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  • ब्रहमताल झील की ट्रेकिंग –Vineeta Yashswi

    Vineeta Yashswi

    बाहर अभी भी अंधेरा ही है और सर्दी भी बहुत ज्यादा। मैं अनमने मन से उठ के भवाली जाने के लिये तैयार हुई जहाँ से मुझे लोहाजंग, चमोली के लिये टैक्सी पकड़नी है जो सुबह 7 बजे हल्द्वानी से भवाली पहुँचने वाली है। यदि वो टैक्सी छूटी तो फिर लोहाजंग पहुुंचना मुश्किल हो जायेगा। लोहाजंग से मुझे ब्रहमताल का ट्रेक करना है जो 3,840 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक बेहद खूबसूरत हिमालयी झील है…

    स्टेशन जाते हुए घुप्प अंधेरी सड़क पर सन्नाटा पसरा रहा जिसे कुत्तों के भोंकने की आवाजें तोड़ती रही। बस कुछ नेपाली मजदूर दूध की पेटियाँ अपने पीठ पर लादे उन्हें घरों में बाँटने के लिये जाते जरुर दिखे। स्टेशन पर भी सन्नाटा है और भवाली के लिये कोई साधन नहीं मिला। कुछ टैक्सी वाले चक्कर काटने लगे और मनमानी बुकिंग में भवाली जाने को तैयार हैं पर कुछ देर खड़े रहने के बाद पिथौरागढ़ जाने वाली गाड़ी मिल गयी जिसने 7 बजे भवाली पहुँचा दिया…

    जिस टैक्सी से मुझे जाना है उसका टायर पंक्चर हो गया इसलिये भवाली में कुछ देर इंतजार करना पड़ा जो बेहद उबाऊ और कठिन काम है तब तो और भी ज्यादा जब ठंडी भी गजब की हो। खैर भवाली में बने पार्क में आधा घंटा बिताया तब तक टैक्सी आ गयी और मैं अल्मोड़ा को निकल गयी…

    रास्ते में कोसी नदी को देख कर दुःख हुआ क्योंकि अच्छी बारिश न होने के कारण कोसी सूखी पड़ी है। कुछ देर में टैक्सी अल्मोड़ा होते हुए सोमेश्वर पहुँची। सोमेश्वर घाटी हमेशा की तरह ही खूबसूरत लगी जिसे फसलों से लहलहाते खेत और भी आकर्षक बना रहे हैं…

    सोमेश्वर से कौसानी होते हुए टैक्सी आगे बढ़ी और छोटे-छोटे गांवों, खेतों और जंगलों को पार करते हुए ग्वालदम पहुँची जहाँ खाने की लिये कुछ देर रुकी। मौसम में अभी भी हल्की ठंड है और बादल भी छाये हैं। यहाँ कुछ सैलानी सेल्फी लेते जरूर नजर आये। यहाँ से आगे का रास्ता ज्यादा संकीर्ण और घुमावदार होने लगा। अभी काफी लम्बा रास्ता तय करना है इसलिये ड्राइवर ने गाड़ी बहुत कंजूसी से रोकी पर रास्ते में एक  शादी का नाच-गाना बेफिक्री से चल रहा है जिसने ट्रेफिक रोक दिया। गाँव की ये शादियाँ देखने में मजा आता है। इनमें एक ओर पारंपरिक रीति-रिवाज होते हैं तो वहीं ये नये जमाने की आबोहवा का मजा लेने से भी नहीं हिचकते फिर वो नाच-गाना हो या आधुनिक लिबास। यहाँ सब कुछ मिलता है। यहाँ तक की स्मार्ट फोन भी  इंटरनेट कनेक्शन के साथ। वट्सैप और फेसबुक से ये अंजान नहीं हैं। हाँ ये अलग बात है कि इंटरनेट सिग्नल या तो आते नहीं या स्पीड बहुत कम होती है। कुछ युवक-युवतियाँ शादी की सेल्फी इंटरनेट पर अपडेट करना चाहते हैं पर शायद कन्क्टीविटी न होने के कारण अपडेट नहीं कर पा रहे जिसकी खीझ उनके चेहरों में दिखायी देती है। शादी की खुशी से बड़ा गम है यह इनके लिये। काफी खुशामद करके जैसे-तैसे बारात ने थोड़ा रास्ता दिया तो सड़क खुली और टैक्सी आगे बढ़ी…

    आगे रास्ता कई जगहों पर टूटा है और लोग इन खस्ताहाल सड़कों पर जिन्दगी की बाजी लगाने को मजबूर हैं। पर नजारे बहुत खूबसूरत हैं। छोटे गाँवों के बीच से बहती हुई पिण्डर नदी बहुत अच्छी लग रही है। संकरी सड़कों से होते हुए कुछ देर में देवाल पहुँचे। यहाँ ड्राइवर ने चाय पीने के लिये टैक्सी रोकी तो मैं देवाल की छोटी सी बाजार देखने आ गयी। इस छोटी कस्बाई बाजार में स्थानीय लोगों के जरूरत का सारा सामान मिलता है। मैं एक फल की दुकान में गयी। दुकानदार ने संतरे मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा – यहाँ के संतरे एक बार खा लोगी तो हमेशा याद करोगी। उसकी बात पर मुझे कोई भरोसा नहीं है पर भूख लगने के कारण मैंने संतरे ले लिये और एक संतरा छील के खाया। वाकई में क्या स्वादिष्ट संतरा है। इतना मीठा, रसीला और मुलायम संतरा मैंने इससे पहले कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा मुँह में रखते ही ऐसे पिघल गया जैसे केंडी फ्लाॅस पिघलती है…

    अब शाम होने लगी और आगे का रास्ता और भी खौफनाक हो गया। सड़कें कई जगहों में टूटी दिखी। लगभग डेढ़ घंटे में टैक्सी लोहाजंग पहुँच गयी और मैं लोहाजंग के अपने गैस्ट हाउस चली गयी। कुछ देर आराम करने के बाद जब मैं बाहर निकली तो सामने नन्दाघुंटी की चोटी सूर्यास्त की रोशनी से नहायी हुई थी जिसे हल्के बादलों ने ढका था। मैं बाजार आ गयी। रास्ते में देखा कुछ महिलायें और पुरुष को एक घास सुखा कर उसे बोरों में भरते देखा…

    मैं उनके पास चली गयी। तीनों महिलायें पारम्परिक गढ़वाली लिबास, काला घाघरा, स्वेटर और सर में फूलों के डिजाइन वाला स्कार्फ पहने हैं। उनके घाघरे मोटे कपड़े के हैं जो ठंड से बचाने के लिये अच्छे होते होंगे परन्तु पुरुष तो आधुनिक लिबास पैंट-शर्ट, स्वेटर और जैकेट में हैं। मेरे जाने से महिलायें शर्मा गयी और अपने मुँह नीचे कर लिये जिससे उनके लाल-लाल चेहरे और भी लाल हो गये…

    घास के बारे में पूछने पर पीछे खड़ा एक आदमी बोला – ये झूला घास है। इसे हमने बाजार में बेचने के लिये जंगलों से इकट्ठा किया है। इससे बहुत चीजें बनती हैं जैसे – धूप, पेंट और  तरह-तरह की इत्र। पूरी बातचीत के दौरान महिलायें लगातार सर झुकाये काम करती रही और पुरुष मुझसे बात करते रहे। हालाँकि बात हिन्दी भाषा में हुई पर गढ़वाली भाषा की झलक दिखती है…

    उनसे बातें करके मैं बाजार आ गयी। लोहाजंग की छोटी बाजार में गाँव वालों और ट्रेकिंग के लिये आये पर्यटकों की जरूरत का सामान मिल जाता है। एक दुकानदार ने बताया – सड़क बंद होने से परेशानी होती है क्योंकि जरूरत का सामान नहीं आ पाता। दुकानदारों से बात करते हुए महसूस हुआ कि ये लोग काफी बिजनस माइंडेड हैं। ट्रेकिंग के लिये आये पर्यटकों से पैसे कैसे वसूलने हैं ये अच्छे से जानते हैं…

    बाजार का चक्कर थोड़ी देर में ही पूरा हो गया। रैस्ट हाउस लौटते हुए एक बुजुर्ग मिल गये। उनके झुर्रियों से भरे चेहरे में उनकी दो छोटी-छोटी आँखें सबसे ज्यादा चमक रही हैं। लोहाजंग के बारे में बताते हुए जब वो बोले तो उनके मुँह में दाँत भी अवशेष मात्र बचे दिखेए उन्होंने बताया – लोहाजंग में देवी पार्वती की राक्षस लोहासुर के साथ घमासान जंग हुई थी जिसमें देवी पार्वती ने राक्षस लोहासुर को मार डाला। इसीलिये इसे लोहजंग कहते हैं। लोह मतलब राक्षस लोहासुर और जंग मतलब युद्ध…

    जल्दी ही घुप्प अंधेरा छा गया और पूरा गाँव सन्नाटे के साये में चला गया और ठंडी भी बहुत ज्यादा बढ़ गयी। मैंने खाना खाया और सो गई…

    सुबह जब नींद खुली तो देखा नन्दाघुंटी में उगते सूरज की रोशनी में डूबी है पर हाँ बादलों से ढकी हुई। गुनगुनी धूप में खड़े होकर गाँव की खूबसूरती का मजा लिया और ब्रेकफास्ट निपटाया। कुछ देर में ट्रेक गाइड महेश भी आ गया। लगभग 4 फीट 9 इंच के कद वाला महेश अभी 19 साल का है और पिछले कुछ सालों से ट्रेकर्स को ट्रेकिंग पर ले जा रहा है। यही उसकी आय का मुख्य स्रोत है। देवाल के नजदीक का रहने वाला महेश खेती-बाड़ी की स्थितियों से बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं दिखता इसलिये ये काम कर रहा है ताकि परिवार को आर्थिक मदद कर सके। महेश के साथ उसके चाचा भी आये हैं। 69 वर्षीय चाचाजी हैं तो दुबले-पतले परं पर काम में काफी फुर्तीले हैं और बोलते भी खूब हैं। महेश ने बताया कि आज हम बेकलताल तक जायेंगे…

    Himalaya

    कुछ देर में ट्रेक शुरू हो गया। बाजार के बीच से एक रास्ता ऊपर को निकल गया और फिर धीरे-धीरे बाजार नीचे छूट गया। मौसम अब गर्म होने लगा। कहीं-कहीं सरसों के खेतों से घिरे मकान दिखे जो सुन्दर लगे। आजकल यहाँ बुराँश ही बुराँश खिला है। पूरा रास्ता बुरांश के लाल रंग से रंगा है। लाल बुरांशों के बीच  कहीं गुलाबी तो कहीं सफेद बुरांश भी दिख जाता। सरसों के पीले फूलों में लिपटी जमीन और बुरांश की लाली मिल कर इस जगह को जन्नत बना रहे हैं जिसे त्रिशुल और नंदाघुटी की चोटियाँ और भी निखार रही हैं…

    Peak Trishul

    सीधे-सरल रास्ते को आसपास के नजारे और भी सुन्दर बना रहे हैं। आगे बढ़ते हुए रास्ते में घास का बंडल पीठ में बाँध के लाती दो महिलायें मिली। दोनों ने धोती को कमर में लपेटा है और पैरों में कुछ नहीं पहना है। दोनों के चेहरों में बिखरी हँसी इस बात की गवाही दे रही हैं कि उन्हें इस बात की कोई शिकायत नहीं हैं। उनमें से एक महिला ने हँसते हुए कहा – हमारे लिये तो यह रोज की बात है। हम तो रोज ही जंगल जाते हैं और घास लाते हैं। अगर यह काम नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या ? दूसरी महिला ने कैमरा देख कर अपनी फोटो खिंचवाना चाहा और शर्त रखते हुए बोली – तुम मुझे फोटो दिखाओगी और अगर अच्छी नहीं आयी तो दूसरा फोटो खींचोगी। उसकी शर्त सुन कर हँसी तो आयी पर मजा भी आया क्योंकि ऐसी शर्त अभी तक मेरे सामने पहली बार ही रखी गयी है। खैर मैंने उसकी चार फोटो खींच कर उसे दिखायी जिसमें से पहली दो उसने रिजेक्ट कर दी और मुझे फिर से फोटो खींचने के लिये बोला। मेरी खुशकिस्मती है कि इस बार वाली फोटो उसे पसंद आयी और उसने कहा – किसी किताब में फोटो छपने भेजोगे तो मेरी पसंद वाली फोटो ही भेजना। आधुनिक तकनीक से ये महिलायें भी अब अंजान नहीं हैं ये देख कर अच्छा लगा। उन दोनों से बातें तो और भी करनी थी पर उन्हें देर तक रोकना भी ठीक नहीं इसलिये जल्दी ही ट्रेक शुरू कर दिया…

    रास्ता अब घने जंगलों के बीच से जाने लगा। जमीन में कई जगह सुअर के मिट्टी खोदे हुए के निशान दिखे। कई जगह झोपड़ियाँ बनी हैं जिनमें गर्मियों में खानाबदोश आते हैं और अपने पशुओं को रखते हैं। हिमालय की सफेद चोटियाँ हर जगह से दिखायी दे जाती जो थकावट नहीं होने दे रही हैं। जंगल में जैसे-जैसे आगे बढ़े वैसे ही ठंडी भी बढ़ने लगी और रास्ते में बर्फ के ढेर भी दिखने लगे। आगे का काफी लम्बा रास्ता बर्फ के ऊपर चल के ही तय किया…

    मैंने चाचाजी से मौसम के बारे में पूछा तो अपने फुर्तीले अंदाज में कहा – अब मौसम की क्या कहें। वैसे भी नैनीताल का फैशन और हिमालय का मौसम तो हर पल बदलते हैं। इसके बाद उनसे पूछने के लिये दूसरा सवाल नहीं था। हम तीन बजे बेकलताल पहुँचे और टेंट लगा के खाना खाया फिर पास के जंगल से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा की ताकि रात को जला सकें। अब शाम होने लगी और मैं बेकलताल देखने चली गयी…

    Bekaltaal

    बेकलताल झील का नाम है और ऐसी मान्यता है कि इसमें नाग देवता का वास है जो इस झील को हमेशा पानी से भरा रखते हैं। हरे रंग की झील ने मुझे दूर से ही आकर्षित कर लिया। सूरज की ढलती हुई रोशनी इसके रंग को और निखार रही है। शोरगुल से दूर यहाँ सिर्फ शांति है। कुछ देर मैं झील के किनारे ही बैठी रही। कभी-कभी मछलियों के उछल-कूद करने से झील के शांत पानी में हलचल हो जाती जो फिर शांत भी हो जाती। कुछ देर इस पसरी हुई शांती में मछलियों की उछल-कूद का मजा लेने के बाद में झील के किनारे-किनारे पैदल चलने लगी…

    यहाँ बैकल नाग देवता का एक छोटा मंदिर भी है। जिसके अंदर कुछ पत्थर की मूर्तियाँ रखी हैं। मंदिर की हालत देख के लगा कि यहाँ कोई पुजारी नहीं आता होगा। झील के किनारों पर मछली पकड़ने के काटे डले हैं यानि गाँव वाले यहाँ आते रहते होंगे। झील का पूरा चक्कर लगा के मैं दूसरे रास्ते से वापस लौट गयी। सूरज अस्त होने लगा और उसकी लाली में पूरी घाटी कुछ देर के लिये डूब गयी और फिर अचानक ही घुप्प अंधेरा छा गया और पूरी घाटी सन्नाटे की आगोश में चली गयी…

    अब बहुत तेज ठंड होने लगी और हवायें भी चलने लगी इसलिये इकट्ठा की हुई लकड़ियाँ जला ली और आग के पास खड़े होकर सूप पीया। तेज हवाओं से धुंआ इधर-उधर फैल रहा था इसलिये बार-बार जगह बदलना जरुरी हो गया। अभी आसमान में तारे चमक रहे हैं। अद्भुद होता है रात के सन्नाटे में तारों भरा आसमान देखना पर ठंडी बहुत ज्यादा बढ़ गयी इसलिये खाना खा कर टैंट में आयी और स्पीपिंग बैग के हवाले हो गयी…

    सुबह हल्की रोशनी से आँख खुली पर ठंडी अभी भी कम नहीं हुई। कुछ देर स्लीपिंग बैग में आलस करने के बाद मैं बाहर आयी और आग के पास खड़ी हो गयी। घाटी होने के कारण यहाँ धूप देर में आती है। आग के पास ही चाय-नाश्ता किया और आज के ट्रेक की तैयारी की। आज हमने ब्रह्मताल जाना है…

    Peak Camet

    आज शुरू के दो-तीन घंटे कठिन चढ़ाई वाले रहे जिसे पार करने में 3 घंटे लग गये। रास्ता घने जंगलों  से होकर जा रहा है इसलिये हल्की सी ठंड बनी है। चढ़ाई पार करते ही विशाल बुग्याल (घास का मैदान) सामने नजर आया। यहाँ से त्रिशुल और नन्दाघुंटी की चोटियाँ इतनी नजदीक लग रही हैं जैसे कि थोड़ा और चल के उन्हें छुआ जा सके। बुग्याल के एक ओर हिमालय अपनी सुन्दरता के साथ खड़ा है तो दूसरी ओर छोटे-छोटे गाँव नजर आये। नीले आसमान में छाये हल्के-हल्के बादल इस खूबसूरती को और बढ़ा रहे हैं। ये बेहद खूबसूरत नजारा है। मैं कुछ समय इस मैदान में बैठी रही और इन पलों को जितना हो सका जीने की कोशिश की और फिर चलना शुरू किया। अब तो बुग्याल का रास्ता शुरू हो गया। सर्दियाँं होने के कारण बुग्याल सूखे हैं पर बुग्याल सूखे हों या हरे-भरे हमेशा अच्छे ही लगते हैं। अब पैदल चलने में मजा आने लगा। बीच-बीच में खच्चर वाले अपने खच्चरों को ले जा रहे हैं जिनके गले में बजने वाली घंटियों से पूरा बुग्याल कुछ देर के लिये झनझना जाता और फिर खामोश छा जाती। जंगल अब नीचे छूट गया। यहाँ तो दूर-दूर तलक बुग्याल ही फैले हैं…

    हिमालय अपनी भव्यता के साथ काफी देर तक साथ चलता रहा। बुग्याल में एक ही सीध में आगे बढ़ती ही रही कि महेश ने नीचे उतरने का इशारा कर दिया और जैसे ही नीचे उतरना शुरू किया वैसे ही ट्रेक कठिन हो गया क्योंकि आगे का रास्ता पथरीला है और इस पथरीले रास्ते में ही नीचे उतरना है। बुग्याल की गुदगुदी नर्म जमीन में चलने के बाद इस पथरीले रास्ते में चलना वैसा ही था जैसे हाइवे की चकाचक सड़क से सीधे खड़ंजे वाली गड्ढेदार सड़क पर आ जाना…

    इस पथरीले रास्ते ने अच्छी खासी कसरत करा दी पर ट्रेकिंग का मजा भी तब ही है जब हर पल कुछ नया होता रहे। इस पथरीले रास्ते को पार करके नीचे पहुँची और फिर सीधी जमीन में चलना शुरू कर दिया।  इसी रास्ते में माँ नन्दा का मंदिर दिखा जो यहाँ की कुलदेवी हैं। अब तक तो नजारा और मौसम दोनों ही बहुत अच्छे हैं पर कुछ ही देर में ही आसमान बादलों से घिरने लगा। मैंने चाचाजी से फिर मौसम के बारे में जानना चाहा तो वो हँसते हुए बोले – नैनीताल का फैशन और हिमालय का मौसम कभी भी बदल जाते है…

    कैम्प साइट पर पहुँचते ही गजब की ठंडी होने लगी और ये क्या थोड़ी ही देर में हल्के बर्फ के फाये भी गिरने लगे। मैंने पहली बार बर्फ के फाहों को तारे के आकार का गिरते हुए देखा। बर्फ के फाहों का ये आकार मेरे लिये किसी अजूबे से कम नहीं है। मुझे लगा बर्फ कुछ देर गिरेगी और फिर मौसम निखर आयेगा जैसा कि अमूमन इन जगहों पर होता है और मेरा अंदाज सही निकला। कुछ देर में ही बर्फ गिरनी बंद हो गई और हल्की सूरज की रोशनी दिखने लगी। लंच करने के बाद मैं टहलते हुए ब्रहामताल की ओर आ गयी जो मेरे टेंट से कुछ दूरी पर है…

    स्थानीय मान्यता के अनुसार ऋषि वेद व्यास जब वेदों की रचना कर रहे थे, उस समय उन्हें पन्ने पलटने के लिये पानी की आवश्यकता पड़ी और उन्होंने भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की। ब्रह्मा ने वेद व्यास की प्रार्थना पर इस झील का निर्माण किया और इसका नाम ब्रह्मताल पड़ गया। ब्रह्मताल का पानी बिल्कुल पारदर्शी है पर इसका रंग गहरा काला नजर आता है…

    Brahmtal in heavy snow

    गहरे काले रंग की झील आजकल थोड़ी सूखी है इसलिये शायद किनारों पर काफी कीचड़ जमी दिखी।  हल्की सूरज की रोशनी में झील अच्छी लग रही है। थोड़ी देर यूँ ही झील के किनारे टहलने के मैं कैमरा लेने टैंट में वापस लौटी तो मौसम अचानक खराब हो गया और पहले से ज्यादा तेजी से बर्फ गिरने लगी। बर्फ का गिरना अच्छा लगता है इसलिये मैं इसका मजा लेने लगी। बर्फ की गति लगातार बढ़ती ही रही और साथ ही ठंड भी। मुझे अभी भी यकीन है कि कुछ देर में बर्फ गिरना बंद हो जायेगा और रात को मौसम साफ होगा…

    पर बर्फ तो लगातार तेज ही होती चली गयी। महेश ने गरमा-गरम मोमो बना दिये। इस मौसम में मोमो और गरम-गरम काॅफी का मजा ही और था। बर्फ अभी गिर ही रही जो अब परेशानी का सबब भी बनने लगी क्योंकि बर्फ ऐसे ही गिरती रही तो वापसी मुश्किल हो जायेगी। अब अंधेरा होने लगा और ठंड भी बढ़ गयी। टेंट भी बर्फ के वजन से थोड़ा दबने लगा था इसलिये उसके ऊपर गिरी बर्फ को झाड़ना जरुरी हो गया। कुछ देर में बर्फ गिरना फिर बंद हो गया और बादलों के बीच से आँख मिचैली करता हुआ चाँद नजर आने लगा तो उम्मीद बन गयी कि अब आसमान साफ ही हो जायेगा…

    चाचाजी ने आग जला दी गयी जिससे थोड़ी राहत मिली पर धुँए का हवा के साथ घूमते रहना एक गंभीर समस्या बन गया। बर्फ पड़ने से चचाजी के चेहरे में रौनक आ गयी और बोले – हमें तो बर्फ में ही अच्छा लगता है। बर्फ नहीं पड़ती है तो दुःःख होता है। ऐसे मौसम में तो हम में दोगुनी ताकत आ जाती है। उनसे उनके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया – मेरे परिवार में मेरी पत्नी, दो लड़के और एक लड़की है। अपने सफेद बालों में हाथ फेरते हुए उन्होंने बीड़ी का एक लम्बा कश खींचते हुए बोले – बच्चे तो पढ़-लिख गये हैं। दोनों लड़के काम करते हैं और लड़की की जल्दी शादी कर दूँगा। आसमान की ओर देखते हुए उन्होंने मौसम का कुछ अनुमान लगाया और फिर बुदबुदाये – मेरा एक लड़का मुम्बई के होटल में काम करता है और अच्छा कमा लेता है। वो कभी-कभार मुम्बई से टूरिस्टों को यहाँ भेज देता है जिन्हें मैं इधर के ट्रेक करा देता हूँ। इससे अच्छी कमाई हो जाती है। मेरे यह पूछने पर कि क्या यहाँ तेंदूआ और कस्तूरी हिरन भी दिखते हैं ? उन्होंने हँसते हुए कहा – बहुत दिखते हैं। कितने बार तो मैंने खुद तेंदुआ देखा है। फिर खिल-खिला कर हँसते हुए 22 साल पुराना किस्सा सुनाया – एक बार मुझे किसी के पास कस्तूरी हिरन की कस्तूरी मिल गई जिसे मैंने 15 हजार रुपये में उससे खरीदा और दिल्ली की एक पार्टी को 25 हजार रुपये में बेच दिया। मुझे 10 हजार रुपये का फायदा हो गया। आज से 22 साल पहले 10 हजार रुपये की बहुत कीमत थी। तब तो आप अभी भी ये सब काम करते होंगे मेरे ऐसा पूछने पर उनका जवाब था – नहीं अब ऐसा नहीं करता बस एक ही बार यह किया जिसके लिये मेरे घर वालों और जात-बिरादरी के लोगों ने बहुत सुनाया फिर उसके बाद कभी ऐसा नहीं किया। किस्सा सुनाने के बाद उनके झुर्रियों भरे चेहरे में हँसी बिखर गयी और उनकी आँखें लगभग गायब हो गयी…

    अपने अनुभव से उन्होंने कहा – बर्फ रात को भी गिरेगी क्योंकि मौसम अभी ठीक से खुला नहीं है। पर फिलहाल बर्फ रुकी इसलिये मुझे उम्मीद है कि सुबह मौसम ठीक होगा। इसी भरोसे के साथ आग के पास और बर्फ के ऊपर खड़े होकर खाना खाया फिर टेंट में आ गयी। आज ठंड बहुत ज्यादा है और सन्नाटा भी महसूस हो रहा है। नींद तो नहीं आई पर अभी आधी रात भी नहीं हुई कि बर्फ गिरनी शुरू हो गयी। बर्फ से बार-बार टेंट अंदर की ओर दबने लगा जिसे झाड़ना जरुरी हो गया। काफी देर तक इसी तरह समय कटा और फिर पता नहीं कब आँख लग गयी…

    अचानक बाहर से महेश और चाचाजी के चिल्लाने की आवाजों से आँख खुली। महेश बाहर से मेरे टेंट के ऊपर पड़ी बर्फ को झाड़ रहा है। मैं टेंट से बाहर आयी तो देखा जमीन में बहुत मोटी परत बर्फ की जम गयी है और अभी भी तेज बर्फ पड़ रही है। बर्फ की मोटी परत से मेरा टेंट भी नीचे दबने लगा। महेश और चाचाजी ने मुझे बार-बार बर्फ झाड़ते रहने को कहा ताकि टेंट दबे नहीं। सुबह होने में अभी दो घंटे बचे हैं। मेरे ये दो घंटे टेंट में बैठकर बर्फ झाड़ते हुए ही बीते। सुबह का उजाला देख जान में जान आयी और मैं बाहर आ गयी। अब तक तो बेहिसाब बर्फ जम गयी और उतनी ही तेजी से बर्फ गिर भी रही है…

    पहले मेरा इरादा सामने वाली चोटी में जाने का था पर अब सब जगह बर्फ ही बर्फ है। रात की बची हुई लकड़ियों को चाचाजी ने जला दिया जिसके पास खड़े होकर चाय नाश्ता किया। हालांकि आज रात भी मुझे  टेंट में ही रुकना है पर चाचाजी ने कहा अब बर्फ का रुकना मुश्किल है। ऐसे में यहाँ फँसना किसी मुसीबत से कम नहीं होगा। इसलिये तय हुआ कि लोहाजंग तक का पूरा टेªक एक ही दिन में कर के आज ही लोहाजंग पहुँच जायेंगे…

    जब चलना शुरू किया तो बर्फीली हवाओं ने मुँह में थप्पड़ बरसाने शुरू कर दिये। ताजी गिरी बर्फ में चलने पर पाँव अंदर तक धसक रहे हैं। थोड़ा चल लेने के बाद ब्रह्मताल आ गया। इस समय झील को देखना अलग ही एहसास है क्योंकि झील के चारों ओर बर्फ ही बर्फ है और ऊपर से भी बर्फ गिर रही है। कल कुछ देर के लिये ही झील दूसरे रूप में दिखी थी पर आज सब बदला हुआ है। कुछ देर झील के पास खड़े रहने के बाद फिर चलना शुरू कर दिया। अब पथरीली चढ़ाई शुरू हो गयी। बार-बार बर्फ के नीचे दबे पत्थरों की टोह लेते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ रहा है उस पर तेज हवाऐं चलना और मुश्किल कर रही हैं…

    कल आते समय नजारा रंगीन था और मात्र कुछ घंटों में सब बदल गया। आज रंग के नाम पर सिर्फ सफेद ही है। चाचाजी की बात सही थी कि हिमालय का मौसम कभी भी बदलता है हालाँकि नैनीताल के फैशन के बारे में कुछ नहीं कह सकती। जैसे-तैसे पथरीली चढ़ाई पार की और बुग्याल पर आये। कल जो बुग्याल पीली सूखी घास से ढका था वही बुग्याल आज बर्फ से ढका है। यहाँ पहुँच के एक बार लगा शायद अब बर्फ कम हो जाये पर यह भ्रम ही निकला क्योंकि थोड़ी ही देर में दोगुनी तेजी से बर्फ गिरने लगी। अब तो यह पक्का हो गया कि यहाँ रुकना मुसीबत में फँसना है इसलिये लोहजंग जाना ही होगा जो अभी बहुत दूर है…

    कुछ देर बुग्याल में रुकने के बाद आगे चलना शुरू किया। आज इधर-उधर देखने को कुछ नहीं है। हिमालय कहाँ है इसका कुछ आभास नहीं है क्योंकि बर्फिली धुुंध से सब ढका है। बुग्याल में हवायें और भी तेज हो गयी जिसने मुसीबत और बढ़ा दी। सिर झुकाये हुए बुग्याल पार किया और जंगल वाले इलाके में आ गये। पेड़ भी बर्फ से ढके हैं। सफेद के अलावा दूसरा कोई रंग नहीं है। यहाँ रास्ता थोड़ा संकरा हो गया जिसमें फिसलना मतलब गहरी खाई में गिरना है…

    काफी लम्बा रास्ता ऐसे ही तय किया। बीच में एक जगह आयी जहाँ बर्फ बहुत ज्यादा तेजी से गिरने लगी। यहाँ फिर से पाँव गहरे तक बर्फ में धसकने लगे। जूतों के अंदर भी पैर ठंड से सुन्न होने लगे और दस्तानों के अंदर तो हाथों के होने का एहसास भी नहीं हो रहा…

    कठिनाई से ही पर इस हिस्से को भी पार कर लिया। अब बर्फ गिरनी तो बंद हो गयी पर बारिश पड़ने लगी। लोहाजंग दिखायी देने लगा पर अभी भी काफी चलना है। अब तो मौसम तरह-तरह के रंग दिखाने लगा। कभी बारिश, कभी बर्फ, कभी धुंध तो कभी बिल्कुल साफ। हर कदम में मौसम ने नया रूप दिखाया। धुुंध के बीच कभी कोई छोटा सा घर नजर आ जाता तो अच्छा लगता। काफी देर से सफेद रंग की आदि हो चुकी आँखों को भी कोई दूसरा रंग देखना सुकुन दे रहा है। अब रास्ते में बर्फ नहीं है। लगता है जैसे सिर्फ ऊँचाई में ही बर्फ गिरी है। खैर जो भी हो मौसम का हर रंग देखते हुए अंततः शाम होते-होते लोहाजंग आ ही गया। मैं थकान और ठंड से हाल बेहाल हूं इसलिये जल्दी ही खाना खाया और आराम किया…

    सुबह भी बारिश और धुंध है। दिन में मौसम खुला तो मैं नजदीक ही अजना टाॅप चली गयी। जाते हुए रास्ते में छोटे बच्चों का स्कूल दिखा। शायद ठंड के कारण बच्चे अंदर न बैठ के छत पर बैठे हैं। मेरे हाथ में कैमरा देखते ही सारे बच्चे मेरे सामने इकट्ठा हो गये और फोटो के लिये अपने-अपने पोज देने लगे। बच्चों के स्टाइल को देख के लगा कि इन्हें पर्यटकों और कैमरों की आदत है। रास्ते में कुछ घर और खेत भी दिखे। एक खेत में किसान बहुत ही तन्मयता के साथ बैलों से हल जोत रहा है। यही तो है असली हार्ड-वर्क। मैं कुछ देर उसे हल जोतते हुए देखती रही फिर आगे बढ़ गयी और घने जंगल में पहुँच गयी। एक बार लगा जैसे मैं रास्ता भटक गयी हूँ पर आगे बढ़ते-बढ़ते अजना टाॅप आ गया। मैं कुछ देर घास में लेट कर आसमान को देखती रही…

    अब फिर से मौसम बिगड़ने लगा और ओले गिरने लगे। लौटते हुए पूरा रास्ता ओलों के बीच ही कटा। इन गिरते हुए ओलों के बीच अचानक ही एक 25-26 साल की महिला दिखायी दी। गोरे चिट्टे रंग और ठेठ पहाड़ी ठसक वाली उस महिला ने भी वही पारम्परिक लिबास ही पहना है। उसने मुझे रोकते हुए कहा – अजना टाॅप से आ रही हो ? तुम तो भीग गयी। मेरे घर चलो मैं आग जला दूंगी और तुम्हें चाय पिला दूँगी। मेरा रेस्ट हाउस यहाँ से कुछ ही दूर था पर मैं उसके साथ उसके घर चली गयी…

    हम रास्ते से थोड़ा ऊपर निकले और खेतों के बीच से होते हुए उसके घर पहुँचे। घर अंदर से तो मिट्टी से लिपा है पर बाहर से सीमेंट लगा है जिसे गुलाबी रंग के पेंट से रंगा गया है। छत पारम्परिक पत्थर की स्लेटों की है जिसे तिरछा करके लगाया है। पशुओं का कमरा अलग है। मुझे एक कमरे में बिठा कर वो दूसरे कमरे में चली गयी। इस कमरे में एक सोफा दो कुर्सियाँ और बीच में एक मेज है जो हाथ से बने मेजपोश से ढकी है। दिवार में कुछ सजावट के सामान के साथ देवी-देवताओं के कैलेंडर टंके हैं। घर के एक कोने में एक टेलिविजन ने भी अपनी जगह बनायी है। कुछ देर उस कमरे में अकेले रहने के बाद मैं महिला जिस कमरे में गई थी वहीं चली गयी। वो वहाँ रसोई के चूल्हे में आग जला रही है। मेरे आते ही वो थोड़ा शर्माते हुए बोली – आप बाहर बैठो। यहाँ कुर्सी नहीं है और लकड़ी का धुँआ भी है। मैं आपके लिये आग वहीं जलाकर लाती हूँ। परन्तु मैं रसोई में ही बैठ गयी। उसका नाम पूछने पर वो आग जलाते हुए बोली – चम्पा। चम्पा को देख के लगा है कि उसकी उम्र ज्यादा नहीं है इसलिये मैंने उम्र पूछ ही ली। चाय का बर्तन आग में रखते हुए बोली-  27 साल। फिर बोली – मेरी शादी को 7 साल हो गये हैं। मेरा मायका टिहरी में है। फिर कुछ सोच के बोली – अब तो नई टिहरी में आ गया है। पुराना वाला घर और जमीन तो टिहरी का बांध बनने में डूब गया। उदासी से बोली – मुझे तो नये घर की आदत भी नहीं है इसलिये मायके जाने का मन नहीं करता। मैं तो जाड़ों में भी यहीं रहती हूँ। उस समय घर पर कोई नहीं था। कुछ लोग खेत पर काम करने गये थे और कुछ बाजार की ओर…

    चूल्हे से चाय का बर्तन उतराते हुए चम्पा ने कहा – खेती बाढ़ी से तो गुजर बसर नहीं होती उस पर  मौसम का भी कुछ भरोसा नहीं है। कभी कैसा तो कभी कैसा।  अपने मन का हुआ। सरकार भी कुछ ध्यान नहीं देती। सब कुछ खुद ही करना हुआ। आग के पास बैठकर गरम लगने लगा। मैंने उससे रसोई गैस के बारे में पूछा तो बोली – जाड़ों में तो लकड़ी में ही खाना बनाते हैं। खाना भी बन जाता है और गर्मी भी रहती है। गैस बहुत महंगी हो गयी है इसलिये बचानी पड़ती है। चम्पा ने स्टील के ग्लास में चाय बना के मेरे हाथ में दी और फिर इधर-उधर कुछ ढूँढने लगी। पूछने पर बोली – देख रही हूँ अगर कहीं कोई बिस्कुट रखा मिल जाता तो तुम्हें देती। तुमको भूख भी तो लग रही होगी। इतना अपनापन और फिक्र ऐसी जगह में रहने वाले ही कर सकते हैं वरना शहरों में तो लोगों को अपनी ही होश नहीं होती। चाय की चुस्कियों के साथ उसकी बातें सुनते हुए समय जल्दी बीत गया और ओले गिरने भी बंद हो गये। उसे इजाजत ले के मैं लौट गयी। चम्पा सड़क तक मुझे छोड़ने आयी और बोली – कभी आओ तो मिलने के लिये आना। चम्पा के साथ आज आखरी दिन अच्छा बीता…

    यहाँ कुछ यादगार पल बिता के अगली सुबह नैनीताल वापसी की यात्रा शुरू कर दी…

    Vineeta Yashswi

    Vineeta Yashswi, a travel enthusiast. She loves travelling with the aim of reaching new places, people, and cultures. She loves trekking too.

    As a trekker, she completed the treks, 

    Milam Glacier (3500 mt.),
    Nanda Devi East Base Camp (4200 mt.),
    Roopkund Trek (4800 mt.),
    Kuari Pass Trek (3,500mt.),
    Chadar Trek in Leh on Frozen Zanskar River,
    Winter Deo Tibba Peak in Himachal (6001 mt),
    Kedarnath Trek (3885 mt.),
    Gangotri (3100mt.),
    Gaumukh (4255mt.),
    Tapovan (4463mt.) trek,
    Devariyatal (2438 m.),
    Tungnath (3680 m.),
    Chandrashila (4000 m.),
    Brahamtal Trek (4000mt.),
    Kedartal Trek (4790mt.) and other.

    She has a great passion for photography since her childhood. She says, “The photography is a pure medium of expression for me”.

  • वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

    वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

    Kumar Shyam

    यह विडियो राजस्थान के चूना बहुल इलाक़ों में स्थित चूना-फैकिट्रयों में काम करने वाले श्रमिकों के वास्‍तविक हालातों की ग्राऊंड-रिपोर्टिंग है। सीमित संसाधनों से एक यूट्यूबर द्वारा इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासी एवं स्‍थानीय मज़दूरों पर होने वाले बेतहाशा शोषण को सामने लाने का प्रयास है। सियासत और मुख्‍यधारा की मीडिया के लिए अरूचिकर हो चुके इन मसलों को इस विडियो में दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह से इन फैक्ट्रियों में मज़दूरों के स्‍वास्‍थ्‍य से लेकर उनके रहन-सहन की मलभूत आवश्‍यकतओं से वंचित रखा जाता है। पर्यावरणीय प्रदुषण के अलावा स्‍थानीय ग्रामीणों को किस तरह से मुश्किलों को सामना करना पड़ता है।

    Kumar Shyam

  • “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    एक अफ़गान मित्र जो कि वरिष्ठ एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव-विज्ञानी/समाजशास्त्री) हैं और जो राजनीतिक शरणार्थी की तरह यूरोप में रह रही हैं शाम होते ही कसरत करने लगीं, दौड़ने लगीं, वे अकेली नहीं थीं उनके साथ स्थानीय यूरोपीय लड़कियां और दो अमेरिकी अधेड़ प्रोफेसर भी कसरत कर रहे थे. होटल से लगे मैदान में वे हँसते मुस्कुराते हुए वर्जिश कर रहे थे. ये सब अगले दिन से शुरू होने वाली कांफ्रेंस के लिए आये थे. मैं उनका मेहमान था. कुछ समय बाद भोजन पर बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा कि आप सब पहले से ही इतने स्वस्थ और संतुलित शरीर वाले हैं आज ही आप यात्रा करके पहुंचे हैं आज कसरत न करते तो क्या हो जाएगा?

    स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में मानवशास्त्र और समाजशास्त्र कांफ्रेंस के दौरान इन मित्रों से मुलाक़ात हुई और कांफ्रेंस के दौरान कुछ एक गजब की बातचीत हुई, आज अपने भारतीय मित्रों के लिए यहाँ रख रहा हूँ.

    मेरा प्रश्न सुनकर अफगान प्रोफेसर हंसने लगीं, मैंने मजाक में कहा कि अब आपको इस हंसी के बारे में और अपनी कसरत के औचित्य के बारे में कोई गंभीर एंथ्रोपोलोजिकल या समाजशास्त्रीय व्याख्या देनी ही पड़ेगी. सभी मित्र हंसने लगे सभी मित्र मजाक के मूड में थे, आगे इस मुद्दे पर वे अफ़ग़ान प्रोफेसर बोलने लगीं कि पहले मैं भी ऐसे ही सोचती थी कि एक दो दिन कसरत न की जाए तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन बाद में समझ में आया कि अच्छी आदतों का एक अपना प्रवाह होता है एक सातत्य होता है जो बनाकर रखना जरुरी होता है. न केवल अच्छी या बुरी बातों का व्यक्तिगत चुनाव से रिश्ता होता है बल्कि उनका आपके समाज संस्कृति और धर्म से भी सीधा रिश्ता होता है. 

    ये बात अफगानिस्तान में रहते हुए समझ नहीं आई थी. लेकिन जब अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा और यहाँ यूरोप में आकर बसी तब पता चला कि एशिया और यूरोप की संस्कृति और समाज में बुनियादी फर्क क्या है और इस फर्क का इंसानों के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य से क्या रिश्ता है.

    आगे उन्होंने बताया कि असल में अफगानिस्तान पाकिस्तान भारत नेपाल जैसे मुल्कों में शरीर और मन के स्वास्थ्य का ख्याल रखने के लिए कोई इंसेंटिव और कोई व्यवस्था ही नहीं है. वहां सब कुछ मुर्दा और जड़ व्यवस्था में बंधा हुआ है. इसीलिये लोगों के शरीर और मन भी मुर्दा हो गये हैं. व्यक्तिगत जीवन में सृजन और प्रेम न होने के कारण ये मुल्क अपनी सेहत भी ठीक नहीं रख पाते. इसीलिये अफगानिस्तान भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में डाइबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत तो पूरी दुनिया में डाइबिटीज के मामले में पहले नम्बर पर है. 

    पाकिस्तान अफगानिस्तान के नीम हकीमों के इश्तिहार देखिये वे दो ही चीजों को बीमारिया समझते हैं तीसरी कोई बीमारी नहीं उनकी नजर में. ये दो बीमारियाँ हैं – कब्ज और नपुंसकता. ये दोनों  चीजें सीधे सीधे लाइफस्टाइल और समाज के मनोविज्ञान से जुडी हुई हैं. ये कब्ज और नपुंसकता न केवल इन समाजों के इंसानों के शरीर में है बल्कि इनकी संस्कृति में भी है. ये समाज न कुछ पैदा कर पा रहे हैं न पुरानी गंदगी को शरीर से बाहर निकाल पा रहे हैं. ये कहकर वे हंसने लगीं.

    ये बात सुनकर मैं चौंका, मैंने उनसे पूछा कि थोड़ा विस्तार से बताइए.

    वे आगे बताने लगीं कि वे पेशावर, कराची और दिल्ली में भी रह चुकी हैं, काबुल में पैदा हुई हैं. उन्होंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के समाज धर्म और संस्कृति को बहुत करीब से देखा है. भारत और पाकिस्तान में बचपन से ही लोगों को अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए कोई प्रेरणा या कारण नहीं दिया जाता. 

    इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहाँ प्रेम करने, दोस्ती, खेलकूद, और औरत मर्द के बीच रिश्ते बनाने की कोई आजादी नहीं है. कबीलों और अमीर गरीब के झगड़े इतने ज्यादा हैं कि आप अपने लिए दोस्त या लड़की या लड़का चुनकर उसे प्रभावित करके अपना दोस्त या जीवनसाथी बनाने की कल्पना ही नहीं कर सकते. आप अपने पडौसी, सहकर्मी, बॉस, या अधीनस्थ को उसकी कबीले वंश इलाके या जाति के गणित लगाये बिना बर्दाश्त ही नहीं कर सकते.

    भारत पाकिस्तान या अफगानिस्तान जैसे समाजों में लड़का लड़की अपनी मर्जी से अपने साथी नहीं चुन सकते. लेकिन यूरोप में वे अपनी मर्जी से ही जीवन साथी और मित्र चुनते हैं. इसीलिये यूरोपियन लड़के लडकियां ही नहीं बल्कि अधेड़ और बूढ़े बूढियां भी अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं. मन को प्रफुल्लित और स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि बेहतर भाषा, बातचीत के ढंग, नये विषयों का ज्ञान, नए हुनर, नई कलाएं संगीत, नृत्य, काव्य इत्यादि सीखकर अपने मित्रों और गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड आदि को प्रभावित कर सकें. 

    इस तरह न केवल वे व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक और मानसिक स्तर पर अनुशासित, स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं बल्कि इसी कारण से वे सामूहिक रूप से एक स्वस्थ, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज का निर्माण भी करते हैं. इसीलिये वे विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, खेलकूद, साहस और शौर्य आदि में बेहतर प्रदर्शन करके दुनिया पे राज करते हैं.

    आगे उन्होंने बताया कि पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत जैसे देशों में मामला एकदम उलटा है. यहाँ लड़की को उसका पति और लडके को उसकी पत्नी, उसके माँ बाप खोजकर देते हैं. उन्हें खुद अपने लिए जीवनसाथी की तलाश का कोई अधिकार नहीं है. इन बदनसीब मुल्कों में अगर कोई लडकी अपने लिए खुद कोई लडका चुन ले तो या तो परिवार और कबीले की नाक कट जाती है या जाति और कुल की नाक कट जाती है. ये लडके लडकियाँ अपनी योग्यता या अपनी खूबियों का प्रदर्शन करके अपने लिए बेहतर जीवनसाथी नहीं चुन सकते. इसीलिये उनके जीवन में अपने शरीर, मन, कैरियर को बेहतरीन हालत में बनाये रखने के लिए एक बहुत स्वाभाविक सी प्राकृतिक प्रेरणा ही जन्म नहीं ले पाती.

    ऐसे में इन मुल्कों के लडके लड़कियों को अच्छी भाषा, बातचीत का ढंग, कला, नृत्य, काव्य, संगीत इत्यादि सीखने की प्रेरणा ही नहीं होती. अगर आप इन सब कलाओं से अपने संभावित जीवनसाथी को प्रभावित और आकर्षित ही न कर सकें तो आपके व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक जीवन से सभ्य होने की, संवेदनशील या सृजनात्मक होने की सारी प्रेरणा ही खत्म हो जायेगी.

    पूरे जीव जगत और पेड़ पौधों को देखिये. वहां भी सारी सृजनात्मकता, कला, कौशल, शौर्य, क्षमता और सौन्दर्य का सीधा संबंध अपने लिए बेहतर जीवनसाथी के चुनाव से जुडा हुआ है. जिन समाजों ने इस सच्चाई का सम्मान किया है वे आगे बढ़े हैं और इस सच्चाई को नहीं समझ सके हैं वे बर्बाद हुए हैं.

    अब एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़की के बारे में सोचिये. उसे उसके माँ बाप उसका पति खोजकर देंगे. वो लडकी खुद अपनी मर्जी से अपना साथी नहीं चुन सकती. ऐसे में वो अपने आसपास के हजारों लड़कों में से अपनी पसंद के लडके को प्रभावित या आकर्षित करने के लिए न गीत संगीत या नृत्य सीखना चाहेगी, न कविता या शायरी सीखेगी न अच्छा भोजन बनाना सीखना चाहेगी न ज्ञान विज्ञान सीखेगी, वो सिर्फ और सिर्फ अपने चेहरे को खुबसुरत बनाने पर ध्यान देगी. 

    वो लडकी उतना ही सीखेगी या करेगी जितना कि उसके माँ बाप द्वारा खोजे गये नये परिवार और पति को खुश करने के लिए न्यूनतम रूप से आवश्यक होगा. यही चीज सेक्स और रोमांस के संबंध में उसकी क्षमता या पसंद को भी नियंत्रित करेगी वो कभी भी सेक्स या और्गाज्म का पूरा सुख नहीं लेना चाहेगी, क्योंकि ऐसा करते ही वो अपने पति की नजर में “गंदी औरत” बन जाएगी.

    इसी तरह एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़का भी अपने संभावित जीवन साथी को चुन नहीं सकता इसलिए वो अपने शरीर को स्वस्थ रखने, मन को सृजनात्मक बनाने, नयी कला, गीत संगीत, काव्य, हुनर आदि सीखने के लिए प्रेरित ही नहीं होता.

    अन्य मित्र भी इन बातों का समर्थन कर रहे थे. वे भी समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के प्रोफेसर और रिसर्चर थे. किसी एक ने भी इन बातों का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने अलग अलग अनुभवों से इन बातों का समर्थन ही किया.

    इन बातों के प्रकाश में भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के समाज संस्कृति और धर्म को ठीक से देखिये.

    इन मुल्कों में शादियाँ, रिश्तेदारी और संबंध प्रेम के आधार पर नहीं बल्कि घृणा के आधार पर होते हैं. शादी ब्याह में अधिक जोर इस बात पर होता है कि किन जातियों कबीलों या समुदायों को “नहीं” लाना है. किन लोगों जातियों या समुदायों को “लाना” है इस पर जोर लगभग नहीं ही होता है. वहीं यूरोप अमेरिका में अपने जीवन या परिवार में किसे “लाना” है इस बात पर सर्वाधिक जोर होता है. एक बार वे अपनी उम्र, विचार, और समान क्षमता के लोग पसंद कर लेते हैं और हर हालत में उनकी अमीरी गरीबी या कबीले वंश आदि को नकारते हुए उन्हें अपने जीवन या परिवार या समूह में शामिल कर लेते हैं.

    इस तरह यूरोप के प्रेम आधारित समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर मेलजोल और सभ्यता का विकास तेजी से होता है और भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान के घृणा आधारित समाज में सब तरह की सृजनात्मक प्रेरणाओं पर धर्म संस्कृति और भेदभाव का एक बड़ा भारी ताला लगा रहता है.

    भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में “किन लोगों” को “शामिल नहीं करना है”, किन लोगों को “जीने नहीं देना है” किन लोगों को “पढने लिखने नहीं देना है” या “रोजगार नहीं करने देना है” – इसकी बहुत साफ़ साफ़ प्रस्तावनाएँ लिखी गईं हैं. ये प्रस्तावनाएँ ही इन मुल्कों का धर्म और संस्कृति है. मनुस्मृति में तो साफ़ लिखा ही है कि किन वर्णों जातियों को शिक्षा और सम्पत्ति का अधिकार नहीं है. इसीलिये भारत पाकिस्तान जैसे समाज कभी भी प्रेम, बंधुत्व, मित्रता, सहकार, समता, सृजन, आदि के आधार पर न तो व्यक्तिगत जीवन जी पाते हैं न सामाजिक या सामूहिक जीवन का निर्माण ही कर पाते हैं.

    भारत की घृणा आधारित संस्कृति और यूरोप की प्रेम आधारित संस्कृति का विभाजन इसमें देखिए, आप देख सकेंगे कि आज का पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत ऐसा क्यों बन गया है. इन मुल्कों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, खेलकूद में प्रदर्शन, ज्ञान विज्ञान में फिसड्डीपन, गरीबी और जहालत इत्यादि को देखिये और आज के यूरोप की बुलंदियों को देखिये. अगर आप वर्तमान यूरोप की संस्कृति और समाज की तुलना भारती पाकिस्तानी समाज से नहीं कर पा रहे हैं तो आप भारत को समर्थ बनाने के संभावित मार्ग की कल्पना भी नहीं कर पायेंगे.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • क़ातिल बेगुनाह, तलवार न्यायाधीश और कुसूरवार गवाह उर्फ़ सलमान बनाम बिश्नोई समाज –Tribhuvan

    क़ातिल बेगुनाह, तलवार न्यायाधीश और कुसूरवार गवाह उर्फ़ सलमान बनाम बिश्नोई समाज –Tribhuvan

    Tribhuvan

    अली सरदार जाफ़री का एक शेर है: तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद, बे-गुनह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा। यानी जहां तेग़ यानी तलवार न्यायाधीश हो और जहां सूली और फ़ांसी गवाह हों, वहां पर क़ातिल ही बेगुनह हुआ करता है।

    सलमान खान प्रकरण में जो दोषी है, वह तो सबकी चर्चाओं और सम्मान के केंद्र में है, लेकिन जो न्याय दिलाने वाले और सम्मान के पात्र लोग हैं, वे हाशिये पर हैं। हम आज अगर पतन और गिरावट की राह पर हैं तो इसीलिए कि अपराधी की शोभा यात्रा निकाली जा रही है और जिसकी शोभा यात्रा निकाली जानी चाहिए, उन्हें उजड्ड और पुरातनपंथी हास्यास्पद बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रकरण में जो गवाह हैं और इस भ्रष्ट और गंदी व्यवस्था में भी पीछे नहीं हटे, वे बिश्नोई समुदाय से हैं और जांभोजी की शिक्षा के कारण ही वे निष्ठा के साथ खड़ रह सके। अगर ये निष्ठाएं नहीं होतीं तो सलमान कभी के इस प्रकरण से बाहर हो चुके होते।

    इन हालात में मुझे बताइये कि हमारे मीडिया और विश्व हिंदू परिषद के जोधपुर वाले उन हिंसकभाव वाले लोगों में क्या फ़र्क़ है, जो निरपराध अफराजुल की नृशंस हत्या करने वाले शंभु की शोभा यात्रा निकाल रहे हैं। देश का पूरा मीडिया और आम लोग तो भी वही सब होने को मरे जा रहे हैं!

    भगवान जांभोजी गुरुनानक जी से 18 साल पहले हुए थे। जांभाेजी का अनुयायी होने के लिए उसे 29 नियमों का मानना जरूरी है। दोनों संतों ने गुरुघरों का जो शिल्प अपनाया, उसमें एक अदभुत साम्य है। ये मसीत और मंदिर के बीच संतुलन कायम करते हैं। क्षमाशीलता को ऊपर मानते हैं। लेकिन प्राणी मात्र की रक्षा करना और हरे वृक्ष नहीं काटना दो ऐसे नियम हैं, जो बिश्नोई धर्म को बाकी सब धर्मों से अलग रखते हैं। हरे पेड़ों की रक्षा के लिए तो बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इनमें 111 तो महिलाएं थीं।

    बिश्ननोई समाज में भी मुस्लिम समाज की तरह मनुष्य को दफ़नाया जाता है, न कि जलाया जाता है। ऐसे बहुतेरे संप्रदाय हैं, जिनमें पार्थिव देह को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। लेकिन बिश्नाई धर्म के प्रति बचपन से ही मेरा अाकर्षण इसलिए रहा है, क्योंकि यह धर्म जीवों के प्रति अपार प्रेम रखता है। किसी भी बिश्नोई बहुल गांव में जाएं तो वहां आपको कितने ही हरिण और मोर ऐसे मिलेंगे, मानो हम किसी अभयारण्य में आ गए हों। बिश्नोई जीव की रक्षा के प्रति इतने प्रतिबद्ध होते हैं कि जीव की हत्या करने वाले की हत्या तक करने में भी उन्हें संकोच नहीं होता। ऐसे भी उदाहरण देखे जाते हैं। यह देखकर तो अांखों में आंसू आ जाते हैं कि कई बार किसी हरिणी को कुत्ते या जंगली जानवर मार दें और उसके बच्चे भूखे हों तो बिश्नोई महिलाएं उन्हें अपने बच्चे की तरह अपने सीने से लगाकर दूध पिला देती हैं। यह अदभुत और अकल्पनीय है।

    जिस युग में पर्वत, पहाड़, नदियां, झरने, वन संपदा और कुदरत के वारे वरदानों को इन्सान तबाह करने पर तुला है तब जांभाेजी भगवान की शिक्षाएं बहुत प्रासंगिक दिखाई देती हैं।

    Credits: Tribhuvan’s Facebook

  • नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    इन दिनों कई दलित संगठन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उसके आधिकारिक अभिलेखों में भीमराव अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ शब्द जोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बतौर, अंबेडकर ने संविधान की प्रति पर अपने हस्ताक्षर, भीमराव रामजी अंबेडकर के रूप में किए थे। परंतु सामान्यतः, उनके नाम में रामजी शब्द शामिल नहीं किया जाता है। तकनीकी दृष्टि से उत्तरदेश सरकार के इस निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह निर्णय, अंबेडकर को अपना घोषित करने की हिन्दुत्ववादी राजनीति का हिस्सा है। भाजपा के लिए भगवान राम, तारणहार हैं। उनके नाम का इस्तेमाल कर भाजपा ने समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया – फिर चाहे वह राममंदिर का मुद्दा हो, रामसेतु का या रामनवमी की पूर्व संध्या पर जानबूझकर भड़काई गई हिंसा का। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हम भारत में दो विरोधाभासी प्रवृत्तियों का उभार देख रहे हैं। एक ओर दलितों के विरूद्ध अत्याचार बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अंबेडकर की जंयतियां जोर-शोर से मनाई जा रही हैं और हिन्दू राष्ट्रवादी अनवरत अंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे हैं।

    इस सरकार के पिछले लगभग चार वर्षों के कार्यकाल में हमने दलितों के दमन के कई उदाहरण देखे। आईआईटी मद्रास में पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया, रोहित वेम्यूला की संस्थागत हत्या हुई और ऊना में दलितों पर घोर अत्याचार किए गए। मई 2017, जब योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे, में सहारनपुर में हुई हिंसा में बड़ी संख्या में दलितों के घर जला दिए गए। दलित नेता चंद्रशेखर रावण, जमानत मिलने के बाद भी जेल में हैं क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंसा भड़काई। दलितों के घरों को आग के हवाले करने की घटना, भाजपा सांसद के नेतृत्व में निकाले गए जुलूस के बाद हुई जिसमें  ‘‘यूपी में रहना है तो योगी-योगी कहना होगा‘‘ व ‘‘जय श्रीराम‘‘ के नारे लगाए जा रहे थे। महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काई गई और जैसा कि दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने कहा है, हिंसा भड़काने वालों के मुख्य कर्ताधर्ता भिड़े गुरूजी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। भाजपा की केन्द्र सरकार में मंत्री व्ही के सिंह ने सन् 2016 में दलितों की तुलना कुत्तों से की थी और हाल में एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी ऐसा ही कहा। उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में जब योगी आदित्यनाथ मुशहर जाति के लोगों से मिलने जा रहे थे, उसके पूर्व अधिकारियों ने दलितों को साबुन की बट्टियां और शेम्पू बांटे ताकि वे नहा-धोकर साफ-सुथरे लग सकें।

    मोदी-योगी मार्का राजनीति की मूल नीतियों और चुनाव में अपना हित साधने की उसकी आतुरता के कारण यह सब हो रहा है। सच यह है कि मोदी-योगी और अंबेडकर के मूल्यों में मूलभूत अंतर हैं। अंबेडकर, भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। वे जाति का उन्मूलन करना चाहते थे और उनकी यह मान्यता थी कि जाति और अछूत प्रथा की जड़ें हिन्दू धर्मग्रंथों में हैं। इन मूल्यों को नकारने के लिए अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था। उन्होंने भारतीय संविधान का निर्माण किया, जो स्वाधीनता संग्राम के वैश्विक मूल्यों पर आधारित था। भारतीय संविधान के आधार थे समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य। दूसरी ओर थीं हिन्दू महासभा जैसी संस्थाएं, जिनकी नींव हिन्दू राजाओं और जमींदारों ने रखी थी और जो भारत को उसके ‘गौरवशाली अतीत‘ में वापस ले जाने की बात करती थीं – उस अतीत में जब वर्ण और जाति को ईश्वरीय समझा और माना जाता था। हिन्दुत्ववादी राजनीति का अंतिम लक्ष्य आर्य नस्ल और ब्राम्हणवादी संस्कृति वाले हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। आरएसएस इसी राजनीति का पैरोकार है।

    माधव सदाशिव गोलवलकर व अन्य हिन्दू चिंतकों ने अंबेडकर के विपरीत, हिन्दू धर्मग्रंथों को मान्यता दी। सावरकर का कहना था कि मनुस्मृति ही हिन्दू विधि है। गोलवलकर ने मनु को विश्व का महानतम विधि निर्माता निरूपित किया। उनका कहना था कि पुरूषसूक्त में कहा गया है कि सूर्य और चन्द्र ब्रम्हा की आंखें हैं और सृष्टि का निर्माण उनकी नाभि से हुआ। ब्रम्हा के सिर से ब्राम्हण उपजे, उनके हाथों से क्षत्रिय, उनकी जंघाओं से वेश्य और उनके पैरों से शूद्र। इसका अर्थ यह है कि वे लोग जिनका समाज इन चार स्तरों में विभाजित है, ही हिन्दू हैं।

    भारतीय संविधान के लागू होने के बाद, आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने एक संपादकीय में संविधान की घोर निंदा की। आरएसएस, लंबे समय से कहता आ रहा है कि भारतीय संविधान में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। हाल में केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी यही बात कही। जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया था, तब उसका जबरदस्त विरोध हुआ था। दक्षिणपंथी ताकतों ने अंबेडकर की कड़ी निंदा की थी। परंतु अंबेडकर अपनी बात पर कायम रहे। उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें न केवल शास्त्रों को त्यागना चाहिए बल्कि उनकी सत्ता को भी नकारना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। तुम में यह साहस होना चाहिए कि तुम हिन्दुओं को यह बताओ कि उनमें जो गलत है वह उनका धर्म है – वह धर्म, जिसने जाति की पवित्रता की अवधारणा को जन्म दिया है‘‘।

    आज क्या हो रहा है? आज अप्रत्यक्ष रूप से जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाई. सुदर्शन ने हाल में कहा था कि इतिहास में किसी ने जाति प्रथा के विरूद्ध कभी कोई शिकायत नहीं की और इस प्रथा ने हिंदू समाज को स्थायित्व प्रदान किया। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करना और विश्वविद्यालयों में इन वर्गों व ओबीसी के लिए पदों में आरक्षण संबंधी नियमों में बदलाव, सामाजिक न्याय और अंबेडकर की विचारधारा पर सीधा हमला हैं।

    जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद होती जा रही है उसके समक्ष यह समस्या भी उत्पन्न हो रही है कि वह दलितों की सामाजिक न्याय पाने की महत्वाकांक्षा से कैसे निपटे। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति, जाति और लैंगिक पदक्रम पर आधारित है। इस पदक्रम का समर्थन आरएसएस चिंतक व संघ परिवार के नेता करते आ रहे हैं। उनके सामने समस्या यह है कि वे इन वर्गों की महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं करना चाहते परंतु चुनावों में उनके वोट प्राप्त करना चाहते हैं। इसी कारण वे एक ओर दलितों के नायक बाबा साहब अंबेडकर को अपना सिद्ध करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर, दलितों को अपने झंडे तले लाने की कोशिश में भी लगे हुए हैं। वे चाहते हैं कि दलित, भगवान राम और पवित्र गाय पर आधारित उनके एजेंडे को स्वीकार करें।

    यह एक अजीबोगरीब दौर है। एक ओर उन सिद्धांतों और मूल्यों की अवहेलना की जा रही है, जिनके लिए अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष किया तो दूसरी ओर उनकी अभ्यर्थना हो रही है। और अब तो अंबेडकर के नाम का उपयोग भी हिन्दुत्ववादी शक्तियां, राम की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहती हैं।   


    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    देश, समाज व मनुष्य

    मनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज व देश होगा ही होगा। मनुष्य परिवार, समाज व देश से बड़ा है, क्योंकि वह निर्माता है। देश व समाज की सत्ता, जीवन-मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही निर्मित, निर्धारित व परिवर्तित करता है। यही सहज सामाजिक तथ्य है; शेष राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व के लिए  तोड़मरोड़ कर निहित-स्वार्थों के लिए थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं। 

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिए   देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है, जिसका निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़, गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है। देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचना है। इसलिए जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।  परिवार, देश व समाज का निर्माण व विकास करना मनुष्य की जिम्मेदारी है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की पुस्तकों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा। यही वास्तविक व व्यापक परिवर्तन होगा। मानव निर्मित सत्ता तंत्रों को चलाने वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है। 

    नेतृत्व

    “मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के द्वारा व्यापक सामाजिक-परिवर्तन के लिए  सामाजिक-नेतृत्व प्रस्फुटित नहीं होता; सामाजिक-नेतृत्व राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम समाज की मौलिकता व गुणवत्ता से स्वतःस्फूर्त रूप में प्रस्फुटित होता है“

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भी सामाजिक-अवतार नहीं होता। जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्हीं तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जाने का साहस व दृष्टि हो ही नहीं सकती है। इसीलिए तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते हैं। ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह कभी भी मानव समाज का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता। क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह गढ़ी गईं है, जिनमें सबसे नीचे के आधार सबसे चौड़े और सबसे ऊपर की चोटियाँ सबसे नुकीली व सबसे कम चौड़ी होती हैं।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाते हुए, निरंतर दबाए रहते हुए ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिए मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, न ही व्यापक-समाधान की दृष्टि रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिष्ठापित किए गए हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    विश्व में अन-आयुधिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलते हुए ही अस्तित्व में आए हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व

    सामाजिक-परिवर्तन व निर्माण कर पाने में सक्षम नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण मौलिकता, गुणवत्ता, दूरदर्शिता, स्वतः स्फूर्ति के मिथकों के प्रयोजन बिना ही होता है। भारत जैसे बड़े देश व समाज में स्वतः स्फूर्त व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण न हो पाने के प्रमुख कारण जाति-व्यवस्था, ईश्वरीय अवतारों व इन अवतारों का धरती पर ईश्वरीय व्यवस्था के प्रयोजन के कारण अवतरित होने की अवधारणाएं, साहित्यिक काव्यों/ग्रंथों को संपूर्ण ज्ञान व ईश्वरीय मानने की अवधारणा, पोथियाँ, पौराणिक कथाएं व सामंतवादी मानसिकता आदि रहे हैं।

    — जाति

    जाति-व्यवस्था के कारण सामाजिक-नेतृत्व का मूल-आधार पुरुषार्थ, कर्म व क्षमता आदि जैसे तत्व नहीं हो पाये। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के लोगों के पास ही सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक नेतृत्व के जन्मजात अधिकार रहे। इसीलिए नेतृत्व की दावेदारी समाज की मौलिकता व गुणवत्ता के बजाय जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के कारण समाज के बहुत ही छोटे हिस्से में संकुचित रही।  जन्मजात नेतृत्व की दावेदारी करने वाले समाज के इस हिस्से की अधिकतर ऊर्जा जाति-व्यवस्था को ईश्वरीय प्रयोजन सिद्ध करते रहने के लिए कपोल कल्पित ईश्वरीय गाथाएं, मिथक व कपोल कल्पित ईश्वरीय अवतार प्रायोजित करने व गढ़ने में ही लगती रही। 

    सामाजिक-नेतृत्व के सतही व अवैज्ञानिक होने, ढोंग व मिथकों आदि के द्वारा प्रायोजित होते रहने के कारण मौलिक, गुणवान् व दृष्टिवान् सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं का भ्रूण भी नहीं पनप पाया।

    सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग की अवधारणा, जन्मजात जाति-व्यवस्था, धर्म का क्षय होने पर धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के द्वारा अवतार लेने की अवधारणा, मंत्रों व ईश्वरीय नाम के जाप द्वारा सुविधा/प्रतिष्ठा/समृद्धि आदि का मनचाहा वरदान या सिद्धि प्राप्त कर पाने की अवधारणा, सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सत्य में देवतुल्य था; आदि आदि जैसी विभिन्न अवैज्ञानिक अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की भ्रूण-संभावना को ही नष्ट कर दिया और भ्रूण-संभावना का यह नष्टीकरण परंपरा में हजारों वर्षों तक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मानसिकता आदि के विभिन्न स्तरों में गहरे अनुकूलन को प्रायोजित व स्थापित करने के साथ होता रहा।

    ज्ञान व सामाजिक-नेतृत्व के लिए ब्राह्मण जाति में पैदा होकर पोथियाँ, पुराण, महाकाव्य, काव्य आदि रट कर उनको मुंह से बोलना व उनमें बताए हुए कर्मकांड आदि को करना ही पर्याप्त रहा। मिथकों के प्रायोजन; व प्रायोजित मिथकों पर शाब्दिक व साहित्यिक विशेषज्ञता आदि के आधार पर सामाजिक-नेतृत्व का स्तर व प्रतिष्ठा निर्धारित होती रही। ब्राह्मण वर्ग की अधिकतर ऊर्जा इन्ही सबमें लगती रही और ऐसा करने को ही संस्कृति, संस्कार, पुरुषार्थ, ज्ञान, योग्यता आदि का नाम दे दिया गया।

    भारत की सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी का सबसे प्रमुख कारण यही रहा कि क्षत्रिय वर्ग को दरबारी भाटों, चाटुकारों व मिथक-साहित्य विशेषज्ञों ने झूठी कहानियाँ व मिथक गढ़ कर ही ईश्वरत्व रूप में जन्मजात पुरुषार्थी, निर्भय, रक्षक, शासक, राजनैतिक दूरदर्शिता व दृष्टिकोण आदि से संपन्न प्रायोजित कर दिया। गढ़े हुए मिथकों की पुष्टि करने के लिए ब्राह्मण वर्ग ने अनेकों पौराणिक कथाएं परंपरा में सत्य कथाओं के रूप में प्रायोजित करके, राजनैतिक सत्ता से अपना संबंध स्थापित करने के लिए क्षत्रिय वर्ग के द्वारा राजनैतिक सत्ता के भोग को ईश्वरीय प्रावधान के दायित्व का निर्वहण प्रायोजित कर दिया।

    यदि पौराणिक कथाओं को संज्ञान में लिया जाए तो मानव समाज की समस्यायें समाधानित करने के लिए, मानव समाज को विकास की ओर गतिमान करने के लिए ईश्वर खुद अवतार के रूप में आवश्यकता पड़ने पर बारंबार सामाजिक-नेतृत्व करने आता रहा। इस प्रकार सामाजिक-नेतृत्व मनुष्य के वास्तविक पुरुषार्थ एवम् समझ की क्षमता से अर्जित न होकर ईश्वरीय योजनाओं के निर्वाहक या परिपूरक के रूप में प्रायोजित व स्थापित रहा। इन मिथकों से भारतीय समाज में अकर्मण्यता प्रतिष्ठित हुई और मौलिक-गुणवत्ता की निरंतर भ्रूणहत्या होती रही।

    समय के साथ अवतारों के बजाय अवतारों की गाथाएं गढ़ने वाले, अवतारों की चर्चा करने वाले, ग्रंथों/महाकाव्यों/काव्यों आदि को रटने वाले, धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकांडों आदि को करने वाले ही सामाजिक-नेतृत्व के रूप में प्रायोजित व स्थापित किए जाने लगे। ब्राह्मण व क्षत्रिय को सिर्फ जाति विशेष में पैदा होने के कारण ही ‘सामाजिक-नेतृत्व’ की मान्यता दी जाती रही। परिणामस्वरूप ‘सामाजिक-नेतृत्व’ भी जन्म के आधार पर प्रायोजित होता रहा।

    भारत में ‘सामाजिक नेतृत्व’ लोगों में ‘आभामंडल-सत्ता’ स्थापित करने का और विभिन्न सत्ताओं द्वारा प्रायोजित होने का ही रहा है, इसीलिये ‘सामाजिक नेतृत्व’ और ‘सत्ताओं’ का आपस में बहुत गहरा व विश्वसनीय रिश्ता रहा है। यही कारण रहा कि भारत में शताब्दियों के बाद आज तक भी भारतीय समाज में स्वत: स्फूर्त ‘सामाजिक नेतृत्व’ आकार नहीं ले पाया।

    चूंकि समाज में जाति-व्यवस्था के कारण स्वतः स्फूर्त, वास्तविक-गुणवान् व मौलिक नेतृत्व विकसित होने की परंपरा नहीं बनने दी गई इसीलिए समाज के लोग धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसरवादी आदि होते चले गए, क्योंकि जाति-व्यवस्था के निरंतर स्थापना-प्रयोजन के लिए यही आधारभूत मूल्य व तत्व होते हैं।  जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज कभी देश व समाज के प्रति ईमानदार व प्रतिबद्ध नहीं हो पाया केवल व्यक्तिगत लिप्साओं, स्वार्थों, भोगों, विलासिताओं, बाजार के उपभोक्तवाद पर आधारित उपभोक्ता बने रहने की व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा आदि स्वार्थ-केंद्रित महात्वाकांक्षाओं के लिए प्रयत्न करना ही जीवन के मायने मान लिया गया।

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की वास्तविकता समझने के लिए एक कहानी को ही समझना पर्याप्त है। महान् गुरू के रूप में स्थापित द्रोणाचार्य ने अद्वितीय प्रतिभाशाली किशोर एकलव्य के दाहिने हाथ का अगूँठा केवल इसलिए कटवा दिया क्योंकि एकलव्य आदिवासी था और द्रोणाचार्य अपने शिष्य, जो एक बहुत बड़े राज्य का राजकुमार था, को महान् धनुर्धारी के रूप में प्रायोजित करना चाहते थे। यह कहानी उस समाज की है जो गुरू-शिष्य परंपरा की संस्कृति की बात करता है और जिस समाज ने द्रोणाचार्य को महानतम गुरू का स्थान दे रखा है। द्रोणाचार्य बहुत कुशल धनुर्धारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने सामाजिक गुरू होने के मूल्यों का ही पतन किया और भारतीय समाज को एकलव्य जैसे अद्वितीय धनुर्धारी से वंचित कर दिया। भारतीय समाज ने विभिन्न स्तरों व क्षेत्रों में अगणित एकलव्यों के अगूँठे काटे हैं। काश! यदि इन एकलव्यों के अगूँठे नहीं काटे गए होते, काश! विभिन्न स्तरों पर प्रायोजित लोग स्थापित नहीं किए गए होते तो आज भारत को प्राचीन-काल की गाथाएं गाकर खुद को महान् सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, न ही भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहता और न ही आज पिछलग्गू होता।

    — स्त्री

    समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शूद्र-वर्ण में रखा गया, जिसको जीवन के मौलिक अधिकार पशुओं जैसे तक नहीं थे। शूद्र-वर्ण के अतिरिक्त जो वर्ण थे, उन वर्णों की भी लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् स्त्री को पशु और वस्तु की श्रेणी में रख दिया गया। इस प्रकार समाज का पाँच में से चार जैसा बहुत बड़ा हिस्सा परंपरा में अपनी मौलिकता की भ्रूण-हत्या व अघोषित दासता का बर्बर-शोषण ही झेलता रहा। बचा-खुचा एक-पाँचवा हिस्सा परंपरागत मूर्खतापूर्ण सीमा में ही तथाकथित सामाजिक-नेतृत्व देता रहा।

    प्रायोजित सामाजिक-नेतृत्व ने स्त्री, जो जीवंत व चेतनशील मनुष्य है, उसको वस्तु के रूप में प्रायोजित कर दिया। मनुष्य के रूप में स्त्री के अस्तित्व व चेतनशीलता का कोई वजूद ही नहीं रहने दिया गया। स्त्री को पुरुष की अघोषित संपत्ति बना दिया गया। स्त्री जिस पुरुष की संपत्ति है, उस पुरुष के अस्तित्व में ही अपने अस्तित्व को बिना सवाल विलीन करने व ऐसा करने में अपने जीवन का लक्ष्य, सफलता व गौरव मानने के लिए निरंतर अनुकूलित किया जाता रहा।

    जो संस्कृति स्त्री को देवी मानने का दावा करती है उसी के समाज में स्त्री को प्रेम करने से वंचित कर दिया गया, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिए। यहाँ तक कि स्त्री को अपना पति तक चुनने का अधिकार नहीं रहा। जिस स्त्री को देवी कहा गया उसी को पर्दे में धकेल दिया गया, शिक्षा से वंचित रखा गया व संपत्ति में अधिकार नहीं दिए गए ताकि वह सदैव पुरुष की दासी बनी रहे। स्थिति की भयावहता की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि आज भी प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियों की हत्या माता के गर्भ में ही खुद उनके ही माता-पिता द्वारा कर दी जाती है। आज भी हजारों स्त्रियों की हत्या उनके ही माता-पिता व परिवार के द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है, क्योंकि स्त्री अपने माता-पिता व परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से प्रेम-विवाह करना चाहती है। 

    स्त्री जिसे देवी कहा गया वही स्त्री प्रेम करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पर्दा न करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पुरुष की उपस्थिति में खुलकर खिलखिलाकर हँस ले तो वह चरित्रहीन व कुलटा।  स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया लेकिन स्त्री के द्वारा पुरुष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व देखने को ही उसका देवी होना प्रायोजित कर दिया गया। स्त्री के द्वारा परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष और पुरुष के परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष, फिर भी स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी। स्त्री के गृहस्थ कार्यों को श्रम की श्रेणी में नहीं रखा गया जबकि वह संतान की जननी व पालन पोषण करने वाली भी है। स्त्री की कर्मशीलता को पुरुष के कारण होना मान लिया गया परिणामस्वरूप स्त्री के द्वारा सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं के भ्रूण की भी संभावना की स्थिति समाप्त हो गई। यही कारण हैं कि बलात्कार होने पर या स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होने पर, समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता रहा है। चूंकि स्त्री को मनुष्य माना ही नहीं गया, इसीलिए स्त्री के पहनावे या बोलचाल या व्यवहार के तरीके को बलात्कार का कारण ठहराया जाता है। इसको कुछ इस रूप में देखा जाए जैसे कोई वस्तु यदि रात में घर के बाहर पड़ी है तो कोई भी उसे चुराकर ले जा सकता है, उसी प्रकार स्त्री यदि रात में घर से बाहर है तो कोई भी उसके साथ बलात्कार कर सकता है। कोई महंगी वस्तु यदि छिपाकर न रखी जाए तो उस पर चोरों की नजर पड़ी रहेगी और वे चुराने का प्रयास करेंगे, वैसे ही स्त्री यदि छोटे कपड़े पहने है तो पुरुष स्त्री का स्त्रीत्व चुराएगा। एक समाज जो स्त्री को देवी मानता है, वही समाज स्त्री के बारे में सब कुछ बहुत ही अधिक वीभत्सपूर्ण घिनौनेपन और असंवेदनशीलता से तय करता है, जैसे स्त्री निर्जीव-वस्तु हो।

    — शाब्दिक/कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति 

    प्रकृति व ईश्वर को समझने का दावा करके प्रतिपल कर्मकांडों को रचने व महिमामंडित करने वाली संस्कृति वास्तव में केवल दर्शन की शाब्दिक व कृत्रिम तार्किकता की अव्यावहारिक विद्वत्ता ही होकर रह गई। यदि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था नहीं होती, स्त्री को मनुष्य माना गया होता और दर्शन को शाब्दिक तार्किकता व कृत्रिमता आदि से ऊपर उठकर समझने व जीने की चेष्टा की गई होती तो भारतीय समाज एक ढोंगी, कुंठित व पिछलग्गू समाज होने के बजाय विश्व के वास्तविक सर्वश्रेष्ठ समाजों में से होता और वास्तव में ही विश्व को विकास व समृद्धि के सार्थक मायने समझाते हुए समाधानित कर रहा होता। 

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व आज तक भी मौलिकता, गुणवत्ता व पुरुषार्थ से इतर अवसरवादिता, छद्म, ढोंग, मोहकता व आकर्षण आदि के प्रायोजन से देश, समाज व आने वाली पीढ़ियों की कीमत पर, पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ प्रायोजित किये जाते हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व को परंपरा में विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा प्रायोजित व स्थापित करते रहने के कारण भारतीय समाज अपने लिए  ही क्रूरता की हद तक असंवेदनशील समाज के रूप में दृढ़ होता गया। बचपन से ही अपनी कमजोरियों को देखने, उनके कारणों को समझने और उनको दूर करने की चेष्टा करना सिखाए जाने के बजाय ढोंगो व सतही प्रायोजनो से दूसरों को निर्दयता व असंवेदनशीलता पूर्वक अपने से खराब साबित करके खुद को अच्छा एवम् कर्म व पुरुषार्थ साबित करने की तकनीक सिखाई जाती है। यह मानसिकता ही बचपन से ही जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे समाज में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता, क्रूरता व सामंतवादिता के बीज को पोषित करती रहती है। 

    हम यदि खुद के जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारा अपना पूरा का पूरा जीवन ही झूठ और दिखावे का पुलिंदा है।  हमें बचपन से ही दिखावे की पुनरुक्ति के लिए इस तरह का अभ्यास करवाया जाता है कि हम खुद अपने आपको ही भूल जाते हैं और अपने ढोंग, खोखलेपन, निर्दयता, असंवेदनशीलता, अवैज्ञानिक-तर्कशीलता व अतथ्यात्मकता आदि को ही अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकता और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि व उद्देश्य मानने लगते हैं। हमें पता ही नहीं  चलता और हम सड़ने लगते हैं।  जब हमें अपने सड़ने की बदबू आती है, हम बदबू का कारण बाहर खोजते हैं।  हम बदबू का कारण बाहर इसलिए नहीं खोजते क्योंकि हमें बदबू का कारण वास्तव में खोजना होता है।  ढोंगो और प्रायोजन के आदी हम वास्तव में अपने से अधिक बदबूदार को खोजना चाहते हैं ताकि खुद को उसकी तुलना में खुशबूदार साबित करके खुद को बेहतर प्रायोजित कर खुद को महान् मान लें। यही कारण है कि हम दिन-प्रतिदिन और अधिक सड़ते जाते हैं लेकिन फिर भी दूसरों की तुलना में खुद को खुशबूदार मानते हैं। 

    — स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता

    यह हमारी स्वयं के प्रति घोर निर्दयता व असंवेदनशीलता ही है कि हम वास्तविक खुशबू में जीने के प्रयास करने के बजाय अपनी सड़ाँध व बदबू को ही खुशबू के रूप में प्रायोजित करने में अपनी ऊर्जाएं लगाते हैं। हम पूरा जीवन नशे व बेहोशी में जीते हैं, और बेहोशी में जीवन जीने को हम जीवन की व्यावहारिकता कहते व साबित करते हैं; जबकि  वास्तव में यह हमारा अपने खुद के प्रति ही और अधिक असंवेदनशील होना ही है। 

    हम स्वयं को विकसित करने के लिये, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए  कर्म, प्रयास या चेष्टा नहीं करना चाहते हैं। स्व-निर्माण की प्रसव पीड़ा नहीं झेलना चाहते हैं।  इसीलिए  हम अपने जीवन के लिए , परिवार के लिए , समाज के लिए  व देश के लिए  ऐसे सामाजिक-नेतृत्व प्रायोजित करते हैं; जो हमारे जैसे ही हों। सामाजिक-नेतृत्व छोड़िए हमने तो अपने ईश्वर भी अपने ही जैसे बना रखे हैं। 

    सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण वास्तविक कर्म से हुआ करता है। ढोंग व सतहीपन से युक्त विभिन्न स्तरों पर अनुकूलताओं के प्रयोजन से नहीं। भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक-नेतृत्व समाज की बेहतरी के लिए  किए गए पुरुषार्थ, कर्म, सक्रिय चिंतन, जीवंत कर्म-अनुभव आदि मूल्यों के आधार पर नहीं स्वीकृत किए गए हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विकास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि में बहुत ही पीछे रह गया। शताब्दियों तक राजनैतिक गुलाम रहा और आज भी मानसिक गुलाम है।

    — स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व की आवश्यकता

    भारत सामाजिक रूप से बहुत अधिक विद्रूपताओं और विविधताओं का देश है। इसलिए  भारत का राष्ट्रीय सामाजिक-नेतृत्व वही कर सकता है जो भारत को भारत की विद्रूपता और विविधताओं के साथ स्वीकारे और फिर सबको साथ लेकर चलते हुए बढ़े।  सामाजिक नेतृत्व का सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरा व स्पष्ट संबंध होता है, बिना सामाजिक सरोकारों व सामाजिक संबंधों को समझे कोई भी सामाजिक नेतृत्व नहीं हो सकता है।  भारतीय समाज को शताब्दियों के अनुकूलन से बाहर आकर अपनी वास्तविक स्थिति, गति को स्वीकारते हुए विभिन्न स्तरों पर वास्तविक परिवर्तकों को “सामाजिक-नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है।

    शाब्दिक व दार्शनिक तर्कशीलता के मानदंडों में अद्वितीय व विलक्षण संस्कृति वाला समाज व्यावहारिक धरातल की वास्तविकता में बहुत ही अधिक अमानवीयता व खोखलेपन को ही पोषित करता व जीता रहा। दर्शन को व्यवहारिक-जीवंतता के स्थान पर केवल शाब्दिक तर्कशीलता तक ही सीमित किया जाता रहा। वास्तव में भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऋणात्मकताएं ढोंग, अमानवीयता व असंवेदनशीलता हैं और ये तत्व ही मूलभूत कारण हैं कि भारतीय समाज बहुत ही वीभत्सता के स्तर तक आंतरिक रूप से सड़ा हुआ है। फिर भी समाज के लोग जो खुद अपने ही जीवन में खोखले होते हैं, रटे-रटाए दर्शन की कृत्रिम शाब्दिक-तार्किकता से अपने को व अपनी संस्कृति को जबरन महान् सिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गीता को महान् बताने वाला समाज, कर्म को ही उपेक्षित रखता आया है।

    यदि भारत को वास्तव में आगे बढ़ना है तो पूरी कठोरता व इच्छाशक्ति के साथ बिना लाग-लपेट के सामाजिक-नेतृत्व के प्रायोजनों की परंपरा व अनुकूलता से दृढ़तापूर्वक बाहर निकलकर वास्तविक स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व के प्रस्फुटीकरण का बीजारोपण करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं।

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा  –Tribhuvan

    अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

    Tribhuvan

    प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘दॅ आइडिया ऑव जस्टिस’ के ‘दो शब्द’ वाले हिस्से में प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ से एक अदभुत उदाहरण दिया है। चार्ल्स डिकंस के उपन्यास में बच्चों की अपनी छोटी-सी संवेदनशील दुनिया है। इसमें एक पात्र पिप कहता है कि अन्याय का एहसास बहुत अंदर तक पीड़ा पहुंचाता है। पिप ने बचपन में अपनी गुस्सैल और बदमिज़ाज बहन के हाथों बहुत अपमान सहा था। हर आदमी जब अन्याय सहता है तो वह पिप की तरह ही सोचता है। ऐसा नहीं होता कि हम व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण बना ही दें; लेकिन यह उम्मीद और प्रत्याशा हर हृदय में स्पंदित होना स्वाभाविक है कि हमारे चारों तरह जो अन्याय का वातावरण बन गया है, उसे समाप्त किया जाए। यह अन्याय कई बार वास्तविक और कई बार छद्म रूप से तैयार किया जाता है।

    हम जिस देश और समाज में जी रहे हैं, वह बहुत ही अदभुत हैं। उसने हम सबको बहुत ही गिरगिटिया बना दिया है। इसे हम सब आए दिन देखते हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करते। हम आए दिन देखते हैं कि शिड्यूल्ड कास्ट्स और शिड्यूल्ड ट्राइब्स विकराल समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन इनका एहसास कथित ऊंची जातियों और उच्च शिक्षित लोगों को नहीं है। आज जिस तरह की डिस्पैरिटीज और जिस तरह के सब्जुगेशंस ये वर्ग भुगत रहे हैं, वह हमें बाहर से सामान्य बात लगती है, लेकिन आप जब इनके हृदय में उतरकर देखेंगे तो वहां आपको एक विकराल झंझावात दिखाई देगा। यह उस मिथकीय रामराज्य का भी कड़वा सच था और यह इस युग के रामराज्य का भी सच है कि यहां वनवासी हनुमान को ही सीना फाड़कर अपने हृदय में बसते राम का ही चेहरा दिखाना होता है। राम राम ही रहते हैं और वनवासी योद्धा हनुमान होकर भी सेवक ही रहता है और राम जी विजय की हुई स्वर्णिम सत्ता विभीषणों को ही सौंपते हैं। भले वह कालकूट विष पीने वाले शिव के आशीर्वाद से ही रची गई हो।

    दुनिया का एक यही देश है, जहां आज भी समाज आदिम तरह से न केवल बंटा हुआ है, बल्कि उसकी भाषिक संवेदनाएं भी आदिकालीन ग्रंथों से अनुप्राणित होती हैं। हमें समझ भी वही आता है। इसलिए वैज्ञानिक सत्य और शोध पर आधारित नई शब्द रचना हमें स्वीकार्य ही नहीं होती। हमारे यहां शिड्यूल्ड कास्ट 16.6 और शिड्यूल्ड ट्राइब 8.6 प्रतिशत हैं। इतना वर्ग इतना सा सरल नहीं है। यह 1108 अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है आैर उनका अपना ऊंच-नीच और छुआछूत है। यह 29 राज्यों में फैला हुआ मानव समाज है। हमारे एसटी 22 राज्यों में फैले हुए हैं और ये 744 तरह के आदिवासी समाज हैं, जिनकी अपनी बहुत समृद्ध और गौरवशाली परंपराएं हैं, लेकिन हमारे विकास की अाधुनिक धारणाओं और कामकाज की शैली ने इन्हें बर्बाद कर दिया है।

    सोशल मीडिया एक तरह का ख़तरनाक़ दर्पण है। यह एक तरह की खुली हुई पैथोलॉजिक लैबोरेट्री है। इसमें हर एक का ब्लड, स्टूल और स्पूटम समुद्र ही तरह से बह रहा है। बायोप्सियों के ढेर लगे हैं। इस विशालकाय पैथोलॉजिकल लैबाेरेटरी से किसी को गंध आ रही है और कोई घृणा में डूबा जा रहा है। कोई मुंह पर कपड़ा बांध रहा है और किसी ने नाक भींच ली है। लेकिन मानव समाज को एक स्वस्थ और विवेकशील समाज के रूप में देखने की कामना करने वाले लोग इसे किसी डॉक्टर की निगाह से देखेंगे। आज के एससी-एसटी वह नहीं हैं जो कल थे। उन्हें शिक्षा और जागरूकता ने सबके बराबर खड़ा कर दिया है। इससे वे कोई विवेकवान या कोई वैज्ञानिक सोच वाले हो गए, यह नहीं है। लेकिन यह सच है कि वे अब उन्हें छोटे-छोटे अन्याय भी उद्वेलित करते हैं। वे एक अब एक ताकत के रूप में गोलबंद हो गए हैं। उनमें सबके सब न तो शंभु हैं कि वे सांप्रदायिक लोगों का गुर्गा बनकर उनकी दमित रक्तपिपासा का शांत कर देे और न ही वे सबके सब प्रतिभा से दिपदिपाते लेखकीय प्रतिभा वाले ऐसे अति संवेदनशील रोहित वेमुल्ला हैं, जो यथार्थ का सामना करने के बजाय आत्महत्या कर लें।

    अब समय आ गया है कि हम हिंसा की मुखर आलोचना करें, लेकिन यह प्रतिज्ञा भी करें कि हम भारतीय समाज से अन्याय को मिटा देंगे। हम अन्याय को खत्म करके ही न्याय का संवर्धन कर सकते हैं। हम अपने घरों में उनका उसी तरह स्वागत सत्कार करें, जैसा हम अपने रिश्तेदारों से करते हैं। हम अपने घरों के अगवाड़े या पिछवाड़े एक-एक अलग से रखे चाय के कपों को हटा दें। हम अपने घरों के बाहर सफाई करने वाले या गंदे नाले में उतरकर सफाई करने वाले से ऐसा ही सलूक करें, जैसा एक आदर सरहद पर लड़ते किसी सैनिक का करते हैं। हमें अपने शब्दकोशों को बदल डालना चाहिए, जिनमें कथित अछूत जातियों के नामों को गालियों के तौर पर प्रयुक्त किया जाता है। हमें अपनी नैतिकता में आ चुकी कलुषाओं को धोना होगा। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारी बस्तियों में वे लोग वैसे ही सम्मान से रहें, जिस सम्मान से एक स्वाभिमानी को रहना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें अपने दिलो-दिमाग को मानवीय और न्यायशील बनाना होगा। हम ऐसे नहीं हैं, इसीलिए हमें अपनी जाति की हिंसा हिंसा ही प्रतीत नहीं होती और किसी अन्य जाति की हिंसा हिंसा दिखाई देती है। इसीलिए हमें गांधी जैसे महानायक की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे आतंकवादी नहीं लगता, लेकिन एक खास इमारत के बाहर गोलियां चला देने वाला देशद्रोही लगने लगता है। हम इमारत के भीतर के देवता की हत्या करने वाले का तो मंदिर भी बनाने लगते हैं, लेकिन इमारत पर बंदूक तानने वाले को फांसी दिए बिना बेचैन हो उठते हैं।

    न्याय की यह पुकार इस महान देश की मिट्‌टी में वैदिक काल से भी शायद सैकडों-हजारों साल पहले की है। हमारी मानवीय चेतना उसी मिट्‌टी से नहाई हुई है। हमें इस धरती पर पल रहे समाज को एक अच्छे मानव समाज का रूप देने के लिए अपनी अपनी संस्कृतियों और अपनी अपनी मानसिकताओं में पल रहे अन्याय को खत्म करना होगा। यह काम हमें ही करना होगा; क्योंकि जिनके भरोसे हमने यह काम छोड़ दिया है, वे बहुत ख़तरनाक़ खेल खेल रहे हैं। वे अपनी सत्ता के लालच में 15 अगस्त 1947 से आज तक बच्चों के हाथों में बासुरियों के बजाय बंदूकें ही शोभित करवाने की संस्कृति को बढा रहे हैं। बच्चे सरदार भगतसिंह ने अंगरेजों को भगाने के लिए खेत में बंदूकें बोई थीं, लेकिन हमें स्वतंत्र भारत में बांसुरियां बोनी चाहिए, न के धनुष और सुदर्शन चक्र! यह राम आैर कृष्ण से भी पहले उन वैदिक ऋषियों का देश है, जिन्होंने मानवता की कोंपलों की रक्षा के लिए अपने आपको होमना सीखा था। यह रक्तपिपासुओं का नहीं, यह ऐसे आम भारतीयों का देश है, जिनके कंठ में राग और विराग पलता है। जहां संतों की वाणियां गूंजती हैं। यह सिर्फ इसी देश को एक परिवार नहीं, पूरी वसुधा को कुटुंब बनाने का स्वप्न रचने वाले लोगों के बच्चों का देश है। यह उन साधुओं और फ़कीरों का वह देश है, जहां एक ऐसे मानव समाज की कल्पना की गई थी, जो निखिल द्यु लोक में प्रेम प्राण, गान गंध और पुलक के झरने की कामना करते हैं। जहां हृदयों में हिंसक भाव नहीं, नीरव आलोक बरसता है। जहां स्वर्णिम उषा की अरुणाई से प्राण आरक्त होते हैं और अलसाई आंखों पर दूर्वादल के आेसकण नव जागृति लाते हैं।

    इसलिए स्वतंत्रता का स्वप्न तभी पूरा होगा जब अन्याय का अंधकार हम सबके हृदयों से हम स्वयं दूर देंगे।

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  • चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

    चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

    Pankaj Mishra

    क्या पूछना है , तीस बरस की उम्र में हाउस लोन मिल गया …. और तीस ही बरस की क़िस्त , चुकाए जाओ मियाँ , किराए के घर में तो न रहना पड़ेगा , लाइफ में क्वालिटी तो होना ही मांगता है ….चुकाइये ..क्वालिटी !! तो भइये , घर में सब कुछ मोड्यूलर होना चाहिए तब न बात बनेगी , रह तो सब लेते है तो करना कुछ नही एक फॉर्म ही तो भरना है , किस्तें टाइमली …. यस बॉस

    अब एक बड़ी गाड़ी तो होनी चाहिए , तो हाज़िर है कल दरवाज़े पर खड़ी हो जायेगी , दस बरस तक लो इंटरेस्ट पर किस्तें भरिये , बिलकुल भरूंगा चाबी दीजिये , थैंक्यू …

    बड़ा वाला टीवी चाहिए , कहां मिलेगा , अरे on line ले लीजिए किस्तो पे , महंगा मोबाइल , फ्रिज ऐसी सब क़िस्त पे मिल तो रहा है , देर किस बात की पट्ठे ले लो , चुकाते रहना …

    इस गर्मी में क्या करूँ , क़िस्त पे इन्वर्टर लिया था तो उससे एसी कहां चलता है , क़िस्त वाला एसी बिजली से चलता है लेकिन अभी बिजली क़िस्त पे नही मिलती , लानत है ऐसे सिस्टम पे ….

    चलो कहीं पहाड़ों पर , गर्मी भर , मिसेज़ त्रिपाठी ठीक कह रही थी , भुवाली में क़िस्त पे फ़्लैट ही ले लिया होता तो अच्छा था , लेकिन कोई बात नही क़िस्त पे टूर पैकेज है न .. अलग अलग डेस्टिनेशन होना चाहिए वरना घूमने का मजा क्या …..

    क्या हुआ बेटा , सेलेक्शन हो गया न , कहता था मैं , कोटा महंगा है तो क्या हुआ … लेकिन IIIIIT ….के लिए बेस्ट है , इंस्टालमेंट में न लेते तो नही पढ़ा पाता … जरा FEE STRUCTURE पे क्लिक करो बेटा …
    बाप रे इत्ती फीस … ये फोटो ज़ूम करो ….थैंक गॉड ….. अच्छा है एजुकेशन लोन की सुविधा कालेज गेट पर ही उस लाल वाले टेंट में है … अरे तो कालेज भी तो एवन है …. कोइ पागल दास महाविद्यालय में , हिस्ट्री जाग्रफी संस्कृत से बीए थोड़ी करने जा रहा है बेटवा ….

    क्या हुआ जी , तुम्हारा मुंह क्यों टेढ़ा रहता है हमेशा , अभी उमर बीत नही गयी मेरी जोहराजबीं ..आज शाम को ही तनिष्क से डायमंड ज्वेलरी की बरसो की साध पूरी हो जायेगी ….. चुपचाप 11 + 1 वाले ऑफर में पांच साल से पैसा जमा कर रहा हूँ जानेमन ….. अब जरा मुस्कुरा दो ….मुस्कुरा दो प्लीज़ , वो तो अच्छा हुआ जो तीन साल से साहब ने स्टोर का चार्ज अकेले मुझे दे रखा है ….. वर्ना इतनी किस्तों को बोझा कैसे सम्भलता …..एक डायमंड रिंग साहब की मिसेज़ के लिए भी लेना था कल उनका बड्डे है , लोवर स्टाफ में सिर्फ मुझे ही बुलाया है …बहुत मानते है साब मुझे …सुबह कथा होगी , धार्मिक आदमी है , परिवार भी संस्कारी है …. सारा इंतज़ाम देखना है , सुबह पंडी जी को भी मुझे ही ले जाना है …उधर दुनिया को देखो सब संस्कार भूलते जा रहे है ..

    अरे ये पंडितवे सब राजनीतिक पंडित हो या धार्मिक ये सब तो और महान है , ये ससुरे उस महान भौतिकवादी का मजाक उड़ाते थे …पता नही कहां से ढूंढ के लाये और उसके मुंह में ठूंस दिए ” ऋणं क्रित्वा घृतम पीवेत …” अब देखो इन्हें , अब खुद क्या कर रहे है , किधर ले जा रहे है देस को ….. देखा जाए तो उसका उपहास उड़ाने के लिए बोले गये बोल आज वेदव्यास के मुंह से निकले बोल हो गए है ..सनातन संस्कृति के निवृत्ति मार्ग के संस्कारों की कैसे वाट लग रही है …..बस , इतना समझ लो भागवान , कि ये जो नेताओं की भाषणबाज़ी है न , ये सब के सब दोगले है , जो कहेंगे उसका उल्टा करेंगे , जिसका मजाक उड़ाएंगे उसी का एजेंडा चुपचाप लागू करेंगे , जो ज्ञान देंगे उसका उल्टा अभ्यास करेंगे , ये सा सा ह ह … आह आह … क्या हुआ …

    क्या हुआ जी …..

    कुछ नही थोड़ा दर्द है इधर ..

    अरे …बायीं तरफ … पसीना भी आ रहा है , हार्ट अटैक के लक्षण है , लेट जाओ …..अरे गुड्डू बेटा देखो तो जरा पापा को क्या हुआ है … बीपी की दवा तो खाई थी न जी आज …

    दवाई व्वाई छोडो , पहले वो अलमारी खोलो …, अरे वो नही वो मैरून वाली , अरे ट्रिपल डोर वाली , जो अमन स्टील वाला उधार दे गया था ….. देखो उसमे वो मेडिकल इंश्योरेंस वाली फ़ाइल रखी होगी , चेक करो .. पता नही रिन्यू कराया था या नही …

    oh my god …. ये तो लैप्स हो गयी है ….

    आं …..तब अपोलो में नही , मेडिकल कालेज चलो …

    कितनी बार कहा …मेडिकल इंश्योरेंस लैप्स न हो ….. लेकिन ..

    अब बड़ बड़ न करो …. दर्द कम हो रहा है ….राहत है …..angina लगता है … राजेश को फोन करो …आये तो पालिसी रिन्यू करा लूँ ……कल सारा चेकप करा लूँगा , लाल पैथोलॉजी वाले कम्प्लीट बॉडी चेकप पर डिस्काउंट दे रहे अपने मेम्बर्स को , लाइफ मेम्बरशिप ले लूँगा उसके बाद कराऊंगा तो चीप पड़ेगा … अब समझ में आ गया , जान है तो जहान है ….

    नही जी …..क़िस्त है , तो जान है , जान है , तो जहान है , मेरा भारत महान है …..

    ठीक कहती हो ….क़िस्त है तो जान है , जान है तो जहान है , मेरा भारत महान है …

    कतरा कतरा मिलती है 
    कतरा कतरा जीने दो 
    जिंदगी है बहने दो …… प्यासी हूँ मैं प्यासी रहने दो 
    रहने दो ……ना …

    बेटा जरा वॉल्यूम बढा दो …

    प्यासी हूँ मैं … प्यासी रहने दो ….ठीक है ठीक है , रहने दो …..अब जरा , पॉप मोड से स्टैण्डर्ड मोड पे कर दो …. फिर जाओ नहाओ , गर्मी बहोत है ….और खाना वाना खाओ , रात गहरा गयी है ….

    Pankaj Mishra

  • प्रेम को क्यो मार दिया है संसद मे बैठने वालो ने –Abhimanyu Bhai

    प्रेम को क्यो मार दिया है संसद मे बैठने वालो ने –Abhimanyu Bhai

    Abhimanyu Bhai

    मोदी जी !
    प्रेम को क्यो मार दिया है संसद मे बैठने
    वालो ने !इसीलिए इनकी पगार और 
    सांसद निधि आप बढाते है !
    मन कितने गंदे हो चुके है समाज मे !
    मन दुखी है !
    तो मन की बात लिख रहा हूं।

    अब ऐसा आरक्षण का कार्यक्रम बनाइए जिसमे
    हर जाति का दलित गरीबी की त्रासदी से बाहर निकले
    और शोषण कारी अन्यायी गरीबी की रेखा की परिभाषा को बदलिए !सहभागिता आधारित योजना क्रियान्वयन को लागू कराइए!

    सोचिए कि हिंसक आन्दोलन क्यो प्रभावी है ?
    क्योकि सरकार हिंसा के बाद सुनती है !
    चित्रकूट के कोल आदिवासी हिंसक आन्दोलन नही कर सके इसलिए आजादी के बाद से आज तक
    उनकी नही सुनी गई!

    चित्रकूट मे एक भी दलित आदिवासी गांव खुशहाल
    नही है -उसे आपकी संसद के आरक्षण का
    लाभ नही मिला !
    यहां आदिवासी बच्चे स्कूल की
    जगह भूख की जुगाड मे रहते है।

    बुन्देलखण्ड मे दलित विकास का
    काम करने वाली संस्था और नेताओ ने भी
    केवल आरक्षण पर अपनी लाठी पीटी है !
    और कोलो को कलम पकडाने की जगह 
    बन्दूक थमा दी।

    यही हाल चमार भंगी पासी तथा गधालादो की जमात मे रहने वाले बच्चो का भी है वह स्कूल छोड के केवल पैसे खोज मे लगे रहते है !

    दलित -हिंदू नेता अपनी अपनी
    सरकारो मे मालामाल हो गये !
    आज कुछ जेल मे है या सत्ता से दूर है!
    जो सत्ता मे है वह केवल फेसबुक तक है !
    उन्होने ने कुछ नही किया दलित विकास मे!
    आपकी सरकार भी ऐसा कुछ नही पा कर रही
    जिससे दलित चाहे जिस जाति का वह गरीबी की त्रासदी से ऊपर आजाए !
    आज सरकार आप की है तो लाजिम है कि 
    कल जो कुछ देश /प्रदेश मे हुवा उसके जिम्मेदार आप तथा राज्य के मुख्यमंत्री जिलाधिकारी पुलिस 
    अधीक्षक सबसे पहले जिम्मेदार है!

    जरुरत है
    आज ऐसे आन्दोलन की जिनके हांथ मे तलवार 
    डंडे की जगह प्रेम की पुस्तक हो !
    आन्दोलन कारियो 
    से ऐसे एग्रीमेंट होने चाहिए! 
    पहले तो सरकार को ऐसे 
    काम करना चाहिए कि लोग आंदोलित ही न हो !
    देश विभाजन की नीव न पडे इसे रोकिए ।

    दलित गरीब को
    उसकी नदी जंगल हवा स्कूल 
    और उसकी जमीन लौटा दीजिए और इन जगहो से 
    सरकारी हस्ताक्षेप बंद करा दीजिए !
    यह अपना आरक्षण 
    अपनी संसद के पास रखिए !
    मान लीजिए सब आपस मे जीना सीख लेगे 
    और जंगल नदियो पशु पक्षी सब प्रेम सीखा देगे?

    कल देखा कि दलित आदोलन मे
    बेचारे भोले भाले युवाओ को -आंदोलन के नेताओ ने 
    बुद्ध की तस्वीर न देकर हांथो मे डण्डे 
    पकडा दिए जैसे हिन्दू -मुस्लिम संगठन 
    तलवार हांथ मे लेकर चलते है!

    बेचारे न समझ उत्साही दलित गरीब निर्दोष युवाओ
    की पिटाई तथा रास्ते चलते निर्दोष आम नागरिको के साथ आन्दोलन कारी उन्माद ने जो कृत्य किया यह सब
    देख कर मन बहुत दुखी है व्याकुल है?
    बेशरम राजनैतिको 
    मत बाटो समाज को
    एक साथ लोग सहजता समरसता से रह सके 
    ऐसा माहौल दो।

    क्यो एक दूसरे के आस्था पर जूते चलाते हो ।
    जैसा बोया हो वैसा ही तुम पा रहे हो –
    इसके बाद भी हाय कुर्सी हाय कुर्सी 
    लगी है !वोट लेने के बाद कभी पलट कर देखते हो
    दलित गरीब किस हालत मे जीता है!
    कौन सा न्याय तुम उसे दिलाते हो!

    तुमने उसका शुद्ध निशुल्क पानी तक छीन लिया
    उसका विचार छीना अब हवा भी छीन रहे हो 
    और लोगो को बीमार बना कर दवा कम्पनीयो को तैनात कर गरीब के घरो मे बडी डकैती डलवाते हो 
    तुम्हारा cmo से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक 
    गरीब को लूटता है –फिर अपना आलीशान मकान बनवाता है —स्कूल चलवाता है !
    जब उसने हिस्सा सही नही दिया तब उसका स्थांतरण करा देते हो !

    हर जाति- धर्म के अन्दर की गरीबी नौकरी सी नही
    दूर होगी –उसकी गरीबी को भारत की गरीबी 
    रेखा की परिभाषा भी दूर नही कर सकती!

    आज तक सबसे दलित जातियो के बच्चे स्कूल
    मे ठहर नही पा रहे और देश की शिक्षा उन्हे 
    न तो आत्मनिर्भर बना रही है न प्रेम शिखा पा रही है केवल उन्माद और नशा शिखा रही है ।
    विपक्ष तो केवल शाखंडी है।

    सरकारो ने केवल वोटर को ठगा
    है लडाया है?
    चाहे वह किसी की सरकार रही हो
    सबकी संस्कृति एक है ।

    बुद्ध महावीर गुरुनानक गांधी अम्बेडकर के समाजिक प्रेम को
    आज संसद के अन्दर बैठने वाले तथा संसद मे जाने की इच्छा रखने वालो ने क्यो मार दिया ?
    आज मै बहुत दुखी हूं।

    Abhimanyu Bhai

  • रोहतास जिले के भईसाहां पंचायत की आशा देवी –Santosh Kumar Singh

    रोहतास जिले के भईसाहां पंचायत की आशा देवी –Santosh Kumar Singh

    Santosh Kumar Singh

    ये हैं रोहतास जिले के भईसाहां पंचायत की आशा देवी। स्वच्छाग्रह की कार्यकर्ता हैं। स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर की उपस्थिती में टूटी फूटी भोजपुरी हिंदी में स्वच्छता अभियान की अईसन खाका खिचिन की लगभग उपस्थित सबलोगों का आंख कमोबेश नम होई गवा।

    किस्सा यू हैं कि आशा देवी का दो बच्चा है एक मानसिक रूप से परेशान और दूसरा विकलांग। गांव गांव घूम के चूड़ी बेच के घर का काम चलाती हैं। संयोग से जब ये स्वच्छता अभियान से जुड़ीं तो इनको समझ में आया कि जिस बच्चे को लेकर परेशान है उसकी बीमारी का कारण शौचालय का अभाव, साफ सफाई की कमी भी हो सकता है। तो इन्होंने ठाना कि अब लोगों को शौचालय बनवाने के लिए जागरूक करेंगी।

    लेकिन समाज इतना जल्दी कहां मानता है जिसके घर जातीं और शौचालय बनवाने को कहतीं वो कहता कि आपके घर में शौचालय है। आशा को भी बात समझ में आया कि बात तो सही है जब अपने घर में ही नहीं है तो दूसरे को क्या उपदेश दें। इन्होने शौचालय बनवाने के लिए पती को कहा। पती का कहना था कि पैसा तो है नहीं। लेकिन आशा को भरोसा था कि बाली रखके उनका भाई पैसा दे देगा। लेकिन भाई ने साफ मना कर दिया। भाई के घर से वापस आ रही थीं तो रास्ते में वो बाली भी हेरा गया। पती के डर से चुप रहीं लेकिन औरत का श्रृंगार तो गहना है।

    लेकिन आशा ने ठान लिया था कि जब तक शौचालय नहीं बनेगा तब तक चुप नहीं बैठेगा। तो उन्होंने किसी से 5000 हजार रूपया उधार लेकर शौचालय बनवाया। अब वो लोगों को समझाती हैं इज्जत चाहिए तो बाजार से इज्जत खरीद लाईये लेकिन बाजार में इज्जत थोडूए न मिलता है..इज्जत तो शौचालय है।

    तो आशा देवी जईसन 20,000 हजार स्वच्छता कार्यकर्ता का जुटान अगले एक सप्ताह तक बिहार के अलग-अलग पंचायत में होने वाला है। 3 से 8 अप्रैल तक बिहार के हर पंचायत में अईसे स्वच्छाग्रहियों द्वारा स्व्च्छता संदेश दिया जायेगा। आपतो जानते ही हैं कि सब लोग चंपारण जा रहा है तो अपने प्रधानमंत्री भी 9 अप्रैल को चंपारण जायेंगे। वहां इन स्वच्छाग्रहियों का सम्मान होगा। लेकिन आशा देवी का किस्सा सुन मंगरूआ कहां चुप रहने वाला था। मंगरूआ ने परमेश्वरण अय्यर से पूछ ही लिया कि आप तो कहते हैं कि शौचालय बनवाने के लिए 12,000 रूपया मिलता है तो ई रूपया मिलता कब है क्या बाली बेचने के बाद या फिर बाली के हेराने का इंतजार है।

    Asha Devi

    Asha Devi with Santosh Kumar Singh

    Santosh Kumar Singh