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  • भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद –Sanjay Jothe

    भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा.  कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है.इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

    पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदी को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और ”विल” को अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

    ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

    इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिको की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये.  कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पायी. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.

    कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा उंचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

    गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नयी बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए. 

    इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

    उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है. 

    भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता, यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

    ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है. 

    भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुडी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

    क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

    Tribhuvan[divider style=’right’]

    इन दिनों जो माहौल चल रहा है, उसे लेकर देश का एक बड़ा वर्ग आरएसएस और उससे जुड़े लोगों को दोषी मानता है। यह स्वर छुपा हुआ नहीं है। यह बहुत मुखर स्वर है और ख़ासकर वामपंथी झुकाव वाले प्रगतिशील खेमे के बुद्धजीवियों में। लेकिन क्या सिर्फ़ संघवादी मानसिकता के लोग ही इस वातावरण के लिए दोषी हैं?

    मैं इतिहास का एक सामान्य सा विद्यार्थी हूं। मैं जब इतिहास पढ़ता हूं तो देखता हूं कि गांधी-नेहरू-पटेल-सुभाष और बहुतेरे बुद्धिजीवी भविष्यवाणी करते हैं कि अंगरेज़ भारत से दफ़ा हो जाए तो हम अमन-चैन से रहेंगे और सांप्रदायिकता सदा के लिए विदा हो जाएगी। ब्रिटिश उपनिवेशवाद की उंगली थामकर सांप्रदायिकता भी भारत की धरती को छोड़ देगी। जातिवाद से तो हम निबट ही लेंगे। यह तो कोई समस्या ही नहीं।

    सच बात तो ये है कि अगर किसी खेत में खरपतवार बुरी तरह उग आया हो तो उसके लिए आप खरपतवार को कभी दोष नहीं दे सकते। अगर कोई ऐसा करेगा तो लोग उसे मूर्ख ही कहेंगे। खेत किसान के पास है और फ़सल को नष्ट करके अगर खरपतवार लहलहाने लगा है तो किसान दोषी है। वह इतने दिन तक कर क्या रहा था! देश में अगर सांप्रदायिक माहौल बना और यह विष बेल परवान चढ़ी तो अब तक मुख्यधारा की सबसे बड़ी और सत्तासीन पार्टी कांग्रेस और ताकतवर दल के रूप में रहे कम्युनिस्ट और समाजवादी कर क्या रहे थे? उन्होंने ऐसा माहौल बनने ही क्यों दिया? अगर आप सत्ता में हों और आप की मति नहीं मारी गई हो तो आप समाज और देश को ठीक से आगे ले जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या ऐसा किया गया?

    इतिहास के सफ़ेद पन्नों पर काले अक्षर नाच-नाच कर कह रहे हैं कि 1947 से पहले कांग्रेस ने दो बड़ी रणनीतिक भूलें की थीं। गांधी-नेहरू और पटेल इसके लिए जिम्मेदार थे। इन सबने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली स्वीकार की थी।

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]आज कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवादी दल और इनकी मानसिकता से जुड़े पत्रकार-लेखक और विचारक वंदेमातरम्, रामराज्य, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म और सनातन धर्म के प्रतीकों का नाम भर सुनकर नौ-नौ ताल उछलते हैं। लेकिन मैं बड़ी विनम्रता से जानना चाहता हूं कि वंदेमातरम्, रामराज्य, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म और सनातन धर्म के प्रतीकों को देश की राजनीतिक संस्कृति में सबसे पहले लाया कौन था? सत्यमेव जयते क्या आरएसएस लेकर अाया था? सुप्रीम कोर्ट का आदर्शन वाक्य यतोधर्मस्ततो जय: कौन लेकर आया था? उस समय विधि मंत्री तो महान् क्रांतिकारी सुधारक और संविधानवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। हिन्दू प्रतीक चिह्नों को भारतीय जीवन दर्शन बनाने वाले लोग तो खुद कांग्रेस के थे और दोष मंढ़ा जा रहा है अकेले आरएसएस पर। अरे भाई, आरएसएस ने तो ये चीज़ें कांग्रेस के कबाड़ खाने से निकालकर अपने खाली आलों में सजाई हैं, क्योंकि उनके पास अपना कुछ था नहीं। वे भारत को परम वैभव पर पहुचाने तो चाहते थे, लेकिन राह नहीं थी। राह कांग्रेस के पास भी नहीं थी। लेकिन वे हिन्दू धर्म के पुरातत्व युग में जाकर गीता की कसम खाने से लेकर न जाने कितनी चीज़ें उठाकर लाए। [/content_container]

    कांग्रेस एक तरफ तो सनातन संस्कृति से जुड़े लोगों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए इन प्रतीकों को गढ़ रही थी और दूसरी तरफ़ मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद के प्रेत को पाल-पोस रही थी। अब आप दो-दो प्रेतों की सेवा करें और आप 70 साल तक बचे रहें तो और आपको क्या चाहिए? अरे आपको तो बहुत पहले नष्ट हो जाना चाहिए था।

    अभी आरक्षण पर लोग बहुत हो हल्ला-करते हैं, लेकिन सच तो ये है कि ब्रिटिश सरकार भारत में मुसलमानों की तरह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए भी अलग निर्वाचन प्रणाली ला रही थी। लेकिन गांधीजी ने हिन्दू समाज की एकता के नाम पर ब्रिटिश योजना के खिलाफ अनशन किया और उन जातियों को आरक्षण का वादा करके लड़ाई जीत ली। आरएसएस आज इसी विचार को लेकर तो प्रचंड हो रहा है। तो यह मूल विचार है किसका? आरएसएस का कि कांग्रेस का? कि गांधीवादियों का?

    हमारा देश आज़ाद हुआ तो कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को अपनाने की बात तो की, लेकिन उसके मूल में हिन्दुत्ववादी पुरुत्थानवाद के बीज ही थे। अब यह बीज वटवृक्ष बना है तो ज़मीन किसी और ने छीन ली है। आज़ादी के बाद स्वतंत्रता दिवस के सरकारी समारोहों में शंखनाद क्या आरएसएस लेकर आया था? हिन्दू पूजा पद्धति से जुड़े मंत्र क्या हिन्दू महासभा पढ़ रही थी? भारत का नाम भारत कांग्रेस के लोगों ने रखा था तो क्या इसे संघ के लोगाें ने सुझाया था? भारत शब्द महाभारत से लिया गया था। क्या यह भारत माता से लिया गया शब्द नहीं था? और क्या यह कांग्रेस के नेताओं के मस्तिष्क की उपज नहीं था? https://bloodbornecertification.com/ generic provigil cost अगर यह उस दिन सही था तो आज भारत माता सांप्रदायिक कैसे हो गया और अगर आज सांप्रदायिक है तो उस दिन कांग्रेस कैसे धर्मनिरपेक्ष थी?

    मुंडकोपनिषद से लिया गया राष्ट्रीय घोष “सत्यमेव जयते” क्या नागपुर से कांग्रेस मुख्यालय को या संविधानसभा के प्रमुख को भेजा गया था? हिन्दू परंपरा का पवित्र पक्षी मोर देश का राष्ट्रीय पक्षी कैसे बना? भाजपा का प्रेम तो ऊंट और गधे के प्रति पिछले कुछ समय में दिखाई दिया है, जो कि पूरी तरह मुसलिम संस्कृति से जुड़े पशु हैं। हिन्दू परंपरा तो ऊंट और गधे का विकराल उपहास ही करती है।

    गाे-रक्षा का मुद्दा तो भाजपा पिछले कुछ वर्ष से लेकर आई है, लेकिन संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में इसे क्या आरएसएस ने शामिल करवाया था? यह काम कांग्रेस के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि ने ही किया था। गोवध पर पाबंदी लगाना भारतीय संविधान के उद्देश्यों में एक बताया गया है। इसमें बहुत सारे नीतिनिर्देशक तत्व हैं, लेकिन एक गाय ही बाकी उद्देश्यों को भूखी मरती चर गई।

    जैन एक अलग धर्म था। सिख एक अलग पंथ था। लेकिन इन्हें हिन्दू धर्म का ही अंग बताने वाला संविधान किसने रचा था? क्या संघ ने? संघ तो उसमें पावर में था ही नहीं। यह सब कांग्रेस और उसके छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नेता ही तो कर रहे थे।

    मुझे लगता है, कांग्रेसजनों, समाजवादियों, वामपंथियों, लोहियावादियों आदि आदि का यह कहना कि देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा और संघ परिवार के लोग ही माहौल बिगाड़ रहे हैं, तर्कसंगत नहीं है। दरअसल धर्मांधता और सांप्रदायिकता वाले इस राजनीतिक खेल के नियम बनाए तो किसी और ने पहले अपने फायदे के लिए था, लेकिन समय आने पर इसे किसी और ने हथिया लिया। यह ऐसा ही है कि आप अपनी सियासी कमज़र्फ़ी के चलते पहले तो बंदूकों दूसरी की तरफ़ तान दें, लेकिन जैसे ही किसी दूसरे के हाथ में यह चीज़ आ जाए तो यह ग़लत हो जाए। यही मूलभूत चूक है।

    इतिहास की ग़लतियों को अगर आप आज खुले तौर पर स्वीकार नहीं करेंगे तो वही होगा, जो हो रहा है। कोई भी देश अतीत के मूल्यों को हृदय में तो धारण कर सकता है, लेकिन उन्हें पहन-ओढ़कर एक आधुनिक भावबोध वाला राष्ट़्र नहीं बनाया जा सकता।

    आज हमारे देश को हमारे महान नेताओं ने जिस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, वहां उनकी राजनीति सत्ता प्राप्ति तक सीमित है और देश और देश के लोग जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनमें से किसी एक का भी हल उनके पास नहीं है। वे एक दूसरे को ग़ाली देने, देशद्रोही और नाकाम घोषित करने के प्रपंच को कामयाब बनाकर चुनाव जीतने तक का वास्ता रखते हैं।

    इस देश का इंटेलिजेंटसिया इन नेताओं से भी अधिक धूर्त और मक्कार है। वह सत्ता के गलियारों का मज़ा जहां और जितनी आसानी से ले सकता है, वह उसके साथ रहता है। उसे इस देश के वास्तविक सरोकारों से कोई लेना देना नहीं हैं। उसके शौक महंगी शराबें, लग्जरी कारें और लैविश लाइफस्टाइल है। आम भारत किस गांव में, किसी गली पर, किस कोने में, किसी आदिवासी अंधेरे में सुबक रहा है, उसे कुछ पता नहीं है। वह अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी गर्व से अपना बाप कह सकता है और गर्व से किसी को भी देशद्रोही ठहरा सकता है।

    भारत के नए हालात बता रहे हैं कि हम एक सुइसाइड स्क्वैड के शिकंजे में हैं और हमें एक नागरिक के तौर पर सदा सजग और चैतन्य रहने की आवश्यकता है। जो आदमी सत्ता के लालच में खु़द ज़हरीली दिल्ली को अपनाने चला है, वह आपके लिए कोई शस्य श्यामला धरती का टुकड़ा ढूंढ़कर लाएगा, अगर आप ऐसा भ्रम पाले हैं तो इस पृथिवी पर आपसे मूर्ख कोई नहीं है।

    हमें अपने देश के हितों को देखना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति, किसी दल, किसी संगठन, किसी विचारधारा, किसी धर्म विशेष या किसी रंग विशेष के हितों और एजेंडे को। इनका शिकार होने का मतलब है आप देश के हितों को नहीं समझ पा रहे हैं। देश का हित इसमें है कि आप सदा सैनिक की तरह चौकन्ने रहें। ग़लत को ग़लत और सही को सही कहें।

    उपनिषद में कहा गया है कि विष को सोने के घड़े में ही रखा जाता है। इसलिए आप विष को भी समझें और घड़े को भी ठीक से देख लें। आज एक नहीं, कई घड़े हैं और उनमें भांति-भांति और इंटरनेशनल ब्रैंड के विष भरे हुए हैं। वे इतने सम्मोहक हैं कि हम स्वयं ही विषपान को उत्कंठित हो जाते हैं और अपने आपको रोक ही नहीं पाते।

    आप समझ गए न : सोने के घड़े में ज़हर!

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    Credits: Tribhuvan’s facebook

  • जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी का जीवन बचाने का अभिनव प्रयास –डा० शुजाअत हैदर जाफरी

    जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी का जीवन बचाने का अभिनव प्रयास –डा० शुजाअत हैदर जाफरी

    डा. शुजाअत हैदर जाफरी

    उ.प्र. राज्य के जनपद झाँसी के ब्लॉक बड़ागाँव की आर बी एस के टीम द्वारा ग्राम लकारा के आंगनवाड़ी केन्द्र में स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान चिन्हित जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी की सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई शल्य चिकित्सा और शल्य चिकित्सा सम्पन्न होने तक और उसके बाद की आशा, निराशा और हर्ष की लहेर का शाब्दिक वर्णन ग्रसित परिवार के मुखिया की ज़बानी ।

    चंद्रशेखर अहिरवार जो की अपने 13 सदस्यों के परिवार का मुखिया है जो की अपने और अपने पूरे परिवार का भरण पोषण 6 बीघा ऊसर ज़मीन और दैनिक मज़दूर के रूप में मिलने वाली दैनिक मज़दूरी 300 से करता है। परिवार में उसके अलावा उसके बुजुर्ग माता पिता दो भाई उनकी पत्निया और उनके दो बच्चे तथा स्वयं की पत्नी और तीन बच्चे है। संयुक्त परिवार हँसी खुशी एक साथ सुख दुख का भागी है और सब एकदूसरे का हर काम में हाथ बंटाते है। चंद्रशेखर मज़दूरी करता है और उसके दोनों भाई खेती करते है।

    चंद्रशेखर की शादी के बाद परिवार में लक्ष्मी के रूप में सलोनी ने जन्म लिया और परिवार खुशी के महौल में डूब गया । समय का चक्र घूमता रहा। पुत्र की चाहत में एक बार फ़िर चंद्रशेखर की पत्नी ने रोहिणी को जन्म दिया । परिवार के सभी सदस्य पुत्र की कामना कर रहे थे सो रोहिणी के आ जाने पर सबको ज्यादा खुशी नहीँ हुई । अभी एक सप्ताह ही बीता था के रोहिणी के लगातार रोते रहने और साँस तेज़ तेज़ लेने के कारण गाँव के ही कुछ लोगों ने रोहिणी को डाक्टर को दिखाने की सलाह दी।

    डाक्टर को दिखाने पर पता चला के रोहिणी तो जन्मजात ह्र्दय रोग से ग्रसित है और उसके दिल में छेद है तथा धमनियों में सिकुड़न है। चन्द्रशेखर और उसकी पत्नी को जब यह पता चला तो मानो उनके पैर के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी हो । दोनों पति पत्नी ने निर्णय लिया के रोहिणी को झाँसी के मेडिकल कालेज में दिखायेंगे । अगले ही दिन दोनों रोहिणी को लेकर झाँसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल लेकर गये और ह्रदय रोग विभाग में दिखाया जहाँ डाक्टर ने उसको देखकर इको की जाँच कराने का बोला । जाँच में वही समस्या सामने आयी जो क्लिनिक के डाक्टर ने होने का अंदेशा बताया था। अब स्पष्ट हो चुका था के रोहिणी के दिल में छेद है और उसका इलाज ऑपरेशन ही है । डाक्टर ने बताया के ऑपरेशन में दो से तीन लाख का खर्च आयेगा और उसके बाद भी रोहिणी के शत प्रतिशत स्वस्थ होने की कोई गारण्टी नहीँ है। मायूस माता पिता उस समय दवा लेकर घर को वापस आ गये।

    Rohini

    मज़दूर चंद्रशेखर दिन रात मेहनत करके जो कमाता था वोह घर के लिये ही नहीँ पूरा पड़ता था ऐसे में रोहिणी की इस जानलेवा बीमारी ने परिवार का चैन और सुकून ही छीन लिया था। रोहिणी की माँ को तो बस एक ही चिंता लगी रहती थी की उसकी बच्ची बचेगी भी या नहीँ और अगर बच भी गयी तो उसका जीवन समान्य होगा या नहीँ, उसके भविष्य की चिन्ता में दिन रात घुल रही थी।  तेज़ धूप में काम करने के बाद साँझ ढले जब चंद्रशेखर घर को आता है तो दिन भर की थकी हारी उसकी पत्नी उसको खाना देती है । परिवार में अन्य लोग समय समय पर दोनों को सांत्वना देते रहते। समय गुज़रते देर नहीँ लगती , रोहिणी अब धीरे धीरे बड़ी हो रही थी उसका इलाज भी लगातार चल रहा था। हर महीने हज़ार बारह सौ रुपये रोहिणी की दवा और जाँच में खर्च हो रहे थे किन्तु आशा की कोई भी किरण नज़र नहीँ आ रही थी।

    एक दिन जब चंद्रशेखर रोहिणी को लेकर मेडिकल कालेज झाँसी गया तो डाक्टर जो की उसके लगातार वहाँ इलाज कराने के कारण उसको पहचान गया था। उसने चंद्रशेखर को सलाह दी के जयपुर में वोह अपनी बेटी का ऑपरेशन करा सकता है जहा उसको यह सुविधा निःशुल्क रहेगी।  निराशा में आशा की एक किरण ने कई दिलों में जान डाल दी । माता पिता की खुशी का ठिकाना नहीँ था के उनकी बच्ची अब ठीक हो सकती है ।

    किन्तु यह क्या? गाँव के बड़े बुजुर्गो ने तो उल्टी ही राय दे डाली के जयपुर एक अनजान शहर है वहाँ तुम अजनबी होगे और वहाँ कैसे रहोगे । सब ऐसे ही कहते है इतना बड़ा ऑपरेशन कोई निःशुल्क कैसे कर सकता है। और इस प्रकार जागरूकता के आभाव में रोहिणी का आगे का इलाज फ़िर से दवा और जाँच पर ही सीमित होकर रह गया था। 

    समय बहुत तेजी से पंख लगाकर उड़ रहा था । रोहिणी अब पाँच साल की हो चुकी थी और पाँच साल में रोहिणी के इलाज पर चार से पाँच लाख रुपय खर्च हो चुके थे किन्तु स्तिथि ज्यों की त्यों बनी थी । ऑपरेशन के खर्च से ज़्यदा दवा और जाँच में खर्च हो चुका था मगर एकमुश्त पैसा ना होने की वजह से रोहिणी का ऑपरेशन नहीँ हो पा रहा था ।

    माता पिता अपनी बड़ी बेटी सलोनी और गाँव के अन्य बच्चो को जब खेलता हुआ देखते और रोहिणी को एक जगह बैठा हुआ देखते थे तो उनकी आँखो में आँसू आ जाते थे के वोह अपने आँखो के तारे के लिये इतने पैसे भी नहीँ जुटा पा रहे के उसे एक नयी ज़िन्दगी दे सके । 
    सबकुछ ईश्वर के हाथ में छोड़ कर दोनों माता पिता किसी चमत्कार के इन्तेज़ार में मन्नत और मुराद माँगने लगे। 

    एक दिन उनके गाँव में आंगनवाड़ी केन्द्र पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की समर्पित मोबाइल हेल्थ टीम बच्चो का स्वास्थ्य परीक्षण करने पहुँची जहा चंद्रशेखर और उसकी पत्नी भी रोहिणी को लेकर दिखाने आये। टीम के लीडर डा. अजय गुप्ता द्वारा तथा डा . स्वप्ना श्रीवास्तव द्वारा दोनों को इस प्रकार की बीमारी से ग्रसित बच्चो को मिलने वाली सरकारी सहायता के बारे में अवगत कराया गया और बच्ची रोहिणी का ऑपरेशन कराने की सलाह दी।

    डा. अजय गुप्ता ने जन्मजात रोग से ग्रसित बच्चे की जानकारी जिला स्तर पर तैनात डीईआईसी मेनेजर डा. रामबाबू को दी जिन्होने जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज से इस विषय में चर्चा की । एक रूपरेखा तैयार कर चिन्हित बच्चों के साथ जनपद से एक टीम जिसमे डॉ रामबाबू और डॉ हैदर के साथ लखनऊ के केजी एम यू अस्पताल में रोहिणी के निःशुल्क शल्य चिकित्सा के लिए ऐसे ही 3 बच्चों के साथ भेजा गया। 

    आर बी एस के टीम बड़ागाँव के लगातार प्रयासों द्वारा रोहिणी की शुरुआती जांचे झाँसी के मेडिकल कालेज में कई चरणों में पूरी हुई जहा डाक्टर ऋषि राज , डाक्टर ब्र्षालि , श्रीमती टीना शर्मा एवं श्रीमती स्मिता एवं श्री शिव कुमार पटेल द्वारा रोहिणी को सम्बन्धित विभाग में लाया जाता रहा और नियमित जांचे करवाई गयी। तत्पश्चात रोहिणी को शल्य चिकित्सा हेतु लखनऊ संदर्भित किया गया।

    लखनऊ पहुँचने पर के जी एम यू के लारी कार्डियोलोजी के सी टी वी एस विभाग के डा . विकास ने विभागाध्यक्ष डा . शिखर टंडन के आदेश पर रोहिणी को भर्ती कर लिया। 18 दिन भर्ती रहने के बाद शल्य चिकित्सा हेतु रक्त की आवश्यकता पड़ी और 5 यूनिट रक्त एक अनजान शहर में उपलब्ध कराना चंद्रशेखर के लिये एक बड़ा यक्ष प्रश्न था। 

    डा. शुजाअत हैदर द्वारा जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज को फोन के माध्यम से रक्त की आवश्यकता के विषय में बताया गया, आनन फानन में राज्य स्तर जिला स्तर पर फोन लगाये गए किन्तु कहीं कोई उम्मीद न दिखाई देने से डोनर ग्रुप से सीधे बात का सोचा गया जिला कार्यक्रम प्रबंधक द्वारा होप ब्लड ग्रुप व्हाट्सएप्प ग्रुप में जीशान भाई से बात की गयी जिनके माध्यम से लखनऊ में ई राजीव गोयल जी से बात की गयी डॉ हैदर द्वारा भी ब्लड डोनेशन ग्रुप्स से बातचीत की गयी। शाम होते होते 5 यूनिट ब्लड का इंतज़ाम रक्त दूतों द्वारा करा दिया गया था जिसमें से एक यूनिट रक्त स्वयं चंद्रशेखर ने दिया। 

    इस प्रकार रोहिणी की सफ़ल हृदय शल्य चिकित्सा सम्पन्न हुई और आज रोहिणी अन्य सामान्य बच्चो की तरह जीवन बिता रही है । कहते हैं “हिम्मत मर्दां मदद ए खुदा” यह झाँसी टीम को हर पल महसूस हुआ जहाँ भी रुकावटे आई ऐसा महसूस हुआ ऊपर वाला खुद आकर मार्गदर्शन और मदद के लिए खड़ा है।

    भारत सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना से रोहिणी के जीवन में तो आशा की किरण जगी ही साथ ही साथ माता पिता के दिलों पर बच्ची के सही इलाज ना करा पाने का जो भार था वह ख़त्म हो गया । और हम आर बी एस के वाले ऐसे बच्चों को चिन्हित करने के बावजूद मन मसोस कर रह जाते थे कि 3 साल से हम सिर्फ आश्वासन दे पा रहे थे वो बोझ भी सर से हल्का हुआ।

    आज हम आर बी एस के बड़ागाँव गर्व महसूस करते है के ईश्वर ने हमें दुनिया के उन श्रेष्ठ लोगों में से चुना है जिनसे ईश्वर अपना काम लेता है।
    धन्यवाद ईश्वर।

    Dr Shujaat Haider Jafari with the family of baby Rohini

    डा. शुजाअत हैदर जाफरी
    फिजियोथिरैपिस्ट
    आरबीएसके बड़ागाँव झाँसी

  • सीखने की कला के बिना स्कूली शिक्षा के दुष्परिणाम

    सीखने की कला के बिना स्कूली शिक्षा के दुष्परिणाम

    Sachin Raj Singh Chauhan[divider style=’right’]

    विश्व विकास रिपोर्ट 2018 के अनुसार स्कूलिंग विदाउट लर्निंग ने न केवल विकास के अवसरों को बर्बाद कर दिया है बल्कि वैश्विक स्तर पर बच्चों के प्रति घोर अन्याय किया है। इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलने लगे है। अकेले ग्रामीण भारत में विद्यालयों के तीसरी कक्षा के 75 प्रतिशत छात्रों को दो अंको के घटाव नही आते। 12 देशों की सूची में मलावी के बाद भारत दुसरे रैंक पर है जहां कक्षा 2 के बच्चों को संक्षिप्त पाठ का एक शब्द पढ़ने में भी समस्या होती है। इस रिपोर्ट में लर्निंग क्राइसिस पर जोर देते हुए चेताया गया है कि इसी कारण निम्न और मध्यम आय बाले देशो के युवाओं को निम्न मजदूरी पर काम करना पड़ता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था जितनी अधिक लर्निंग बेस्ड होगी हम उतना ही बेहतर जीवन की तरफ अग्रसर होंगे।

    विडम्बना है कि जिस देश में 38 प्रतिशत बच्चें सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है,19 करोड़ कुपोषित लोग है (यू न के एक रिपोर्ट के अनुसार) और जहां बुनयादी जरूरते भी पूरी न होती हो वहां हम कहते है कि विकास हो रहा है, देश एक बड़ी आर्थिक ताकत हो गया है, दुनिया नत-मस्तक होती है और वगैरा-वगैरा सारा बेमानी प्रतीत होता है। विकास का मतलब या तो समझ नही आता है इनको या फिर समझना नही चाहते। आज देश उस मोड़ पर आ गया है जहां परिवार के दो सदस्य करोड़ों रुपये कमाते है , संसाधनों का दोहन करते है और जिंदगी को पूरी शान-शौकत से गुजारते है जब कि इसके इतर परिवार के बाकी सभी सदस्य दर- दर की ठोकरे खाते है, उनकी वुनयादी जरूरते भी पूरी नही ही पाती। अकेले दिल्ली – एनसीआर में कई लाख लोग पिछले 1 साल में वेरोजगार हुए है जिसके चलते कई परिवारों की जिंदगी तवाह हो गयी। मुझे ये समझ नही आता कि राफ़ेल डील, 1.10 लाख करोड़ का बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट अभी जरूरी था या फिर करोड़ो लोगों की बुनयादी जरूरते पूरी करना।

  • धरती और इंसान

    धरती और इंसान

    Nishant Rana[divider style=’right’]

    जला देना हर एक उस पेड़ को
    जो तुम्हारे कहने से मनचाहा फल न दे।

    भाप बना कर उड़ा देना हर वो नदी
    जो तुम्हारे कहने पर दिशा न बदले।

    भून देना हर एक उस पंछी को , पशु को 
    जो तुम्हारे तलुए न चाटे,
    जो दुम हिला के हाजिर न हो तुम्हारी
    एक आवाज पर।

    जहर घोल देना उस हर हवा में जो तुम कहो
    पूरब और पच्छिम को चलें।

    कतरा कतरा कर देना किताब के
    हर उस पन्ने का
    जो हर्फ़ दर हर्फ़ वो न कहती हो
    जो तुम सुनना चाहों।

    तलवार, कट्टे , लाठी, छुरी
    सब हथियारों से लैस होकर चलते रहो।
    और मारते रहो हर एक उस आदमी को
    जो जरा सा भी असहमत हो तुमसे।

    तब तक मत रुकना जब तक धरती से
    आखिरी आदमी खत्म न हो जाए,
    हवस मिट न जाए अपनी हर बात
    सही साबित करने की।

    धरती को जरूरत भी नहीं इंसानों की।

     

  • राहुल गाँधी बनाम उन पर लगाए जाने वाला वंशवाद का इल्ज़ाम !

    राहुल गाँधी बनाम उन पर लगाए जाने वाला वंशवाद का इल्ज़ाम !

    Razia S. Ruhi[divider style=’right’]

    डॉक्टर का बेटा एक अच्छा डॉक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बेटा एक काबिल इंजीनियर बन सकता है, चिरौंजी लाल का बेटा उसकी किराने की दुकान संभाल सकता है, ऋषि कपूर का बेटा रॉक स्टार बन सकता है, और इस सब में कहीं किसी का वंशवाद आड़े नहीं आता बल्कि इन क्षेत्रों में तरक्की ये अपने हुनर की बदौलत करते हैं। सवाल यह उठाए जा सकते है हमने परम्परा में जो व्यवस्था बना रखी है उसमें कितने लोगों को अपना पहला मौका या हुनर चमकाने का समय ही नहीं मिलता.  लेकिन इस तर्क से भी जिस व्यक्ति को मौका मिला है वह गलत नहीं हो जाता है.

    इन सब के बाद भी अकेले राहुल गांधी पर वंशवाद का इल्ज़ाम क्यों?

    राहुल के ऊपर कोई हत्या बलात्कार या गुंडा एक्ट का मुकदमा नही है, राहुल ने न लड़की छेड़ी है, न किसी लड़की की जासूसी करवाई है,  राहुल बाकी के कई नेताओं की तरह बेहूदी असभ्य भाषा भी नहीं बोलते.. राहुल बाकी के कई नेताओं की तरह साम्प्रदायिक नफ़रत के बीज बो कर वोट नहीं मांगते.. जबकि इन सब तरीको से राजनीति में चमकना आज के भारत में सबसे आसान काम बना हुआ है, राहुल का इस बात के लिए तो स्वागत होना ही चाहिए की वह राजनीति के सकारात्मक पहलू को स्वीकार न किए जाने के बावजूद एक ऐसे पौधे के रूप में संघर्ष करके उभरा है जो बेहतर आज की बात करता है.  इन सब पर भी राहुल गांधी भले ही सर्वोत्तम विकल्प न हों लेकिन जब तक राहुल ऐसी कोई गलती नहीं करते तब तक वो इन बाकी के कई नेताओं से कहीं बेहतर विकल्प जरूर हैं।

    मुझे उनके वंशवाद से कोई समस्या नहीं है, मुझे उनकी उनकी निजी जिंदगी में झाँकने का कोई हक़ नहीं है… मुझे सिर्फ़ उनके सार्वजनिक व्यवहार और राजनीतिक नज़रिए से मतलब है, उनका आंकलन इसी आधार पर होगा।। आप राहुल गांधी के अंधविरोधी हो सकते हैं, और अंधविरोधियों को विरोध और आलोचना का बहाना चाहिये बस.. तो वंशवाद एक अच्छा बहाना है। हो सकता है राहुल गाँधी मौका मिले तो एक अच्छे प्रधानमंत्री भी साबित हो । जो तमीज़, अदब, सभ्य ब्यवहार और सुशीलता दिखती है उनमें उससे इतना तो तय है कि उनके भीतर तुग़लक़ नहीं जागेगा। जो पार्टी और ज्ञानी पॉलिसी मेकर्स कहेंगे उनके अनुसार फैसला लेंगे । होने को तो आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, ग़ुलाम नबी आज़ाद ज्यादा अनुभवी और विद्ववान राजनीतिज्ञ हैं, और भी कई हैं। पर राहुल गाँधी के नाम पर ही कांग्रेस फ़िलहाल जी सकती है, और शायद यही डर ही कारण भी है विरोधी पार्टियों द्वारा उनके अंधविरोध का.. हो सकता है सोनिया गाँधी की तरह ही राहुल भी किसी और को प्रधानमंत्री बनने को बोल सकते हैं, कम से कम लोलुपता तो नहीं दिखाई देती उनमें..  अंतर्राष्ट्रीय और कूटनीतिक हलकों में ब्लू ब्लड कांसेप्ट अभी भी जम कर चलता है। वह एक्सेप्टेबिलिटी भी इंडिया के फेवर में ही होगी.. लेकिन मेरा कहना है कि कांग्रेस का अध्यक्ष चुनने का हक़ कांग्रेस के सदस्यों को ही है, वो चाहें तो राहुल गांधी को चुनौती दे सकते हैं, जनता को यदि राहुल अपने नेता के तौर पर पसंद न हों तो वो उन्हें आम चुनाव में हरा सकती है, लेकिन यदि तमाम आपराधिक मुकदमों के बावजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जा सकते है बाकी लोगों को हाशिये पर धकेला जा सकता है, बाहर निकाला जा सकता है तब यह नैतिक अधिकार नहीं ही बनता है कि वे राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर चुने जाने की आलोचना करें.. जिम्मेदार पद पर रहते हुए तमाम अलोकतांत्रिक कारनामों को अपना मौन समर्थन देने वाले नेता/लोग जब वंशवाद पर ट्वीट करते हैं तो बड़े हास्यास्पद लगते हैं।

     

     

  • किसानों की जमीन पूंजीपतियों  द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

    किसानों की जमीन पूंजीपतियों द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

    Nishant Rana[divider style=’right’]

    आए दिन हम सुनते रहते है की कोर्पोरेट किसानों की जमीन हथियाती जा रही है इसके आगे भी यह सुनते है कि  सरकार जोर जबर्दस्ती पूंजीपतियों को किसान की जमीनों पर कब्जा दिलवा रही है। इसके लिए हम दूर दराज के क्षेत्र, जंगलों आदि के बारे में की-बोर्ड पर बैठे तुक्के मारते रहते है क्योकि पुलिस फौजों के फोटो गाहे बगाहे हमारे सामने को निकलते रहते है भले वह फोटों प्रायोजित होते हो या किसी अन्य प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किए जाते हो। हमने तो सरकार पुलिस फ़ौज को कोसते हुए किसानों के समर्थन में लेख दे मारा है बस हो गया तथ्यों तक जाने में समय ऊर्जा भी खर्च होती है और कहानी भी हमारी समझ से अलहदा मिल सकती है तो आज की पत्रकारिता जो मिनट दर मिनट बदलते ट्रेंडिंग मुद्दों पर खड़ी है इन सब पर कौन सर खपाए।

    फिलहाल यह लेख न किसानों की जमीन पर कब्जा करते जा रहे कोर्पोरेट के समर्थन में है , न ही किसी पुलिस या फ़ौज के किसी उत्पीड़न के मामले को जस्टिफाई करने के लिए इसलिए विनती है कि किसी भी टिका टिप्पणी से पहले लेख पूरा पढ़ा जाए।

    किसान किस तरह खेती बाड़ी से दूर होते हुए अपने खेतों से भी दूर होता जा रहा है। इसके लिए बस्तर के किसी आदिवासी गाँव, राजस्थान, मध्य प्रदेश के दूर दराज के गाँवो तक पहुँचने की जरुरत नहीं है जहाँ “विकास” नामक सदी का सबसे बड़ा मानवीय और प्राकृतिक करप्शन अपने बिलकुल शुरुआती दौर में पैर जमा रहा है। विकास का मतलब अन्यत्र विश्व में कुछ भी होता हो लेकिन हमारे समाज में विकास का इससे इतर मतलब कम से कम मुझे तो नहीं ही दिखाई पड़ता है!

    यहाँ मैं बात करना चाहता हूँ उन गांवो के बदलाव की जो छोटे बड़े शहरों से बहुत दूर नहीं थे लेकिन शहरी प्रभाव से लगभग लगभग अछूते थे , देश की राजधानी दिल्ली के दो सौ किलोमीटर के दायरे में आज भी सैकड़ो गाँव ऐसे मिल जायेंगे जो शहरों से लगभग पूरी तरह कटे हुए है जहाँ शहरों से जोडती हुई सड़कें या तो दो एक साल पुरानी है या अभी तक बनी ही नहीं है। कितने ही गाँव दो छोटी छोटी नदियों के किनारे बसे हुए है जिनमें बरसात में पानी आ जाने के कारण बाहरी क्षेत्रों से सम्बन्ध बिलकुल कट जाता था , जहाँ अभी तक यातायात के साधन के नाम पर केवल रेलवे की दो चार पसेंजेर ट्रेनों का सहारा है। जो इन ग्रामीण क्षेत्रों पर बने हाल्ट पर मिनट दो मिनट के लिए रूकती है. आदमी तो आपने आने जाने का बंदोबस्त कर भी ले लेकिन कितनी औरते और बच्चे अपनी बीमारी और जरूरतों के लिए भी बीस किलोमीटर की दूरी आज भी तय करना बहुत ही टेढ़े कामों में से एक है । आज भी इन ग्रामीण क्षेत्रों में दो चार आदमी औरत ऐसे मिल जाते है जो कभी शहर नहीं गए या केवल मज़बूरी में गए हुए होते है।

    इन सब के बाद भी ये गाँव आत्म निर्भर थे,  शांति से जीवन व्यतीत करते थे , होड़, हबड़-तबड़ से दूर थे। जीवन यापन की बेसिक जरूरतों अन्न, सब्जी, दाल एवं अन्य खाद्यान्नो, कपड़ा, मकान आदि को पूरा करते हुए को भी धीमी गति से ही सही लेकिन मजबूत स्थिति की ओर बढ़ रहे थे। नदियों, तालाबों, पशुओं, पेड़ पौधे से निर्भरता और जरूरतों का जीता-जागता सम्बन्ध बना हुआ था। गाँव का आदमी आज भी जल्दी से इन सब को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि प्रकृति का पोषण ही करता है। भारत के गाँवो की सबसे बड़ी ताकत यहीं रही है की उनकी निर्भरता बाजार पर न के बराबर रही है जबकि बाजार उन पर आज भी पूरी तरह निर्भर है। हम भारतीय गांवों के साथ जो सबसे बुरा कर सकते थे वह यहीं था की गांवों की आत्मनिर्भरता को ज्यादा से ज्यादा कमजोर किया जाए. जिसके लिए हम सब ने पिछले तीन दशक भरपूर प्रयास किया है। हमनें कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है की भारत के गाँव-किसान बाजार की मांग के हिसाब चलने लग जाए, बाजार का उन पर पूरी तरह नियन्त्रण हो जाए। इस बात की शुरुआत को इस तरह से समझ सकते है खेतों के पानी देने के लिए रहट का इस्तेमाल होता था, तालाबों में भरपूर पानी रहता था, जुताई के लिए हल बैलों का प्रयोग होता था, रासायनिक जहर की उसे कोई जानकारी नहीं थी। धरती अपनी शक्ति में स्वयं वृद्धि करे इसके लिए कुछ एक सालों में जमीन को बिना फसल लिए कुछ समय के लिए खाली छोड़ा जाता था।  इन सब के लिए किसान को बाजार की कितनी जरूरत पड़ने वाली थी या नहीं पड़ने वाली थी यह हम आसानी से देख सकते है। किसान का उत्पादन के लिए अलग से कुछ खर्चा था ही नहीं सब कुछ प्रकृति , पशुओ, गाँव में रहने वाले सभी व्यक्तियों का सामूहिकता सहजता से बढ़ते कदम थे जो न केवल उन्हें मजबूत कर रहे थे बल्कि पूरी धरा को एक कड़ी में जोड़ते हुए मजबूत कर रहे थे।

    एक नजर :- ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

     

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    हल-बैल बनाम ट्रैक्टर

    यह हम थे जिसने यह मानसिकता बनाई हल बैल चलाने वाले किसान को हीनता  या तरस खाने वाली की दृष्टि से देखा। जबकि हीनता से हमारी दृष्टि को देखा जाना चाहिए था। हम घंटो मोबाइल चला सकते है, टीवी देख सकते है , बे-सिर पैर की बहसों में घंटो ऊर्जा खर्च कर सकते है। हम यह  भी नहीं जानते की हमारी थाली में जो रोटी रखी है वह लूट कर खाई जा रही रोटी ही हो। लेकिन हम खेतीं को आधुनिक बनाने के व्याख्यान  दे मारेंगे। हल बैल किसान के घर की चीज है जो उसे सहज उपलब्ध रहती है, फसल, पशुओं के चक्र में आपसी जरूरते, रख रखाव जरूरत से ज्यादा पूरी होती रहती है जबकि ट्रैक्टर बाहरी चीज है जिसके लिए उसे बड़ी पूंजी लोन आदि जुटाने पड़ते है। इसके बाद उसके रख-रखाव चलाने के भारी खर्चे अलग से। किसान खर्चा उठा सकता है उसके लिए कोई बड़ी बात भी नहीं होती है। लेकिन जिस दलदल में हम फंसे थे हमने किसान को भी उसी दलदल में धकेल दिया। हल बैल की जुताई धरती को उत्तेजित नहीं करती है, धरती उर्वरक क्षमता को पोषित करते केंचुओं एवं अन्य कीड़ो मकोड़ों आदि को नहीं मारती है जबकि ट्रैक्टर की जुताई खेत की क्षमता को कम करती जाती है। चूँकि अब हल बैल से खेती करना शर्म की बात है किसान अपने सहज जीवन और जमीन का ही दुश्मन बन बैठा.

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    प्राकृतिक खाद बनाम रासायनिक खाद

    प्राकृतिक खाद भी किसान को सहजता से उपलब्ध है जो खेती किसानी फसलों को बिना किसी नुकसान के भरपूर पोषण देता है। लेकिन बाजार की मांग को पूरा करने में वह रासायनिक खादों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में करने लगा। रासायनिक खाद जमीन की उर्वरक क्षमता को तेजी से बढाते है, एक के बाद एक तेजी से ज्यादा ज्यादा फसल लेनी है क्योकिं किसान तो पूंजी बनाने के लिए भी फसल पर ही निर्भर है। इस चक्कर में ऐसा समय भी दूर नहीं जब धरती किसानों का साथ छोड़ देती है  हमने गाँव-किसान को जहर की खेती करने मजबूर कर दिया है की वह अपना स्तर किसी भी तरीके चकाचौंध के ढोंग की तरफ धकेले वरना हेय दृष्टि से देखे जाने और पिछड़ा महसूस करने के लिए तैयार रहे।

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    रहट-तालाब-कुएं बनाम नलकूप-सब्मर्सिबल

    रहट

    नब्बे के दशक तक रहट-तालाब-कुएं गाँव खेती की लाइफ-लाइन हुआ करते थे। तालाब या कुओं से आप जबर्दश्ती पानी निकलते नहीं रह सकते। कुओं से पानी निकालने के लिए या तालाबों से पानी के लिए धरती के नीचे का जलस्तर या तो बहुत अच्छी अवस्था में होना चाहिए या फिर बारिश आदि के पानी को इकठ्ठा करने उसे साफ़ बनाए रखने के लिए, बर्बाद न करने के लिए सामूहिक सजगता अवश्य होनी चाहिए। किसानों द्वारा खेतों में प्रयोग किए जाने वाले नलकूपों से पानी तो खेती के लिए उतना ही निकाला जाता है जितना रहट आदि के माध्यम से निकाला जाता है। अंतर आया है तो गति का, निर्भरता का एवं उसके जल के मुख्य स्रोतों से दूर जाने का। अंतर केवल गति या श्रम की कमी का होता तब कोई दिक्कत नहीं थी  लेकिन भारतीय किसान रहट द्वारा पानी निकालने के लिए किसी बाह्य कारक पर निर्भर नहीं था। आज वह बिजली और महंगे तेल पर पूरी तरह निर्भर है, साथ के साथ जो सबसे बुरा हो सकता था वह यह था किसान और गाँवो का भी सबसे आखिर में ही सही लेकिन तालाबों और कुओं से सम्पर्क टूटता चला गया। इतना भी जरुरी नहीं समझा गया की लोगों को इतना तो जागरूक किया जाए कि कम से कम जानकारी में तो इतना पता हो की पृथ्वी के नीचे अथाह जल भंडार नहीं है। रही सही कसर आज घर घर में सब्मर्सिबल लगवा कर पूरी की जा रही है। यह सब क्या षड्यंत्र का हिस्सा नहीं है. जब प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किए जाने का काम  इतने बड़े पैमाने पर हो सकता है तो किसान के लिए वाटर हार्वेस्टिंग जैसे प्रोग्राम भी बड़े स्तर पर स्थापित किए जा सकते थे, वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों की ओर बढा जा सकता था लेकिन जब सोच समझ ही रखा है की किसानों को आत्मनिर्भर बनाना पूंजीवाद पर चोट करेगा तो क्यों उसके लिए प्रयास किए जाए।

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    एक नजर :- किसान और अर्थव्यवस्था  

    चलते चलते

    यह हम थे जिसने मानसिकता बनाई की शहर में रहना ही आपको महान, बुद्धिमान बना देता है और गाँव में रहने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है। यह हम थे जिसने गाँव किसान को लगातर हीन मानते हुए यह दिखाया की भोग करना, कुछ अधिकार प्राप्त हो जाए तो केवल अपने भोग करने के लिए उनका जितना हो सकता है दुरूपयोग करना और इन दुरुपयोगों में भी अपने आप को महान साबित किए रहना। यह हम थे जिन्होंने भोग, ढोंग और धूर्त्तता को आदर्श के तौर पर  स्थापित किया। हमने ही यह स्थापित किया कि महंगी डिग्री हासिल कर के कुछ उत्पाद बेच लेना , नौकरी कर लेना, मानसिक गुलाम हो जाना महानता है और जो खेत घर परिवार संभाले हुए है जो पूरी अर्थव्यवस्था में वास्तविक योगदान देते है वह सब हमसे कम समझ रखते है।

    मुद्रा में ही बात कर ले तो हम आज तक किसान के  दैनिक श्रम की कीमत नहीं तय कर पाए , हम किसान को यह अधिकार नहीं दे पाए की वह अपनी फसल की कीमत क्या रखेगा,  हम यह तय नहीं कर पाए यह किसान का अधिकार है की वह अपनी फसल को मर्जी जिस बाजार में बेचे, वहीँ किसान अपनी ही चीजे बाजार से कई गुना दामों पर खरीदने को मजबूर है। हमने विकल्प ही क्या छोड़ा है सिवा भूखे मरने या मुद्रा के बदले जमीन बदलने के  और हम बात करते है किसान को सिखाने की, उसे आधुनिक बनाने की ; कुछ बेसिक शर्म लिहाज तो हम में भी होना ही चाहिए।  किसान बाजार के खेलों में फंस कर जमीन बेचता है,  जिसे  बाजार की और धकेलने का काम हम आप लगातार अपने दैनिक जीवन में करते है। जमीन की लड़ाई तो रह ही नहीं जाती है लड़ाई तो फिर मुआवजों की होती है हम यह बात समझते ही नहीं है कि दुनिया का कोई भी मुआवजा उस जमीन के बराबर हो ही नहीं सकता। पूंजी अपने आप को फिर से बढ़ा लेती है, जमीन बेचने वाला किसान उस पूंजी का कितना भी सही इस्तेमाल कर ले लेकिन उतनी जमीन के उत्पादन की कीमत प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कही न कही कोई किसान ही चुकाता है। हमने हर उस बात को उच्च मापदंडो पर निर्धारित किया जो धूर्तता, ढोंग, परजीविता पर आधारित थी जिन पर किसी भी सभ्य समाज के मनुष्य को शर्म आनी चाहिए थी। जो शहर गांवों के रहमों-करम पर फले फूले हो, लूट खसोट को अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हो वह एक भी व्यक्ति को वास्तव में कैसे आत्मनिर्भर बना सकते है, हाँ अगर आप  कम से कम मुद्रा पर अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों पर सरल सम्पन्न जीवन व्यतीत करते लोगों के बजाय धूर्तता के साथ बनाई गयी परजीवी व्यवस्था, किसी भी तरीके से इकठ्ठा की गई मुद्रा पर आधारित मापदंडो को जो गांवों की शक्ति पर भोग करती है को आत्मनिर्भरता, ईमानदारी, चेतना के विकास में सहायक तत्व, महानता बोलते हो तो अलग बात है।

    एक नजर :- बूचड़खाने

  • यूँ बनता है एक आदमी

    यूँ बनता है एक आदमी

    Veeru Sonker[divider style=’right’]

    यूँ बनता है एक आदमी
    थोड़ा सा डर बटोरे हुए जो कहता है
    मैं नही डरता.

    चलने से पहले बहुत बार ठिठकता है
    और जेब मे पड़ी भाषा की गिन्नियां टटोलता है
    उसके बाद आदमी नही
    उसका जोड़-घटाव चलता है.

    जैसे नफरत चलती है जैसे सत्ता के पैर नाचते हैं
    जैसे लड़खड़ा जाती है एक उम्र
    बिना पिये ही.

    आदमी ही बताता है सबसे जोरदार नशा होता है समय के प्याले में
    वह जितनी बार तौला जाता है जितनी बार गिना जाता है
    मायूस होता है जितनी बार
    वह उतनी बार ही अपनी खाल छोड़ता है
    और एक नई खाल ओढ़ता है.

    वह स्त्री से बोलता है दुनिया की सुन लेता है
    और टिकाएं रहता है स्मृतियों के पैर
    बेमतलब के पूर्वजो के पास वह आता जाता है

    बहुत बीमार हो कर भी कहता है अपनी देह से
    मैं ठीक हूँ एकदम.

    इतना सब होने के बाद भी वह एक आदमी गिरता है
    एक लंगड़ी सभ्यता की गोद मे
    और कहता है
    मैं तुम्हारा सबसे जरूरी पुर्जा हूँ

    एक लड़की ढांपती है अपने सीने को
    और देखती हैं नजर कैसे बदल गयी
    एक आदमी में,

    एक औरत चुपचाप देखती है
    आहिस्ता-आहिस्ता पुत्र के भीतर से बाहर आते पिता/पति के चेहरे को.

    जगहों के सिमटने का मौसम कितना क्रूर होता है
    देखता है एक बूढ़ा पिता
    ढूंढता है अपने खेत मे बटती हुई जमीन के भीतर ठहरने की कोई जगह.

    उचक कर देखता हुआ बच्चा
    कंधे से उतरता है आहिस्ता
    एक कदम तेज़ चल कर निकलता है अपनी उम्र से बाहर
    हो जाता है एक आदमी.

    एक बच्चा चढ़ता है घोड़े पर
    और बन जाता है आदमी.

    एक बच्चा देखता है स्त्री को
    देखते देखते
    उसके हाथ से कट जाती है बचपन की पतंग
    वह दुख से रोता नही,
    वह सड़क पर दौड़ता है और लूट लेता है मौके से भरी एक पतंग

    ‘मौका’ उसे बदलता है एक आदमी में!

    बहुत बार मरता है एक जल्दबाज पिता
    और बन जाता है
    बारह साल का एक लड़का
    तेज़तर्रार आदमी.

    कॉलेज से बाहर धकेल देती है
    उच्च प्रतिभा-प्रतिशत के शेयरों सी उछलती एक मार्कशीट बहुत बार
    बहुत बार आदमी बनते ही दौड़ लगती है बाजार की ओर
    बाजार सिद्धस्त है
    वह अधबने कच्चे रह गए बच्चों को बदल देता है आदमी में.

    एक बच्चा गिरता है एक सुनसान सड़क पर
    आसपास कोई नही होता
    अचानक वहीँ चढ़ता है बड़े होने का बुखार पहली बार एक बच्चे पर.

    एक बच्चा बुखार को छोड़ता है
    बिस्तर में,
    घर की ऊबी बंद दीवारों के पार ले जाता है
    कौतूहल से जगमग अपनी आंखों को
    और झांकता है
    सभ्यता की उदास आंखों में

    छोड़ता है ढेर सारा भरोसा
    और कहता है मैं चलता हूँ अब!

    वह लौटता है बड़ा होकर
    मांगता है वापस
    उस सभ्यता से अपनी उम्र

    सभ्यता प्रेमिका की तरह तड़पती है
    सभ्यता बारिश की तरह गिरती है

    और

    बूढ़े पत्थरों को चाट कर कहती है
    उम्र का स्वाद लिया है तुमने
    तुम्हारे हाथों से अब कागज की नाव नही बन सकती
    जिस पर ढोते हुए मैं ला सकूँ
    बचपन बोने का बीज

    सभ्यता बड़ी बहन सा दे देती है जमा किया अपना सारा हिस्सा

    आदमी तब टूटता है
    और एक ऐड लेता है समझदारी से भरी हुई

    साथ-साथ चलते हुए दोनों समय के दरवाजे को ठोंकते हैं
    आदमी चुप रहता है सभ्यता बोलती है
    बात करती है और भरोसा देती है!

    दरवाजा खुलता है-
    और एक आदमी कविता से निकल कर
    औंधे मुंह गिरता है
    किसी कहानी में

    यूँ बनता है एक आदमी
    जैसे घुसता है व्याकरण, एक भाषा के भीतर
    आदमी घुसता है कहानी के कपड़े पहन कर
    एक बच्चे के भीतर

    और ला कर पटक देता है
    पकती हुई उम्र के खड़ी कगार वाले एक टीले पर
    बहुत बार उस टीले से उतरता है एक बच्चा
    और फुदक फुदक कर चलता है

    वह तारीखों के/देशों के/पेड़ो के/पूर्वजो की तस्वीर के
    और तमाम असमय घट रही घटनाओं के गाल चूम-चूम कर लाल कर देता है

    नदी, आकाश और मौसम का हाथ पकड़ कर
    चढ़ जाता है फिर उसी टीले पर

    आदमियत की अपनी उतारी हुई खाल को देखता है
    उसे फिर से ओढ़ता है

    थोड़ा रुआंसा होता है
    और कहता है

    मैं बचा लूंगा सब!

  • महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता –Sanjay Jothe

    महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    Mahatma Jyotiba Phule and Dr. B. R. Ambedkar

    महात्मा ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमे एक से दूसरे पायदान तक विक्सित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं. ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं.

    अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के उठाये कदमों को एकसाथ रखकर देखें. दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है. समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है. और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं.

    ज्योतिबा के समय में जब कि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीती निवारण –इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था. न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था. और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी. क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं.

    इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है. ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है. इसलिए नही कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँती पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा.

    ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा. जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं. नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं. फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है.

    आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है.

    इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है. इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है.

    यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है. जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया. ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी. यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है.

    इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है.ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है.एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना इस प्रष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है.

  • दलाई लामा बनाम तिब्बत –Sanjay Jothe

    दलाई लामा बनाम तिब्बत –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe


    Dalai Lama

    दलाई लामा जैसे लोग अपने देश और संस्कृति को बर्बाद करके विकसित और सभ्य देशों को सभ्यता और धर्म सिखाते हैं तो बड़ा मजा आता है. ये बिलकुल भारतीय बाबाओं जैसी लीला है. अपने खुद के घर में सडांध और बीमारियाँ फ़ैली है और दूसरों के साफ़ सुथरे घर में जाकर सुगंध, स्वच्छता और सौन्दर्य पर भाषण देते हैं.

    इनका अपना ज्ञान पिछली कई सदियों से तिब्बत को लगातार खोखला करता गया. भयानक अंधविश्वास, शोषण और अशिक्षा ने वहां के आम जन को जानवरों जैसी जिल्लत में बनाये रखा. महिलाओं और गरीबों सहित बच्चों के अधिकारों को कुचला गया.

    चीन का आक्रमण बहुत बाद में हो रहा है. चीन के आने के पहले ही वहां पुनर्जन्म पर आधारित दलाई लामा नाम की संस्था ने इतना शोषण किया है जिसका कोई हिसाब नहीं. एक पूरा देश और संस्कृति धीरे धीरे बर्बाद की गयी है इन महाशय के द्वारा. ये कहते हैं ये पहले वाले लामा जी के पुनर्जन्म हैं. अगर इनकी बात मान भी लें तो ये और बड़े अपराधी सिद्ध होते हैं.

    ये पहले दुसरे या दसवें बारहवें के पुनर्जन्म हैं, इसका अर्थ ये हुआ कि तिब्बत के समाज और संस्कृति को गर्त में पहुंचाने के लिए उन्होंने एक व्यक्ति या एक संस्था के रूप में हर पीढी में खुद ही जरुरी निर्णय लिए हैं.

    इसका क्या मतलब हुआ?

    यही मतलब हुआ कि आज तिब्बत जो कुछ है वह इन्हीं महाशय की देन है. कोई राष्ट्र या समाज जब इतना लचर और दकियानूसी हो जाए तो अडोस पड़ोस के देश उसपर चढ़ाई कर सकते हैं. चीन ने यही किया. चीन दलाई लामा द्वारा बनाई परिस्थितियों का अपने हित में शोषण कर रहा है.

    दलाई लामा से आज तक सही प्रश्न नहीं पूछे गए हैं. उनसे पूछा जाना चाहिए कि तिब्बत की संस्कृति और समाज को नष्ट होने से बचाने के लिए अतीत में क्या किया जा सकता था? फिर उनके चेहरे का रंग देखिये. उनसे ध्यान समाधी, सुख दुःख स्वर्ग नरक या अध्यात्म के चलताऊ सवाल करने से कुछ नहीं होता. ऐसे सवालों का जवाब देना सभी को आता है. उन जवाबों से न आज तक कुछ हुआ है न आगे कुछ होगा.

    अब ये सज्जन अपने समाज और संस्कृति की होली जलाकर दुनिया भर में ज्ञान बाँट रहे हैं. ये अच्छा मजाक है. अमेरिकी राजनीति को अगर चीन के खिलाफ एक मोहरे की जरूरत न हो तो ये इन महाशय की महानता अभी तुरंत खो जायेगी.

    कम से कम भारतीय ओबीसी, दलितों और स्त्रीयों को इन महाशय से बचकर रहना चाहिए. ये जब भी मिलें इनसे अध्यात्म के नहीं बल्कि तिब्बत के समाज के योजनाबद्ध विनाश के संबंध में सवाल पूछिए. तब देखिये इनका सारा चमत्कार धरा रह जाएगा.