Tag: Alok Nandan

  • दलित चेतना 

    आलोक नंदन


    वेदों-शास्त्रों के खिलाफ
    विषवमन करके मुटाती है
    दलित चेतना

    मनुस्मृति को मुंह में डालकर
    पघुराती है
    दलित चेतना

    अपने पूर्वजों के खिलाफ
    वर्णवादी व्यवहार पर
    कसमसाती है
    दलित चेतना

    एकलव्य के कटे हुये अंगूठे
    में अपना अक्स निहारती
    तर्कों का फन फैलाकर
    कभी राम पर कभी कृष्ण पर
    फुंफकारती है
    दलित चेतना।

    बाबा साहेब के कंधों पर सवार हो
    संविधान में जगह पाती है
    फिर भी प्रतिशोध की आग में
    धधकती है
    दलित चेतना

    मनु की खींची रेखाओं से
    बाहर निकलने की चाह में
    अकुलाती है
    दलित चेतना

    सदियों की दूरी तय करने के बावजूद
    वर्ण की दीवार पर
    अपना सिर मारकर
    पछाड़ खाती है
    दलित चेतना।

  • एक लंबी कविता

    आलोक नंदन


    झाड़ियों में उगती है,
    कंटीली झाड़ियों में
    और उनके संग खुद भी
    कंटीली हो जाती है
    चुभे तो लहू टपक पड़े,
    ऐसी है
    लंबी कविता।

    धरती के कोख में उस
    जगह पलती है
    जहां होता है
    पानी का अभाव ।

    पुस की रात में
    सड़क पर
    ठिठुरते हुये
    बुढ़े के नींद में ऊंघती है
    लंबी कविता !

    गंगा की मौजों पर
    सुबह कि सुर्खीली किरणों
    के फैलाव में अटखेलियां करती है
    लंबी कविता

    दुल्हन के अंग-प्रत्यंग पर
    सोलहों श्रृंगार में
    लजाती, सकुजाती
    और कसमसाती है
    लंबी कविता

    सेल में बंद
    किसी कैदी की बेड़ियों की
    खनखनाहट में
    आजादी के नगमें सुनाती है
    लंबी कविता।

    ध्यानमग्न साधक की बंद आंखों के बीच
    रश्मियों की तरह नजर आती है
    लंबी कविता।

    लंबी कविता उगती है
    बढ़ती है
    और फैलती है
    अमरलता मानिंद।

    मंत्रों व आयातों में
    उतरती है लंबी कविता।

    सुकरात, अरस्तु और मार्क्स की
    दाढ़ियों में
    युगों-युगो तक बढ़ती है
    लंबी कविता।

    पहली बारिश के बाद
    धरती की मटैली सोंधी महक बन कर
    सांसों में घुल जाती है
    लंबी कविता।

     

  • डंडा-झंडा

    आलोक नंदन


    हाथ में होना चाहिए
    डंडा-झंडा
    और जुबां पर नारा
    फिर कियादत की
    कतारों में हो गये शामिल।

    भ्रम पैदा करके
    यदि दूर तक चल सकते हैं।
    और फिर अपने औलादों को भी
    उसी राह पर ढाल कर
    आगे निकल बढ़ना ही
    आपकी बेहतर सेवा
    में शुमार होती है।


    जम्हूरियत के गहवारों में
    पुश्त-दर-पुश्त
    पैबैंद हो जाते हैं।
    बस शर्त एक है
    हाथ से झंडा-डंडा
    नहीं छूटना चाहिए।


    जम्हूरियत पताकों पर चलती है
    जिसका पताका जितना ऊंचा
    उसके हिस्से में जम्हूरियत
    का उतना ही बड़ा हिस्सा।

    .