Category: आपके आलेख

  • मोदी सरकार के तीन साल

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    इस 26 मई को मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर विभिन्न शहरों में ‘मोदी फैस्ट’ के अंतर्गत धूमधाम से बड़े-बड़े समारोह आयोजित किए गए। इन समारोहों से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश समृद्धि की राह पर तेज़ी से अग्रसर हुआ है और कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल हुई हैं। मोदी को उनके प्रशंसक, ‘गरीबों का मसीहा’ बताते हैं। कई टीवी चैनलों और टिप्पणीकारों ने उनकी शान में कसीदे काढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

    असल में पिछले तीन सालों में क्या हुआ है?

    एक चीज़ जो बहुत स्पष्ट है, वह यह है कि मोदी सरकार में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है। यह तो सभी को स्वीकार करना होगा कि यह सरकार अपनी छवि का निर्माण करने में बहुत माहिर है। नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोज़गार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली में किए गए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन को सरकार के पिछलग्गू मीडिया ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का भी हुआ।

    विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रूपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है। पहले राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया और अब पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है और मुसलमानों के एक बड़े तबके की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी गई है। सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रूख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्यों के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र, अपराधियों को सज़ा दिलवाने की बजाए, पीड़ितों को ही परेशान कर रहा है।

    सामाजिक स्तर पर पहचान के मुद्दे छाए हुए हैं। पिछली यूपीए सरकार भी अपनी सफलताओं का बखान करती थी परंतु कम से कम यह बखान लोगों के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार संबंधी अधिकारों पर केन्द्रित था। अब तो चारों ओर झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है। पाकिस्तान के मुद्दे पर सरकार जब चाहे तब आंखे तरेरती रहती है। सीमा पर रोज़ भारतीय सैनिक मारे जा रहे हैं परंतु आत्ममुग्ध सरकार, सर्जिकल स्ट्राईक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़कों के अलावा अब लड़कियां भी सड़कों पर निकलकर पत्थर फेंक रही हैं। कश्मीर के लोगों की वास्तविक समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। उनसे संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।

    हिन्दुत्ववादी देश पर छा गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र का लगभग भगवाकरण हो गया है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर गंभीर हमले हुए हैं। ‘पारंपरिक ज्ञान’ को वैज्ञानिक सिद्धांतों पर तवज्ज़ो दी जा रही है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया जा रहा है। यहां भी अतीत का महिमामंडन करने के लिए केवल ब्राह्मणवादी प्रतीकों जैसे गीता, संस्कृत और कर्मकांड को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    दिखावटी देशभक्ति का बोलबाला हो गया है। पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने यह प्रस्तावित किया था कि हर विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक बहुत ऊँचा खंबा गाड़ कर उस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए। हर सिनेमा हॉल में फिल्म के प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान बजाया जाना अनिवार्य कर दिया गया है। एक अन्य स्वनियुक्त देशभक्त ने यह प्रस्तावित किया है कि हर विश्वविद्यालय में ‘देशभक्ति की दीवार’ हो, जिस पर सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र उकेरे जाएं। समाज के सभी वर्गों का देश की उन्नति में योगदान होता है परंतु प्रचार ऐसा किया जा रहा है, मानो केवल सेना ही देश की सबसे बड़ी सेवा कर रही हो। जो किसान खेतों में काम कर रहे हैं और जो मज़दूर कारखानों में खट रहे हैं, क्या उनकी सेवाओं का कोई महत्व ही नहीं है? लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। यह सरकार केवल जय जवान का उद्घोष कर रही है और किसान को विस्मृत कर दिया गया है।

    देश में प्रजातंत्र सिकुड़ रहा है और बोलने की आज़ादी पर तीखे हमले हो रहे हैं। मीडिया का एक बड़ा तबका शासक दल के साथ हो लिया है और वह उन सब लोगों की आलोचना करता है, जो सरकार की नीतियों के विरोधी हैं। मीडिया ने प्रजातंत्र के चैथे स्तंभ और सरकार के प्रहरी होने की अपनी भूमिका को भुला दिया है। दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या के साथ देश में असहिष्णुता का जो वातावरण बनना शुरू हुआ था, वह और गहरा हुआ है। मुसलमानों के खिलाफ तो ज़हर उगला ही जा रहा है, दलित भी निशाने पर हैं।

    आज देश में जिस तरह का माहौल बन गया है, उसे देखकर यह अहसास होता है कि केवल प्रचार के ज़रिए क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया गया है कि मोदी सरकार देश का न भूतो न भविष्यति विकास कर रही है और आम लोगों का भला हो रहा है।

    परंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई हिस्सों में लोगों ने अपने विरोध, असंतोष और आक्रोष का जबरदस्त प्रदर्शन भी किया है। किसानों के एकजुट हो जाने के कारण, मजबूर होकर, सरकार को अपना भूसुधार विधेयक वापस लेना पड़ा। कन्हैया कुमार, रामजस कॉलेज, रोहत वेम्युला और ऊना के मुद्दों पर जिस तरह देश में वितृष्णा और आक्रोष की एक लहर दौड़ी, उससे यह साफ है कि सरकार की प्रतिगामी नीतियों को चुनौती देने वालों की संख्या कम नहीं है। जहां हिन्दुत्ववादी तत्वों का स्वर ऊँचा, और ऊँचा होता जा रहा है, वहीं देश भर में चल रहे कई अभियानों और आंदोलनों से यह आशा जागती है कि भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित बहुवादी समाज के निर्माण के स्वप्न को हमें तिलांजलि देने की आवश्यकता नहीं है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • यह दुनिया ग़ज़ब है भाई

    Tribhuvan

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    लालू यादव का भक्त कबीला इन दिनों नीतीशकुमार की क्या ग़ज़ब ख़बर ले रहा है। जैसे नीतीशकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भोज पर जाकर और सोनिया गांधी के भोज पर न जाकर मानो ऐसा कर दिया हो कि वे अभी गंगाजी जाने वाले थे, लेकिन अचानक से धर्म बदलकर मक्का चल दिए और हाज़ी हो गए। अरे दोस्तो, आपकी स्मृति को क्यों काठ मार गया। ये वही नीतीशकुमार हैं, जो कुछ समय पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रहे थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने से पहले नरेंद्र मोदी से बेहतर संभावित प्रधानमंत्री घोषित किया था। लालू के साथ नीतीशकुमार हो तो वह घटिया और वही नीतीशकुमार अगर नरेंद्र मोदी या भाजपा के साथ चला जाए तो पापात्मा। क्या कमाल है!

    मायावती और उनका भक्त-संप्रदाय आजकल भाजपा पर टूटकर पड़ रहा है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दलितों की इस महान् उम्मीद ने ही उत्तरप्रदेश में सबसे पहले भाजपा से गठजोड़ करके भाजपा के हिन्दुत्वाद पर मुहर लगाई थी। यह वह समय था जब वामपंथी दलों और कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करते हुए जनांदोलन खड़ा किया था। उस जनांदोलन के कई हरावल दस्ते के कई नेता आजकल नरेंद्र मोदी के यशोगान कर अपने आपको उपकृत समझ रहे हैं।

    कुछ लोग हैं, जो एक इनसान को गोमांस रखने के नाम पर नृशंस ढंग से मारकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं, मानो इस देश में इनसानियत नाम की चीज़ ही नहीं रह गई है। कांग्रेस इस पर बढ़चढ़कर हल्ला मचाती है। लेकिन अचानक हम देखते हैं कि यही पार्टी एक निरीह और निरपराध मूक प्राणी, जो दुर्भाग्य से एक कारुणिक गाय है, सार्वजनिक रूप से काटकर अपने भीतर छुपी हिंसक नृशंसता को ला बाहर करती है।

    हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र को दूषित करने पर आमादा राजनीतिक दलों, राजनीतिक लोगों और इस देश के राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों के मानस में एक विषैलापन भरता जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाएं इसकी सबूत हैं।

    लाल यादव को लोग एक बार फिर मौका देते हैं, लेकिन वह सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय आज भी पारिवारिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक ऐसा नेता है, जिसने स्वार्थाें के वशीभूत अपने साहसिक गुणों को तिरोहित करके अपने आपको लगभग डुबाे दिया है।

    मायावती के पास दलितों का एक ऐतिहासिक बल आता है, लेकिन वह सत्ता के दंभ, धन एकत्र करने और महज सीटें जीतने के लिए एक धर्मविशेष के दिखावटी प्रेम का ऐसा मूर्ख प्रदर्शन करती हैं, दूसरे धर्म के चालाक कट्टर लोग उसे चौकड़ी भुला देते हैं।

    कुछ दिन पहले एक प्रयोग हुआ आम आदमी पार्टी का। इस आम आदमी ने आम आदमी के नाम पर राजनीतिक शुचिता, व्यवहार गत ईमानदारी और सिद्धांतिप्रियता के पेट में जिस तरह छुरा घोंपा, वह तो शायद ही किसी ने किया हो।

    ये मानसिकता प्रदर्शित करती है कि एक ही व्यक्ति को ये लोग एक ही समय में महान् लोकतांत्रिक घोषित कर सकते हैं और अगले ही पल उसे फासीवादी।

    मेरी चिंता सिर्फ़ इतनी सी है कि हमारी नई पीढ़ी की नवांकुरित प्रतिभाओं के मानस पटल पर यह अविवेकीपन लाया जा रहा है।

    मुझे लगता है, हमारी नई पीढ़ी को तटस्थ होकर चीज़ों का विश्लेषण कर सोच की एक नई राह बुननी चाहिए, ताकि हम एक सबल, सुसभ्य और सुलोकतांत्रिक समाज की ओर से बढ़ सकें। ऐसे समाज की तरफ जो विवेकशील मानवतावाद से भी आगे बढ़कर प्राणि-प्रकृति प्रियता को आत्मसात कर सके।

    दरअसल, इस सबके लिए अगर कोई कुसूरवार है तो हम लोग हैं। हम अवाम। हम भारत के लोग। हम किसी के कांग्रेस के पीछे लगते हैं तो 70 साल लगे ही रहते हैं और अगर नरेंद्र मोदी हमें भाता है तो फिर ऐसा भाता है कि उसकी हिमालय जैसी भूल भी राई जितनी नहीं दिखती। हम पर कभी नेहरू का चश्मा चढ़ता है और कभी इंदिरा का। कभी हमें राजीव गांधी चमत्कृत करते हैं और कभी हमें वीपी सिंह जैसा कोई लगता ही नहीं।

    हम भारत के लोग लोकतंत्र की नसों में जो विनाशकारी तेज़ाब डाल रहे हैं, वह तो दुनिया में कहीं दिखता। हमारे सैनिक मारे जाते हैं, हमारे नागरिक मारे जाते हैं और हमारे सपने मारे जाते हैं। हम हल्ला करते हैं, लेकिन हमारी नींद नहीं उड़ती। हम जैसे बोस्निया-हर्जेगोविना बनने को उतावले हैं। हमारे सत्ताधीश आयातुल्लाह खुमैनी बनकर हमें पाकिस्तान, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान और सीरिया बनाने की राहें उलीकते हैं तो हमें दिखता नहीं। वह फिर इंदिरा गांधी हों या नरेंद्र मोदी! वह बंगाल को नारकीय हालात में बदलने वाला कम्युनिस्ट शासन हो या केरल के मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए सार्वजनिक रूप से गाय काटने वाली कांग्रेस। हम सब सेना होते हैं और हम सब पत्थर फेंकते हैं अपने ऊपर!

    हम एक प्रहसन बनने को उतावले हैं। अपने घर को सपनों का घर और अपने देश को सपनों का देश बनाने के लिए जैसे हमें कोई सरोकार ही नहीं। हम अपनी महान् सांस्कृतिक थाती को तिरोहित होते कब तक देखते रहेंगे?

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall

  • जातिगत अत्याचारों से बचने के लिए दलित अपना रहे हैं बौद्ध धर्म और इस्लाम

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    भारतीय समाज में जाति हमेशा से एक महत्वपूर्ण कारक रही है। अतीत से लेकर वर्तमान तक, राजनीति में जाति की भूमिका हमेशा से रही है। जाति व्यवस्था के उदय और उसके प्रचलन के बारे में कई अलग-अलग दावे और व्याख्याएं की जाती रही हैं। अंबेडकर का मानना था कि जाति की जड़ें, हिन्दू पवित्र ग्रंथों में हैं। परंतु हिन्दुत्व की विचारधारा के पैरोकारों का कहना है कि हिन्दू समाज में सभी जातियां समान थीं। मुस्लिम आक्रांता, हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहते थे और जो लोग धर्मपरिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे वे दूरदराज़ के स्थानों पर भाग गए और यहीं से जातिगत असमानता की शुरूआत हुई। यह व्याख्या घटनाओं की सही विवेचना नहीं है और ऊँची जातियों की सोच को प्रतिबिंबित करती है। जो लोग कहते हैं कि मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ज़बरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने की कोशिश के कारण जाति व्यवस्था जन्मी, उनके दावों का खंडन करने के लिए ‘मनुस्मृति’ पर्याप्त है, जो दूसरी सदी ईस्वी में रची गई थी और जिसमें जातिगत पदक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है। मनुस्मृति जब लिखी गई थी, तब इस्लाम दुनिया में था ही नहीं और ना ही मुस्लिम व्यापारी भारत के मलाबार तट पर पहुंचे थे। मुस्लिम शासकों के आक्रमण तो तब सदियों दूर थे।

    इस बेसिरपैर की व्याख्या के विपरीत, स्वामी विवेकानंद हमें बताते हैं कि दलितों द्वारा इस्लाम में धर्मपरिवर्तन, मुख्यतः जातिगत उत्पीड़न के चलते हुआ। औपनिवेशिक काल में भारत के अर्ध-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई परंतु इसके बाद भी जाति व्यवस्था बनी रही। आज, स्वाधीनता के 70 साल, और भारतीय संविधान, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, के लागू होने के 67 साल बाद भी, जाति व्यवस्था जिंदा है। गोरखनाथ मठ के भगवाधारी आदित्यनाथ योगी के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया है कि जातिप्रथा हमारे समाज में आज भी उतनी ही मज़बूत है जितनी पहले थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तरप्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सहारनपुर में हुई हिंसा इसका एक उदाहरण है।

    कुछ रपटों के अनुसार, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ गांवों के 108 दलित परिवारों ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ने पर अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिहै। सहारनुपर के कुछ गांवों में, ठाकुरों और दलितों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी और दलितों ने राजपूत शासक राणाप्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जुलूस को निकलने नहीं दिया क्योंकि उसके लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी। दलितों का कहना है कि आदित्यनाथ की सरकार, केवल ठाकुरों की सरकार है।

    सहारनपुर के निकट मुरादाबाद के लगभग 50 दलित परिवारों ने यह धमकी दी है कि अगर आदित्यनाथ, भगवा ब्रिगेड द्वारा दलितों पर किए जा रहे हमलों को नहीं रोकते तो वे हिन्दू धर्म त्याग देंगे। इस आशय की खबर ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ के 22 मई, 2017 के अंक में छपी है। दलितों के हितों की रक्षा के लिए भीमसेना नाम का एक संगठन गठित हो गया है। सहारनपुर का प्रशासन कहता है कि भीमसेना, हिंसा कर रही है, जबकि दलितों का दावा है कि यह सेना उनकी रक्षक है। उनका यह भी आरोप है कि प्रशासन, ऊँची जातियों के पक्ष में झुका हुआ है और असली दोशियों को पकड़ने की बजाए, भीमसेना पर निशाना साध रहा है। हिन्दुओं के स्वनियुक्त रक्षकों के समूहों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। इस पृष्ठभूमि में, भीमसेना को दलित, आशा की एक किरण के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं और इसलिए उनके पास इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं है कि वे ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को त्याग दें। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म ही संघ परिवार की हिन्दुत्व की विचारधारा का आधार है। अभी हाल (22 मई, 2017) में दिल्ली के जंतरमंतर पर बड़ी संख्या में दलित, उनके विरूद्ध किए जा रहे अत्याचारों का विरोध करने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

    दलितों के प्रश्न पर आरएसएस हमेशा से एक बड़ी दुविधा में फंसा रहा है। एक ओर वह उनके वोट चाहता है तो दूसरी ओर वह यह भी जानता है कि अगर उसने दलितों को समान दर्जा देने की बात कही, तो आरएसएस-हिन्दुत्व राजनीति के मूल समर्थक जो ऊँची जातियों के हैं, उससे दूर छिटक जाएंगे। इस समस्या से निपटने के लिए आरएसएस, सोशल इंजीनियरिंग व सांस्कृतिक अभियानों के ज़रिए दलितों को अपने साथ लेने का प्रयास कर रहा है। उसने सामाजिक समरसता मंचों की स्थापना की है और नीची जातियों के लोगों के साथ भोजन करने के कार्यक्रम शुरू किए हैं। एक दूसरे स्तर पर वह दलित नेताओं जैसे रामविलास पासवान, रामदास अठावले व उदित राज इत्यादि को सत्ता की लोलीपोप पकड़ाकर अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आरएसएस की कोशिश यह भी है कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि दलित, मुसलमानों के हमलों से हिन्दुओं की रक्षा करने वाले लोग थे। इस तरह की सांस्कृतिक जोड़तोड़, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    पिछले तीन वर्षों में दलितों के प्रति दुर्भाव और पूर्वाग्रह कई अलग-अलग तरीकों से प्रकट हुआ है। आईआईटी, मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन की दलित-विरोधी नीतियों के कारण, वहां के शोधार्थी रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या हुई। गुजरात के ऊना में पवित्र गाय की रक्षा के नाम पर दलितों को बर्बर ढंग से पीटा गया। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, जाति व्यवस्था से दमित वर्गों के लक्ष्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाने वाली है। हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय के महानतम पैरोकारों में से एक अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया था। परंतु इसी मनुस्मृति का आरएसएस के चिंतकों जैसे एमएस गोलवलकर ने महिमामंडन किया। गोलवलकर जैसे लोगों ने तो भारतीय संविधान तक का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास मनुस्मृति के रूप में पहले से ही एक ‘अद्भुत’ संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की ज़रूरत ही क्या है? जहां अंबेडकर कहते थे कि गीता, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है वहीं मोदी सरकार गीता का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है।

    हिन्दू राष्ट्रवाद, भारत के एक काल्पनिक इतिहास का निर्माण करना चाहता है, जिसमें हिन्दू धर्मग्रंथों के मूल्यों का बोलबाला था। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहता है, जिनका एक प्रजातांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। हिन्दू धर्म की कई अन्य धाराएं भी हैं जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमण परंपराएं कहा जाता है। ये परंपराएं ऊँचनीच को खारिज करती हैं। परंतु हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण ने इन परंपराओं को हाशिए पर ढकेल दिया है। पिछली लगभग एक सदी से ब्राह्मणवादी मूल ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार बने हुए हैं। जंतरमंतर में चल रहा जबरदस्त विरोध प्रदर्शन इस बात की ओर संकेत करता है कि आरएसएस द्वारा हिन्दू धर्म के मूलतः समानता का धर्म होने की भ्रांति उत्पन्न करने का प्रयास सफल नहीं होगा। इससे हमें यह याद आता है कि अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जाति व्यवस्था से बचने के लिए हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज भी दलित यही करने में अपनी मुक्ति देखते हैं।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • वाचालता इस युग की प्रमुख प्रवृति बन गई है

    Shayak Alok

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    मुझे लगता है कि शासन व प्रशासन में बहुत कुछ अप्रत्यक्ष-नीतिक (कूटनीतिक) रखना उचित होता है. मैं इसे लोकशैली के एक वक्तव्य से पुष्टि देता रहा हूँ कि ‘मार कम बपराहट ज्यादा’ का प्रयोग लाभप्रद होता है. इसका आशय यह होता है कि साध्य को अधिक प्रकट बनाए रखना, न कि साधन प्रयोग पर एक दंभ बनाए रखना. मायावती की रैली से लौटते दलित-ईसाई-मजदूर युवक की हत्या मामले में उन्होंने यह हुनर आजमाया. buy zolpidem er 12.5 mg https://www.livermedic.com/ ambient online magazin उन्होंने न केवल अलसुबह परिवार को दबाव में ले मृतक का दाह-संस्कार कर दिया बल्कि उसी रात कई राजपूत युवकों को हिरासत में भी लिया. इससे संतुलनकारी स्थिति बनती है और प्रशासन के पास रचनात्मक स्पेस होता है कि वह बाकी कार्रवाई को नियंत्रण में अंजाम दे सके. अपने क़स्बाई पत्रकारिता दिनों में मैंने लोकल प्रशासन (एसपी-डीएम) को प्रायः इसी नीति से काम करते देखा है. शासन या प्रशासन को खुला पक्षकार नहीं बनना चाहिए. पक्षधरता सियासत का अवगुण है.

    मेजर गोगोई के मामले में बेहद आसानी से सेना के अंदर सेना प्रशासन द्वारा यह मैसेज कन्वे किया जा सकता था कि मेजर ने जो किया वह हालात के अनुसार एकदम सही था. यह मैसेज कन्वे करने की आवश्यकता भी नहीं थी यदि सेना जानती ही है कि विपरीत परिस्थितियों में वह प्रायः मनोनुकूल कार्रवाई उपाय अपनाती ही रही है. उत्तरपूर्व से कश्मीर तक सेना पर बलात्कार के आरोप लगते रहे हैं, आंतरिक कार्रवाइयों की बातें भी होती ही रहती हैं, लेकिन क्या पब्लिक डोमेन में ऐसी बातें प्रमुखता से आती हैं कि वास्तविक रूप से किसी सैन्य अधिकारी पर बलात्कार आरोप पर कोई कार्रवाई हुई. तो क्या नीति रही उनकी कि उन्होंने इसे अप्रत्यक्ष-नीतिक बनांये रखा है ताकि न तो सेना का कथित ‘मोरेल’ डाउन हो, न उन्हें पब्लिक आउटरेज से अकेले व सीधे मुक़ाबिल होने को विवश होना पड़े.

    किन्तु यूँ मेजर गोगोई को सम्मानित कर सेना प्रशासन पक्षकार बन गई. पहले से असंतुष्ट कश्मीर को एक और खराब मैसेज गया. यदि कश्मीरी भारतीय नागरिक ही हैं तो फिर प्रश्न तो बनता है कि संस्थागत पक्षधरता और नागरिक पक्षधरता के बीच सेना ने किसके प्रति पूर्वग्रह रखा. यह धैल किस्म का लोकतंत्र हुआ यदि सेना सैनिकों व नागरिकों में से सैनिकों को ही बस अपना समझे. यह ऐसा ही है कि एक बार किसी इजरायली मंत्री ने यह कह दिया था कि चयन यदि हमारे बच्चों की मौत और फ़लस्तीनी बच्चों की मौत में से एक का करना हो तो मैं फ़लस्तीनी बच्चों को चुनूँगा.

    सफल कूटनीति यह होनी थी कि मेजर गोगोई मामले पर सेना प्रशासन का बयान होता (या किसी बयान की आवश्यकता ही नहीं थी) कि मेजर गोगोई ने एक परिस्थिति में एक निर्णय लिया और उचित प्रतीत होता है, किन्तु इसके समानांतर नागरिक प्रशासन ( हमारी सरकार !) का यह बयान रहता कि सेना अधिकतम संयम बरते कि इस मामले की निष्पक्ष जांच करे. हुआ यह कि सेना ने मेजर को सम्मानित कर दिया और सरकार के लोग ‘जश्ननुमा’ बयान में लग गए.

    बीच का कोई रचनात्मक स्पेस मिला ही नहीं, बाँधा गया युवक स्टोन-पेल्टर भी नहीं साबित हुआ, कश्मीरियों का असंतोष इस घटना से बढ़ा होगा वह अलग.

    इस उत्सवधर्मी सरकार और ओवरकांफिडेंट सेना को इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि कश्मीर का अंतिम उपचार लोहे के जोर से नहीं बल्कि कश्मीरियों को विश्वास में लेकर ही होना है. हमने सत्तर साल से कश्मीर को सिर्फ लोह के दम से नहीं बचा रखा बल्कि संवादात्मक और संवेदनात्मक उपायों से भी बचा रखा है.

    किन्तु हम मोदी युग में हैं. सारे पाठ ही किसी और दिशा को प्रस्तावित हैं. भाषिक व व्यवहारपरक वाचालता इस युग की प्रमुख प्रवृति बन गई है.

     

  • लगता था तुम सभ्य हो गये हो –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

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    लगता था तुम्हारे पुराण
    अतीत ही में कहीं छूट से गये हैं
    लगता था तुम सभ्य हो गये हो
    अपने जहरीले धर्म से आगे बढ़ गये हो

    लेकिन हम सब गलत थे

    न तुम बदले
    न तुम्हारे पुराण बदले
    न पुराण बुद्धि बदली
    न तुम्हारा धर्म ही बदला

    लगता था मुगलों, तुर्कों, ब्रिटिशों ने
    तुम्हे सभ्य बना दिया है
    कि छोड़ दी हैं तुमने वे जहरीली तरकीबें
    अपनों से अपनों को ही लडाते रहने की
    कि सीख ली है तुमने भाषा
    सभ्यता विकास और लोकतंत्र की
    कि बढ़ चले हो तुम उस नये उजास की ओर
    जिसे अर्जित करने की तुम्हारी कोई योग्यता तो नहीं थी
    लेकिन तुम्हे दिया जरुर गया था

    आज इस सबको झुठला दिया तुमने

    तुमने सिद्ध कर दिया
    कि तुम सनातन ही हो

    तुम्हारा रोग
    तुम्हारी जड़ता
    तुम्हारी मूर्खता
    और तुम्हारा शोषण

    सच में सनातन है

  • सोच

    Dhiraj Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    अनिश्चितता इस कदर व्याप्त हो कि
    ठीक ठीक कुछ भी कहना
    ठीक नही हो तो
    संभावना या प्रायिकता
    इस बात कि सबसे ज्यादा होती है कि
    किसी ज्ञात बिन्दु पर
    या किसी ज्ञात समय पर
    यदि वो ‘हाँ’ है तो
    तक्षण दुसरे बिन्दु या समय पर
    वो ‘ ना’ हो जाता है

    ऐसा ही कुछ कुछ
    यादों मे बसा हुआ
    ‘ सोच ‘ के साथ होता है
    यादों के किसी ज्ञात-अज्ञात पड़ाव पर
    सोच जब ठोस होता है तब
    इसके तरल होने की
    संभावना एकदम से खत्म हो जाती है
    ठीक उल्टा यह कि
    जब सोच बहता हुआ होता है
    तब इसके ठोस होने कोई कारण
    नही होता है

     

  • ह्यूमर

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    एक दृश्य यह है कि डेविड लेटरमैन एक छत से नीचे झाँक रहे हैं और कहते हैं कि अमेरिका में जेनरेटर तब चलता है जब बिजली के तार पर कोई पेड़ गिर गया हो. वे फिर यह भी कहते हैं भारत में इतने डीजल जेनरेटर हैं कि पूरे ऑस्ट्रेलिया को बिजली की आपूर्ति की जा सकती है. सौर ऊर्जा की विशिष्टता बताने के लिए वे कहते हैं कि देखो, मैं इसे छू सकता हूँ और कोई खतरा नहीं है. मैं अपना सर इसके नीचे रख सकता हूँ.

    डेविड लेटरमैन नेशनल जियोग्राफिक के डाक्यूमेंट्री सीरिज ‘इयर्स ऑफ़ लिविंग डेंजरसली’ के लिए तब भारत में थे और जलवायु परिवर्तन व ऊर्जा के उपयोग पर भारत की दशा दिशा का आकलन कर रहे थे. प्रसिद्ध पूर्व टीवी होस्ट और कॉमेडियन डेविड लेटरमैन ने इस क्रम में प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू भी लिया था और इंटरव्यू के बाद कहा कि मैं उम्मीद कर रहा था कि वे आज रात मुझे यहीं रुक जाने को कहेंगे.

    डोनाल्ड ट्रम्प के दावेदारी के तुरंत बाद डेविड ने एक मंच से यह टिप्पणी की – ‘’मैं सेवानिवृत हुआ …मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, मैं खुश था. मैं कुछ वास्तविक दोस्त बनाऊंगा. मैं आत्मतुष्ट था. संतुष्ट था. तृप्त था, और फिर कुछ दिन पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने यह कह दिया है कि वे राष्ट्रपति पद के लिए खड़े हो रहे हैं. मुझसे जीवन की सबसे बड़ी भूल हो गई है.’’

    इसी हफ्ते डेविड को ‘मार्क ट्वेन प्राइज़ फॉर अमेरिकन ह्यूमर’ दिया गया है.

    अमेरिकन ह्यूमर

    प्रत्येक देश में हास-परिहास की अपनी भाषिक संस्कृति होती है जो अभिव्यक्ति के तरीके पर निर्भर होती है और यही उसे विशिष्ट बनाती है. अमेरिकी ह्यूमर के पितामह माने जाते प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘’अमेरिकी हास-परिहास फ्रेंच, जर्मन, स्कॉच या अंग्रेज हास-परिहास से बिल्कुल अलग है. और यह अंतर अभिव्यक्ति के तरीके का अंतर है. भले इसकी उत्पत्ति अंग्रेज ह्यूमर से हुई है लेकिन अमेरकी ह्यूमर अनूठा है. सिद्धांततः जब कोई अंग्रेज लिखता है या कहानी सुनाता है तो हास्य बिंदु पर जोर देता है और विस्मयादी का प्रयोग करता है. कहानी कहने वाला अमेरिकी ऐसा नहीं करता. वह ह्यूमर से होने वाले प्रभाव से प्रकटतः बेपरवाह बना रहता है.

    भारतीय परंपरा में हास-परिहास के दो अद्वितीय लोकचर्चित किरदार हुए. तेनाली राम और बीरबल. तेनाली राम राजा कृष्णदेव राय के दरबार के अष्टदिग्गजों में से एक थे और प्रसिद्ध कवि थे. लोक में उन्हें ‘विकट कवि’ के रूप में प्रतिष्ठा हासिल है जिसका ढीला ढाला अर्थ विदूषक या मसखरा है. राजा बीरबल अकबर के दरबार में थे और अपनी हाजिरजवाबी के लिए लोकचर्चित हुए. एक प्रकार से कह सकते हैं कि भारतीय परंपरा का ह्यूमर भाषाई सौष्ठव या अभिव्यक्ति के तरीके के बजाय सहज बुद्धि के त्वरित प्रयोग व वाकपटुता से अधिक प्रेरणा लेता रहा. यूँ भी भारतीय अभिव्यक्ति परंपरा में हाव-भाव अभिनय, बोलने या चुप रहने के तरीके और भाषा के इस्तेमाल के बजाय कहे गए ‘कंटेंट’ पर अधिक जोर रहता है.

    एक कथा है कि नेहरु सीढियां उतरते लडखडा गए तो राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें संभाला. नेहरु ने शुक्रिया कहा कि आपने संभाल लिया. दिनकर ने जवाब में कहा कि राजनीति जब भी लड़खड़ाएगी तब साहित्य उसे सहारा देगा. यह भारतीय ह्यूमर का एक क्लासिक उदाहरण है. एक और कथा में नेहरु संसद में देश को हौसला दे रहे थे कि चीन द्वारा हड़प ली गई भूमि में यूँ भी कुछ नहीं उगता. इस पर महावीर त्यागी ने तुरंत जवाब दिया कि आपके सर पर भी कुछ नहीं उगता तो क्या इसे किसी और को सौंप दिया जाए.

    हास-परिहास में फोर्मेट की भी अपनी विशेष भूमिका व योगदान है. यह फोर्मेट भी कई स्तरों पर निर्मित होता है और फोर्मेट के भीतर कई दूसरे फोर्मेट देखे जा सकते हैं. परदे की कॉमेडी, साहित्यिक व्यंग्य, हास्य कविताएं, राजनीतिक कटाक्ष और रोजमर्रा के आम जीवन में प्रासंगिक लोककहावतों के साथ दर्शाया जाता हास-परिहास मूल में अलग अलग प्रवृतियों व प्रभाव को प्रकट करता रहा है. इनके बीच का अंतर निश्चय ही किसी बौद्धिक अवलंब के बिना पर देखा जा सकता है. एक ही फिल्म में कॉमेडियन, हीरो-हीरोइन और विलेन द्वारा प्रस्तुत हास-परिहास में एक साफ़ अंतर दीखता है. एक ही साहित्यिक व्यंग्य में लेखक के सवाल और किसी किरदार के जवाब से दो अलग तरह का ह्यूमर-इफेक्ट पैदा होता है.

    मेरे हिसाब से भारतीय ह्यूमर का प्रतिनिधित्व एडिटोरियल पन्ने पर लिखने वाले हमारे कुछ स्तंभकार कर पाते हैं. कुछ प्रतिनिधित्व वरुण ग्रोवर एवं अन्य कुछ स्टैंडअप कॉमेडियन कर पाते हैं वरना यह ‘’आर्ट’’ हम कुछ तो जरुर खो रहे हैं.

    भारतीय ह्यूमर का सबसे अधिक संक्रमण इन दिनों राजनीति व न्यूज़ मीडिया में देखने को मिल रहा है. वे जैसे किसी कुंठा से उत्पन्न होते हैं और किसी मनोविनोद के बजाय एक कड़वाहट छोड़ने पर समाप्त हो जाते हैं. संसद में कई बार किसी सदस्य के वक्तव्य में उत्कृष्ट ह्यूमर नजर आ जाता है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और हमारे सबसे बड़े प्रधानमंत्री उम्मीदवार ज्यादातर बार हल्के चुटकुले या चुभते कटाक्ष पर ही अपनी प्रतिभा समाप्त कर लेते हैं और बौद्धिक चर्या का मनोविनोद प्रस्तुत नहीं कर पाते.

    अभिव्यक्ति का एक अन्य संकट ‘रेस्पोंसिबिलिटी’ का है. मुझे डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक बात बेहद पसंद आई थी जो उन्होंने एक निजी संवाद में कही थी. उन्होंने कहा कि ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ के साथ लेखक में या किसी भी प्रतिनिधि या व्यक्ति में ‘सेन्स ऑफ़ रेस्पोंसिबिलिटी’ भी अवश्य हो, तब असल आनंद है.

    चर्चित कवि श्री मंगलेश डबराल को किसी किरदार की तरह रखते हुए अब मैं कुछ उदाहरण दूंगा :-

    1. ह्यूमर : मंगलेश डबराल मुझसे तीन बार टकराए और तीनों बार एक ही तीन सवाल पूछे – कि मैं कैसा हूँ, कहाँ रहता हूँ, और क्या करता हूँ. तीनों बार उन्होंने मंच से मोबाइल, टॉर्च और पहाड़ तीन कविताएं सुनाई.
    2. व्यंग्य : वे पहाड़ से कुछ कविताएं लिए आए थे, दिल्ली में बात नहीं बनी, इन दिनों वे फिर कविताओं के लिए पहाड़ की ओर ताक रहे हैं.
    3. कटाक्ष : डबराल कैंप के कवियों में (कवयित्रियों में भी) बची रहे थोड़ी सी लज्जा.
    4. फूहड़ता : वे थोड़े लंप (हिंदी और अंग्रेजी इनिशियल) किस्म के व्यक्ति हैं.
    5. हास्य : वे श्री प्रभात रंजन से हिंदी में नाराज हुए और श्री वीरेन्द्र यादव से अंग्रेजी में उनकी शिकायत करने लगे.

     

  • क्या हम मुसलमान हैं ??

    Saleem Sabri

    [themify_hr color=”red”]

    आधे-अधूरे पांच फर्ज़ (कलमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज)पूरे कर हम मुसलमान होने का दावा करते है .. अधिकतर तो वो भी नहीं करते । लेकिन क्या हम अपने आचरण से मुसलमान है ?? शायद नहीं .. ?? लेकिन मुस्लिम के यहाँ जन्म लेने से या मुस्लिम नाम रख लेने भर से हम मुसलमान हो जाते और फिर इस्लाम जैसे महान धर्म के प्रतिनिधी भी अब पूरी दुनिया के लिए जैसा आचरण मुसलमान करते है वो ही इस्लाम है । —

    लेकिन क्या हम इस्लाम के अनुसार आचरण कर रहे है ? क्या हमारे समाजिक जीवन में हमारा व्यवहार इस्लाम की शिक्षाओ के अनुरूप है .. ?? कुछ अपवादों को छोड़कर शायद 1-2% भी नहीं । आइए देखते है इस्लाम मुसलमानों से क्या तव्वको रखता है ।

    इस्लाम के अनुसार मुसलमानो का व्यवहार :

    • अपने माँ-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करो (कुरान,4.36)
    • अपने बच्चों को शिष्ट रहन-सहन और अच्छी शिक्षा प्रदान करो (पैगम्बर स० अ०)
    • सगे सम्बंधियों के साथ अच्छा बर्ताव करो (कुरान,4:36)
    • वह मुसलमान नहीं जिसका पेट भरा हो और पड़ोसी भूखा हो (पैगम्बर स० अ०)
    • पड़ोसी के घर से ऊंचा अपना घर न बनाओ ( पैगम्बर स० अ०)
    • गरीबों को खाना खिलाओ (कुरान )
    • मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो (पैगम्बर स० अ०)
    • अनाथों और निर्धनों के साथ दयालुता का व्यवहार करो (कुरान 4:36)
    • संसार की सभी रचनाओं पर दया करो (कुरान 21:107)
    • छायादार वृक्ष को न काटो (पैगम्बर स० अ०)
    • एक पौधा लगाना दान है (हदीस )
    • प्राकृतिक संसाधनों और धन की फिज़ूलखर्ची न करो (कुरान 7:31)
    • लोगों के मानवाधिकार का हनन माफ नहीं किया जाएगा (पैगम्बर स० अ०)
    • मुस्कुराकर मिलना भी दान है (पैगम्बर स० अ०)
    • अत्याचारी को अत्याचार से रोक दो (पैगम्बर स० अ०)
    • दयालु और विनर्म बनो (पैगम्बर स० अ०)
    • जब नापकर दो तो, नाप पूरी रखो । (कुरान 17:35)
    • जब बात कहो, तो इंसाफ की कहो , चाहे मामला नातेदार का क्यों न हो (कुरान 6:152)
    • अमानत में खयानत न करो (कुरान 4:58)
    • लोगों से भली बात करो (कुरान 2:83)
    • दूसरों की कमियों को उजागर न करो (पैगम्बर स० अ०)
    • सफाई आधा ईमान है (पैगम्बर स० अ०)
    • कमज़ोरो के मित्र बनो और ज़ालिम शासकों और उनके तरीकों का विरोध करो (कुरान 4:75)
    • गोद से कब्र तक ज्ञान प्राप्त करते रहो (पैगम्बर स० अ०)
    • अंहकार से बचो (कुरान 49:12)
    • झूठे पर अल्लाह की फटकार है (24:7)
    • अपनी गलती या गुनाह को किसी निर्दोष पर न थोपो (कुरान 4:112)
    • कंजूसी और जमाखोरी न करो (कुरान 3:180,9:34)
    • ब्याज लेना और देना अवैध है (कुरान 2:275,278-279)
    • मदिरा और जुआ शैतान के काम है (कुरान 5:90)
    • निर्धनता के भय से अपनी संतानों की हत्या (गर्भपात) न करो (कुरान 17:31)

    और भी हज़ारों समाजिक व्यवहार और आचरण से सम्बन्धित शिक्षाएं है ,, लेकिन अफसोस सभी मुस्लिम तंजीमें और खुद हम भी फरायज़े से आगे सोचते ही नहीं है और दुनिया के सामने इस्लाम की बिगड़ी हुई छवि रख रहे है । हम गैर-मुस्लिमों की साज़िशों को तो ढूंढ लेते है , लेकिन कभी ईमानदारी से अपने अन्दर झांकते नहीं है । यादि हम 10% भी अमल कर ले तो शायद अपना और इस्लाम का कुछ भला कर पायें ।

    अल्लाह हम सबको हिदायत दे और अमल करने की तौफीक दे। आमीन।

  • ‘एज इट इज़’ देखने का अभाव

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    मैं शोर और विशेषज्ञों के विश्लेषणों पर बहुत ज्यादा यकीन नहीं कर पाता. भारतीय सन्दर्भ में नीति विषयों पर तो इन विशेषज्ञों के अटकलों, अनुमानों और सुझावों को मैंने कभी भी काम लायक नहीं पाया है. मुझे उनके विचार बेहद किताबी लगते रहे हैं. चीजों को ‘एज इट इज़’ देखने के बेहद जरुरी मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का उनमें अभाव दीखता है. वे हमेशा कुछ विशेष ढूंढ लाते हैं और विशेष सलाह देने लगते हैं.

    यह कहानी मोदी के दंभपूर्ण हुंकार से शुरू हुई कि वे पाकिस्तान को अलग थलग कर देंगे. मुझे तब भी यह बात हास्यास्पद लगी थी. अब इन दिनों भारतीय चिंताकार भारत के ही अलग थलग पड़ते जाने पर लेख लिख रहे. मुझे यह बात भी हास्यास्पद लग रही है.

    गधे की अपनी उपयोगिता होती है और घोड़े की अपनी.

    पहले पाकिस्तान पर ही आते हैं. पाकिस्तान एक लगभग फेल्ड स्टेट की स्थिति में है. उसकी यह स्थिति ही उसे दक्षिण एशिया में सबसे अधिक प्रासंगिक बना देती है. पाकिस्तान अमेरिका या चीन के जैसे काम आ सकता था/है, वैसा कोई अन्य देश नहीं आ सकता. अमेरिका के पाकिस्तान से कुछ दूर होते ही रूस ने भी इसलिए अपनी रूचि दर्शा दी है. भारत संप्रभुता का प्रश्न उठा बेल्ट एंड रोड समिट को स्कीप करता है, और पाकिस्तान संप्रभुता को ही दाँव पर लगा सीपेक को बी एंड आर का फ्लैगशिप बनाने में योगदान करता है.

    भारत की शक्ति उसका आर्थिक आकार और उसका बाज़ार है. विश्व की रूचि भारत में इस कारण है. इस रूचि का परित्याग विश्व किसी भी कारण क्यों करेगा. चीन-भारत आर्थिक संबंध के वॉल्यूम को ही देख लें और उसका चीन की ओर झुकाव देख लें तो भारत ऐसा घोड़ा नहीं है जिसपर दाँव खेलने से चीन कभी भी पीछे हट जाएगा. रूस पर भी यही गणित लागू होता है. अमेरिका की भारत में बढ़ी रूचि का स्ट्रेटजिक गणित है और इसपर जाहिर ही हमारे चिंताकार फिलहाल चिंतित नहीं होंगे.

    अमेरिका चीन रूस को पाकिस्तान जो सुविधाएं व सेवाएं दे सकता है, वह क्या संप्रभु भारत कभी दे सकता है ? आसान गणित है.

    हाल यहाँ यह है कि हम यहाँ अपने ही टाटा को स्वदेशी प्लांट लगाने के लिए जमीन देने में मार मचा देते हैं जबकि पाकिस्तान अपनी हजारों एकड़ कृषिभूमियां चीन को खेती के प्रयोग के लिए सौंप रहा है.

    एज इट इज़. ऐसा ही है. नैसर्गिक बनते बदलते समीकरण. दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान अपनी इस विशिष्ट स्थिति का ही उपभोग करते रहेंगे. मोदी हुंकार से न पाकिस्तान अलग थलग पड़ेगा, न ही किसी बैकफायर से भारत अलग थलग पड़ेगा.

    भारतीय चिंताकार अधिक चिंतित इस बात पर भी दीखते हैं कि भारत के छह पड़ोसी बी एंड आर से चीन से भारी निवेश पाएंगे और भारत वंचित रहेगा. ये प्रायः इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी मद के निवेश हैं. प्रश्न है कि हम चीन से इसी शर्त और श्रेणी का निवेश लेने को कितने उद्यत हैं. जिनपिंग ने गुजरात में हमसे पिछली मुलाकात में जितने निवेश का वादा कर रखा, क्या उसे खींच लेगा ? रूठ जाएगा हमसे ? निवेश करना लाभ का व्यापार करना है, खैरात नही होता.

    अब आते हैं रणनीतिक मसले पर. वैश्विक महत्वाकांक्षा जी रहा चीन भारत के किसी भी अवरोध से यदि नाराज होता है तो उसके पास आजमाने को क्या विकल्प हैं ? हमारी दुखती रग पाकिस्तान को थोड़ा और सहला देना ? इस उस मंच पर हमारे प्रवेश को थोड़ा बाधित कर देना ? किन्तु चीन का यह रुख तो मोदी-जिनपिंग के अच्छे दिनों से ही जारी है. युद्ध ? चीन को युद्ध करना हो तो दलाई लामा का बहाना ही पर्याप्त है.

    मैं अभी एक चिंताकार को पढ़ रहा था एक्सप्रेस में. वे इतने भयभीत और उत्तेजित दिख रहे हैं कि अभी ही सरकार को पांच सौ प्रकार के नये प्रोजेक्ट शुरू करने की सलाह दे दी. मतलब कि वे तैयार बैठे थे कि एक जिनपिंग आएगा, जो स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की रणनीति आजमाने के बाद जब सशंकित होगा कि उसकी मनोवृति पकड़ में आ रही है तो फिर ओबीओआर आजमाएगा, और इस दरम्यान भारत यूँही बस बैठा रहेगा, और फिर वे अपनी सलाह दे सकेंगे.

    अतीत में भी नाटो सिएटो फलना चिलना रूस अमेरिका में हमारे चिंताकारों ने यूँही वक्त जाया किया जबकि भारत ने अपनी आर्थिक/रणनीतिक राह उनके अटकलों अनुमानों सुझावों से परे जाकर पकड़ी और औसत से अधिक सफल भी रहा.

     

  • मेरे शहर के हिस्ट्रीशीटर

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    उन दिनों एसपी हुआ करते थे बीजू जॉर्ज जोसेफ़। क्या हिम्मती बंदा था। खूब पढ़ाकू और खूब लड़ाकू। थानेदार थर-थर कांपते थे और बंदे को देखो तो हर समय पसीने से लथपथ। एसपी जैसा एसपी।

    मज़ाल कि कानून और व्यवस्था को कोई धता बता दे। थानेदार भले ढीले पड़ जाएं, सीआई चाहे कहीं छुप जाएं और डीवाईएसपी चाहे किसी कंदरा में ओझल हो जाएं, अपराधियों को खुद ही धर लेता था। कमज़ोर एसपीज के समय में जो कानून अपराधियों के सामने साए की तरह ज़मीन पर रेंगता है, उसमें अच्छे एसपी सूरमे सांप की सी जुंबिश और फुफकार भर देते हैं। बीजू ने उन दिनों यही किया था।

    एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में मैं थाने में थानेदार के सामने था तो एक कॉल आई और थानेदार सावधान की मुद्रा में आ गया कुर्सी से कूदकर। पता चला, बीजू का फ़ोन है। मज़ा आया।

    बीजू के साथ मैंने कई पुस्तकें एक्सचेंज करके पढ़ीं। अरुंधति रॉय की “दॅ गॉड ऑव स्मॉल थिंग्स” उन्हीं दिनों आई थी और मुझे मिल नहीं रही थी। यह उपन्यास मैंने उन्हीं से लेकर पढ़ा। बीजू के आग्रह पर मैंने शायद उन्हें नीरद सी चौधरी की “दॅ ऑटोबायोग्रैफी ऑव अन अननॉन इंडियन” पढ़ने को दी थी। यह सिलसिला काफ़ी चला। लेकिन ज़ल्द ही उनका तबादला हो गया और वे चले गए। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन बहुत यादगार।

    तो ख़ैर, शहर के एक बहुत नामी उद्योगपति की उनके अपने ही सगे भाई ने जेल से पैरोल पर आए एक ख़तरनाक अपराधी से दिन दहाड़े हत्या करवा दी थी। इस हत्याकांड से शहर में सनसनी फैल गई थी, लेकिन बीजू ने इसे कुछ घंटे बाद ही पंजाब बॉर्डर क्रॉस करते हुए धर दबोचा था।

    इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग बहुत रोमांचकारी रही। गर्भनाल के रिश्ते खून से आलूदा हो चुके थे। जिस समय अदालत से फैसला आया, मारे गए व्यक्ति की पत्नी हत्या के असली अभियुक्त को सज़ा दिलाने से पीछे हट गई और एक नेपाली नौकर के बयानों के अाधार पर अदालत ने अपराधियों को सख़्त सजा सुनाई। औरत का पतन देखो, पैसा मिल गया; पति के असली हत्यारे को बख्श दिया। शहर में चर्चा थी कि देवर और भाभी में भारी डील हुई है।

    इस घटनाक्रम ने मन उचाट कर दिया। क्या कोई सगा भाई पैसे के लालच में इतना नीचे गिर सकता है? क्या कोई पत्नी इतना पतित हो सकती है? लेकिन उस समय और भी शर्म आई, जब पता चला कि पूरे शहर ने उस शख्स को सिर पर बिठा लिया है, जिसने मर्डर करवाया था।

    खैर, हत्यारे की गिरफ्तारी की जिस समय खबरें की जा रही थीं, मेरे पास जेल से नंबरदार का फोन आया। वह बोला : एक बात करनी है आओ। मैं जेल पहुंचा। जेल में नंबरदार सबसे सीनियर और लीडर बंदे को कहते हैं। इसने कोई न कोई खतरनाक अपराध किया होता है।

    मैं गया तो वह बोला : यार, इससे मिलो। ये हैं करतारसिंह। मैं बोला : तो हुआ क्या?

    करतारसिंह बोला : वो सेठ के मर्डर में जिस संजय को पकड़ा है। पुलिस ने 302 की जगह 303 लगाई है। ये ग़लत है। रोंग है। बिलकुल रोंग। मैंने इस धारा के बारे में पहली बार उसी समय सुना था।

    दरअसल, आईपीसी की एक धारा है 303, जो ऐसे मर्डरर पर लगाई जाती है, जो पहले से आजीवन कारावास की सजा काट रहा हो। इसमें फांसी के अलावा और कोई सजा नहीं है।

    करतारसिंह, जिस पर कई लाेगों के मर्डर का आराेप था और जो एक ठेठ देसी किसान था, बोला : हू एवर बीइंड अंडर सेंटेंस ओफ इंप्रीजनमेंट फोर लाइफ, कमिट्स मर्डर, शैल बी पनिश्ड विद डैथ।

    वह बोला : ध्यान देणा भाई साब। शैल बी पनिश्ड विद डैथ। लेकन गल ये है कि मिट्‌ठूसिंह और भगवान बख्श सिंह के केसों में भाई साहब सुप्रीम कोर्ट ने एटीफोर से पहले ही आईपीसी के इस सेक्शन को स्ट्रक डाउन कर दिया था। इसे वोइड और अनकंस्टीट्यूशनल भी करार दिया था जी।

    अब पूरी कहानी समझ आई कि पुलिस ने जिस मर्डर मामले में ये सेक्शन लगाया है, उसमें तो कोर्ट ने भी पीसी रिमांड दिया है। मैंने कहा तो करतारसिंह बोला : देखो, अजकल, कनून दे बारे न जजां नूं पता, न पुलिस अफसरां नूं। कनून दा पता हुंदा तां अज्ज ऐने लोक बेकसूर ही जेलां विच नहीं सड़दे।

    मैंने कहा : यार तुमने तो खुद मर्डर किया है। तुम सजा काट रहो, सड़ नहीं रहे हो!

    वह बोला : बताओ किसका किया?
    मैं बोला : अब तुम्हीं बता दो।
    करतार ने कहा : मेरे घर की एक लड़की को कोई बुरी नजर से देख रहा था। वह हद पार होने लगा तो समझाया। नहीं माना तो दो चार बार और समझाया। नहीं माना और अपनी हद से गुजरा तो उसकी गर्दन उतारकर मैंने उसके चबूतरे पर रख दी। …. की मैं गलत कीता? https://remotepilot101.com/ देख वीरा, मेरे दिल विच देख। मेरी बहन प्रसन्न है और मेरे दिल से इनसाफ़ की महक आ रही है।

    ……वह बोला : मैं कोई कमीना कातिल नहीं हूं!

    मैं अनुत्तरित था।


    फेसबुक वाल से साभार