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  • ‘कविता का जोखिम’

    Shayak Alok

    ‘कविता का जोखिम’ विषय पर हिंदी अकादमी, दिल्ली के मंच से दिया गया मेरा वक्तव्य – शायक

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    मैं भी लिखकर लाया हूँ. अभी रवीश कुमार पुरस्कार लेने गए थे तो कहा कि ‘उम्र हो गई है तो सोचा कुछ लिखकर लाते हैं.’ उसके बाद उन्होंने कविता की भाषा में कुछ भारी बातें कहीं. घड़ी की टिक टिक. आहट. ब्लाह ब्लाह. भाषण लिखकर ले जाना अच्छा ही होता है. इससे भटकने और दुनिया को भटकाने पर कुछ रोक लग सकती है.

    अभी आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि मैं रवीश कुमार पर व्यंग्य कर रहा रहा हूँ और कुछ लोग सोच रहे होंगे कि लगता है ये महाशय भी एनडीटीवी प्रकार के बुद्धिजीवी हैं. इस समय का सबसे बड़ा जोखिम यही है कि एक कवि भी अपना मुंह खोले तो उसे सामने लगी दो कतारों में से एक में खड़ा कर दिया जाता है. कविता का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ऐसी तय कतारों के बीच कविता अपनी सुसंगत जगह कैसे बनाए.

    कविता के जोखिम पर अकादमिक भाषा व परिभाषा में एक युवा कवि के पास निर्णयपूर्वक कुछ कह सकने की सुविधा बेहद कम है. मेरे पास संशय अधिक है कि साध्य क्या है और हमें कौन से टूल्स आजमाने हैं. इसलिए मैं आपका बेहद कम समय लूँगा और कुछ उलझी हुई बातें ही कहूँगा. सबसे पहले तो कविता की परिभाषा का ही संकट है जहाँ एक सुविज्ञ अध्येता एक परिभाषा गढ़ता है तो दूसरा उसपर दूसरे प्रकार की आपत्तियां लादता हुआ उपहास करने लगता है. आप नामवर सिंह, डा. नगेन्द्र और जगदीश गुप्त के नाम यहाँ रख लें. मैंने पढ़ा कि ‘जकड़ी जा रही सभ्यता में कला की स्वायत्तता का प्रश्न ही कला का जोखिम है.’ अगर स्वायत्तता की आधारभूमि को हम केंद्र में रख भी लें, कि यह कला या कविता का सबसे बड़ा जोखिम है, तो इस स्वायत्तता की परिधि का ठीक ठीक निर्धारण कठिन है. पहला संकट, कि बहस स्वायत्तता तक ही नहीं ठहरी हुई है.

    एक दूसरा विचार सापेक्षिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता का है. इसमें भी सुधार व आदर्श की गुंजाइश की मांग रखते हुए स्वयत्तता अर्थात ऑटोनोमी, को अस्मिता अर्थात आइडेंटिटी से स्थानापन्न कर देने का प्रस्ताव है. अब अस्मिता को लेकर संकट यह है कि इसका सृजन मनुष्य अपनी आत्मचेतना के अंदर करता है, इसलिए वह सपनों व आकांक्षाओं में भटकती रहेगी. हेगेल ने अस्मिता के बारे में यह कह रखा है कि अस्मिता हमेशा दूसरों के विरुद्ध होती है. इससे एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जहाँ दूसरे को नष्ट कर हम सम्पूर्ण बनना चाहते हैं लेकिन दूसरा नष्ट होता है तो उसके बिना हमारा ही अस्तित्व नष्ट हो जाता है. यह बात निर्मल वर्मा ने कही है. सापेक्ष स्वायत्तता का हिंदी विचार नामवर सिंह ने लोकप्रिय कराया है. बीच में अशोक वाजपेयी यह प्रस्ताव लेकर आए हैं कि कविता की स्वायत्तता का आग्रह उसे राजनीति या जनजीवन से विमुख करना नहीं है और इसलिए वे कविता के लिए राजनीति सी किसी सत्ता या समकक्षता की मांग रखते हैं. किन्तु यहीं फिर वे राजनीति को उपलब्ध प्रणाली, ढांचे या व्यवस्था पर कोई विचार नहीं करते और कविता के जोखिम के किसी प्रश्न से उलझते हुए सीधे ‘इधर के कवियों में बौद्धिक ठसपन और एंद्रियता के अभाव’ की शिकायत करने लगते हैं.

    आर्ट या आर्टफॉर्म के जोखिम को फिर आइडियोलॉजी के रु ब रु देखा गया है. चेतना के परिप्रेक्ष्य में आइडियोलॉजी को एकमात्र चुनौती कला से ही मिलती है क्योंकि वह स्वतंत्र स्थिति की आकांक्षा रखती है, लेकिन ऐसा करने पर फिर कला ही संदिग्ध हो उठती है क्योंकि उससे आइडियोलॉजी की कथित पवित्रता भंग होती है.

    इसी प्रकार कविता के जोखिम को हम फिर प्रासंगिकता और उपादेयता से समझने का प्रयास करते हैं. कला की प्रासंगिकता बढ़ी है क्योंकि आधुनिक युग में मनुष्य की स्वतंत्रता गहन संकट में है, लेकिन विरोधाभास यह है कि कला ने अपनी स्वतंत्रता का स्वैच्छिक परित्याग कर खुद को किसी फ्रेम में जकड़ लेना स्वीकार कर लिया है. आइडियोलॉजी एक फैशन की तरह भी कविता पर हावी हुआ है कि चलन में यही है तो यही लिखते हैं. निर्मल वर्मा आह भरते हुए कहते हैं कि जिनके पास शब्द हैं उनके पास सत्य नहीं और जिनके पास अपने असहनीय अनुभवों का सत्य है, शब्दों पर उनका अधिकार नहीं.

    कविता के जोखिम से जुड़े विषयों पर गोएटे, फाकनर, हेगेल, मार्क्स, कैसिरर, फ्रायड, विटगेन्सटाईन आदि के हवाले से बहुत सी बातें कही जा सकती हैं लेकिन मुझे संशय है कि फिर भी कविता के जोखिम के इस प्रश्न को अंतिम-अनंतिम तरीके से सुलझाया जा सकता हो.

    बातें हैं बातों का क्या !

    यह ऐसा है कि एक मछली की कहानी में कई मछलियाँ उसे तैरने का पाठ देती रहीं. अथाह जल में नहीं जाना, उथाह तल पर नहीं आना. हरे रंग से डरना. लाल पर भरोसा मत करना. मैंने एक दिन श्री प्रभु जोशी से पूछा कि आखिर में उस मछली का क्या बन पड़ा ? उन्होंने कहा कि एक नए विमर्श में उसपर खोज जारी है, अभी वह मछली ही नहीं मिल रही.

    कुछ दिन पूर्व विश्व कविता दिवस पर मैंने चिली के प्रसिद्ध कवि निकानोर पर्रा की एक कविता का अनुवाद किया जो नवोदित कवियों को संबोधित है.

    जैसे तुम्हारा मन हो वैसे लिखो
    किसी भी शैली में जो तुम्हें पसंद हो

    बहुत खून बह चुका इस पुल के नीचे
    महज इस भ्रम के नाम पर
    कि केवल एक ही रास्ता है जो सही है

    कविता में सबकुछ स्वीकृत है

    बेशक लेकिन लिखो तो केवल एक शर्त पर
    कि खाली पन्ने को भरोगे तो बेहतर से भरोगे.

    मेरे लिए कविता अपने बोध और अनुभूति से की गई संवाद की एक क्रिया है क्योंकि मैं खुद को सबसे पहले एक इकाई मनुष्य और एक नागरिक के रूप में देखता हूँ. मेरे सामने कविता का सबसे बड़ा जोखिम मेरे खुद के बचे रहने का जोखिम है क्योंकि समय का इतिहास लगातार एक संक्रमण से गुजरता हुआ जब मेरे समय तक पहुंचा है तब राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक रूप से पूरा विश्व एक बिसुबियस क्रेटर पर बैठा नजर आता है. इस प्रकार प्रत्येक इकाई मनुष्य, और नागरिक के ऐतिहासिक संवाद की जिम्मेवारी बढ़ गई है.
    हम एक दृश्य जगत में जीते हैं तो हमारी प्रकट चुनौतियाँ सर्वप्रथम इस दृश्य जगत की चुनौतियाँ ही हैं और हमें हमारे हथियारों या उपस्करों के साथ इसका तात्कालिक मुकाबला करना है.

    मैं कविता के जोखिम के प्रश्न को कविता के अंदर का प्रश्न नहीं रखना चाहता. मैं इसे चेतना-अवचेतना के गुह्य कक्षों से नहीं गुजारना चाहता. न ही मैं इसे महान पवित्रता के किसी अखंड दरवाजे की तरह समय के तोप के आगे निरीह छोड़ देने के पक्ष में हूँ. मैं कविता और साहित्य को संवाद और संदेश के माध्यम के रूप में देखना चाहता हूँ जो दृश्य जगत की समस्याओं से सीधे वार्तालाप में सक्षम हो. मैं सिनेमा की तरह इस माध्यम के विस्तार के पक्ष में हूँ.

    अगर कविता का सबसे बड़ा जोखिम अपने लिए स्वायत्तता की तलाश ही है तो हमें इसके लिए एक स्थूल व्यवस्था का निर्माण करना होगा. हमें उस व्यवस्था के संचालन के लिए ईमानदार स्थितियों की रचना करनी होगी. हमें लेखक संगठनों की भूमिकाओं का विस्तार करना होगा. अकादमी-विश्वविद्यालयों-संस्थानों और संगठनों के बीच एक संवादपरक व सहयोगपरक समन्वय की राह जाना होगा.

    पिछले वर्ष मैंने श्री उदय प्रकाश को एक चिट्ठी लिखी और उनसे आग्रह किया कि पुरस्कार कोई कृपा नहीं हो बल्कि एक युवा प्रतिनिधि संवाद स्वर चुनने की इच्छा हो जो हमारे साथ या हमारे समानांतर हांक लगा सके.

    युवाओं के लिए उपलब्ध, चिन्हित होने के जो भी मौके हैं, वहां मैंने लोकतांत्रिक और सुगढ़ प्रक्रिया की अपेक्षा रखी. मैंने कहा कि साहित्य में नोबेल का उदाहरण हमारे सामने है तो हम इस प्रकार से चयन क्यों नहीं कर सकते कि इस दस को हमने अंतिम रूप से चुना और यह एक पुरस्कृत हुआ. मैंने अपेक्षा रखी कि भारत भूषण का पुरस्कारदाता अपनी प्रस्तावना लिखे तो उसमें जिक्र करे कि पिछले वर्ष उसने किन किन युवा कवियों की कौन कौन सी कविताएं पढ़ अपने अंतिम निर्णय को चुना. मैंने यह प्रस्ताव दिया कि उसके लिए खुद चुन सकना कठिन हो तो वह कविताएं आमंत्रित ही कर ले. बेढब व्यवस्था की सवारी करती कविता दूसरी सत्ताओं से आदर्श की मांग कैसे कर सकती है?

    प्रतिनिधित्व का महत्व है. आवक पीढ़ी को चिन्हित करने का भी. कविता का जोखिम नई प्रतिनिधि पीढ़ी को तैयार करना है. हम इसे कविभरोसे नहीं छोड़ सकते कि वह जो पाए अपनी खुद की गोटियाँ फिट कर पाए. आपकी इच्छा है कि कविता राजनीति सरीखी कोई स्वायत्त सत्ता हो और आपका योगदान यह कि आप शोरशराबे के साथ एक बेकार का मजमा जुटाते है, कोई ढांचा बनाने की कोशिश नहीं करते.

    दो वर्ष पहले अशरफ फ़याद का मामला सामने आया. अशरफ फ़याद फिलिस्तीनी मूल के युवा कवि हैं और सऊदी अरब में रहते हैं. सऊदी सरकार ने ईशनिंदा के आरोप में उन्हें बंदी बना लिया और फांसी की सज़ा सुना दी. पूरी दुनिया में इस सजा पर लेखकों के प्रोटेस्ट सामने आ रहे थे. लेकिन दिल्ली हमारी चुप थी. हिंदी में सबसे पहले इस विषय को केरल से कवयित्री रति सक्सेना ने उठाया. मैंने फ़याद की अंग्रेजी अनुवादक मोना करीम से संपर्क किया और पहली बार अशरफ की दस क्रांतिकारी कविताओं को हिंदी में लेकर आया. और हिंदी की प्रतिक्रिया ऐसी कि फेसबुक पर घूम घूमकर कवयित्री से दिवाली विशेषांक के लिए कविताएं मांगने वाला हमारा बड़ा कवि-संपादक इस संवाद के प्रकाशन में कोई रूचि नहीं रखता !

    निराशा होती है. बहुत बहुत निराशा होती है. बहुत निराशा होती है कि 2014 के विकल्पहीन वैचारिक विप्लव काल के बाद जहाँ कविता की आक्रामकता हमारा प्रतिनिधित्व करती, वहां आप हमपर अर्थविहीन बिंबों और कविता की खिलंदड़ी को थोप देते हैं. हम हिंदी के लोग बचपन से नीरो को कोसते बड़े होते हैं कि रोम जल रहा था तब वह बाँसुरी बजा रहा था, लेकिन जब हमारे घर आग लगी तब हम खुद बाँसुरी सुनने में लग पड़े. तो मैं बेहद जोर देकर कहता हूँ कि कविता का जोखिम कवियों और कविताओं की इस आंतरिक दुनिया के धैल बेईमान बोध और समीकरण को ध्वस्त करना है.

    कविता को एक बड़ा खतरा उसकी नष्ट होती जाती स्वीकार्यता से भी है. हमने अखबारों में कितनी ही भाग जाती लड़कियों की खबरें पढ़ी. लेकिन हम उन लड़कियों की संवेदना से तब गहरे जुड़े जब आलोक धन्वा ने भागी हुई लड़कियां लिखी. हमने हताशा में बैठे हुए किसी किरदार को उतनी गहराई से यूँ नहीं महसूसा जैसा विनोद कुमार शुक्ल के हाथ बढ़ाने के बाद महसूसा. कविताएं, ख़बरों और दृश्यों की संवेदनात्मक पुष्टि थी. वह असर खोता जा रहा. सोशल मीडिया के आगमन के बाद कविताएं भी रोजमर्रा के पोस्ट की तरह लिखी जा रहीं और हम कविताओं को रोजमर्रा की ख़बरों की तरह देखते हुए गुजर जा रहे. कविताएं जैसे सिंथेटिक उत्पाद भी बन गई हैं जहाँ प्रथम पुरुष के साथ दुनिया के तमाम इतर पीड़ा का रोज़ाना उत्पादन किया जा सकता है. ऐसी पीड़ा किसे झकझोरेगी जिसका कर्ता उस पीड़ा से दूरस्थ संबंध रखता है.

    मैं अपने युवा साथियों से भी संबोधित होना चाहूंगा कि वे एक दूसरे की कविता को किसी साझा उपलब्धि की तरह देखें और जो कविता, समय से खुले मुठभेड़ में रत हो, तुरंत आकर उसका कंधा थाम लें, ताकि वह लड़खड़ा जंग न हार जाए.

    कवि हूँ मैं, तो अंत में एक कविता से ही अपनी बात समाप्त करूँगा. यह कविता संवाद के जोखिम पर है जो मेरे चिरंतन संशय के साथ ही समाप्त हो जाती है. चिरंतन संशय ने नीत्शे को पागल कर दिया और टालस्टाय ने अपने अंतिम दिनों में पूछा कि – क्या कला का कोई अर्थ है?

    अंत में यही होगा बहुत से बहुत कि
    तुम उठा डाल दोगे मुझे पागलखाने में
    एक बयान जारी कर कहोगे कि नहीं था यह किसी के पक्ष में
    न लाल हरा न नीला केसरिया !
    कि इसने मुझे भी
    मेरे विरोधियों को भी गालियाँ बकी
    कि प्रेस वार्ता के बाद के शराब भोज में
    मुझे जानने वाला संपादक तुम्हारे कान में कहेगा-
    ‘ ठीक किया .. अजब पागल था ‘

    वे जो मुझे कनखियों से देखते हैं
    जो इस दौरान चुप थे, रहे थे ताक में
    मुस्कुराएंगे
    वे जो कविताएं लिखते हैं, मेरी कविताएं चबाएंगे.

    यह भी होगा कि
    पागलखाने की सलाखों से मैं हंसूंगा तुमपर
    कुछ और ही जोर से, और चिल्लाऊंगा
    और तुम्हें लिखेंग चिट्ठियाँ वे कुछ
    जो मेरी तरह शोक में थे ऐसे संक्रमित समय पक्ष के

    अंत में यह होगा कि तुम्हारे तमाम पक्षों के खिलाफ
    मेरे पक्ष की संख्या में इजाफा होगा
    या यह होगा कि इस मुल्क में
    पागलखानों की तादाद बढ़ानी होगी तुम्हें.

     

  • शांति वाया कश्मीर

    Shayak Alok

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    शांति धमाके से आएगी
    गोलियों की दनदनाहट
    और विशाल नरभक्षी गिद्धों की फड़फड़ाहट से आएगी

    दुनिया का जोर गणित है
    कि एक और आखिरी शोर
    और शांति आ जाएगी

    वरना इसके लिए अनवरत संघर्ष का वादा है

    अनुमान है कि शांति आएगी
    तो दबे चुपके पांव नहीं आएगी

    सीरिया से फ़लस्तीन वाया कश्मीर तक
    शांति आएगी
    हमारे सारे प्रयास मुल्लबिस हैं

    शांति विशाल प्रतिकारी मजमों
    बदले की हत्याओं और
    टीवी की एक्सक्लूसिव रिपोर्टों के बाद आएगी

    धरती नामक गुमशुदा औरत
    देखेगी एक आखिरी मृत चेहरे पर आखिर उभर आया अजूबा
    और हाथ उठा इसकी पुष्टि करेगी

    लटकाये पांव कब्र में एक दरख्त
    सबसे बाद में
    एक और बच्चे के शव को सौंपेगा कुछ फूल
    और देखेगा कि शांति आ चुकी है.

     

  • बुद्ध पूर्णिमा पर बुद्ध के दुश्मनों को पहचानिए –Sanjay Jothe

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध के सबसे पुराने और सबसे शातिर दुश्मनों को आप आसानी से पहचान सकते हैं. यह दिन बहुत ख़ास है इस दिन आँखें खोलकर चारों तरफ देखिये. बुद्ध की मूल शिक्षाओं को नष्ट करके उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बकवास भरने वाले बाबाओं को आप काम करता हुआ आसानी से देख सकेंगे. भारत में तो ऐसे त्यागियों, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और स्वयं को बुद्ध का अवतार कहने वालों की कमी नहीं है. जैसे इन्होने बुद्ध को उनके जीते जी बर्बाद करना चाहा था वैसे ही ढंग से आज तक ये पाखंडी बाबा लोग बुद्ध के पीछे लगे हुए हैं.

    बुद्ध पूर्णिमा के दिन भारत के वेदांती बाबाओं सहित दलाई लामा जैसे स्वघोषित बुद्ध अवतारों को देखिये. ये विशुद्ध राजनेता हैं जो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए बुद्ध की शिक्षाओं को उलटा सीधा तोड़ मरोड़कर उसमे आत्मा परमात्मा घुसेड देते हैं. भारत के एक फाइव स्टार रजिस्टर्ड भगवान् – भगवान् रजनीश ने तो दावा कर ही दिया था कि बुद्ध उनके शरीर में आकर रहे, इस दौरान उनके भक्तों ने प्रवचनों के दौरान उन्हें बुद्ध के नाम से ही संबोधित किया लेकिन ये “परीक्षण” काम नहीं किया और भगवान रजनीश ने खुद को बुद्ध से भी बड़ा बुद्ध घोषित करते हुए सब देख भालकर घोषणा की कि “बुद्ध मेरे शरीर में भी आकर एक ही करवट सोना चाहते हैं, आते ही अपना भिक्षा पात्र मांग रहे हैं, दिन में एक ही बार नहाने की जिद करते हैं” ओशो ने आगे कहा कि बुद्ध की इन सब बातों के कारण मेरे सर में दर्द हो गया और मैंने बुद्ध को कहा कि आप अब मेरे शरीर से निकल जाइए.

    जरा गौर कीजिये. ये भगवान् रजनीश जैसे महागुरुओं का ढंग है बुद्ध से बात करने का. और कहीं नहीं तो कम से कम कल्पना और गप्प में ही वे बुद्ध का सम्मान कर लेते लेकिन वो भी इन धूर्त बाबाजी से न हो सका. आजकल ये बाबाजी और उनके फाइव स्टार शिष्य बुद्ध के अधिकृत व्याख्याता बने हुए हैं और बहुत ही चतुराई से बुद्ध की शिक्षाओं और भारत में बुद्ध के साकार होने की संभावनाओं को खत्म करने में लगे हैं. इसमें सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि दलित बहुजन समाज के और अंबेडकरवादी आन्दोलन के लोग भी इन जैसे बाबाओं से प्रभावित होकर अपने और इस देश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.

    इस बात को गौर से समझना होगा कि भारतीय वेदांती बाबा किस तरह बुद्ध को और उनकी शिक्षाओं को नष्ट करते आये हैं. इसे ठीक से समझिये. बुद्ध की मूल शिक्षा अनात्मा की है. अर्थात कोई ‘आत्मा नहीं होती’. जैसे अन्य धर्मों में इश्वर, आत्मा और पुनर्जन्म होता है वैसे बुद्ध के धर्म में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म का कोई स्थान नहीं है. बुद्ध के अनुसार हर व्यक्ति का शरीर और उसका मन मिलकर एक आभासी स्व का निर्माण करता है जो अनेकों अनेक गुजर चुके शरीरों और मन के अवशेषों से और सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षणिक आदि आदि कारकों के प्रभाव से बनता है, ये शुद्धतम भौतिकवादी निष्पत्ति है. किसी व्यक्ति में या जीव में कोई सनातन या अजर अमर आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती. और इसी कारण एक व्यक्ति का पुनर्जन्म होना एकदम असंभव है.

    जो लोग पुनर्जन्म के दावे करते हैं वे बुद्ध से धोखा करते हैं. इस विषय में दलाई लामा का उदाहरण लिया जा सकता है. ये सज्जन कहते हैं कि वे पहले दलाई लामा के तेरहवें या चौदहवें अवतार हैं और हर बार खोज लिए जाते हैं. अगर इनकी बात मानें तो इसका मतलब हुआ कि इनके पहले के दलाई लामाओं का सारा संचित ज्ञान, अनुभव और बोध बिना रुकावट के इनके पास आ रहा है. सनातन और अजर-अमर आत्मा के पुनर्जन्म का तकनीकी मतलब यही होता है कि अखंडित आत्मा अपने समस्त संस्कारों और प्रवृत्तियों के साथ अगले जन्म में जा रही है.

    अब इस दावे की मूर्खता को ठीक से देखिये. ऐसे लामा और ऐसे दावेदार खुद को किसी अन्य का पुनर्जन्म बताते हैं लेकिन ये गजब की बात है कि इन्हें हर जन्म में शिक्षा दीक्षा और जिन्दगी की हर जेरुरी बात को ए बी सी डी से शुरू करना पड़ता है. भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि ही नहीं बल्कि इनका अपना पालतू विषय – अध्यात्म और ध्यान भी किसी नए शिक्षक से सीखना होता है. अगर इनका पुनर्जन्म का दावा सही है तो अपने ध्यान से ही इन चीजों को पिछले जन्म से ‘री-कॉल’ क्यों नहीं कर लेते? आपको भी स्पेशल ट्यूटर रखने होते हैं तो एक सामान्य आदमी में और इन अवतारों में क्या अंतर है?

    इस बात को ठीक से देखिये. इससे साफ़ जाहिर होता है कि अवतार की घोषणा असल में एक राष्ट्राध्यक्ष के राजनीतिक पद को वैधता देने के लिए की जाती है. जैसे ही नया नेता खोजा जाता है उसे पहले वाले का अवतार बता दिया जाता है इससे असल में जनता में उस नेता या राजा के प्रति पैदा हो सकने वाले अविश्वास को खत्म कर दिया जाता है या उस नेता या राजा की क्षमता पर उठने वाले प्रश्न को भी खत्म कर दिया जाता है, जनता इस नये नेता को पुराने का पुनर्जन्म मानकर नतमस्तक होती रहती है और शिक्षा, रोजगार, विकास, न्याय आदि का प्रश्न नहीं उठाती, इसी मनोविज्ञान के सहारे ये गुरु सदियों सदियों तक गरीब जनता का खून चूसते हैं. यही भयानक राजनीति भारत में अवतारवाद के नाम पर हजारों साल से खेली जाती रही है. इसी कारण तिब्बत जैसा खुबसूरत मुल्क अन्धविश्वासी और परलोकवादी बाबाओं के चंगुल में फंसकर लगभग बर्बाद हो चुका है. वहां न शिक्षा है न रोजगार है न लोकतंत्र या आधुनिक समाज की कोई चेतना बच सकी है.

    अब ये लामा महाशय तिब्बत को बर्बाद करके धूमकेतु की तरह भारत में घूम रहे हैं और अपनी बुद्ध विरोधी शिक्षाओं से भारत के बौद्ध आन्दोलन को पलीता लगाने का काम कर रहे हैं.

    भारत के बुद्ध प्रेमियों को ओशो रजनीश जैसे धूर्त वेदान्तियों और दलाई लामा जैसे अवसरवादी राजनेताओं से बचकर रहना होगा. डॉ. अंबेडकर ने हमें जिस ढंग से बुद्ध और बौद्ध धर्म को देखना सिखाया है उसी नजरिये से हमे बुद्ध को देखना होगा. और ठीक से समझा जाए तो अंबेडकर जिस बुद्ध की खोज करके लाये हैं वही असली बुद्ध हैं. ये बुद्ध आत्मा और पुनर्जन्म को सिरे से नकारते हैं.

    लेकिन भारतीय बाबा और फाइव स्टार भगवान लोग एकदम अलग ही खिचडी पकाते हैं. ये कहते हैं कि सब संतों की शिक्षा एक जैसी है, सबै सयाने एकमत और फिर उन सब सयानों के मुंह में वेदान्त ठूंस देते हैं. कहते हैं बुद्ध ने आत्मा और परमात्मा को जानते हुए भी इन्हें नकार दिया क्योंकि वे देख रहे थे कि आत्मा परमात्मा के नाम पर लोग अंधविश्वास में गिर सकते थे. यहाँ दो सवाल उठते हैं, पहला ये कि क्या बुद्ध ने स्वयं कहीं कहा है कि उन्होंने आत्मा परमात्मा को जानने के बाद भी उसे नकार दिया? दुसरा प्रश्न ये है कि बुद्ध अंधविश्वास को हटाने के लिए ऐसा कर रहे थे तो अन्धविश्वास का भय क्या उस समय की तुलना में आज एकदम खत्म हो गया है? दोनों सवालों का एक ही उत्तर है – “नहीं”.

    गौतम बुद्ध कुटिल राजनेता या वेदांती मदारी नहीं हैं. वे एक इमानदार क्रांतिचेता और मनोवैज्ञानिक की तरह तथ्यों को उनके मूल रूप में रख रहे हैं. उनका अनात्मा का अपना विशिष्ठ दर्शन और विश्लेषण है. उसमे वेदांती ढंग की सनातन आत्मा का प्रक्षेपण करने वाले गुरु असल में बुद्ध के मित्र या हितैषी नहीं बल्कि उनके सनातन दुश्मन हैं. आजकल आप किसी भी बाबाजी के पंडाल या ध्यान केंद्र में चले जाइए. या यहीं फेसबुक पर ध्यान की बकवास पिलाने वालों को देख लीजिये. वे कृष्ण और बुद्ध को एक ही सांस में पढ़ाते हैं, ये गजब का अनुलोम विलोम है. जबकि इनमे थोड़ी भी बुद्धि हो तो समझ आ जाएगा कि बुद्ध आत्मा को नकारते हैं और कृष्ण आत्मा को सनातन बताते हैं, कृष्ण और बुद्ध दो विपरीत छोर हैं. लेकिन इतनी जाहिर सी बात को भी दबाकर ये बाबा लोग अपनी दूकान कैसे चला लेते हैं? लोग इनके झांसे में कैसे आ जाते हैं? यह बात गहराई से समझना चाहिए.

    असल में ये धूर्त लोग भारतीय भीड़ की गरीबी, कमजोरी, संवादहीनता, कुंठा, अमानवीय शोषण, जातिवाद आदि से पीड़ित लोगों की सब तरह की मनोवैज्ञानिक असुरक्षाओं और मजबूरियों का फायदा उठाते हैं और तथाकथित ध्यान या समाधि या चमत्कारों के नाम पर मूर्ख बनाते हैं. इन बाबाओं की किताबें देखिये, आलौकिक शक्तियों के आश्वासन और अगले जन्म में इस जन्म के अमानवीय कष्ट से मुक्ति के आश्वासन भरे होते हैं. इनका मोक्ष असल में इस जमीन पर बनाये गये अमानवीय और नारकीय जीवन से मुक्त होने की वासना का साकार रूप है. इस काल्पनिक मोक्ष में हर गरीब शोषित इंसान ही नहीं बल्कि हराम का खा खाकर अजीर्ण, नपुंसकता और कब्ज से पीड़ित हो रहे राजा और सामंत भी घुस जाना चाहते हैं. आत्मा को सनातन बताकर गरीब को उसके आगामी जन्म की विभीषिका से डराते हैं और अमीर को ऐसे ही जन्म की दुबारा लालच देकर उसे फंसाते हैं, इस तरह इस मुल्क में एक शोषण का सनातन साम्राज्य बना रहता है. और शोषण का ये अमानवीय ढांचा एक ही बिंदु पर खड़ा है वह है – सनातन आत्मा का सिद्धांत.

    इसके विपरीत बुद्ध ने जिस निर्वाण की बात कही है या बुद्ध ने जिस तरह की अनत्ता की टेक्नोलोजी दी है और उसका जो ऑपरेशनल रोडमेप दिया है उसके आधार पर यह स्थापित होता है कि आत्मा यानी व्यक्तित्व और स्व जैसी किसी चीज की कोई आत्यंतिक सत्ता नहीं है. यह एक कामचलाऊ स्व या व्यक्तित्व है जो आपने अपने जन्म के बाद के वातावरण में बहुत सारी कंडीशनिंग के प्रभाव में पैदा किया है, ये आपने अपने हाथ से बनाया है और इसे आप रोज बदलते हैं.

    आप बचपन में स्कूल में जैसे थे आज यूनिवर्सिटी में या कालेज में या नौकरी करते हुए वैसे ही नहीं हैं, आपका स्व या आत्म या तथाकथित आत्मा रोज बदलती रही है. शरीर दो पांच दस साल में बदलता है लेकिन आत्मा या स्व तो हर पांच मिनट में बदलता है. इसी प्रतीति और अनुभव के आधार पर ध्यान की विधि खोजी गयी. बुद्ध ने कहा कि इतना तेजी से बदलता हुआ स्व – जिसे हम अपना होना या आत्मा कहते हैं – इसी में सारी समस्या भरी हुयी है. इसीलिये वे इस स्व या आत्मा को ही निशाने पर लेते हैं. बुद्ध के अनुसार यह स्व या आत्मा एक कामचलाऊ धारणा है, ये आत्म सिर्फ इस जीवन में लोगों से संबंधित होने और उनके साथ समाज में जीने का उपकरण भर है. इस स्व या आत्म की रचना करने वाले शरीर, कपड़े, भोजन, शिक्षा और सामाजिक धार्मिक प्रभावों को अगर अलग कर दिया जाए तो इसमें अपना आत्यंतिक कुछ भी नहीं है. यही अनात्मा का सिद्धांत है. यही आत्मज्ञान है. बुद्ध के अनुसार एक झूठे स्व या आत्म के झूठेपन को देख लेना ही आत्मज्ञान है.

    लेकिन वेदांती बाबाओं ने बड़ी होशियारी से बुद्ध के मुंह में वेदान्त ठूंस दिया है और इस झूठे अस्थाई स्व, आत्म या आत्मा को सनातन बताकर बुद्ध के आत्मज्ञान को ‘सनातन आत्मा के ज्ञान’ के रूप में प्रचारित कर रखा है. अगर आप इस गहराई में उतरकर इन बाबाओं और उनके अंधभक्तों से बात करें तो वे कहते हैं कि ये सब अनुभव का विषय है इसमें शब्दजाल मत रचिए. ये बड़ी गजब की बात है. बुद्ध की सीधी सीधी शिक्षा को इन्होने न जाने कैसे कैसे श्ब्द्जालों और ब्रह्म्जालों से पाट दिया है और आदमी कन्फ्यूज होकर जब दिशाहीन हो जाता है तो ये उसे तन्त्र मन्त्र सिखाकर और भयानक कंडीशनिंग में धकेल देते हैं. इसकी पड़ताल करने के लिए इनकी गर्दन पकड़ने निकलें तो ये कहते हैं कि ये अनुभव का विषय है. इनसे फिर खोद खोद कर पूछिए कि आपको क्या अनुभव हुआ ? तब ये जलेबियाँ बनाने लगते हैं. ये इनकी सनातन तकनीक है.

    असल में सनातन आत्मा सिखाने वाला कोई भी अनुशासन एक धर्म नहीं है बल्कि ये एक बल्कि राजनीती है. इसी हथकंडे से ये सदियों से समाज में सृजनात्मक बातों को उलझाकर नष्ट करते आये हैं. भक्ति भाव और सामन्ती गुलामी के रूप में उन्होंने जो भक्तिप्रधान धर्म रचा है वो असल में भगवान और उसके प्रतिनिधि राजा को सुरक्षा देता आया है. यही बात है कि हस्ती मिटती नहीं इनकी, इस भक्ति में ही सारा जहर छुपा हुआ है. इसी से भारत में सब तरह के बदलाव रोके जाते हैं. और इतना ही नहीं व्यक्तिगत जीवन में अनात्मा के अभ्यास या ज्ञान से जो स्पष्टता और समाधि (बौद्ध समाधी)फलित हो सकती है वह भी असंभव बन जाती है.

    ये पाखंडी गुरु एक तरफ कहते हैं कि मैं और मेरे से मुक्त हो जाना ही ध्यान, समाधि और मोक्ष है और दूसरी तरफ इस मैं और मेरे के स्त्रोत – इस सनातन आत्मा – की घुट्टी भी पिलाए जायेंगे. एक हाथ से जहर बेचेंगे दुसरे हाथ से दवाई. एक तरफ मोह माया को गाली देंगे और अगले पिछले जन्म के मोह को भी मजबूत करेंगे. एक तरह शरीर, मन और संस्कारों सहित आत्मा के अनंत जन्मों के कर्मों की बात सिखायेंगे और दुसरी तरफ अष्टावक्र की स्टाइल में ये भी कहेंगे कि तू मन नहीं शरीर नहीं आत्मा नहीं, तू खुद भी नहीं ये जान ले और अभी सुखी हो जा. ये खेल देखते हैं आप? ले देकर आत्मभाव से मुक्ति को लक्ष्य बतायेंगे और साथ में ये भी ढपली बजाते रहेंगे कि आत्मा अजर अमर है हर जन्म के कर्मों का बोझ लिए घूमती है.

    अब ऐसे घनचक्कर में इन बाबाओं के सौ प्रतिशत लोग उलझे रहते हैं, ये भक्त अपने बुढापे में भयानक अवसाद और कुंठा के शिकार हो जाते हैं. ऐसे कई बूढों को आप गली मुहल्लों में देख सकते हैं. इनके जीवन को नष्ट कर दिया गया है. ये इतना बड़ा अपराध है जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती. दुर्भाग्य से अपना जीवन बर्बाद कर चुके ये धार्मिक बूढ़े अब चाहकर भी मुंह नहीं खोल सकते.

    लेकिन बुद्ध इस घनचक्कर को शुरू होने से पहले ही रोक देते हैं. बुद्ध कहते हैं कि ऐसी कोई आत्मा होती ही नहीं इसलिए इस अस्थाई स्व में जो विचार संस्कार और प्रवृत्तियाँ हैं उन्हें दूर से देखा जा सकता है और जितनी मात्रा में उनसे दूरी बनती जाती है उतनी मात्रा में निर्वाण फलित होता जाता है. निर्वाण का कुल जमा अर्थ ‘नि+वाण’ है अर्थात दिशाहीन हो जाना. अगर आप किसी विचार या योजना या अतीत या भविष्य का बोध लेकर घूम रहे हैं तो आप ‘वाण’ की अवस्था में हैं अगर आप अनंत पिछले जन्मों और अनंत अगले जन्मों द्वारा दी गयी दिशा और उससे जुडी मूर्खता को त्याग दें तो आप अभी ही ‘निर्वाण’ में आ जायेंगे. लेकिन ये धूर्त फाइव स्टार भगवान् और इनके जैसे वेदांती बाबा इतनी सहजता से किसी को मुक्त नहीं होने देते. वे बुद्ध और निर्वाण के दर्शन को भी धार्मिक पाखंड की राजनीति का हथियार बना देते हैं और अपने भोग विलास का इन्तेजाम करते हुए करोड़ों लोगों का जीवन बर्बाद करते रहते हैं.

    बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर इन बातों को गहराई से समझिये और दूसरों तक फैलाइये. एक बात ठीक से नोट कर लीजिये कि भारत में गरीबॉन, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों और आदिवासियों के लिए बुद्ध का अनात्मा का और निरीश्वरवाद का दर्शन बहुत काम का साबित होने वाला है. बुद्ध का निरीश्वरवाद और अनात्मवाद असल में भारत के मौलिक और ऐतिहासिक भौतिकवाद से जन्मा है. ऐसे भौतिकवाद पर आज का पूरा विज्ञान खड़ा है और भविष्य में एक स्वस्थ, नैतिक और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण भी इसी भौतिकवाद की नींव पर होगा. आत्मा इश्वर और पुनर्जन्म जैसी भाववादी या अध्यात्मवादी बकवास को जितनी जल्दी दफन किया जाएगा उतना ही इस देश का और इंसानियत का फायदा होगा.

    अब शेष समाज इसे समझे या न समझे, कम से कम भारत के दलितों, आदिवासियों, स्त्रीयों और शूद्रों (ओबीसी) सहित सभी मुक्तिकामियों को इसे समझ लेना चाहिए. इसे समझिये और बुद्ध के मुंह से वेदान्त बुलवाने वाले बाबाओं और उनके शीशों के षड्यंत्रों को हर चौराहे पर नंगा कीजिये. इन बाबाओं के षड्यंत्रकारी सम्मोहन को कम करके मत आंकिये. ये बाबा ही असल में भारत में समाज और सरकार को बनाते बिगाड़ते आये हैं. अगर आप ये बात अब भी नहीं समझते हैं तो आपके लिए और इस समाज के लिए कोई उम्मीद नहीं है. इसलिए आपसे निवेदन है कि बुद्ध को ठीक से समझिये और दूसरों को समझाइये.

     

  • इस लोकतंत्र का नाश हो!

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    लोकतांत्रिक शासन की इस राजसी संस्कृति की क्षय हो। इस लोकतांत्रिक संस्कृति से लाख गुना बेहतर राजाशाही, बादशाही और किंगडम की वह संस्कृति थी, जिसमें शासन का शीर्ष व्यक्ति सेना के साथ सबसे आगे खड़े होकर हरावल दस्ते में सीना तानकर खड़ा होता था। ऐसे शासक न केवल स्वयं को बचाकर लाते थे, अपने हर सैनिक के प्राण भी उनके लिए अमूल्य थे। सैनिक मरते थे तो शासक भी मरता था और शासक बचता था तो सैनिक भी बचते थे। कई बार शासक वीर गति को प्राप्त होता था और सैनिक बच जाते थे। शासक और सैनिक के बीच जीत और हार का ही नहीं, प्राणों से जुड़ा रिश्ता भी हुआ करता था।

    वह शासक जानता था कि मेरा फ़ौजी मरेगा तो मैं भी मरूंगा और फ़ौजी समझता था कि बादशाह मरेगा तो मेरा मरना तय है। लेकिन अब फ़ौजी ही मरता है। सैनिक ही मारा जाता है। न इधर के बादशाह का बाल बांका होता है और न उधर के शासक का। शासक तो शासक हैं। इधर वाला शपथ लेगा तो उसे ख़ास मेहमान बनाकर बुलाएगा और उधर वाले का मन आया तो वह आसमान से उड़ते राजा को कहेगा, आ भाई, दो घूंट छक ले।मेरे बेटे का ब्याह है। और वह राजा सारी दुश्मनियां भुलाकर अपने जहाज को तत्काल तथाकथित दुश्मन के आंगन में उतारेगा और उतरते ही उसे बांहों में भर लेगा।

    आज के बादशाह को अपने सैनिक का ख़ून अपना ख़ून नहीं लगता। वह उसे पराया ही लगता है। गुरु गोबिंदसिंह के पास बहुत छोटी सेना थी। उनके लिए एक-एक सैनिक बहुत कीमती थी। तो उन्होंने थियोरी निकाली : सवा लाख से एक लड़ाऊं। और हमारे लोकतांत्रिक शासक ऐसे कमज़र्फ़ हैं कि वे एक से सवा लाख को लड़ा रहे हैं।

    बादशाहों और राजाओं के ज़माने में किसी सैनिक के रक्त की एक बूंद गिरती तो उन्हें लगता था कि किसी का रक्त गिरा है। जो महाराणा प्रताप और शिवाजी को लगता, ठीक वैसा ही अक़बर और औरंग़ज़ेब को लगता। वे सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे।

    वे भाई का खून बहा सकते थे, पिता को जेल में डाल सकते थे, अपने भतीजे, भांजे या भाई की आंख में लौह तप्त सलाखें डाल सकते थे, क्रूरतम हो सकते थे, लेकिन अपने सैनिक को मरा हुआ नहीं देख सकते थे।

    सैनिक की सुरक्षा सबसे बड़ी सुरक्षा थी उनके लिए। वे युद्ध और योद्धा का धर्म निभाना जानते थे। वे पिता के शत्रु हो सकते थे, लेकिन अपने सैनिक की जीत उनकी जीत और अपने सैनिक की हार में वे अपनी हार देखते थे।

    अगर किसी दुश्मन ने सैनिक की उंगली काटी तो शासक यह मानता था कि दुश्मन ने उसके हाथ को काटने की कोशिश की है। यह राजाशाही थी। यह किंगडम थी और यह बादशाहत हुआ करती थी। यह शिवाजी का धर्म था। यह महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की शासन शैली थी। यह सिकंदर और नेपाेलियन की राह थी। उस पुराकालीन और आज के समय में लगभग अप्रासंगिक हो चुकी शासन संस्कृति के मुग़ल बादशाह रहे हों या महाराणा प्रताप, पृथिवीराज चौहान, शिवाजी, महाराणा कुंभा या विक्रमादित्य या फिर भोज आदि, इन सबकी एक खूबी यह थी कि वे जनता के दुखदर्द को भी सुनते थे और ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने लोगों की जमीन बिकवा दी हों, उनका अन्न छीन लिया हो या फ़सलें बर्बाद कर दी हों या लोग न्याय के लिए भटकते रहे हों, फिर भी उन्होंने अपने ही लोगों को ऐसे खेमे करके नहीं मरवाया, जिसमें एक पक्ष किसी भी तरह के रंग का आतकंवादी करार दे दिया गया हो और उसे नाराज़ जनता मानने होते हुए भी उन्हीं के बेटों को उनके खिलाफ़ सैनिक बनाकर लड़ने लगा दिया गया हो।

    लेकिन कमीनी हिटलरशाही अपना ख़ून बहाना पसंद नहीं करती। वह मानती है कि राजा का खून पवित्र खून होता है। फिर वह 1947 के तत्काल बाद का हो या 2017 का शासक।

    और ऐसे शासकों के लिए सैनिक का रक्त रक्तू नहीं, पानी से भी गया गुजरा होता है। पानी की एक बॉटल भी ऐसे शासकों को वीरगति प्राप्त सैनिक के खून से सस्ती लगती है।

    और आज तो हालात ये हो गए हैं कि हमारे शासकों ने ऐसी संस्कृति बना दी है कि वे पानी तो बचाने की बात करते हैं, लेकिन सैनिकों का रक्त उनके लिए नितांत मूल्यहीन है। इतना कि चाहे जितना बहाओ। बस, पानी बचाओ। पानी रहेगा तो जीवन रहेगा। रक्त का क्या है, हमारे पास इतने सैनिक हैं, बहाते जाओ। आप अपने दिलों और दिमागों के ताले मत खोलना। आप मत समस्याओं का समाधान निकालना। आपको निकालना भी क्यों चाहिए? क्योंकि कौनसा आपका बेटा मर रहा है।कौनसा आपके पोते का रक्त जा रहा है। आपको तो अपने लाल प्यारे हैं और वे ऊंची नौकरियां करेंगे, करोड़ों के बिजनेस करेंगे, साधु भी हो गए तो या परम-वैभवशाली मठ बना लेंगे, दस-बीस हजार करोड़ की कोई पतंजलि कंपनी खोल लेंगे। इन सब जगहों पर प्रधानमंत्री शीश नवाएंगे। आप पूजनीय कहाएंगे।

    और सैनिक कौन? अरे हमारे घर का जवान। किसान का लाल। भारत का सपूत। इस धरती का बेटा। किसी गांव के भाेले-भाले सहज भारतीय परिवार का गौरवशाली भाल। बेटे और लाल तो तुम्हारे भी हैं इस महान् लोकतंत्र के महान् शासको, लेकिन क्या तुम भेजते हो कभी सरहद पर?

    इस महान् और देशभक्त शासको, मैं तुम्हें 1947 से देख रहा हूं। अरे, भेजा है कभी आपने अपने बेटे को कि जाओ तुम अपनी दाईं बाह कटा आओ। जाओ तुम अपनी गर्दन में एक खंजर झेल आओ। जाओ, अपनी तर्जनी पर एक ब्लेड न सही, हिन्दूमलकोट या जैसलमेर की तपती धरती पर कुछ घंटे रेत पर फिराकर ही देख लो। कभी कुछ घंटे कराकोरम या कश्मीर के शीर्ष पर उस वेशभूषा में कुछ घंटे बिताकर देखो, जहां हमारे सैनिक आपाद मस्तक अपने शौर्य को प्रतिमा की तरह 1947 से स्थापित किए हुए हैं।

    नेता ही नहीं, नेताओं के मानसिक गुलामों को भी देखिए, जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है और पैसे के लिए ही अपने देश के भीतर मौत का मंजर कायम करने को उत्कंठित होकर टीवी चैनलों से पूरे देश को लड़ ही मरो, कट ही मरो का संदेश देेने में सबसे आगे हैं।

    अरे कभी सोचा है, नामुरादो कि एक सैनिक मरता है तो उसके घर में कैसा मंजर होता है। शासन जैसा लोककल्याण का महान् मार्ग है, लेकिन वह कार्पोरेट के दासों से अटा पड़ा है। छलिए ही छलिए। अच्छे हर जगह हैं। हर दल में हैं और ज़हर से आप्लावित सोने के घड़े लेकर चलने वाले भी हर जगह हैं। ऐेसे जाली नेताओं के गुलाम और मीडिया जैसे पवित्र पेशे में घुस आए मदारी और सुबुकदस्त सुर में सुर साधकर कागारोल करते हैं : अरे, शहीद की वीरांगना ने कहा है, मेरे घर दो और बच्चे हैं। मैं दोनों को भेज दूंगी। भले वीरांगना ने कहा हो कि एक सिर के बदले उसे पचास सिर चाहिए और नहीं तो उस कायर का ही सिर लाकर मेरी हथेली पर धर दो! लेकिन नहीं, वह सब आपका यह शौर्यशाली एंकर नहीं बोलेगा। रिपोर्टर ने बड़ी मेहनत करके भी भेजा होगा तो वह नहीं चलाएगा। और जो नहीं बोला होगा या जो शासकों ने कहा होगा कि ये बुलवाओ तो उसे वह ज़रूर चलवाना चाहेगा।

    देश में शौर्य और शूरवीरता बांटने वाले इन एंकर महाशय से कोई पूछे : अरे, भाई, तू खुद क्यों नहीं सीमा पर चला जाता देश की रक्षा करने। वह जो तुझसे रिपोर्ट करवा रहा है, वह अपने बेटे को क्यों नहीं भेजता। वह स्वयं तो सपरिवार एसी में बैठेगा, शाम को किसी दूतावास में महंगी दारू पीने जाएगा और मौजमस्तियां करेगा, लेकिन किसान के बेटे का रक्त मांगेगा? अरे तुम सब राक्षस हो या शासक, मीडिया या देशभक्त। क्या हो तुम? देशभक्त हो तो सबसे पहले खुद जाओ सेना में। सेना में नहीं जा सकते, चुने नहीं जा सकते तो बन जाओ मरजीवड़े। बना लो आत्मघाती जत्थे और बम बांधकर जा गिरो दुश्मनों पर। अगर इतना ही देशप्रेम आप के भीतर ठांठें मार रहा है तो थोड़ा किसानों के बेटों का भी बोझ हलका करो। कुछ इस धरती का भी।

    किसान का खून भी खून है। पानी नहीं है। पराया है तो क्या हुआ। वह भी नस्ले आदम का खून है। पूर्व है तो क्या और पश्चिम का है तो क्या? वह शहर का है तो क्या और गांव का है तो क्या?

    वह टीवी एंकर जो कल एक चैनल पर चार लाख का पैकेज ले रहा था, ठीक उसी उम्र का युवा है, जिस उम्र के दो बहादुर सैनिकों ने अपने सिर कटाए हैं। लेकिन वह आज किसी और चैनल पर बैठा है, क्योंकि उसे दस लाख का पैकेज मिल गया है। जिसने उसे सब कुछ सिखाया और इस लायक बनाया, उसे छोड़ दिया। यानी मैं तो हर साल सवा करोड़ का पैकेज लूंगा, आला नेताओं से दोस्ती रखूंगा, देश की राजधानी में रहूंगा, समस्त वैभवशाली सुविधाएं भोगूंगा और राजनेताओं और शासकों से कभी कोई ऐसा प्रश्न नहीं करूंगा, जो उन्हें परेशान करे। लेकिन मैं मानवता का रक्तार्चन करने के लिए और नस्ले-आदम का खून बहाने के लिए, ऋषियों-मुनियों की इस धरती पर रक्त प्रवाह कराने के लिए हर रोज दुश्मनियां भड़काऊंगा।

    इस युवा एंकर का रक्तपिपासु हृदय यह नहीं देखता कि सरहद पर लड़ना कितना मुश्किल है। उसे नहीं मालूम की रूहे-तामीर कितने ज़ख़्म खाकर एक सैनिक पैदा करती है। अरे, एक बेटा मरेगा तो तेरे चैनल की तो टीआरपी बढ़ेगी और तेरा तो पैकेज बढ़ जाएगा और उस विचारधारा या पार्टी के वोट भी बढ़ जाएंगे, जो सत्ता के लिए समस्त सिद्धांत तिरोहित करके इतना आगे बढ़ चली है, जिस समय गांव में जवान सैनिकों के ताबूत आएंगे। लेकिन यह भी तो सोच कि इस धरती की ज़ीस्त कितना तिलमिलाएगी जब वह देखेगी कि इस जवान को भी उसके मां या बाप ने फ़ाकाकशी करके पाला था और किसी देशप्रेम के कारण नहीं, सिर्फ़ नौकरी की बेबसी में फौज में भेजा था।

    यह जो युवा हर रोज़ अपने सीने पर बम झेलते हैं, उसकी लपट न तो चैनल वाले के यहां आती है और न किसी पार्टी वाले के यहां।

    क्यों कोई राहुल गांधी प्रधानमंत्री ही बनना चाहता है? क्यों कोई रामदेव जो योग कुशल है, जो स्वस्थ है, जो हर तरह की आसन क्रियाएं जानता है, वह 10, 577 करोड़ की कंपनी खड़ी करने की राह ही पकड़ता है, सैनिक बनकर सिर कटाने की नहीं सोचता? क्यों? ऋषिवर? क्यों?

    योगिराज, तुम पकड़ो बंदूक और लगो न सरहद पर। सारा पतंजलि परिवार, समस्त शंकराचार्य और उनके अनुयायी, समस्त कारसेवक, समस्त सत्तासेवी देशभक्त, समस्त गोरक्षक, समस्त तिरंगाधारी, समस्त लालझंडे वाले और समस्त-समस्त युद्ध भड़काऊ, सारा आर्ट ऑव लिविंग और सारा राष्ट्रप्रेमी कुनबा क्यों नहीं सेना में जाता? अरे सेना में मत जाओ। सरहद के गांवों में जाकर उन लोगों की मुश्किलें ही हल कर दो, जो 1947 से बदतर जीवन जी रहे हैं और जिनके पास न पानी का नल है, न स्कूल है, न अस्पताल है, न जीवन जीने का कोई बड़ा मकसद है।

    अरे, किसान खेत भी अपना जलाए और बेटा भी अपना होम करे। टैंक आगे बढ़ें तो वे दस जनपथ या सात रेसकोर्स रोड की तरफ़ तो झांकें ही नहीं, लेकिन पूरी भारत माता की कोख को बांझ कर दें। हम ने भी जब अपने टैंक आगे बढ़ाए तो हमने क्या किया? हमने भी तो इस्लामाबाद के कन्स्टीट्यूशन ऐवेन्यू स्थित पीएम हाउस या ऐवाने सदर को भूल गए और आम पाकिस्तानियों को रौंद डाला। उन बेचारों का क्या कुसूर था? कुसूरवार भुट्‌टो था, भुट्‌टो को क्या दंड मिला? क्या बाल भी बांका हुआ? उसे फांसी दी तो जिया उल हक़ ने दी। और चीन, उसका तो कोई टीवी चैनल वाला या राजनेता या देशभक्त नाम ही नहीं लेता कि चलो, पेइचिंग के कब्जेवाली जमीन छुड़ाओ। क्या हुआ संघ के उस प्रस्ताव का, जिसमें कस्में खाई गई थीं कि संसद में तब तक नहीं जाएंगे जब तक दुश्मन चीन से अपनी मातृभूमि का एक-एक कण प्राप्त न कर लेंगे? पुरानी बात भूल गए, चीन के बादशाह आए तो लालकालीन बिछाना याद रहा, जो हम और किसी के आगे तो कभी नहीं बिछाते।

    हमारे राजनेता आज फ़तह का जश्न तो मनाना जानते हैं, लेकिन किसी सैनिक के सिर कटने पर उनके घरों में कभी सोग होता हो, ऐसा मैंने देखा नहीं है। एक दिन हमारे जवानों के सिर कटते हैं और अगले दिन उन जवानों का सबसे शीर्ष मुखिया किसी देशभक्त ऋषि सम्राट् के यहां राष्ट्र ऋषि की उपाधि पाता देखा जाता है। नेहरू से मोदी तक कोई भी हों और किसी भी पार्टी के हों, सबके सब उस समय प्रसन्न चेहरों के साथ राजसत्ता के वैभव को जी रहे होते हैं जब धरती माता या भारत माता की जिंदगी मय्यतों पर रोती है।

    लोकतंत्र के शरीफ़जादे नेता न जंग टालने की कोशिशें करते हैं और न ही अपने आंगने के महकते फूलों की रक्षा करना जानते हैं। इनकी एक सीट बच सके या ये एक सीट जीत सकें तो ये किसी गुंडे को भी पार्टी में देशभक्त बताकर ला सकते हैं और इनकी अपनी मां की हत्या हो जाए तो ये पांच हजार लाेगों का खून बहाने और अपने ही देश के भाइयों को जीवित जलाने जैसा हिंसक, अमानवीय और निंदनीय कर्म करने में संकोच नहीं करते। इनके चूल्हे पर वोटों की आंच जलती रहे तो ये राम की मर्यादा को भूल सकते हैं और इनके नुकसान हो तो ये किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।

    हम सभी दलों के सभी तरह के शासकों को देख चुके हैं 1947 से आज तक। ऐसी कोई विचारधारा नहीं, जिसे आजमाया न हो। नतीजा यही है कि लोकतंत्र की सभी सत्ताएं अपने ही लोगों के दुख-दर्द दूर करने की कोशिश नहीं करतीं, वे सिर्फ अपने आंगन के महकते फूलों से अपनी पिपासा शांत करने के लिए रक्त मांगती रहती हैं।

    सत्तालिप्सा में डूबे हमारे शासक उस देवी को तो पूजते हैं, जो अपनी गर्दन में खप्पर टांगती है और शत्रुओं का मर्दन करती है, लेकिन उसका यह आचरण ये लोग नहीं अपनाते कि मैं ही युद्ध भूमि में रहूं और मैं ही खप्पर पहनूं। यह काम किसी और का नहीं है।

    रक्तपिपासु तो खप्परवाली देवी भी है, लेकिन वह संदेश देती है कि शत्रु के रक्तपिपासु बनो। शत्रु कौन? यह भी पहचानने की जरूरत है। यह भी आत्मचिंतन का विषय है। क्या ये शत्रु अशिक्षा, निर्धनता, दु:ख, आंसू, पीड़ा, घृणा, वैमनस्य, चोरी, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, बीमारियां, धरती पर बढ़ते बोझ और न जाने क्या-क्या चीज़ें नहीं हो सकतीं? हो सकती हैं, लेकिन उससे वोट नहीं मिलते। वोट रक्तस्नान करने से नहीं, रक्तस्नान कराने से मिलते हैं। खुद को रक्षित करके। खुद को बचाकर।

    इनको खप्परवाली देवी का यह सिद्धांत पसंद नहीं कि सबसे आगे मैं। देशभक्ति में भी और सिर कटाने के पवित्र काम में भी। अगर ऐसे हैं तो यह राजशाही है, यह भक्ति है और यह शक्ति है, लेकिन इनका सिद्धांत है तू सिर कटा और मैं महल में रहकर अपनी जान बचाऊं आैर सबसे बड़ा देशभक्त कहलाऊं। यही है लोकतंत्र!महान् लाेकतंत्र!! और मुझसे ऐसा लोकतंत्र सख्त नापसंद है। मैं ऐसे लोकतंत्र से घृणा करता हूं।


    फेसबुक वाल से साभार

     

  • कुछ अभिव्यक्ति बहुत साधारण होती है, पर सच्ची होती है

    Mukesh Kr Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    मेरी हर कविता
    अपनी प्रसव पीड़ा झेलने के बाद
    सृजन के तद्पूरांत
    जब पन्ने पर हो चुकी होती है उकेरित
    यहाँ तक की कुछ पाठक वर्ग भी
    मिल चुके होते हैं
    फिर भी फुसफुसाती हुई कहती है
    फिर से सोचो यार
    क्या नहीं लगता तुम्हें
    है बदलाव की जरूरत !!

    कभी लगता है भाव है अधूरा
    कभी दर्द नहीं उभरता
    कभी प्यार नहीं खिल पाता,
    कभी तो शुरुआत ही लड़खड़ा जाती, तो
    कभी अंत सही नहीं होता

    शायद पुरजोर कोशिश के बावजूद
    नहीं रख पाता अपनी बात व सोच
    रह जाती है आधी अधूरी !!
    चाहता हूँ कुछ ऐसा कौंधे
    कि उभर पाये भाव, खिल पाये प्यार
    दिखे खिलखिलाती जिंदगी, फूल पत्तियाँ
    सजे व गूँथे हो हर शब्द
    सृजित हो पाये एक पूर्ण व सुंदर कविता

    चलो फिर कोशिश करेंगे कभी
    आखिर उम्मीद और अभिलाषा जरूरी है
    भविष्य के बेहतरी के लिए !!

     

  • नव निर्माण के लिए हुआ ध्वंस हॉल ऑफ नेशंस

    Onkareshwar Pandey

    [themify_hr color=”red”]

     

    दिल्ली की वह मशहूर इमारत जो, राजधानी के प्रगति मैदान को पहचान थी, ढहा दी गयी है. इस हॉल ऑफ नेशंस नामक ऐतिहासिक हॉल में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर स्टारर फिल्म त्रिशूल की भी शूटिंग हुई थी।

    हाल ही में दिल्ली के प्रगति मैदान में स्थित जिन दो मशहूर इमारतों को ढहाया गया उनमें हॉल ऑफ नेशंस भी एक थी। कभी इसे 20वीं सदी के सबसे मशहूर वास्तुकला ढांचों की एक प्रदर्शनी के लिए चुना गया था। इसे ढहाने का काम काम वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइजेशन के आदेश के बाद हुआ। रात के अंधेरे में चुपचाप हॉल ऑफ नेशंस को ढहाने के पीछे अधिकारियों ने यह अकाट्य’ तर्क दिया कि इसकी जगह पर एक अत्याधुनिक सम्मेलन स्थल बनाया जाएगा। लेकिन इसको लेकर कई सवाल हो रहे हैं।

    हॉल ऑफ नेशंस का डिजाइन आर्किटेक्ट रवि रेवाल ने तैयार किया था। प्रगति मैदान में बने इस हॉल ऑफ नेशंस’ का उद्घाटन स्वतंत्रता दिवस के सिल्वर जुबली वर्ष में 3 नवंबर, 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।

    देश-विदेश के बड़े-बड़े वास्तुकारों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर हॉल ऑफ नेशंस को बचाने की अपील भी की थी। बाजजूद इसके दिल्ली की एक प्रतीक-पहचान बन चुके इस खूबसूरत हॉल ऑफ नेशंस को ढहाने की कार्रवाई इसके बावजूद हुई कि इससे जुड़े एक अदालती मामले पर सुनवाई बाकी थी। लेकिन अधिकारियों को इससे क्या फर्क पड़ता है। उन्हें तो शायद यह दिख रहा हो कि नयी इमारत के निर्माण में कुछ उनका भी उद्धार हो जाएगा।

    आप अपने शहर में भी गौर करेंगे तो पाएंगे कि सड़कों के बीच डिवाइडर बार बार तोड़े और बनाये जाते हैं। नये नये रूपों में। आखिर क्योंताकि ठेकेदारों और अधिकारियों को उनका हिस्सा मिलता रहे। कभी इसकी सोशल एडिटिंग नहीं होती कि आखिरकार एक बार बना हुआ डिवाइडर कम से कम कितने साल चलना चाहिए था। और कम चला तो इसकी जिम्मेवारी किसकी है। इसी तरह सड़कें, पुल और सरकारी इमारत बिना किसी निश्चित ड्यूरैबिलिटी प्लान के बनाये जाते हैं। ताकि फिर बनाने का मौका मिले। फिर कुछ कमाने का मौका मिले। इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक नहीं सैकड़ों मोदी चाहिए।

    बहरहाल बात हॉल ऑफ नेशंस की हो रही थी। कुछ लोगों का मानना है कि ये इमारत इसलिए ढहा दी गयी, क्योंकि इस इमारत की वास्तुकला शैली एक बहुलतावादी और समावेशी भारत वाले नेहरू के सपने की याद दिलाती थी, जो हो सकता है कि मौजूदा सत्ता को नहीं भाई हो। जिसके बारे में कहा जाता है कि वह एक अलग- कुछ के मुताबिक परेशान करने वाला – तरह का देश देखना चाहती है, जिसमें सब एक जैसे हों। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के समर्थक भी विरोधी कांग्रेस द्वारा इमरजेंसी के समय किए गए कामों का उदाहरण दे रहे हैं। खासकर तुर्कमान गेट का वह प्रकरण याद दिलाया जा रहा हैजिसमें जबर्दस्ती हटाए जाने का विरोध करते हुए कई लोग मारे गए थे।

    हालांकि हॉल ऑफ नेशंस का गिराया जाना दो राजनीतिक दलों के बीच की लड़ाई नहीं है। और न इस द्वंद में अपनी रोटी सेंकने वाले अफसरों-नेताओं की चाल। बहरहाल हमारा आपका हॉल ऑफ नेशंस काल कवलित हो गया।

    यह बात तो सही है कि जो देश, जो समाज अपने प्राचीन और आधुनिक धरोहरों की कद्र नहीं करता, इतिहास उसकी कद्र नहीं करता। और फिर ऐसे समाजों को इसकी कीमत अपनी संस्कृति के विनाश के रूप में चुकानी पड़ती है। सार्वजनिक स्मारक वैचारिक प्रतियोगिताओं के प्रतीक होते हैं। उनका बनना और मिटना एक ऐसे संघर्ष को जाहिर करता है, जिसकी अक्सर उपेक्षा की जाती है। वैसे तो भारतीय पुरातत्व विभाग भी मान चुका है कि हमारे देश की अनेक संरक्षित धरोहरें तक गायब होती जा रही हैं। और इसके लिए हम सिर्फ लोगों की उपेक्षा को ही जिम्मेदार मानकर अपनी जिम्मेवारी से नहीं बच सकते। सच तो ये है कि इसके लिए नेताओं-अफसरों की भ्रष्ट मिलीभगत भी जिम्मेदार है।

    लेकिन हॉल ऑफ नेशंस का ध्वंस एक नये निर्माण के लिए किया गया है। चार दशक पुरानी यह धरोहर कानूनन संरक्षित होने योग्य विरासत व इमारत की श्रेणी में आने से पहले ही काल कवलित हो गयी। यह कुछ हमें भी सालता है।   

    हॉल ऑफ नेशंस कोई विवादास्पद बाबरी ढांचा तो था नहीं, जिसे भाजपा ने बाकायदा निशाने पर लेकर ढहाया हो। इस इमारत का दुश्मन कोई राजनीतिक दल हो, ऐसा भी नहीं लगता। नये निर्माण की जरूरत, और सरकारी अधिकारियों की अनुशंसा पर हॉल ऑफ नेशंस  को दिल्ली हाई कोर्ट के ऑर्डर के बाद गिराया गया। अदालत ने यह फैसला धरोहर इमारतों की रक्षा के लिए गठित हेरिटेज कंजर्वेशन कमिटी की सिफारिश पर दिया था। कमिटी ने कहा था कि सिर्फ 60 साल या उससे अधिक पुरानी इमारतों पर धरोहर के दर्जे के लिए विचार किया जाएगा। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हॉल ऑफ नेशंस सिर्फ 45 साल पुराना है और कमिटी के दिशा-निर्देशों के अनुसार यह विरासती ढांचे के तौर पर विचार किए जाने का हकदार नहीं है। बिल्डिंग न ढहाने के लिए इसके आर्किटेक्ट राज रेवल ने याचिका भी दायर की थी। लेकिन उनकी याचिका को भी अदालत ने खारिज कर दिया था।

    हॉल ऑफ नेशंस को ढहाने के पीछे उद्धेश्य दरअसल प्रगति मैदान का मेकओ‌वर करना है। इसके पुनर्विकास प्रस्ताव को मंजूरी साल 2006 में आर्थिक मामलों की संसदीय समिति ने दी थी। समिति की अनुशंसा के तहत प्रगति मैदान में एक होटल बनाए जाने का प्रस्ताव भी है।

    इसके तहत सन 2019 तक प्रगति मैदान में एक बड़ा कन्वेशन सेंटरएक अंडरग्राउंड पार्किंग लॉटनई ऐक्सेस सड़कें और एग्जिबिशन हॉल्स होंगे। 2,254 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रॉजेक्ट को फास्ट ट्रैक पर रखा जा रहा है। प्रगति मैदान राजधानी दिल्ली के बीच में स्थित है और 115 एकड़ में फैला हुआ है। नवनिर्माण का कार्य दो फेज में हो रहा है। पहले फेज में 25 हजार वर्ग मीटर के बिल्ट-अप एरिया को हटाकर 1लाख वर्ग मीटर का बनाया जाएगा। फेज-में 88,000 वर्ग मीटर की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाई जाएगी। सभी नई इमारतें दो फ्लोर ऊंची होंगी और हर फ्लोर का क्षेत्रफल 10 हजार वर्ग मीटर होगा। आने वाले दिनों में प्रगति मैदान का रूप-रंग पूरी तरह से बदल जाएगा। दिल्ली के प्रगति मैदान में अब आप आएंगे, तो कुछ नया नया सा लगेगा। पर जिनने इस इमारत को देखा था, जिया था, महसूस किया था, इसके नीचे बैठकर चाट खाये थे, वे इसको जरूर मिस करेंगे।

     

    The Hall of Nations, Pragati Maidan, Delhi
  • हीरो होता कौन है और लोग घोषित किसी को कर देते हैं!

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    Geetanjali

    अब विनोद खन्ना को ही लें। पूरी दुनिया में उनकी क्या तारीफ़ें हो रही हैं। लेकिन मुझे लगता है कि अपनी निजी ज़िंदगी में वे एक खलनायक थे। असली नायक रहीं उनकी पत्नी गीतांजलि।

    Vinod Khanna

    जिस समय विनोद खन्ना आेशो के सम्मोहक सुंदरियों वाले निर्बाध कामनाओं की संपूर्णता के द्वीप में पहुंचे तो घर में आठ महीने का अक्षय और ढाई साल का राहुल था। दोनों बच्चों को कामयाब बनाना और अपने पिता के घर से भाग जाने के बावजूद स्थापित कर देने वाली गीतांजलि से बड़ा नायक कौन होगा? कम से कम, विनोद खन्ना तो नहीं। दुनिया चाहे जो कहे, सच तो सच है और सच ही रहेगा।

    प्रणाम है, ऐसी अनाम स्त्रियों को जो एक बूढ़ी सास का पूरा ख़याल रखती हैं, उन्हें 24 घंटे मुस्कुराते हुए रखती हैं, उनकी आवभगत और सेवा-सुश्रूषा करती हैं, लेकिन इस मां के साथ फोटो कोई और बड़ा आदमी खिंचवाता है। माँ की कभी खैरखबर न लेने वाला।

    ऐसे कितने ही लोग हैं, जो मां के साथ फ़ोटो और विडियो को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मां के महात्म्य भरे शब्दों के साथ ख़ुद का गौरवगान करवाते हैं, लेकिन अपने ही परिवार की उन स्त्रियों की तारीफ़ में एक शब्द नहीं कहते, जो मां को हर समय अपनी हथेलियों पर रखती अपने दर्द भुला देती हैं। इस तरफ़ कभी कोई मीडिया भी झाँकता नहीं।

    हम भले अमिताभ बच्चन को महानायक कहें, लेकिन क्या वह जया भादुड़ी सच्ची महानायक नहीं है, जो अपना कॅरियर छोड़कर अपनी बेटी और अपने बेटे को स्थापित करती हैं? ऐसी कितनी ही नायिकाएँ हैं।

    क्या आपके या मेरे अपने घर की वह स्त्री सच्ची नायक नहीं है, जो दो बच्चों को उनके पिता की हर रोज़ 15 से 20 घंटे की ग़ैरमौजूदगी में अंकुर से पेड़ बनाते अपने आपको होमती है और एक परिवार को पुष्पित और पल्लवित करती है?

    क्या उन स्त्रियों को कभी नायक का दर्जा दिया जाएगा, जिन्होंने अपने चूल्हे की आंच से आरएसएस के स्वयं सेवकों की धमनियों में ऊर्जा धौंकी या फिर जो हॉलटाइमर कम्युनिस्टों के लिए चूल्हे जलाजलाकर अपने अांखें फोड़ चुकीं?

    क्या इस देश में स्त्रियों की भलाई के नाम पर तूफ़ानी आंदोलन खड़ा करने वाले नेताओं को कभी यह ध्यान आएगा कि उज्ज्वला योजना होने के बावजूद आज भी हमारी गलियों में महानायिकाएं सिर पर लकड़ियों के गट्ठर ढो-ढोकर अपने परिवारों का भरण-पोषण करती हैं, लेकिन कोई सांसद, कोई विधायक, कोई जिला अध्यक्ष, कोई जिला कलक्टर, कोई एडीएम या पटवारी घर से निकलकर उन्हें रास्ते में यह तोहफ़ा नहीं सौंप देता कि लो बहन, तुम हो उज्ज्वला की सच्ची हक़दार!

    समाज के अपने मानदंड हैं, लेकिन नायक तो नायक है। यह इंतज़ार रहेगा कि स्त्री कब नायक कही और स्वीकार की जाएगी? कब सीता, द्रौपदी और यशोधरा असली नायक कही जाएंगी?


    फेसबुक वाल से साभार

  • सांड  को आवारा होने से कौन बचाये  .. 

    Vidya Bhushan Rawat

    [themify_hr color=”red”]

    गाय हमारी माता है,
    हमको कुछ नहीं आता है,
    बैल हमारा बाप है,
    पढ़ना लिखना पाप है।

    बचपन में ये बहुत सुना था।  गाय और बैल हमारे जीवन का हिस्सा थे।  दो बैलो की जोड़ी कांग्रेस का प्रसिद्ध चुनाव चिन्ह था।  गाय के बछड़ा होने पर लोग उतना दुखी नहीं होते थे जितना आज होते हैं क्योंकि मशीनीकरण ने बैलो की कृषि पर आधारित उपयोगिता ख़त्म कर दी और मंहगाई के इस दौर में जहा हर चीज का मोल है, किसानो के लिए असंभव है के के अनुपजाऊ बछड़ो का बोझ अपने सर ले सके.

    लगभग तीन चार वर्ष पूर्व मुझे ये लगा के हासिये के जिन समाजो के बीच हम काम करते हैं उनमे गाय भैंस पालन की आदत डाल दूध डेयरी बनाने का प्रयास करना चाहिए. लेकिन क्योंकि हमने पहले भी ऐसा करके देखा था इसलिए प्रयोग को दूसरे तरीके से किया गया।

    हमने पहले वर्ष में तीन  गाय और एक भैंस खरीदी।  अगले वर्ष भी हमने गाये खरीदी।  इस प्रकार ४ वर्षो वर्षो में  हमारे प्रयासों से हमारे प्रेरणा केंद्र में कुल गाय भैंसो की संख्या १५ तक पहुँच गयी. ये हकीकत है के मात्रा दूध पर निर्भर होकर लाभ कमाने की उम्मीद भी नहीं हो सकती इसलिए हम चाहते थे के साल भर में  एक दो नयी गाय भैंसे ले और एक दो बेचे भी ताकि काम अच्छे से चले।

    लेकिन पिछले एक दो वर्षो में गाय के नाम पर जो गुंडागर्दी देखने के मिली है उसने तो पूरे बाजार को ख़त्म कर दिया है।  पशु हाट लगभग बंद हो चुके हैं और किसान न तो गाय खरीद पा रहा है और न ही बेच पा रहा है।  उसकी हालत दिन प्रतिदिन दयनीय होते जा रहे हैं।

    भारत की आर्थिक नीतियों के कारण खेती आज खतरे में हैं। जानवरो के चरागाह ख़त्म होचुके  हैं।  किसानो के हालत तो खेती के कारण पहले ही बुरे हैं और सरकारी तंत्र शायद चाह रहा है के वो जानवर भी न पाल पाए।  क्या ये  किसानो को ख़त्म करने की साजिश नहीं क्योंकि जब वो जानवर पालना और खेती करना स्वयं ही छोड़ देगा तो मुकेश भाई और  अडानी भाई की देश की अर्थव्यवसथा” को बचाने और बढ़ाने का समय आएगा।  अम्बानी जी  ,दूध, दही, फल और सब्जी सभी बेचेंगे।  वैसे भी इस देश के भ्रष्ट मध्यम वर्ग को इससे कोई मतलब नहीं के सब्जी किसान की है या अम्बानी की, उसे तो साफ़ पॉलिथीन पैक में सब्जी चाहिए।

    जनवरी में मैं जब अपने सामुदायिक केंद्र में था तो गर्भवती गाय की प्रसव प्रक्रिया को देखा। जैसे ही एक सहयोगी ने इस प्रक्रिया को पूरा किया, बच्चे के निकलते ही उसने कहा मिठाई। मैं आश्चर्य में के अभी तो बच्चा पूरा निकला ही नहीं और ये मिठाई मांग रहा है।  थोड़ी देर में समझ आया के बछिया हुयी है इसलिए सभी खुश थे। अभी चार पांच दिन पहले मेरी सहयोगी का फ़ोन आया के गाय ने बच्चा दिया है और वो बछड़ा है।  उसकी आवाज थोड़ा दुखी थी क्योंकि बछड़े का कोई  करे क्या।  सर , इस बछड़े का हम क्या करेंगे ? ये तो लोगो के खेत ख़राब करेगा।  ज्यादातर लोग इन्हे छोड़ देते हैं।

    मैंने देखा, इंसान बहुत मतलबी है।  अपने घर में अगर लड़की  हो तो दुखी और जानवरो में लड़का हो तो दुखी क्योंकि माल से मतलब है। लेकिन किसान की बात समझनी पड़ेगी क्योंकि आज गाय भैंस पालना बहुत मुश्किल कार्य हो गया है।  पहले किसान के लिए गाय और बैल दोनों उपयोगी थे लेकिन आज जब हर चीज पैसो में  खरीदी जाती है तो चारे की कीमत भी सर के ऊपर चली गयी है।  हम लोगो ने चारे खर्च से बचने के लिए गांव के लोगो  को अधिया पे गाय और भैंस दी।  मतलब ये के गाय के बच्चा होने तक वो उसके खान पान का ध्यान रखे और जब वो बच्चा देने वाली हो या दे चुकी हो तो उसका बाजार मूल्य लगाकर आधा आधा बाँट लिया जाता है।  छोटे किसान या भूमिहीन समुदायों में ये लोकप्रिय हो रहा था क्योंकि साल के आखिर में उन्हें एकमुश्त एक अच्छी रकम मिलजाती थी जिसका उपयोग वे अपने विशेष कार्यो में करते थे।

    इस बार तो हद हो गयी।  योगी जी की सरकार आने पर गौ सेवको के सड़को पर उतरने के बाद और सरकार की शंकित चुप्पी से किसानो की हालत तो और भी खस्ता हो गयी।  क्योंकि पशुओ का व्यापार बंद हो चूका है और पशु हाट जो किसानो की बहुत बड़ी मंडी हुआ करती थी अब ठप्प पड़ी है इसलिए किसान अब गाय भैंस न तो बेच पा रहा और न ही खरीद पा रहा। हमारी  जिस गाय को हमने एक मुशहर परिवार को अधिया पे दिया था बच्चा होने के बाद उसे उम्मीद थी के उसे करीब १५-२० हज़ार रुपैये मिल जायेंगे क्योंकि दुधारू गाय का बाजार मूल्य निश्चय ही ३०,००० से चालीस हज़ार से नीचे नहीं होना चाहिए लेकिन जब उन्होंने गाँव में लोगो को बुलाकर उसकी कीमत आंकी तो दुधारू गाय की कीमत मात्र १२ हज़ार रुपैया -२० हज़ार तक आंकी गयी. मतलब ये के वो परिवार जो साल भर तक गाय या भैंस की सेवा किया, अब मात्रा ८-१० हज़ार रूपया में ही संतोष करे।  हम व्यक्तिगत तौर पर ऐसा नहीं होने देंगे लेकिन मैं आपके सामने जो बीमारी है उसको रख रहा हूँ।

    अब गाय भैंसो की कोई कीमत नहीं है।  किसान हर वर्ष अपनी कुछ गाय भैंसो को बेचते हैं और कुछ नयी लेते हैं।  ये लें देन स्थानीय हाटो में होता था।  पुरानी परंपरा थी और सब अच्छे से चल रहा था।  गाय का बछड़ा हुआ तो किस काम का।  इसलिए जब तक वो दूध देते हैं तब तक लोग रखते हैं और फिर छोड़ देते हैं क्योंकि किसी के पास इतना पैसा नहीं के वो इनकी सेवा कर सके। तो ऐसे बछड़े जब बड़े होंगे तो आवारा सांड बनेगे और फिर सड़को से लेकर खेतो में अपनी आवारगी दिखाएंगे।

    अभी खबर आ रही है के केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है के वो गायो के लिए भी आधार कार्ड की व्यवस्था करेगी।  हम सरकार से पूछना चाहते हैं के सरकार किसानो के हालत सुधारने के लिए क्या कर रही है।  क्या गाय पालने वालो को कोई विशेष सुविधा मिलेगी. क्या उनकी बूढी गायो की देखभाल करने के लिए सरकार कुछ विशेष विभाग खोलने जा रही है।  बछड़ा पैदा होने पर किसान क्या करे ? www.colombia.co यदि गाय मर गयी तो क्या करे ? क्या सरकार पशु बीमा और पशु चिकित्सा के लिए कुछ करेगी।  उम्मीद है सरकार सभी किसान जो गाय भैंस पालते हैं उन्हें गैर क़ानूनी न घोषित कर दे और फिर उसके लिए लाइसेंस मांगने की बात न कहे।

    गाय और भैंस हमारे जीवन का हिस्सा हैं और उससे कोई इंकार नहीं लेकिन उनकी खरीद फरोख्त से किसानो को रोकने का मतलब है के खेती को चौपट करने की व्यवस्था।  सरकार को चाहिए के बीफ निर्यात पर एक श्वेत पत्र जारी करे और जो इस निर्यात के अगुआ हैं उनके नाम जारी करे। हम जानना चाहते हैं के तीस हज़ार करोड़ रुपैये के बीफ निर्यात के ठेकेदार कौन ? क्या उनकी ठेकेदारी की मज़बूत करने के लिए तो किसानो की कमर तोड़ने का इंतेज़ाम तो नहीं है ? समय आ गया है के सरकार अपने मंशा साफ़ करे।  गाय  सुरक्षा के नाम पर बड़ी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की हर कोशिश का पर्दाफाश होना चाहिए। गाय के नाम पर निर्दोष लोगो को मारने या परेशान करने वालो को चाहिए के उन निर्यात कंपनियों के खिलाफ आंदोलन करे जो अरबो पैसा कमा रही है।  क्या विदेश में मांस निर्यात होने से आपकी भावनाये नहीं भड़कती ? छोटे कामगारों पर हाथ डालकर आप अपनी राजनीती तो कर लेंगे लेकिन आपकी नियत पर शक रहेगा आखिर वर्षो पूर्व डालडे में चर्बी की मिलावट किसी मुसलमान ने तो नहीं की।  गाय को हिन्दू और मुस्लमान न बनाये और उसे किसान ने पाला है वो किसान जो आज आत्महत्या करने पर उतारू है क्योंकि उसको बचने के लिए हम कुछ नहीं कर रहे।  खेती को कॉर्पोरेट के हवाले करने के षड्यंत्र को पहचानने के जरुरत है।  यदि सरकार समझती है के पशुपालन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए तो उसे एक कंक्रीट योजना लानी होगी जो किसानो खासकर छोटे और मंझोले किसानो को मदद कर सके।  गाय भैंस पालन और उनके रख रखाव के लिए किसानो की मदद की जाए और उनकी कोआपरेटिव बनाकर दूध व्यापर को बढ़ाया जाय लेकिन ये तभी होगा जब सरकार इन पर किसानो से बात करे और मुद्दे पर गंभीर हो।  गाय को अपनी राजनीती की रोटियां सेकने का मोहरा न बनाये तो अच्छा होगा और ऐसे लोगो को तुरंत सन्देश दिया जाए के सरकार गौरक्षा के नाम पर उनकी गैर क़ानूनी हरकतों को  बर्दास्त नहीं करेगी।  क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

     

  • भारत की कश्मीर नीतिः आगे का रास्ता

    Prof Ram Puniyani

    [themify_hr color=”red”]

    कश्मीर घाटी में अशांति और हिंसा, जिसने बुरहान वानी की जुलाई 2016 में मुठभेड़ में हत्या के बाद से और गंभीर रूप ले लिया है, में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। बल्कि हालात और खराब होते जा रहे हैं। अप्रैल 2017 में हुए उपचुनावों में बहुत कम मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान का प्रतिशत सात के आसपास था। इन उपचुनावों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए। हम सबने देखा कि किस तरह एक कश्मीरी युवक को सेना की गाड़ी से बांध दिया गया ताकि पत्थरबाज, गाड़ी पर पत्थर न फेंके। यह घटना दिल दहला देने वाली थी।

    घाटी में पत्थरबाजी में कोई कमी नहीं आ रही है। पत्थर फेंकने वाले युवाओं को लोग अलग-अलग दृष्टिकोणों से देख रहे हैं। शेख अब्दुल्ला ने चुनाव की पूर्व संध्या पर कहा कि पत्थर फेंकने वाले अपने देश की खातिर ऐसा कर रहे हैं। उनके इस बयान की कटु निंदा हुई। कुछ लोगों ने इसे केवल एक चुनाव जुमला निरूपित किया।

    मीडिया के एक तबके का कहना है कि पत्थर फेंकने वाले पाकिस्तान समर्थक हैं और हमारे पड़ोसी देश के भड़काने पर ऐसा कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। कश्मीर में पत्थरबाजी का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है परंतु हाल के कुछ महीनों में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धि हुई है। युवा दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक ओर हैं आतंकवादी और अतिवादी और दूसरी ओर, सुरक्षाबल। दोनों ही उन्हें डरा धमका रहे हैं और उनके खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। यह साफ है कि जब भी दमनचक्र तेज़ होता है तब पत्थरबाजी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। मकबूल भट्ट को 1984 में फांसी दिए जाने के बाद, अफज़ल गुरू को 2013 में मृत्युदंड दिए जाने के बाद और अब बुरहान वानी की मौत के बाद इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है।

    ये लड़के कौन हैं जो पत्थर फेंकते हैं? क्या वे पाकिस्तान से प्रेरित और उसके द्वारा प्रायोजित हैं? सुरक्षा बलों की कार्यवाहियों में घाटी में सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं, हज़ारों घायल हुए हैं और कई अपनी दृष्टि गंवा बैठे हैं। मीडिया का एक हिस्सा चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि पत्थरबाजी के पीछे पाकिस्तान है और वही पत्थरबाजों को धन दे रहा है। जो प्रश्न हमें अपने आप से पूछना चाहिए वह यह है कि क्या कोई भी युवा, किसी के भड़काने पर या धन के लिए अपनी जान दांव पर लगा देगा। क्या वह अपनी आंखें खो देने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा मोल लेगा? पत्थरबाजों में से अनेक किशोरवय के हैं और आईटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं। परंतु वे घृणा से इतने लबरेज़ हैं कि वे अपनी जान और अपने भविष्य को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे कितने अधिक कुंठित हैं।

    मीडिया के एक छोटे से तबके ने इस मुद्दे की गहराई में जाकर पत्थरबाजों से बातचीत की। उन्होंने जो कुछ कहा उससे कश्मीर घाटी में कानून और व्यवस्था की स्थिति के बारे में हमारी सोच को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता है। इनमें से कई ऐसे परिवारों से हैं, जिन्हें अब जिंदगी से कोई उम्मीद बाकी नहीं है। उन्होंने शारीरिक प्रताड़ना झेली है, उन्हें हर तरह से अपमानित किया गया है और उनके साथ मारपीट आम है। उनके लिए पत्थर फेंकना एक तरह से कुंठाओं से मुक्त होने का प्रयास है। उनमें से कुछ निश्चित तौर पर पाकिस्तान समर्थक हो सकते हैं परंतु मूल मुद्दा यही है कि घाटी के युवाओं में गहन असंतोष और अलगाव का भाव घर कर गया है और इसका कारण है वह पीड़ा और यंत्रणा, जो उनके क्षेत्र में लंबे समय से सेना की मौजूदगी के कारण उन्हें झेलनी पड़ रही है। बुरहान वानी की हत्या के बाद, पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस, दोनों को ही यह अहसास हो गया था कि वहां स्थितियां बिगड़ सकती हैं। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, असंतुष्टों के साथ बातचीत करना चाहती थीं परंतु सरकार में उनकी गठबंधन साथी भाजपा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महबूबा मुफ्ती का मानना है कि केवल बातचीत से ही समस्या का हल निकल सकता है। इसके विपरीत, भाजपा, गोलाबारूद और सेना की मदद से असंतोष को कुचल देना चाहती है।

    ऐसे समय में हमें घाटी में शांति स्थापना के पूर्व के प्रयासों को याद करना चाहिए। यूपीए-2 ने वार्ताकारों के एक दल को कश्मीर भेजकर समस्या का अध्ययन करने और उसका हल सुझाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस दल में कई प्रतिष्ठित नागरिक शामिल थे। दल ने सुझाव दिया था कि कश्मीर विधानसभा की स्वायत्तता बहाल की जाए, जिसका प्रावधान कश्मीर की विलय की संधि में था। दल ने यह सुझाव भी दिया था कि असंतुष्टों के साथ बातचीत के रास्ते खोले जाएं, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द किया जाए और पाकिस्तान के साथ चर्चा हो।

    आज ज़रूरत इस बात की है कि हम विलय की संधि की शर्तों को याद करें और वार्ताकारों की सिफारिशों को गंभीरता से लें। कश्मीर के भारत में विलय के 70 साल बाद भी हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय राष्ट्र निर्माताओं का कभी यह इरादा नहीं था कि कश्मीर का भारत में जबरदस्ती विलय करवाया जाए या वहां व्याप्त असंतोष को सेना के बूटों तले कुचला जाए। भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए कहा थाः ‘‘कुछ लोग यह मानते हैं कि हर मुस्लिम-बहुल इलाके को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। वे यह पूछते हैं कि हमने कश्मीर को भारत का भाग बनाने का निर्णय क्यों लिया है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रहेंगे…हम कश्मीरीयों को दगा नहीं देंगे’’ (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)।

    कश्मीर में स्थिति अत्यंत गंभीर है और केन्द्र सरकार के मनमानीपूर्ण व्यवहार के कारण दिन प्रतिदिन और गंभीर होती जा रही है। अगर हम स्वर्ग जैसी इस भूमि पर शांति चाहते हैं तो हमें महबूबा मुफ्ती और शेख अब्दुल्ला जैसे व्यक्तियों के विचारों का भी सम्मान करना होगा। स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है जब हम लोगों के दिलों को जीतें। अति-राष्ट्रवादी फार्मूलों से काम नहीं चलेगा।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • भारतीय शास्त्रीय कलाएं और सामाजिक सरोकार –Sanjay Jothe

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    भारतीय कलाकारों, खिलाड़ियों, गायकों नृत्यकारों के वक्तव्य बहुत निराश करते हैं। उनके वक्तव्यों में आम भारतीय मजदूर या किसान या गरीब के सामाजिक सरोकार एकदम से गायब हैं। उन्होंने कला को व्यक्तिगत मोक्ष या अलौकिक आनन्द की जिन शब्दावलियों में गूंथा है उसमें फसकर कला और कलात्मक अभव्यक्तियाँ भी इस लोक की वास्तविकताओं के लिए न सिर्फ असमर्थ हो गए हैं बल्कि उसके दुश्मन भी बन गए हैं। हालांकि अभी कुछ वर्षों से पश्चिमी प्रभाव में एक भिन्न किस्म की कला उभर रही है वह एक नई घटना है, उससे कुछ उम्मीद जाग रही है।

    भारत का उदाहरण लें तो साफ नजर आता है कि कला, भाषा, संगीत काव्य आदि सृजन के वाहक होने के साथ ही शोषक परम्पराओं और धर्म के भी वाहक बन जाते हैं। खासकर भारत मे संगीत और साहित्य ने जो दिशा पकड़ी है उसका मूल्यांकन आप समाज की सेहत के संदर्भ में करेंगे तो आपको चौंकानेवाले नतीजे मिलेंगे। 1935 के पहले तक का नख शिख वर्णन और भक्ति सहित नायिका विमर्श वाले साहित्य को दखिये और आज तक के शास्त्रीय संगीत और नर्तन को दखिये – ये सब शोषक धर्म और संस्कृति के कथानकों, मिथकों, गीतों का ही मंचन, गायन और महिमामंडन करते आये हैं।

    नृत्य की प्रमुख शास्त्रीय शैलियो को देखिये वे किसी न किसी मिथक या अवतार की लीला से आरंभ होकर उस अवतार या मिथक से जुड़े सामाजिक मनोविज्ञान को सुरक्षित रखने का काम करती आई है। अधिकांश शास्त्रीय गायक अपनी गायकी जिन काव्य प्रतीकों और छंदों में बांधते हैं वे काव्य अंश सामंती दास्यभाव की भक्ति के गुणगान से या परलोकी वैराग्य और काल्पनिक ईश्वर के महिमामंडन से भरी होती है।

    यह सब सीधे तरीके से ब्राह्मणी वेदांत और ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमवादी सामाजिक संरचना को बनाये रखने का एक सूक्ष्म हथियार बन जाता है। एक खास किस्म का कल्पनालोक इन शास्त्रीय कलाओं से जन्म लेता है और स्वयं को हर पीढ़ी में आगे सौंपता जाता है। इसी से प्रेरणा लेकर हमारा फिल्मी और टेलीविजन का संगीत और नृत्य विकसित/पतित होता है। इस ढंग ढोल में जन्मे संगीत नृत्य खेल साहित्य आदि में समाज के वास्तविक सरोकारों को कोइ स्थान नहीं मिलता है। यही भारतीय कला की हकीकत रही है।

    हमारे साहित्य, संगीत, खेल और फ़िल्म सहित मीडिया की किसी भी विधा के चैम्पियनों को उठाकर देख लीजिए। उनकी कला न उनके हृदय में सामाजिक सरोकारों को पैदा कर पा रही है न उनसे प्रभावित लोगों में किसी सामाजिक शुभ को प्रेरित कर रही है।

    हां, ये ठीक है कि एक व्यक्तिगत अर्थ में, एक व्यक्ति की सृजन प्रेरणाओं को ऊर्जा और आकार देने में ये विधाएं ठीक ढंग से काम करती आई हैं लेकिन इसका सामाजिक या सामूहिक शुभ से कोई अनिवार्य संबन्ध नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारी कलाएं और उनकी अभिव्यक्तियाँ ठोस और जमीनी सरोकारों से एक खास किस्म की तटस्थता सायास बनाकर चलती हैं।

    यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोक कलाओं और जनजातीय कलाओं में यह समस्या नहीं है। लेकिन चूंकि उनका विकास अब अवरुद्ध सा हो गया है और उनके अपने वाहक अब “सभ्य” होने लगे हैं, सो उनमे पुरानी लोक कलाओं को सहेजने या विकसित करने की प्रवृत्ति क्षीण हो रही है। एक पॉप्युलर कल्चर और उसका आभामण्डल उनपर हावी हो रहा है। अब वे भी चलताऊ किस्म के न्यूज चैनल्स की शैली में परोसीे गई कला, गीत, संगीत, मंचीय काव्य, शायरी और जगरातों कथा पंडालों से प्रभावित हो रहे हैं।

    कुल मिलाकर एक सामान्य स्थिति यह है कि अब लोक कलाओं का नाम लेने वाले समूह और समुदाय ही नहीं बल्कि व्यक्ति और संस्थाएं भी सिकुड़ रही हैं। ऐसे में फिल्म या टेलीविजन पर सवार कला ही सामान्य जनसमुदाय के लिए एक बड़ी खुराक का निर्माण करती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारा आम भारतीय कलाओं की बहुत निकृष्ट और व्यक्तिगत मोक्ष के अर्थ वाले संस्करणों से कला की प्रेरणा लेता है। यह एकांत में तनाव मुक्ति का या किसी तरह के मनोलोक में खो जाने का उपाय भर होता है। इसका समाज की सामूहिकता पर क्या प्रभाव होता है यह एक अन्य भयानक तथ्य है।

    अब कलाकारों और आम जन को लोक कला सहित लोक और लोकतंत्र से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे  में कला खेल संगीत नृत्य आदि लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हुई फासीवादी शक्तियों का गुणगान करने लगे हैं। हमारा बोलीवूड, क्रिकेट, टेलीविजन और शास्त्रीय संगीत अब अपनी सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक रुझान की घोषणा कर रहा है।

    उदारीकरण के बाद राजनीति, धर्म और व्यापार की त्रिमूर्ति ने जिस नये और सर्वयव्यापी ईश्वर को रचा है अब उस ईश्वर के गुणगान में भारतीय  शास्त्रीय संगीत, नृत्य, खेल आदि कलाएं भी दोहरी हुई जा रही है। पहले देवी देवताओं और सामंतों की स्तुति होती थी अब थोड़े बदले ढंग से बाजार और राजनेता की स्तुति हो रही है। ये स्तुति प्रत्यक्ष नजर नहीं आएगी लेकिन प्रचलित राजनीति और राजनीतिक आका जिन मिथकों और महाकाव्यों से अपने विषबुझे तीर हासिल करते हैं उन्ही प्रतीकों को अपने गायन नर्तन में जिंदा रखकर असल मे ये कलाएं और कलाकार एक खास राजनीति की ही सेवा करते आये हैं।

    आश्चर्य नहीं कि कलाकार हद दर्जे के अंधविश्वासी, कर्मकांडी, ज्योतिष वास्तु आदि के गुलाम और परलोकवादी होते हैं। इनकी संगीत और काव्य की प्रशंसा सुनें तो साफ नजर आएगा कि ये संगीत या काव्य की प्रशंसा उसके आलौकिक या समयातीत होने की उपमा देते हुए करते हैं। किसी अव्यक्त अज्ञात या अज्ञेय के नजदीक जाने के उपकरण की तरह इन्हें वह संगीत नृत्य या काव्य उपयोगी नजर आता है। ऐसे में संगीत, नृत्य और काव्य स्वयं में एक काल्पनिक ईश्वर के प्रचारतंत्र के दलाल बन जाते हैं।

    इस भूमिका के बाद आप भारतीय कलाकारों,संगीतकारों, खिलाड़ियों और कुछ हद तक साहित्यकारों के समाज विरोधी वक्तव्यों को दखिये, आप देख सकेंगे कि भारतीय कला और कलाकार असल मे प्रतिक्रांति के प्राचीन उपकरण रहे हैं जिनमे शहरी मध्यम वर्ग की असुरक्षाओ और नव उदारीकरण के कीटाणुओं ने नई धार और नया जहर भर दिया है।