अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।

सामाजिक यायावर


एक बहुत पुरानी कहावत है। बुज़ुर्ग कहते आए हैं। अगर अपने वस्त्र उघाड़ेंगे तो अपनी ही नग्नता दिखाई देगी। हर चीज़ का न सुबूत होता है और न यह ज़रूरी कि हर चीज़ दिखाई ही जाए। सर्जिकल स्ट्राइक मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष ही नहीं, पूरे मीडिया में जो बहस चल रही है, वह हमारे देश की जगहंसाई कराने के लिए काफ़ी है। दुनिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रराज्य की विदाई का समय आ चुका है और हम अभी तक पूरी तरह राष्ट्र ही नहीं हो सके हैं।

हमारे देश में या तो राष्ट्रवाद के स्वयंभू ठेकेदार हैं और वे अपने अलावा किसी दूसरे को राष्ट्रवादी मानना ही नहीं चाहते या ऐसे लोग जिनके लिए राष्ट्र से पहले व्यक्तियों की जमात है। ऐसे लोगों के लिए उनके अपने अलावा सब देशद्रोहीनुमा चीज़ हैं। एक वर्ग ऐसे लोगों का है, जो लोकतांत्रिक ढंग से पांच साल के लिए चुने हुए लोगों की किसी भी बात को गले से नीचे उतारने को तैयार नहीं हैं। ये सब वे लोग हैं, जिन्होंने चुनाव में और उससे पहले कभी इस देश के पीड़ित लोगों के अांसू पौंछने का कोई काम नहीं किया। ये सब विचारधारा के कड़ाहों में उबलते रहे हैं।

मुझे तो कई बार लगता है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए उतनी मेहनत की ही नहीं, जितना परिश्रम सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहनसिंह, दिग्विजयसिंह, पी चिदंबरम्, कपिल सिब्बल आदि ने नरेंद्र मोदी की राह आसान बनाने के लिए किया। उनकी सरकार के पहले तीन साल का रिकॉर्ड मुखर होकर कह रहा था कि सीटें ज्यादा नहीं आएंगी, लेकिन सुनता कौन था? नरेंद्र मोदी के बारे में मैंने सबसे पहले वामपंथी अभियानों के दौरान बांटे जाने साहित्य के माध्यम से सुना था। वामपंथियों को मोदी को राष्ट्रव्यापी हिन्दू हृदयसम्राट बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी।

इस बात के कि वे गुजरात में उनके धत्कर्मों पर फोकस करके गुजरात में उन्हें रोकते। यह एक लोकतांत्रिक तरीका होता। लेकिन आज जो मोदी को लेकर अरण्यरोदन हो रहा है, वह अप्रासंगिक होता जा रहा है। आज सर्जिकल स्ट्राइक पर बहस करने वाले तीन साल बाद चुनावों के आते-आते इतने थक जाएंगे कि बोल ही नहीं निकाल पाएंगे, जबकि वही उचित समय होगा। अभी तो बच्चे की जान मत लीजिए, उसे फस्ट टेस्ट, सैकिंड टेस्ट, थर्ड टेस्ट, कॉपी चेक, हाफ़ इयरली आदि देने दीजिए। फ़ाइनल आए तो फिर ख़बर जरा कस कर लीजिएगा। जैसे लोगों ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, दिग्गी राजा, चिदंबरम, सिब्बल आदि की ली। लेेकिन मुझे लगता है, तब आपके तेवर ऐसे नहीं रहेंगे।

लेकिन आप संवैधानिक ढंग से सत्ता में आ जाते हैं तो इसका मतलब यह भी नहीं होता कि आपकी आलोचना नहीं की जा सकती। इस देश की लोकशाही को अधिकार है कि वह ख़राब प्रश्नपत्र करने वाले बच्चे को दीवार की तरफ़ मुंह करके खड़ा कर दे या मुर्गा बना दे। मुर्गा वुर्गा आजकल लोगबाग कम बनाते हैं, क्योंकि बच्चों की माएं बहुत हल्ला मचाने लगती हैं। फिर भी अापकी ग़लती पर आपको ग्राउंड के चार चक्कर तो लगवाए ही जा सकते हैं।

खैर, एक खेमा है, जो पहले सत्ता में रही अपने विरोधी दलों की सरकारों की हर अच्छाई की तो आलाेचना करता ही था, उन बुराइयाें पर तो कोहराम मचाता था, जिन्हें आज उन्होंने अपना प्रिय कंठहार बना रखा है। एफडीआई, पाकिस्तान को सबक सिखाना, चीन की चीं बुला देना, स्वदेशी आदि ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन पर पूरा संघ परिवार पहले दिन से शीर्षासन की मुद्रा में है। पुराने ऑडियो और विडियो सामने आए तो मारे शर्म के ऐसे-ऐसे कदम उठाने पड़े, जिनसे किसी भी जिम्मेदार नेता को बचना ही चाहिए। आख़िर यह कौन-सा आत्मसम्मान है, जो आज चीन की हर चीज़ के बहिष्कार का नारा लगाता है, लेकिन हमारे प्राणप्रिय नेता सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की बारी आती है तो आप भारतीय हस्त लाघव वाले शिल्पकारों को भूल कर चीन की शरण में चले जाते हैं। आप अगर किसी ऐसी चीज़ का सहारा लेंगे, जो उचित नहीं है तो अनुचित प्रश्न भी आपके सामने जीभें लपलपाएंगे।

इसलिए एक जिम्मेदार और सुसंस्कृत देश के नागरिक होने के नाते जिम्मेदार और सुसंस्कृत अाचरण ही करना चाहिए। आप अपने अहंकारों के लिए देश के दर्प को दांव पर मत लगाइए। अगर आपका उपहास उड़ता है तो अपनी पुरानी ग़लतियों पर अफ़सोस कीजिए, न कि उन पर गर्वीला पर्दा डालिए। यही पश्चाताप है। अगर इस देश ने किसी को संवैधानिक तौर पर चुना है तो बर्दाश्त कीजिए, क्योंकि करोड़ों लोग अपने नापसंद नेताओं को सत्तासीन होते मन ही मन कुढ़ते रहे हैं। उनके मन में 68 साल की दबी हुई कुंठा अगर उबाल नहीं खाएगी तो किसकी खाएगी? इसलिए देश को देश रहने दें। अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।

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त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

 

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