैं। राजनैतिक दलों की निर्लज्जता और इस देश के वोटर की बेबसी दोनों ही दुखदायी हैं। क्यों कोई इन नेताओं से नहीं पूछता कि  इन पांच सालों या फिर स्वतंत्रता के बाद इतने सालों के शासन में तुमने क्या किया?

    उप्र की समाजवादी पार्टी हो या पंजाब का भाजपा अकाली दल गठबंधन दोनों को सत्ता में वापस आने के लिए या फिर अन्य पार्टियों को  राज्य के लोगों को आज इस प्रकार के प्रलोभन क्यों देने पड़ रहे हैं? लेकिन बात जब पंजाब में लोगों को घी बाँटने की हो तो मसला बेहद गंभीर हो जाता है क्योंकि पंजाब का तो नाम सुनते ही जहन में हरे भरे लहलहाते फसलों से भरे खेत उभरने लगते हैं और घरों के आँगन में बँधी गाय भैंसों के साथ खेलते खिलखिलाते बच्चे  दिखने से लगते हैं। फिर वो पंजाब जिसके घर घर में दूध दही की नदियाँ बहती थीं , वो पंजाब जो अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाता था जो अपने घर आने वाले मेहमान को दूध दही घी से ही पूछता था आज  उस पंजाब के वोटर को उन्हीं चीजों को सरकार द्वारा मुफ्त में देने की स्थिति क्यों और कैसे आ गई?

    सवाल तो बहुत हैं पर शायद जवाब किसी के पास भी नहीं। जब हमारा देश आजाद हुआ था तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था तो आज इस देश के हर नागरिक पर औसतन 45000 से ज्यादा का कर्ज क्यों है? जब अंग्रेज हम पर शासन करते थे तो भारतीय रुपया डालर के बराबर था तो आज वह 68.08 रुपए के स्तर पर कैसे आ गया? हमारा देश कृषी प्रधान देश है तो स्वतंत्रता के इतने सालों बाद भी आजतक  किसानों को 24 घंटे बिजली एक चुनावी वादा भर क्यों है? चुनाव दर चुनाव पार्टी दर पार्टी वही वादे क्यों दोहराए जाते हैं? क्यों आज 70 सालों बाद भी पीने का स्वच्छ पानी,  गरीबी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी जरूरतें ही मैनिफेस्टो का हिस्सा हैं? हमारा देश इन बुनियादी आवश्यकताओं से आगे क्यों नहीं जा पाया? और क्यों हमारी पार्टियाँ रोजगार के अवसर पैदा करके हमारे युवाओं को स्वावलंबी बनाने से अधिक मुफ्त चीजों के प्रलोभन देने में विश्वास करती हैं?

    यह वाकई में एक गंभीर मसला है कि जो वादे राजनैतिक पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो में करती हैं वे चुनावों में वोटरों को लुभाकर वोट बटोरने तक ही क्यों सीमित रहते हैं।चुनाव जीतने के बाद ये पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो को लागू करने के प्रति कभी भी गंभीर नहीं होती और यदि उनसे उनके मैनिफेस्टो में किए गए वादों के बारे में पूछा जाता है तो सत्ता के नशे में अपने ही वादों को  ‘चुनावी जुमले ‘ कह देती हैं। इस सब में समझने वाली बात यह है कि वे अपने मैनिफेस्टो को नहीं बल्कि अपने वोटर को हल्के में लेती हैं।

    आम आदमी तो लाचार है चुने तो चुने किसे आखिर में सभी तो एक से हैं। उसने तो अलग अलग पार्टी   को चुन कर भी देख लिया लेकिन सरकारें भले ही बदल गईं मुद्दे वही रहे। पार्टी और नेता दोनों  ही लगातार तरक्की करते गए लेकिन वो सालों से वहीं के वहीं खड़ा है। क्योंकि बात सत्ता धारियों द्वारा भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दिखाए जाने वाले सपनों की है। मुद्दा वादों  को हकीकत में बदलने का सपना दिखाना नहीं उन्हें सपना ही रहने देना है।

    चुनाव आयोग द्वारा चुनाव से पहले आचार संहिता लागू कर दी जाती है। आज जब विभिन्न राजनैतिक दल इस प्रकार की घोषणा करके वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं तो यह देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि पार्टियाँ अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा करें और जो पार्टी सत्ता में आने के बावजूद अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा नहीं कर पाए वह अगली बार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दी जाए।

    जब तक इन राजनैतिक दलों की जवाबदेही अपने खुद के मेनीफेस्टो के प्रति तय नहीं की जाएगी हमारे नेता भारतीय राजनीति को किस स्तर तक ले जाएंगे इसकी कल्पना की जा सकती है। इस लिए चुनावी आचार संहिता में आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ नए कानून जोड़ना अनिवार्य सा दिख रहा है।

  • अरे वो बसंत…

    Dr Mukesh Kumar “Mukul”

    [themify_hr color=”red”]

    अरे वो बसंत…

    तू आते हो, इठलाते हो,
    ठण्ड की मार भगाते हो,
    वसुंधरा को सजाते हो,
    प्रेम का राग जगाते हो।
    अरे वो बसंत…

    पल में पतझर को रुखसत कर,
    चहुँ ओर हरियाली बिछाते हो,
    उत्सव और उल्लास भरकर,
    जीवन को सजाते हो,
    दूर भगाकर आलस तन-मन से,
    जज्बातो को जगाते हो,
    अरे वो बसंत…

    प्रेम-राग का तान छेड़कर,
    क्यूँ मन को हर्षाते हो?
    प्रियतमा की बाँहो सा,
    तुम स्नेह सब पर लुटाते हो,
    तन-मन प्रफ्फुलित कर प्रेम-रस में,
    फिर क्यूँ “मुकुल” को तड़पाते हो?
    अरे वो बसंत…

    .

  • गिरना

    धीरज


    गिरने की सीमा
    या तो सुनियोजित होती है
    या पूरी तरह अनियोजित
    तीसरा विकल्प तो
    उपरोक्त का निर्विकल्प
    ही होता है….

    जब गिरने की सीमा
    अनियोजित होता है
    बहुधा ताड़ से ही गिरते है
    और किसी मनचाहे खजूर पर
    आकर अटक ही जाते है
    जब सुनियोजित ढंग से
    गिरना शुरू करते है
    भारशून्यता के साथ गिरते है
    और तब धरती भी
    गिरते हुए को रोक नही पाती
    या यूं कहें..

    धरती रोकने से
    इंकार कर देती है
    भला भारहीन को
    क्या और क्यूं रोकना ?
    सुनियोजित या अनियोजित से परे
    उक्त के निर्विकल्प के तौर पर गिरने को
    निर्विवाद गिरना तो नही कह सकते
    पर ऐसा हो सकता है
    जब प्रेम या समर्पण या सेवा के
    उद्यमशीलता के शिखरों पर
    गिरने के क्रम मे
    पहुँच रहे होते हैं…

    और तब…
    धरती तो धरती
    आकाश भी
    गिरते हुए का
    दामन थाम ही लेता है…