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  • जबरन पढ़ाने की परिपाटी

    जबरन पढ़ाने की परिपाटी

    Chaitanya Nagar

    दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्टॉय फार्म में पढ़ने वाले बच्चों में से एक बहुत ही उपद्रवी और अनुशासनहीन था| मजबूर होकर महात्मा गांधी ने एक दिन उसे छडी से मारा| बाद में उन्होंने लिखा कि उस बच्चे को मारते वक़्त वह भीतर तक काँप गए थे| उन्होंने लिखा कि उन्हें तुरंत यह अहसास हुआ कि उन्होंने बच्चे को ‘ठीक’ करने के इरादे से नहीं, बल्कि अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए मारा था| गांधी जी लिखते हैं कि वह बच्चा ही मेरा शिक्षक बन गया क्योंकि उसने मुझे सिखाया कि मैं क्रोध करता हूँ| गांधी जी के इस वक्तव्य को किसी भी विचारक की शिक्षा संबंधी गंभीरतम अंतरदृष्टियों में से शामिल किया जा सकता है| यह पूरी बात गांधी जी की जीवनी लिखने वाले फ्रेंच लेखक लुई फिशर ने बताई है। शिक्षा के क्षेत्र में टॉलस्टॉय फार्म गाँधी जी का एक प्रयोग था. सजा अक्सर अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए दी जाती है, न बच्चे को पढ़ाने या सुधारने के लिए। इसकी जड़ में स्वार्थ-केन्द्रित भावना होती है।        

    परंपरागत शिक्षा का आधार हमेशा से सजा और ईनाम रहा है| घरों में और स्कूलों में भी इसी आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती रही है| खास तौर पर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को| लम्बे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए धमकी, जोर-जबरदस्ती, शारीरिक दंड और लालच का इस्तेमाल किया जा रहा है, बिना यह जाने और सोचे कि उसका बच्चे के कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे इन रास्तों को अपना कर हम एक अंततः एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं| जो बच्चा ईनाम के लालच में पढ़ेगा वह बड़ा होकर ईनाम के लालच में ही अपना काम भी करेगा और बुनियादी अर्थ में भ्रष्टाचार तो यही है| जो बच्चा भय के कारण पढ़ेगा उसका डर जीवन के कई क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से व्यक्त होगा। वह यह मान बैठेगा कि कुछ करने के लिए कुछ मिले. यह जरूरी है. जब वह सरकारी अधिकारी बनेगा तो वह इसी ईनाम की अपेक्षा करेगा. ‘कुछ हमें दो, अतिरिक्त कुछ, तभी हम ये काम करेंगे’। यही तो भ्रष्टाचार की मौलिक, स्थूल परिभाषा है।   

    डांटने-डपटने, सजा देने और सिखाने के बीच के फर्क को जानना जरूरी है। किसी खतरे के आने पर चीखना, डांटना, डपटना जरूरी भी है | पशु पक्षी भी खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं| बिजली के सॉकेट या आग के पास जाते इंसानी बच्चे को भी तेज आवाज़ में समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे वहां से जबरन हटाकर उसके रोने को बर्दाश्त करना क्रूरता है|

    बच्चे या विद्यार्थी को मार-पीट या डांट-धमका कर एक बार काबू में तो किया जा सकता है लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है| इसका दूसरा पहलू है कि अगर शिक्षक दंड न दे तो विद्यार्थी पूरी कक्षा में अव्यवस्था फैला देते हैं और पढ़ना-पढ़ाना ही मुश्किल हो जाता है| इसलिए इस समस्या को बड़ी बारीकी और धैर्य से समझना होगा|

    यह समझना आवश्यक है कि हम, शिक्षक और अभिभावक, भी बच्चे के साथ-साथ सीख सकते हैं और दोनों ही जीवन की गुत्थियाँ सुलझाते हुए आगे बढ़ सकते हैं| हम बड़े लोगों के पास कुछ ऐसा नहीं है जो बहुत ख़ास हो और उसे हमें बच्चे को सिखाने की जरूरत हो| स्कूल जाने के ठीक पहले की उम्र में जब किसी बच्चे को निहारें, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि ऐसा क्या है कि हम इसे सिखा देंगे? उसकी मासूमियत के सामने हमारा समूचा ज्ञान निरर्थक ही नहीं, खतरनाक भी है! क्या हम इस बात का विशेष ध्यान रख सकते हैं कि हमारे संस्कार, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उस तक संप्रेषित न हो जाएँ| हमारे पास बस कुछ अधिक तकनीकी जानकारी, किसी ख़ास विषय संबंधी सूचनाएं हैं जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से, समझदारी के साथ देते रहना चाहिए| पर ये जानकारियां हमें बच्चे से बेहतर नहीं बनातीं. शिक्षा छात्र और शिक्षक की साझा सहयात्रा है, जिसमे किसी विषय, जीविका और जीवन —सभी के बारे में साथ साथ सीखा जाना चाहिए| इस सीख की आवश्यकता शिक्षक को भी है और छात्र को भी.

    ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं| जीवनयापन के साधन के तौर पर वह अध्यापन को चुन लेते हैं, पर उनमें शिक्षण की कम समझ होती है और अपने काम के लिए उत्कटता का भी अभाव होता है| देश में आमतौर पर व्याप्त शिक्षा प्रणाली पर भी नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बाबा-आदम के ज़माने के तरीके ही आजमाए जा रहें हैं| पढाई के वही पुराने तरीके हैं, रटो और परीक्षा में उगल दो| बढ़िया उगल दिया तो अच्छे अंक मिलते हैं पर कितना सीखा, कितना जाना, कितना नया करने की प्रेरणा मिली इसका महत्व नहीं होता| कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल सबसे बड़ी शिक्षा है| यह कोशिश नहीं की जाती कि छात्र सही अर्थ में अपनी रूचि, अपनी प्रतिभा का पता कर सके.

    तथाकथित ‘समस्या से पीड़ित’ और ‘अनुशासनहीन’ बच्चों के साथ संवाद टूट जाता है और चूँकि वे ‘सुनते ही नहीं’ इसलिए उनके साथ संवाद नहीं बन पाता| ऐसे बच्चों से कई अध्यापकों को  संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए| ऐसे बच्चों को खेल में लगाना भी उपयोगी हो सकता है| योग और ध्यान की कुछ तकनीकें भी लाभदायक हो सकती हैं| ऐसे मामलों में घर-परिवार के सदस्यों से बात करना जरुरी है| यह भी जरुरी है कि कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दवाब कम करके उनको दूसरी गतिविधियों में लगाया जाए| जो बातें अध्यापकों पर लागू होती हैं, वही अभिभावकों और माता पिता पर भी लागू होती हैं.

    ये सारे उपाय सिर्फ संकेत भर हैं| वास्तविक काम तो खुद उस अध्यापक या अभिभावक खुद ही करना होगा जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह जानता है कि बच्चों के इस तरह के व्यवहार का कोई गहरा कारण है और इसलिए उनको पढ़ाने का भी एक ख़ास तरीका जरूरी है| जब एक ‘स्पेशल एजुकेटर’ आक्रामक मानसिक रूप से अक्षम बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है| शारीरिक दंड की एक स्नेहपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में कोई जगह ही नहीं होनी चाहिए| यदि शारीरिक दंड जरुरी भी लगे, तो यह उनके लिए ही होना चाहिए जो इसके हिमायती हैं!

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  • बोरियत में बुराई क्या है?

    बोरियत में बुराई क्या है?

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    हाल ही में बीती गरमी की छुट्टियों के दौरान संपन्न और शौकीन लोग देश-विदेश की यात्राओं पर निकले होंगे। जो किन्हीं कारणों से घर पर रह गए, उन्हें अपने बच्चों से यह सुनने को मिला होगा कि ‘हम बोर हो रहे हैं!’ यह बोरियत किसी का पीछा नहीं छोड़ती। लेकिन कभी पूछा जाए कि क्या बुराई है बोर होने या ऊबने में! ऊबा हुआ इंसान उत्तेजना ढूंढ़ता है, एक से ऊबने के बाद अगली की खोज में निकल पड़ता है। यह अंतहीन यात्रा है। बोरियत से मुक्ति की यात्रा भी बहुत ऊबाऊ है!

    पश्चिमी देशों में रहने वाले मेरे मित्र कहते हैं कि भारत में बच्चे गरीब होते हुए भी मुस्कराते दिखते हैं, जबकि हमारे यहां बच्चे हमेशा दुखी ही रहते हैं, चाहे उन्हें कितने भी खिलौने दे दो। अक्सर मोबाइल, टीवी और ई-पैड बोरियत के लिए जिम्मेदार होते हैं। जिन चीजों को मनोरंजन के लिए बनाया गया, वही बोरियत का कारण बन गर्इं। यह दिलचस्प है कि बोरियत को जानबूझ कर भी पैदा किया जाता है। दरअसल, मनोरंजन का उद्योग अरबों डॉलरों का है। अगर इंसान बोर न हो तो कैसे यह उद्योग चलेगा? जरा सोचिए, जो खालीपन बहुत सृजनात्मक भी हो सकता था, उसे कैसे बाजार ने चीजों से भर दिया और साथ ही उसे अधूरा भी बनाए रखा। आइंस्टाइन सड़क पर बैठा घंटों कीड़ों को देखता था! क्यों? सीखने वाला, सृजनात्मक मन कभी ऊब नहीं सकता। उत्तेजना की तलाश में लगा मन हमेशा भूखा और ऊबा हुआ होता है। जब हम कोई प्याला, पात्र या मर्तबान लेने जाते हैं तो उसे खाली लेकर ही घर आते हैं। मगर जीवन में एक भी पल खाली हुआ तो हमें कितना बेचैन कर देता है! इस खालीपन और उससे भागने की इच्छा का नाम ही है बोरियत। इसे और कुरेदें तो इसके भीतर भय का चेहरा भी झांकता दिखेगा।
    आइंस्टाइन ने बहुत पहले चेतावनी दी थी कि एक ऐसी पीढ़ी जल्दी ही आने वाली है जो तकनीक की वजह से मूढ़ हो जाएगी! हमारी और हमारे ठीक बाद वाली पीढ़ी का जीवन हर वक्त किसी न किसी स्क्रीन या फ्रेम के साथ बंधा रहता है। इसने हमें बहुत सीमित कर दिया है। क्या हम समुद्र के किनारे की नमकीन, भीगी हुई हवा की गंध को सूंघने, लहरों के थपेड़ों को अपने घुटनों तक महसूस करने और उसे एचडी स्क्रीन पर देखने का फर्क समझ सकते हैं? स्क्रीन को देखता हुआ मन एक निष्क्रिय सजगता में रहता है और तेजी से भागती स्क्रीन उसके मस्तिष्क में कहीं प्रवेश कर जाती है और वह उसे ही वास्तविक मान लेता है।
    यह कोई जटिल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं। हम सभी बड़ी आसानी से इसे खुद के और बाकी लोगों के भीतर भी होता हुआ देख सकते हैं। स्क्रीन पर घटने वाली उत्तेजक चीजें एक रसायन पैदा करती हैं दिमाग में। डोपामाइन नाम के इस रसायन का संबंध होता है सुखदायी उत्तेजना के साथ। एक बार मस्तिष्क इसका आदी हो जाए तो फिर बहुत मुश्किल है इससे छुटकारा। आप हिमालय के विराट सौंदर्य के सामने खड़े होकर भी अपने मोबाइल का स्क्रीन देखते रहेंगे! एक शोध में पता चला है कि अगर कोई व्यक्ति रोजाना दस घंटे बैठे-बैठे बिताता है तो पूरी संभावना है कि अगले दस सालों में उसकी मृत्यु हो जाएगी! स्क्रीन के साथ जुड़े होने का मतलब ही है एक जगह बैठ जाना। और इसके साथ कई जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियां हैं, मसलन, मधुमेह, रक्तचाप, हड्डियों की बीमारियां।
    जब बच्चे कहते हैं कि वे ऊब रहे हैं तो सबसे आसान तरीका है उन्हें कोई इलेक्ट्रॉनिक सामान पकड़ा देना, या टीवी चालू कर देना। मगर यह अस्थायी और सतही समाधान है। क्या ऐसे समय में बच्चे के साथ बैठ कर थोड़ी बात की जा सकती है? उसके साथ कोई ऐसा खेल खेला जा सकता है, जिसमें शारीरिक श्रम भी लगे? megacanabisdispensary.com ambien cr generic हम खुद अगर मोबाइल के आदी हो गए हों, तो यह मुमकिन है कि उससे बचने के लिए हम थोड़ा बाहर या घर के भीतर ही टहल लें! बर्टेंड रसल अपनी किताब ‘द कॉन्क्वेस्ट आॅफ हैप्पीनेस’ में लिखते हैं- ‘किसी बच्चे का विकास तभी होता है जब उसे एक छोटे पौधे की तरह उसी मिट्टी में छोड़ दिया जाए। बहुत अधिक यात्राएं, कई तरह के प्रभाव उनके लिए अच्छे नहीं। जब वे बड़े होते हैं तो वे जीवन की उपयोगी ऊब को बर्दाश्त कर पाने में विफल हो जाते हैं।
    जीवन कई तरह के कचरे से भर गया है और बगैर खाली हुए यह कचरा दिखाई नहीं देगा। हमेशा उचाट रहेगा मन, किसी न किसी वस्तु, मित्र, अतिथि, किसी के प्रेम की खोज में बुझा, उदास रहेगा। एक बार हम सीखें कि ऊबना कोई बीमारी नहीं। कभी खाली पात्र की तरह हो लें और जीवन को उतरने दें अपने भीतर आहिस्ता-आहिस्ता। पूरी तरह मशीन बन जाने से पहले। पास्कल तो यहां तक कहते थे कि इंसान अगर कुछ पल भी खुद को किसी कमरे में बंद करके अकेला रह सके तो इस दुनिया की ज्यादातर समस्याएं निपट जाएंगी।