Tag: Shayak Alok

  • जामुन का भूत

    Shayak Alok

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    यह अजब कहानी है. कोई दलित मरा है तो उस दलित के मर कर भूत हो जाने की कहानी उसी वर्ग की तरफ से (कानी बुढ़िया) फैलाई गई है. (प्रतिरोध ने मिथक रच लिया है क्योंकि मिथक अंधाधुंध समर्थन के लिए मनोवैज्ञानिक काम करता है). और अब यह भूत सत्ता के सब प्रतीकों पर हमला कर रहा है. पहले उसने किसी प्रतीक में आर्थिक शोषण तंत्र (साहूकार) को पटका और फिर उसे पवित्र घोषित करने वाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था (राम नारायण पंडित) को, जिसका उससे नेक्सस है. यह नेक्सस न केवल आर्थिक शोषण तंत्र को धार्मिक नैतिकता प्रदान करने में है बल्कि ब्राह्मण वर्ग खुद भी सदियों से आर्थिक शोषण का प्रकट भागीदार है (उसके बाप के बाप ने). यह कविता फिर एक हमला उस विडंबना पर कर देती है जहाँ जिंदा नंगे भूखों का कोई महत्व नहीं, लेकिन मृत पत्थर प्रतीकों को किसी अलौकिक भय से पूजा जाता है (गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत हर शनिवार को खाता है बताशे ). विमर्श का उत्थान यह है कि अफवाह से उभारा गया यह नायक या यह प्रतिरोध केवल हमलों तक सीमित नहीं है बल्कि अपने शोषित वर्ग के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना भी करने लगा है. यह स्थापना उस वर्ग का भय दूर करने और उसे साहस देने में प्रकट है (नहीं डरती चंपा). और अंत में कविता चुनावी लोकतंत्र के संक्रमण पर हमला कर देती है जहाँ यह नग्न खुलासा कर देती है कि एक शोषित वर्ग के उभार के विरुद्ध सामाजिक-आर्थिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता के बीच एक गठजोड़ हो जाता है (भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए). मैंने यहाँ भारतीय संदर्भ का वास्तविक पाठ ही लिया है जहाँ शोषितों के किसी प्रतिरोध आंदोलन को शोषितों के विरुद्ध ही प्रस्तावित कर सरकारें उनके दमन का तर्क ढूंढती हैं. एक अजीब बात और हुई है कि प्रेमचंद की कई कहानियों के विवश व नैसर्गिक व सुरंग-बंद अंत की तरह यह कविता यूँही समाप्त नहीं होती और एक संभावना, एक रौशनी का संकेत देती है कि जामुन का भूत नया जामुन ढूंढ सकता है.

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    जामुन का भूत

    किसी गाँव में जब गोबर नाम का दलित मरा तो भूत हो गया
    तो वह भूत रहने लगा उसी गाँव के बँसवारी में
    पहलेपहल तो यह बात कानी बुढ़िया ने कही और
    फिर किस्से शुरू हो गए.

    एक दिन जब गोबर ने उठा पटक मारा बगल गाँव के सुखला साहूकार को
    और उसका बटुआ भी छीन लिया तब तो बड़ा हंगामा हुआ
    सुखला का गमछा पाया गया गाँव से दो कोस दूर
    ऐसा बिछा हुआ जैसे गोबर ही उस पर सुस्ताने दो दम मारा हो.

    तो तय यह पाया गया कि हाथ पैर जोड़ कर बुला लिया जाय रामनारायण पंडित को
    और खूब जोर से कच्चे धागे से बंधवा दिया जाए उस नासपीटे जामुन को
    जामुन जो बँसवारी का अकेला ऐसा पेड़ था जो बांस नहीं था.

    लेकिन उसी रोज रात में घटी एक और घटना
    ‘न देखा न सुना’ – कहती है रामजपन की माई भी
    बिशो सिंह के दरवाजे सत्तनारायण संपन्न करा के लौट रहे रामनारायण पंडित को
    बँसवारी के आगे धर दबोचा गोबर ने
    और ऐसा भूत मन्त्र मारा कि गूंगे हो गए बेचारे
    बोलते हैं तो सिर्फ चक्की के घिर्र घिर्र की आवाज़ आती है.

    कहते हैं कि गोबर के दोमुंहे पुराने घर थी ऐसी ही एक चक्की जो
    उसके बाप ने अपने बाप के श्राद्ध में रामनारायण को गिरवी बेचा था.

    खैर जामुन के भूत को बाँध दिया गया और गोबर से शांत रहने की प्रार्थना की गई.

    गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत
    हर शनिवार को खाता है बताशे
    कभी भूख बढ़ने पर जन्मते ही खा जाता है मवेशियों के बच्चे
    अपने साथी भूतों के भोज के लिए एक दिन जला डाला मुर्गों का दड़बा
    चबाई हड्डियाँ डोभे में फेंक दी.

    गोबर के भूत ने न्याय भी लाया है गाँव में
    मुंह अँधेरे अब शौच जाने से नहीं डरती चंपा
    हर महीने सरसतिया के जिस्म पर आने वाला भूत अब नहीं आता
    गुनगुनाते हुए बड़े दालान से गुजर लेती है अठोतरी.

    सुना है गोबर अन्य भूतों संग रोज रात को बँसवारी में करता है बैठकें
    हंसने और जोर जोर से बतियाने की आवाज़ आती है.

    टीवी पर जब से आई है गोबर की कहानी
    सरकार फिक्रमंद है आम जान माल को लेकर
    भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए
    इसलिए सेना निपटेगी उनसे लोकसभा चुनाव के पहले पहल.

    मजे में जी रहे जामुन के भूत को दूसरा जामुन ढूंढना होगा.

    .

  • गुरमेहर कौर सी युवाओं के पास चार में से एक चुनने का विकल्प है

    Shayak Alok

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    कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का गठन पीपुल्स वार और एमसीसीआई को मिलाकर हुआ. ये दोनों नोटोरियस संगठन रहे हैं. ये प्रेरणा माओ से लेते हैं जो मानव सभ्यता का सबसे बड़ा हत्यारा हुआ. माओ इतना बड़ा हत्यारा हुआ कि आप मान लीजिए कि हिटलर, स्टालिन, मोदी और ट्रम्प जैसे लोग अपनी स्थापित योग्यता पर उसके दरबान तक नहीं रखें जाएं. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का मोटिव है भारत की मौजूदा व्यवस्था को क्रांति के रास्ते उखाड़ फेंकना और डेमोक्रेटिक फेडरल रिपब्लिक की स्थापना करना. मोटा मोटी समझ लीजिए कि ये भारत को माओ का चीन बनाना चाहते हैं जहाँ सिद्धांत और नीति से जनता का ही समर्थन पा लाखों किसानों-मजदूरों को अकाल और भूख से कत्ल कर देना चाहते हैं. यह व्यवस्था ऐसी होगी कि अशोक वाजपेयी ने सत्ता विरोधी मार्च निकाला या अपूर्वानंद ने इंडियन एक्सप्रेस में कोई एं टें आलेख लिखा, तो उन्हें तोप के मुंह पर बाँध उड़ा दिया जाएगा.

    इस पार्टी की विचारधारा में मौजूदा भारतीय तंत्र के प्रति घृणा का भाव है और इसमें इस्लाम को साम्राज्यवादी-पूंजीवादी धारा के विरुद्ध एक उपस्कर के रूप में देखा जाता है. पार्टी भारत सरकार की तरफ से आतंकी संगठन घोषित है और कुछ राज्य सरकारों ने भी उनपर प्रतिबंध लगा रखा है. यह अल्ट्रा लेफ्ट है जिसे विश्व में बेहद कम स्वीकार्यता प्राप्त है. आतंकी लेफ्ट. माओ और माओ का चीन भी वर्तमान में इसे स्वीकार नहीं कर सकता और दक्षिण चीन सागर में उठा फेंकेंगा (संभव है दक्षिण चीन पर उत्तेजित अमेरिका और जापान इन्हें छान लें).

    इसी धारा और पार्टी की छात्र इकाई है डीएसयू जिसे जेएनयू और डीयू में सक्रिय रखा गया. उमर ख़ालिद इसी छात्र संगठन का सदस्य रहा और जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी वाले आयोजन के तुरंत पहले संगठन के आंतरिक लोकतंत्र के प्रश्न पर अन्य साथियों संग अलग हुआ था. जेएनयू में उस आयोजन में उमर ख़ालिद की विशिष्ट भूमिका थी और विशेष उपस्थिति भी. कन्हैया ने भारत विरोधी नारों की निंदा की, उमर ने बचाव किया.

    यहीं अपनी जानकारी भी थोड़ा दुरुस्त कर लीजिए कि उमर कश्मीरी नहीं है. उमर मुसलमान नहीं है. (उमर ने जावेद अख्तर की तरह खुद को नास्तिक घोषित कर रखा है). उमर बम फेंकने वाला आतंकवादी भी नहीं है. उमर का पाकिस्तान और हाफ़िज़ सईद से कोई संबंध नहीं है. उमर बस अल्ट्रा लेफ्टिस्ट है.

    क्या आप इस पार्टी-संगठन के विचारों से सहमत हैं ? क्या इसके प्रतिनिधियों को लोकतांत्रिक संवाद पक्ष का प्रतिनिधि मानने को तैयार हैं ? क्या आप तैयार हैं कि भारत की बर्बादी तक जंग छिड़ जाए जो इस विचार पक्ष का मोटिव है ? क्या आप सोचते हैं कि अल्ट्रा लेफ्ट को फ्री वाक मिलना चाहिए?

    ठीक है आप तैयार हैं .. लेकिन आप तैयार हैं तो फिर संकट है कुछ .. alprazolam buy online malaysia https://urbanyogaphx.com/ buy xanax egypt buy xanax in turkey
    लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उमर ख़ालिद को विद्यार्थी परिषद जैसा संगठन भी फ्री वाक दे सकता है ? उमर, जिसका बेहद संक्षिप्त परिचय है और वह परिचय डीएसयू और जेएनयू की उस घटना से जुड़ा है. परिचय जो भारत-विरुद्ध है.

    नम्बर नहीं दे सकता. चाह कर भी नहीं दे सकता. क्योंकि विद्यार्थी परिषद बिल्कुल इसके विपरीत परिकल्पना पर संचालित है.
    तो यह संघर्ष तय है. यह संघर्ष जारी रहेगा. और विचारधारा कपाड़ – यह सियासी संघर्ष है. यह शक्ति का संघर्ष है.

    तो यहाँ गुरमेहर कौर सी युवाओं के पास चार राह में से एक चुनने का विकल्प है. पहला, कि हाँ अल्ट्रा व रेडिकल विचारों को भी फ्री वाक मिले. किन्तु इससे तंत्र की अराजकता बढ़ेगी. दूसरा, कि हाँ परिषद द्वारा गुंडा तरीके से विरोध करना जायज है. लेकिन गुंडागर्दी को आप समर्थन नहीं दे सकते. तीसरा, कि न हम उमर ख़ालिद के विचार पक्ष को एंडोर्स करते हैं, न परिषद की गुंडागर्दी को. हम गांधी-अम्बेडकर-कलाम के लोग लानत भेजते हैं हर प्रतिगामिता को. और चौथा, कि निरपेक्षता रखना और अपना फ़ोकस पढ़ाई और बॉयफ्रेंड और कॉफ़ी और सरोजिनी-कमला पर रखा जाए.

    गुरमेहर कौर सी युवा अपनी तख्ती अपने बोध से उठाएं.

     

  • तारेक फ़तह और चुप्पी के बारे में

    Shayak Alok

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    किसी ने पूछा मुझसे कभी कि तारेक फ़तह के बारे में आपकी क्या राय है तो मैंने कहा था कि वे कुछ बातें बहुत अच्छी कहते हैं लेकिन थोड़े लाउड हैं.

    लाउड इस आशय में कि वे चौथी जमात के मुस्लिम धर्मावलंबियों को आठवीं जमात का पाठ्यक्रम पढ़ाना चाहते हैं. भारतीय या पाकिस्तानी समाज अभी इतना अधिक लिबरल होने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है. उन्हें धीरे धीरे प्रशिक्षित करना होगा. लाउड इस आशय में भी कि वे पाकिस्तान (और इस प्रकार मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक उपमहाद्वीपीय इस्लाम) के बहुत अधिक विरुद्ध और भारत (और इस प्रकार दक्षिणपंथ) के बहुत अधिक पक्ष-समर्थक प्रकट होते हैं. इस कारण कई बार वे धैल अतार्किक हो उठते हैं. हालांकि पाकिस्तान से उनकी चिढ़ स्वाभाविक भी है. पाकिस्तान ने उन्हें प्रताड़ित किया है और जलावतनी को मजबूर हैं.

    जो लोग सिर्फ फतह से परिचित हैं, उन्हें मैं बताऊँ कि पाकिस्तान में हसन निसार, नज्म सेठी, हुसैन हक्कानी, परवेज हुडबोय, मोईद युसूफ, हामिद बशानी आदि विभिन्न मौकों पर स्वतंत्र और चुनौतीपूर्ण राय प्रकट करते नजर आते रहे हैं और वे भी फ़तह की ही तरह बिरादरी से गाली सुनते रहे हैं. इनमें से कुछ फ़तह की ही तरह भारतीय एजेंट होने के भी आरोप सुनते रहे हैं. इन सब विश्लेषकों की अपनी अपनी शैली है. जैसे हसन निसार बहुत हताशा और लानतों के साथ लाउड बोलते हैं. हक्कानी और हुडबॉय व्यंग्य से टिप्पणी करते हैं.

    तीन घटनाओं पर बात करना आवश्यक है. पहला, कोलकाता में तारेक के कार्यक्रम को रद्द करना, जहाँ सरकार ने अपना पल्ला झाड लिया कि रद्द करने का निर्णय क्लब का निजी निर्णय था, दूसरा, पंजाब विवि में तारेक पर हमला, जहाँ यह तर्क दिया गया कि उन्होंने स्थानीय छात्रों को अपने वक्तव्य और देहभाषा से उकसाया, और तीसरा, जश्न ए रेख्ता कार्यक्रम में दिल्ली में उनका बेजा घेराव व मैनहैण्डलिंग.

    इन घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं आनी चाहिए थी. तारेक पर हमले की आलोचना होनी चाहिए थी. तारेक का लाउड होना भी यह मौका मुहैया नहीं करा सकता कि आप मुर्दा चुप्पी रखें. तारेक जितना कहते हैं और जैसे कहते हैं, उससे अधिक और उससे अधिक खतरनाक वक्तव्यों व दृष्टिकोण के लिए हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तर्क देते रहे हैं.

    आप बौद्धिक अभिव्यक्ति को यूँ वर्गीकृत नहीं कर सकते. मेरा तेरा. मेरा सोना तेरा पत्थर.

    मैं हमेशा यह सोचता हूँ कि बौद्धिकता हर प्रतिगामिता पर अपनी जुबान खोलेगी. मैं उम्मीद रखता हूँ.


    Credits: Facebook wall of Shayak Alok

  • बासी पुर्जे

    Shayak Alok

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    अपनी कविताओं के लिए अजूबे बिम्ब ढूंढती उस लड़की से मैंने एक दिन कहा कि देहराग में डूबा एक प्रेम-सना बिम्ब मेरी ओर भी भी उछाल दो तो उसने कहा कि मेरी जंघाओं के संधिस्थल पर तुम अपना मस्तक रखो और मैं तुम्हें जन्म दूंगी ..

    ***

    उसने कविताओं को एक क्षण को विराम कहा और मेरी आँखों में अपनी आँखें उतारते हुए पूछा- और तुम्हारे पास मेरी ओर उछालने को कौन सा बिम्ब है .. मैंने कहा, मैं तरबूज के लाल तिकोन टुकड़े से तुम्हारी नाभि के ग्यारह गोल चक्कर लगाऊंगा ..

    ***

    उसकी नाभि का वह मेरा ग्यारहवां चक्कर था जब उसने भूख की बात की .. फिर मैं अपनी कविता में आग और चुल्हा ले आया, वह ले आई अपनी कविता में स्वर्ण-चमकते गेहूं से भरा खेत ..

    ***

    भूख मिट गई थी जब वह अपनी कुछ पुरानी कविताएं निकाल लाई और उनके सारे बिम्बों पर नए शब्दों में पुनर्विचार करने लगी .. मैंने कहा कि लोकबिम्ब पर विचार करो तो पेट भरने के बाद बिस्तर को पीठ पर डाल आराम करना चाहिए.. वह मुस्कुराई .. कहा- और मेरी आत्मा की भूख का क्या ? .. मैं हँस पड़ा .. मैंने कहा कि यह कविता के बीच में तुम एक चलताऊ बिम्ब ले आई हो .. उसे तुरंत कोई दूसरा बिम्ब नहीं सूझा तो वह गुनगुनाने लगी – सूरज को धरती तरसे, धरती को चंद्रमा .. धरती को चंद्रमा ..

    ***

    पूर्णविराम से हम शुरू करेंगे अपना प्रेमालाप, तुम अपने दांतों से मेरी जीभ पर कोई निशान अंकित करना ..मैं अपनी चीख तुम्हारे कानो की दोनों बालियों पर टांग छोड़ दूंगा.. मेरी ऊँगली के पोर पर अटकी हवा जब तुम्हारे गर्दन पर से गुजरेगी, तुम गुनगुना पड़ना और तुम्हारे गले में घुटी रह गयी इस्स-इस्स-सिसकी मैं तुम्हारे अधरों तक खिंच लूँगा.. | … इसी एक ठहरे हुए पल मैं अपनी आँखों से तुम्हारी आँखों को कहूँगा कि इस प्रेमालाप में आये पहले लौटते अर्द्धविराम पर ही फिर जीभ तुम्हारी होगी .. और दांत मेरे …

    ***

    मेरी हथेली की दो समानांतर रेखाओं के बीच जहाँ तुम अपने अधर छोड़ गयी थी न वहीं एक त्रिभुज उग आया है… उस त्रिभुज की किसी तीसरी दीवार के किसी एक कोने में एक जो सुरंग खाली रह गयी थी न वहीं उसी मुहाने पर दीवार से अपनी पीठ सटा मैं बैठ गया हूँ…सुरंग में जब जब निर्वात बनता है मैं जोर से तुम्हारा नाम पुकार लेता हूँ और तुम्हारी खुशबू से सुरंग भर आती है…जिस दिन तुम भी जोर से पुकार लोगी मेरा नाम उस दिन तुम्हारी गंध मेरी हथेलियों से आने लगेगी …

    ***

    वह जो तुम्हारी पेंटिंग में बर्फ का पहाड़ था, पिघल गया है…पहाड़ के पीछे का ललमुँहा सूरज माथे पर बरस रहा है…तुम्हारी चिट्ठियों पर चीनी के दाने हैं, चीटियाँ सदियों तक यहीं जीने मरने के गीत गायेंगी .. रुमाल पर रखे तुम्हारे बासी लब पर पिछली रात फफूंद उग आये..और मैं.. मैं और मेरी उबासी अब तक खूंटी से टंगे हैं. लौट सको तो ठीक वरना गुजरती हवा के बैरंग से अपनी ज़रा गंध भेजना.

    .

     

  • मृत उँगलियों में रंगीन ऊन का घेरा

    Shayak Alok

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    उस घर की दीवारों में दरारें थीं तो पिस्त्रा मोरी सूई और मोटे ऊन से उन दरारों को सिलने लगी .. रोज वह घर के जरुरी काम निपटाती .. पति को कलेवा दे काम करने भेजती और फिर दोपहर से शाम एक एक दरार को ढूंढती और उसे सिलने लगती .. दीवारों में नए दरार फिर उभर आते तो वह ऊन और वक़्त का अनुमान करती और फिर उन्हें सिलने में लग जाती .. रात को कभी चौंक के उठती तो दीया जलाती और महीन दरारों की महीन सिलाई शुरू कर देती ..

    उसका पति उसे थका देने वाला प्यार कर रहा होता और वह छत की दरारों को देखती उन्हें सिलने का उपाय सोच रही होती ..

    अलग अलग दरारों में अलग रंग ढंग के ऊन..

    पिस्त्रा मोरी का पति खुश था .. उसे लगता एक एक दरारें मिट रही हैं .. उसे लगता उनके बीच की दूरियां भी मिट रही हैं ..

    आजकल पिस्त्रा से संतुष्ट उसका पति पूछता कि बोलो कितना प्रेम है मुझसे तो तुरंत वह जवाब देती ‘उतना जितना प्रेम है मुझे मेरे दरारों के सिलने के काम से ‘ ..

    वह फिर पूछता और पिस्त्रा फिर दरारों के रूपक में जवाब देती – ‘ इतना प्रेम जितनी गहरी वह नई दरार ‘ ..

    काम से जल्दी लौटे पिस्त्रा के पति ने उस नई दरार की चिर्री से एक रोज देखा पिस्त्रा को उस ऊन वाले सौदागर के साथ ऊन का हिसाब किताब करते .. पिस्त्रा हंसती और नए ऊन का गोला उठाती फिर मोलभाव करती ..

    पति को गुस्सा आया .. पिस्त्रा रोती चिल्लाती रही पर न सुना उसने .. सब दरारें उघाड़ दी और बडबडाता पैर पटकता चला गया ..

    देर रात लौटा पिस्त्रा मोरी का पति तो दरारों भरी दीवारें गिर चुकी थी.. दीवारों के नीचे दबी पिस्त्रा मोरी के शरीर पर दरारें उभर आई थीं.. पिस्त्रा की मृत उँगलियों में रंगीन ऊन का घेरा था..

  • आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया

    Shayak Alok

    पढ़ते पढ़ते ही मैंने पाया कि मेरे प्रिय कई लेखक वगैरह अपने समकालीन दूसरे लेखकों-समीक्षकों-इतर साहित्यिकों को लेकर एक पूर्वग्रह-आक्रामक भाव में भी रहते हैं. कई बार वे मुखर उन्हें कोसते पीटते भी नजर आते हैं. मैंने पाया कि यह लक्षण मुझमें भी है. आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया.

    1.

    समीक्षाओं आलोचनाओं से नहीं
    न ही अफवाहों से
    उस झूठ से भी नहीं जो तुम्हारे चेहरे को सफ़ेद करता है
    न व्यंग्य के कहकहों से
    मुझे शापित करती तुम्हारी आहों कराहों से
    न ही गालियाँ बकने .. धमकाने से
    न पीठ पर
    चाक़ू खंजर चलाने से
    दाखिल खारिज के खेल से भी नहीं
    तुम्हें मारना हो अगर मुझे
    मुझे तुम्हारे जैसा बना दो.

    2.

    मूर्ख पाठकों
    और पूर्वाग्रही कवि मित्रों
    को
    रखो दो किनारों पर
    और तौलो
    बराबर की माप
    ‘क्या कहते हैं कि संतुलन’
    दो चार कविताओं को
    इधर उधर रख देने से आ जाएगा.

    3.

    मेरे लिखे शब्द
    जब मुझे ही भ्रमित करते हैं
    तब मेरा एक सींग निकल आता
    है
    इन्हीं मान्यताओं व शर्तों
    पर
    मैंने कुछ कवियों में एक
    पूंछ को निकलते देखा है.

    4.

    मेरे वैचारिक
    खूंटे से बंधी है मेरे समय की बकरी
    जबकि उनके उनके हाथ
    उनके समय के भेड़ियों की पीठ
    सहलाते हुए
    वे मरेंगे, भेड़िये मरेंगे या फिर बकरी.

    5.

    कवि,
    वे पहले
    तुम्हें अनदेखा करेंगे
    वे फिर
    तुम्हें सहलायेंगे .. शब्दों से बहलाएँगे
    वे फिर तुम्हारी हाड़ मांस की कविताओं को चबायेंगे
    अपने मुंह के खून तुम्हारी आस्तीन में छुपायेंगे
    कवि, वे फिर तुमपर आरोप लगायेंगे
    बहाने में कविता को कवि से बचायेंगे
    सियारों की सियासत में
    लोमड़ियों से भी सावधान रहना कवि
    वक़्त की अदालत में इन सबके खाल उघाड़े जायेंगे ..