कोरोना :: लाकडाउन बनाम प्रवासी महापलायन — Bimal Siddharth

Bimal Siddharth

मज़दूरों का पलायन जब शुरू हुआ तो मुझे भी लगा कि उन्हें लॉक डाउन का पालन करना चाहिए। जहाँ हैं वहीं रुक कर करोना संक्रमण को रोकना चाहिए। लॉक डाउन का प्रधानमंत्री का फ़ैसला भी जायज़ लगा था। लगा कि सरकार करोना संकट के प्रति गम्भीर है और युद्ध स्तर पर योजनाएँ बनाते हुए कार्यवाई करेगी। किसी भी वाइरस संक्रमण को रोकने का पहला क़दम टेस्टिंग है। इसके बग़ैर आपको पता ही नहीं चल सकता कि कौन व्यक्ति संक्रमित है और कौन नहीं। लॉक डाउन के बावजूद यदि लोग आवश्यक कामों से बाहर निकल रहे हैं, लेनदेन कर रहे हैं तो संक्रमण की सम्भावना बनी ही रहेगी। टेस्टिंग के अभाव में संक्रमित व्यक्ति अनजाने ही फैलाव का कारण बनता रहेगा। लॉक डाउन तो महज़ संक्रमण की तेज़ गति को स्लो डाउन करने की एक रणनीति है। दुनिया की सभी जागरूक और ज़िम्मेवार सरकारें ऐसा ही कर रही थीं। लॉक डाउन किया। समय रहते टेस्टिंग और उपचार की समुचित व्यवस्था की और करोना से युद्ध में उतर पड़े।

लॉक डाउन एक ऐतिहासिक घटना थी। अचानक एकसाथ पूरे देश- समाज का स्थिर हो जाना कोई सामान्य बात नहीं थी। दो चार छह दिन तो इस अजीबोग़रीब स्थिति से तालमेल बनाते ही निकल गए। ख़बरों से पता चलता रहा कि पुलिस सक्रिय है। सख़्ती से लॉक डाउन का पालन करा रही है। पब्लिक भी जागरूकता के साथ सहयोग कर रही है। लोग बेहद ज़रूरी काम से ही बाहर निकल रहे हैं। मास्क सबने लगा रखा है। सोशल डिसटेंसिंग का पालन हो रहा है। करोना और पुलिस के डर ने बहुत तेज़ी से एक नयी सामाजिक व्यवस्था को आकार दे डाला है।

लेकिन टेस्टिंग? कई दिन बीत जाने के बावजूद यह सिरे से ग़ायब थी। यदा कदा थर्मल स्क्रीनिंग की बात ही सुनाई पड़ी। थर्मल स्क्रीनिंग से करोना संक्रमित का पता नहीं चल सकता, इसका ख़ुलासा भी कई दिनों बाद हुआ। टेस्टिंग किट के अभाव की बात आई। मन में सवाल उठा कि इस अभाव को दूर कर पाने में हम क्या असक्षम हैं? कुछ लक्षणों को नाप सकने वाला कोई भी उपकरण रौकेट साइंस तो नहीं! फिर रौकेट साइंस में भी हम कम तो नहीं। ख़बर पढ़ी कि गाड़ियाँ बनाने वाली कम्पनी महिंद्रा के तकनीशियनों ने दो ढाई दिनों में ही वेंटिलेटर बना डाला है। वेंटिलेटर तो एक जटिल और संवेदनशील उपकरण है जिसकी बाज़ार क़ीमत चार- पाँच लाख रुपए है। कम्पनी के प्रमुख ने कहा कि वे मानवता और देशहित में इसे साढ़े सात हज़ार रुपए में ही उपलब्ध करा सकते हैं। फिर ख़बर आई कि पुणे में एक महिला चिकित्सा वैज्ञानिक ने टेस्टिंग किट भी बना डाला है जो काफ़ी कम समय में सटीक परिणाम दे पाने में सक्षम है। सुखद संयोग देखिए कि इस टेस्टिंग किट को जन्म देने के अगले दिन ही महिला वैज्ञानिक ने अपने बच्चे को जन्म दिया।

प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री केयर्स फ़ण्ड की स्थापना करते हुए देशवासियों से आर्थिक सहयोग का आह्वान किया। महज़ कुछ दिनों में बड़े कारपोरेट घरानों से लेकर आम नागरिकों ने कई हज़ार करोड़ रुपए का सहयोग कर डाला। देश का हर नागरिक, छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, अपनी क्षमतापूर्वक करोना से लड़ने के लिए एकजुट था। राजनीतिक विरोधी भी अपने वैचारिक मतभेद को किनारे रख सरकार के साथ खड़े थे। प्रधानमन्त्री के हर आह्वान को लोगों ने पूरी आस्था से निभाया। थाली बजाओ, थाली बजाया। दीप जलाओ, दीप जलाया।

प्रधानमंत्री ने क्या किया?

प्रधानमंत्री ने समय नष्ट किया। इस आपदा से लड़ने के लिए समय ही सबसे बड़ी पूँजी थी। अमूल्य समय नष्ट होता रहा और प्रधानमंत्री हर हफ़्ते दस दिन बाद टीवी पर अवतरित हो चमत्कार का आश्वासन देते रहे मानो लॉक डाउन के ब्रहमास्त्र से ही करोना ख़त्म हो जाएगा। व्यापक टेस्टिंग को सम्भव बनाने के लिए कोई पहलकदमी ही नहीं ली गयी। मेक इन इण्डिया का नारा देने वाले ने इतने विशाल संसाधनों वाले देश पर भरोसा कर ख़ुद उत्पादन करने की बजाय टेस्टिंग किट आयात किया। बढ़ी हुई क़ीमतों पर घटिया किट्स का आयात, जिन्हें आते ही रिजेक्ट करना पड़ा। यदि विज़न होता तो समय रहते आप आशा जैसे फूट सोलज़र्स, शिक्षकों की बड़ी फ़ौज, सरकारी कर्मचारियों की पढ़ी लिखी सक्षम जमात, तीनों सेनाओं की ताक़त, लाखों की संख्या में छोटे मंझोले और बड़े उद्योगों को नियोजित कर सारे उपकरण और टास्क फ़ोर्स तैयार कर सकते थे। मोहल्ले- मोहल्ले गाँव- गाँव टीम नियुक्त कर टेस्टिंग शुरू कर सकते थे। प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ करने की बजाय हेलीकाप्टरों से फूल बरसवाए और अगले हफ़्ते तक एक बार फिर अदृश्य हो गए।

सन दो हज़ार एक की जनगणना के हिसाब से देश भर में एक राज्य से दूसरे राज्य में जा कर कामकाज करने वालों की संख्या सैंतिस करोड़ थी। इनमें से अधिसंख्य दिहाड़ी मज़दूर या फुटपाथों पर ठेला खोमचा लगाने वाले होंगे। इनकी आय बेहद सीमित होगी जिसका अधिकांश हिस्सा वे अपने घरों को भेजते जाते होंगे। आमतौर पर महानगरों में ये संख्या किराए के नर्क में रहती है। लॉकडाउन में जब आय की सारी सम्भावनाएँ ख़त्म हो चुकी हों और टीवी अख़बार रातदिन करोना के भूत से डराते जा रहे हों, वह मदद और हौसले के बिना कब तक टिक पाता? प्रधानमंत्री ने दोनों नहीं दिया। सिर्फ़ प्रवचन दिया। उसके पाँव उखड़ने लगे तो घर तक पहुँचने का साधन भी नहीं दिया। जब वह स्वयं की व्यवस्था- अव्यवस्था से निकल पड़ा तो उसे जहाँ तहाँ रोक पुलिस से पिटवाया ज़रूर गया।

भारतीय रेल सामान्य तौर पर हर रोज़ सवा दो करोड़ लोगों को यात्रा कराती है। प्रधानमंत्री चाहते तो क्या पूरी अप्रवासी आबादी को विश्वास में लेकर दो चार हफ़्तों में सुकून और सुरक्षा से घर तक पहुँचवा नहीं सकते थे? क्या रेल राष्ट्र की धरोहर नहीं है? क्या रेल ने अपने कर्मचारियों की छुट्टी कर दी है या फिर तनख़्वाह बन्द कर दी है? अभी भी महापलायन और प्रताड़ना जारी है। लोगों को राज्य की सीमा पर रोका और पीटा जा रहा है। मदद करने वालों को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी, आप की राजनीति किस बात से प्रेरित है जो निरीह आबादी की ऐसी दुर्गति पर उतारू है?

अब जब अराजक पलायन ने सोशल डिसटेंसिंग की धज्जियाँ उड़ा दी हैं तब क्या पता करोना कितना कहाँ जा रहा है?

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12 Responses to कोरोना :: लाकडाउन बनाम प्रवासी महापलायन — Bimal Siddharth

  1. Sunil Kumar says:

    बहुत बढ़िया लिखा है, जैसे लिखा है वैसे ही घटित हुआ है, किसी कोई जिम्मेदारी तय ही होने नही दी जा रही है।

  2. Vijendra Diwach says:

    एकदम सही लिखा है।सरकारों को कोरोना की धल्ले भर भी समझ नहीं थी और अब भी नहीं समझ पा रहे हैं। हां बेवकूफ़ जरूर बनाया जा रहा है जनता को।

  3. आमिर मलिक says:

    पूर्णतया सहमत

  4. राकेश उमराव says:

    सिद्धार्थ जी ने बहुत अच्छा लेख लिखा है और हकीकत में यही हुआ है

  5. शानदार, आलेख, बधाई

  6. pawan gupta says:

    सार्थक

  7. Ashok Singh Raghuvanshi says:

    वास्तविक परिदृश्य प्रस्तुत करता एक सक्षम आलेख।

  8. Ashok Singh Raghuvanshi says:

    सर, टाइपिंग त्रुटि के कारण सक्षम की जगह अक्षम लिख गया। क्षमा प्रार्थना के साथ निवेदन करता हूँ कि आप इसे एडिट करके सक्षम कर लें।

  9. Sunil Chheda says:

    Give solutions, do not point problems, reference Vivek Umrao

    • Siddharth Bimal says:

      If you read carefully, you will find the solutions which could have been adhered to combat the pandemic. Thank you.

  10. Awesome describe of government failure upon pandemic control.

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