आलोक नंदन
हाथ में होना चाहिए
डंडा-झंडा
और जुबां पर नारा
फिर कियादत की
कतारों में हो गये शामिल।
भ्रम पैदा करके
यदि दूर तक चल सकते हैं।
और फिर अपने औलादों को भी
उसी राह पर ढाल कर
आगे निकल बढ़ना ही
आपकी बेहतर सेवा
में शुमार होती है।
जम्हूरियत के गहवारों में
पुश्त-दर-पुश्त
पैबैंद हो जाते हैं।
बस शर्त एक है
हाथ से झंडा-डंडा
नहीं छूटना चाहिए।
जम्हूरियत पताकों पर चलती है
जिसका पताका जितना ऊंचा
उसके हिस्से में जम्हूरियत
का उतना ही बड़ा हिस्सा।
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