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  • उनका पिरामिड उलट दीजिये

    Amar Tripathi

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    दुनिया भर के समाजशास्त्रीय और अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों को धूल चटा जाईये और सिर्फ यह सोचिये कि आप अपने लिए कैसी जिंदगी चाहते हैं और अपने लिए कैसी दुनिया ? करेंसी और बैंकिंग के जिस स्कैम ने आज हमें और आपको घेर रखा है और हमारी जिंदगियों को सुविधा पूर्ण बनाने के नाम पर वह हमारी साँसों तक को जिस तरह डिक्टेट कर रहा है, क्या वह आपको पसंद आ रहा है ? क्या आप स्वतंत्र हैं ? अपनी मर्जी की जी पा रहे हैं या फिर दिन रात मेहनत करके, बदले में मिली करेंसी से अपनी जरूरत और विलासिता के लिए चीजें जुटाने वाली एक मशीन बन चुके हैं ? असलियत यह है कि आप और हम उनके बनाये हुए सिस्टम में फिट होकर उत्पादन और उपभोग के चक्करदार क्रम में निरंतर घिसते हुए पुर्जे से ज्यादा हैसियत नहीं रखते !

    मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैसलो ने मनुष्य की जरूरतों का एक पिरामिड बनाया और हमें बताया कि पिरामिड में नीचे से शुरू करके ऊपर की ओर जाते हुए एक एक करके मनुष्य की जरूरतें पूरी होंने पर ही मनुष्य पूर्णता को प्राप्त होता है और उसे उच्च मानवीय मूल्यों के दर्शन होते हैं. चित्र में दिए पिरामिड को ध्यान से देखिये आप खुद-ब-खुद समझ जायेंगे. मोटे तौर पर मैस्लोवेँयन पिरामिड ऑफ़ नीड्स के अनुसार यदि आपकी शारीरिक जरूरतें जैसे–सांस, भोजन, सेक्स और सुरक्षा–नहीं पूरी हुयी हैं तो आप जीवन में उच्च्चतर मूल्यों जैसे प्यार, आत्मसम्मान, ज्ञान और स्वतंत्रता की सोच भी नहीं सकते !

    अब जरा सोचिये अगर ऐसा ही होता तो अभाव और गरीबी में जीने वाला कोई भी कभी किसी उच्चतर अनुभव को प्राप्त ही नहीं हो सकता था. कबीर और रैदास तो होते ही नहीं, भारत ही क्या दुनिया के हर कोने से भयंकर गरीबी और संघर्ष झेलकर और उसी में पलकर, सैकड़ों साहित्यिक, अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और खेल जगत की प्रतिभाओं ने जन्म लिया और उभरीं ही नहीं बल्कि अपनी अपनी जगह से अब्राहम मैसलो के इस सिद्धान्त को मुंह चिढा रही हैं….

    लेकिन आज भी अमेरिका के पांच-पांच विश्वविद्यालयों में दंड पेल चुके मनोविज्ञान के इस प्रकांड पट्ठे की “Maslow’s hierarchy of needs” बाकायदा दुनिया भर में रेफर की जाती है और छात्रों को पढाई जाती है.

    यह पोस्ट जिस बात से शुरू हुयी थी कल उसे इस सिद्धांत में मिलाते हुए इसकी बखिया उधेड़ेंगे और जरा समझेंगे कि इसे कैसे वे लोग अपने हक़ में इस्तेमाल करते हैं और फिर इसी को पकड़ कर हम दूसरे सिरे से कैसे अपने हक़ में इस्तेमाल कर सकते हैं ……..वापस पाने के लिए अपना जीवन, अपनी स्वतंत्रता और ख़ुशी।

    अब्राहम मैसलो का पिरामिड एक सिद्धांत हो या हायीपोथेसिस– इसको कोई भी नाम दे लीजिये सिर्फ एक रेफेरेंस पॉइंट है, जिससे हम चीजों को समझना शुरू करते हैं और हमारे बाजारू शोषक हमें समझाना. कल की पोस्ट के कमेन्ट में सरफराज अनवर ने मैस्लोवियन पिरामिड को चुनौती देने वाले कबीर, रैदास आदि की सफलता को समझने के लिए, black swan phenomenon को समझने की सलाह दी.

    दरअसल black swan phenomenon भी एक तरह का पोंगा सिद्धांत है जिसे स्टॉक ट्रेडर नसीम निकोलस तालिब ने 2008 की अमरीकन तबाही और उसके पीछे अमरीकी फाइनेंसियल सर्विस कंपनियों की धोखेबाजी को छिपाने के लिए गढ़ा. निकोलस ने रोबोटिक ट्रेडिंग के लिए कम्प्यूटर मॉडल बनाने में जिंदगी भर लगे रहे फिर भी न तो जिम्बावे के हाइपर इन्फ्लेशन और न ही 2008 के अमरीकी मेल्ट डाउन को ही समझ पाए थे इसलिए उन्होंने ये नयी थ्योरी पकड़ा दी. इसके अनुसार “black swan is an event or occurrence that deviates beyond what is normally expected of a situation and is extremely difficult to predict.” जब कि कोई भी घटना बिना कारण नहीं होती और न ही नियम का अपवाद होती है, उसके बीज सदा पिछली परिस्थितियों में छिपे होते हैं जिन्हें देखने समझने के लिए कम्प्यूटर की मशीनी इंटेलिजेंस नहीं मानवीय समझ की जरूरत पड़ती है.

    फिलहाल मेरा मानना है कि सभी बेईमान और ईमानदार विद्वानों के सारे सिद्धांत जीवन से ही प्रतिपादित होते हैं और जीवन उनके आधार पर नहीं चलता. मनुष्य लगातार स्थापित सत्य को चनौती देता रहता है और नए सत्य की रचना करता रहता है.

    अब मस्लोवियन पिरामिड को उलटने की बात करते हैं और उस प्रश्न से अपनी बात शुरू करते हैं जो कल की पोस्ट के आरम्भ में की गयी थी.

    आप कैसा जीवन चाहते हैं और वैसा जीवन जीते हुए कैसी दुनिया आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ कर जाना चाहते हैं? कहीं आप अपनी आनंद और संतुष्टि की खोज में जीवन के मूलभूत अधारों को ही तो नहीं नष्ट कर रहे? पृथ्वी नामक ग्रह और उसके संसाधनों का, जिनका उपयोग करते हुए आप बन्दर से आदमी बन गए अभी भी बंदरों की तरह ही क्यों उपयोग कर रहे हैं? यह समय है टटोलने का कि कहीं एक अदद पूँछ अभी भी तो आपके पीछे नहीं चिपकी रह गयी, जो आपको हर चीज की अंधी नक़ल करने के लिए उकसा रही है ?

    मैस्लोवेयन पिरामिड को उलटी तरफ से लागू करना शुरू कीजिये, सभ्यता का व्याकरण बदल जायेगा और जीवन का भी, हाँ लेकिन उसके पहले अपने पीछे चिपकी हुयी पूंछ हटानी होगी. अगली पोस्ट तक सोचिये कि कैसे हटायेंगे?

    कबीर रैदास और दुनिया के हजारो साधारण लोग जो जीवन में ऊच्च्तर अनुभवों को जीते आये हैं उन्होंने ऐसा ही किया है और आज भी करते हैं।

    ***

    अगर जीवन का एकमात्र उद्देश्य मैटेरिअल कम्फर्ट यानि सुविधा भोग ही करना है तो आज औसतन पचास-साठ हजार महीना कमाने वाले जितनी सुविधा भोग पा रहे हैं, उतनी दो सौ साल पहले इंग्लॅण्ड के राजपरिवार को भी नसीब नहीं थी. जरा सोचिये कि तमाम भौतिक सुखों से लैस होने के बावजूद भी दुःख और खालीपन का रोना क्यों रोते हैं लोग? क्या जीवन स्तर (quality of life=the standard of health, comfort, and happiness) सिर्फ वस्तुओं और उपभोग से निर्धारित होता है? अगर ऐसा होता तो वातानुकूलित कमरे में नरम गद्दे पर लेटे हुए मनुष्य सर्वाधिक उल्लास का अनुभव कर सकता. लेकिन ऐसा होता नहीं है, तो जाहिर है कुछ अन्य तत्त्व भी हैं जो हमारे जीवन की सार्थकता और ख़ुशी के वाहक हैं.

    जीवन में सार्थकता और ख़ुशी का अनुभव करवाने वाले तत्त्व हर व्यक्ति के लिए नितांत निजी और अलग-अलग होते हैं जो उस व्यक्ति के अपने जीवन की विकास यात्रा के हिसाब से स्वतः निर्धारित होते चलते हैं. आपने अपना जीवन किस मानसिक और भौतिक मुकाम से शुरू हुआ और आप उसे किधर लेकर चल रहे हैं, आपको होने वाले अच्छे बुरे अनुभव इसी पर निर्भर करेंगे.

    सुख और दुःख का अनुभव जीवन में एकंतारिक है (एक के बाद ही दूसरे का आना) और अनिवार्य भी; ( अन्यथा एक के बिना दूसरे की पहचान भी कैसे होगी?) जो अपनी इस चक्रीय व्यवस्था से जीवन को समृद्ध निरंतर समृद्ध करता चलता है. अपने प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश में स्वतंत्र, स्वस्थ्य, सौहार्दपूर्ण साहचर्य के साथ यह समृद्धि पाना और उसे बांटना ही जीवन का पूर्णकाम होना है.

    स्वतंत्रता भी एक सापेक्ष स्थिति है. किसी व्यक्ति, कुनबे, कबीले या राज्य की स्वतंत्रता तभी तक कायम रह सकती है जब तक कि वह किसी दूसरे व्यक्ति, कुनबे, कबीले या राज्य की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करे. इसलिए अपनी स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए दूसरे की स्वतन्त्रता को बनाये और बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है. प्रकृति से प्राप्त जीवन के साथ प्रकृति का सामंजस्य बनाये रखने की हमारी जिम्मेदारी भी इसी श्रेणी में आती है.

    प्रकृति की स्वतंत्रता में जितना हस्तक्षेप मनुष्य करेगा, प्रकृति भी उसकी स्वतन्त्रता में उतना ही हस्तक्षेप करेगी और यह लड़ाई मनुष्य जीत नहीं सकता क्योंकि वह रचनाकार (creator) नहीं है मात्र अनुगामी है. ध्यान दीजिये हमारा हर आविष्कार आज भी किसी न किसी प्राकृतिक रचना से ही प्रेरित है और निरंतर विकसित होते विज्ञान ने अब तक सिर्फ प्राकृतिक घटनाओं को समझने का ही काम किया है; किसी नयी परिघटना को जन्म नहीं दिया.

    इस संक्षिप्त और प्रवचन जैसे लगने वाले वक्तव्य को हजम करने के बाद ज़रा वर्तमान की ओर लौटिये और प्रकृति का ही एक उदहारण देखिये–

    मधुमक्खी जिस फूल से रस लेती है उस फूल को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाती, उलटे फूलों के पराग की वाहक बनती है जिससे उस पौधे की संतति बढती है. वापस वह शहद बनाती है लेकिन अपनी निजी आवश्यकता से बहुत ज्यादा, इतना कि वह मनुष्य के लिए भी उपलब्ध होता है. संक्षेप में जितना वह प्रकृति से लेती है उससे अधिक देती है और साथ में प्रकृति का काम भी करती है. मनुष्य को मधुमक्खी से कुछ सीखना चाहिए.

    तो वापस मैस्लोवेयन पिरामिड की तरफ आईये, उसे पकड़ कर उलट दीजिये और उस पर मधुमक्खी की तरह बैठ कर अपना छत्ता बुनिए, आपका जीवन अधिक ठंडा, मीठा और सुखदायी होगा.

    हाँ लेकिन आज के समय में, इसके साथ ही आपको अपने चारों तरफ अपनी स्वतंत्रता के विरुद्ध चल रही साजिशों से सावधान रहना होगा, उसका प्रतिरोध भी करना होगा और जाहिर है इसमें कुछ collateral damage तो होगा ही।


    साभार : अर्थसत्ता

  • इनकम, इनकमटैक्स और हमारा पोपट

    Amar Tripathi

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    दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग बसते है :

    एक जो पैसे के लिए काम करते हैं।
    दूसरे जो अपने पैसे से काम लेते हैं।

    आप कारीगर हैं, किसान हैं, मिल या फैक्ट्री के मजदूर हैं, अध्यापक हैं, बुद्धिजीवी हैं, पेंटर हैं, कलाकार हैं, सरकारी,अर्ध सरकारी या निजी उपक्रम में कर्मचारी हैं, 

    तो जाहिर है आप पैसे के लिए काम कर रहे हैं। 

    यदि आप व्यापारी हैं या उद्योगपति हैं तो स्पष्ट है की आप अपने पैसे से काम ले रहे हैं।

    आप सभी अपनी आय के अनुसार सरकार को इनकमटैक्स भी देते हैं।

    अब सिर्फ ये समझना बाकी है कि इनकम टैक्स की व्यवस्था किस तरह उन लोगों के पक्ष में झुकी हुयी है कि जो अपने पैसे से काम लेते हैं

    और उनका पोपट कैसे बन गया जो पैसे के लिए काम करते हैं।

    अब थोड़ा इनकम टैक्स की पृष्ठभूमि में चलते हैं। 

    इनकमटैक्स ही नहीं किसी भी टैक्स की ईजाद राज्य द्वारा प्रत्यक्ष अपने खर्चे चलाने के लिए की गयी परन्तु ऐसा करते हुए इस बात का ध्यान रखा गया कि इसका बोझ उनके ऊपर न पड़े जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, इसीलिए टैक्स वसूली की जद में सामान्य रूप से धनिकों को ही रखने का प्रचलन रहा।

    प्राचीन रोम में केवल संपत्ति कर लिया जाता था जो कि संपत्ति (भूमि, भवन, पशुधन, गुलामो की संख्या, मूल्यवान वस्तुओं और नकदी) की कुल मूल्य का १ % वार्षिक होता था, लेकिन युद्ध के दिनों में बढ़ा कर ३% तक कर दिया जाता था। इसके अलावा दसवीं शताब्दी के चीन में ‘सिन’ साम्राज्य के ‘वैंग मैंग’ नामक सम्राट ने १०% वार्षिक तक का टैक्स लगाया लेकिन वह मात्र १३ साल चल पाया और उसके बाद आने वाले ‘हान’ साम्राज्य में फिर से पुरानी टैक्स दर लागू कर दी गयी। परन्तु इनकमटैक्स सबसे पहले लागू किया गया ११८८ के इंग्लॅण्ड में, तीसरे क्रूसेड के खर्चे पूरे करने के लिए, जब हर खासो-आम से उसकी चल संपत्ति और नकदी का १०% वसूला गया।

    इसके बाद में १७९८ के दौरान ग्रेट ब्रिटेन में ब्रिस्टल के डीन के सुझाव पर प्रधानमंत्री विलियम पिट ने प्रति पौंड २ पेन्स (तब १२० पेन्स का एक पौंड होता था) का इनकम टैक्स लगाया जिसका मकसद फ़्रांसीसी क्रांति से उपजे युद्ध के लिए हथियार खरीदना था। यही पर पिट ने ही सर्वप्रथम बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों से टैक्स वसूलने के प्रथा शुरू की। उसके समय ६० पौंड (अबके लगभग ६००० पौंड) के ऊपर की आय वालों से २ शिलिंग प्रति पौंड की दर से टैक्स लिया गया जो लगभग १०% बैठता है। हालाँकि यह टैक्स १८०१ में ख़त्म किया गया, फिर १८०३ में हेनरी अड्डिंग्टन द्वारा शुरू किया गया जो १८१६ में फिर खत्म किया गया। 

    इनकम टैक्स की विधिवत शुरुआत १८४२ के इनकम टैक्स एक्ट से हो सकी जो कि बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों वाले हेनरी अड्डिंग्टन माडल पर ही आधारित थी। हालाँकि उस समय इसका विरोध भी हुआ लेकिन धीरे-धीरे १८६१ तक इनकम टैक्स वहां की टैक्स व्यवस्था का अंग बन गया। 

    अमेरिका में भी इसी दौरान सरकार ने इनकम टैक्स लागू किया जो कि १९१३ के संशोधन के बाद वहां भी स्थायी हो गया।

    इस छोटे से विवरण से यह तो स्पष्ट है ही कि राज्य द्वारा युध्द या दूसरे आकस्मिक खर्चों को पूरा करने के लिए लगाये गए इनकम टैक्स की अवधारणा ने अंततः स्थायी रूप ले लिया, लेकिन फिर भी मूल रूप से यह टैक्स धनिक वर्ग से ही वसूला जाता था, जिनमें वही लोग होते थे जो वहुधा अपने पैसों से काम लेते थे, न कि पैसों के लिया काम करते थे। अब देखिये कि इस व्यवस्था का पोपट कैसे बना —-

    लेकिन इसके पहले जरा उनकी भी पड़ताल कर ली जाये की जो अपने पैसे से काम लेते हैं। सन १६०० तक शुद्ध और मुक्त व्यावसायिक कंपनियां नहीं होती थीं। यूरोप के कुछ देशों ने अपनी अपनी संसद के चार्टर से चंद लुटेरी कंपनियां बना रखी थीं जिनका काम दूसरे मुल्कों में जाना, व्यापारिक समझौते या युद्ध के माध्यम से उनकी संपत्ति हड़पना ही होता था, ईस्ट इंडिया कंपनी भी उनमे एक थी जिसने प्लासी की लड़ाई के बाद से भारत पर अधिपत्य जमाया। उस समय भी कंपनियों में सरकार की कोई सीधी आर्थिक भागीदारी नहीं होती थी लेकिन परोक्ष रूप से उन पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता था।

    विस्तृत इतिहास में न जाते हुए केवल इतना बताना प्रासंगिक होगा कि धनिक वर्ग शुरू से राज्य सत्ता का सहयोगी तो रहा है लेकिन राज्य सदैव उसे नियंत्रण में भी रखता रहा है, जिससे एक तनावपूर्ण संतुलन सदैव बना रहता था …और इसी संतुलन की वजह से देशों की आतंरिक आर्थिक प्रगति भी संभव हो सकी। ग्लेडस्टोन के ज़माने में १८४४ में आये कानून के माध्यम से ही आधुनिक व्यापारिक प्रतिष्ठानो का गठन संवैधानिक रूप से संभव हुआ। अमरीका में भी यह प्रक्रिया सबसे पहले न्यू जर्सी में १८९६ में शुरू हुयी। इसके बाद हुए अनेक कानूनी परिवर्तनों के माध्यम से हिस्सेदारी के स्वरूप तय किये गए और कंपनियों को स्वतन्त्र वित्तीय इकाई के रूप में प्रतिष्ठा मिली ।

    इसके बाद लगभग आधे दशक तक कम्पनियाँ बनी, शेयर निर्धारण के तौर तरीके, उनके बाजार विकसित हुए और साथ ही विकसितहुए विविध मैन्युफैक्चरिंग उद्योग, जिसके बल पर चारों और तमाम नयी-नयी वस्तुओं के ढेर लग गए और हम अपने को अत्यंत प्रगतिशील समझने लगे । वस्तुतः हमारी प्रगतिशीलता विचारों से फिसल कर वस्तुओं में केंद्रित होने लगी थी । इसके बाद १९५० के दशक में सरकार पर कंपनियों पर से नियंत्रण कम करने के लिए दबाव की मुहीम शुरू हुयी, और सफल भी हुयी जिसकी चर्चा हम अर्थसत्ता-१ व २ में कर चुके हैं।

    यूरोप में औद्योगिक विकास के साथ ही गरीब-अमीर के बीच की खाई बढ़नी शुरू हो गयी थी और उसी के साथ विकसित हुयी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, जिसमे राज्यसत्ता ने, टैक्स द्वारा प्राप्त धन को गरीबों और निर्बलों की स्थिति सुधारने में भी व्यय करने की योजना बनायी और इनकम टैक्स बढ़ती आय पर बढ़ती दर के हिसाब से ही लगाया, जो सर्वथा न्याय सांगत जान पड़ता था, और वास्तव में था भी।

    इसी के साथ उन लोगो ने —जो पैसे से काम लेते हैं, अपनी हैसियत के अनुसार, छोटी बड़ी कम्पनियाँ बनानी शुरू कर दीं। अत्यंत छोटी हैसियत की मालिकाना हक़ वाली कम्पनियाँ भी खूब बनी। साथ में आय को पारिभाषित करने का फार्मूला ऐसा विकसित हुआ जो कि ‘पैसे से काम लेने’ वालों के हक़ में था; और वही आज भी लागू है।

    फर्क यही से शुरू होता है—– किसी कंपनी की आय, उसे प्राप्त कुल व्यापारिक भुगतान में से सारे खर्चे काट कर बची हुयी राशि को माना जाता है, जब कि किसी व्यक्ति को उसके श्रम के बदले मिले हुए सकल भुगतान को। अब टैक्स का निर्धारण तो आय पर ही होना है।

    नतीजा—

    आज हर वेतन भोगी पैसे कमाता है, पहले टैक्स अदा करता है उसके बाद खर्च कर पाता है। 

    जब कि हर व्यवसायी पैसे कमाता है, पहले जी भर खर्च करता है,खर्च के वाउचर जमा करता है फिर बचे हुयी राशि पर टैक्स अदा करता है ।

    यानि की जो कर व्यवस्था सामान्य और निम्न वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए बनायी गयी थी वह उन्ही की आय में कटौती का वायस बन रही है, जब कि व्यावसायिक वर्ग/धनिक वर्ग के जीवन यापन के स्तर पर इसका तनिक भी प्रभाव नहीं है।

    हो गया न हमारा पोपट !

    अब इसमें बढ़ती मुद्रा स्फीति के अनुपात में टैक्स स्लैब का न बढाया जाना और कोढ़ में खाज का काम करता है।


    Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2016/12/blog-post.html

  • प्यार में बाजार

    Amar Tripathi

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    चारों तरफ प्रेम का परनाला बह रह रहा हैं—सोशल मीडिया में, रेडियो-टेलीविजन में, अखबारों में. युवाओं को फ़िल्मी गानों के माध्यम से प्रेम करने के लिए उकसाया जा रहा है, जिससे कहीं वे इस पचड़े में पड़े बिना ही 14 फरवरी न निकाल दें.

    इस सबका वास्तव में वाजिब असर भी हुआ है, और इतना हुआ है कि वे अब जाग गए हैं और लगता है कि प्रेम करके ही मानेंगे और वह भी पूरे विधिविधान से. जो नौजवान अभी भी इस हल्ले में नहीं आ पा रहे हैं वे दूसरी तरफ जाकर “सस्कृति” नामक भैंस दुहने में लग गए हैं. वे इस बात से भी रुष्ट हैं कि बाजार उनके प्रतीकों जैसे लाठी, त्रिशूल और परदे को वैलेंटाइन वीक के आयोजनों में सही जगह नहीं देता.  इसलिए वे प्रेमियों  के साथ वही सुलूक करने में लग जाते हैं जो आज के लगभग १८०० साल पहले सेंट वैलेंटाइन के साथ तत्कालीन रोमन सम्राट ने किया था–यानी पिटाई.

    बाजार की मार्फ़त ही पता चला है कि प्रेम करना और उसे जाहिर करना खासा खर्चे वाला काम है और यह सात दिन में स्टेप-बाई-स्टेप ही किया जा सकता है. गुलाब, चॉकलेट, टेडी और अन्य उपहारों के जोर से आप प्रस्ताव को गौर करने लायक बनाते हैं और फिर स्वीकृत हो जाने पर ‘हग’ या ‘किस’ करते हैं तब कहीं जाकर मामला जमता है, और प्रेम, जो अब तक शायद कहीं अटका हुआ था, अचानक हो बैठता है और बात आगे बढती है. अगर ये सब आपकी हैसियत के बाहर बैठता है तो आप और चाहे जो कर सकते हों, प्रेम तो बिलकुल नहीं कर सकते.

    मगर इतना कर सकने की हैसियत के साथ आप चाहें तो “मेरी जां, जाने जिगर, इकरार, बेकरार, प्यार, यार, दिलदार, बहार, चन्ना  जैसे बीस तीस शब्द जो बार-बार अलग अलग फ़िल्मी गानों में आकर आपको बचपन से परेशान करते रहे हैं उनको आपस में लपेट कर, कुछ कविता या शायरी टाइप के एक नये  टॉप-अप वाउचर से अपने प्रेम की रिचार्ज वैल्यू बढ़ा सकते हैं.

    यकीन न  हो तो अपने यार/दिलदार से प्यार और पैसा में से किसी एक को  चुनने को कहिये  तो वह निश्चित रूप से आपको ही छोड़ देगा/देगी क्योंकि प्यार और पैसा आपस में कुछ इस तरह गुत्थम गुत्था हैं कि समझ में नहीं आता कि भला उनमें कुश्ती हो रही है या प्यार. हालाँकि दोनों में ख़ास फर्क भी नहीं है.

    और ऐसा क्यों न हो? can you buy modafinil online legally www.guardianfueltech.com आखिर इसी काम के लिए और इसी मौसम में, अमेरिका में २० अरब डॉलर और इंग्लॅण्ड में डेढ़ अरब पौंड और इससे कुछ ही कम फ़्रांस में प्रेमी जन हर साल फरवरी में खर्च करते हैं तो हम क्यों पीछे रह जाएँ ?

    वैसे बड़े धीरज का काम है कि अगर आप को प्यार हो जाए और आप उसके इजहार के लिए फरवरी का इंतज़ार करें… कम से कम ये मुझ जैसे नकारा आदमी के बस की बात तो नहीं.


    Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2017/02/blog-post.html