भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

Vivek Umrao "सामाजिक यायावर"
मुख्य संपादक, संस्थापक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
कैनबरा, आस्ट्रेलिया

समय-समय पर भारत में नेताओं के बयान आते रहते हैं व आम लोग बातचीत में कहते रहते हैं कि पाकिस्तान भेज दो या पाकिस्तान चले जाओ। इसका मतलब यह निकलता है कि जैसे पाकिस्तान में लोग खानाबदोश की तरह रहते हैं। पाकिस्तान में सड़कें नहीं हैं, सुविधाएं नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, शिक्षा नहीं है, नागरिक सुविधाएं नहीं हैं। ऐसा ही और भी बहुत कुछ।

हम भारतीय विशेषकर हिंदू-धर्म के अनुयाई इस कल्पना में जीते हैं कि पाकिस्तान में विकास का ककहरा तक नहीं होगा, बहुत बुरी गत से लोग रहते होंगे। हम यह भूल जाते हैं कि भारत व पाकिस्तान का समाज एक ही था। इसलिए धार्मिक मामलों को छोड़कर समाज की मानसिकता व कंडीशनिंग कमोबेश समान ही रही है। विभाजन के बाद मानसिकता व कंडीशनिंग में कुछ बहुत बदलाव आए हो सकते हैं, लेकिन चारित्रिक मूल-आधार समान है।

जैसे भारत ने तीन-तिकड़म से परमाणु बम, मिसाइल इत्यादि बनाए। पाकिस्तान ने भी उसी तरह के तीन-तिकड़म से परमाणु बम, मिसाइल इत्यादि बनाए। जैसे भारतीय समाज ने अपने लिए गैर-वैज्ञानिकों को महान वैज्ञानिकों के रूप प्रायोजित किया ताकि राष्ट्र-दंभ को तृप्त किया जा सके। उसी तरह पाकिस्तान समाज ने अपने लिए गैर-वैज्ञानिकों को महान वैज्ञानिकों के रूप में प्रायोजित किया ताकि राष्ट्र-दंभ को तृप्त किया जा सके।

विकसित देशों में भारतीयों की संख्या पाकिस्तानियों की तुलना में कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन यदि जनसंख्या का कितना प्रतिशत विकसित देशों में अनिवासी के रूप में रहता है तो पाकिस्तान के लोगों का प्रतिशत अधिक निकलेगा। भारतीयों की तरह पाकिस्तानी भी विकसित देशों में बड़े व प्रतिष्ठित पदों पर काम करते हैं। विकसित देशों में पाकिस्तानियों को जिम्मेदार व मेहनती लोगों के रूप में माना जाता है।

जहां विकसित देशों के लोग खूबसूरत लकड़ी के घरों में रहना पसंद करते हैं, घर छोटा भी हो तब भी बागवानी रखते हैं, घरों को हवादार व प्रकाश से भरपूर बनाते हैं। वहीं हम भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चरल-चकाचौंध को विकास मानते हैं। हम पेड़-पौधों को काट-काट कर कांक्रीट के जंगल खड़ा करने को विकास मानते हैं। चकाचौंध को विकास व उपलब्धि मानने के कारण हमारा समाज भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है, क्योंकि पैसे से चकाचौंध खरीदी जा सकती है। ऐसी ही मानसिकता पाकिस्तान-समाज की है। पाकिस्तान-समाज चकाचौंध वाले विकास के मामले में भारत-समाज से कुछ कदम आगे ही है। चूंकि दोनों देशों के समाजों की मानसिकता व मूल चरित्र समान है इसीलिए सामाजिक विकास इत्यादि के मामलों में दोनों देशों की दुनिया में रैंकिंग कुछ कम-अधिक एक जैसी रहती है।

यदि हम भारतीय-समाज यह सोचते हैं कि सौ दो-सौ साल बाद भारत दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में आए तो हमें मौलिक होना पड़ेगा, हमें लोकतांत्रिक सोच का होना पड़ेगा, हमें विजनरी होना पड़ेगा। भारत के हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति कूट-कूट कर भरी नफरत से बाहर आना होगा।

यह लेख मूलतः पाकिस्तान में विकास के मामले पर है। इसलिए इस लेख को फोटो-लेख के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। फोटो पाकिस्तान के विभिन्न शहरों की हैं।

भवन

माल्स/सुपर-मार्केट्स

सड़कें

हवाई अड्डा

शिक्षण संस्थाएं

अस्पताल

इस्लामाबाद

राष्ट्रीय राजधानी — प्राकृतिक सौंदर्य व इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का समन्वय


Vivek Umrao Glendenning "Samajik Yayavar"

After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

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20 Responses to भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

  1. संजीव says:

    दिलचस्प और ज्ञानवर्धक

  2. MD ISHTEYAQUE ALAM says:

    आपके विचार से सहमत हूं, पर इतना कहना चाहूंगा कि किसी भी देश,लोगों फोटो देख कर आंकना आसान नहीं होगा। हां वहां भी पूर्वी बिहार जैसे पिछड़े इलाके भी होंगे और फोटो में को दिख रहा है वैसी जगह दिल्ली और मुम्बई में भी हैं।
    जब से गांधी जी को पढ़ना और आपको फॉलो करना सीखा विकास को सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर के चश्मे से देखना भी बन्द कर दिया। हां दोनों देश यानी दोनों देशों की जनता वाकई लोकतांत्रिक होतीं तो देश के हालात कुछ और होते। आज दोनों देशों में जो हालात हैं उसके लिए सिर्फ एक चीज़ ज़िम्मेदार है वो है धर्म आधारित विभाजन। बहुत हद तक धर्म के आड़ में ही दोनों देशों की जनता आज तक ठगी जाती रहीं हैं।

  3. Vinay kumar says:

    Jabardast bhai

  4. Vijendra Diwach says:

    बिल्कुल सही।दोनों देशों के समाजों का चरित्र समान है।

  5. Dharmendra kumar Yadav says:

    यहां तो लोगों को छद्म राष्ट्रवाद और देशभक्ति के लिए इतना ही फैलाया जाता है कि पाकिस्तान में कबाड़ी और भिखारी रहते हैं जो चीन और अमेरिका से भीख मांग कर पेट भर रहे हैं, कोई भी उठाई गिरा यहां पाकिस्तान को मिट्टी में मिलाने के लिए उठ खड़ा होता है, वाकई आज भारत मूर्खों के हाथ में है

  6. अमित शाह says:

    जानकारी के लिए शुक्रिया, भारत से पकिस्तान के बारे मे सुन कर लगता था वो टेंट मे रहते होंगे और बैल गाड़ी से यात्रा करते होंगे…

  7. pankaj sachan says:

    सादर प्रणाम भारत में जादातर लोग अशिक्षित कु शिक्षित है इन्हें शब्दों और सही विचारों कि मर्यादा का ज्ञान नहीं है

  8. Dhirendra Sharma says:

    Uncharted Life’sJourney

    Author of INDIA’S NUCLEAR ESTATE.

    Uncharted LIFE’S JOURNEY: A Social Activist’s STORY : By Dr. Dhirendra Sharma
    Author of this Life’s Journey spent years discussing Philosophy with Vedantic scholars in ashrams, Lamasaries and with Bishops and the Catholic monks in the Austro–Swiss Alps. He trekked through the Himalayan heights to Tapovan, Panch-Kedar, and to Mt. Kailash and Manasarovar, crossed over the Pacific and the Atlantic Oceans. In England, he worked in a night factory and was awarded Ph.D. at the University of London.
    In the Evolving Global civilization, he found no Passage to Paradise. But in the Uncharted Life’s Journey, he observed synergic effects of Science, Technology, and Society (STS) reduced the life threatening pain and sufferings. The narratives of social activists Life’s Journey had led the author to ever-advancing Frontiers of Knowledge.
    Professor Noam Chomsky of MIT has written about the Author:
    “I have known Dr. Dhirendra Sharma for almost 20 years. He was a courageous and effective participant in the American anti-war movement, and has since done important and highly-valued academic work in the area of science policy while continuing with his engagement in defence of civil and human rights in India and elsewhere in the world. His active opposition to the Indo-China war apparently cost him a US. government research fellowship in the year 1969-70. No stranger to controversy, Dr Sharma has always conducted himself with great honour and integrity, both in his scholarly work and his activities in connection with problems of freedom and justice.”
    The author repeats what the Denise the Menace said:
    IF I WENT ONLY WHERE I’m INVITED,
    I wouldn’t have gone to go anywhere!
    Uncharted LIFE’S JOURNEY: A Social Activist’s STORY
    (Educreation Publishing, 2019)

  9. Mozahid Alam says:

    informative. Got to know many new things. I had the prejudice towards Pakistan country backwardness.

  10. maanu thakur says:

    मेरी बहुत समय से पाकिस्तान को जानने समझने और देखने की इच्छा थी। पर कुछ बहुत ही जानकारी मिल पाई थी वहां के बारे में आप के इस लेख को पढ़ने के बाद मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई है अब अपने पड़ोसियों को लेके । लेख शानदार है क्यों कि उसमें पिक्स है तो बहुत ही सरलता से बात को समझ पाए हैं जो आप ने बताया।मैने कुछ लोगो को ए लेख दिखाया सब आश्चर्य चकित है और विश्वास ठीक से नहीं कर पा रहे है।।

  11. बिंदु पांडेय" says:

    पाकिस्तान और भारत दोनो देशो के सत्ता नशीनों को लोकतंत्र के हित मे नागरिको हेतु दरवाजे खोल देना चाहिए जिससे नागरिक एक दूसरे के लिए नफरतों के अलावे विकास और संस्कृति के आइने भी देख सके |

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