बोरियत में बुराई क्या है?

Chaitanya Nagar


हाल ही में बीती गरमी की छुट्टियों के दौरान संपन्न और शौकीन लोग देश-विदेश की यात्राओं पर निकले होंगे। जो किन्हीं कारणों से घर पर रह गए, उन्हें अपने बच्चों से यह सुनने को मिला होगा कि ‘हम बोर हो रहे हैं!’ यह बोरियत किसी का पीछा नहीं छोड़ती। लेकिन कभी पूछा जाए कि क्या बुराई है बोर होने या ऊबने में! ऊबा हुआ इंसान उत्तेजना ढूंढ़ता है, एक से ऊबने के बाद अगली की खोज में निकल पड़ता है। यह अंतहीन यात्रा है। बोरियत से मुक्ति की यात्रा भी बहुत ऊबाऊ है!

पश्चिमी देशों में रहने वाले मेरे मित्र कहते हैं कि भारत में बच्चे गरीब होते हुए भी मुस्कराते दिखते हैं, जबकि हमारे यहां बच्चे हमेशा दुखी ही रहते हैं, चाहे उन्हें कितने भी खिलौने दे दो। अक्सर मोबाइल, टीवी और ई-पैड बोरियत के लिए जिम्मेदार होते हैं। जिन चीजों को मनोरंजन के लिए बनाया गया, वही बोरियत का कारण बन गर्इं। यह दिलचस्प है कि बोरियत को जानबूझ कर भी पैदा किया जाता है। दरअसल, मनोरंजन का उद्योग अरबों डॉलरों का है। अगर इंसान बोर न हो तो कैसे यह उद्योग चलेगा? जरा सोचिए, जो खालीपन बहुत सृजनात्मक भी हो सकता था, उसे कैसे बाजार ने चीजों से भर दिया और साथ ही उसे अधूरा भी बनाए रखा। आइंस्टाइन सड़क पर बैठा घंटों कीड़ों को देखता था! क्यों? सीखने वाला, सृजनात्मक मन कभी ऊब नहीं सकता। उत्तेजना की तलाश में लगा मन हमेशा भूखा और ऊबा हुआ होता है। जब हम कोई प्याला, पात्र या मर्तबान लेने जाते हैं तो उसे खाली लेकर ही घर आते हैं। मगर जीवन में एक भी पल खाली हुआ तो हमें कितना बेचैन कर देता है! इस खालीपन और उससे भागने की इच्छा का नाम ही है बोरियत। इसे और कुरेदें तो इसके भीतर भय का चेहरा भी झांकता दिखेगा।
आइंस्टाइन ने बहुत पहले चेतावनी दी थी कि एक ऐसी पीढ़ी जल्दी ही आने वाली है जो तकनीक की वजह से मूढ़ हो जाएगी! हमारी और हमारे ठीक बाद वाली पीढ़ी का जीवन हर वक्त किसी न किसी स्क्रीन या फ्रेम के साथ बंधा रहता है। इसने हमें बहुत सीमित कर दिया है। क्या हम समुद्र के किनारे की नमकीन, भीगी हुई हवा की गंध को सूंघने, लहरों के थपेड़ों को अपने घुटनों तक महसूस करने और उसे एचडी स्क्रीन पर देखने का फर्क समझ सकते हैं? स्क्रीन को देखता हुआ मन एक निष्क्रिय सजगता में रहता है और तेजी से भागती स्क्रीन उसके मस्तिष्क में कहीं प्रवेश कर जाती है और वह उसे ही वास्तविक मान लेता है।
यह कोई जटिल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं। हम सभी बड़ी आसानी से इसे खुद के और बाकी लोगों के भीतर भी होता हुआ देख सकते हैं। स्क्रीन पर घटने वाली उत्तेजक चीजें एक रसायन पैदा करती हैं दिमाग में। डोपामाइन नाम के इस रसायन का संबंध होता है सुखदायी उत्तेजना के साथ। एक बार मस्तिष्क इसका आदी हो जाए तो फिर बहुत मुश्किल है इससे छुटकारा। आप हिमालय के विराट सौंदर्य के सामने खड़े होकर भी अपने मोबाइल का स्क्रीन देखते रहेंगे! एक शोध में पता चला है कि अगर कोई व्यक्ति रोजाना दस घंटे बैठे-बैठे बिताता है तो पूरी संभावना है कि अगले दस सालों में उसकी मृत्यु हो जाएगी! स्क्रीन के साथ जुड़े होने का मतलब ही है एक जगह बैठ जाना। और इसके साथ कई जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियां हैं, मसलन, मधुमेह, रक्तचाप, हड्डियों की बीमारियां।
जब बच्चे कहते हैं कि वे ऊब रहे हैं तो सबसे आसान तरीका है उन्हें कोई इलेक्ट्रॉनिक सामान पकड़ा देना, या टीवी चालू कर देना। मगर यह अस्थायी और सतही समाधान है। क्या ऐसे समय में बच्चे के साथ बैठ कर थोड़ी बात की जा सकती है? उसके साथ कोई ऐसा खेल खेला जा सकता है, जिसमें शारीरिक श्रम भी लगे? हम खुद अगर मोबाइल के आदी हो गए हों, तो यह मुमकिन है कि उससे बचने के लिए हम थोड़ा बाहर या घर के भीतर ही टहल लें! बर्टेंड रसल अपनी किताब ‘द कॉन्क्वेस्ट आॅफ हैप्पीनेस’ में लिखते हैं- ‘किसी बच्चे का विकास तभी होता है जब उसे एक छोटे पौधे की तरह उसी मिट्टी में छोड़ दिया जाए। बहुत अधिक यात्राएं, कई तरह के प्रभाव उनके लिए अच्छे नहीं। जब वे बड़े होते हैं तो वे जीवन की उपयोगी ऊब को बर्दाश्त कर पाने में विफल हो जाते हैं।
जीवन कई तरह के कचरे से भर गया है और बगैर खाली हुए यह कचरा दिखाई नहीं देगा। हमेशा उचाट रहेगा मन, किसी न किसी वस्तु, मित्र, अतिथि, किसी के प्रेम की खोज में बुझा, उदास रहेगा। एक बार हम सीखें कि ऊबना कोई बीमारी नहीं। कभी खाली पात्र की तरह हो लें और जीवन को उतरने दें अपने भीतर आहिस्ता-आहिस्ता। पूरी तरह मशीन बन जाने से पहले। पास्कल तो यहां तक कहते थे कि इंसान अगर कुछ पल भी खुद को किसी कमरे में बंद करके अकेला रह सके तो इस दुनिया की ज्यादातर समस्याएं निपट जाएंगी।

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