Dr Surendra Singh Bisht
सनातन समाज का पतन होने के कारण भारत का अंतिम विभाजन 1947 में हुआ। पतनशील सनातन समाज के कारण केवल दो पीढ़ी पूर्व मुस्लिम बने जिन्ना इस विभाजन के शिल्पकार बने! 1940 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग में भारत विभाजन का प्रस्ताव पारित कराया। खिलाफत के बाद सनातन धर्म के महान नेताओं जैसे महामना मालवीय, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, लाला हरदयाल, कवींद्र रवींद्र नाथ ठाकुर आदि के द्वारा व्यक्त की गई आशंका को ही जिन्ना मूर्त्त रूप दे रहा था। 8 अगस्त 1942 को “अंग्रेजों’ भारत छोड़ो” आंदोलन की घोषणा वाले भाषण में गांधीजी ने कहा – ”मुसलमानों की जो जायज मांग है, वह जिन्ना की जेब में है। या मानो प्रत्येक मुसलमान की जेब में है। पाकिस्तान तब संभव है, जब आजादी आएगी। अतः आजादी की लड़ाई में साथ दो। जितना जायज है, उतना मिल जाएगा, उससे एक इंच भी अधिक पाने के लिए लड़ना होगा।”
न मुस्लिम लीग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए और न ही अधिकांश मुसलमान। 1943 में राजगोपालाचारी जेल में जाकर गांधीजी से मिले। उन्होंने भारत विभाजन के प्रस्ताव पर गांधीजी की सहमति ली। राजाजी ने भारत विभाजन कैसे हो, इसका एक प्रारूप सबके विचारार्थ प्रस्तुत किया। उसे जिन्ना को भी भेजा। आगे गांधीजी जेल से बाहर आये। गांधीजी भारत के भविष्य पर बात करने जिन्ना को मिले। राजाजी का दस्तावेज साथ ले गए थे। पर जिन्ना उस पर तैयार नहीं हुए। जिन्ना पूरा पंजाब, पूरा बंगाल सहित असम और कश्मीर के साथ मिलाकर पाकिस्तान बनाने पर अड़े रहे। “चतुर बनिया” गांधी से जिन्ना बचते रहे और अंग्रेजों पर भरोसा करते रहे। उसी में गांधीजी ने दबाव बनाने के लिए सार्वजनिक बयान देना शुरू कर दिया – ‘भारत विभाजन मेरी लाश पर होगा!’ अंग्रेज जल्दी भारत छोड़कर जाना चाहते थे, गांधी और कांग्रेस की सहमति के बिना वे देश को आजादी नहीं दे पा रहे थे और भारत को तोड़े बिना भी नहीं जाना चाहते थे। अब अंग्रेजों ने जिन्ना को दबाया कि जो मिल रहा है, ले लो, नहीं तो वो भी नहीं मिलेगा। अंत में गांधी की सहमति से बनी राजाजी योजना के अनुसार ही जून 1947 में भारत विभाजन अंग्रेजों और जिन्ना को स्वीकारना पड़ा। योजना अनुसार, नेहरू के पुरुषार्थ के बावजूद सिंध का एक जिला, थारपारकर को भारत मे नहीं मिलाया जा सका !
जिन्ना उस आधे अधूरे मिले पाकिस्तान से आहत था। सत्ता हस्तांतरण समझौते के अनुसार देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में मिलने के लिए स्वतंत्र थी। अब जिन्ना कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का षड्यंत्र में लग गए। गांधी – नेहरू भी जिन्ना की बची नाक काटने के लिए आतुर थे। स्वतंत्रता से पहले ही जुलाई 1947 में आपसी विचार (माउंटबेटन, गांधी, नेहरू और पटेल के बीच) के बाद गांधीजी पहली बार कश्मीर पहुंचे। घोषित उद्देश्य महाराजा से शेख अब्दुल्ला को रिहा करने की मांग थी। गांधीजी महाराजा से मिले और कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग रखी। महाराजा तुरंत तैयार नहीं हुए। शाम को महारानी को मिलने बुलाया गया। नेहरू द्वारा भेजी गई फ़ाइल उन्हें दिखाई गई। फ़ाइल देखने के बाद महारानी ने कहा – मुझे क्या करना है ? गांधीजी ने कहा कि मैं लौटने से पहले महाराजा से कश्मीर के भारत में विलय पर सहमति लेना चाहता हूँ। अगले दिन महाराजा ने गांधीजी को मौखिक आश्वासन दे दिया। गांधीजी ने लौटते समय ट्रैन में रिपोर्ट लिखी और नेहरू को भेज दी।
रियासतों का विलय गांधीजी ने सरदार पटेल को सौंपा था। मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर के भारत में विलय के प्रति सरदार पटेल अनिच्छुक थे। वे व्यवहारिक राजनेता थे इसलिए वे मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर को हमेशा का सरदर्द पालना मान रहे थे। पर कुछ समय बाद जिन्ना ने गलती कर दी। सरदार पटेल के गुजरात की हिन्दू बहुसंख्या वाली जूनागढ़ रियासत को पाकिस्तान में विलय के समझौते पर जिन्ना ने हस्ताक्षर कर दिए। अब सरदार पटेल को बहाना मिल गया। उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी।
तभी प्रधानमंत्री नेहरू को गुप्त समाचार मिला कि पाकिस्तान कश्मीर को हड़पने के लिए सेना घुसाने वाला है। नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिख कर नाराजगी व्यक्त की कि विलय समझौते में देरी क्यों हो रही है, जल्दी करो, पाकिस्तान सेना घुसा सकता है। कुछ ही दिनों में पाकिस्तानी सेना श्रीनगर के पास पहुंच गई, तब आनन फानन में कश्मीर विलय पर हस्ताक्षर हुए। गांधी ने जनरल करियप्पा को आशीर्वाद देकर कश्मीर भेजा। कुछ सामाजिक संगठनों ने श्रीनगर हवाई अड्डे को दुरुस्त करने जैसा मामूली सहयोग भी दिया। सेना ने कश्मीर में पहुंच कर श्रीनगर को बचा लिया।
अब माउंटबेटन बीच में आ गए। उन्होंने नेहरू पर दबाव बनाया। बीच का रास्ता पर अनौपचारिक (और अघोषित भी) समझौता कर दिया। नेहरू ने तब कश्मीर का मामला सरदार पटेल से निकाल कर अपने हाथ में ले लिया। सेना को रोककर कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले को संयुक्त राष्ट्र संघ में नेहरू ले गए। गांधी और सरदार पटेल उससे बहुत नाराज हुए पर तब तक गलती हो चुकी थी।
बाद में एक नराधम ने गांधी की हत्या कर दी। सरदार पटेल कमजोर पड़ गए। आगे 1950 में असमय ही सरदार पटेल का देहांत हो गया। कश्मीर समस्या पर पूर्णविराम नहीं लग पाया। तब से कश्मीर के बहाने पाकिस्तान को पीटने का लगातार मौका भारत को मिल रहा है।
जिन्ना को छोटा से छोटा पाकिस्तान देने की गांधी की कूटनीति और नेहरू के कश्मीर प्रेम का परिणाम है कश्मीर का भारत में विलय! सरदार पटेल और नेहरू की कुछ गलतियों के कारण पूरा कश्मीर भारत मे नहीं मिला सके। सरदार पटेल ने कश्मीर विलय में जो देरी का अपराध किया और नेहरू ने पाकिस्तानी आक्रमण के बाद माउंटबेटन की बात मानकर कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने की गलती की, उसके कारण एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान में अभी भी है। पर मुस्लिम बहुल होते हुए कश्मीर का भारत में विलय तत्कालीन नेताओं की महान उपलब्धि है।
जिन संगठनों और नेताओं की महत्वकांक्षा के आड़े गांधीजी आ गए, उन्होंने अपने अनुयायियों के दिल- दिमाग में गांधी के विषय में अनेक असत्य बातें घुसा दीं हैं। उसी में गांधी को भगवान मानने वाले सरदार पटेल को महान बताया जा रहा है और पटेल के भगवान को खलनायक सिद्ध किया जा रहा है। कश्मीर के विलय के विषय में दुष्प्रचार भी उसी का हिस्सा है।
Dr Surendra Singh Bisht

राष्ट्रीय संयोजक – भारत अभ्युदय प्रतिष्ठान (वैकल्पिक नीतियों के लिए शोध, चिंतन व सामाजिक प्रयोगों पर कार्यरत बौद्धिक संस्थान)
मुख्य संपादक – भारत अभ्युदय पत्रिका


Comments
8 responses to “कश्मीर का भारत में विलय: महान उपलब्धि है!! — Dr Surendra Bisht”
वास्तविक आंकलन किया है
शानदार लेख।
Wow! what an article.! Those less educated have twisted the history for own benefits.Under lots of pressure Patelji & Nehruji both did what they thought the best for India.!
Shandaar lekh
अपनी वर्ग विशेष की क्षीण मानसिकता से ग्रसित लगते हैं। लेखक को हमेशा मोनो या स्टीरियो नहीं बल्कि बहु-आयामी सोच विकसित करनी चाहिए शायद यही विकास है।
अच्छा लेख है ,, कश्मीर पे ऐसे ही और लेखों की जरूरत है।
पार्ट -2 भी आना चाहिए इसका। काफी अच्छा लेख है और जानने की इच्छा होने लगी इसको पढ़ कर
Dr Surrendra Bist,article prima facie seems palatable but detailed research ,and facts have to be found,India and Pakistsan have to move forward,though Pakistan itself is Part of Bharat.