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  • नितीश कुमार, भाजपा व बिहार : पसंद नापसंद के खाचों से इतर व्यवहारिक चर्चा

    Vivek “Samajik Yayavar”


    यदि मार्च 2000 में जब नितीश कुमार केवल 8 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, को छोड़ दिया जाए तो नितीश कुमार नवंबर 2005 में स्थाई रूप से बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2005 में जनतादल (यू) व भाजपा ने बिहार में चुनाव मिल कर लड़ा था, वह भी लालू यादव के विरुद्ध। 2005 से 2010 तक जनतादल (यू) व भाजपा ने मिलकर सरकार चलाई। 2010 के बिहार चुनावों में इस गठबंधन ने दुबारा सरकार बनाई 243 सीटों में 206 सीटें जीतकर, जिसमें जनतादल (यू) ने 115 व भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं।

    नितीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का चेहरा बदल दिया। यदि बिहार व गुजरात का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए तो बिहार में विकास विपरीत परिस्थितियों में बहुत बदहाल स्थिति से हुआ था। गुजरात की परिस्थितियां से बिलकुल भिन्न व बहुत अधिक दुरूह।

    भाजपा ने बिहार में सरकार में गठबंधन में होते हुए कभी सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला नितीश कुमार के काम करने के तौर तरीकों में। तालमेल से सरकार चल रही थी। गड़बड़ तब हुई जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया। जबकि नितीश कुमार की दबी हुई इच्छा थी उनको बनाया जाए। नितीश कुमार का अनकहा तर्क, यदि NDA द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चुनाव विकास से ही तय होना था तो नितीश कुमार का चुनाव होना चाहिए था।

    जून 2013 में नरेंद्र मोदी जी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे आते ही, कुछ ही दिनों में जनतादल (यू) पार्टी भाजपा गठबंधन से अलग हो गई, जबकि जनतादल (यू) के ही शरद यादव NDA के राष्ट्रीय समन्वयक थे। नितीश कुमार ने लालू यादव के सहयोग से सरकार बनाई लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में करारी हार हुई। भाजपा ने 40 में से 32 सीटें जीतीं। नितीश कुमार, लालू यादव व कांग्रेस 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े, सरकार बनाई।

    लेकिन नितीश कुमार व लालू यादव का तालमेल दो साल भी नहीं चल पाया। नितीश कुमार को भी यह अहसास हो चुका था कि अब प्रधानमंत्री बनना नहीं। बेहतर कि सकून के साथ तालमेल के साथ पहले जैसे सफलता से सरकार चलाई जाए। लालू यादव के साथ तालमेल न तो चल पा रहा था और न ही चलना ही था, किसी तरह गाड़ी खिंच रही थी। लालू यादव अपनी संतानों को राजनीति में लंबी दूरी के लिए सेट करने की हड़बड़ी में भी हैं।

    नितीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन करके नई सरकार बनाकर छठवीं बार मुख्यमंत्री बने। मेरा मानना है कि नितीश कुमार 2015 के बाद से ही भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार चलाना चाहते थे। नितीश कुमार व भाजपा दोनों बिहार में एक दूसरे के साथ पूरकता में लंबे समय तक सरकार अच्छे से चला चुके हैं। भाजपा ने नितीश के ऊपर बिहार में सरकार चलाते हुए सीमा से अधिक दबाव नहीं डाला, उंगलबाजी नहीं की। दोनों ने बिहार के लिए बेहतर काम भी किए।

    2013 से 2017 तक के चार वर्षों के चक्र में मेरे अनुमान के अनुसार नितीश कुमार से राजनैतिक गणनाओं में दो बार गलतियां हुईं।

    1. 2013 में छिपी हुई प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा के कारण नितीश कुमार NDA से अलग हुए। उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रबंधन को हलके में लिया। उनको लगा कि त्रिशंकु संसद में उनकी संभावना रहेगी, उनको यह भी लगा कि वे संसदीय चुनावों में बिहार राज्य में 15 से 20 सीटें निकाल ले जाएंगे।
    2. 2014 में लोकसभा चुनावों में भाजपा की भयंकर जीत व मीडिया प्रबंधन के कारण नितीश कुमार डर गए, उनको लगा कि यदि वे अकेले चुनाव लड़ते हैं तो वे सरकार नहीं बना पाएंगे। यदि बिहार में भाजपा की सरकार बन गई तो मोदी उनके राजनैतिक भविष्य को पूरी तरह खतम कर देंगे।इसलिए नितीश कुमार बिहार चुनाव में अकेले उतरने की बजाय लालू यादव के साथ उतरे। लालू यादव अपने साथ कांग्रेस को भी उतार लाए। जबकि यदि नितीश कुमार यदि हिम्मत दिखाते तो अकेले चुनाव लड़कर भी अच्छी स्थिति में रहते। आवश्यकता पड़ती तो चुनाव के बाद गठबंधन बनाते।

    भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार होने के बावजूद नितीश कुमार ने बिहार में कभी सांप्रदायिक माहौल नहीं बनने दिया। दलितों महादलितों व पिछड़ी जातियों के लिए काम किया। बिहार के लोग आराम चाहते हैं, विकास चाहते हैं, तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस चाहते हैं। वे विकास व तुलनात्मक बेहतर गवरनेंस का स्वाद चख चुके हैं।

    इसमें कोई संदेह नहीं कि नितीश कुमार ने बिहार में विकास के माध्यम से चेहरा बदला। नितीश कुमार को बिहार की पिछड़ी जातियां, दलित, महादलित व मुस्लिम पिछड़ी जातियां पसंद करते हैं। नितीश कुमार ने जातिगतता से ऊपर उठकर सर्वमान्य रूप में लोकप्रियता अपने कामों व गवर्नेंस से हासिल की। बिहार का चेहरा बदलने का काम वास्तव में किया, तब भाजपा के साथ ही गठबंधन सरकार में थे। अभी भी उनके पास तीन सालों का समय है। पिछले लगभग 12 सालों से सरकार चला ही रहे हैं, जिसमें लगभग आठ साल सरकार भाजपा के साथ मिलकर ही चलाई है। लोगों का दिल फिर से जीतना असंभव भी नहीं।

  • सरकार द्वारा झुग्गीवासियो की अनदेखी दुःखद : लक्ष्य

    सरकार द्वारा झुग्गीवासियो की अनदेखी दुःखद : लक्ष्य

    दिनांक 22 जुलाई 2017 को लक्ष्य की महिला टीम ने  “लक्ष्य झुगी झुगी” अभियान के तहत   लखनऊ के जानकीपुरम के सेक्टर जी की झुगिओ का दौरा किया तथा वहां  के निवासियों से उनकी समस्याओं को सुना व् उनके साथ सामाजिक चर्चा की !

    लक्ष्य कमांडर सुषमा बाबू ने सामाजिक  चर्चा करते हुए सफाई पर जोर दिया उन्होंने कहा कि गंदगी ही बीमारियों की जड़ है अतं हमें साफ सफाई का जरूर ध्यान रखना चाहिए ! उन्होंने कहा की हमें अपना ध्यान स्वंय रखना होगा ! उन्होंने कहा कि शाशन व् प्रसाशन से  बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए !  उन्होंने झुगीवासियो की दुर्दिशा पर दुःख प्रकट करते हुए कहा कि  आम जनता भी  इनकी अनदेखी करती है जबकि कि ये भी देश के नागरिक है हम सबको इन लोगो  के अधिकारों के लिए प्रयास करना चाहिए !

    लक्ष्य कमांडर रेखा आर्या ने प्रशासन दुवारा  झुगीवासियो की अनदेखी पर गहरी चिंता जताई ! उन्होंने सरकार से मांग करते हुये  कहा कि वो इन लोगो को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराये अन्यथा लक्ष्य की टीम को मजबूरन सड़को पर उतरना पड़ेगा !  उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में  हमारा ” लक्ष्य झुगी झुगी” का  अभियान और तेजी के साथ आगे बढ़ेगा ! उन्होंने लोगो से इस अभियान में जुड़ने की अपील भी की !

    लक्ष्य कमांडर संघमित्रा गौतम ने बच्चो की शिक्षा पर जोर दिया ! उन्होंने नशे से बचने की सलाह भी दी ! उन्होंने कहा कि नशा ही सभी समस्याओं की जड़ है ! लक्ष्य कमांडर ने बहुजन समाज के उत्थान में बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर के योगदान की भी चर्चा की ! लक्ष्य महिला कमांडरों ने उनको पूरा सहयोग देने का अश्वासन भी दिया !

     

  • कोरी राष्ट्रपति, घांची प्रधानमंत्री…हिन्दुत्ववादियों के सामाजिक न्याय का नया मॉडल और कांग्रेसी-कम्युनिस्टों-समाजवादियों से लेकर ब्राह्मणवादियों तक के समवेत रुदन का समय

    रामनाथ कोविंद देश के राष्ट्रपति हो गए हैं। वे अनुसूचित जाति से होने के कारण राष्ट्रपति बनाए गए हैं। जिस देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सर्वोच्च जातियां मानी जाती हों और इन जातियों के बड़ी तादाद में लोगों के भीतर जातिगत श्रेष्ठता का झूठा और अमानवीय अहंकार भरा हो, उस देश में यह एक अच्छी बात है। और सबसे अच्छी बात ये है कि जिस दल और जिस विचारधारा को आज तक अपनी नामसझी के कारण इन ऊंची जातियों के लोग समर्थन देते रहे हैैं, उनकी आंखें खुलने का भी यह समय है।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राजनीति और समाज के भीतर पैदा हुए छोटे-छोटे अदृश्य आंदोलनों ने कुछ एेसे मूल्य और मानदंड स्थापित कर दिए हैं, जो किसी भी धार्मिक और राजनीतिक कट्‌टरता को निचोड़ कर रख देते हैं।

    नरेंद्र मोदी को मैं वैचारिक रूप से पहले ही दिन से खारिज करता रहा हूं और वे मेरी पसंद के प्रधानमंत्री नहीं हैं। लेकिन मुझे मेरे देश का लोकतंत्र और लोकतांत्रिक समाज प्रिय है, इसलिए अच्छा लगता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद मोदी भारी जन समर्थन हासिल कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले व्यक्ति हैं। पंडित नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कई प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इनमें से हरेक के साथ सहज और नैसर्गिक प्रधानमंत्रित्व का गुण नहीं जुड़ा था। शास्त्री बहुत कमज़ोर प्रधानमंत्री थे और बहुत मज़बूरी में बनाए गए थे। इंदिरा गांधी नेहरू की बेटी होने के कारण प्रधानमंत्री बनी थीं। माेरारजी जनता पार्टी की एक लाचार और अशक्त अभिव्यक्ति थे। वीपी सिंह बहुत शातिराना ढंग से प्रधानमंत्री बने। उन्होंने कांग्रेस की समस्त धूर्तताओं को मात दे दी थी। जिस सफाई से वे पूरे चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नहीं बनने का दावा करते रहे और स्वयं को फ़कीर बताते रहे, उसी सफाई से वे प्रधानमंत्री भी बन गए और चंद्रशेखर इसके विरोध में उतरे। वाजपेयी बहुत शालीन और बड़ी अाबादी की पसंद थे, लेकिन उनके साथ लोकबल नहीं था। यह लोक बल अगर कोई बटोर पाया तो वह नरेंद्र मोदी हैं। यह अलग बात है कि शासन करने की क़ाबिलियत और समाज या देश का सकारात्मक ट्रांस्फोरमेशन कम ही लोगों के बूते की बात होती है। यह तत्व हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री में नहीं दिखता है।

    मैं उस समय बड़ी प्रसन्नता का अनुभव करता हूं, जब ब्राह्मणवादी अहंकार के साथ जीने वाले मेरे मित्र अपने साथ के लोगों को तेली-तमोली और न जाने क्या-क्या कहकर गरियाते हैं और उनके घरों में जाने तक को पसंद नहीं करते; लेकिन अपनी फेसबुक पर सारा दिन घांची जाति के नरेंद्र मोदी की तसवीर लगाकर गर्व का अनुभव करते हैं। यही वह शिफ्ट है, जो भारतीय समाज में होना चाहिए था। यह शिफ्ट आना तो चाहिए था गतिशील और प्रगतिशील ताकतों के कारण, लेकिन यह बदलाव आ रहा है एक कूढ़मगज, दकियानूसी और प्रतिगामी सोच को लेकर चलने वाली राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारधारा के कारण। आपको हीरा तो मिल रहा है, लेकिन वह कीचड़ में लिपटा हुआ है। दरअसल समाज को बदलाव चाहिए, बदलाव ला कौन ला रहा है, उसका चेहरा तलाशने की ज़रूरत नहीं है।

    भाजपा ने पृथकतावादी पीडीपी से समझौता किया है। उसके साथ सरकार चलाई है। यह ऐसी ही बात है, जैसे कोई पहले तो कुलवधू होने का दावा करे और फिर अचानक से कॉलगर्ल हो जाए। लेकिन नख़रे वही कुलवधू के! जो पार्टी चीन से अपनी मातृभूमि का एक-एक इंच वापस नहीं लेने तक संसद में प्रवेश नहीं करने के संकल्प ले और जब स्वयं के पास शासन आए और चीन आपके विमान को भी मार गए और धौंस भी दिखाए तब भी आप उसके राष्ट्रपति के लिए लाल कालीन बिछाएं, अपने परम पुरुष की प्रतिमाएं उसके यहां से बनवाएं और वह बुलाए तो आप राष्ट्रीय स्वाभिमान पर द्विराष्ट्रीय रिश्तों की परवाह करने लगें तो इससे अच्छा बदलाव और क्या होगा! लेकिन ज्यादा अच्छा ताे तब है जब आप देश की सड़कों पर विनम्र दिखाई दें।

    क्या यह हिन्दूवादी और ब्राह्मणवादी पार्टी के भीतर कम कमाल की बात है कि जो लोग अपने चौके-चूल्हे पर जिस जाति के नादान बच्चे तक के चढ़ जाने पर गंगाजल से स्नान करते हैं और गंगाजल से चौका-चूल्हा धोते हैं, उस सड़ी हुई सोच और अमानवीय विचारधारा के लोगों को अपने हृदय में बसाना पड़ता है। मुझे लगता है, यह बदलाव है और बड़ा बदलाव है, जिसे सामाजिक न्याय की राजनीति के दबाव से आना पड़ा है। आप यकीन मानिए, यह बदलाव अभी और विस्तार लेगा और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को खत्म करके एक ऐसा हिन्दुत्व खड़ा करेगा, जिसमें 90 प्रतिशत पिछड़ी और दलित जातियों की भूमिका है। संघ आजकल इसी सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रहा है और इसीलिए जल्द से जल्द वह अपने प्रांतों की कमान इस वर्ग के लोगों को सौंप रहा है। यह अनचीन्हा आरक्षण है, जिसकी संघ के लोगों ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी।

    यह इसलिए भी बड़ा बदलाव है, क्योंकि भारतीय राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के दोनों पद आज ऐसी जातियों के दो लोगों के पास हैं, जो आम समाज में बेहद अप्रतिष्ठित और दीनहीन बनाकर रख दी गई हैं। अगर जातिगत प्रतीकों से सामाजिक बदलाव आता है तो भाजपा सामाजिक बदलाव का यह संदेश देने में सफल रही है। कांग्रेस के पास दलित मीराकुमार पहले भी थी और ज़हीन-शहीन प्रतिभावान गोपाल गांधी भी कब से थे, लेकिन कांग्रेस को इनकी याद कभी नहीं आई। उसने विवशता में ये नाम ऐसे समय चुने, जब हार तय थी।

    दरअसल जाति आधारित सामाजिक न्याय का जो सिद्धांत कांग्रेसी, कम्युनिस्ट और समाजवादी लेकर आए थे, वह एकदम झूठा साबित हुआ और यह थियरी लोगों को न्याय नहीं दिला पाई। न लोकतंत्र बलशाली हुआ और न बंधुता ही कायम हुई। समता और स्वतंत्रता का तो प्रश्न ही नहीं है, इस मोहिनी सिद्धांत ने गरीब को गरीब नहीं समझा और उसकी जाति पूछना जरूरी समझा।

    हमारे देश में जिस समय जातिवादी और धर्मांधतावादी ताकतें मज़बूत हो रही हैं, उस समय अगर सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद पर कोई तीखा प्रहार हो रहा है तो वह इसी हिन्दुत्व की राजनीति से होता दिख रहा है।

    हिन्दुत्ववाद के ध्वजवाहकों को तो नहीं, लेकिन उसके चुनीदा रणनीतिकारों को अब यह समझ आ गया है कि वे अपना धार्मिक राज्य ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के बलबूते पर नहीं कर सकते। इसलिए इन जातियों को नींव में दबाकर अब दलित-पिछड़ा वर्ग, जिसकी भारतीय समाज में तादाद 90 प्रतिशत है, उन्हें अग्रणी रखकर ही हिन्दू भारत बनाना संभव है। लेकिन आप सदियों पुरानी इस कहावत को याद रखें कि लोहा लाेहे काे काटता है और ज़हर ही ज़हर को मारता है। इसलिए जो लोग ज़हर उलीच रहे हैं, उसे कंठ में धारण करने वाला कोई शिव तो हमारे आसपास नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह विष जातिवादी और ब्राह्मणवादी सोच के अंगों को तो नीला करके खत्म कर ही देगा।

    कोरी जाति के रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति और घांची जाति के नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने का साफ़ सा अर्थ यह है कि हिन्दुत्ववादी राजनीति के रणनीतिकारों ने भारी शिफ्ट किया है और अब वे जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें कम्युनिस्टों, समाजवादियों और कांग्रेसी लोगों के लिए संभावनाएं बहुत क्षीण पड़ गई हैं। वे अगर कोई क्रांतिकारी फार्मूला या रणनीति लेकर आगे नहीं बढ़ पाए तो इस राजनीतिक युद्ध में उनका पराभव सौ प्रतिशत तय है। राजनीतिक लोगों को यह समझ आ चुका है, लेकिन उनके आसपास मंडरा रहे मीडियाई और विश्वविद्यालयीय बुद्धिजीविता के भ्रम को पाले बैठे लोगों को यह समझ नहीं आया है और वे अपने आकाओं से ज़्यादा हल्ला करते हैं। गवाह चुस्त हैं और मुद्दई सुस्त हैं।

    और आप जल्द ही आने वाले चुनावों में बहुत स्पष्टता से देखेंगे कि हिन्दुत्ववादी राजनीति के रणनीतिकार आने वाले समय में ब्राह्मणवाद के अवशेषों को किस तरह धू-धू कर जलाते हैं। जो लोग अब तक आरक्षण की सरकारी नीतियों से परेशान थे और सुबह-शाम उस नीति को गरियाकर भाजपा-आरएसएस का दामन थाम रहे थे, उनके रुदन के दिन बहुत निकट है। हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद भले अभी मुस्लिमों को डरा रहा हो, लेकिन आप देखेंगे कि संघ और भाजपा के ये कोविंद जैसे सजावटी दीए कुछ दिन बाद ब्राह्मणवादियों और सवर्णवादियों को भी डराने लगेंगे; क्योंकि इनके साथ ही अब इन पदों से सदा के लिए कथित ऊंची जातियों के नेताओं की छुट्टी होने वाली है।

    यह अलग बात है कि ट्रांस्नेशनलिज़्म, कॉमन मार्केटिज़्म, कांपीटीटिव डेमाक्रेटिक इकोनॉमी और नई टेक्नाेलॉजिकल इंस्पीरेशंस के दबाव किसी भी देश में कट्टरतावादियों, रूढिवादियों और प्रतिगामी शक्तियों को कामयाब नहीं होने देंगे। एक तरह से एक बार अंधेरा गहराएगा और उसमें से एक नई दुनिया का साफ़ और सुंदर चेहरा दिखाई देगा।

  • एक चुटकी मुस्कान

    एक चुटकी मुस्कान

    Mukesh Kumar Sinha

    होंठ के कोने से चिहुंकी थी हलकी सी मुस्कराहट
    आखिर दूर सामने जो वो चहकी,
    नजरें मिली, भर गयी उम्मीदें
    हाँ, उम्मीदें अंतस से लाती है हंसी !!

    माँ के आँचल में दबा, था अस्तव्यस्त
    छुटकू सा बालक, स्तनपान करता
    तभी आँचल के कोने से दिख गए पापा
    मुस्काया, होंठ छूटे और फिर खिलखिलाया
    आखिर जन्मदाता ही देते हैं पहली हंसी
    भरते हैं जीवन में किलकारियाँ !!

    हंसी, खिलखिलाहट, हो हो हो …….हां हा हा
    जीने के लिए है लाइफ लाइन
    इसलिए तो मुस्कुराते फोटो के लिए
    कहते हैं चीज या पनीर, और
    क्लिक पर मुस्कुरा जाता है चेहरा …… !!
    ताकि गंभीर भी कहलायें
    हंसमुख व फोटोजनिक !!

    कभी दर्द से कराहो या हो
    शोक संतृप्त दृश्य, हो सब गमगीन
    और, लगे कोई बच्चा खिलखिलाने
    फिर देखना, कैसे छूटेगा फव्वारा
    खिलखिलाहटों का, दर्द की झील से निकल कर !!

    अन्दर से आ रही हो हंसी, और खिलखिलाओ
    समझ में आती है बात
    पर कभी रोते रोते
    कुछ ऐसे जगाओ खयालात
    ताकि हंस पड़े जज्बात !!
    तब खुद से कहोगे क्या बात क्या बात!!

    वैसे हंसी होती है प्यार, न्यारी
    दिल दिमाग और स्वास्थ्य
    के लिए भरती है पिचकारी
    हंसी को हो वजह कुछ भी
    पर जब खिलखिलाएं खुद की
    बेवकूफियों और गलतियों पर
    वो हंसी, हो जाएँ खुद पर कुर्बान
    कहता है तब मन !!

    हंसो हंसो, बन जाओ लाफिंग बुद्धा
    ताकि कहलाओ स्वयंसिद्धा !!

    जिंदगी का जायका ही बदल देती है
    एक चुटकी मुस्कान !!

  • अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    Vidya Bhushan Rawat

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए. ये भी हकीकत है के ऐसे हमले सीमा पार की शह के बिना पे नहीं हो सकते हैं लेकिन भारत सरकार की कश्मीर निति पूर्णतः असफल हो चुकी है. हम जानते है के इस वक़्त भक्त पत्रकार मामले को सांप्रदायिक रूप देने में व्यस्त होंगे और कई ने ट्वीट करना शुरू किया है के क्या #नोटइनमायनेम का कोई प्रदर्शन भी होगा . ये शर्मनाक है क्योंकि देश पर किसी भी संकट पर हम सभी लोग साथ होते हैं लेकिन अगर उस संकट का संप्रदायी करण करने की कोशिश होगी तो स्थिती बेहद गंभीर होगी .

    हम जानते है के आतंक की इस वारदात का देश के सभी लोग चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, दलित हो या आदिवासी या अन्य कोई कड़े शब्दों में निंदा करते है . हम लोग आतंक के खिलाफ है लेकिन हर किस्म के . उस आतंक के भी जो गौरक्षा के नाम पर निरपराध लोगो को मार रहा है . आखिर आतंक की किसी भी घटना में मारने वाले लोग तो निरपराध ही होते हैं .

    हम जानते हैं के कश्मीर में भारत के जवान लड़ रहे है और अपने जान की क़ुरबानी भी दे रहे हैं . सवाल यह नहीं के फौज या जवान कार्य नहीं कर रहे . सवाल इस बात का है के इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के बावजूद ऐसी घटना घटती है तो किसे दोष दे. आतंकवादी तो चाहते हैं के निरपराध लोगो को मारकर कश्मीर और देश में अफरा तफरी का माहौल पैदा कर दे. लोगो को एक दुसरे के खिलाफ खड़ा कर दे. कश्मीर में भाजपा की गठबंधन सरकार है और इसके नेताओं ने अपनी पूरी मर्जी कश्मीर पर चलाई है. न केवल सरकार ने अपितु टी वी पर भडुआ भोम्पुओ की फौज भी माहौल को साम्प्रदायिक बनाने में जुटी है लेकिन सवाल इस बात का है के कश्मीर में जो राजनैतिक पहल होनी चाहिए थी वो क्यों नहीं हो रही . क्यों ये सरकार हर एक मसले का हल सेना के जरिये चाहती है. अगर सेना हल होती तो हर देश में समस्याओ का समाधान सेना के जरिये हो जाता. सेना देश की सुरक्षा के लिए है और सैनिक उसके लिए अपनी जान भी लगा देता है . आज सिक्किम में भी भारतीय जवान अपनी जान पे खेलकर हमारी सीमा को सुरक्षित कर रहे है लेकिन सवाल यह है के बात कब होगी . क्या युद्ध किसी बात का समाधान है ?

    हम राजनैतिक दलों और सरकार से अनुरोध करते हैं के कश्मीर के प्रश्न को गंभीरता से ले और उस पर सर्वदलीय बैठकर बुलाकर एक विशेष कमिटी का गठन करे . आतंकवादियों से कोई बात नहीं होनी चाहिए लेकिन कश्मीर के अन्दर जो लोग राजनैतिक समाधान चाहते हैं उनके साथ तो बात हो सकती है .

    सरकार का काम होना चाहिए के सभी से अनुरोध करे के जहाँ इस घटना पर उसे दुःख होना चाहिए और इस कृत्य को करने वाले लोगो के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए वही अपने चाहने वालो को देश के दुसरे हिस्से में आग उगलने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश से बचना चाहिए. अपने चुनाव जीतने के चक्कर में देश को विभाजित न करे . घटना की कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए लेकिन सरकार की कश्मीर निति पर सवाल भी पूछे जाने चाहिए .

  • लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    Mukesh Kumar Sinha

    लड़कियों से जुड़ी बहुत बातें होती है
    कविताओं में
    लेकिन नहीं दिखते,
    हमें दर्द या परेशानियों को जज़्ब करते
    कुछ लड़के
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए, अपनों के सपनों के साथ

    वो लड़के नहीं होते भागे हुए
    भगाए गए जरुर कहा जा सकता है उन्हें
    क्योंकि घर छोड़ने के अंतिम पलों तक
    वो सुबकते हैं,
    माँ का पल्लू पकड़ कर कह उठते हैं
    “नहीं जाना अम्मा
    जी तो रहे हैं, तुम्हारे छाँव में
    मत भेजो न, ऐसे परदेश
    जबरदस्ती!”

    पर, फिर भी
    विस्थापन के अवश्यम्भावी दौर में
    रूमानियत को दगा देते हुए
    घर से निकलते हुए निहारते हैं दूर तलक
    मैया को, ओसरा को
    रिक्शे से जाते हुए
    गर्दन अंत तक टेढ़ी कर
    जैसे विदा होते समय करती है बेटियां
    जैसे सीमा पर जा रहा हो सैनिक
    समेटे रहते हैं कुछ चिट्ठियाँ
    जिसमे ‘महबूबा इन मेकिंग’ ने भेजी थी कुछ फ़िल्मी शायरी

    वो लड़के
    घर छोड़ते ही, ट्रेन के डब्बे में बैठने के बाद
    लेते हैं ज़ोर की सांस
    और फिर भीतर तक अपने को समझा पाते हैं
    अब उन्हें ख़ुद रखना होगा अपना ध्यान
    फिर अपने बर्थ के नीचे बेडिंग सरका कर
    थम्स अप की बोतल में भरे पानी की लेते हैं घूँट
    पांच रूपये में चाय का एक कप खरीद कर
    सुड़कते हैं ऐसे, जैसे हो चुके हों व्यस्क
    करते हैं राजनीति पर बात,
    खेल की दुनिया से इतर

    कल तक,
    हर बॉल पर बेवजह ‘हाऊ इज देट’ चिल्लाते रहने वाले
    ये छोकरे घर से बाहर निकलते ही
    चाहते हैं, उनके समझ का लोहा माने दुनिया
    पर मासूमियत की धरोहर ऐसी कि घंटे भर में
    डब्बे के बाथरूम में जाकर फफक पड़ते हैं
    बुदबुदाते हैं, एक लड़की का नाम
    मारते हैं मुक्का दरवाज़े पर

    ये अकेले लड़के
    मैया-बाबा से दूर,
    रात को सोते हैं बल्व ऑन करके
    रूम मेट से बनाते है बहाना
    लेट नाइट रीडिंग का
    सोते वक्त, बन्द पलकों में नहीं देखना चाहते
    वो खास सपना
    जो अम्मा-बाबा ने पकड़ाई थी पोटली में बांध के

    आखिर करें भी तो क्या ये लड़के
    महानगर की सड़कें
    हर दिन करने लगती है गुस्ताखियाँ
    बता देती है औकात, घर से बहुत दूर भटकते लड़के का सच
    जो राजपथ के घास पर चित लेटे देख रहें हैं
    डूबते सूरज की लालिमा

    मेहनत और बचपन की किताबी बौद्धिकता छांटते हुए
    साथ ही बेल्ट से दबाये अपने अहमियत की बुशर्ट
    स को श कहते हुए देते हैं परिचय
    करते हैं नाकाम कोशिश दुनिया जीतने की
    पर हर दिन कहता है इंटरव्यूअर
    ‘आई विल कॉल यु लेटर’
    या हमने सेलेक्ट कर लिया किसी ओर को

    हर नए दिन में
    पानी की किल्लत को झेलते हुए
    शर्ट बनियान धोते हुए, भींगे हाथों से
    पोछ लेते हैं आंसुओं का नमक
    क्योंकि घर में तो बादशाहत थी
    फेंक देते थे शर्ट आलना पर

    ये लड़के
    मोबाइल पर बाबा को चहकते हुए बताते हैं
    सड़कों की लंबाई
    मेट्रों की सफाई
    प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान,
    कनाट प्लेस के लहराते झंडे की करते हैं बखान
    पर नहीं बता पाते कि पापा नहीं मिल पाई
    अब तक नौकरी
    या अम्मा, ऑमलेट बनाते हुए जल गई कोहनी

    खैर, दिन बदलता है
    आखिर दिख जाता है दम
    मिलती है नौकरी, होते हैं पर्स में पैसे
    जो फिर भी होते हैं बाबा के सपने से बेहद कम
    हाँ नहीं मिलता वो प्यार और दुलार
    जो बरसता था उनपर
    पर ये जिद्दी लड़के
    घर से ताज़िंदगी दूर रहकर भी
    घर-गांव-चौक-डगर को जीते हैं हर पल

    हाँ सच
    ऐसे ही तो होते हैं लड़के
    लड़कपन को तह कर तहों में दबा कर
    पुरुषार्थ के लिए तैयार यकबयक
    अचानक बड़े हो जाने की करते हैं कोशिश
    और इन कोशिशों के बीच अकेलेपन में सुबक उठते हैं

    मानों न
    कुछ लड़के भी होते हैं
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए अपनों के सपनों के साथ।

  • दंगो में ऐसा ही होता है

    Hafeez Kidwai

    दूर एक हाथ कटा पड़ा था। उस हाथ का जिस्म अलग एक खम्भे से टेक लगाए पड़ा था। शायद औरत थी। करीब से देखा तो फुसफुसा रही थी और करीब गया तो फुसफुसाहट समझ आने लगी। एक हाथ से हाथ जोड़ते हुए वह कह रही है “मेरी बेटी से एक एक करके बलात्कार करो,एक साथ करोगे मर जाएगी। वह मर जाएगी,ए आदमियों इधर मुझपर आ जाओ, उसपर एक साथ मत टूटो, वह मर जाएगी।”

    यह शब्द अगर किसी इंसान ने सुने होते तो उसके जिस्म की अकड़न शर्मिंदगी से खुद बखुद खत्म हो जाती। दूर उसकी आठ साल की बच्ची पड़ी थी। करीब जाकर देखने पर महसूस हुआ जो हमारे लिए आठ साल की बच्ची थी, वह अभी किसी वहशी झुँड के लिए औरत थी।

    कभी उस औरत को देखता तो कभी उस बच्ची को, तो कभी जले हुए घर देखता तो कभी बारिश की तरह बिखरे पड़े ख़ून को।लड़की के होंट वहशियों की गन्दगी से छुप गए थे।रुमाल को गीला करके मैं उसके मुँह को साफ़ करता की आँसू फिर टपक कर उसका मुँह गीला कर देते। मैं बार बार साफ़ करता, वह बार बार गन्दा हो जाता। उसके जिस्म से उठती दूसरे झुण्ड की बदबू दिमाग में इस तरह चढ़ी की कल दोपहर की पी चाय एक झटके में मुँह से निकल गई।

    किसी ने आकर मुझे उठाया,मैंने पलट कर सवालिया अंदाज़ में उसे देखा। उसने कहा दोस्त परेशान मत हो। दंगो में ऐसा ही होता है। भीड़ किसी को भी नही बख्शती। यह हमारा दुर्भाग्य है की हम इसमें फंस गए। दँगे हर एक को खत्म कर देते हैं।यही बहुत रहा की हम ज़िंदा बच तो गए।।।।।वह मुझ मुर्दे से बोले जा रहा था जैसे वह बोले जा रही थी। “मेरी बेटी से एक एक कर के बलात्कार करो, एक साथ मत करो, वह सह नही पाएगी, मर जाएगी”