Author: siddharthvimal

  • आत्मविश्वास और सम्मान का नया औज़ार: इनकम रिटर्न

    कोई भी देश-समाज अपनी उत्पादक शक्तियों की पहचान, आंकलन और सम्मान द्वारा ही विकास की सीढियां चढ़ता है. इस मामले में हमारे यहाँ एक गंभीर चूक हुई है. भारत में दो महत्वपूर्ण उत्पादक वर्ग इस से अछूते रह गए जो उनके हाशिये पर छूटे/ढकेले रहने का सम्भवतः बड़ा कारण है. इसका कुप्रभाव इन वर्गों के आत्मविश्वास, सम्मान और विकास की कमी के रूप में साफ़ दिखाई देता है.

    यह दो वर्ग हैं :
    १. घरेलू-महिलाएं.
    २. कृषि क्षेत्र में मजदूर-किसान.

    आय-व्यय-मुनाफे का आकलन अभी भारत में बहुत ही छोटे वर्ग विशेष तक सीमित है. मध्यम दर्जे और ऊपर के व्यवसायी व् नौकरीपेशा (दर्ज) लोग ही इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं.वह भी लगभग मजबूरी में. बाकी बचे लोगों के लिए यह एक बहुत ही जटिल तकनीकी हौआ है और सुनते ही इस सरदर्द को येन-केन-प्रकारेण टालने की कोशिशें जोर मारने लगती हैं. छोटे व्यवसाइयों और उत्पादकों का एक बड़ा वर्ग इससे सुरक्षित दूरी बनाए रखता है. आय का टैक्स से जुड़ा होना भी एक अड़ंगा है. मुझे लगता है कि “इनकम टैक्स रिटर्न” से इतर इस छूटे हुए वर्ग के लिए यदि सिर्फ “इनकम-रिटर्न” की नयी प्रक्रिया सृजित की जा सके तो क्रांतिकारी बदलाव हो सकते हैं.

    तकनीकि-क्रान्ति के युग में इस कल्पना को साकार कर पाना मुश्किल बिलकुल भी नहीं है. shop.viavisolutions.com एक गृहणी टोल-फ्री नम्बर पर फोन मिलाती है. उसके स्वागत के साथ कंप्यूटरिकृत सिस्टम द्वारा कुछ निश्चित सूचनाएं ली जाती हैं जिससे उसका प्रोफाइल तैयार होता है. इस प्रोफाइल में फिर विभिन्न प्रतिमानों के अनुसार उनके द्वारा किये जाने वाले दैनिक कार्य, घंटे आदि सूचनाएं दर्ज होती हैं और मिनटों में ही स्वतः उक्त व्यक्ति को स्वयं द्वारा किये गए श्रम का आंकलन उसकी अनुमानित कीमत के रूप में प्राप्त हो जाता है.

    ऐसी ही व्यवस्था हर वर्ग के लिए भिन्न प्रतिमानों/ घटकों के आधार पर की जा सकती है ताकि व्यय और आय की स्पष्ट समझ विकसित हो सके. निश्चित ही यह प्रक्रिया घाटे को कम करने और आय को बढाने की दिशा में एकाउंटिंग के प्रति अनजान और उदासीन वर्ग के लिए एक कामयाब नुस्खा साबित हो सकती है.

    सरकारों में यदि ईक्षा-शक्ति हो तो क्या ऐसा सम्भव नहीं है ?
    क्या इस प्रक्रिया के लागू होने से उत्पादक-शक्तियों और देश-समाज के कदम तेज़ी से गुणात्मक बदलाव की तरफ नहीं बढ़ जायेंगे?

  • होमई व्यरवाल्ला Homai Vyarawalla

    UNKNOWN PHOTOGRAPHER  Homai Vyarawalla with her Speed Graphic Camera on her shoulder.Gelatin silver print. Alkazi Collection of Photography

    होमई व्यरवाल्ला भारत की पहली महिला पेशेवर प्रेस-फोटोग्राफर थीं और उन राजनेताओं से कम प्रसिद्ध न थीं जिनकी तस्वीरें उन्होंने उतारी. फोटोग्राफी के प्रति उनका प्रेम भी अपने पति श्री मानेकशा व्यरावल्ला के सानिध्य और प्रेम में अंकुरित हुआ. मानेकशा खुद एक पेशेवर फोटोग्राफर थे और उन्होंने होमई को फोटोग्राफी की बुनियादी बारीकियों से परिचित कराया. संयोगवश 1930 फोटो-जगत का एक ख़ास दौर था जब होमई ने फोटोग्राफी जगत में प्रवेश किया. नयी तकनीकी ने कैमरे को स्टूडियो की बंदिशों से से मुक्त कर दिया था और भारतीय फोटोग्राफर आत्मनिर्भर होने लगे थे. “द बॉम्बे क्रोनिकल” और “द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया” ने, जो छायाचित्रों को विशेष महत्व देते थे, होमई के छायाचित्रों को अपने पन्नों में स्थान दे एक नयी पहचान दी.

    होमई ने आज़ादी से पहले और बाद के सैकड़ों अनमोल पलों को अपने कैमरे में कैद किया. जवाहरलाल नेहरु उनके पसंदीदा विषय थे. फ्लैश चमकने के कारण एक बार उन्हें गांधी जी की डांट भी खानी पड़ी कि इस लड़की को तब तक चैन नहीं मिलेगा जब तक यह मुझे अँधा न कर दे. ख़ास क्षणों को बगैर चूके तस्वीरों में जज़्ब करने की गज़ब की दृष्टि थी होमई के पास जो हमेशा-हमेशा के लिए देशवासियों के लिए धरोहर बनी रहेगी.

    1970 में होमई ने फोटोग्राफी से सन्यास ले लिया.

     

  • गांधी का हत्यारा विचार नहीं पूर्वाग्रह युक्त मिज़ाज तैयार करता है

    Bimal

    आज कई फेसबुक पोस्टों से आभास हुआ कि अतिवादी दलित-पिछड़ा हों या वामपंथी दोनों ही गांधी के कट्टर विरोध में खड़े हैं. गाँधी की आलोचना नहीं बल्कि गांधी को गरियाते-लांछन लगाते ये पोस्ट और कमेन्ट वस्तुतः बिना किसी नुक्ते के हेर-फेर के संघ की साजिश का कॉपी-पेस्ट ही दिखाई देते हैं. रत्ती भर भी फर्क नहीं. यह भी बताया जाता है कि उनके द्वारा बताये जा रहे किस्से-कहानियाँ जो किसी कुंठित दिमाग की बीमार कल्पना के सिवाय कुछ नहीं, किसी साजिश के तहत पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं हैं.

    मुझे गहरा संदेह है कि इन विद्द्व्त जनों ने वास्तव में कभी स्वयं आंबेडकर, गांधी या मार्क्स को पढने के बाद यह धारणा बनायी होगी. इसके उलट वो खुद मुझे एक साजिश का शिकार नजर आते हैं जिसमें अल्प-वयस्क चेतना को पहले शुद्धतावाद के नाम पर बख्तरबंद किया जाता है और फिर उसमें ढेर सारे पूर्वाग्रहों का कूड़ा-भूंसा ठूंस प्रचारक में तब्दील कर दिया जाता है . फिर वह ताजिंदगी नकार में जीता हुआ विष-वमन करता स्वयं और देश-समाज के लिए आत्मघाती दस्ते का हिस्सा बन जिन्दा-शहीद हो जाता है.

    गांधी का हत्यारा विचार नहीं पूर्वाग्रह युक्त मिज़ाज तैयार करता है.

    ——————————————————————————————————————–

    छोटा था. पांचवी-छठी में पढता होऊंगा. दादी गाँव से शहर हमारे पास आयीं थीं कुछ दिनों के लिए. तीखे-नाक नक्श , गोरा रंग और झक्क सफ़ेद बॉब-कट कटे हुए बाल . चेहरे पर अनगिनत खूबसूरत झुर्रियां जो बारीक से बारीक मनोभावों को भी लुटाती चलें. प्यार से कोई उन्हें इंदिरा गांधी कहता तो कोई महारानी विक्टोरिया. अपनी भाषा बोलतीं और अपनी ही समझतीं. हम बच्चे इस झंझट में न पड़ उनके भावों को ही पढ़ काम चला लेते. एक दुपहर मैं खेल रहा था और लगा दादी शायद बोरियत महसूस कर रही हैं. हफ्ते भर से ज्यादा हो गए थे उन्हें आये और अब शायद उनका मन ज्यादा उचाट होने लगा था. मैंने लकड़ी के डब्बे वाला ब्लैक-एंड-वाइट टीवी ऑन कर दिया ताकि उनका मन बहल जाए. एकलौता दूरदर्शन लोक-गीत-संगीत का कोई कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था. दादी को मोतियाबिंद था…वो ध्यान लगा कर सुनने लगीं और मैं पास ही खेलता रहा. थोड़ी देर में दादी आयीं मेरे पास और कुछ कहा. मेरी समझ में न आया तो देखा कार्यक्रम खत्म हो चुका था. दादी बार-बार कुछ कहतीं जा रही थीं लेकिन मेरे पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रहा था. फिर वो खुद ही झट तेज़ी से रसोई की तरफ गयीं और थोड़ा सा चूड़ा-गुड निकाल लायीं और मुझे देते हुए कहा, ” देई दा”. मैंने पुछा, “किसे?”. उन्होंने टीवी की तरफ इशारा किया और समझते ही मैं ठहाका लगा रहा था. दादी मुझे विस्मित ताक रहीं थीं.

    आज सोच रहा हूँ बापू भी तो उन्हीं की पीढ़ी के थे .उन्होंने उस पीढ़ी को आज़ादी का ज्ञान कराया जो आज की पीढ़ी से बहुत ज्यादा भोली-भाली और सुविधा विपन्न थी. जो अपने गाँव के सीवान को ही देश की सीमा कहती और जानती थी.

    सत्य और अहिंसा के नये रास्ते ने वाकई चमत्कार किया था.


    सिद्धार्थ विमल