Vivek Umrao Glendenning
प्रस्तावना परिचय
प्रस्तावना परिचय से आगे:
इसी काल में शुरू होती है पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाके के गांव के रमाशंकर पाण्डे की। उन रमाशंकर पाण्डे की, जिन्होंने मुझे तब सहारा दिया जब मुझे चारों तरफ से लातें पड़ रहीं थीं। रमाशंकर पाण्डे एक पिछड़े गांव के सामान्य किसान परिवार से हैं। इनके कई भाई हैं। जयशंकर पाण्डे इनके सबसे बड़े भाई, मेरे सामाजिक मित्र रहे। मेरे व रमाशंकर पाण्डे के बीच संबंधो का रास्ता यही जयशंकर पाण्डे थे। रमाशंकर पाण्डे उन दिनों बनारस के सर्वसेवासंघ में रहा करते थे। दो कमरे, एक रसोई व एक शौचालय।
मैंने आईआईटी कानपुर के भौतिकी के प्रोफेसर एच सी वर्मा जी से बात की, उनको परिस्थितियों व माता-पिता द्वारा बेदखली से अवगत कराया। उनका कहना हुआ कि मैं भारत के जिस शहर में जाना चाहूं, जैसी भी कोचिंग करना चाहूँ या मैं किसी गांव जाकर वहां कुछ करना चाहूँ तो वे मेरा पूरा खर्च कुछ वर्षों तक बिना शर्त वहन करने को तैयार हैं। मेरे लिए यह बहुत बड़ा संबल था। मैंने सोचा कि यदि जीवन मरण का प्रश्न खड़ा होगा तो यह विकल्प है ही। किंतु उस समय मैंने इस विकल्प को स्वीकार करने से मना कर दिया, भविष्य के गर्भ के लिए विकल्प को संभावनाओं के साथ छोड़ दिया।
दो सौ रुपए, एक पिठ्ठू बैग, कुछ किताबें, दो जोड़ी कपड़े व कुछ दस्तावेज। कुल जमा यही गृहस्थी थी जिसे लेकर मैं जयशंकर पाण्डे के यहां सर्वसेवासंघ पहुंचा। दो सौ रुपयों में से काफी रुपए कानपुर से वाराणसी पहुंचने में खर्च हो चुके थे। यूं समझिए कि मेरे पास पैसे नहीं थे।
जयशंकर पाण्डे वहां रहते नहीं थे। रमाशंकर पाण्डे रहते थे। रमाशंकर के पास भी पैसे नहीं होते थे। रमाशंकर संस्कृत से स्नातक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उनको भी घर से खर्च बहुत कम मिलता था। मैं व रमाशंकर दाल चावल, कभी कभी दाल नमक प्याज खाकर कई महीने रहे। मैंने कई मित्रों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की लेकिन सभी कन्नी काट गए। स्थिति यह थी कि प्रोफेसर एच सी वर्मा जी के पास जाने तक के किराए के लिए पैसे नहीं थे। जीवन को मुख्यधारा की रूटीन हिसाब से इतर अपनी शर्तों में जीने के लिए भारत में बहुत संघर्षों, उपेक्षाओं, प्रताडंनाओं व तिरस्कारों को झेलना पड़ता है।
उन्हीं दिनों दिल्ली की गांधी निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड व कनाडा की यूनिवर्सिटी संयुक्त सेमिनार आयोजित करने वाली थी। जागृति राही दीदी व उनके पति संजय सिंह भाई के सहयोग व सुझाव पर मैं दिल्ली पहुंचा जहां मेरी मुलाकात व मित्रता अनुपम मिश्र जी से हुई। दिल्ली पहुंचने पर भी मेरे पास लगभग पचास रुपए व पिठ्ठू बैग वाली गृहस्थी थी। ट्रेन का किराया व टैक्सी का किराया जागृति राही दीदी द्वारा दिया गया था।
जब क्लेयर से मेरा विवाह हुआ तब मैंने क्लेयर को बताया कि रमाशंकर पाण्डे मेरे जीवन की रक्षा करने वाले लोगों में से एक हैं। मैंने व मेरी पत्नी ने रमाशंकर से पूछा कि वह क्या करना चाहते हैं। रमाशंकर ने दिल्ली आने की इच्छा जाहिर की। रमाशंकर कई वर्षों तक हमारे घर में हमारे सगे छोटे भाई की तरह कई सालों तक रहे। रमाशंकर ने अंग्रेजी स्पीकिंग कोर्स, जिम इत्यादि जो भी सीखना व करना चाहा उसके लिए पूरी सुविधाएं दी गईं जैसे कि अपने घर के बच्चों को दी जातीं हैं।
वहीं रमाशंकर आज देश भर में बाडी बिल्डिंग में नाम व शोहरत कमा रहे हैं। सामान्य किसान परिवारों का लाखों युवा दिल्ली आकर रोजी रोटी का जुगाड़ करना चहता है, सपने देखता है। रमाशंकर चाहते तो दिल्ली में ही अच्छा खासा जीवन यापन कर सकते थे। लेकिन रमाशंकर वापस अपने गांव लौटे। बिना पूंजी के शुरूआत की, और धीरे-धीरे इलाके का सबसे बेहतर जिम स्थापित किया।
रमाशंकर का जिम केवल कसरत नहीं कराता है, वरन् स्वस्थ व सक्रिय रहने की जीवन शैली की बात करता है। खानपान के तौर तरीके बताता है। रमाशंकर ने अपनी मेहनत के दम पर पूरे जिले व पड़ोसी जिलों में अपनी सम्मानपूर्ण पहचान बनाई है। सरकारी अधिकारी व उनके परिवार भी खानपान व स्वास्थ्य के तौर तरौके सीखने समझने आते रहते हैं।
रमाशंकर पाण्डे राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में धमाल मचाते रहते हैं। Mr NCR, Mr North India to Time, Delhi Classic Shree, Mr UP, Mr Delhi जैसी प्रतियोगिताओं में खिताब जीत चुके हैं। ऐसी ही एक प्रतियोगिता में एक अच्छी मोटरसाइकिल भी उपहार में मिली।
इतने खिताबों को जीत चुकने तथा फिटनेस व हेल्थ सेंटर से अचछा खासा पैसा कमाने के बावजूद, रमाशंकर अपने खेतों में काम करते हैं। मजदूरी करते हैं। मेेेरे जीवन को बचाने वाले रमाशंकर पाण्डे ऐसे ही बने रहें, नाम व शोहरत कमाते रहें।







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