चीन का कपटी-साम्यवाद व फर्जी-विकास बनाम भारत में चीन के अंध-भगत लोग : फोटो लेख — Vivek Umrao

Vivek Umrao "सामाजिक यायावर"
मुख्य संपादक, संस्थापक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
कैनबरा, आस्ट्रेलिया

लेखक के दो शब्द

मैं जब भी चीन की बात करता हूं, जब भी यह कहने का प्रयास करता हूं कि चीन साम्यवादी देश नहीं है, साम्यवाद के नाम पर धूर्तता से लोगों को मूर्ख बनाता आ रहा है। चीन के लोगों की हालत व भारत के लोगों की हालत में अंतर नहीं, उल्टे कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें भारत चीन से बेहतर है और कुछ मामले ऐसे हैं जिनमें चीन भारत से बेहतर है। यदि संपूर्णता में बात की जाए तो भारत चीन की तुलना में बेहतर देश है। भारत का अपरिपक्व लोकतंत्र भी चीन के कपटी-साम्यवाद से बहुत बेहतर है।

मेरे ऐसा कहने पर बहुत लोग भयंकर रूप से प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं, कुछ तो मुझ पर व्यक्तिगत हमले भी शुरू कर देते हैं, गाली-गलौच शुरू कर देते हैं, शायद इन लोगों का ऐसा होना ही उनको चीन के कपटी-साम्यवादी चरित्र के और नजदीक ला देता है।

ऐसा भी नहीं है कि प्रतिक्रियावादी होने वाले सिर्फ माओत्से तुंग के समर्थक लोग होते हैं। वे लोग भी होते हैं जिनको चकाचौंध का शौक होता है, यौन कुंठित व सैडेस्टिक सोच के लोगों को भी चीन आदर्श देश लगता है। इनमें से बिना किसी अपवाद सभी का चीन से आर्थिक व बाजारू लाभ का रिश्ता ही होता है। 

दरअसल भारत में चीन को बहुत ही बढ़िया, सामाजिक आदर्श व विकसित देश मानने की मनोवैज्ञानिक बीमारी टाइप है, इसमें चीन की यूनिवर्सिटियों मे लाखों रुपए सालाना फीस देकर जाकर पढ़ने वाले छात्र, नौकरी के लिए जाने वाले लोग व व्यापारी लोग हैं। छात्र हों या प्रोफेशनल लोग या व्यापारी लोग, इनको चीन के कुछ शहरों के शहरी चकाचौंध से इतर असली चीन का चेहरा देखने, जानने, समझने की न तो जरूरत होती है, न सोच, न ही वैचारिक औकात, न ही अधिकार। इसलिए जितना देख पाते हैं, उतने को ही चार अंधों की तरह पूरा हाथी मान लेते हैं। यहां मैं यह मानकर चल रहा हूं कि आपको चार अंधों व हाथी वाली कहानी पता ही होगी, इसलिए बताने की जरूरत नहीं समझता हूं।

चीन के अंध-भक्त (भगत-गण)

दरअसल भारत जैसे विकासशील देशों जहां लोगों का एक खास वर्ग है जिसमें मार्क्सवाद, साम्यवाद, कम्युनिज्म, माओवाद इत्यादि के  प्रति अंध-भक्ति वाला एकतरफा रोमांस होता है। जबकि मार्क्सवाद क्या है साम्यवाद क्या है कम्युनिज्म क्या है माओवाद क्या है इत्यादि की धेला भर भी वास्तविक समझ नहीं होती है। लेकिन इन लोगों को चीन में सबकुछ आइडियल दीखता है, पता नहीं कैसे देखते हैं, क्या पढ़ते हैं, क्या सोचते हैं, क्योंकि इन लोगों को चीन में वह सबकुछ दीखता है जो चीन के संदर्भ में इन लोगों व इन लोगों के जैसों के अलावा किसी और को नहीं दीखता है। इन लोगों के पास हर एक बात की एक ही काट होती है कि पाश्चात्य मीडिया व कंपनियों का षणयंत्र रहता है कि चीन को बदनाम किया जाए। गजब बात यह है कि चीन खुद इन षणयंत्रकारियों को अपने यहां सुख सुविधाएं देकर बुलाता है और अपने देश के लोगों को इन कंपनियों के लिए मशीनी रोबोट टाइप बनाकर प्रस्तुत करता है। इन लोगों को दुनिया भर का षणयंत्र दीख जाता है लेकिन चीन द्वारा वीभत्स व फर्जी साम्यवाद के नाम पर चीन के करोड़ों लोगों के साथ लगातार किया जा रहा षणयंत्र नहीं दीखता है।

दरअसल इन चीन-भगत लोगों व भारत के राजनेताओं व राजनैतिक-पार्टियों के भगत लोगों में बिलकुल भी अंतर नहीं होता है। जैसे भारत में विभिन्न प्रकार के भगत लोगों को उनकी भगतई के आधार पर गुजरात में विकास, उत्तरप्रदेश में समाजवाद या बहुजनवाद, बिहार में सामाजिक-न्याय इत्यादि दीखता रहता होता है। कितना भी जोर लगा लीजिए, कितना भी वस्तुनिष्ठता से तथ्य दीजिए, कितना भी तर्कसंगत चर्चा कीजिए, इन सब तत्वों का कोई वजूद रह ही नहीं रह पाता क्योंकि भगत लोगों को वही देखना होता है जो इनको देखना होता है। चूंकि भगतई के अलावा कुछ और ठोस इनके पास होता नहीं तो बहुत जल्द अपने असली चोले में आकर गाली-गलौच शुरू कर देते हैं।

किंकर्तव्यविमूढ़ता यह है कि चीन के ये अंध-भगत लोग भारत के उन लोगों को घटिया मानते हैं, दोयम सोच का मानते हैं, जो लोग भारत के किसी राजनेता या राजनैतिक पार्टी का भगत लोग होते हैं। मानों चीन की भगतई करने से अभिजात्य हो जाते हों, रातोंरात बौद्धिक हो जाते हों, क्रांतिकारी हो जाते हों, परिवर्तनकारी हो जाते हों। मजेदार बात यह कि इनमें से अधिकतर लोग भरे पेट वाले होते हैं, साम्यवादी विचारधारा को जीवन में प्रमाणिकता से उतार कर जीने से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता, उल्टे शोषणकारी ढांचों का सक्रिय हिस्सा बनते हैं। जीवन पूरी बेशर्मी व ढोंग के साथ गुजारते हैं।

चीन देश की कुछ फोटो

अब चीन की कुछ फोटो दे रहा हूं, फोटो के बाद लेख जारी रहेगा। लेख के बीच में फोटो क्यों दे रहा हूं, यह आपको पूरा लेख पढ़ने के बाद स्वतः समझ आ जाएगा। फोटो दो प्रकार की हैं। चीन के अमीर व अभिजात्य लोगों के लिए शहरी चकाचौंध की फोटो तथा चीन की लगभग आधी जनसंख्या जो जीने के लिए अभिशप्त है, उस असली चेहरे की फोटो।

— शहरी-अभिजात्यीय चकाचौंध

— असली चेहरा (फर्जी-विकास)

पेयजल व औद्योगिक कचरा

करोड़ों लोगों व बच्चों का भोजन

करोड़ों गरीब बच्चों के लिए शिक्षा

दूरदराज के इलाकों में सरकार स्कूल तक नहीं बनवाती, बच्चों को जान हथेली पर रख कर स्कूल जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है

बाल मजदूरी के लिए अभिशप्त होना

करोड़ों बच्चे अभिशप्त हैं बचपन न जीने को

करोड़ों गरीब बच्चों की देखभाल

करोड़ों लोगों की आर्थिक दशा-स्थिति

करोड़ों वृ्द्ध लोगों की आर्थिक स्थिति

करोड़ों गरीब लोग

चीन का कपटी-साम्यवाद

  • चीन के प्रमुख शहरों में सबसे सस्ते घर भी, 100 गज से भी कम क्षेत्रफल वाले घर की कीमत भी कई करोड़ रुपए होती है। हर शहर में बहुत महंगे इलाके, कुछ कम महंगे इलाके, कुछ और कम महंगे इलाके यानि कई आर्थिक स्तरों वाले इलाके होते हैं। शहरों में स्लम जैसे इलाके भी होते हैं, गरीबों के इलाके होते हैं। वैसे ही जैसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश इत्यादि देशों में होते हैं।
  • चीन में भी आयकर देना होता है। आय के स्तरों के आधार पर आयकर देना होता है। एक रुपया भी आय है तो आयकर देना होता है (वह अलग बात है कि बहुत लोगों की आय की लिखापढ़ी हो ही नहीं सकती, होती ही नहीं)। 3% से लेकर 45% तक आयकर पड़ता है। जैसे दुनिया के दूसरे देशों में स्लैब होते हैं, वैसे ही स्लैब यहां भी होते हैं। साम्यवादी शासन में लोगों की आय में जमीन आसमान का अंतर कैसे? यह समझ के बाहर है।
  • चीन में 60% सरकारी व 40% प्राइवेट अस्पताल हैं। साम्यवादी शासन में प्राइवेट अस्पताल कैसे? यह समझ के बाहर है। कोरोना के लिए 10 दिन में अस्पताल खड़ा करने की नौटंकी कर सकते हैं, लेकिन चीन की लगभग आधी जनसंख्या के लिए ठीक-ठाक स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं करा सकते हैं।
  • चीन में प्राइवेट स्कूल भी होते हैं, जिनमें भारी-भरकम फीस वसूली जाती है।
  • चीन में लाखों बच्चे आर्थिक विपन्नता के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं।
  • चीन में लाखों बच्चे स्वास्थ्य कारणों से पढ़ाई छोड़ देते हैं।
  • चीन में करोड़ों लोग ऐसी स्थितियों में रहते हैं, जिनको विकास किस चिड़िया का नाम है, पता ही नहीं। इन लोगों को पता ही नहीं कि साम्यवाद, कम्युनिज्म किस चिड़िया का नाम होता है।
  • चीन में लगभग 70 रुपए प्रतिदिन से कम वाले को गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है, 70 रुपए प्रतिदिन के बावजूद चीन में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या करोड़ों में है।

चीन की GDP

चीन की GDP लगभग 12.238 ट्रिलियन डालर है। बहुत लोग मुझसे बहुत बदतमीजी के साथ बहसबाजी करते हैं कि चीन विकासशील देश कैसे हो सकता है क्योंकि इतने ट्रिलियन की GDP है। सुनने समझने को तैयार नहीं होते हैं, अजानकारी व भगतई का अहंकार बहुत बड़ा वजूद रखता है। दरअसल साम्यवाद व ट्रिलियन GDP इत्यादि ऐसे शब्द हैं कि शेष सबकुछ कोई मायने नहीं रखता है। बहुत लोगों को GDP क्या होता है, यह पता नहीं होता, साम्यवाद के सूक्ष्म बिंदुओ का पता नहीं होता। लेकिन इन शब्दों के मायाजाल में अपनी सोच विचार की शक्ति को कुंठित कर लेते हैं।

चीन की GDP पर अपनी बात को एक उदाहरण से सरल ढंग से रखता हूं —

ऑस्ट्रेलिया देश की GDP 1.323 ट्रिलियन डालर है, चीन की GDP 12.238 ट्रिलियन डालर है। मतलब चीन की GDP ऑस्ट्रेलिया की GDP से लगभग 9 गुना अधिक है। चीन की GDP 9 गुना अधिक दीख रही है लेकिन वास्तविकता में चीन की GDP ऑस्ट्रेलिया से बड़ी है नहीं। 

दरअसल चीन की 144 करोड़ जनसंख्या ऑस्ट्रेलिया की ढाई करोड़ जनसंख्या से लगभग 58 गुना अधिक होकर भी सिर्फ 9 गुना ही अधिक GDP पैदा करती है। जाहिर है चीन की सत्ता को संसाधनों का प्रबंधन नहीं आता, जबकि चीन के सभी लोग चीन की सत्ता के गुलाम हैं। दुनिया भर की कंपनियों के लिए पूरे चीन देश को सस्ता मजदूर सप्लाई करने वाला बनाकर भी उतनी GDP नहीं पैदा कर पाता जितनी GDP ऑस्ट्रेलिया के महज ढाई करोड़ लोग पैदा कर लेते हैं।

चीन के साथ तो जनसंख्या घनत्व का बहाना भी नहीं है, क्योंकि चीन का जनसंख्या घनत्व योरप के अधिकतर देशों के जनसंख्या घनत्व से कम है। फिर भी चीन योरप के अधिकतर देशों के विकास व सामाजिक परिपक्वता के सामने कहीं नहीं ठहरता है, सिवाय सस्ते मजदूरों की सप्लाई व उपभोक्ताओं की संख्या के।

यदि सूक्ष्मता से गणना की जाए तो गणना यह निकलती है कि ऑस्ट्रेलिया की GDP चीन की GDP से लगभग 6 गुना अधिक बड़ी है। ऑस्ट्रेलिया की GDP का अधिकांश भाग उसकी अपनी GDP है, जिस पर उसका पूरा अधिकार है। ऑस्ट्रेलिया अपनी GDP अपने देश के लोगों के बेहतर जीवन स्तर पर खर्च करता है।

जबकि चीन की GDP का बड़ा हिस्सा कागजी लिखापढ़ी में भले ही चीन की GDP हो, लेकिन उस पर अधिकार तो योरप, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका की कंपनियों का ही है। यदि चीन की GDP से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकार वाली GDP घटा दी जाए तो चीन की वास्तविक GDP तो बहुत अधिक कम हो जाती है।

चूंकि चीन अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जमकर करता आ रहा है, इसलिए दुनिया की कंपनियों को लुभाने के लिए अब उसके पास सस्ते मजदूर ही हैं। दुनिया की कंपनियां चीन इसलिए पहुंचती हैं क्योंकि चीन में उनको सस्ते मजदूर उपलब्ध होते हैं। यह कौन सा सर्वहारा साम्यवाद है जो मजदूरों का शोषण खुद ही करवाता है?

वास्तविक GDP कम होने के बावजूद चीन अपनी GDP को अपने देश के लोगों का जीवन स्तर बेहतर करने की बजाय अंतरिक्ष की फूं-फां, सैन्य-शक्ति की फूं-फां, विदेशों में संपत्ति खरीदने इत्यादि की फूं-फां में प्रयोग करता है।

यह कौन सा साम्यवाद है कि देश के करोड़ों लोग भूखे मर रहे हों, पहनने के लिए कपड़े नहीं हों, सर पर छत नहीं हो, बच्चों के लिए शिक्षा नहीं हो, लोगों के लिए स्वास्थ्य नहीं हो लेकिन देश की GDP का बड़ा हिस्सा फूं-फां व सत्ता-संचालकों की अय्याशी में खर्च की जाती हो।

उपसंहार

आपने लेख पढ़ लिया है, फोटो देख ली हैं, अब अपने मन में यह विचार जरूर कीजिएगा कि चीन में किस तरह का साम्यवाद या कम्युनिज्म है। यथार्थ यही है कि चीन का साम्यवाद दुनिया की कंपनियों के लिए आर्गनाइज्ड रूप से शोषित सस्ता मजदूर उपलब्ध कराने का औजार बन कर रह गया है, यही बनना भी चाहता है। चीन में साम्यवाद नहीं है। चीन का चरित्र शोषणकारी है न कि सर्वहारावादी।

सस्ता मजदूर उपलब्ध कराने के बदले चीन के सत्ता वर्ग व कुछ प्रतिशत लोगों को अय्याशी भोगने को मिलती है। लोग सवाल भी नहीं खड़ा कर सकते हैं, क्योंकि साम्यवाद के नाम पर हिंसक व बर्बर तरीके से बहुत तगड़ा शिकंजा कस रखा है।

दरअसल माओत्से तुंग इलाके के सबसे अमीर व्यक्ति के पुत्र थे, राज्य के सबसे अभिजात्य परिवारों में से एक में उनका ननिहाल था। बचपन से किशोरवास्था तक के समय का अपना अधिकतर जीवन अपने ननिहाल के ऐश्वर्य में गुजारा। किताबें पढ़ने का शौक था तो जीवन में किताबें खूब पढ़ीं। महात्वाकांक्षी बहुत ही अधिक थे, संवेदनशील तो बिलकुल भी नहीं थे। 

रूस को अपने साम्यवाद का फैलाव करना था सो माओत्से तुंग जैसे आदमी की खोज थी। माओत्से को अनाप-शनाप सैन्य संसाधन व आर्थिक संसाधन दिए, परिणामतः माओत्से तुंग चीन की सत्ता पलटने में कामयाब हुए। सत्ता बनी रहे, निरंकुश रहे, इसलिए लंबे समय तक चीन के लोगों के साथ बर्बरता करते रहे। सर्वहारा के विकास के नाम पर लोगों को शातिराना धूर्तता से मूर्ख बनाते रहे।

चूंकि माओत्से का साम्यवाद से कोई लेना-देना था नहीं, तो उन्होंने साम्यवाद का अपना वर्जन बनाया, बहुत ही अधिक हिंसक, बर्बर व अनैतिक वर्जन। नैतिकता का तो मजाक उड़ाता था। माओत्से तुंग ने लगभग हर उस व्यक्ति की हत्या की जिसने थोड़ा सा भी विरोध किया। कल्पना कीजिए कि माओत्से कितना अधिक शक्की व क्रूर आदमी रहा होगा जिसने 7 करोड़ से अधिक लोगों की हत्या की। ये 7 करोड़ लोग सर्वहारा ही तो रहे होंगे। यदि सर्वहारा नहीं थे तब तो चीन की राजशाही का दिलखोल कर आदर करना चाहिए, क्योंकि राजशाही अपने आपमें साम्यवादी विचार पर चलने वाली रही होगी जो चीन के 7 करोड़ से भी बहुत अधिक लोग अमीर व अभिजात्यीय थे। जाहिर है, माओत्से ने अपने ही देश के सर्वहारा लोगों की हत्याएं करवाईं वह भी करोड़ों की संख्या में।

यदि चीन में लोगों की सहमति से या लोगों की समझ बढ़ने के कारण साम्यवाद आया तो फिर करोड़ों हत्याएं कराने की क्या जरूरत थी। क्यों चौक पर बीसियों हजार निर्दोष छात्रों को चारों तरफ से घेर कर गोलियों से भून दिया गया था। क्यों हर साल हजारों लोगों की चुपचाप हत्याएं कर दी जाती हैं, जो लोग जरा सा भी चीन की सत्ता की आलोचना करने का दुस्साहस करते हैं।

रूस के साम्यवाद में बड़ी खामियां रहीं लेकिन वहां का साम्यवाद चीन जैसा घिनौना व कपटी साम्यवाद नहीं था, यही कारण रहा कि समय के साथ परिपक्व होने के लिए लोकतंत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ गया। दरअसल लोकतंत्र ही साम्यवाद की परिपक्व अवस्था है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं जो कागज में भले ही साम्यवादी न हों लेकिन अपने-अपने देश की सीमा के अंदर व्यवहारिक साम्यवाद को जीते हैं।

इसलिए भारत में रहने वाले चीन के भगत लोगों को थोड़ी सी ही सही लेकिन कम से कम कुछ तो सामाजिक ईमानदारी जीने का प्रयास करना ही चाहिए। भारत के लोकतंत्र को परिपक्व होने में, परिष्कृत होने में योगदान देना चाहिए। यह न कर पाएं, तब भी ठीक है, लेकिन कम से कम चीन के फर्जी, ढकोसलेबाज व कपटी साम्यवाद तथा बर्बर, क्रूर, वीभत्स सत्ता-समूह के शान में जबरिया अतथ्यात्मक कसीदे तो नहीं ही पढ़ना चाहिए। 

Vivek Umrao Glendenning "Samajik Yayavar"

After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.