आदर्शों के भ्रम जाल

Murari Tripathi

कुछ लोग आदर्शों पर चलते हैं
पथ पर बढ़ते हैं निरंतर
कुछ लोग आदर्शों को मानते हैं नकली
किसी भी तरह पहुंचना चाहते हैं कृत्रिम शिखर पर

कुछ लोग आदर्शवादी होने का रचते हैं भ्रमजाल
करते हैं दिखावा
व्यापार करते हैं क्षद्म संवेदनाओं का

अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए
बेंच सकता है इंसान खुद को
बिना किसी हिचक के
बिना किसी ग्लानि के

मन में चलता है बहुत कुछ
तरह- तरह के स्वार्थ के विचार
असंख्य बार गुजरते हैं मस्तिष्क पटल पर

झूठ दर झूठ गढ़ा जाता है 
भट्टी में पकाई जाती हैं 
गीली मिट्टी से बनीं ईंटें
बेशर्मी जैसी कठोर बनकर निकलती हैं

रची जाती हैं काल्पनिक कहानियां
लिखे जाते हैं महानता के गीत
लिखे जाते हैं नाटक
जो असल में होते हैं सिर्फ नाटक

एकाकीपन कितना क्रूर है
पैदा करता है अप्रासांगिक हो जाने का डर

हर क्षण सुनना चाहते हैं हम
अपनी तारीफों के कसीदे
हर क्षण पाना चाहते हैं घिरा खुद को
चारण कवियों के समूह से

आलोचनाएं चुभती हैं
गरल की तरह पीनी पड़ती हैं
घूंट पर घूंट

उचित सिद्ध करते रहते हैं
हम अपने विचलन को
अपने स्वार्थों को
बिना किसी टीस के
यह सोचकर कि
दुनिया ऐसे ही चलती है

क्यों ये दुनिया ऐसे ही चलती है?
और अगर चलती है
तो क्या ऐसे ही चलती रहनी चाहिए?
बोलो…
बोलने से पहले खुद से पूछो…

Murari Tripathi


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