गिरना

धीरज


गिरने की सीमा
या तो सुनियोजित होती है
या पूरी तरह अनियोजित
तीसरा विकल्प तो
उपरोक्त का निर्विकल्प
ही होता है….

जब गिरने की सीमा
अनियोजित होता है
बहुधा ताड़ से ही गिरते है
और किसी मनचाहे खजूर पर
आकर अटक ही जाते है
जब सुनियोजित ढंग से
गिरना शुरू करते है
भारशून्यता के साथ गिरते है
और तब धरती भी
गिरते हुए को रोक नही पाती
या यूं कहें..

धरती रोकने से
इंकार कर देती है
भला भारहीन को
क्या और क्यूं रोकना ?
सुनियोजित या अनियोजित से परे
उक्त के निर्विकल्प के तौर पर गिरने को
निर्विवाद गिरना तो नही कह सकते
पर ऐसा हो सकता है
जब प्रेम या समर्पण या सेवा के
उद्यमशीलता के शिखरों पर
गिरने के क्रम मे
पहुँच रहे होते हैं…

और तब…
धरती तो धरती
आकाश भी
गिरते हुए का
दामन थाम ही लेता है…

 

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