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  • अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    Vidya Bhushan Rawat

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए. ये भी हकीकत है के ऐसे हमले सीमा पार की शह के बिना पे नहीं हो सकते हैं लेकिन भारत सरकार की कश्मीर निति पूर्णतः असफल हो चुकी है. हम जानते है के इस वक़्त भक्त पत्रकार मामले को सांप्रदायिक रूप देने में व्यस्त होंगे और कई ने ट्वीट करना शुरू किया है के क्या #नोटइनमायनेम का कोई प्रदर्शन भी होगा . ये शर्मनाक है क्योंकि देश पर किसी भी संकट पर हम सभी लोग साथ होते हैं लेकिन अगर उस संकट का संप्रदायी करण करने की कोशिश होगी तो स्थिती बेहद गंभीर होगी .

    हम जानते है के आतंक की इस वारदात का देश के सभी लोग चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, दलित हो या आदिवासी या अन्य कोई कड़े शब्दों में निंदा करते है . हम लोग आतंक के खिलाफ है लेकिन हर किस्म के . उस आतंक के भी जो गौरक्षा के नाम पर निरपराध लोगो को मार रहा है . आखिर आतंक की किसी भी घटना में मारने वाले लोग तो निरपराध ही होते हैं .

    हम जानते हैं के कश्मीर में भारत के जवान लड़ रहे है और अपने जान की क़ुरबानी भी दे रहे हैं . सवाल यह नहीं के फौज या जवान कार्य नहीं कर रहे . सवाल इस बात का है के इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के बावजूद ऐसी घटना घटती है तो किसे दोष दे. आतंकवादी तो चाहते हैं के निरपराध लोगो को मारकर कश्मीर और देश में अफरा तफरी का माहौल पैदा कर दे. लोगो को एक दुसरे के खिलाफ खड़ा कर दे. कश्मीर में भाजपा की गठबंधन सरकार है और इसके नेताओं ने अपनी पूरी मर्जी कश्मीर पर चलाई है. न केवल सरकार ने अपितु टी वी पर भडुआ भोम्पुओ की फौज भी माहौल को साम्प्रदायिक बनाने में जुटी है लेकिन सवाल इस बात का है के कश्मीर में जो राजनैतिक पहल होनी चाहिए थी वो क्यों नहीं हो रही . क्यों ये सरकार हर एक मसले का हल सेना के जरिये चाहती है. अगर सेना हल होती तो हर देश में समस्याओ का समाधान सेना के जरिये हो जाता. सेना देश की सुरक्षा के लिए है और सैनिक उसके लिए अपनी जान भी लगा देता है . आज सिक्किम में भी भारतीय जवान अपनी जान पे खेलकर हमारी सीमा को सुरक्षित कर रहे है लेकिन सवाल यह है के बात कब होगी . क्या युद्ध किसी बात का समाधान है ?

    हम राजनैतिक दलों और सरकार से अनुरोध करते हैं के कश्मीर के प्रश्न को गंभीरता से ले और उस पर सर्वदलीय बैठकर बुलाकर एक विशेष कमिटी का गठन करे . आतंकवादियों से कोई बात नहीं होनी चाहिए लेकिन कश्मीर के अन्दर जो लोग राजनैतिक समाधान चाहते हैं उनके साथ तो बात हो सकती है .

    सरकार का काम होना चाहिए के सभी से अनुरोध करे के जहाँ इस घटना पर उसे दुःख होना चाहिए और इस कृत्य को करने वाले लोगो के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए वही अपने चाहने वालो को देश के दुसरे हिस्से में आग उगलने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश से बचना चाहिए. अपने चुनाव जीतने के चक्कर में देश को विभाजित न करे . घटना की कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए लेकिन सरकार की कश्मीर निति पर सवाल भी पूछे जाने चाहिए .

  • लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    Mukesh Kumar Sinha

    लड़कियों से जुड़ी बहुत बातें होती है
    कविताओं में
    लेकिन नहीं दिखते,
    हमें दर्द या परेशानियों को जज़्ब करते
    कुछ लड़के
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए, अपनों के सपनों के साथ

    वो लड़के नहीं होते भागे हुए
    भगाए गए जरुर कहा जा सकता है उन्हें
    क्योंकि घर छोड़ने के अंतिम पलों तक
    वो सुबकते हैं,
    माँ का पल्लू पकड़ कर कह उठते हैं
    “नहीं जाना अम्मा
    जी तो रहे हैं, तुम्हारे छाँव में
    मत भेजो न, ऐसे परदेश
    जबरदस्ती!”

    पर, फिर भी
    विस्थापन के अवश्यम्भावी दौर में
    रूमानियत को दगा देते हुए
    घर से निकलते हुए निहारते हैं दूर तलक
    मैया को, ओसरा को
    रिक्शे से जाते हुए
    गर्दन अंत तक टेढ़ी कर
    जैसे विदा होते समय करती है बेटियां
    जैसे सीमा पर जा रहा हो सैनिक
    समेटे रहते हैं कुछ चिट्ठियाँ
    जिसमे ‘महबूबा इन मेकिंग’ ने भेजी थी कुछ फ़िल्मी शायरी

    वो लड़के
    घर छोड़ते ही, ट्रेन के डब्बे में बैठने के बाद
    लेते हैं ज़ोर की सांस
    और फिर भीतर तक अपने को समझा पाते हैं
    अब उन्हें ख़ुद रखना होगा अपना ध्यान
    फिर अपने बर्थ के नीचे बेडिंग सरका कर
    थम्स अप की बोतल में भरे पानी की लेते हैं घूँट
    पांच रूपये में चाय का एक कप खरीद कर
    सुड़कते हैं ऐसे, जैसे हो चुके हों व्यस्क
    करते हैं राजनीति पर बात,
    खेल की दुनिया से इतर

    कल तक,
    हर बॉल पर बेवजह ‘हाऊ इज देट’ चिल्लाते रहने वाले
    ये छोकरे घर से बाहर निकलते ही
    चाहते हैं, उनके समझ का लोहा माने दुनिया
    पर मासूमियत की धरोहर ऐसी कि घंटे भर में
    डब्बे के बाथरूम में जाकर फफक पड़ते हैं
    बुदबुदाते हैं, एक लड़की का नाम
    मारते हैं मुक्का दरवाज़े पर

    ये अकेले लड़के
    मैया-बाबा से दूर,
    रात को सोते हैं बल्व ऑन करके
    रूम मेट से बनाते है बहाना
    लेट नाइट रीडिंग का
    सोते वक्त, बन्द पलकों में नहीं देखना चाहते
    वो खास सपना
    जो अम्मा-बाबा ने पकड़ाई थी पोटली में बांध के

    आखिर करें भी तो क्या ये लड़के
    महानगर की सड़कें
    हर दिन करने लगती है गुस्ताखियाँ
    बता देती है औकात, घर से बहुत दूर भटकते लड़के का सच
    जो राजपथ के घास पर चित लेटे देख रहें हैं
    डूबते सूरज की लालिमा

    मेहनत और बचपन की किताबी बौद्धिकता छांटते हुए
    साथ ही बेल्ट से दबाये अपने अहमियत की बुशर्ट
    स को श कहते हुए देते हैं परिचय
    करते हैं नाकाम कोशिश दुनिया जीतने की
    पर हर दिन कहता है इंटरव्यूअर
    ‘आई विल कॉल यु लेटर’
    या हमने सेलेक्ट कर लिया किसी ओर को

    हर नए दिन में
    पानी की किल्लत को झेलते हुए
    शर्ट बनियान धोते हुए, भींगे हाथों से
    पोछ लेते हैं आंसुओं का नमक
    क्योंकि घर में तो बादशाहत थी
    फेंक देते थे शर्ट आलना पर

    ये लड़के
    मोबाइल पर बाबा को चहकते हुए बताते हैं
    सड़कों की लंबाई
    मेट्रों की सफाई
    प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान,
    कनाट प्लेस के लहराते झंडे की करते हैं बखान
    पर नहीं बता पाते कि पापा नहीं मिल पाई
    अब तक नौकरी
    या अम्मा, ऑमलेट बनाते हुए जल गई कोहनी

    खैर, दिन बदलता है
    आखिर दिख जाता है दम
    मिलती है नौकरी, होते हैं पर्स में पैसे
    जो फिर भी होते हैं बाबा के सपने से बेहद कम
    हाँ नहीं मिलता वो प्यार और दुलार
    जो बरसता था उनपर
    पर ये जिद्दी लड़के
    घर से ताज़िंदगी दूर रहकर भी
    घर-गांव-चौक-डगर को जीते हैं हर पल

    हाँ सच
    ऐसे ही तो होते हैं लड़के
    लड़कपन को तह कर तहों में दबा कर
    पुरुषार्थ के लिए तैयार यकबयक
    अचानक बड़े हो जाने की करते हैं कोशिश
    और इन कोशिशों के बीच अकेलेपन में सुबक उठते हैं

    मानों न
    कुछ लड़के भी होते हैं
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए अपनों के सपनों के साथ।

  • दंगो में ऐसा ही होता है

    Hafeez Kidwai

    दूर एक हाथ कटा पड़ा था। उस हाथ का जिस्म अलग एक खम्भे से टेक लगाए पड़ा था। शायद औरत थी। करीब से देखा तो फुसफुसा रही थी और करीब गया तो फुसफुसाहट समझ आने लगी। एक हाथ से हाथ जोड़ते हुए वह कह रही है “मेरी बेटी से एक एक करके बलात्कार करो,एक साथ करोगे मर जाएगी। वह मर जाएगी,ए आदमियों इधर मुझपर आ जाओ, उसपर एक साथ मत टूटो, वह मर जाएगी।”

    यह शब्द अगर किसी इंसान ने सुने होते तो उसके जिस्म की अकड़न शर्मिंदगी से खुद बखुद खत्म हो जाती। दूर उसकी आठ साल की बच्ची पड़ी थी। करीब जाकर देखने पर महसूस हुआ जो हमारे लिए आठ साल की बच्ची थी, वह अभी किसी वहशी झुँड के लिए औरत थी।

    कभी उस औरत को देखता तो कभी उस बच्ची को, तो कभी जले हुए घर देखता तो कभी बारिश की तरह बिखरे पड़े ख़ून को।लड़की के होंट वहशियों की गन्दगी से छुप गए थे।रुमाल को गीला करके मैं उसके मुँह को साफ़ करता की आँसू फिर टपक कर उसका मुँह गीला कर देते। मैं बार बार साफ़ करता, वह बार बार गन्दा हो जाता। उसके जिस्म से उठती दूसरे झुण्ड की बदबू दिमाग में इस तरह चढ़ी की कल दोपहर की पी चाय एक झटके में मुँह से निकल गई।

    किसी ने आकर मुझे उठाया,मैंने पलट कर सवालिया अंदाज़ में उसे देखा। उसने कहा दोस्त परेशान मत हो। दंगो में ऐसा ही होता है। भीड़ किसी को भी नही बख्शती। यह हमारा दुर्भाग्य है की हम इसमें फंस गए। दँगे हर एक को खत्म कर देते हैं।यही बहुत रहा की हम ज़िंदा बच तो गए।।।।।वह मुझ मुर्दे से बोले जा रहा था जैसे वह बोले जा रही थी। “मेरी बेटी से एक एक कर के बलात्कार करो, एक साथ मत करो, वह सह नही पाएगी, मर जाएगी”

     

  • किसान संकट के बीज

    किसान संकट के बीज

    Prem Singh

    बुंदेल खण्ड में ग्रीन रेवलूशन, गाँव से बाहर शहरों में पढ़े नव शिक्षित वर्ग के साथ १९७५ के आस पास ही गाँव में प्रवेश कर पाया इसके पहले नहीं। वही शिक्षित वर्ग जिसे गाँव वालों ने बड़े हसरत और प्यार से बाहर पढ़ने के लिए भेजा था, लौट आने के बाद भी बड़ा सम्मान करते थे।(मेरे गाँव में सबसे पहले जो सज्जन इलाहबाद विस्वविद्यालय पढ़ने गए थे १९६५ में, पूरे गाँव ने टीका लगाकर, पैसे देकर ग़ाजे बाजे के साथ बस में बिठा कर विदाई की थी।जब वही व्यक्ति पुनः वापस आया जीवन भर उसे गाँव वालों ने भैया कह कर २०१५ उसके निधन तक सम्मान किया) इसी वर्ग ने गाँव के सारे मानक बदल डाले। सबसे पहले बड़ेपन या श्रेष्ठता का मानक बदला। हमारे गाँव में उसको उतना ही सम्मान मिलता था जो जितना आत्म निर्भर था और दूसरों के काम आता था। जैसे ही कुछ अतिरिक्त उत्पादन या आमदन होती तुरंत गाँव के सामूहिक उपयोग के लिए बर्तन, फ़र्श, तख़्त, जंगाल( पानी इकट्ठा करने का ताम्बे का बर्तन), कोपर, कठौती,अद्धा( प्रकाश फैलाने का यन्त्र, हारमोनियम, तबला आदि अनेकानेक वस्तुएँ लाते थे। और गाँव वाले पूरे अपने पन से उन्हें प्रयोग करते थे। यही बड़प्पन था।

    जो वास्तव में विचारों और व्यवस्था,दोनो में बड़े थे वे सबके समान दिखने में ही बड़प्पन समझते थे। मैंने अपने गाँव में ऐसे भी बड़े देखे हैं जो बिवाह आदि सुख दुःख के अवसर पर बिना बुलाए पहुँचते थे और पूरी जानकारी लेते थे कमी होने पर अपने घर से पूरा करते थे।

    मेरे नाना ख़ानदान में एक मान्यता थी की यदि कोई ईंट लगाएगा तो नास हो जायेगी। मैंने पूँछा ऐसा क्यों? बोले यदि हमने छत बना दी तो पड़ोस के घर नंगे हो जाएँगे। बहु बेटियों को तकलीफ़ होगी और छत बनाने की प्रतिस्पर्धा हो जाएगी।

    अब इन डिग्री धारी नव शिक्षतो ने परिभाषा ही बदल दी। १९७५ के बाद दूसरों से बड़ा दिखना और अधिकारियों से पुलिस से नज़दीकी रखना बड़प्पन होने लगा। ट्रैक्टर, रासायनिक उर्वरक एव कीटनाशक प्रयोग करना,कई माले का पक्का मकान,मोटर सयकिल, गाड़ी, कूलर, टी वी ,डबल बेड, बेडरूम, सोफ़ा,मट्ठा भाने की मशीन, फ्रिज, चाय, काफ़ी, बिस्कुट, शक्कर रखना और टेरिकाट पहनना, क़र्ज़ लेना( बैंक से)बड़ा पन हो गया।

    गाँव वालों ने तो यह सोच कर इन्हें बड़े बड़े शहरों में पढ़ाया था कि वापस आकर ये गाँव को सम्भालेंगे। लोगों में पुरक़ता और समृद्धि के नए सूत्र बतायेंगे। हुआ कुछ उलटा।
    वर्तमान किसान संकट का बीज वही कहीं है।

  • मनु, मन्दिर और दलित

    ज़िंदगी को देखने-समझने के नज़रिये और अपने अनुभव से गुने मायने ना चाहते हुए भी आपके व्यवहार को प्रभावित करतें ही हैं। शायद मैं अब तक भी इतनी परिपक्व नहीं हो पाई कि उन अनुभवों को किनारे रख निष्पक्ष भाव से व्यवहार कर पाऊँ। यदि जीवन उन अनुभवों के साथ जी रहें हैं तो हिम्मत या समझदारी ज़रूरी नहीं कि काम आ ही जाए। ऐसा ही एक कँपा देने वाला अनुभव मुझे उस दिन हुआ जब मनाली में टैक्सी वाले भैया ने घूमने के लिए पहली ही जगह टैक्सी रोकी……..मनु मंदिर के ठीक सामने।

    मैं टैक्सी का गेट खोल कर बाहर आई; मंदिर के नाम का बड़ा सा बोर्ड सामने था। पहले से फ़िक्स नहीं था कि घूमने कहाँ जायेंगे बस जो पहले आ जाए वहीं घूम लेंगे वाला सिस्टम था। अपने सामने मंदिर और मनु का नाम देख कर ही मैं सन्न रह गई….. ऐसे लगा मानो जैसे बर्फ सी जम गई हूँ, इतना जड़वत शायद पहले कभी महसूस नहीं किया था। मुझे इस से पहले वाक़ई नहीं पता था कि ओल्ड मनाली में मनु का मंदिर है, और मनाली नाम दरअसल मनु के सम्मान में रखा गया है। यानि मनुआलय से ही मनाली बना है। लोग कहतें हैं कि इस मंदिर में मनु के धरती पर पड़े पहले कदम की छाप है। जिस मनु के वज़ह से एक पूरा समुदाय पीढ़ियों से अमानवीय जीवन जीने के लिए अब तक भी मजबूर है, उसका मंदिर मेरी नज़रों के बिल्कुल सामने था।

    उस वक़्त एक ही पल में बहुजन समाज के लाखों लोगों के चेहरे एक साथ मेरे ज़ेहन में कौंध गए। मुझे दिखे मेरे बहुजन परिवार के लोग जो मनु और मनुवादियों की वजह से अब तक भी ना जाने कितने तरह के संघर्षों की चक्की में पीसते हुए, बद से भी बदत्तर जीवन जी रहे हैं। मैं वहीं खड़ी-खड़ी ऊपर जाती हुई सीढ़ियों और उस पर उतरते-चढ़ते लोगों को कुछ देर देखती रही। बहुत कोशिश की खुद को समझाने की, कि सीढ़ियों से कदम ऊपर बढाऊँ, देखकर आऊँ कि कैसे पूरे तंत्र के साथ दुनिया का सबसे बर्बर संस्थान ज़िंदा है। पर मैं नहीं हिम्मत कर पाई। जिस जगह पर मनु का टेम्पल हो, जिस जगह का नाम ही मनु के ऊपर हो,जहां के अधिकतर गाड़ियों और घरों पर जय बाबा मनु की लिखा हो…..वहाँ दलितों के क्या हालात होंगें अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।

    मैंने वहीं से कदम वापस लिए और बराबर से ही नीचे की ओर डाउन टाऊन जाने का रास्ता पकड़ लिया। कुछ सीढ़ियाँ उतरने के बाद ही सड़क पर मुझे बलिराम जी मिले जो जूते-चप्पल ठीक करने का काम करतें हैं बारिश की वजह से भीगे हुए परेशान हो रहे थे। मैंने रोक कर उनसें बातें की, आखिर क्या हालात हैं वहाँ मुझे उनसें बेहतर कौन बताता। मैं उनके साथ हो ली, उनकी पत्नी-बच्चों और बगल में रह रहे दूसरे भाइयों से भी बात की। पता लगा कि वहाँ दलित पुरुषों को ‘डूम’ और महिलाओं को ‘डुमनी’ कहा जाता है, आज भी वो मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, वे आज भी अछूत हैं, जातिवाद बहुत ही वीभत्स रूप में मौजूद है यहां। ये ना ही सामूहिक भोज में हिस्सा ले सकतें हैं, और ना ही इनके यहां कोई खाना खाता है, सबके खाने के बाद बचा खाना अलग से दिया जाता है उन्हें। उनके घर अलग से बसे हुए हैं पुरुष मजदूरी, पत्थर तोड़ने का काम, साफ-सफ़ाई, कचरा-पट्टी और सीवरों में काम करतें हैं, चमड़े का काम करतें हैं, महिलाएँ भी खेतों में काम करने जाती हैं, चारे और ऊन का काम करती हैं। पहाड़ के कठिन जीवन के बीच वहाँ के दलितों के जीवन की दुश्वारियाँ भी दुगनी हैं……..जब बर्फ़ पड़ने लगती है और कोई काम नहीं मिलता तो पुरूष चंडीगढ़ में काम करने चले जातें हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं पर बाकी बच्चों से अलग बैठते हैं, उनसें स्कूल में काम करने भी कहा जाता है। बहुत कुछ था उनके पास बताने और मेरे जानने के लिए पर वो सब काम करने वाले लोग थे, कितनी देर मेरे पास बैठते। मैंने और भी लोगों से बात करने की कोशिश की पर समय कम था कि कुछ और जान पाती।

    देवों की भूमि कहे जाने वाले हिमाचल में शूद्रों को प्रवेश आज भी नहीं मिलता है। 1966 में पंजाब राज्य से अलग हुए इस राज्य में स्वतंत्रता के 70 सालों के बाद भी रेडिकल हिंदू वैल्यूज फॉलो किए जातें हैं। सिक्ख साम्राज्य के समय सिक्ख दर्शन की स्थापना को लेकर डोगरा और पहाड़ी राजाओं से सिक्खों के कई युद्घ हुए। बाद में आगे चलकर जब गुरू गोविंद जी ने उन्हें एक साथ मिलकर मुगलों के विरुद्ध लड़ने को कहा तो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उनकी सेना में लोअर कास्ट के लोग भी सैनिक के रूप में सम्मिलित थे। सिक्ख साम्राज्य के रहते हुए पहाड़ी राजा टिपिकल हिंदूवाद या मनुवादी सिस्टम को लागू नहीं कर पाए थे, क्योंकि पुजारी सिक्खों से डरते थे। इसलिए जब उनका यह डर मिट गया तो उन्होंने मंदिरों के बाहर दीवारों पर लिखवाना शुरू किया-‘मंदिर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है’। इसे इस रूप में भी समझ सकतें हैं कि किसी समय में ज़रूर ही उनका प्रवेश प्रतिबन्धित नहीं रहा होगा, और वो समय सिक्ख साम्राज्य का ही था। स्वतंत्रता के बाद जब राज्य स्वायत्तता की स्थिति में आया तो हिंदूइज़्म को अपने वास्तविक रूप में लागू किया। इसलिए ही हिमाचल में दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता है। अब हिन्दूइज़्म को लागू करने वाले लोग कौन होंगे बताने की जरूरत है क्या? जहाँ कहा जाता हो कि मनु अपने जीवन चक्र में यहां सात बार मरा और सात बार ज़िंदा हुआ है, वहाँ बहुत से मनु ज़िंदा घूम रहे हैं।

    मनुस्मृति ज़िंदा रूप में देखनी हो तो देखिए हिमाचल में, तब भी मन ना भरे तो आगे बढ़ जाइए उत्तराखंड आपका इंतजार करेगा। जहाँ-जहाँ तीर्थधाम हैं वहाँ-वहाँ दलितों के लिए नारकीयता मौजूद है।

    पहाड़ सबके लिए खूबसूरत नहीं हैं, कुछ लोगों की चीखें उन पहाड़ों में ही दफ़्न रह जाती है।

  • सामाजिक यायावर के शिक्षा के प्रयोग (सन् 2004): उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील के एक गांव में एक विद्यालय

    सामाजिक यायावर के शिक्षा के प्रयोग (सन् 2004): उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील के एक गांव में एक विद्यालय

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    डा० राकेश सक्सेना “रफीक” से मेरी पहली मुलाकात आज से तकरीबन ग्यारह-बारह वर्ष पहले मेरे एक पत्रकार मित्र के घर में हुई थी। राकेश युवा-भारत से जुड़े हुए थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से डाक्टरेट राकेश सक्सेना मुरादाबाद के किसी डिग्री कालेज में अतिथि-व्याख्याता के रूप में पढ़ाते थे। एक दिन लखनऊ में राकेश मुझसे कहते हैं कि वे और उनके एक स्थानीय स्तर के नेता मित्र एक विद्यालय खोलना चाह रहे हैं जिसमें बच्चों के ‘मनुष्य’ होने पर प्राथमिकता दी जायेगी और शिक्षा के प्रयोग होगें। राकेश ने कहा कि मैं विद्यालय में शिक्षा निर्देशन का काम संभालूं, शिक्षा से संबंधित अनुप्रयोगों को करने के लिए मुझे सारे अधिकार रहेंगें, संस्थापक-मंडल का हस्तक्षेप नहीं होगा उल्टे मेरे अनुप्रयोगों में सहयोग ही दिया जाएगा। मैं राकेश को नहीं जानता था, ना ही जीवन में कभी उनका मित्र रहा था, केवल चंद औपचारिक मुलाकातें पत्रकार मित्र के यहाँ हुईं थीं। फिर भी ‘शिक्षा’ में प्रयोग के लालच में मैंने अपनी सहमति दे दी। सहमति देने के कारणों में गांवों के बच्चों के विकास के लिए काम करने से प्राप्त होने वाली आत्मिक संतुष्टि और एक अनजान क्षेत्र में अनजान लोगों के बीच जाकर उनके लिए काम करने की सार्थकता आदि भी थे।

    विद्यालय में मेरा पहुंचना/प्रथम-दिन

    जिन दिनों मुझे विद्यालय पहुँचना था, उन्हीं दिनों मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत ही गहरे आंतरिक दु:ख से गुजर रहा था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई खतम हो चुकी थी। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) व टोक्यो यूनिवर्सिटी जापान की विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था संयुक्त शोध परियोजना में शोध कार्य भी कर रहा था। माता-पिता ने मेरी सामाजिक गतिविधियों के कारण अपने दिल व पैतृक संपत्तियों से पहले ही बेदखल कर दिया था, आजतक बेदखल हूँ। कई अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव थे, नामचीन संस्थानों से पीएचडी करने के भी प्रस्ताव थे। किंतु जीवन में जो प्रताड़नाएं व असंवेदनशीलताएँ भोग चुका था, हजारों किताबों का वर्षों तक रात-दिन जो स्वाध्याय किया था, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी, जीवन को जिस सामाजिक प्रतिबद्धता व सक्रियता के लिए अनेक वर्षों में ढाला था। अजीब उहापोह में था कि जीवन की दिशा क्या चुनूं। यही वह समय था जब अपने जीवन की दिशा तय होनी थी।  

    जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने के लिए मैंने सोचा कि सबसे बेहतर रहेगा कि शरीर की जरूरतों से ऊपर उठकर, मन की भोग-लिप्सा व इच्छाओं से ऊपर उठकर, अहंकार से ऊपर उठकर निर्णय लिया जाए। इसलिए लंबा उपवास करने का निर्णय लिया। जीवन का सबसे लंबा उपवास किया, कुल अठारह दिनों का उपवास। लगातार अठारह दिनों तक नींबूं, पानी व नमक के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। नींबू व नमक भी कई दिन के बाद लेना शुरू किया था।

    स्वयं में इच्छाशक्ति संवर्धित करने व जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने में सक्षम हो पाने के लिए अठारह दिनों का नीबूं-पानी उपवास किया। इसी उपवास की समाप्ति के अगले दिन भीषण शारीरिक कमजोरी की हालत में भी मैंने भारी पिठ्ठू-बैग अपनी पीठ पर लादा और भारतीय रेल के ‘जनरल डिब्बे’ में किसी तरह ठुंसते हुए निकल पड़ा सक्रिय-यायावरी की अपनी यात्रा में। मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से पिठ्ठू बैग लादकर पैदल लगभग दो किलोमीटर दूर बस-स्टैंड, वहां से भरी हुई सरकारी खटारा बस में किसी तरह से ठुस-ठुसा कर अत्यधिक खराब हालात के सड़क-मार्ग से गंतव्य तक पहुंचा।

    बिलारी तहसील मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव की सीमा में सुनसान खेतों के बीच में एक छोटा सा विद्यालय था। छोटे-छोटे तीन कमरे, एक दो तरफ से बिना दीवारों का हरी बरसाती-पालीथीन से ढका स्थान, एक हैंडपंप, एक खुला मूत्रालय, एक शौचालय, एक ईटों का ढेर लगाकर ऊपर से ढककर बनाई गई बहुत ही छोटी रसोई और छोटा सा क्रीडा-स्थल कुल मिलाकर विद्यालय-कैंपस था। विद्यालय से सटा हुआ एक और विद्यालय था उसके अतिरिक्त दूर-दूर तक केवल खेत थे।

    शिक्षा में मेरे प्रयोग

    शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ प्रयोग

    विद्यालय की स्थापना का पहला वर्ष था। विद्यालय प्रशासन के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा० शीला डागा को और शिक्षा में अनुप्रयोगों के लिए मुझे बाहर से बुलाया गया था। हम दो लोगों को छोड़कर शेष लोग स्थानीय या आसपास के क्षेत्रों के थे। विद्यालय में प्रि-नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा तक कुल मिलाकर ग्यारह कक्षायें थीं। इन ग्यारह कक्षाओं व तीन सौ से अधिक छात्र-छात्राओं के लिए कुल नौ शिक्षक-शिक्षिकाएं थीं। इनमें भी कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं युवा भारत संगठन के स्वयंसेवक थे, जिन्होंनें जीवन में कभी कोई धरातलीय प्रयोग नहीं किए थे, शिक्षा की समझ नहीं थी फिर भी इनका मानना था कि वे बहुत ही बेहतर शिक्षाविद हैं। शिक्षक-शिक्षिकाओं की इस जमात से केवल अजयवीर ऐसा युवा था जो मेरा सहयोगी बन पाया था और हर कदम पर मेरे अनुप्रयोगों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ा रहा।

    शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए जब साक्षात्कार शुरू हुए तो मुझे मालूम पड़ा कि यहाँ शिक्षा पर अनुप्रयोग करना मतलब रेगिस्तान में पानी निकालना है। अंग्रेजी में परास्नातक को साधारण अनुवाद तो दूर की बात है छोटी-छोटी वर्तनी भी शुद्ध लिखनीं नहीं आती हो, गणित से एम.फिल को आठवीं क्लास के सवाल हल करना मुश्किल हो, भूगोल से परास्नातक को नक्शा देखना नहीं आता हो आदि-आदि। ऐसे लोगों में से विद्यालय के लिए शिक्षक-शिक्षिका छाँटना था, ऊपर से इनमें से लगभग सभी को अहंकार कि इनके इतना कोई योग्य नहीं। जो उपलब्ध थे उनमें से तुलनात्मक जो बेहतर थे, उनको लेकर विद्यालय शुरू हुआ। कुछ दिनों तक शिक्षक आते-जाते रहे। सप्ताह दो सप्ताह में ऐसे ही हिचकोले लेते हुए शिक्षा के अनुप्रयोगों के तौर-तरीकों को सुनकर और संस्थापकों के प्रयास से विद्यालय को मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, सुभाषिनी वर्मा, प्रियंका शर्मा, रेखा सक्सेना व दीपशिखा तोमर जैसी शिक्षिकाएं मिलीं। सुभाषिनी वर्मा व रेखा सक्सेना छोटे बच्चों को पढ़ातीं थीं। पाँचवीं और पाँचवी से नौंवीं कक्षा तक के स्तर के शिक्षकों की भारी कमी थी। विश्वविद्यालयी डिग्रियाँ तो परास्नातक की थीं लेकिन योग्यता नहीं थी। यूं समझिए कि यदि चंद अपवाद शिक्षकों को छोड़ दिया जाए तो उनमें पांचवीं कक्षा के सामान्य विषय पढ़ाने की भी वास्तविक योग्यता नहीं थी। जबकि कोई-कोई तो दो या तीन विषयों में परास्नातक थे एक-दो तो शायद कहीं से डाक्टरेट भी कर रहे थे। शिक्षकों का वेतन पाँच सौ रुपए महीना से एक हजार रुपया महीना तक था।

    कौन शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक रूप से ठीक से पढ़ा सकता है, यह समझने के लिए मैं लगभग रोज शिक्षकों, कक्षाओं व विषयों को यादृच्छिक रूप से फेंटता था। उनकी कक्षाओं में बच्चा की तरह बैठता था ताकि समझ सकूं कि कौन सा शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक पढ़ा सकता है।

    मैं रोज विद्यालय समाप्ति के बाद शिक्षकों को लगभग दो घंटे पढ़ाता। छात्र, शिक्षक व शिक्षा पर संवाद की चर्चायें करता। मनीषा, रुपाली, सुभाषिनी व रेखा जैसी कुछ शिक्षिकाओं को छोड़कर किसी को भी इस प्रकार की चर्चाएं पसंद नहीं थीं। मैं शिक्षक-शिक्षिकाओं को जागृत करना चाहता था, उनका बेतहरीन बच्चों  के विकास में प्रयोग करवाना चाहता था। बने बनाए दस्तूरों से हटकर जो भी मैंने करना चाहा, उस हर बात में मेरा विरोध व असहयोग हुआ। मैं हार नहीं मानता था, दृढ़ता से अपनी बात में अड़ा रहता था।  कुछ दिनों के बाद शिक्षक मेरी बात मानते थे, मेरे हर नये विचार पर बार-बार यही होता था। किसी भी नए विचार को लागू करने के पहले मैं खुद को मानसिक रूप से तैयार करता था कि दो या तीन दिन तक मुझे शिक्षकों का बहुत अधिक विरोध झेलना पड़ेगा। कभी कभी तो शिक्षक स्तीफे तक की धमकी देते थे। किंतु कभी कोई गया नहीं उल्टे समय के साथ-साथ बच्चों  के साथ प्रेम के साथ काम करने लगे थे।

    विद्यालय, कक्षाएं, छात्रगण और छात्रों से मेरे संबंध

    मेरे रहने का इंतजाम विद्यालय से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर पास के कस्बे में पतली गंदी गलियों में से चलकर मिलने वाले एक घर में किया गया था जो एक संस्थापक का पैतृक घर था। पैतृक घर होने के बावजूद घर बहुत छोटा था, दो कमरे, एक बाथरूम, एक शौचालय व एक पेड़ था। पेड़ को छोड़कर सभी का आकार बहुत छोटा-छोटा था एवम् छत की ऊंचाई बहुत ही कम थी। घर के सामने से गंदी नाली बहती थी जिसके कारण मच्छरों का भयंकर प्रकोप था। रोज सुबह जल्दी उठकर नगरपालिका की सप्लाई वाला पानी भरना, दो-चार केले खाकर लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर फिर रिक्शा करके विद्यालय पहुंचना, इसी तरह शाम को वापस लौटना। इस प्रक्रिया में रोज का दो से तीन घंटे का समय, मानसिक व शारीरिक थकावट, केलों और रिक्शा के किराए में रुपए खर्चना। 

    बच्चों व शिक्षकों को अधिक समय दे पाऊं। विद्यालय का खर्च कम से कम हो इसलिए मैंने विद्यालय में ही रहने का निर्णय लिया। जब मैंने कहा कि मैं विद्यालय में ही रुकूंगा, उस समय विद्यालय से लगभग एक किलोमीटर तक कोई घर नहीं था केवल खेत थे। मुझसे कहा गया कि रात में जंगली जानवर आते हैं, बिस्तर नहीं है आदि आदि। मैंने कहा कि यदि जंगली जानवरों के हाथों मारा जाऊंगा तो कम से कम ‘आत्महत्या के दोष’ से मुक्त रहूंगा। मैंने विद्यालय में रहना शुरु किया। मेरे साथ अजयवीर ने भी हिम्मत दिखाई। हम दोनों रात में बच्चों की बैठने वाली बेंचों को जोड़कर बिना गद्दे व बेडशीट के ही सोते थे। मच्छरों के लगातार हमलों से परेशान होकर मच्छरदानी ले आये, फिर एक बेडशीट और दो तकिया। जब तक विद्यालय में रहे ऐसे ही सोए हम दोनों लोग। फिर वीरेंद्र भी हम लोगों के साथ सोने लगे थे। वीरेंद्र भी अजयवीर की तरह परिश्रमी थे, शिक्षक के रूप में बेहतर न होते हुए भी बच्चों को खेलकूद अच्छा सिखाते थे और मेरे अनुप्रयोगों का विरोध नहीं करते थे। 

    विद्यालय में ही सोने के कारण सुबह तीन-चार बजे जगना जुगाड़ में बैठकर दूरदराज के गावों से बच्चों को विद्यालय लेकर आना संभव हो पाया। रास्ते में बच्चों से बातें करना, हसते गाते उनसे चर्चा करना, उनको समझना, उनके साथ उनके घर में हो रही घटनाओं को समझना आदि-आदि यही करता था लगभग रोज सुबेरे बच्चो के साथ जुगाड़ की कुछ घंटे की यात्रा में। अधिकतर गांवों के रास्ते मिट्टी व ईटों के खड़ंजे के होते थे। बारिश होने पर कीचड़ में जुगाड़ का फंस जाना, सारे बच्चों का नीचे उतरना, हम सब का मिलकर जुगाड़ में धक्का लगाकर कीचड़ से बाहर निकालना, फिर जुगाड़ में चढ़ना। कभी-कभी यह प्रक्रिया कई-कई बार दोहरानी पड़ जाती थी। जीवन में पहली बार जुगाड़ में यहीं बैठा था। मेरे लिए जुगाड़ की यात्रा बहुत थकावट भरी होती थी लेकिन जुगाड़ में मेरे जाने से मुझे बच्चों के साथ विद्यालय के बाहर उनकी अपनी उन्मुक्तता व सहज जीवंतता के साथ रहने को मिलता था। मेरे व बच्चों के मध्य विश्वसनीय व अपनत्व भरे रिश्ते बनते थे और बच्चे मेरे सामने उन्मुक्त होकर व्यवहार करते थे। 

    कई बच्चों को घर से निकलते ही भूख भी लगती थी तो वे जुगाड़ में ही अपना टिफिन खोलकर खाना भी खाने लगते थे। मैंने भी उनसे एक-दो कौर लेकर खाना शुरू कर दिया था। विद्यालय में भोजनावकाश होने पर मैंने बच्चों के टिफिन में से एक-दो कौर निकाल कर खाना शुरू कर दिया था। बच्चों को मेरे द्वारा उनके टिफिन से खाना खाया जाना बहुत अच्छा लगा। बच्चे मेरे लिए एक रोटी अतिरिक्त लाने लगे, इस तरह मेरे पास प्रतिदिन बहुत रोटियां हो जातीं थीं। इन्हीं रोटियों में से मैं उन बच्चों को खाना खिलाता जो किसी कारणवश टिफिन नहीं ला पाते थे। इससे दो फायदे हुए, दलितों सहित विभिन्न जाति व धर्मों के बच्चे एक दूसरे के टिफिन से खाना खाते, बच्चों से मेरे मित्रवत रिश्ते बनते। शिक्षक व शिक्षिकाएं भी बच्चों के साथ ही भोजन करेंगे ऐसा नियम बनाया, शुरू-शुरू में मेरे इस नियम का विरोध हुआ लेकिन बेहतर परिणामों को महसूस करके कुछ शिक्षिकाओं ने भी अपने घर से अतिरिक्त भोजन लाना शुरू कर दिया था और बच्चों के साथ अपना भोजन करने लगीं। शनिवार व रविवार को मुझे व डा० शीला डागा को बच्चों के अभिभावक व्यक्तिगत रूप से दूर दराज के गांवो से भोजन के आमंत्रित करते थे।

    मैंने बच्चों के साथ बिलकुल उन्हीं की तरह बच्चा बनकर उन्हीं के बनाए नियमों के तहत खेलना शुरू किया। शिक्षकों के द्वारा बच्चों  को डांटने व मारने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। धीरे-धीरे मैं छोटे शिशु से लेकर किशोर तक लगभग सभी बच्चों  का मित्र हो चुका था और इतना विश्वास प्राप्त कर चुका था कि वे मेरी बात पर अनुप्रयोग करने को तैयार हो चुके थे। विद्यालय में बच्चों व शिक्षक के मध्य का संबंध शिक्षा का मुख्य आधार होता है, यही संबंध सब कुछ तय करता है।

    बच्चों व शिक्षकों के साथ विश्वासपूर्ण संबंध बनते ही मैंने आमूलचूल परिवर्तन के लिए दस्तूरों से हटकर कुछ बड़े निर्णय लिए जैसे कि – 

    विद्यालय व कक्षा में बच्चे को अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी

    कक्षा में बच्चे अपना मनचाहा विषय पढ़ सकते थे। एक ही समय में एक ही कक्षा में बच्चे गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, चित्रकला आदि अपनी पसंद के अनुसार कोई भी विषय पढ़ सकते थे। एक शिक्षक पर्यवेक्षक की तरह कक्षा में रहता था। बच्चे को अपने विषय के लिए आवश्यकता होने पर या तो उस विषय के शिक्षक के पास जाने या यदि शिक्षक खाली है तो शिक्षक कक्षा में आता था। यदि किसी बच्चे की इच्छा कोई भी विषय पढ़ने की नहीं है तो उस बच्चे को कक्षा से बाहर जाकर खेलने कूदने की स्वतंत्रता थी। बच्चे की इच्छा होने पर वह कक्षा के में लेटकर पढ़ व सो भी सकता था। जिन कक्षाओं में यह प्रयोग मैने किया उनके बच्चों की गुणवत्ता व सीखने की क्षमता तेजी से बढ़ी। कभी-कभी कुछ विषयों जैसे कि अंग्रेजी, विज्ञान, गणित आदि के लिए कई कक्षाएं जैसे कि छठवीं, सातवीं, आठवीं व नौवीं कक्षाएं मिला दी जातीं थीं ताकि बच्चे एक दूसरे को सिखाते हुए सीख सकें और उनमें एक दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान व जिम्मेदारी के भाव विकसित हों। 

    परीक्षा प्रणाली में आमलचूल परिवर्तन

    मैंने हमेशा से महसूस किया है कि विद्यालयों में परीक्षा प्रणाली व पाठ्यक्रम का पूरा ढांचा ही गलत है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि गणित की परीक्षा है और दस प्रकार के नियम पढ़ाए गए। एक छात्र आठ प्रकार के नियमों को जानता है और दूसरा छात्र केवल दो प्रकार के नियमों को जानता है। परीक्षा में प्रश्न पत्र बनाने वाले शिक्षक ने यदि दो नियमों पर आधारित प्रश्न पत्र बना दिया तो जिसको आठ नियम आते हैं वह शून्य अंक पाएगा और जिसको केवल दो नियम आते हैं वह पूरे अंक पाएगा। ऐसी परीक्षा प्रणाली में जो बहुत योग्य है वह नाकारा साबित हो जाता है और जो कम योग्य है वह विशेषज्ञ साबित हो जाता है। 

    मैंने प्रत्येक विषय के प्रत्येक अध्याय/नियम को प्रश्न पत्र में स्थान दिलवाया। प्रत्येक नियम/अध्याय की लिखित परीक्षा करवानी शुरू की। प्रत्येक बच्चा खुद को और अपने सहपाठियों को हर नियम/अध्याय में ग्रेड देता था। मतलब यह कि बच्चा स्वयं व अपनी कक्षा के सहपाठियों का मूल्यांकन उस विषय के लिए करता। इससे बच्चों में एक दूसरे के प्रति स्वीकार्यता बढ़ी और वे एक दूसरे से/को सीखने व सिखाने लगे।

    बच्चा प्रत्येक विषय के शिक्षक की ग्रेडिंग करता था और विषय का शिक्षक बच्चे की ग्रेडिंग करता था। बच्चे व शिक्षक दोनों को ही यह मालूम पड़ता था कि वे एक दूसरे के बारे में क्या विचार रखते हैं? इस पद्धति ने बच्चे का शिक्षक और स्वयं के ऊपर विश्वास बढ़ाया। 

    यह पद्धति बच्चों को इतनी मजेदार लगी कि वे हर दूसरे दिन परीक्षा देने को तैयार रहते, कुछ बच्चे तो जिद करते कि परीक्षा आज ली जाए।

    ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवाना

    मैंने कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवा दिया था। मेरा तर्क था कि ब्लैकबोर्ड से पढ़ाई फेंककर दी जाती है, जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को लपक लेता है वह पढ़ जाता है जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को नहीं लपक पाता वह नहीं पढ़ पाता है। पढ़ाई बच्चे के हाथ में ठीक से सहेजकर पकड़ाई जानी चाहिए। शिक्षक को प्रत्येक बच्चे पर ध्यान देना होता था।  कक्षाओं में कुर्सी-मेज का प्रयोग भी बंद करवा दिया था।

    बच्चों को शिक्षक व आंतरिक प्रबंधक बनाना

    बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा के बच्चों को शिक्षक की तरह पढ़ाते थे। जिन बच्चों को जिस विषय में बेहतर जानकारी होती थी वे उस विषय को अपनी कक्षा या अपनी से ऊंची कक्षा के बच्चों को पढ़ाते थे। विद्यालय का आंतरिक प्रबंधन भी बच्चों को सौंपा गया, उनके द्वारा लिए गए निर्णय शिक्षकों को भी मानने होते थे।

    ……. आदि आदि कई अनुप्रयोग मैंने किये। 

    इन प्रयोगों के लिए मेरे मन में मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, अजयवीर व डा० शीला डागा का विशेष स्थान है। इन लोगों ने कभी मेरा विरोध नहीं किया। सदैव सहयोग दिया।  विद्यालय में दो सत्ता-केंद्रों के होने के बावजूद कभी भी एक पल के लिए महसूस नहीं हुआ कि दो सत्ता-केंद्र हैं। डा० शीला डागा ने कभी अपने अहंकार को तवज्जो नहीं दी। वे बच्चों  व शिक्षिकाओं को प्रेम करतीं थीं और उनका विकास देखना चाहतीं थीं। उनके लिए या मेरे लिए एक छोटे से विद्यालय का प्रधानाचार्य या शिक्षाधिकारी होना एक तरह से अपनी पहचान खोकर ही समाज के लिए काम करना था। हम दोनो एक दूसरे के संपूरक की तरह काम करते थे। शिक्षा के मेरे अनुप्रयोगों में डा० शीला डागा सदैव साथ खड़ी रहीं। मेरे व संस्थापकों के बीच संघर्ष होने की स्थिति में बीच में ढाल की तरह खड़ी हो जाती थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर का प्रधानाचार्या के रूप में नाम ही उनके छोटे से विद्यालय को उस क्षेत्र में पहचान देता था, इसलिए डा० शीला डागा का नाम विद्यालय से जुड़े रहना संस्थापकों के लिए ताकत थी। 

    मेरा विद्यालय को छोड़ना

    मेरी इच्छा थी कि लगभग एक साल रह कर इस विद्यालय में शैक्षिक अनुप्रयोगों को स्थापित करके जाऊं। किंतु जैसा सामान्यतयः भारत में विकृतिपूर्ण मानसिकता है कि जो काम नहीं करते हैं उनको काम करने वालों की लोकप्रियता से असुविधा होती है और अहंकार में चोट पहुंचती है। यहां भी ऐसा ही हुआ, संस्थापकों को मेरे अनुप्रयोगों की सफलता व उपलब्धियों को देखने के बावजूद मेरे अनुप्रयोगो से असुविधा होने लगी। मैं सोचता था कि जब तक बच्चे, कुछ शिक्षक-शिक्षिकाओं व डा० शीला डागा साथ दे रहे हैं, संस्थापकों के द्वारा किए जा रहे अपमानों में ध्यान दिए बिना बच्चों  के विकास के लिए प्रयोग करते जाऊं। बच्चों का ही कुछ भला होगा, इनके माता-पिता की ही कुछ सोच बदल जाये। 

    मेरी एक आदत रही है, अब भी है कि मैं सामाजिक कामों को करते समय बिलकुल खुद को भूल कर काम करने लगता हूँ और अपने मान-अपमान व प्रतिष्ठा आदि की जरा सा भी परवाह नहीं करता। तो अधिकतर होता यह है कि बहुत लोग मेरे बारे में यह सोचने लगते हैं कि मेरी कोई विवशता है। ऐसे लोगों को यह लगता है कि आखिर कोई क्यूंकर किसी अनजान जगह जाकर, अनजान लोगों के लिए इतनी मेहनत से काम करेगा। ऐसे लोग जो सिर्फ पहचान, प्रतिष्ठा व सत्ता के लिए ही सामाजिक कामों का दिखावा करते हैं को यह समझ ही नही आता कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो निःस्वार्थ भाव से दूसरों के विकास में भारी असुविधाएं व अपमान झेलकर भी भागीदार बनने में आत्म-संतुष्टि की प्राप्ति करते हैं। 

    रात में विद्यालय में बच्चों  के बैठने की बेंचों को जोड़कर सोना, बिना एक रुपया वेतन लिए विद्यालय के लिए काम करना, सुबह चार बजे जगकर लकड़ी के पटरों को जोड़कर बनाए गए जुगाड़ में बैठकर बिना सड़कों वाले गांवों में जाकर बच्चों को विद्यालय लाना, बच्चों  के टिफिनों से दो-दो कौर रोटी लेकर अपने भोजन का इंतजाम करना आदि-आदि जैसे तौर-तरीकों को देखकर संस्थापकों के अंदर मेरे प्रति आदर भाव या प्रेम भाव जगने की बजाए मेरे प्रति उपेक्षा व तिरस्कार का भाव जगा। उनको यह लगा कि मैं इसी तरह की बेगार मजदूरी के ही लायक हूं, यही मेरा स्तर है। स्थितियाँ यहाँ तक पहुंची कि एक दिन मुझे अपने आपको वहां से अलग करना पड़ा। मेरे हटने के अगले ही दिन से मेरे सारे प्रयोग बंद कर दिए गए और विद्यालय को दूसरे स्कूलों की तरह बना दिया गया। यदि कोई बच्चा कभी यह कह देता कि विवेक सर बहुत अच्छे थे तो उसको दंड दिया जाता। अगले सत्र में बच्चों  की संख्या बहुत अधिक घटी और दो-तीन साल में ही विद्यालय बंद हो गया। जबकि मेरे निकलने के बाद विद्यालय में कई कमरे बने, विद्यालय का भवन दुमंजिला हुआ, अच्छे चमकदार शौचालय बने, खेलकूद के सामान आदि भी आये।

    मेरी जिद, अनुप्रयोगों को करते हुए संवाद-प्रक्रिया व असहयोगों के बावजूद हार न मानना आदि कारण रहे होगें कि बच्चों  के साथ-साथ संवेदनशील शिक्षकों को भी बहुत कुछ सीखने समझने को मिला इसीलिए आजतक मुझे प्रेमभाव से याद करते हैं। मुझे आज भी याद आता है, उस विद्यालय में मेरा अंतिम दिन जब तीन सौ से अधिक बच्चे व शिक्षक-शिक्षिकाओं घंटो रोए थे। बच्चों  व शिक्षको के परिवारों ने मेरे साथ पारिवारिक रिश्ते बनाए। उनमें से कुछ के परिवारों का अभिन्न भाग बन चुका हूँ। इन परिवारों के कारण मुझे यूँ लगता है जैसे बिलारी मेरी अपनी ही मातृभूमि है। जब भी बिलारी अपने इन सामाजिक परिवारों से मिलने जाता हूँ तो विद्यालय के संस्थापकों से भी औपचारिक मुलाकात करने जाता हूँ पता नहीं क्यों आज भी उनका व्यवहार उपेक्षा व अपमान से युक्त दिखावटी ही रहता है। संस्थापकों की पता नहीं कैसी मानसिकता व सोच है कि आज तक एक छोटी सी बात नहीं समझ पाए कि मैंने उनको दिया ही है, उनसे कुछ लिया नहीं। मेरे अहसान उन पर हैं, उनका कोई अहसान मुझ पर नहीं। उनको मेरे प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। यह मेरी विनम्रता व उदारता है कि मैं उनसे मिलने जाता हूँ।

    जब भी मैं इस विद्यालय के संदर्भ में अपने अनुप्रयोगों के बारे में सोचता हूँ तो यह पाता हूँ कि अयोग्य शिक्षकों व न्यूनतम संसाधनों के बावजूद विद्यालय को जिस मुकाम तक लाकर मैने खड़ा किया था। यदि शिक्षा की समझ संस्थापकों के पास होती तो यह विद्यालय बंद होने की बजाए आज देश में शिक्षा के प्रतिष्ठित माडलों में से एक होता।

    चलते-चलते

    जिस इलाके में यह विद्यालय था वहां किसी छात्र द्वारा विज्ञान वर्ग से दसवीं कम अंकों से भी पास कर लेना बड़ी बात मानी जाती थी। हमारे पढ़ाए हुए बच्चों ने कुछ महीनों के इन प्रयोगों से प्राप्त अपने आत्मविश्वास व सोच के दम पर कुछ वर्षों बाद दसवीं व बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में जिले स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त की। जब कुछ महीनों का रिश्ता बच्चों में इतना आत्मविश्वास व सोच पैदा कर सकता है तो यदि बच्चों को अच्छे शिक्षक मिल जायें तो बच्चे क्या नहीं कर सकते हैं। 

    मेरा बहुत ही दृढ़ता से मानना है कि किसी समाज या देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह देश या समाज अपने बच्चों से व्यवहार कैसा करता है, अपने बच्चों को शिक्षा कैसे देता है। मेरा यह भी मानना है कि शिक्षा बिना सुविधाओं के भी संभव है किंतु केवल सुविधाओं से शिक्षा संभव नहीं है। बहुत लोग रोज मैकाले की शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हैं किंतु उनकी खुद की अपनी समझ भी मैकाले शिक्षा पद्धति की अनुकूलता से बाहर की नहीं होती। 

    इस प्रयोग की विस्तृत चर्चा मेरी किताब “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” में की गई है। आप चाहें तो किताब भी पढ़ सकते हैं। किताब यहां से प्राप्त की जा सकती है – ‘मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • मार डालो

    मार डालो
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    मुझे मार डालो मेरी मूर्खता के लिए

    मुझे मेरी जाति, मेरे धर्म, मेरे रवायत के लिए मार डालो
    मुझे मार डालो कि मैं यहीं पैदा हुआ यहीं मरूँगा
    और तुम हो घोड़ों पर आए दूधिया ईश्वरों की फ़ौज

    मुझे मार डालो कि तुम यहीं थे
    मैं आया था हांफता हुंकारता कालक्रम में देर से
    कि मेरी शहतीर पर जमा खून तुम्हारा है

    मुझे मार डालो कि अल्लाह है निगेहबां
    उस दुनिया में बाकियों के लिए जगह नहीं

    मुझे मेरी बौद्धिकता के लिए मार डालो

    मुझे मार डालो कि मेरी भूख इतनी बढ़ गई है
    कि किसी अगले क्षण तुम्हारा दूध का कटोरा झटकने
    मैं तुम्हें मार दूंगा

    मुझे मार डालो कि तुम सोचते हो मेरे साम्राज्य की ईंटें
    तुम्हारी अस्थियों पर खड़ी हैं
    कि मानते हो इस प्रासाद का रंग है तुम्हारे खून का रंग

    मुझे मार डालो इसलिए भी कि मैं तुम्हें मारता रहा हूँ
    साल पीढ़ी सदी तक
    इसलिए भी कि अनुमान है तुम्हें कि यह वक़्त तुम्हारा है

    मुझे मार डालो मेरे अलग लिंग के लिए
    इसलिए कि हमारे अंग एक प्राकृतिक खांचे में अब फिट नहीं बैठते
    कि मुझे अब ज्यादा चाहिए

    मुझे मार डालो एक तर्क पर कि सारे तर्क तुम्हारे हैं
    तंत्र तुम्हारा है कि
    अतार्किक तरीके से मार डालो मुझे
    मुझे मार डालो कि तुम्हें नहीं है इस तंत्र पर यकीन

    सब सबको मार डालो.

  • चाय या दोस्ती की मिठास

    ख़त्म हो चुके चाय के कप के
    तलों में बची कुछ बूँद चाय
    अब ऐसी ही मित्रता है
    कुछ बेहतरीन शख्सियतों की
    ‘मेरे लिए’
    कभी ये दोस्ती की चाय का कप
    था लबालब,
    गर्मजोशी ऐसी, जैसे भाप उगलता कप
    हर पल सुगंध ऐसे जैसे
    चाय के साथ इलायची की अलबेली सुगन्ध
    मित्रता में रिश्ते का छौंक व
    जिंदादिली से भरपूर मिठास
    हर सिप को जिया है !!
    खैर ! कप के चाय की अंतिम बून्द
    शायद सूख चुकी या सूखने वाली है
    पंखा भी तो पांच पर चल रहा !
    फिर भी
    दोस्ती जिंदाबाद के नारे के साथ
    ऐसे लिखते हुए भी
    उम्मीद कर रहा है
    फिर से एक और चाय का कप ।
    मौसम की आद्रता बचाये रखेगी
    चाय या दोस्ती की मिठास
    समझे न !
    उम्मीद ही अहमियत है ! https://karensingermd.com

  • जातीय दंश, रंगभेद, लिंगभेद और हमारा दोगलापन

    वैसे तो लड़कियों के इनबॉक्स में रोज़ तमाम तरह के मैसेज आतें हैं, पर बीते दिनों कुछ लड़कियों के जो मैसेज आए उन्होनें मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया। पहाड़ों पर घुमक्कड़ी की कई फ़ोटो के अपलोड के दौरान बहुत से कॉमेंट और मैसेज मिले, लेकिन मेरी लड़की दोस्तों ने जो लिखा वो लगभग कई बहुजन लड़कियों के अतीत-वर्तमान और रोज़मर्रा से जुड़ी प्रेक्टिसेस, उनके सपनों की ऊंचाइयों, समाज की खाइयों, गढ़ रहे व्यक्तित्व, बनते-बिगड़ते विश्वास-आत्मविश्वास की बात है।

    एक लड़की ने लिखा है कि मैं आपकी ही तरह साँवली हूँ, बचपन से लेकर आज तक भी हमेशा सबने इग्नोर ही किया, मेरे साँवले रंग के पीछे मेरी तमाम योग्यतायें फीकी ही मानी जाती रही है, मैं खुद भी सबकी सुन-सुन कर इतनी दब्बू हो गई हूँ कि मान ही लिया है कि मैं सुंदर नहीं हूं इसलिए ही फ़ेसबुक पर भी कभी अपनी फ़ोटो लगाने की हिम्मत नहीं कर पाई। पर आपको देखकर एक नया हौसला मिला है, आप साँवले होते हुए भी कितना स्मार्टली-बोल्डली ख़ुद को कैरी करती हैं, आपके कॉन्फिडेंस की क़ायल हूँ मैं। आपको देखकर एक नया आत्मविश्वास मिला कि खूबसूरती गोरी चमड़ी की मोहताज़ नहीं। अब मैं भी अपने काले रंग को लेकर हीन नहीं महसूस करूँगी।

    दूसरा मैसेज एक और लड़की ने किया है कि दीदी मेरा रंग भी आपकी तरह काला है, हम तीन बहनें हैं और सभी का रंग साँवला ही है। काले रंग वज़ह से हर जगह लोग नाक-मुँह सिकोड़ते हैं। और दलित हूँ लोग रंग देखकर ही अंदाजा लगा लेते हैं। मेरी दीदी की शादी में बहुत मुश्किल आ रही है, सिर्फ़ रंग की वज़ह से बहुत दहेज़ मांग रहें हैं लड़के वाले जबकि मेरी दीदी गवर्मेंट जॉब में है। मैं जानती हूँ मेरे और मेरी छोटी बहन के साथ भी यही होगा। पर मैं ऐसे नहीं चाहती, मुझे मंजूर नहीं कि लोग मुझे मेरे रंग से नापें। आपको फ़ेसबुक पर बहुत दिनों से पढ़ रही हूँ, आपसे हिम्मत मिलती है, आपमें बहुत कॉन्फिडेंस है, मैं भी ऐसे ही बनना चाहती हूँ।

    अगला मैसेज है जो मराठी में है,जिसका हिन्दी अनुवाद लिख रही हूँ। मैम आप बहुत अच्छा लिखती हो, मेरे पापा को मैंने ही बताया था कि अपने समाज की ही है यह लड़की। पापा स्मार्ट फोन नहीं चला पाते हैं पर हमेशा आप जो भी लिखती हो, मुझसे पढ़वाते हैं। मैंने आपके मनाली टूर की फ़ोटो भी दिखाई है घर में सभी को। आपकी वजह से मुझे भी कॉलेज से जा रहे ट्रिप पर माथेरान जाने की परमिशन मिल गई है। इसलिए आपको बड़ा वाला थेंक्स। आपसे ज़िंदगी जीना सीख रही हूं।

    एक और मैसेज मिला जो एक शादीशुदा लड़की का है, जो लिखती है कि मेरा सपना था कि पूरी दुनिया देखूँ, घूमना चाहती थी, पढ़ना चाहती थी पर बारहवीं के तुरंत बाद घरवालों के दबाव में शादी करनी पड़ी, मैं अपने सपने जी ही नहीं पाई, अब बस हॉउस वाइफ हूँ घर, बच्चे और पति बस। काश! कि पैसे होते तो मैं भी आपकी तरह पढ़ पाती, नौकरी करती और पूरी दुनिया घूम पाती। आपको इस तरह घूमते देख रही हूँ तो ऐसे लग रहा है कि हम साथ-साथ घूम रहें हैं। आप पूरी दुनिया घूमना, आपके पीछे-पीछे ही सही मेरे सपने भी पूरे हो जाएंगे।

    ये मैसेज चार अलग-अलग लड़कियों के थे, नाम डिस्क्लोज नहीं कर रही हूँ। ये सभी बहुजन लड़कियाँ ही हैं, ये चार मैसेज चार परिस्थितियों को आपके सामने रखतें हैं। इनबॉक्स में जवाब तो दे चुकी हूँ पर पोस्ट लिखा आप सभी के लिए। काला होना क्या होता है? दलित होना क्या होता है? लड़की होना क्या होता है? और इन सब बातों का एक साथ होने के क्या मायने हैं जानती हूं मैं। बचपन से लेकर अब तक भी भुगता और भुगत रही हूँ बहुत कुछ। इस दुनिया का सबसे वर्स्ट कॉम्बिनेशन है काली दलित लड़की होना। मैंने बचपन से ना केवल जातिवाद का दंश झेला है बल्कि अपने काले रंग के साथ लगातार रंग भेद भी झेल ही रही हूँ। बचपन से ही हमारे आसपास के लोग काले रंग को लेकर इतना हीन महसूस करा देतें हैं कि हम खुद को बदसूरत मान ही लेते हैं। मेरे साथ भी यही मामला था। लोग मेरा रंग देख कर बड़ी आसानी से मुझे नीच जात की हूँ “रंग से जाति पता लगाओ प्रतियोगिता” से जान लेते थे। बचपन में नवरात्रों में कन्या भोजन में खीर-पुड़ियाँ खिलाने के लिए लोग बुलाते तो रंग देखकर ही; मैं और मेरी जैसी काली लड़कियाँ पहले ही बाहर रोक दी जाती। रंग से नीच जात पहचानना बड़ा आसान सा फंडा है हमारे सो कॉल्ड महान देश में। फिर बाहर ही दोना-पत्तल में खीर-पूड़ी मिलती जो उस वक़्त घोर ग़रीबी में मेरे लिये बहुत बड़ी बात थी, फ़िर भले ही वो दो हाथ दूर से फेंक कर दी जाती रही हो। खैर जो दलित लड़कियाँ गोरी होती हैं, उनके साथ भी बड़ा बुरा व्यवहार होता है। लोग उनकी जात गोरे रंग की वजह से पहचान नहीं पाते हैं और फिर गोरी दलित लड़कियों को बोलते हैं कि जरूर उनकी माँ किसी सवर्ण के साथ सोई होगी। पर मैं तो काली हूँ इसलिए सीधे-सीधे पहचानी जाती रही हूँ।

    बचपन में मैं भी पहनना चाहती थी चटख लाल रंग की फ़्रॉक और बनना चाहती थी लालपरी। बहुत मन होता था कि काश! डार्क नीले रंग के कपड़े पहन पाऊं पर मम्मी-पापा मार-पीट कर वही सफ़ेद, हल्का ग़ुलाबी, हल्का पीला रंग घुमा-फिराकर दिला देते थे। कॉलेज आने तक भी मुझमें कॉन्फिडेंस नहीं था कि डार्क या पसंद के रंग पहन पाऊं। क्योंकि तब तक काले रंग, नीच जात की लड़की होने से जुड़े तमाम भेदभाव को मैं नीचे सिर झुका कर स्वीकार की हुई थी।स्कूल-कॉलेज में यही एक मात्र यूएसपी थी कि पढ़ने में अच्छी थी और सरकारी स्कूल में अंधों में काना राजा टाइप हालात थे। चाहते हुए भी कभी स्कूल में मैडम ने किसी डाँस या नाटक में भाग नहीं लेने दिया क्योंकि उसमें सुंदर मतलब गोरी लड़कियां ही चलती थी। मैं कभी स्कूल में नाच ही नहीं पाई और ना ही कभी मुख्य अतिथियों का स्वागत करने मिला काले होने की वजह से।

    बहुत छोटे से गाँव से दिल्ली तक के सफ़र में वो तमाम दिक़्क़तों से लड़ा है, अपने-परायों से जूझा है इस कॉन्फिडेंस तक आने में। पूरे समय खुद को छुपाती-बचाती नज़रें नीची रखी हुई हीनभावना से ग्रस्त दब्बू दीपाली से आज की दीपाली का सफ़र में बहुत कुछ झेल कर संघर्ष करके सीखा, बुना, गुना, पचाया और तचाया है। ये सब बातें इसलिए लिख रही हूँ दोस्तों क्योंकि ये सब तमाम लड़कियों/लड़कों के संघर्ष हैं अपनी-अपनी तरह के। बहुजनों के लिए समाज में ऐसी परिस्थियां या प्रिविलेज नहीं हैं कि उन्हें ज़िंदगी की ज़मीन उर्वर मिले। और मैं कोई विशेष नहीं हूँ हाँ ख़ुद को बेहतर इंसान बनाने की कोशिश लगातार कर रही हूँ।

    रंग भेद के साथ जातिभेद का डबल टॉर्चर और लिंगभेद की वर्स्टनेस के साथ उनसे जुड़ी तमाम मुश्किलों से लड़कर आज वाला आत्मविश्वास ला पाई हूँ। बाबासाहेब का शुक्रिया कहने के लिए शब्द नहीं बचते मेरे पास कि कुछ भी कह पाऊँ। अगर पढ़-लिख नहीं पाती तो शायद ये दीपाली भी नहीं होती। तो मेरे सभी बहुजन दोस्तों ख़ूब पढ़िए, लड़िए हम लोगों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और पाने के लिए पूरी दुनिया है।

  • जाति विनाश कैसे हो? –Sanjay Jothe

    जाति विनाश कैसे हो? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जाति विनाश अगर सवर्णों से अपेक्षित है तो ये व्यर्थ का प्रोजेक्ट है. लेकिन जाति विनाश दलितों पिछड़ों से अपेक्षित है तो इस प्रोजेक्ट से बहुत उम्मीद की जा सकती है.

    जाति विनाश कैसे होगा इसकी विस्तार से चर्चा करने से पहले दो वक्तव्य याद रखिये. महान आयरिश लेखक, विचारक और नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ से एक बार किसी ने पूछा था कि नेता कौन होता है? शॉ ने मजाकिया अंदाज में चुटकी लेते हुए बताया कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही हो उसी दिशा में झंडा उठाकर सबसे आगे हो लेने वाला ही नेता होता है.” दूसरा वक्तव्य डॉ. अंबेडकर का है जब वे अपनी प्रसिद्ध किताब “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के दुसरे संस्करण की भूमिका लिख रहे थे. उन्होंने लिखा “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इन दो वक्तव्यों में जाहिर तौर पर उपर उपर कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन आगे के विस्तार में जाकर हम देखेंगे कि ये ‘अलग अलग’ वक्तव्य जाति उन्मूलन के मुद्दे पर बहुत दूर से एकदूसरे से कैसे जुड़ते हैं.  

    जाति विनाश या जाति का उन्मूलन सदा से भारतीय शूद्रों (ओबीसी) दलितों (अनुसूचित जातियों) दमितों (स्त्रीयों) का सपना रहा है. इसे लेकर जितना चिंतन मंथन और काम हुआ है उसकी बड़ी असफलता को साफ़ –साफ़ देखा जा सकता है. एक सामाजिक, राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में इस मुद्दे पर जितना काम हुआ है उससे अपेक्षित परिणाम नहीं आये हैं बल्कि इस काम ने इन जातियों और समुदायों को पहचान या शिनाख्त की राजनीति (आइडेंटिटी पोलिटिक्स) की अंतहीन अँधेरी सुरंग में धकेल दिया है. इस अँधेरी सुरंग में ये ही पता नहीं चलता कि आपके नाम से आपके हक में नारे लगाने वाले राजनेताओं के हाथ में आपके लिए फूल हैं या खंजर है. इस अँधेरी राजनीति में सिर्फ शोर और नारे सुनकर जो लोग शामिल हुए हैं उनके चेहरों पर निराशा और पराजय का भाव साफ़ नजर आता है. पहले जो लोग हाथों में फूल लेकर आपके साथ नारे लगा रहे थे उनके सभी फूल अब कमल के फूल बन गये हैं. सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा और उनकी सरकारों की गुलामी करने में इन दलित आदिवासी या अल्पसंख्यक ‘क्रांतिकारियों’ को किसी तरह लज्जा का अनुभव नहीं हो रहा है. आज जब देश में दलितों आदिवासियों मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे हैं तब दलित और आदिवासी नेताओं, अधिकारियों की चुप्पी बहुत भयानक सच्चाई को उजागर करती है. ये चुप्पी सिर्फ दलित नेताओं, झंडाबरदारों और प्रशानिक अधिकारियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि शूद्र (ओबीसी), दलित आदिवासी तबकों से आने वाले बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी इस स्थिति के सामने मौन और दुविधाग्रस्त होकर खड़ा है.

    जाति नाश या जाति उन्मूलन की मूल भावना और लक्ष्य को अगर ठीक से देखा जाए तो आप पायेंगे कि एक अच्छे उद्देश्य से जो काम शुरू किया गया उसकी दिशा और उसकी कार्यपद्धति बहुत हद तक गलत रही है. ये वक्तव्य जाति उन्मूलन के अभी तक के देशव्यापी प्रयासों पर एक साझी टिप्पणी के रूप में समझा जा सकता है. इस वक्तव्य के कई पहलू हैं और ये वक्तव्य कई बिन्दुओं पर आधारित है.

    हम शुरुआत करते हैं डॉ. अंबेडकर के जाति उन्मूलन के आह्वान से. उनका प्रसिद्ध भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” जो कि असल में सवर्णों को उनके धर्म की बुराई के बारे में जागरूक करते हुए लिखा गया था उसमे जाति व्यवस्था का और उसकी अनैतिकता और दरिन्दगी का विश्लेषण किया गया है. लेकिन इसमें बहुत स्पष्ट शब्दों में जाति उन्मूलन का कोई प्रेक्टिकल रोडमेप नहीं दिया गया है. हालाँकि वो भाषण हो भी नहीं पाया और हमें तत्कालीन सवर्ण हिन्दू मानस की प्रतिक्रिया भी इस पर नहीं मिल पायी. बाद में ये भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के नाम से एक किताब के रूप में प्रकाशित हुआ. इस किताब का उद्देश्य सवर्ण हिन्दुओं को उनकी जाति व्यवस्था के प्रति जागरूक करना था ताकि वे अपनी बीमारी को पहचान सकें. इस किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में भी डॉ. अंबेडकर ने  इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. उसके बाद डॉ. अंबेडकर जाति उन्मूलन के अन्य संभव सामाजिक, राजनीतिक शैक्षणिक और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन संबंधी आयामों में भी प्रयोग और प्रवेश करते हैं. लेकिन इस सबका परिणाम क्या हुआ?

    यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि इसका परिणाम नहीं हुआ है. वास्तव में इसका बहुत कुछ परिणाम हुआ है. दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन गौर से देखा जाए तो जाति उन्मूलन नहीं हुआ है. दलितों दमितों की आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति में सुधार अवश्य हुआ है लेकिन व्यापक रूप से देखें तो भारत की सामाजिक या धार्मिक जमीन पर उनके लिए स्थिति बिलकुल भी नहीं बदली है. इसका सीधा अर्थ ये है कि ऊपर-ऊपर कास्मेटिक बदलाव हुए हैं लेकिन गहराई में जाति का विभाजन – जाति अंतर्गत विवाह और भोजन की विवशता के रूप में – अभी भी वहीँ का वहीं बना हुआ है. इसको और सरल शब्दों में कहें तो जाति के आधार पर विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध अभी भी बना हुआ है जो बताता है कि जाति अभी भी पूरी तरह बनी हुई है. फिर इस केन्द्रीय तथ्य के बाकी सारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सभ्यतागत परिणाम हैं जो हम सब रोज अखबारों में पढ़ते हैं. अखबार की ये खबरें बीमारी को दिखाती हैं लेकिन बीमारी के असल कारण – जाति और वर्ण के भेद की निरन्तरता को नहीं दिखाती है.

    दो घटनाओं को उदाहरण की तरह लीजिये. पहला उदाहरण ये कि अभी किसानों की आत्महत्याओं से हम सब दुखी और चिंतित हैं. शायद भारत ने दुनिया में अनोखा वर्ल्ड रिकार्ड बनाया है जिसमे किसानों ने युद्ध या गृहयुद्ध या आर्थिक मंदी के न होने की दशा में भी इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्याएं की हैं. इसका कुछ संबंध जाति और वर्ण की बहस से भी अवश्य जुड़ता है. जिस वर्ण या जाति के लोग किसान हैं या भूमिहीन मजदूर हैं उन जातियों वर्णों के लोगों का राजनीति और व्यापार जगत में ‘सक्रिय’ प्रतिनिधित्व कितना है? स्थानीय व्यापारियों के जगत में किस जाति या वर्ण का कब्जा है? मंडियों में अनाज के व्यापार पर और सब्जियों के बाजार में सदियों से किन जातियों और वर्ण का कब्जा है? बीज, खाद, कीटनाशकों की दुकानों और बैंकों तक में किन जातियों और वर्णों का वर्चस्व है? फिर इन सबको नियंत्रित करने वाली शासन-प्रशासन या कानून की व्यवस्था की बागडोर किन जातियों और वर्णों के हाथ में है? इस सबके बाद अब ये देखिये कि किसानों मजदूरों की जातियों के सक्रिय प्रतिनिधि ऊपर वाले स्तरों पर कितने हैं? सरल शब्दों में कहें तो बात ये है कि किसान या मजदूर के मरने पर शेष ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के मरने” जैसा दुःख होता है क्या? किसान या मजदूर के कमजोर और अशिक्षित रह जाने पर ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के पिछड़ जाने” जैसा दुख होता है क्या? इसका उत्तर है – नहीं. उन्हें इस तरह का कोई दुःख नहीं होता. उन्हें इन आत्महत्याओं से या इस पिछड़ेपन से न तो व्यक्तिगत दुःख होता है न ही उनकी राजनीति, अर्थसत्ता या सामाजिक सत्ता पर कोई खतरा नजर आता है इसीलिये वे इसे नजरअंदाज करके बड़ी आसानी से सदियों सदियों जहां के तहां बने रहते हैं.

    दूसरा उदाहरण देखिये. सवर्ण हिन्दुओं को जब महसूस हुआ कि राम मन्दिर मुद्दे को वे अपनी राजनीतिक सत्ता मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं तो उन्होंने देश भर में इसके लिए आन्दोलन छेड़ दिया. मन्दिर मस्जिद के होने या न होने से किसी गरीब हिन्दू या मुसलमान का कोई भला नहीं होता लेकिन चूँकि स्वर्ण हिन्दू राजनीति को इसकी जरूरत थी इसलिए उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द्र को नुक्सान पहुंचाते हुए भी ये काम किया. वे ऐसा कर सके क्योंकि समाज, व्यापार, शासन, प्रशासन, धर्म संस्कृति और मीडिया के हर स्तर पर उनके लोगों का दबदबा है. उनका अपना नेटवर्क और प्रेशर ग्रुप है जो देश और देश की गरीब जनता से ज्यादा अपने जातीय और वर्णगत नेटवर्क के प्रति अधिक वफादार है.

    इसका सीधा अर्थ ये हुआ कि भारत की राजनीति और सामाजिक प्रक्रियाएं सवर्णों के आपसी सामाजिक संबंधों और समीकरणों से चलती हैं. उन प्रक्रियाओं में दलितों पिछड़ों के समाजों में उभर रहे सुख दुःख का कोई असर शामिल नहीं है. सवर्ण हिन्दू अपने लिए मंदिर बनवाने के लिये देश भर में आन्दोलन कर देंगे लेकिन किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर गरीब असहाय मजदूरों और किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के मुद्दे पर कुछ नहीं करेंगे. इससे ये सीख मिलती है कि अगर दलितों शूद्रों के आपसी जातीय समीकरण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से एकदूसरे के निकट आकर एक हो जाएँ तो आप इस सवर्ण राजनीति या समाज को अपने अनुसार बदल सकते हैं. याद रखिये, दलित पिछड़ों के समाज में समाज के अलग अलग स्तरों में अगर आपसी मेलजोल नहीं है तो दलितों पिछड़ों की राजनीति इसी तरह बिकती रहेगी आपके दलित नेता सवर्णों की गोदी में बैठकर ऐसे ही पुरस्कार पाते रहेंगे.

    कल्पना कीजिये कि भारत में शासन-प्रशासन में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व रखने वाली जातियों के बच्चों में कोई बीमारी फैलती है और उनके जीवन पर संकट आता है. तब ये प्रतिनिधि क्या करेंगे? क्या ये अपने बच्चों को भी दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों के बच्चों की तरह उपेक्षा से देखेंगे? या फिर ये अपने शासन प्रशासन की शक्ति और पहुँच का इस्तेमाल अपने बच्चों की बेहतरी और सेहत के लिए करेंगे? इसका जवाब आसान है. ये लोग पूरी ताकत लगाकर अपने बच्चों की सेहत और खुशहाली के लिए शासन प्रशासन से ऐसी नीतियाँ बनवायेंगे जो उनके हित में हों. उसे लागू करवाने का भी इन्तेजाम करेंगे. ऐसा कारनामा हमारे सांसद और विधायक अपनी अपनी तनख्वाह बढवाने के लिए कई बार कर चुके हैं.

    इस काल्पनिक उदाहरण के बाद वास्तविकता में भारत की गरीब जातियों के बारे में सोचिये. उनके बारे में सोचने वाले और वास्तव में मुंह खोलने वाले इस राजनीति, शासन-प्रशासन में कितने हैं? और इससे भी बड़ी बात ये कि क्या इन लोगों को पता है कि वे अपने बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं और भारत से जाति को खत्म करके न सिर्फ अपने लोगों को बल्कि स्वयं भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी को सबल बना सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर है – नहीं. सरल शब्दों में कहें तो भारत की पिछड़ी जातियों को उनके प्रतिनिधियों और सक्षम लोगों को बहुत हद तक ये साफ़ साफ़ पता ही नहीं है कि वे अपने लोगों की और भारत की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या (जो कि दलित और शूद्र/ओबीसी/आदिवासी/अल्पसंख्यक है ) की जिन्दगी को निर्णायक रूप से सुधारने के लिए क्या कर सकते हैं या उन्हें क्या करना चाहिए.

    इस सवाल को दुसरे कोण से देखिये. क्या भारत के इन बहुसंख्य लोगों के कमजोर या बीमार होने से सवर्ण जातियों के सामाजिक सम्मान या राजनीतिक आर्थिक रुतबे में कोई खतरा पैदा होता है? इसका जवाब ये है कि भारत के बहुसंख्यक लोगों के कमजोर होने से उन सवर्णों को नुक्सान नहीं बल्कि फायदा होता है. तब वे अपनी राजनीति अपने धर्म और अपनी संस्कृति को, अपने भोजन या कपडे की पसंद को आपके ऊपर थोप सकते हैं. अभी आंख खोलकर देखिये, भारत में ये ही खेल चल रहा है. तब आप क्यों और कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ये जातियां और वर्ण दलितों शूद्रों और आदिवासियों लिए बेहतर नीतियों या बेहतर राजनीति के निर्माण के लिए मेहनत करेंगी? और आप इनसे ये उम्मीद करते हैं तो आप स्वयं क्या करेंगे? क्या बैठकर इंतज़ार करेंगे? कब तक इन्तेजार करेंगे?

    इस बात को गहराई से समझिये, राजनीति या प्रशासन में कुछ अच्छा करने की सदिच्छा के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह राजनीतिक संकल्प (पोलिटिकल विल) का विषय है. और राजनीतिक संकल्प असल में सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक लाबिंग का खेल है. हो सकता है कि सवर्ण जातियों में बहुत से संवेदनशील राजनेता, प्रशासक चिन्तक, लेखक कार्यकर्ता या सामान्य नागरिक हों. मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ ऐसे बहुत लोग हैं. और ये भी सच है कि दलितों पिछड़ों के हक की आवाज उठाने के लिए हजारों लाखों सवर्ण हिन्दूओ और ब्राह्मणों भी बहुत ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, पहले भी उन्होंने भारत को सभ्य बनाने के लिए और जाति सहित अस्पृश्यता आदि के उन्मूलन के लिए बहुत कुछ किया है. लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते तो इसका इमानदार विश्लेषण करना होगा.

    ऊपर के इस विस्तार में जाने के बाद आप देखेंगे कि जाति नाश आरंभ से एक ऐसा प्रयास रहा है जिसमे जाति व्यवस्था से पीड़ित लोगों की बजाय जाति व्यवस्था से फायदा उठाने वालों पर अधिक ध्यान दिया गया है. एक अर्थ में ये जरुरी भी था. दलितों पिछड़ों को ये बताना जरुरी था कि तुम्हारी दुर्दशा के लिए तुम नहीं बल्कि ये सामाजिक धार्मिक व्यवस्था जिम्मेदार है, ताकि वे हीन भावना से निकलकर कुछ करने को सक्षम हो सकें. साथ ही हिन्दुओं को उनके शास्त्रों और धर्म में छुपे कैंसर के बारे में भी बताना जरुरी था ताकि वे दुनिया की अन्य सभ्यताओं और धर्मों से अपनी तुलना कर सकें. ये काम न्यूटन या गेलिलियो के काम जैसा है. कबीर रैदास फूले अंबेडकर पेरियार आदि ने ये काम पूरी उंचाई तक ले जाकर मुकम्मल कर दिया है. एक तरह से उन्होंने न्यूटन की तरह गुरुत्वाकर्ष्ण सिद्धांत खोजकर दे दिया है. अब हमे आइन्स्टीन या स्टीफेन हाकिंग की तरह आगे बढना है. आज भी हम अंबेडकर फूले पेरियार की तरह सिर्फ सवर्णों को संबोधित करते रहेंगे तो इसका मतलब है कि हम हर पीढी में न्यूटन की तरह ग्रेविटी की खोज करते रहेंगे. फिर हम ग्रेविटी के ज्ञान पर आधारित राकेट यान कब बनायेंगे? तब हम मार्टिन लूथर की तरह समाज और संस्कृति में पुनर्जागरण कब लायेंगे?

    जाति व्यवस्था के लिए सवर्णों को संबोधित करने की बात हमारे लेखन, साहित्य, राजनीतिक सामाजिक बहस में और दस्तावेजों में डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण – एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट – से ही चली आ रही है. डॉ. अंबेडकर ने सवर्णों की सभा के लिए ही इसे लिखा था और इस भाषण के पहले और बाद में भी अपने लोगों के लिए सवर्णों की सदिच्छा पर निर्भर न रहते हुए भी स्वयं की शक्ति में भरोसा रखते हुए कई महत्वपूर्ण काम किये हैं, लेकिन जाति विनाश के विमर्श और आन्दोलन के केंद्र में जाति से पीड़ित जातियों की बजाय लाभ पाने वाली जातियों को रखने की प्रवृत्ति अभी भी कम नहीं हुई है. इसका सरल भाषा में मतलब ये हुआ कि आज भी दलित पिछड़ों के बीच में आपसे बातचीत होती है तो सवर्ण द्विज हिन्दुओं की भूमिका पर अधिक चर्चा होती है स्वयं दलित पिछड़े अपने बीच जाति भेद कैसे गिरा सकते हैं इस बात पर बहुत कम चर्चा होती है.

    दलितों पिछड़ों को समझना चाहिए कि समाज, राजनीती और शासन प्रशासन सहित व्यापार रोजगार आदि भी असल में सामाजिक आर्थिक संबंधों और राजनीतिक नेटवर्किंग या लॉबिंग से चलते हैं. ऊपर बताये उदाहरण में अगर सवर्ण प्रतिनिधि अपने बच्चों के इलाज के लिए या अपनी तनख्वाह बढाने के लिए शासन प्रशासन को मजबूर कर सकते हैं तो आपको भी यह सोचना है कि आप स्थानीय व्यापार, सामाजिक आर्थिक समीकरण, स्थानीय राजनीति, स्थानीय बाजार, स्थानीय या क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक या वैचारिक बहस को अपनी जातियों और वर्ण की एकता से कैसे प्रभावित कर सकते हैं? ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है जो राजनीति से ज्यादा समाज की रोजमर्रा जिन्दगी पर लागू होता है. इस प्रश्न का जो उत्तर है उसके दो पहलु हैं:

    1. पहला ये कि राजनीतिक या सामाजिक बदलाव लाबिंग या सामाजिक नेटवर्क के आपके हित में सक्रीय होने से होता है. ऐसा नेटवर्क बनाना और उसे आपके हित में सक्रीय करना आपकी यानि दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी है. अगर इसके लिए आप सवर्ण द्विज हिन्दुओं का मुंह देखते हैं तो आप कार्यवाही और सोच विचार की कमान उनके हाथों में दे देते हैं फिर वे जैसे चाहें आपको घुमाते रहेंगे.

    2. दूसरा ये कि अगर आप राजनीतिक सामाजिक नेटवर्क बनाने और सक्रिय करने में अपनी ही जातियों और वर्ण के लोगो को केंद्र में रखें सिर्फ उनसे ही उम्मीद करें और आपस में अपनी जातियों को पहले खत्म कर सकें तो जाति उन्मूलन के विमर्श और उसपर कार्यवाही की कमान आपके हाथ में होगी. तब स्वर्ण द्विज हिन्दू चाहकर भी आपको भटका नहीं सकेंगे. और तब वे आपके राजनीतिक नेतृत्व को खरीद भी नहीं पायेंगे.

    अब मुद्दा ये है कि समाज और राजनीति में दलित पिछड़े अपना नेटवर्क और अपनी लाबी को कैसे मजबूत करेंगे?

    इसके उत्तर के लिए हमें डॉ. अंबेडकर के वक्तव्य को ठीक से समझना पड़ेगा. जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है डॉ. अंबेडकर ने “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इस वक्तव्य पर गौर कीजिये. यहाँ सवर्ण हिन्दुओं से उम्मीद की जा रही है कि वे जाति व्यवस्था के जहर को समझें और ये भी समझें कि उनकी ये बीमारी शेष भारत के लिए क्यों खतरनाक है. बाद के दौर में हम देख पाते हैं कि सवर्ण हिन्दुओं को अपनी इस बीमारी की वजह से शेष भारत के नुकसान की कोई चिंता नहीं है. इसके विपरीत उन्हें इस बीमारी को बढाते जाने की चिंता अधिक है. अगर आप भारत में सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक संगठनों और प्रचलित बाबाओं कथाकारों और गुरुओं के कामों का विश्लेषण करें तो वे जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं बल्कि जिस पलायनवादी और पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से जाति व्यवस्था को ताकत मिलती है, उसी अध्यात्म का पाठ पढाये जा रहे हैं. सवर्ण सांस्कृतिक संगठन हिंदुत्व की विभाजक राजनीति कर रहे हैं और दलितों शूद्रों मुसलमानों के शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास, स्वास्थय सुविधाओं सहित सामाजिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संभावना को कमजोर बना रहे हैं, घोषित रूप से जाति आधारित आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं और इससे भी आगे बढ़कर वे आरक्षण के मुद्दे पर दलितों शूद्रों आदिवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं.

    इन बातों का मतलब ये हुआ कि सवर्ण द्विज हिन्दू अभी भी जाति को अपनी बीमारी के रूप में या देश के लिए खतरे के रूप में नहीं देख पा रहे हैं या इस तरह देखना नहीं चाहते हैं. इसका कारण भी साफ़ है कि चूँकि उन्हें इस बीमारी को बनाये रखने से फायदा होता है इसलिए वे अपनी तरफ से इसे खत्म करने का कोई काम नहीं करेंगे. इसका साफ़ मतलब ये है कि डॉ. अंबेडकर हिन्दुओं को नहीं समझा पाए कि वे बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी देश के लिए खतरनाक है. थक हारकर उन्होंने दलितों को बौद्ध धर्म में जाने की सलाह दी थी.  उनका ये कदम इस बात के लिए था कि सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद करना बेकार है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को स्वयं अन्धविश्वासी धर्म और परम्परा को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर अपनी मदद खुद करनी चाहिए.

    अब इस बिंदु पर आकर अब एक सबसे बड़ा सवाल उठता है कि स्वर्ण द्विज हिन्दुओं को छोडिये, क्या दलितों, शूद्रों आदिवासियों और मुसलमानों को ये बात समझ में आ गयी है कि “उनके अपने भीतर की जाति व्यवस्था उनके अपने लिए क्यों और किस तरह खतरनाक है?” ये सवाल अजीब लगेगा लेकिन यही असली सवाल है. और इसका उत्तर ये है कि दलितों पिछड़ों को पता ही नहीं है कि ये ‘उनकी अंदरूनी जाति व्यवस्था’ ही उनके लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है. मेरे इस वक्तव्य पर बहुत लोगों को तकलीफ होगी या इसका मजाक उड़ाया जा सकता है. लेकिन हकीकत यही है कि दलित और पिछड़े समुदाय अपनी खुद की अलग अलग जातियों में विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध नहीं तोड़ पाए हैं. अभी भी दलितों और आदिवासियों और शूद्रों में आपसी एकीकरण नहीं हो पाया है और इसी कारण इनके राजनीतिक और सामाजिक प्रेशर ग्रुप निकम्मे पड़े हैं.

    कल्पना कीजिये कि किसानों कामगारों और मजदूरों की जातियों में आपस में एकीकरण हो जाए, ये सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद लगाना छोड़कर खुद ही अपने बीच जाति नाश करके अपने बीच में विवाह और भोजन सहित अन्य सामाजिक आर्थिक व्यवहार शुरू कर दें तो क्या होगा? इससे ये होगा कि एक समाज के रूप में और एक राजनीतिक इकाई के रूप वे संगठित हो जायेंगे. एक जाति में दुसरी जाति की बेटी या बहु या रिश्तेदार होगा तो उन्हें उस जाति के गरीब या अमीर होने में दुःख या सुख का अनुभव होगा. ऐसे में जब सभी जातियों के हित एकदूसरे से विवाह और भोजन सहित व्यापार रोजगार आदि के रास्ते से जुड़ जायेंगे तब दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों के सामाजिक और राजनीतिक संगठन एक भारी संख्या (भारत की जनसंख्या का 70 प्रतिशत से भी अधिक) के जरिये अपने सपनों का समाज और भारत बना सकेंगे. तब तीस प्रतिशत या तीन प्रतिशत रसूखदारों को भी आपके लिए बदलना ही पड़ेगा. जब सवर्ण द्विज हिन्दू ये देखेंगे कि जाति व्यवस्था से ‘उन्हें’ उनकी राजनीति और उनके व्यापर को नुक्सान हो रहा है तब वे जाति उन्मूलन का प्रयास अपनी तरफ से इमानदारी से शुरू करेंगे. मतलब ये हुआ कि सभी दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों को अपनी अंदरूनी जाति व्यवस्था तोड़कर पूरे समाज को इस स्तर तक ले जाना है जहां सवर्णों को अपनी राजनीति, व्यापार, रोजगार आदि के मामले में जाति व्यवस्था से नफरत होने लगे. तभी वे कुछ करेंगे. और जब तक वे कुछ न करें तब तक हमें अपने भीतर जाति व्यवस्था को खत्म करना है.  

    अब इस लेख की शुरुआत में आये जार्ज बर्नार्ड शॉ के वक्तव्य पर लौटते हैं कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही है उसी दिशा में झंडा लेकर आगे हो लेने वाला नेता होता है” ये वक्तव्य असल में राजनीतिक नेतृत्व और राजनीतिक अवसरवादिता को व्यक्त करता है. साथ ही बर्नार्ड शॉ का ये मजाक असल में जनता की असली ताकत को भी उजागर करता है. जनता (हमारे लिए भारत की गरीब जातियां) अगर अपनी मर्जी से कोई एक दिशा चुन कर उसपर निकल पड़े तो सारे नेता उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ने के लिए मजबूर हो जायेंगे. इस बात को आप अभी भी होता हुआ देख सकते हैं. जिन लोगों ने गाय या मन्दिर या राष्ट्रवाद के इर्दगिर्द राजनीति खडी की है उन्होंने ये काम राजनीति में सीधे सीधे नहीं किया है बल्कि धीमे जहरीले धार्मिक प्रचार और शिक्षा, धार्मिक प्रवचनों, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों, धार्मिक सीरियल्स, कार्टून, फिल्मों आदि के माध्यम से भीड़ को धर्म, मन्दिर, गौरक्षा और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया है. अब जब भीड़ उन जहरीले प्रचार और शिक्षा को मानकर एक दिशा में निकल पड़ी तब उनकी “बी टीम” के राजनेता झंडा लेकर आगे हो गये हैं और भारत की राजनीति और संसद में ताकतवर होकर नजर आने लगे हैं.

    भीड़ के इस चुनाव के तर्क को आगे बढायें तो हमें देखना होगा कि दलित और पिछडे क्या सीखकर किस दिशा में दौड़ रहे हैं? आप गहराई से देखें तो उन्होंने इन सवर्ण धार्मिक बाबाओं, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों सहित उनके धर्म और देवी देवताओं से ही शिक्षा ली है और उस शिक्षा पर खड़ी जाति व्यवस्था और धर्म को अपनी ही अंदरूनी जातियों को मजबूत बनाने में इस्तेमाल किया है. जब सवर्ण नेता या किसी भी जाति वर्ण के नेता ये देखते हैं कि दलित या पिछड़े खुद ही जाति व्यवस्था और इस व्यवस्था को सिखाने वाले अन्धविश्वासी धर्म को ही मजबूत करने में लगे हुए हैं तो वे भी झंडा उठाकर उसी दिशा में दौड़ पड़ते हैं. इसमें उनकी गलती कम है दलितों पिछड़ों की गलती अधिक है. ऐसे में जाति व्यवस्था को खत्म करने वाला सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व उभर ही नहीं सकता. ऐसे में किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणापत्र में जाति उन्मूलन एक एजेंडे की तरह शामिल नहीं हो सकता. ऐसे में जाति उन्मूलन का वादा चुनाव में जीत का आश्वासन नहीं बन सकता.

    ये दलितों पिछड़ों की बड़ी आबादी के लिए बड़ी शर्म की बात है कि मंदिर या मस्जिद की लड़ाई या “मन्दिर वहीं बनायेंगे” जैसी बातें चुनाव में जीतने के लिए आश्वासन बन जाती हैं और “जाति सभी मिटायेंगे” जैसे नारों की कल्पना तक राजनीतिक घोषणापत्र या राजनीतिक रणनीति से नहीं जुड़ पाई है. इसका ये मतलब है कि बीमारी या कमजोरी राजनीति में नहीं है बल्कि दलितों पिछड़ों की भीड़ में ही कहीं असली बीमारी छुपी हुई है.  वे खुद अपनी राजनीतिक प्रतिनिधियों को ये सन्देश साफ ढंग से नहीं दे पाए हैं कि उन्हें जाति और जातिवादी धर्म को कमजोर करना पसंद है या इन्हें मजबूत करना पसंद है. जब राजनीतिक नेता दलितों पिछड़ों को सवर्ण हिन्दुओं के मन्दिरों में पंडालों में कथाओं और जगरातों में कीर्तन करता हुआ देखते हैं, पुनर्जन्म और आत्मा परमात्मा की शिक्षा से प्रभावित होता हुआ देखते हैं, लगन महूरत और ज्योतिष में भरोसा करता हुआ देखते हैं  तो वे समझ जाते हैं कि ये भीड़ जाति नाश की दिशा में नहीं बल्कि जाति को और जातिवादी धर्म को मजबूत करने की दिशा में जा रही है. तब वे भी अपनी अवसरवादी फितरत के साथ उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ते हैं और नारा लगाने लगते हैं. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ अपमानित किये जाने पर भी बार बार उसी मन्दिर में जाती है तो वे नेता नारा लगाते हैं कि ‘मंदिर वहीं बनायेंगे’. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ आपसी जातियां मिटाने लगें तो कल को ये ही नेता नारा लगायेंगे कि “जाति सभी मिटायेंगे”. आपके नेता क्या करेंगे क्या नारा लगायेंगे ये आपको आपकी भीड़ को और आपके समुदायों को आपस में मिलकर तय करना है.

    अब इस सब से करने योग्य क्या हासिल हुआ?

    इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि आपको जाति के नाश के लिए दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी है. दलितों पिछड़ों को सवर्णों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे आकर उनका धार्मिक अंधविश्वास और उस पर आधारित जाति को मिटा दें. इसके विपरीत दलितों पिछड़ों को आपस में मिलजुलकर अपनी-अपनी जातियों में विवाह, भोजन और सामाजिक, आर्थिक व्यवहार के अन्य रिश्ते बनाने होंगे. और इससे भी बढ़कर एक काम और करना होगा. जो धर्म या अन्धविश्वास जाति व्यवस्था को मजबूत करता है. जो धर्म या शास्त्र या गुरु या बाबा आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की शिक्षा देता है उससे दूरी बनाइए. उनकी शिक्षाओं में ही असली दुर्भाग्य छुपा हुआ है, जाति व्यवस्था की जड़ इसी धार्मिक शिक्षा में और इस पर आधारित पलायनवादी अध्यात्म में छुपी हुई है. अगर इस शिक्षा को दलित और पिछड़े नकार दें तो भारत भी सभ्य और समर्थ हो सकता है.

    ऐसे नकार के लिए दलितों पिछड़ों को अतिवादी नहीं बनना है, न कोई सेना या हिंसक आन्दोलन खड़ा करना है, न तो हिन्दू धर्म को अब अपमानित करना है न उनके देवी देवताओं शास्त्रों का उपहास करना है ये सवर्ण  हिन्दुओं का उनका अपना धर्म है वे जिस तरह उसे मानते हैं उन्हें मानने पूजने का संवैधानिक अधिकार उनके पास है. वे दलितों शूद्रों स्त्रीयों को अपने मंदिरों शास्त्रों के लिए अपवित्र या नीच समझते हैं तो दलितों शूद्रों को उन मन्दिरों शास्त्रों के निकट जाकर उन्हें दुखी नही करना चाहिए, ये शिष्टाचार की बात है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को पने मूल श्रमण धर्म ‘बौद्ध धर्म’ का अभी से पालन करना शुरू कर देना चाहिए. इसके लिए धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है. आपको सिर्फ आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक और अन्धविश्वासी बातों में विश्वास करना बंद करना है और भारत के संविधान के अनुरूप वैज्ञानिक चित्त का अपने भीतर और अपने परिवार रिश्तेदारों मित्रों में विकास करना है. अपने बच्चों और स्त्रीयों मित्रों रिश्तेदारों आदि को को काल्पनिक मिथकों, देवी-देवताओं, भूत-प्रेत, या पितरों आदि के पूजा पाठ आदि से दूर कर लेना है. किसी अंधविश्वास की गुलामी हो या उसका मजाक बनाना हो दोनों एक तरह की अति है, कोई भी अति समाज के लिए ठीक नहीं होती. इनके बीच में मध्यम मार्ग और संतुलित मार्ग ये है कि आप अपने भीतर की जाति व्यवस्था खत्म करें और अंधविश्वास से दूरी बना लें और वैज्ञानिक और नैतिक लोकतांत्रिक चेतना का विकास करते रहें. यही दलितों पिछड़ों और भारत को सक्षम और समृद्ध बनाने का रास्ता है.  

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।