Author: .

  • जीवन मझदार

    जीवन मझदार

    एक भी नाव नहीं है मेरे पास
    लकड़ी की या कागज़ की
    और तुम कहते हो
    कि दो नावों पर सवार हूँ मैं

    देख ही रहे हो
    ३२ साल से एक नदी को
    पार नहीं कर पा रहा हूँ
    बीच धार में चिल्ला रहा हूँ
    मुझे बचा लो
    कोई आता भी नहीं बचाने अब किसी को

    कितनी नावों में कितनी बार
    बैठने की हसरत लिए
    मर नहीं जाऊंगा एक दिन

    वैसे अच्छा ही हुआ कोई नाव नहीं है
    क्या पता उसमे एक छेद होता
    और डूब जाता मैं
    या नाव ही उलट जाती .

    अब बहुत अँधेरा है पहले से अधिक
    बहुत तेज़ आंधी
    खून खून चारों तरफ दीवारों पर

    सच कहता हूँ
    अब दम घुटने लगा है
    आपस में ही उलझ गए हम
    एक दूसरे को दुश्मन मान बैठे हैं
    अब तो लगता है
    यह नाव भी अब नाव कहाँ है
    जब बुलेट ट्रेन चलने की बात हो रही है
    मुल्क में

    एक भी नाव नहीं है
    एक भी सायकिल नहीं
    नंगे पाव् ही चलना है
    रेत में
    फिर क्या कहना
    कि पाँव जल रहे हैं मेरे
    कृपया मेरे इस त्याग को दर्ज कर लिया जाये इतिहास में

  • भारत के सभ्य होने की राह में सबसे बड़ी बाधा – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत के सभ्य होने की राह में सबसे बड़ी बाधा – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक ख़ास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है. कई लोगों ने भारत में सामाजिक क्रान्ति की संभावना के नष्ट होते रहने के संबंध में जो विश्लेषण दिया है वो कहता है कि भारत का धर्म इसके लिए जिम्मेदार है. निश्चित ही भारत का धर्म प्रतिक्रान्ति का हथियार है लेकिन सर उपर उपर नजर आने वाले इस धर्म को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह ठीक नहीं है.

    धर्म मोटे अर्थों में कर्मकांड, विश्वास और पूजा पद्धति इत्यादि इत्यादि का जमघट होता है, ये स्वयं अपना स्त्रोत नहीं है बल्कि ये भी किसी अन्य गहरी विधा के गर्भ से जन्मता है. ठीक से कहें तो भारतीय धर्म का मूल उसके भाववादी दर्शन में है. इस लोक के शोषण और सच्चाइयों से भाग कर परलोक में परम शान्ति या मोक्ष को खोजते हुए जन्म मरण (भवचक्र) से बाहर निकलना इस दर्शन का इसका मूल लक्ष्य है. ऐसे लक्ष्य असल में इस जमीन पर चल रहे जीवन को सम्मान नहीं देते बल्कि किसी आसमानी लोक या हवा हवाई स्वर्ग में या मोक्ष या बैकुंठ को सम्मान देते हैं.

    जो लोग ये कहते हैं की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना इस जमीन पर घट रहे जीवन के खिलाफ है वे बहुत हद तक सही हैं. इसके बावजूद ये वक्तव्य अधूरा है. मेरा गहरा अनुभव ये है की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना भी तभी उठती है जबकि आपके समाज में जमीनी जीवन के खिलाफ एक निर्णायक मनोवृत्ति बन चुकी हो. उदाहरण के लिए भारत में सामाजिक और लौकिक जीवन की जमीनी सच्चाइयों को छुपाते हुए उनमे पल रही सडांध और बीमारी को लगातार दबाते हुए समाज में यथास्थिति बनाये रखना ही भारत की परम्परा रही है.

    भारत में पुरोहित वर्ग, शासक वर्ग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा से एक ख़ास तरह की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाया है. इस संरचना में अस्सी प्रतिशत कामगारों मजदूरों, स्त्रीयों और अछूतों को पूरी व्यवस्था के लाभों से वंचित रखने का काम किया है. यह काम सैनिक बल से या लठैतों के जरिये नहीं किया जा सकता. इसे सामाजिक धार्मिक विश्वास के जरिये ही किया जा सकता है. इस ख़ास तरह की अमानवीय सामाजिक संरचना को बनाये रखने के लिए धर्म ने बड़ी चतुराई से हजारों साल तक बढिया काम किया है. भारत के धर्म ने कर्मकांडों और त्योहारों के जरिये इन अस्सी प्रतिशत बहुजनों के बीच निश्चित ही एक ख़ास तरह की गुलामी, कायरता और भाग्यवाद को फैलाया है. विशेष रूप से बहुजनों की स्त्रीयों को इस धर्म ने व्रत उपवासों, त्योहारों आदि के जरिये एकदम गुलाम और कायर बनाया हुआ है.

    ये गुलाम और डरपोक स्त्रीयां एक डरपोक कौम को जन्म देती हैं जो किसी भी बदलाव या तर्क की बात से डरते हैं. ये अस्सी प्रतिशत डरपोक और दिशाहीन लोग वही हैं जिन्हें सामाजिक क्रान्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन ये खुद उस क्रान्ति को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

    भारतीय धर्म को और उसके स्वाभाविक परिणाम को इस तरह देखना बहुत आसान है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा अनुभव ये बताता है कि हमें धर्म के बाह्य कर्मकांडीय स्वरूप पर प्रश्न उठाने से या उसे ध्वस्त कर देने भर से कोई स्थाई समाधान नहीं मिलने वाला है. बाहरी कर्मकांड रुक भी जाएँ तो यह जहरीली अमरबेल फिर से पनप जायेगी. इसका जीवन स्त्रोत कहीं और छुपा हुआ है.

    आप गौर कीजिये इस समाज के पढ़े लिखे तबके पर, ये शहरी मध्यमवर्ग तबका धर्म के बाहरी कर्मकांड जैसे कि यज्ञ, हवन, बलि, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, दान दक्षिणा, ब्राह्मण भोज आदि नहीं करता है. ये तबका – जिसमे सुशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रबन्धक, और हर तरह के पेशेवर और नई पीढी के युवा या अप्रवासी भारतीय आते हैं – वे ग्रामीण या कस्बाई कर्मकांड नहीं करते हैं. वे लोग बहुत मौकों पर प्रगतिशील भी नजर आते हैं. अक्सर वे पार्टी इत्यादि में शराब और मांस का सेवन करते हुए मिल जाते हैं. यही लोग शहरों में लिव इन रिलेशन और समलैंगिक शादियों सहित लोकतंत्र, साम्यवाद, क्रान्ति आदि के झंडे भी लहराता हुआ मिल जायेंगे. ऐसा करते हुए वे खुद की और दूसरों की नजरों में स्वयं को “गैर-रुढ़िवादी” सिद्ध कर देते हैं. लेकिन आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म में इनका विश्वास कभी कम नहीं होता.

    सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब ये हुआ कि ये प्रगतिशील युवा वर्ग सिगरेट शराब और मांस सहित फ्री सेक्स के बावजूद पूरी ठसक के साथ अंदर से धार्मिक बना रहता है और इस सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है. ये एक विचित्र लेकिन परेशान करने वाला तथ्य है. इसका ये अर्थ हुआ कि बाहरी आडंबरों से भारत के इस धर्म का या इस धर्म के वास्तविक जहर का कोई अधिक सम्बन्ध नहीं है. बल्कि बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों से भी कहीं अधिक गहराई में छुपा इसका जहरीला अध्यात्म या रहस्यवाद ही इसका असली जीवन स्त्रोत है. उसी स्त्रोत से जहर का वो फव्वारा फूटता है जो हर दौर में हर पीढ़ी में पूरे भारत को पागल बनाये रखता है. इस बात को गहराई से समझना होगा, ये थोड़ी उलझी हुई बात है.

    असल में भारत का धर्म कोई एकरूप बात नहीं है इसके हजारों विभिन्न रंग और चेहरे हैं. इसी को विविधता कहके महिमंडित किया जाता है. लेकिन इन विविध रूपों के भीतर एक सा जहर लहू बनके बहता है. वह लहू है इसकी ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की मान्यता’. इसी जहरीली त्रिमूर्ति के गर्भ से परलोक की महिमा और इस लोक की निंदा जन्म लेती है. बाहरी आडंबर, कर्मकांड कुछ भी हों अंदर ही अंदर इनमे कर्म का विस्तारित सिद्धांत (इस जन्म का कर्म अगले जन्म को तय करेगा) चलता रहता है. इसी में लपेट कर दान दक्षिणा, पुण्य, पाप आदि की सलाहकारी भी चलती रहती है, इसी से ध्यान साधना के तरीके बनाये जाते हैं और लोगों को व्यर्थ के तन्त्र मन्त्र ध्यान भजन में उलझाया जाता है. बाहर के कर्मकांड बदल भी जाएँ तो थोड़े दिनों बाद इस जहरीले कुँए से नई जहरीली बेल पनप कर समाज पर फ़ैल जाती है. उदाहरण के आजकल के पूजा पंडाल जगराते जुलूस, सामूहिक भोज आदि भारत में बहुत पुराने नहीं हैं.

    जब स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों में आजादी के आन्दोलन के लिए या तथाकथित हिन्दू जीवन दर्शन को प्रचारित करने के लिए हिन्दुओं सहित बहुजन जातियों को संगठित करने की आवश्यकता हुई तब पुराने दर्शन और कर्म के सिद्धांत पर आधारित कर्मकांडों को नये रूप में ढाल दिया गया और नये देवी देवताओं सहित नई आरती, नये पूजा विधान, जुलूस, जगराते, डांडिया, सामूहिक भोज आदि निर्मित कर दिए गये. इनमे शामिल होने वाले लोगों के मौलिक मनोविज्ञान अभी भी आत्मा, परमात्मा और कर्म के विस्तारित सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा से ही नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ये इनोवेशन किया गया था. इन नये कर्मकांडों से इन्हें आजाद करवा भी दिया जाए तो कोई बदलाव नहीं होने वाला. उस अमरबेल में से फिर नये अंकुर अपने आप निकल आयेंगे.

    यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले दलितों बहुजनों में भी इसी कारण कोई ख़ास बदलाव नहीं आता है. उनके मन में गहराई में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष या स्वर्ग या जन्नत जैसे अंधविश्वास भरे ही रहते हैं. इन जहरीले बीजों को अपने साथ ले जाकर वे ध्यान समाधी मोक्ष जन्नत आदि के लिए नये कर्मकांड खुद ही बना लेते हैं. वे भी पुराने देवी देवता छोड़कर नये देवी देवता और तीर्थ, मन्दिर ध्यान केंद्र आदि बना लेते हैं और नये धर्म में भी पुराने भारतीय धर्म की जहरीली खुराक फैला देते हैं. ये एक लाइलाज बीमारी नजर आती है.

    अब बड़ा सवाल ये है कि इसका इलाज कैसे हो?

    मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है. हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी. इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

    ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं. ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं कि कई पीढियां इसमें से बाहर नहीं निकल पाती. आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाये रखते हुए उसके ऊपर ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

    ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है. इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं. पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं. युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है.

    अपने परिवारों, गाँवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है. इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है.

    इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

    इसलिए सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों आदिवासियों को मेरी यही सलाह होती है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएँ. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें. ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही प्रगतिशील एजेंट हैं.

    आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता पौराणिक बकवास का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं. ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं.

    अगर धोती या जनेऊ या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक नही होगा. लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते.

    यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.

  • किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए, केवल अपने परिवार लायक उपजाना चाहिए –दीपक पुजारी

    किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए, केवल अपने परिवार लायक उपजाना चाहिए –दीपक पुजारी

    Deepak Pujari

    किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए और केवल अपने परिवार के लायक उपजा कर बाकी ज़मीन को पड़त छोड़ देना चाहिए। जो लोग अपने बच्चों को डेढ़ लाख की मोटर साइकल, लाख का मोबाइल लेकर देने में एक बार भी नहीं कहते कि महँगा है, वे लोग किसानों की माँग पर बहस कर रहे है कि दूध और गेहूँ महँगा हो जाएगा।

    माॅल्स में जाकर अंधाधुंध पैसा उजाड़ने वाले गेंहूँ की कीमत बढ़ जाने से डर रहे हैं। तीन सौ रुपये किलो के भाव से मल्टीप्लैक्स के इंटरवल में पॉपकॉर्न खरीदने वाले मक्का के भाव किसान को तीन रुपये किलो से अधिक न मिलें इस पर बहस कर रहे है। एक बार भी कोई नहीं कह रहा कि मैगी, पास्ता, कॉर्नफ़्लैक्स के दाम बहुत हैं।

    सबको किसान का क़र्ज़ दिख रहा है और यह कि उस क़र्ज़ की माफी की माँग करके किसान बहुत नाजायज़ माँग कर रहा है। यह जान लीजिए कि किसान क़र्ज़ में आप और हमारे कारण डूबा है। उसकी फसल का उसको वाजिब दाम इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि उससे खाद्यान्न महँगे हो जाएँगे। 1975 में सोने का दाम 500 रुपये प्रति दस ग्राम था और गेंहू का समर्थन मूल्य किसान को मिलता था 100 रुपये। आज चालीस साल बाद गेंहू लगभग 1500 रुपये प्रति क्विंटल है मतलब केवल पन्द्रह गुना बढ़ा और उसकी तुलना में सोना आज तीस हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम है मतलब 60 गुना की दर से महँगाई बढ़ी मगर किसान के लिए उसे पन्द्रह गुना ही रखा गया। ज़बरदस्ती, ताकी खाद्यान्न महँगे न हो जाएँ। 1975 में एक सरकारी अधिकारी को 400 रुपये वेतन मिलता था जो आज साठ हज़ार मिल रहा है मतलब एक सौ पचास गुना की राक्षसी वृद्धि उसमें हुई है। इसके बाद भी सबको किसान से ही परेशानी है।

    किसानों को आंदोलन करने की बजाय खेती करना छोड़ देना चाहिए। बस अपने परिवार के लायक उपजाए और कुछ न करे। उसे पता ही नहीं कि उसे असल में आज़ादी के बाद से ही ठगा जा रहा है।

    किसान क्यों हिंसक हो गया है यह समझना होगा, जनता को भी और सरकार को भी। किसान अब मूर्ख बनने को तैयार नहीं है। बरसों तक किया जा रहा शोषण अंततः हिंसा को ही जन्म देता है। आदिवासियों पर हुए अत्याचार ने नक्सल आंदोलन को जन्म दिया और अब किसान भी उसी रास्ते पर है। आप क्या चाहते हैं कि आप समर्थन मूल्य के झाँसे में फँसे किसान के खून में सनी रोटियाँ अपनी इटालियन मार्बल की टॉप वाली डाइनिंग टेबल पर खाते रहें और जब किसान को समझ में आए सारा खेल तो वह विरोध भी नहीं करे।

    आपको पता है आपका एक सांसद साल भर में चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँकने का अधिकारी होता है, लेकिन किसान का चार हजार का बिजली का बिल माफ करने के नाम पर आप टीवी चैनल देखते हुए बहस करते हैं। यह चेत जाने का समय है। कहिए कि आप साठ से अस्सी रुपये लीटर दूध और कम से कम साठ रुपये किलो गेंहू खरीदने के लिए तैयार हैं, कुछ कटौती अपने ऐश और आराम में कर लीजिएगा। नहीं तो कल जब अन्न ही नहीं उपजेगा तो फिर तो आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उस दाम पर खरीदेंगे ही जिस दाम पर वे बेचना चाहेंगी।

    एक किसान की नजर
    किसान पुत्र
    दीपक पुजारी

    Deepak Pujari

    • Founder, President at Rangbhumi Group Of Art
    • Founder, President at Pragati Path Foundation
    • Former Chief executive officer at Matribhumi Jan Seva Sansthan
  • ओशो: प्रतिक्रान्ति का शिखर पुरुष –Sanjay Jothe

    ओशो: प्रतिक्रान्ति का शिखर पुरुष –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    (नोट: बाबाओं के सम्मोहन के विषय में बात करते हुए आप अगर ओशो रजनीश को भूल रहे हैं तो आप सबसे बड़ी भूल कर रहे हैं, वर्तमान बाबा बाजार का जहरीला माडल देने वाले इन बाबाजी को बार बार समझना होगा ताकि इस बीमारी का ठीक निदान किया जा सके)

    ओशो पर बात करते हुए अक्सर ही यह मान लिया जाता है कि चूँकि वे बुद्ध से सबसे ज्यादा प्रभावित थे इसलिए उनकी शिक्षाएं बुद्ध या बौद्ध दर्शन के अनुकूल हैं. यह भी मान लिया जाता है कि चूँकि उन्होंने कई बार अंबेडकर और दलितों का पक्ष लेते हुए महात्मा गांधी और हिन्दू धर्म सहित वर्ण व्यवस्था पर चोट की है इसलिए वे अंबेडकर की शिक्षाओं के पक्ष में हैं. यहाँ बहुत स्पष्टता से मैं इन दोनों मान्यताओं को नकारना चाहता हूँ.

    ओशो न तो पूरी तरह से अंबेडकर के पक्ष में हैं न ही बुद्ध या बौद्ध दर्शन के पक्ष में हैं. वे इन दोनों का ब्राह्मणीकरण कर रहे हैं और बुद्ध के मुंह से वह सब निकलवा रहे हैं जो बुद्ध के मूल दर्शन में कहीं है ही नहीं. यह बात अंबेडकरवादियों और दलितों सहित भारत के आदिवासियों, शूद्रों, पिछड़ों और स्त्रीयों को साफ़ साफ़ समझ लेनी चाहिए. इस तथ्य को उजागर करना इस किताब का एक बड़ा उद्देश्य है.

    Osho

    असल में प्रारंभिक दौर में ओशो ने जो नास्तिकवादी और तर्कवादी दिशा ली थी उसकी असफलता के बाद उन्होंने तय किया कि वे भारत की अन्धविश्वासी जनता को उसके अंधविश्वास के जरिये ही पकड़ेंगे और स्वयं को स्वीकृत बनायेंगे. उस समय उन्हें न केवल स्वयं को स्वीकृत बनाने की आवश्यकता थी बल्कि उन्हें धन संपत्ति और संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता थी. इसलिए उन्होंने गहराई से निरीक्षण करके पाया कि आम भारतीय अन्धविश्वासी और धर्मभीरु मनुष्य किस बात से प्रभावित होता है और किस बात से उत्तेजित होता है. इन दोनों का एकसाथ उपयोग करते हुए उन्होंने ब्राह्मणवादी मान्यताओं पर खड़े धर्म और साधना का प्रचार शुरू किया. इसी दौर में उन्होंने नव संन्यास की घोषणा की इसके बाद उनकी प्रसिद्धि बढती ही गयी और वे शीघ्र ही एक सम्पन्न आश्रम में रहने लगे. लेकिन ब्राह्मणवाद को उपयोग करते हुए वे यह भूल रहे थे कि जिस खेल को वे शुरू कर रहे हैं वो खेल वे खुद ही कभी बंद नहीं कर सकेंगे.

    धार्मिक अंधविश्वास पर खड़ी कोई भी रचना दुर्निवार होती है. ब्राह्मणवाद इतना जहरीला खेल है कि इसका उपयोग करने वाले को भले ही यह लगता हो कि वो इसका उपयोग कर रहा है लेकिन अंत में जाहिर होता है कि ब्राह्मणवाद ही उस व्यक्ति को निगलकर उपयोग करने लगता है. ठीक यही ओशो के साथ हो रहा है. उनके शिष्यों की आजकल की शिक्षाओं को देखिये और उनके आश्रमों को देखिये. यह बहुत साफ़ हो जाता है कि ब्राह्मणवादी खेल का उपयोग करने के बाद ओशो कभी ब्राह्मणवाद के चंगुल से आजाद नहीं हो सके और इसी खींचतान में उनका अंत हुआ. उनकी अंतिम किताब में वे ब्राह्मणी अर्थ के या वेदान्तिक अर्थ के पुनर्जन्म को प्रचारित करते हुए विदा हो रहे हैं.

    इससे साफ़ जाहिर हो रहा है कि बुद्ध की प्रशंसा और अनत्ता की प्रशंसा करते हुए भी वे अनत्ता के आधार पर रचे गये पुनर्जन्म के निषेध को अपने “सबसे विद्रोही” शिष्यों के सामने अपने अंतिम प्रवचनों में भी नहीं रख पा रहे हैं. इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यही हुआ कि या तो वे वेदान्तिक पुनर्जन्म को ही सत्य मानते हैं, या फिर बुद्ध की प्रशंसा करते हुए भी वे बुद्ध के मुंह से वेदांत की प्रशंसा करवाना चाह रहे हैं. दोनों स्थितियों में वे बुद्ध और अंबेडकर के खिलाफ जा रहे हैं और उस सनातनी पाखण्ड का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसमे “सर्वम खल्विदं ब्रह्मं” अर्थात सब कुछ ब्रह्म ही है – कहने वाले आदिशंकराचार्य एक चांडाल के स्पर्श कर जाने पर कुपित हो जाते हैं. कण कण में ब्रह्म का दर्शन करने की सलाह और भेदभाव छुआछूत एकसाथ चलाए रखना, यही सनातनी पाखण्ड है यही ब्राह्मणवाद का सबसे खतरनाक अस्त्र है. ऊपर ऊपर समावेश और प्रगतिशीलता की प्रशंसा चलती है लेकिन सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार में एक इंच का भी बदलाव नहीं आने दिया जाता सामाजिक व्यवस्था जहां की तहां एक पर्वत सी अचल बनी रहती है.

    इस लेख से गुजरते हुए सभी पाठक मित्रों से निवेदन है कि वे एक बात को बहुत साफ़ तौर से समझ लें और नोट कर लें. भगवान् रजनीश पर भारत का सबसे बड़ा ब्राह्मणवादी गुरु होने का जो आरोप यहाँ लगाया जा रहा है उसका यह अर्थ नहीं है कि भगवान् रजनीश पुरातनपंथी या रुढ़िवादी विचारक या गुरु हैं. न ही इसका यह अर्थ है कि वे प्राचीन भारतीय दर्शन और समाज व्यवस्था को बनाये रखने का सचेतन प्रयास कर रहे हैं. इसके विपरीत वे बहुत प्रगतिशील विचारों वाले, बहुत खुले और दुस्साहसिक वैचारिक प्रयोग करने वाले व्यक्ति हैं जिन्होंने कई मौकों पर पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौती दी है और पश्चिम में हुई सफल क्रांतियों की शिक्षाओं को कई कई तरह से बतलाने का प्रयास किया है.

    इसके बावजूद वे कुछ ख़ास अर्थों में भयानक रूप से ब्राह्मणवादी हैं और उनका इस तरह का ब्राह्मणवाद किसी जाहिर और घोषित रूप से काम करने वाले ब्राह्मणवाद से अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह प्रगतिशील और क्रांतिकारी चर्चाओं के पीछे छिपकर काम करता है. न केवल सिद्धांत में ऐसा है बल्कि यह जमीनी तौर पर उनके विशाल शिष्य समुदाय में उनकी दिनचर्या और उनकी दार्शनिक, धार्मिक, रहस्यवादी और सामाजिक मान्यताओं में साफ़ देखा जा सकता है. यह बात जटिल है इसलिए इसे बिन्दुवार समझना औचित होगा:

    १. भगवान रजनीश घोषित रूप से स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में हैं और स्त्री को वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि लैंगिक आजादी देने के भी पक्ष में हैं. लेकिन यह बात उनकी मुख्या प्रस्तावना में शामिल नहीं है. जिस रहस्यवाद या धर्म दर्शन को वे प्रचारित कर रहे हैं और जिस वेदान्तिक ढाँचे के आधार पर वे पुनर्जन्म और मोक्ष की धारणा का प्रचार कर रहे हैं वह ढांचा और वे धारणाएं ऐतिहासिक रूप से पुरुष सत्ता और पितृ-सत्ता को ही मदद करती आई हैं.

    उदाहरण के लिए वे गीता की व्याख्या करते हुए कृष्ण द्वारा दिए गए वक्तव्य को दोहराते हैं “स्त्रीयों में मैं कीर्ति हूँ” इस कीर्ति की व्याख्या करते हुए वे इसे एक विशिष्ठ गुण बताते हैं और इसे संवेदनशीलता और स्त्रैणता से जोड़ते हैं जो स्त्री को एक ख़ास तरह के ढाँचे में जकड़कर देखने जैसा है. यह मान लिया गया है कि स्त्री स्त्रैण ही होगी, नाजुक और संवेदनशील होना ही उसका आत्यंतिक गुण है. इस तरह की चर्चाओं का समाज पर जो प्रभाव है और रुढ़िवादी हिन्दू समाज इसे जिस भाँती स्वीकार करता है उसे अब ध्यान से देखिये. वह समाज जब स्त्री पुरुष की समानता और स्त्री अधिकारों की बातों के साथ साथ कीर्ति की इस तरह की व्याख्या सुनता है तब असल में उसकी स्मृति में क्या गहराई से रजिस्टर होता है? निश्चित ही उसके मन में आर्थिक या लैंगिक आजादी की प्रस्तावना की बजाय कीर्ति की व्याख्या ही अधिक गहराई से अंकित होगी. लेकिन जब लोग कीर्ति की व्याख्या से प्रभावित होकर भगवान् रजनीश का गुणगान करेंगे तब कई लोग गलती से यह मान लेंगे कि यह गुणगान उस व्यक्ति का है जिसने स्त्री की परिपूर्ण स्वतंत्रता की प्रस्तावना दी है.

    २. इसी तरह जब वे अंबेडकर की प्रशंसा करते हुए दलितों आदिवासियों या शूद्रों (ओबीसी) के अधिकारों को समर्थन दे रहे हैं तब वे बहुत क्रांतिकारी नजर आते हैं लेकिन असल में विचार की दृष्टि से क्रांतिकारी बनते हुए भी वे सामाजिक सस्थाओं के सन्दर्भ में जब वर्ण व्यवस्था पर टिप्पणी करते हैं तो वे वर्ण व्यवस्था के “क्रियात्मक तर्क (फंक्शनल लोजिक) का पूरी तरह समर्थन करते हैं और इसे कार्य विभाजन की ही एक पद्धति बताकर महिमामंडित करते हैं. गीता की व्याख्या करते हुए वे कृष्ण द्वारा चार वर्णों के सृजन को इसी तर्क से समझाते और वैध ठहराते हैं. इसके बाद भी उनके बाद के प्रवचनों में वे जोर देकर कहते हैं कि पैदा तो सभी शुद्र होते हैं कोई कोई अपने पुरुषार्थ से ब्राह्मण बन पाता है. इस बिंदु को सावधानी से समझना होगा. जब वे इस प्रकार का वक्तव्य दे रहे हैं तो असल में वे वर्ण व्यवस्था को मान्यता दे रहे हैं भले ही वे इसे जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर वैध ठहरा रहे हैं लेकिन अंततः तो वे इसे स्वीकृति दे ही रहे हैं और यह भी जतला रहे हैं कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और शुद्र निकृष्ट है जिसे महान श्रम करके ब्राह्मणत्व अर्जित करना है.

    आश्चर्य इस बात का है कि ठीक यही तर्क ब्राह्मणवादी भी देते हैं वे भी कर्म और श्रम के विभाजन के आधार पर ही वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करते हैं और बड़ी आसानी से श्रमिकों के विभाजन के प्रश्न से बच निकलते हैं. श्रमिकों के विभाजन का प्रश्न अंबेडकर ने उठाया था और कहा था कि वर्ण या जाति व्यवस्था असल में श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है. यहाँ यह नोट करना होगा कि भगवान रजनीश बाद के वर्षों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था को सिरे से नकारते हुए इसे नष्ट कर देने की बात भी करते हैं और कई प्रवचनों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था के जहरीले परिणामों की चर्चा करते हुए इसे अमानवीय बताते हैं.

    इस विषय में भी यही प्रश्न खडा होता है, कि समाज, वर्ण और जाति व्यवस्था पर गौर करते हुए एक आम आदमी या एक आम रजनीशी के मन में कौनसी सलाह ज्यादा गहराई से अंकित हो रही है या काम कर रही है? वर्ण व्यवस्था को उखाड़ देने की सलाह या वर्ण व्यवस्था को कृष्ण द्वारा कार्य गुण कर्म के अनुसार मानव का वर्गीकरण करने की सलाह? हम पाते हैं कि भगवान् रजनीश और कृष्ण की महिमा से प्रभावित एक आम भारतीय या रजनीशी असल में कृष्ण का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित है अंबेडकर का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित नहीं है. इस बात का परीक्षण करने के लिए किसी भी आम रजनीशी या अध्यात्मिक रुझान रखने वाले आम भारतीय हिन्दू से बात की जा सकती है.

    ३. ध्यान और समाधि सहित मोक्ष के मुद्दों पर भी भगवान् रजनीश की प्रस्तावनाएँ एकदम पारम्परिक हैं. उनमे जिन प्रयोगों का उल्लेख है और जिन नवाचारों का उल्लेख है वे बहुत नए नहीं हैं. हाँ यह अवश्य है कि वे आम जन के प्रचलन से बाहर हो गये थे और केवल मठों और आश्रमों तक सीमित हो गए थे. न केवल वे प्रयोग बल्कि उनकी सांगत व्याख्याएं भी पहले से मौजूद थीं जिनका सरलीकरण और प्रचार भगवान रजनीश ने बहुत प्रभावशाली ढंग से किया. लेकिन यहाँ एक गहरी बात जो नोट करनी आवश्यक है वो ये कि इन ध्यान विधियों और इनसे जुड़े जिस मनोविज्ञान का वे प्रचार करते रहे उसकी दार्शनिक प्रष्ठभूमि क्या है? कोई भी आसानी से देख सकता है कि इस प्रष्ठभूमि में आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्म का विस्तारित सिद्धांत, गुरु शिष्य परम्परा और कृपा या शक्तिपात आदि की पुरातन मान्यताएं हैं. ये मान्यताएं असल में ब्राह्मणवादी या वेदान्तिक मान्यताएं हैं दुर्भाग्य से इन्ही पर भारत में शोषण और दमन सहित अंधविश्वास और भाग्यवाद का पूरा भवन खडा है. ऐसे में इस मूलभूत ब्राह्मणवादी रहस्यवाद या धर्म दर्शन को प्रचारित करके वे ब्राह्मणवादी शोषण के तन्त्र को ही लाभ पहुंचा रहे हैं.

    हालाँकि वे बुद्ध या महावीर की प्रशंसा करते हुए परमात्मा या आत्मा तक को नकार देते हैं लेकिन वह उनकी मूल शिक्षा नहीं है. न ही उस शिक्षा ने उनके पूरे शिष्य समुदाय का निर्माण किया है. आज भी अगर उनके शिष्यों से यह पूछा जाए कि आत्मा और परमात्मा सहित पुनर्जन्म पर उनके क्या विचार हैं तो वे इन तीनों को स्वीकार करते हैं और पुनर्जन्म के स्मरण सहित पाप पुण्य के अगले या पिछले जन्म पर प्रभाव को भी मान्यता देते हैं. वे शून्य या अनत्ता पर आधारित ध्यान या निर्वाण की चर्चा नहीं करते हैं.

    इसके दो कारण हैं एक तो ये कि भगवान रजनीश सहित ओशो ने ही कभी भी शुन्य या अनत्ता की अलग से व्याख्या नहीं की है और न ही अनत्ता के आधार पर जन्म मरण या निर्वाण को समझाया है. दुसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण ये है कि भगवान रजनीश के अधिकाँश शिष्य वे हैं जो उनके द्वारा आत्मा और पुनर्जन्म आधारित ब्राह्मणी या वेदान्तिक रहस्यवाद से प्रभावित होकर उनके निकट आये हैं. अभी भी उनके प्रमुख शिष्य जिस तरह का संन्यास देते हैं और जिस तरह से साधना सिद्धि और निर्वाण की बात करते हैं वह आवागमन के चक्र से मुक्त होने की धारणा पर ही आधारित है.

    इसमें एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि भगवान् रजनीश और उनका परवर्ती अवतार ओशो, दोनों ही बारम्बार यह दोहराते हैं कि अनत्ता और आत्मा एक ही हैं और एक ही सत्य के दो नाम हैं. वे शून्य और पूर्ण को भी एक ही निरुपित करते हैं और इसे एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ बताते हैं. साथ ही यह भी बतलाते हैं कि बुद्ध ने अव्याख्य की व्याख्या न करके जो निर्णय लिया था वह महान निर्णय था और यह मानते हैं कि जिस चीज की व्याख्या संभव न हो उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए. इस सन्दर्भ में वे लुडविनविटगिस्टीन का प्रसिद्द वक्तव्य भी दोहराते हैं कि जिस बात को समझाया न जा सके उसे उठाया ही नहीं जाना चाहिए.

    इस सन्दर्भ में अगर हम विचार करें कि उनका वृहत्तर शिष्य समुदाय किस बात से प्रभावित होकर उनके पास आ रहा है? क्या पूर्ण को शुन्य मानकर आ रहा है? या शुन्य को पूर्ण में अनुवाद करके उनके पास आ रहा है? भगवान रजनीश में एक प्रश्न के उत्तर में बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती कहा था यह वक्तव्य उन्होंने आदि शंकर पर उठाये गए एक प्रश्न के उत्तर में दिया था जिसमे रामानुज द्वारा शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध निरुपित करने का उल्लेख किया गया था. अब ध्यान से देखना होगा कि उनका शिष्य समुदाय वास्तव में शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध मान रहा है या बुद्ध को प्रछन्न वेदांती मान रहा है? ठीक से देखें तो पता चलता है कि यहाँ बुद्ध का ही वेदान्तीकरण या ब्राह्मणीकरण हो रहा है न कि शंकराचार्य का बौद्धिकरण.

    ४. अध्यात्म, साधना और मुक्ति के प्रश्न पर भी भगवान् रजनीश की जो प्रस्तावनाएँ सर्वाधिक प्रचलित हैं वे गुरु शिष्य परम्परा और समर्पण, शरणागति पर आधारित हैं. तर्क, दुस्साहस, खतरे में जीना और अप्प दीपो भव् की बुद्ध की प्रस्तावना का वे जब तब समर्थन अवश्य करते हैं लेकिन यह उनकी मूल शिक्षा नहीं है. उनकी मूल शिक्षा, जिससे कि उनका अधिकतम शिष्य समुदाय प्रभावित है वह गुरु पर निर्भरता और सतत मार्गदर्शन देने वाले माडल पर आधारित है. बौद्ध अर्थ की अप्प दीपो भव वाली क्षण क्षण जागरूकता वाली शैली – जो कि ओशो के समकालीन कृष्णमूर्ति द्वारा सर्वाधिक प्रचारित की गयी – वह भगवन रजनीश या ओशो की मूल शिक्षा नहीं है.

    क्षणवाद और निर्विकल्प जागरूकता पर आधारित यह शैली या विधि (हालाँकि इसे विधि कहना पूरी तरह ठीक नहीं) पुनर्जन्म और आत्मा के नकार पर ही खड़ी है. इसकी मूल मान्यता यह है कि शरीर और मन सहित आत्मा (व्यक्तित्व या स्व) असल में प्रकृति और समाज के द्वारा दिए गए हैं और कोई आत्यंतिक व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती जो कि एक से दुसरे शरीर या जन्म में प्रवेश करती हो. न तो मैं और मेरे की तरह कोई शरीर है न स्व या व्यक्तित्व या आत्मा है. जो सत्ता स्व या आत्मा की तरह भासती है असल में वह एक झूठा आभास भर है जो शरीर, और समाज द्वारा दिए गए तात्कालिक व्यक्तित्व या मन के गठजोड़ द्वारा निर्मित होती है. शरीर की मृत्यु के बाद शरीर और मन के ये टुकड़े बिखर जाते हैं और अन्य शरीरों और मनों के निर्माण में उपयोग कर लिए जाते हैं. इस तरह वहां आत्मा या स्व जैसा कुछ नहीं है. बुद्ध के अनुसार इसी को अपने अनुभव से जान लेना निर्वाण या मुक्ति है.

    लेकिन भगवान् रजनीश और ओशो भी जिस ढंग से मोक्ष की व्याख्या करते रहे हैं वह ढंग सनातन आत्मा और परमात्मा को मान्यता देता है और इस आत्मा का परमात्मा में विलीन होना ही मोक्ष निरूपित किया गया है. अब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा सनातन अर्थात अजर अमर है (गीता के अनुसार) तो वह परमात्मा में विलीन होकर भी बनी रहेगी. अर्थात वह पूर्ण रूप से विलीन होकर खो नहीं रही है बल्कि अपना सत्व या अपनी अस्मिता बचाए रख रही है. अगर कहें कि वह पूर्णतया विलीन हो जाती है या खो जाती है तो फिर अजर अमर या सनातन नहीं रही. इस प्रकार आत्मा की अमरता और मोक्ष दो विरोधी सिद्धांत हुए जिनमे से कोई एक ही सत्य हो सकता है. लकिन वेदांती रहस्यवाद या ब्राह्मणवाद इन्हें एकसाथ इस्तेमाल करता है. जबकि बुद्ध इसमें परमात्मा और आत्मा दोनों को निरस्त करके निर्वाण को बहुत तर्कसंगत और सबके लिए संभव बना देते हैं. बुद्ध के अनुसार “हमारा” कोई शरीर नहीं है और “हमारा” कोई मन/व्यक्तित्व/आत्मा नहीं है बल्कि शरीर भी चार भूतों का उत्पाद है और मन भी स्मृतियों, कल्पनाओं, विचारों, संस्कारों और वासनाओं का समुच्चय है.

    ये चार भूत अर्थात पदार्थ और ये संस्कार वासनाएं अर्थात मन ये सब बाहर से आता है अन्य व्यक्तियों, प्राणियों और वनस्पतियों से यह पदार्थ आते हैं और समाज, शिक्षा, परिवार से ये विचार आते हैं इसलिए शरीर सहित मन या व्यक्तित्व भी “मेरा” या “हमारा” नहीं है बल्कि समष्टि का है और उसी में खो जाता है. जो व्यक्ति आज नजर आ रहा है वह समय में पहली और अंतिम बार जन्मा है. उसका शरीर और उसका मन मर जाने के बाद उसके शरीर के भूतों का और उसके मन के संस्कारों का सौ प्रतिशत हिस्से का दुबारा एकसाथ किसी नए गर्भ में प्रवेश कर जाना लगभग असंभव है इसलिए नया व्यक्ति इस मरे हुए व्यक्ति के शरीर या मन के अंशों को धारण करते हुए भी पूरी तरह वो पुराना व्यक्ति नहीं है. इस प्रकार कोई पुनर्जन्म नहीं होता बल्कि हर जन्म एक नए व्यक्ति का जन्म होता है.

    अनत्ता को इस तरह “शरीर और मन दोनों ही मेरा नहीं है” और मैं और मेरा जैसी भी कोई सत्ता नहीं है के रूप में जान लेना ही निर्वाण कहा गया है. हालाँकि वेदान्त और ब्राह्मणवादी रहस्यवाद भी मुक्ति को मैं और मेरे से मुक्ति के अर्थ में ही देखते हैं लेकिन वे एक भयानक विरोधाभास का निवारण नहीं कर पाते. वो विरोधाभास यह है कि अगर आत्मा अमर है तो मोक्ष में विलीन कैसे हो जा सकती है या खो कैसे सकती है? और अगर मोक्ष ही अंतिम सत्य है या आत्मा व शरीर के अल्पकालिक अस्तित्व की तुलना में वही सर्वकालिक या सनातन सच्चाई है तो आत्मा शरीर की तरह एक क्षणिक सत्ता हुई. इस बिंदु पर आते ही हम बुद्ध के दर्शन में प्रवेश कर जाते हैं. अर्थात अनंत मोक्ष के सामने आत्मा क्षणिक ही साबित होती है. यही बुद्ध का सिद्धांत है, आत्मा या स्व असल में एक क्षणिक आभास मात्र है.

    अब इतने विस्तार में जाने के बाद हम यह देखेंगे कि एक आम रजनीशी या ओशो का सन्यासी आत्मा सहित मोक्ष को किस रूप में देखता है? अनुभव बताता है कि ओशो या भगवान रजनीश का एक आम सन्यासी भारत के एक आम धार्मिक हिन्दू की भांति आत्मा की अमरता को मानता है और परमात्मा से मिलन के अर्थ में ही योग और मोक्ष को स्वीकार करता है. इस प्रकार पुनः यह सिद्ध होता है कि भगवान् रजनीश या ओशो के शिष्य असल में बुद्ध के बताये अनत्ता और निर्वाण की प्रशंसा सुनकर ओशो या रजनीश के सन्यासी नहीं हुए हैं बल्कि वे वेदांती और ब्राह्मणवादी आत्मा और मोक्ष के सिद्धांत से प्रभावित होकर रजनीश या ओशो के निकट आये हैं.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • ब्लू व्हेल

    ब्लू व्हेल

    Kumar Vikram

    ब्लू व्हेल किसी भी चिड़िया का नाम हो सकता है
    अंधभक्तों की टोली का सरताज किसी बाबा का नाम
    अथवा इतिहास को सर के बल खड़ा करने को आमादा लोगों को अपने वोटपाश में बाँधे किसी नेता का नाम

    ग़रीब किसानों के लिए वह हो सकता है
    बैंकों दलालों सरकारी नीतियों मानसून की
    रहस्यमय मिलीभगत का नाम
    जो स्वचालित वीडियो गेम की तरह
    उन्हें ऋण लेने को
    और अंतत: आत्महत्या के लिए उकसाते रहते हैं 

    शास्त्रों में तो जीवन की परिकल्पना ही
    शायद ब्लू व्हेल का ही दूसरा नाम है
    जहाँ अनेक तरह के पूर्व निर्धारित क़र्ज़
    मनुष्य को ग्लानि और कुंठा से भर देते हैं
    जिनसे बचकर निकलने के सारे दरवाज़े
    पहले से ही बंद कर दिए गए होते हैं

    और फिर अपने घातक मोहपाश में बँधे शमां परवानों पर 
    अनगिनत शेर नज़्म ग़ज़ल
    लिखने वालों को ब्लू व्हेल के बारे में नया क्या बताना
    कुछ पूछना है तो उनसे कुछ डर डर कर
    और कुछ हिचकिचाते हुए पूछो 

    जो अपना सर्वस्व
    बाढ़ दंगों भूकंप नरसंहार बीमारी युद्ध दुर्घटनाओं में
    गँवाकर कर भी
    नई सुबह के इंतज़ार में
    आकाश की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं

    कि आख़िर किस आंतरिक साहस से वे
    ब्लू व्हेल की अवधारणा को ख़ारिज करते हैं
    या तुम्हारी ही तरह वे भी किसी दुशचक्र में ही फँसे हैं
    जिसे तुम्हारी रूमानियत मानने को मना करती है


    * ब्लू व्हेल एक समकालीन इन्टरनेट गेम है जिसके अदृश्य ‘एडमिन’ उसे खेलने वाले को एक तरह से मनोवैज्ञानिक रूप सेनियंत्रित कर आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इस गेम के कारण पूरी दुनिया (और भारत) में कई युवा अपनी जान गँवाचुके हैं और कई जगहों पर इसपर प्रतिबंध लग चुका है।

    Kumar Vikram


  • हमें भारत मे छुआछूत, दंगा और बाबा म्यूजियम चाहिए –Sanjay Jothe

    हमें भारत मे छुआछूत, दंगा और बाबा म्यूजियम चाहिए –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जर्मनी और रवांडा जैसे कुछ अफ्रीकी देशों में कई सारे होलोकॉस्ट म्यूजियम हैं स्कूल कॉलेज के बच्चों को वहां दिखाया जाता है कि हिटलर के दौर में या हुतु तुत्सी जातीय हिंसा के दौर में किस नँगाई का नाच हुआ था, कैसे पढ़े लिखे समझदार लोग जानवर बन गए थे और एकदूसरे की खाल नोचने लगे थे। 

    मरे हुए लोगों को खोपड़ियां, कंकाल, जूते, कपड़े, उनके बर्तन, फर्नीचर इत्यादि सब सजाकर रखे गए हैं ताकि अगली पीढ़ी देख सके कि वहशीपन क्या होता है और धार्मिक नस्लीय जातीय हिंसा से क्या क्या संभव है।

    भारत मे भी हर जिले में भी ऐसा ही कम से कम एक “दंगा, छुआछूत और बाबा म्यूजियम” होना चाहिए जिसमें उस इलाके में हुए धार्मिक जातीय दंगों का विवरण और फोटो इत्यादि रखे गए हों। छुआछूत के आधार पर उस इलाके के पाखण्डी सवर्ण द्विजों ने सालों साल तक कैसे अपनी ही स्त्रियों और दलितों, यादवों, अहीरों, कुर्मियों, कुम्हारों, किसानों, मजदूरों, शिल्पियों को जानवर सी जिंदगी में कैद रखा, कैसे मूर्ख बनाकर गरीबों की जमीनों और औरतों को लूटा – ये सब बताया जाना चाहिए।

    कैसे यज्ञ हवन और पूजा पाठ करने वालों, ज्योतिषियों, गुणियों कान फूंकने वाले ओझाओं ने औरतों और शूद्रों दलितों को शिक्षा और रोजगार सहित पोष्टिक भोजन और जीवन के अधिकार से वंचित रखा ये दिखाया जाना चाहिए।

    कितने बाबाजन, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और धर्मगुरुओं ने कितने बलात्कार किये, कितने मर्डर किये, कितनी जमीने दबाई कब कोर्ट ने उन्हें दबोचा, वे कितने साल जेल में रहे – ये सब विस्तार से बताना चाहिए।

    अगली पीढ़ी अगर इन सब मूर्खताओं को करीब से देख समझ ले तो उसे कावड़ यात्रा, कार सेवा, देवी देवता के पंडालों, धार्मिक दंगों, बाबाओ के बलात्कार और जातीय धार्मिक दंगों सहित छुआछूत भेदभाव और अंधविश्वास से बचाया जा सकता है। 

    लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि ये सब बताने की बजाय भारतीय परिवार अपने बच्चों को अपने मूर्ख पारिवारिक गुरुओं, देवी देवताओं के पंडालों और आत्मा परमात्मा की बकवास सिखाने वाले शास्त्रों की गुलामी सिखाते हैं। हर पीढ़ी बार बार उसी अंध्विश्वास, छुआछूत और कायरता में फंसती जाती है। 

    भारत मे व्यक्ति और समाज की चेतना का एक सीधी दिशा में रेखीय क्रमविकास नहीं होता बल्कि यहां सब कुछ गोलाई में घूम फिरकर वहीं का वहीं पुराने दलदली गड्ढे में वापस आ जाता है। इसीलिए ये मुल्क और इसकी सभ्यता कभी आगे बढ़ ही नहीं पाती, हर पीढ़ी उन्हीं बीमारियों में बार बार फसती है जिन्हें यूरोप अमेरिका के समाज पीछे छोड़ चुके हैं।

    भारत के धर्म और सँस्कृति को इतना सक्षम तो होना ही चाहिए कि अपने लिए नए समाधान न सही कम से कम नई समस्याएं ही पैदा कर ले। बार बार उन्हीं गड्ढों में गिरना भी कोई बात हुई? 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

    निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

    हर साल बाढ़ से बेघर हुए
    लाखों लोग
    राहत शिविरों में पैदा होते बच्चे 
    हेलिकॉप्टर से फेंके गए खाने के पैकेट
    को धक्का मुक्की कर लूटने को अभिशप्त
    बच्चे जवान और बूढ़े
    ज़िला अस्पताल के गलियारों में
    अधमरे सोए कातर निगाहों से टहलते कुत्तों को देखते
    मरीज़ और उनके अस्वस्थ परिचारक
    भावी इतिहास हमारा है
    जैसे नारों से दूर बहुत दूर
    अनिश्चित वर्तमान में डूबे हुए
    पूरी तरह सार्वजनिक है उनकी निजता
    और उनका स्वाभिमान दुख व दर्द
    उनके लिए निजता पर
    महान अदालत का महान निर्णय
    कुछ नहीं बस
    एक मध्यवर्गीय परिकल्पना है
    खाए-अघाए प्राणियों की आख़िरी कल्पना है
    जिसपर अपने घर के दरवाज़े बंद कर
    महफ़ूज़ होकर सोने वाले
    खुलकर सार्वजनिक बहस करते हैं
     

    Kumar Vikram
     
  • भारत और जापान का सभ्यता बोध –Sanjay Jothe

    भारत और जापान का सभ्यता बोध –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जापानी टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था की बात अक्सर ही की जाती है। जो सवर्ण द्विज हिन्दू जापान यूरोप अमेरिका आदि आते जाते हैं वे बड़ी होशियारी से वहां के समाज और सभ्यता की विशेषताओं को छिपाते हुए वहां की तकनीक विज्ञान मौसम भोजन आदि की बातें करते पाए जाते हैं. बहुत हुआ तो वे वहां के सेक्स संबंधी खुलेपन और शराब पीने के व्यवहार या परिवार के टूटने और बड़ों और बच्चों में पैदा हुए जेनेरेशन गैप की बात करते हैं. लेकिन वे पूरी सावधानी बरतते हैं कि अमेरिका यूरोप जापान आदि विकसित और सभ्य देशों की सामाजिक संस्कृति वहां के मानवता बोध, सभ्यता बोध आदि का कोई उल्लेख न हो. उन्हें पता है की अगर वे ऐसी बातें करेंगे तो अपने खुद के समाज, देश और धर्म की जहालत की पोल खुल जायेगी.

    अगर भारतीय जनता सभ्य देशों के सामाजिक व्यवहार और अनुशासन सहित वहां की मानव गरिमा के बारे में सुनेगी तो एक बार जरुर पूछेगी की जिस देशों को भौतिकवादी कहकर गाली दी जाती है उनकी सभ्यता इतनी विक्सित है तो धर्मप्राण कहलाने वाले भारत में क्या समस्या है? यहाँ छुआछूत भेदभाव जातीय हिंसा और इतनी अनैतिकता भ्रष्टाचार आदि क्यों है?

    हमारी मित्र “सम्यक संकल्प” ने अपने जापान दौरे के अनुभव को विस्तार से लिखा है. मैं हूबहू उनका लेखन यहाँ दे रहा हूँ. आप देख सकते हैं की जो समाज विज्ञान तकनीक या आर्थिक आयाम में सशक्त हुए हैं उनकी सभ्यता और सामाजिकता बोध, नैतिकता बोध ने भी काफी विकास किया है. वे समाज पहले सभ्य बने हैं उसके बाद तकनीकी या आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं. भारतीय धर्म-धूर्त और सवर्ण द्विज पाखंडी हमेशा ये समझाते हैं की भारत का धर्म और नैतिकता सबसे ऊँची है, उसे वहीं का वहीं बनाये रखते हुए इन्हें साइंस और टेक्नोलोजी का विकास करना है. ठीक यही तर्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान सहित अन्य इस्लामिक मुल्कों में दिया गया है. नतीजा साफ़ है. ये मुल्क न तो विज्ञान तकनीक सीख पाए न ही इंसानियत सीख पाए. मोबाइल से लेकर मिसाइल तक और लोकतंत्र से लेकर प्रबंधन तक हर एक चीज यूरोप अमेरिका जापान जैसे सभ्य समाजों से उधार ले रहे हैं.

    नीचे जापानी समाज की एक ख़ास विशेषता पर हमारी मित्र “सम्यक संकल्प” ने विस्तार से लिखा है  जापानी समाज में गर्भवती स्त्री के संबंध में वहां का सभ्य समाज और सरकारी तन्त्र कैसे काम करता है इसे गौर से पढ़ें और सोचें कि भारत इस मुद्दे पर कहाँ ठहरता है. इसी से तुलना कीजिये कि भारत का धर्म, संस्कृति और सभ्यता बोध की क्या हालत है.

    “गर्भवती होते ही माता को इसकी सूचना अपनी नगरपालिका या वार्ड कार्यालय को देनी होती है और उसे माता और शिशु की देखभाल संबंधी निर्देश पुस्तिका दी जाती है। इसमें सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का विवरण होता है। इसमें गर्भवती महिला की प्रत्येक जाँच का विवरण भी अंकित किया जाता है।

    शिशु के जन्म के बाद के उसके पालन-पोषण के लिए अलग से अनुदानों का प्रावधान है। यदि परिवार में चार सदस्य हों और उनकी कुल वार्षिक आय 2396000 येन (लगभग १२ लाख रुपये) से कम हो तो शिशु के तीन वर्ष का होने तक, पहले और दूसरे शिशु के लिए 5 हजार येन प्रतिमाह और तीसरे बच्चे के लिए 10 हजार येन प्रतिमाह अनुदान दिया जाता है। यदि परिवार की आय इससे अधिक हो और माता या पिता में से कोई भी राज्य या व्यावसायिक प्रतिष्ठान का कर्मी हो और उसकी वार्षिक आय 4178000येन(बीस लाख रुपये) से कम हो तो उसे राज्य सरकार या प्रतिष्ठान द्वारा अलग से इतना ही पालनपोषण भत्ता अनुमन्य है।

    पिता की मृत्यु अथवा माता का विवाह-विच्छेद होने पर, बच्चे के लिए अठारह साल की अवस्था तक और विकलांगता की स्थिति में बीस वर्ष की अवस्था तक प्रतिमास पूर्ण भत्ता 41390 येन और आंशिक भत्ता 27690 येन अनुमन्य है। दूसरे बच्चे के लिए 5000 येन और तीसरे बच्चे के लिए 3000 प्रति येन अलग से दिया जाता है।

    यदि बच्चा विकलांग हो, और परिवार की कुल आय 7410000 येन से कम हो तो अधिक विकलांगता की स्थिति में 50350 येन, और कम विकलांगता की स्थिति में 33530 येन प्रतिमास अनुदान अनुमन्य है। यदि परिपालक पिता न होकर अभिभावक हो और उसकी कुल वार्षिक आय 9041000 येन से कम हो और परिवार में 6 सदस्य हों तो उसे भी यह अनुदान अनुमन्य है।

    घर आकर नवजात शिशुओं की जाँच करने के लिए अलग से नर्सों की नियुक्ति की गयी है। प्रत्येक मुहल्ले में एक स्वयंसेवी शिशु आयुक्त नियुक्त है जो गर्भवती माताओं और शिशुओं के बारे में जानकारी लेता रहता है और उन्हें आवश्यक निर्देश देता है। यही नहीं जिनके माता पिता देर से घर लौटते हैं उनके लिए स्कूलों में अलग से मनोरंजन, क्रीड़ा और जलपान की व्यवस्था है।

    जापान में गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सुविधाएँ हैं। प्रत्येक महिला को प्रसव से पूर्व आवश्यक जाँच हेतु अस्पताल आने-जाने के लिए तीस हजार येन (१५ हजार रुपये) के कूपन, प्रसव में अस्पताल के परिव्यय के लिए 6लाख येन (तीन लाख रुपये ) तथा शिशु के जन्म के बाद उसके वस्त्रादि के लिए पुनः तीस हजार येन के कूपन दिये जाते हैं।

    यही नहीं, यदि माता-पिता अल्प-आय वर्ग चौबीस लाख येन ( बारह लाख रुपये) प्रति वर्ष से कम आय वर्ग के हों तो शिशु के वस्त्रादि के लिए प्रतिमास अलग से अनुदान दिया जाता है। जन्म के दो सप्ताह बाद शिशु के स्वास्थ्य की जाँच के लिए अस्पताल से एक नर्स घर आती है। दस वर्ष की अवस्था का होने तक सभी बच्चों की चिकित्सकीय जाँच और औषधियाँ की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाती है। इसमें माता-पिता की राष्ट्रीयता पर विचार नहीं किया जाता।

    वस्तुतः जापान के संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रत्येक नागरिक को रहन-सहन के न्यूनतम स्तर की गारंटी दी गयी है। इस अनुच्छेद के अधीन माता और शिशु के कल्याण के लिए अनेक प्राविधान किये गये हैं। इन प्राविधानों के मूल में जनसंख्या के अनवरत ह्रास को रोकने के साथ-साथ एक स्वस्थ समाज के निर्माण का संकल्प भी है। जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय की सूचनाओं के अनुसार जापान में 1960 में बाल-मृत्यु दर 30.7 और जन्मना मृत शिशुओं की दर 17 प्रति हजार थी। यह 1994 में घट कर क्रमशः 4.2 और 2.3 प्रति हजार हो गयी। इसमें जापान सरकार की स्वास्थ्य-नीति के निम्नलिखित प्रावधानों का महत्वपूर्ण योगदान है।

    यदि कोई शिशु जन्म के समय 2.5 कि.ग्रा. से कम हो अथवा समय से पहले पैदा तो ऐसे बच्चों की नियमित जाँच के लिए बुलाने पर नर्स की सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध हैं। इसके अलावा माता और शिशु के लिए अलग से चिकित्सा भत्ता दिया जाता है। विकलांग अथवा क्षयग्रस्त बच्चों के लिए विशेष सुविधाएं और गर्भवती माताओं की चिकित्सकीय जांच आदि के लिए विशेष अनुदान दिया जाता है”

    [themify_box]

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

    [/themify_box]

     

  • विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है –Sanjay Jothe

    विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग मेडिसिन मैनेजमेंट आदि पर अधिक जोर देकर और ह्यूमेनिटीज, सोशल साइंस को कुचलकर असल मे वर्ण व्यवस्था को वापस लाया जा रहा है।

    वर्ण व्यवस्था को ज्ञान के कुप्रबंधन या ज्ञान की हत्या के अर्थ में देखिये। समाज की बुद्धि और चेतना को नियंत्रित करने वाला जो आयाम है वो धर्म, सँस्कृति, इतिहास, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि है।

    समाज विज्ञान विषयों की चेतना से युक्त या इससे वंचित समाज को जीते रहने के लिए जो तकनीकी या प्रबंधकीय ज्ञान चाहिए उतना वे कहीं से भी उधार ले आते हैं। इस तरह युध्द, सैन्य, व्यापार, टेक्नोलॉजी, चिकित्सा, प्रबंधन आदि को दूसरे देशों से आयात करने में किसी को कोई खतरा नहीं। इसमें कोई शर्म की बात भी नहीं है।

    यही भारत ने अपने ज्ञात इतिहास में किया है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ने दैनिक जीवन की तकनीकी और प्रबंधन संबन्धी विशेषज्ञताओं को विकसित किया है या कहीं से उधार लिया है। लेकिन समाज को सभ्यता, सँस्कृति, नैतिकता और इंसानियत की तरफ आगे बढ़ाने के लिए जो सबसे जरूरी आयाम था उस पर अन्धविश्वासी और धर्म-धूर्त ब्राह्मणों ने कब्जा कर रखा है। उन्होंने इस ज्ञान को अपने स्वार्थ के कारण विकसित ही नहीं होने दिया. वैज्ञानिक चिन्तन, आलोचनात्मक चिंतन और भौतिकवादी इतिहास दृष्टि को उन्होंने बार बार कुचला और बर्बाद किया है।

    यहाँ तक कि भारत के निचले तीन वर्णों की तकनीकी या प्रबंधकीय कुशलता का स्वयं उन्हें या देश को कोई लाभ नहीं मिल सका है। व्यापक रूप से गरीबी, कायरता, आलस्य, बेरोजगारी और गुलामी हमेशा बनी रही है। भारत ज्ञात दो हजार साल में युद्ध, ज्ञान विज्ञान, सभ्यता, नैतिकता आदि के मुद्दों पर निरन्तर पिछड़ता और हारता ही रहा है।

    इसका एक ही कारण है। वो है “तकनीकी और प्रबंधकीय ज्ञान से कहीं ऊंचे और महत्वपूर्ण सामाजिक दार्शनिक ज्ञान पर ब्राह्मणों का कब्जा”।

    अगर धर्म, दर्शन, इतिहास, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि के ज्ञान पर किन्ही विशेष लोगों का कब्जा है तो वे आपकी तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रबंधकीय, चिकित्सीय, गणितीय, सैन्य आदि सब तरह की क्षमताओं का इस्तेमाल अन्धविश्वास को बढाने में और दंगा फैलाने में करते रहेंगे।

    यही भारत का इतिहास रहा है। अभी भी आपकी आंखों के सामने यही दोहराया जा रहा है।

    क्षत्रिय की सैन्य कुशलता और वैश्य या शूद्र की प्रबंधकीय कुशलता आपस में मिलकर भी इस देश को भुखमरी और गुलामी से नहीं बचा सकी। क्योंकि देश, समाज को दिशा देने वाली सांस्कृतिक, दार्शनिक, वैचारिक बहस का नियंत्रण इनके हाथ मे नहीं बल्कि ब्राह्मणों के हाथ मे था। आज अभी अगर आप बहुजनों, दलितों, स्त्रियों, गरीबों, मजदूरों के हक में विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, सैन्य, चिकित्सा आदि का लाभ सुनिश्चित करना चाहते हैं तो आपको ह्यूमेनिटीज यानी सामाजिक विज्ञानों का नियंत्रण अपने हाथ मे लेना होगा।

    भारत के बहुजनों, दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और स्त्रियों को सामाजिक विज्ञानों, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि को अपने हक में मोड़ना सीखना होगा। इन विषयों पर अधिकार निर्मित करना होगा। जो कौम अपनी भाषा, इतिहास, दर्शन, साहित्य, समाज शास्त्र और सँस्कृति का विमर्श अपनी बुद्धि से आगे नहीं बढ़ा सकती वो विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, चिकित्सा आदि सीखकर भी भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरह गुलाम ही रहती है।

    भारत के बहुजनों को अपनी ऐतिहासिक पराजय और गुलामी को इस नजर से देखना चाहिए और ह्यूमेनिटीज या सामाजिक विज्ञान विषयों को गंभीरता से लेना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि बहुजन समाज से आने वाले लोग इन विषयों पर खूब लिखें, खूब पढ़ें और अपनी खुद की जरूरतों के हिसाब से नए नए विमर्श पैदा करें।

    विज्ञान या तकनीक खुद से कोई विमर्श पैदा नहीं करते बल्कि पहले से उपलब्ध सामाजिक राजनीतिक या दर्शनिक विमर्शों की सेवा करते हैं।

    जो सभ्य समाज आज विज्ञान, तकनीक प्रबंधन आदि के ज्ञान से लाभ उठा रहे हैं और एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ पा रहे हैं उन देशों समाजों को गौर से देखिये. उन्होंने पहले अपने समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा, इतिहास और दर्शन आदि के ज्ञान को दुरुस्त किया है. अपने समाज में मानविकी विषयों की बेहतर शोध और समझ को विकसित किया है इसीलिये वे विज्ञान तकनीक आदि को सही दिशा में इस्तेमाल कर पा रहे हैं।

    इसके विपरीत भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान सीरिया आदि देशों में जहां अपने सामाजिक विज्ञान अपने साहित्य इतिहास दर्शन आदि की समझ के विकास को रोका गया है वहां के समाज विज्ञान तकनीक आदि को अपनी ही जनसंख्या के हित के लिए इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. इस “उधार ली गयी” विज्ञान और तकनीक से वे अपनी समस्याओं को बढा रहे हैं कम नहीं कर रहे हैं।

    इसका सीधा मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनीक जिस तरह के मनोविज्ञान और सामाजिक, मानसिक प्रौढ़ता से पैदा होते हैं वैसा सामाजिक मनोविज्ञान और वैसी सामाजिक प्रौढ़ता पैदा किये बिना अगर किसी समाज को विज्ञान, तकनीक और प्रबन्धन आदि का ज्ञान उधार में मिल जाए तो वो उस ज्ञान से आत्मघात कर लेगा. यही भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों ने किया है।

    इस विषय में केन विल्बर्स नामक एक अमेरिकी दार्शनिक ने कहा है कि “तीसरी दुनिया के वे देश जिन्होंने अपनी जमीन पर सामाजिक मुक्ति की लड़ाई नहीं लड़ी है उन्हें अगर पश्चिमी टेक्नोलोजी सिखा दी जाए तो वे उसे सही दिशा में इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं”. किसी विज्ञान या तकनीक को कैसे और किस दिशा में इस्तेमाल करना है ये बुद्धि सामाजिक विज्ञानों की दर्शन, साहित्य,इतिहास आदि की समझ से आती है. और ये समझ भारत पाकिस्तान जैसे गरीब मुल्कों में पैदा ही नहीं हो पा रही है।

    विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है। अगर ये नियंत्रण बहुजनों के हाथ मे है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि भारत के पंचानवे प्रतिशत लोगों के हित में काम करेगा। अगर ये नियंत्रण भारत के बहुजनों के हाथ मे नहीं है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि की ये विशेषज्ञताएँ पांच प्रतिशत धर्मधूर्तों की सेवा करेंगी।

    भारत के बहुजन तय कर लें कि वे क्या चाहते हैं।

    [themify_box]

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

    [/themify_box]

     

  • सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

    सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

    Nishant Rana


    हमें अपने खांचे इतने पसंद है कि जो हमारे खांचों में फिट बैठता है बस वहीं भगवान का दूसरा रूप है जो हमारे खांचों से अलग है उसे केवल इसलिए गालियां देंगे की हमारे खांचे वाला ऊपर दिखाई दे।
    आजादी के समय सबका योगदान था भगत सिंह, आजाद , गांधी , अम्बेडकर , नेहरू , सुभाषचंद्र आदि आदि। इन सभी को आज खेमे में बांट दिया गया है अलग अलग खेमों द्वारा गरियाया ही जाता है प्रेमचंद, टैगोर आदि को भी नहीं बख्शा जाता केवल इसलिए कि वह सब आपकी पसंद के हिसाब से काम क्यों नही कर रहे थे, भले ही हम खुद तमाम मकड़ जालों में फंसे हो , एक निश्चित पैटर्न में जीवन जी रहे हो, अपने ही स्वार्थ, सुरक्षा , सुविधाओं के लिए जीवन बिता रहे हो और वह सब इसलिए जब कभी कभार हमारा अंतर्मन हमें धिक्कारता है तो हम तुरन्त अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे पर डाल देना चाहते है, अपना पल्ला दूसरों पर झाड़ लेने से खुद को जिम्मेदार ठहराने वाली ऊर्जा से कुछ समय के लिए मुक्ति या शांति तो मिल ही जाती है।

    चलते चलते –

    हर व्यक्ति के जीवन के अलग अलग घटना क्रम है , अलग अलग परिस्थितियां है, हर व्यतित्व का विकास अलग है, अलग अलग काम करने के तरीके है ,  अलग अलग क्षेत्रों में रुचि व प्रतिभा है। जिस व्यक्ति की जैसी समझ और तासीर बनती जाती है उसी के हिसाब से जीवन जीता है जो जिसे उचित लगता है उसी समझ से सामाजिक योगदान भी करता है। कोई नेतृत्व अच्छा करता है , कोई लिखता अच्छा है, किसी का सामाजिक चिंतन बहुत गहरा है किसी का वैज्ञानिक पक्ष मजबूत है। हां हर जीवन के असर, संदेश बहुत सीमित से लेकर बहुत व्यापक हो सकते।
    कोई व्यक्ति भगवान भी नहीं है, समय जीवन भी निश्चित ही है जिसकी जैसी समझ थी उसने अपना जीवन होम करके देश समाज के लिए काम किया। हम कब देखेंगे कि समाज एक व्यक्ति नहीं बनाता यह मिलजुल कर बनता है। हम कब खांचों से मुक्त होकर वाकई अपनी जिम्मेदारी समझेंगे कब इन लोगों को अलग अलग गरियाने के बजाय इनके सामूहिक नेतृत्व से सीख लेंगे।

    स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना के साथ बस इतना ही कि आजादी, लोकतंत्र कोई एक दिन या एक बार की विषय-वस्तु नहीं है। रोने की भी नहीं की है  यह प्रत्येक मनुष्य की जिमेदारी है की जितना हमारे पूर्वज हमारे लिए परिस्थितियां जितनी सुगम बना कर गए हम अगली पीढ़ियों को बेहतर लोकतांत्रिक मूल्य और समाज देकर जाए।