डा. शुजाअत हैदर जाफरी
उ.प्र. राज्य के जनपद झाँसी के ब्लॉक बड़ागाँव की आर बी एस के टीम द्वारा ग्राम लकारा के आंगनवाड़ी केन्द्र में स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान चिन्हित जन्मजात हृदय रोग से ग्रसित अत्यंत निर्धन एवं मज़दूर परिवार की 6 वर्षीय बच्ची रोहिणी की सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई शल्य चिकित्सा और शल्य चिकित्सा सम्पन्न होने तक और उसके बाद की आशा, निराशा और हर्ष की लहेर का शाब्दिक वर्णन ग्रसित परिवार के मुखिया की ज़बानी ।
चंद्रशेखर अहिरवार जो की अपने 13 सदस्यों के परिवार का मुखिया है जो की अपने और अपने पूरे परिवार का भरण पोषण 6 बीघा ऊसर ज़मीन और दैनिक मज़दूर के रूप में मिलने वाली दैनिक मज़दूरी 300 से करता है। परिवार में उसके अलावा उसके बुजुर्ग माता पिता दो भाई उनकी पत्निया और उनके दो बच्चे तथा स्वयं की पत्नी और तीन बच्चे है। संयुक्त परिवार हँसी खुशी एक साथ सुख दुख का भागी है और सब एकदूसरे का हर काम में हाथ बंटाते है। चंद्रशेखर मज़दूरी करता है और उसके दोनों भाई खेती करते है।
चंद्रशेखर की शादी के बाद परिवार में लक्ष्मी के रूप में सलोनी ने जन्म लिया और परिवार खुशी के महौल में डूब गया । समय का चक्र घूमता रहा। पुत्र की चाहत में एक बार फ़िर चंद्रशेखर की पत्नी ने रोहिणी को जन्म दिया । परिवार के सभी सदस्य पुत्र की कामना कर रहे थे सो रोहिणी के आ जाने पर सबको ज्यादा खुशी नहीँ हुई । अभी एक सप्ताह ही बीता था के रोहिणी के लगातार रोते रहने और साँस तेज़ तेज़ लेने के कारण गाँव के ही कुछ लोगों ने रोहिणी को डाक्टर को दिखाने की सलाह दी।
डाक्टर को दिखाने पर पता चला के रोहिणी तो जन्मजात ह्र्दय रोग से ग्रसित है और उसके दिल में छेद है तथा धमनियों में सिकुड़न है। चन्द्रशेखर और उसकी पत्नी को जब यह पता चला तो मानो उनके पैर के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी हो । दोनों पति पत्नी ने निर्णय लिया के रोहिणी को झाँसी के मेडिकल कालेज में दिखायेंगे । अगले ही दिन दोनों रोहिणी को लेकर झाँसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल लेकर गये और ह्रदय रोग विभाग में दिखाया जहाँ डाक्टर ने उसको देखकर इको की जाँच कराने का बोला । जाँच में वही समस्या सामने आयी जो क्लिनिक के डाक्टर ने होने का अंदेशा बताया था। अब स्पष्ट हो चुका था के रोहिणी के दिल में छेद है और उसका इलाज ऑपरेशन ही है । डाक्टर ने बताया के ऑपरेशन में दो से तीन लाख का खर्च आयेगा और उसके बाद भी रोहिणी के शत प्रतिशत स्वस्थ होने की कोई गारण्टी नहीँ है। मायूस माता पिता उस समय दवा लेकर घर को वापस आ गये।
मज़दूर चंद्रशेखर दिन रात मेहनत करके जो कमाता था वोह घर के लिये ही नहीँ पूरा पड़ता था ऐसे में रोहिणी की इस जानलेवा बीमारी ने परिवार का चैन और सुकून ही छीन लिया था। रोहिणी की माँ को तो बस एक ही चिंता लगी रहती थी की उसकी बच्ची बचेगी भी या नहीँ और अगर बच भी गयी तो उसका जीवन समान्य होगा या नहीँ, उसके भविष्य की चिन्ता में दिन रात घुल रही थी। तेज़ धूप में काम करने के बाद साँझ ढले जब चंद्रशेखर घर को आता है तो दिन भर की थकी हारी उसकी पत्नी उसको खाना देती है । परिवार में अन्य लोग समय समय पर दोनों को सांत्वना देते रहते। समय गुज़रते देर नहीँ लगती , रोहिणी अब धीरे धीरे बड़ी हो रही थी उसका इलाज भी लगातार चल रहा था। हर महीने हज़ार बारह सौ रुपये रोहिणी की दवा और जाँच में खर्च हो रहे थे किन्तु आशा की कोई भी किरण नज़र नहीँ आ रही थी।
एक दिन जब चंद्रशेखर रोहिणी को लेकर मेडिकल कालेज झाँसी गया तो डाक्टर जो की उसके लगातार वहाँ इलाज कराने के कारण उसको पहचान गया था। उसने चंद्रशेखर को सलाह दी के जयपुर में वोह अपनी बेटी का ऑपरेशन करा सकता है जहा उसको यह सुविधा निःशुल्क रहेगी। निराशा में आशा की एक किरण ने कई दिलों में जान डाल दी । माता पिता की खुशी का ठिकाना नहीँ था के उनकी बच्ची अब ठीक हो सकती है ।
किन्तु यह क्या? गाँव के बड़े बुजुर्गो ने तो उल्टी ही राय दे डाली के जयपुर एक अनजान शहर है वहाँ तुम अजनबी होगे और वहाँ कैसे रहोगे । सब ऐसे ही कहते है इतना बड़ा ऑपरेशन कोई निःशुल्क कैसे कर सकता है। और इस प्रकार जागरूकता के आभाव में रोहिणी का आगे का इलाज फ़िर से दवा और जाँच पर ही सीमित होकर रह गया था।
समय बहुत तेजी से पंख लगाकर उड़ रहा था । रोहिणी अब पाँच साल की हो चुकी थी और पाँच साल में रोहिणी के इलाज पर चार से पाँच लाख रुपय खर्च हो चुके थे किन्तु स्तिथि ज्यों की त्यों बनी थी । ऑपरेशन के खर्च से ज़्यदा दवा और जाँच में खर्च हो चुका था मगर एकमुश्त पैसा ना होने की वजह से रोहिणी का ऑपरेशन नहीँ हो पा रहा था ।
माता पिता अपनी बड़ी बेटी सलोनी और गाँव के अन्य बच्चो को जब खेलता हुआ देखते और रोहिणी को एक जगह बैठा हुआ देखते थे तो उनकी आँखो में आँसू आ जाते थे के वोह अपने आँखो के तारे के लिये इतने पैसे भी नहीँ जुटा पा रहे के उसे एक नयी ज़िन्दगी दे सके ।
सबकुछ ईश्वर के हाथ में छोड़ कर दोनों माता पिता किसी चमत्कार के इन्तेज़ार में मन्नत और मुराद माँगने लगे।
एक दिन उनके गाँव में आंगनवाड़ी केन्द्र पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की समर्पित मोबाइल हेल्थ टीम बच्चो का स्वास्थ्य परीक्षण करने पहुँची जहा चंद्रशेखर और उसकी पत्नी भी रोहिणी को लेकर दिखाने आये। टीम के लीडर डा. अजय गुप्ता द्वारा तथा डा . स्वप्ना श्रीवास्तव द्वारा दोनों को इस प्रकार की बीमारी से ग्रसित बच्चो को मिलने वाली सरकारी सहायता के बारे में अवगत कराया गया और बच्ची रोहिणी का ऑपरेशन कराने की सलाह दी।
डा. अजय गुप्ता ने जन्मजात रोग से ग्रसित बच्चे की जानकारी जिला स्तर पर तैनात डीईआईसी मेनेजर डा. रामबाबू को दी जिन्होने जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज से इस विषय में चर्चा की । एक रूपरेखा तैयार कर चिन्हित बच्चों के साथ जनपद से एक टीम जिसमे डॉ रामबाबू और डॉ हैदर के साथ लखनऊ के केजी एम यू अस्पताल में रोहिणी के निःशुल्क शल्य चिकित्सा के लिए ऐसे ही 3 बच्चों के साथ भेजा गया।
आर बी एस के टीम बड़ागाँव के लगातार प्रयासों द्वारा रोहिणी की शुरुआती जांचे झाँसी के मेडिकल कालेज में कई चरणों में पूरी हुई जहा डाक्टर ऋषि राज , डाक्टर ब्र्षालि , श्रीमती टीना शर्मा एवं श्रीमती स्मिता एवं श्री शिव कुमार पटेल द्वारा रोहिणी को सम्बन्धित विभाग में लाया जाता रहा और नियमित जांचे करवाई गयी। तत्पश्चात रोहिणी को शल्य चिकित्सा हेतु लखनऊ संदर्भित किया गया।
लखनऊ पहुँचने पर के जी एम यू के लारी कार्डियोलोजी के सी टी वी एस विभाग के डा . विकास ने विभागाध्यक्ष डा . शिखर टंडन के आदेश पर रोहिणी को भर्ती कर लिया। 18 दिन भर्ती रहने के बाद शल्य चिकित्सा हेतु रक्त की आवश्यकता पड़ी और 5 यूनिट रक्त एक अनजान शहर में उपलब्ध कराना चंद्रशेखर के लिये एक बड़ा यक्ष प्रश्न था।
डा. शुजाअत हैदर द्वारा जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज को फोन के माध्यम से रक्त की आवश्यकता के विषय में बताया गया, आनन फानन में राज्य स्तर जिला स्तर पर फोन लगाये गए किन्तु कहीं कोई उम्मीद न दिखाई देने से डोनर ग्रुप से सीधे बात का सोचा गया जिला कार्यक्रम प्रबंधक द्वारा होप ब्लड ग्रुप व्हाट्सएप्प ग्रुप में जीशान भाई से बात की गयी जिनके माध्यम से लखनऊ में ई राजीव गोयल जी से बात की गयी डॉ हैदर द्वारा भी ब्लड डोनेशन ग्रुप्स से बातचीत की गयी। शाम होते होते 5 यूनिट ब्लड का इंतज़ाम रक्त दूतों द्वारा करा दिया गया था जिसमें से एक यूनिट रक्त स्वयं चंद्रशेखर ने दिया।
इस प्रकार रोहिणी की सफ़ल हृदय शल्य चिकित्सा सम्पन्न हुई और आज रोहिणी अन्य सामान्य बच्चो की तरह जीवन बिता रही है । कहते हैं “हिम्मत मर्दां मदद ए खुदा” यह झाँसी टीम को हर पल महसूस हुआ जहाँ भी रुकावटे आई ऐसा महसूस हुआ ऊपर वाला खुद आकर मार्गदर्शन और मदद के लिए खड़ा है।
भारत सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना से रोहिणी के जीवन में तो आशा की किरण जगी ही साथ ही साथ माता पिता के दिलों पर बच्ची के सही इलाज ना करा पाने का जो भार था वह ख़त्म हो गया । और हम आर बी एस के वाले ऐसे बच्चों को चिन्हित करने के बावजूद मन मसोस कर रह जाते थे कि 3 साल से हम सिर्फ आश्वासन दे पा रहे थे वो बोझ भी सर से हल्का हुआ।
आज हम आर बी एस के बड़ागाँव गर्व महसूस करते है के ईश्वर ने हमें दुनिया के उन श्रेष्ठ लोगों में से चुना है जिनसे ईश्वर अपना काम लेता है।
धन्यवाद ईश्वर।
डा. शुजाअत हैदर जाफरी
फिजियोथिरैपिस्ट
आरबीएसके बड़ागाँव झाँसी



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