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यूट्यूब पर मैंने कोई विडियो देखी थी कभी जिसमें दुबई के किसी मॉल में कोई एकदम छोटी सी लड़की यूँ ठिठक गई है और मासूम पैरों से जैसे किसी आवाज़ का पीछा कर रही है. वह अज़ान की आवाज़ थी जो पास की किसी मस्ज़िद से आ रही थी. वह वाकई एक सुंदर सुरीली आवाज़ थी. हालांकि उस विडियो का शीर्षक कुछ इस प्रकार का रख दिया गया था – अज़ान की आवाज़ से ईसाई बच्ची सरप्राइइज्ड. सुंदर गायन सा ही अज़ान सऊदी अरब के शाही मस्ज़िद से सुनने को मिलता है. मैं एकबार हौज़ख़ास में प्रत्यूष के कमरे पर बैठा था, तब भी इतनी ही सुंदर आवाज़ सुनी थी और प्रत्यूष से इसका ज़िक्र किया था.
लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. हमारे आसपास की मसाज़िद के बेसुरे मुअज़्ज़िन सच में ऐसी टेर लगाते हैं कि पहली इच्छा यही होती है कि ख़ुदा अभी इस मस्ज़िद पर आंधी-तूफ़ान-बिजली के रूप में अपनी करम बरसा इस व्यक्ति की आवाज़ को कंठ में ही दबोच ले. अलसुबह की अज़ान तो और भी अप्रिय लग सकती है.
अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..
बेगूसराय में हमारे मोहल्ले की अज़ान सुन एकाध बार मैंने विचार किया कि अज़ान के लिए मुअज़्ज़िन का चुनाव करने में शायद वे इस बात पर विचार करते हैं कि कौन अपनी नाक सबसे अधिक हुनर से दबाकर आवाज़ निकाल सकता है या किसकी आवाज़ अल्लाह ने ऐसी ही बनाकर ज़ुल्म करने को धरती पर भेजा है.
खैर यह तो एक बात हुई.
दूसरी बात यह हुई कि मुझे एक ऐसी लड़की से इश्क़ हुआ जो दिन में फ़ोन ही नहीं कर पाती थी. वह देर रात की फुसफुसाहट में मुझे फ़ोन करती और उसकी आधी बातें मुझे सुनाई ही नहीं पड़ती. मुझे व्हिस्प्रिंग वाला संवाद सिर्फ तब पसंद है जब हम दैहिक क्षणों में इतने क़रीब हों कि आवाज़ थोड़ी भी तेज़ हो तो देह की लय टूटती हो. उसने सामान्य आवाज़ का जो अवसर तलाशा वह शाम का समय होता था जब उसकी माँ और बहनें रसोई में व्यस्त हो और वह छत पर आकर मुझसे बात करे. लेकिन अन्याय हुआ यहाँ. मैं उससे रूमानी बातें करने की कोशिश करता और कोई द्वारपालों को कह रहा होता कि भाई कन्हैया से कह दो कि हम मिलने आए हैं. उसने मुझे बताया और मैंने सुना कि प्रतिदिन 7-9 और 5-7, चार घंटे यूँही कोई चिल्लाकर द्वारपालों से बात कर रहा होता या राम बनकर श्याम बनकर प्रभु जी से (प्रभु जोशी नहीं, ईश्वर) आने की विनती कर रही होती. न प्रभु जी कभी आए, न उनकी रोज़ की चिल्लपों बंद हुई, न मेरा इश्क़ परवान चढ़ा. मैं गंभीरता से सोचता हूँ तो उस लड़की से मेरे ब्रेक अप का सबसे बड़ा कारण उसके पड़ोस के मंदिर की कथित धार्मिकता ही रही.
मैं मुखर्जी नगर इलाक़े में रहता था तो मैंने गौर किया कि हमारे प्रीलिम और मेन्स एग्जाम के तुरंत पहले अचानक से माता रानी के जगरातों की बाढ़ आ जाती थी. भारी चिढ़ में मैं यह सोचकर संतोष करता कि संभवतः हमें एग्जाम पास कराने के लिए यह मोहल्ले वालों का सामूहिक धार्मिक सहयोग है. हालांकि, माता रानी का गणित अधिक तेज़ निकलता रहा. हम फेल होते रहे और उनके ‘यूपीएससी एसपायरेंट’ किरायेदारों की संख्या बढ़ती रही और वे और मोटे होते रहे.
बहिरकैफ़, ये सब पुरानी झेली हुई कहानियां हैं और इनपर बातें हम करते ही रहे हैं. अभी न जाने देश में कौन सी हवा चली है कि अचानक इन बातों को हमले के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. अब ये बातें किसी राय या विचार सी नहीं लगतीं, बल्कि ऐसा लगता है कि समुदाय विशेष पर हमले के लिए ही इसे खुलकर प्रकट किया जा रहा.
मैंने कहीं पढ़ा कि कुरआन में ही कहीं यह ज़िक्र है कि ‘तब बोलो यदि तुम्हारा बोलना तुम्हारे चुप रहने से अधिक बेहतर हो.’ सोनू तो सुरीले गायक हैं. वे चार ट्वीट से भी अपनी बात नहीं समझा सकने के बजाय एक ट्विट से ही यह व्यंग्य करते कि मेरे पास की मस्ज़िद मुझे मुअज़्ज़िन रख ले या अत्याचार बंद करे, तो वे ज्यादा असर करते. खैर.
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