गुरमेहर कौर सी युवाओं के पास चार में से एक चुनने का विकल्प है

Shayak Alok

[themify_hr color=”red”]

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का गठन पीपुल्स वार और एमसीसीआई को मिलाकर हुआ. ये दोनों नोटोरियस संगठन रहे हैं. ये प्रेरणा माओ से लेते हैं जो मानव सभ्यता का सबसे बड़ा हत्यारा हुआ. माओ इतना बड़ा हत्यारा हुआ कि आप मान लीजिए कि हिटलर, स्टालिन, मोदी और ट्रम्प जैसे लोग अपनी स्थापित योग्यता पर उसके दरबान तक नहीं रखें जाएं. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का मोटिव है भारत की मौजूदा व्यवस्था को क्रांति के रास्ते उखाड़ फेंकना और डेमोक्रेटिक फेडरल रिपब्लिक की स्थापना करना. मोटा मोटी समझ लीजिए कि ये भारत को माओ का चीन बनाना चाहते हैं जहाँ सिद्धांत और नीति से जनता का ही समर्थन पा लाखों किसानों-मजदूरों को अकाल और भूख से कत्ल कर देना चाहते हैं. यह व्यवस्था ऐसी होगी कि अशोक वाजपेयी ने सत्ता विरोधी मार्च निकाला या अपूर्वानंद ने इंडियन एक्सप्रेस में कोई एं टें आलेख लिखा, तो उन्हें तोप के मुंह पर बाँध उड़ा दिया जाएगा.

इस पार्टी की विचारधारा में मौजूदा भारतीय तंत्र के प्रति घृणा का भाव है और इसमें इस्लाम को साम्राज्यवादी-पूंजीवादी धारा के विरुद्ध एक उपस्कर के रूप में देखा जाता है. पार्टी भारत सरकार की तरफ से आतंकी संगठन घोषित है और कुछ राज्य सरकारों ने भी उनपर प्रतिबंध लगा रखा है. यह अल्ट्रा लेफ्ट है जिसे विश्व में बेहद कम स्वीकार्यता प्राप्त है. आतंकी लेफ्ट. माओ और माओ का चीन भी वर्तमान में इसे स्वीकार नहीं कर सकता और दक्षिण चीन सागर में उठा फेंकेंगा (संभव है दक्षिण चीन पर उत्तेजित अमेरिका और जापान इन्हें छान लें).

इसी धारा और पार्टी की छात्र इकाई है डीएसयू जिसे जेएनयू और डीयू में सक्रिय रखा गया. उमर ख़ालिद इसी छात्र संगठन का सदस्य रहा और जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी वाले आयोजन के तुरंत पहले संगठन के आंतरिक लोकतंत्र के प्रश्न पर अन्य साथियों संग अलग हुआ था. जेएनयू में उस आयोजन में उमर ख़ालिद की विशिष्ट भूमिका थी और विशेष उपस्थिति भी. कन्हैया ने भारत विरोधी नारों की निंदा की, उमर ने बचाव किया.

यहीं अपनी जानकारी भी थोड़ा दुरुस्त कर लीजिए कि उमर कश्मीरी नहीं है. उमर मुसलमान नहीं है. (उमर ने जावेद अख्तर की तरह खुद को नास्तिक घोषित कर रखा है). उमर बम फेंकने वाला आतंकवादी भी नहीं है. उमर का पाकिस्तान और हाफ़िज़ सईद से कोई संबंध नहीं है. उमर बस अल्ट्रा लेफ्टिस्ट है.

क्या आप इस पार्टी-संगठन के विचारों से सहमत हैं ? क्या इसके प्रतिनिधियों को लोकतांत्रिक संवाद पक्ष का प्रतिनिधि मानने को तैयार हैं ? क्या आप तैयार हैं कि भारत की बर्बादी तक जंग छिड़ जाए जो इस विचार पक्ष का मोटिव है ? क्या आप सोचते हैं कि अल्ट्रा लेफ्ट को फ्री वाक मिलना चाहिए?

ठीक है आप तैयार हैं .. लेकिन आप तैयार हैं तो फिर संकट है कुछ .. alprazolam buy online malaysia https://urbanyogaphx.com/ buy xanax egypt buy xanax in turkey
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उमर ख़ालिद को विद्यार्थी परिषद जैसा संगठन भी फ्री वाक दे सकता है ? उमर, जिसका बेहद संक्षिप्त परिचय है और वह परिचय डीएसयू और जेएनयू की उस घटना से जुड़ा है. परिचय जो भारत-विरुद्ध है.

नम्बर नहीं दे सकता. चाह कर भी नहीं दे सकता. क्योंकि विद्यार्थी परिषद बिल्कुल इसके विपरीत परिकल्पना पर संचालित है.
तो यह संघर्ष तय है. यह संघर्ष जारी रहेगा. और विचारधारा कपाड़ – यह सियासी संघर्ष है. यह शक्ति का संघर्ष है.

तो यहाँ गुरमेहर कौर सी युवाओं के पास चार राह में से एक चुनने का विकल्प है. पहला, कि हाँ अल्ट्रा व रेडिकल विचारों को भी फ्री वाक मिले. किन्तु इससे तंत्र की अराजकता बढ़ेगी. दूसरा, कि हाँ परिषद द्वारा गुंडा तरीके से विरोध करना जायज है. लेकिन गुंडागर्दी को आप समर्थन नहीं दे सकते. तीसरा, कि न हम उमर ख़ालिद के विचार पक्ष को एंडोर्स करते हैं, न परिषद की गुंडागर्दी को. हम गांधी-अम्बेडकर-कलाम के लोग लानत भेजते हैं हर प्रतिगामिता को. और चौथा, कि निरपेक्षता रखना और अपना फ़ोकस पढ़ाई और बॉयफ्रेंड और कॉफ़ी और सरोजिनी-कमला पर रखा जाए.

गुरमेहर कौर सी युवा अपनी तख्ती अपने बोध से उठाएं.

 

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More posts