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हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए

Atul Kumar Rai

गाँव में सुबह उठते ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है और पता चलता है कि रात का बिछौना सुबह ओढ़ना हो जाए उसे चैत का महीना कहतें हैं। खटिया पर ऊंघते हुए देखता हूँ सात बज रहे हैं। सभी लोग अपने काम में लगे हैं। जैसे एक बहन खाना बना रही है। छोटी वाली पढ़ाई कर रही है। भाभी अंचार सूखा रहीं हैं। बड़का बाबू गाय को लेहना दे रहें हैं।

मन में आता है कि बनारस के स्टैंडर्ड टाइम के अनुसार एक घण्टा और सो लेना चाहिए। लेकिन माताजी इन अरमानों का धूप जलाकर दुर्गासप्तशती का पाठ रोकते हुए धीरे से कहती हैं...

"जइबs खेतवा में हो.बनिहार आ गइल बाड़े सs."

मैं सर हिलाकर सहमति प्रदान करता हूँ.

उसके बाद दोनों ओर कुछ देर तक एक गहरी खामोशी रहती है...मन में आता है कि क्यों न आदत के अनुसार मोबाइल में नोटिफिकेशन चेक कर लिया जाए...बारी-बारी से सभी को देखने लगता हूँ.. फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर, इंस्टाग्राम.

माँ हाथ में मोबाइल देख एक बार और रुक जाती है..इस बार स्वर और लय में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है...

"उठबs की ना हो.."

मैं फिर सहमति में सर हिलाता हूँ.तब तक माँ का भाषण तार सप्तक के पंचम में पढ़ा जाने लगता है..और देखते ही देखते उससे जो सुमधुर और अत्यंत ही अझेलनीय ध्वनि निकलती है उसका मतलब ये होता है कि...

"खेती नामक कार्य मेरे जैसे शहराती लोगों के बस की बात नहीं है. क्योंकि हमारी आदत को मोबाइल ने माटी में मिला दिया है..और आजकल के लड़के पता न अपनी किस नवकी माई को सुबह से लेकर शाम तक निरेखते रहतें हैं. रात को दो बजे सोएंगे तो उठेंगे कब. मेरा बस चले तो मोबाइल को चूल्हे में झोंककर उस पर खिचड़ी बना दूँ"

हाय! मेरा दिल बैठ जाता है.."बस करो माई..'

तब तक इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञान छोटी बहन दे देती है कि "ए मम्मी जब इहाँ सात बजे उठ रहा तो बनारस कs बजे उठता होगा हो"?

मुझे गुस्सा नहीं आता है, न मां पर, न बहन पर। सोचता हूँ कि इसके पहले मां दुर्गासप्तशती का पाठ छोड़कर शिवतांडव पढ़ना शुरू करे, उठ जाने में ही भलाई है।

इधर कमरे से बाहर कदम रखते ही एक दूसरे दृश्य से सामना होता है. लोग खेतों की ओर चले जा रहें हैं. सबके जबान पर खेती की बातें हैं और हवा में चैत की महक। कुछ देर खड़े होकर सोचता हूँ कि पता न ये वाली हवा किस एयर प्यूरीफायर और किस एसी से निकल के आ रही होगी.. इतनी शीतलता और इतनी ताज़गी कि मन भीग उठता है। सुबह का सूरज चमक रहा है...किसी सितार के तार की तरह गेंहू हिल रहें हैं..चना अधपका है...जिसे मुंह में डालते ही एक अनजानी सी मिठास रोम-रोम में फैल जाती है.

सरसों पक के झुनझुने की तरह बज रहे हैं. उधर मेढ़ लगा रहे.. खेत काट रहे, पानी चला रहे चाचा, बाबा, भइया लोगों को प्रणाम करते, हाल-चाल लेते हुए बगीचे के आखिरी आम के नीचे वाले बरम बाबा को गोड़ लागते, सूख चूके महुआ के अंतिम पेड़ पर अफ़सोस करते हुए जब अपने खेतों में पहुंचता हूँ तो देखता हूँ कि अभी तो कोई आया ही नहीं यार...

"ई हमार माई भी न..?

क्या कहें..बदन को सिहराती हवा में मन तो करता है कि अतुल बाबू कुछ देर यहीं बिछाकर सो लिया जाए. मां यहां देखने थोड़े आएगी..लेकिन मन विद्रोह कर जाता है.."कि तुम बनारस से सोने आए हो कि दँवरी करवाने आए हो"..?

तब तक चाचा ये कहकर इस चिंतन पर विराम दे देते हैं कि "खाली बैठकर क्या करोगे...सरसो ही काट दो. घूरन बो आती ही होंगी"।

ये सुनकर अपने निठल्लेपन पर आंशू आने लगता है. लेकिन एक उत्साह से हाथ में हंसुआ उठाता हूँ.. मानों आज कीम जोंग के सगे फूफा किसी नई मिसाइल का टेस्ट करने जा रहें हों..

मन करता है हँसुआ का दाँत गीन लें. तब तक चाचा मेरे कपड़े को देखकर ताना मारतें हैं... जिसका मतलब ये होता है कि.."सूट पहन लिए होते या शेरवानी.लोअर और टी शर्ट में कुछ मजा नहीं आ रहा है.."

मैं हंसना छोड़कर सरसों काटने लगता हूँ..इधर चाचा से बगल वाले खेतों में काम कर रहे कुछ लोग पूछते हैं.."ई नया किसान के ह हो" ?

चाचा अत्यंत ही व्यंगात्मक आवाज में जबाब देते हैं.."अरे! जीतन भाई ई किसान जो है न कि हॉलैंड में रहता है, और वहाँ बावन बीघा पुदीना बोकर सीधे यहीं आ रहा है"

मैं अपनी इस बेइज्जती पर झेंपता हूँ.. तब तक पता चलता है कि घूरन बो बड़की माई अपने लाव-लश्कर के साथ बोझा बांधने आ गई हैं. साथ में बीसराम बो चाची और नमूना बो भौजी, उनके बेटा-पतोह सबके हाथ में बोझा बांधने वाला बांस का कोइन है, दूसरे हाथ में हंसुआ, तेतरा और सनीसवा के हाथ में मोबाइल और मोबाइल में गाना..

"तू तs बहरा में करेलs आराम
चइत में हमरा घाम लागsता'

इधर घूरन बो बड़की माई मुझे सरसो काटता देख चाचा पर खिसियाती हैं.."काहें हेह घामा में हमार लइका के जान लेत बाड़s हो"

बड़की माई की इस बात को सुनकर मन श्रद्धा से भर जाता है..वो हमारी बनिहार हैं,और कहतें हैं माँ-पापा की शादी से दस दिन पहले उनकी शादी हुई थी..और तेइस-चौबीस साल पहले मेरे संयुक्त परिवार वाले घर के पवनीयों में एक वहीं थीं, जिससे मां बिना घूंघट काढ़े भी घण्टो बतिया सकती थी. घर वालों से छिपाकर उनको कुछ दे सकती थी.और हर महीने दिल्ली रहने वाले उनके पति घूरन को चिट्ठी लिख सकती थी. यही कारण है कि हम सब भाई-बहन उनको बड़की माई कहतें हैं.

वो मुझसे जब मिलतीं हैं तो बताती हैं कि मैं पैदा हुआ तो मेरी आजी ने उनको पायल दिया था. अब मेरी माँ ने कहा है कि बेटे की शादी में कुछ बढ़िया देगी. यही कारण है कि मुझे देखते ही उनका पहला सवाल होता है कि "कहिया बियाह करबा बबुआ.." ?

मैं बबुआ नामक प्राणी बियाह के नाम पर बड़े ही रस्मी तरीके से मुस्कराता हूँ. तब तक पता चला है धूप तेज हो चली है और उधर बोझा बांधना शुरू हो गया है. मैं खेत की मेढ़ पर बैठ जाता हूँ.इधर पापा मुम्बई से फोन कर रहे..."ठीक से बोझा गीन लिहs.."

मैं गिनती भूल गया हूँ.. देख रहा बनिहारों के हाथों को, उनकी अदम्य जिजीविषा को, कर्मठता और धैर्य को, वो ऐसे डूबे हैं जैसे डूब जाता है अलाप में खोया कोई ख्याल गायक, किसी नृत्य के साधक की साधना जैसे अचंभित कर जाती है..वैसे ही अचंभित कर जाता है उनका आपसी सामंजस्य..

इधर नमूना बो भौजी को तेतरा छेड़ता है. सुना है नमूना भइया खेदन के संगे लोधियाना रहतें हैं. फगुआ में नहीं आए की एक्के बार अपने सार के बियाह में आएंगे. सनीसवा मोबाइल की आवाज़ बढ़ा देता है.और गाना बज उठता है..

"तू तs लोधियाना में करs तारs ड्यूटी
पछुआ के हवा मोर बिगाड़ देता ब्यूटी"

घरवा रहितs तs पका के देहतs आम
चइत में हमरा घाम लागs ता"

हाय! नमूना बो भौजी ये गाना सुनकर किसी नवकी बहुरिया जैसा शरमाती हैं और देखते ही देखते दो घण्टे में पौने डेढ़ बीघे की मंसूरी बांध दी जाती है. खेत में ही बोझा बांधकर रख दिया जाता है.

बारह बजने को होते हैं. तापमान चालीस हो चला है. पता चला ट्रैक्टर तीन बजे आएगा. तब तक खेत की मेढ़ पर बैठकर आराम करना चाहिए. माँ ने खेत में ही खाना और पानी भेजवा दिया है।

आज पहली बार खेत में पराठा-भूजिया-अंचार खाते हुए एक ऐसे स्वाद से सामना होता है, जो महंगे से महंगे रेस्टुरेंट में खाकर कभी न हुआ।

शाम को थ्रेसर लेकर ट्रैक्टर आता है. और देखते ही देखते सभी मंसूरी के बोझा को भूसा और अनाज में तब्दील कर देता है. अनाज घर आता है. मंसूरी को हाथ में लेते ही मां की आंखें चमक उठती हैं. मानों माँ अनाज को नहीं, सोने से जड़ी कोई बहुत खूबसूरत चीज़ को छू रही हो...बहन मंसूरी को मुंह में डाल लेती है।

मां खिसिया जाती है..जिसका मतलब ये होता है कि "पागल कहीं की पहले अनाज देवता-पीतर और डीह बाबा काली माई को जाएगा..आखिर उन्हीं के आशीर्वाद से तो आंधी-तूफान और बारिश से बचकर अनाज किसान के घर में आता है'

इधर मेरी हालत पस्त हो जाती है. और उस समय पता चलता है कि खेत मे जाकर खेती करने और कमरे में बैठकर खेती के बारे में लिखने में बड़ा भारी अंतर है.

और हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए..

रात को कब नींद आ जाती है. समझ में नहीं आता है..आधी रात को नींद खुलती है. तो देखता हूँ किसी ने तेल रख दिया है कपार पर. पैर में.. माथे पर.. बदन टूट रहा है. उसी समय उन मजदूरों और खेतों में रोज मेहनत कर रहे लोगों को नमन करने का मन होता है।

मोबाइल देख रहा तो डेढ़ बजे रहें हैं. आज नवमी का कलशा रखा गया है.. घर धूप-बाती अगरबत्ती से महक उठा है.. समूचा गाँव सो रहा है. और चारों ओर से पचरा की आवाज़ आ रही है. माँ किसी साध्वी जैसी कलश के सामने बैठकर गा रही है.

"जवनी असिसिया मइया मलीया के दिहलु
उहे असीसिया ना।
हमारा अतुल बाबू के दिहतु कि उहे असिसिया ना"

ये सुनते ही मेरा मन लोक की इस सुगन्ध में तैरने लगता है. और उस दिन पता चलता है कि अपने गाँव आना, अपने घर आना, अपनी टूट रही जड़ों को सींचना हैं।

सुबह उठता हूँ.. भारी मन हल्का हो चला है..और लग रहा जैसे कि शहर माथे पर रखा एक तनाव है. और गाँव थाती में मिला एक सुकून. जिसे सम्भाला है खेतों ने, खलिहानों नें. गांव की टूटती पगडंडियों नें..मां के गीतों और बिना मतलब आपसे घँटों बतियाते लोगों नें..

आखिर घर से बनारस चलते समय मन उदास हो जाता है. रह-रहकर कुछ ही दिन पहले गुज़र चूके प्रिय कवि केदार नाथ सिंह याद आतें हैं. याद आतीं हैं उनकी कई कविताएं..उनकी कई बातें..

जब देखता हूँ कि गांव के सारे बगीचे वीरान हो चुके हैं..खेतों में पहुंच जाने वाला टैक्टर और थ्रेसर ने खलिहान नामक शब्द को लील लिया है..खलिहान में बचा गांव का आखिरी कुँआ झाड़-झंखाड़ से भर चुका है..और पानी के शीलबन्द बोतल घर-घर आने लगे हैं. लोगों में पहले वाला उत्साह नहीं है. कोई खेती करके खुश नहीं है..सब शहर भाग जाना चाहतें हैं.

जैसे शहर केंद्रित विकास ने शहर को हमारी नियति में तब्दील कर दिया है...लेकिन इन विडम्बनाओं के बावजूद गाँव ने अपने किसी कोने में इतनी खूबियों को बचाकर रखा है कि बार-बार गाँव लौट जाने का मन होता है..डीह बाबा को गोड़ लागते समय एक बार फिर केदारनाथ सिंह याद आतें हैं.

"अभी गाँव ही एक ऐसी जगह है,जहां कोई किसी के घर बिना काम के भी जा सकता है।

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