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  • बुद्ध पूर्णिमा पर बुद्ध के दुश्मनों को पहचानिए –Sanjay Jothe

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध के सबसे पुराने और सबसे शातिर दुश्मनों को आप आसानी से पहचान सकते हैं. यह दिन बहुत ख़ास है इस दिन आँखें खोलकर चारों तरफ देखिये. बुद्ध की मूल शिक्षाओं को नष्ट करके उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बकवास भरने वाले बाबाओं को आप काम करता हुआ आसानी से देख सकेंगे. भारत में तो ऐसे त्यागियों, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और स्वयं को बुद्ध का अवतार कहने वालों की कमी नहीं है. जैसे इन्होने बुद्ध को उनके जीते जी बर्बाद करना चाहा था वैसे ही ढंग से आज तक ये पाखंडी बाबा लोग बुद्ध के पीछे लगे हुए हैं.

    बुद्ध पूर्णिमा के दिन भारत के वेदांती बाबाओं सहित दलाई लामा जैसे स्वघोषित बुद्ध अवतारों को देखिये. ये विशुद्ध राजनेता हैं जो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए बुद्ध की शिक्षाओं को उलटा सीधा तोड़ मरोड़कर उसमे आत्मा परमात्मा घुसेड देते हैं. भारत के एक फाइव स्टार रजिस्टर्ड भगवान् – भगवान् रजनीश ने तो दावा कर ही दिया था कि बुद्ध उनके शरीर में आकर रहे, इस दौरान उनके भक्तों ने प्रवचनों के दौरान उन्हें बुद्ध के नाम से ही संबोधित किया लेकिन ये “परीक्षण” काम नहीं किया और भगवान रजनीश ने खुद को बुद्ध से भी बड़ा बुद्ध घोषित करते हुए सब देख भालकर घोषणा की कि “बुद्ध मेरे शरीर में भी आकर एक ही करवट सोना चाहते हैं, आते ही अपना भिक्षा पात्र मांग रहे हैं, दिन में एक ही बार नहाने की जिद करते हैं” ओशो ने आगे कहा कि बुद्ध की इन सब बातों के कारण मेरे सर में दर्द हो गया और मैंने बुद्ध को कहा कि आप अब मेरे शरीर से निकल जाइए.

    जरा गौर कीजिये. ये भगवान् रजनीश जैसे महागुरुओं का ढंग है बुद्ध से बात करने का. और कहीं नहीं तो कम से कम कल्पना और गप्प में ही वे बुद्ध का सम्मान कर लेते लेकिन वो भी इन धूर्त बाबाजी से न हो सका. आजकल ये बाबाजी और उनके फाइव स्टार शिष्य बुद्ध के अधिकृत व्याख्याता बने हुए हैं और बहुत ही चतुराई से बुद्ध की शिक्षाओं और भारत में बुद्ध के साकार होने की संभावनाओं को खत्म करने में लगे हैं. इसमें सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि दलित बहुजन समाज के और अंबेडकरवादी आन्दोलन के लोग भी इन जैसे बाबाओं से प्रभावित होकर अपने और इस देश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.

    इस बात को गौर से समझना होगा कि भारतीय वेदांती बाबा किस तरह बुद्ध को और उनकी शिक्षाओं को नष्ट करते आये हैं. इसे ठीक से समझिये. बुद्ध की मूल शिक्षा अनात्मा की है. अर्थात कोई ‘आत्मा नहीं होती’. जैसे अन्य धर्मों में इश्वर, आत्मा और पुनर्जन्म होता है वैसे बुद्ध के धर्म में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म का कोई स्थान नहीं है. बुद्ध के अनुसार हर व्यक्ति का शरीर और उसका मन मिलकर एक आभासी स्व का निर्माण करता है जो अनेकों अनेक गुजर चुके शरीरों और मन के अवशेषों से और सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षणिक आदि आदि कारकों के प्रभाव से बनता है, ये शुद्धतम भौतिकवादी निष्पत्ति है. किसी व्यक्ति में या जीव में कोई सनातन या अजर अमर आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती. और इसी कारण एक व्यक्ति का पुनर्जन्म होना एकदम असंभव है.

    जो लोग पुनर्जन्म के दावे करते हैं वे बुद्ध से धोखा करते हैं. इस विषय में दलाई लामा का उदाहरण लिया जा सकता है. ये सज्जन कहते हैं कि वे पहले दलाई लामा के तेरहवें या चौदहवें अवतार हैं और हर बार खोज लिए जाते हैं. अगर इनकी बात मानें तो इसका मतलब हुआ कि इनके पहले के दलाई लामाओं का सारा संचित ज्ञान, अनुभव और बोध बिना रुकावट के इनके पास आ रहा है. सनातन और अजर-अमर आत्मा के पुनर्जन्म का तकनीकी मतलब यही होता है कि अखंडित आत्मा अपने समस्त संस्कारों और प्रवृत्तियों के साथ अगले जन्म में जा रही है.

    अब इस दावे की मूर्खता को ठीक से देखिये. ऐसे लामा और ऐसे दावेदार खुद को किसी अन्य का पुनर्जन्म बताते हैं लेकिन ये गजब की बात है कि इन्हें हर जन्म में शिक्षा दीक्षा और जिन्दगी की हर जेरुरी बात को ए बी सी डी से शुरू करना पड़ता है. भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि ही नहीं बल्कि इनका अपना पालतू विषय – अध्यात्म और ध्यान भी किसी नए शिक्षक से सीखना होता है. अगर इनका पुनर्जन्म का दावा सही है तो अपने ध्यान से ही इन चीजों को पिछले जन्म से ‘री-कॉल’ क्यों नहीं कर लेते? आपको भी स्पेशल ट्यूटर रखने होते हैं तो एक सामान्य आदमी में और इन अवतारों में क्या अंतर है?

    इस बात को ठीक से देखिये. इससे साफ़ जाहिर होता है कि अवतार की घोषणा असल में एक राष्ट्राध्यक्ष के राजनीतिक पद को वैधता देने के लिए की जाती है. जैसे ही नया नेता खोजा जाता है उसे पहले वाले का अवतार बता दिया जाता है इससे असल में जनता में उस नेता या राजा के प्रति पैदा हो सकने वाले अविश्वास को खत्म कर दिया जाता है या उस नेता या राजा की क्षमता पर उठने वाले प्रश्न को भी खत्म कर दिया जाता है, जनता इस नये नेता को पुराने का पुनर्जन्म मानकर नतमस्तक होती रहती है और शिक्षा, रोजगार, विकास, न्याय आदि का प्रश्न नहीं उठाती, इसी मनोविज्ञान के सहारे ये गुरु सदियों सदियों तक गरीब जनता का खून चूसते हैं. यही भयानक राजनीति भारत में अवतारवाद के नाम पर हजारों साल से खेली जाती रही है. इसी कारण तिब्बत जैसा खुबसूरत मुल्क अन्धविश्वासी और परलोकवादी बाबाओं के चंगुल में फंसकर लगभग बर्बाद हो चुका है. वहां न शिक्षा है न रोजगार है न लोकतंत्र या आधुनिक समाज की कोई चेतना बच सकी है.

    अब ये लामा महाशय तिब्बत को बर्बाद करके धूमकेतु की तरह भारत में घूम रहे हैं और अपनी बुद्ध विरोधी शिक्षाओं से भारत के बौद्ध आन्दोलन को पलीता लगाने का काम कर रहे हैं.

    भारत के बुद्ध प्रेमियों को ओशो रजनीश जैसे धूर्त वेदान्तियों और दलाई लामा जैसे अवसरवादी राजनेताओं से बचकर रहना होगा. डॉ. अंबेडकर ने हमें जिस ढंग से बुद्ध और बौद्ध धर्म को देखना सिखाया है उसी नजरिये से हमे बुद्ध को देखना होगा. और ठीक से समझा जाए तो अंबेडकर जिस बुद्ध की खोज करके लाये हैं वही असली बुद्ध हैं. ये बुद्ध आत्मा और पुनर्जन्म को सिरे से नकारते हैं.

    लेकिन भारतीय बाबा और फाइव स्टार भगवान लोग एकदम अलग ही खिचडी पकाते हैं. ये कहते हैं कि सब संतों की शिक्षा एक जैसी है, सबै सयाने एकमत और फिर उन सब सयानों के मुंह में वेदान्त ठूंस देते हैं. कहते हैं बुद्ध ने आत्मा और परमात्मा को जानते हुए भी इन्हें नकार दिया क्योंकि वे देख रहे थे कि आत्मा परमात्मा के नाम पर लोग अंधविश्वास में गिर सकते थे. यहाँ दो सवाल उठते हैं, पहला ये कि क्या बुद्ध ने स्वयं कहीं कहा है कि उन्होंने आत्मा परमात्मा को जानने के बाद भी उसे नकार दिया? दुसरा प्रश्न ये है कि बुद्ध अंधविश्वास को हटाने के लिए ऐसा कर रहे थे तो अन्धविश्वास का भय क्या उस समय की तुलना में आज एकदम खत्म हो गया है? दोनों सवालों का एक ही उत्तर है – “नहीं”.

    गौतम बुद्ध कुटिल राजनेता या वेदांती मदारी नहीं हैं. वे एक इमानदार क्रांतिचेता और मनोवैज्ञानिक की तरह तथ्यों को उनके मूल रूप में रख रहे हैं. उनका अनात्मा का अपना विशिष्ठ दर्शन और विश्लेषण है. उसमे वेदांती ढंग की सनातन आत्मा का प्रक्षेपण करने वाले गुरु असल में बुद्ध के मित्र या हितैषी नहीं बल्कि उनके सनातन दुश्मन हैं. आजकल आप किसी भी बाबाजी के पंडाल या ध्यान केंद्र में चले जाइए. या यहीं फेसबुक पर ध्यान की बकवास पिलाने वालों को देख लीजिये. वे कृष्ण और बुद्ध को एक ही सांस में पढ़ाते हैं, ये गजब का अनुलोम विलोम है. जबकि इनमे थोड़ी भी बुद्धि हो तो समझ आ जाएगा कि बुद्ध आत्मा को नकारते हैं और कृष्ण आत्मा को सनातन बताते हैं, कृष्ण और बुद्ध दो विपरीत छोर हैं. लेकिन इतनी जाहिर सी बात को भी दबाकर ये बाबा लोग अपनी दूकान कैसे चला लेते हैं? लोग इनके झांसे में कैसे आ जाते हैं? यह बात गहराई से समझना चाहिए.

    असल में ये धूर्त लोग भारतीय भीड़ की गरीबी, कमजोरी, संवादहीनता, कुंठा, अमानवीय शोषण, जातिवाद आदि से पीड़ित लोगों की सब तरह की मनोवैज्ञानिक असुरक्षाओं और मजबूरियों का फायदा उठाते हैं और तथाकथित ध्यान या समाधि या चमत्कारों के नाम पर मूर्ख बनाते हैं. इन बाबाओं की किताबें देखिये, आलौकिक शक्तियों के आश्वासन और अगले जन्म में इस जन्म के अमानवीय कष्ट से मुक्ति के आश्वासन भरे होते हैं. इनका मोक्ष असल में इस जमीन पर बनाये गये अमानवीय और नारकीय जीवन से मुक्त होने की वासना का साकार रूप है. इस काल्पनिक मोक्ष में हर गरीब शोषित इंसान ही नहीं बल्कि हराम का खा खाकर अजीर्ण, नपुंसकता और कब्ज से पीड़ित हो रहे राजा और सामंत भी घुस जाना चाहते हैं. आत्मा को सनातन बताकर गरीब को उसके आगामी जन्म की विभीषिका से डराते हैं और अमीर को ऐसे ही जन्म की दुबारा लालच देकर उसे फंसाते हैं, इस तरह इस मुल्क में एक शोषण का सनातन साम्राज्य बना रहता है. और शोषण का ये अमानवीय ढांचा एक ही बिंदु पर खड़ा है वह है – सनातन आत्मा का सिद्धांत.

    इसके विपरीत बुद्ध ने जिस निर्वाण की बात कही है या बुद्ध ने जिस तरह की अनत्ता की टेक्नोलोजी दी है और उसका जो ऑपरेशनल रोडमेप दिया है उसके आधार पर यह स्थापित होता है कि आत्मा यानी व्यक्तित्व और स्व जैसी किसी चीज की कोई आत्यंतिक सत्ता नहीं है. यह एक कामचलाऊ स्व या व्यक्तित्व है जो आपने अपने जन्म के बाद के वातावरण में बहुत सारी कंडीशनिंग के प्रभाव में पैदा किया है, ये आपने अपने हाथ से बनाया है और इसे आप रोज बदलते हैं.

    आप बचपन में स्कूल में जैसे थे आज यूनिवर्सिटी में या कालेज में या नौकरी करते हुए वैसे ही नहीं हैं, आपका स्व या आत्म या तथाकथित आत्मा रोज बदलती रही है. शरीर दो पांच दस साल में बदलता है लेकिन आत्मा या स्व तो हर पांच मिनट में बदलता है. इसी प्रतीति और अनुभव के आधार पर ध्यान की विधि खोजी गयी. बुद्ध ने कहा कि इतना तेजी से बदलता हुआ स्व – जिसे हम अपना होना या आत्मा कहते हैं – इसी में सारी समस्या भरी हुयी है. इसीलिये वे इस स्व या आत्मा को ही निशाने पर लेते हैं. बुद्ध के अनुसार यह स्व या आत्मा एक कामचलाऊ धारणा है, ये आत्म सिर्फ इस जीवन में लोगों से संबंधित होने और उनके साथ समाज में जीने का उपकरण भर है. इस स्व या आत्म की रचना करने वाले शरीर, कपड़े, भोजन, शिक्षा और सामाजिक धार्मिक प्रभावों को अगर अलग कर दिया जाए तो इसमें अपना आत्यंतिक कुछ भी नहीं है. यही अनात्मा का सिद्धांत है. यही आत्मज्ञान है. बुद्ध के अनुसार एक झूठे स्व या आत्म के झूठेपन को देख लेना ही आत्मज्ञान है.

    लेकिन वेदांती बाबाओं ने बड़ी होशियारी से बुद्ध के मुंह में वेदान्त ठूंस दिया है और इस झूठे अस्थाई स्व, आत्म या आत्मा को सनातन बताकर बुद्ध के आत्मज्ञान को ‘सनातन आत्मा के ज्ञान’ के रूप में प्रचारित कर रखा है. अगर आप इस गहराई में उतरकर इन बाबाओं और उनके अंधभक्तों से बात करें तो वे कहते हैं कि ये सब अनुभव का विषय है इसमें शब्दजाल मत रचिए. ये बड़ी गजब की बात है. बुद्ध की सीधी सीधी शिक्षा को इन्होने न जाने कैसे कैसे श्ब्द्जालों और ब्रह्म्जालों से पाट दिया है और आदमी कन्फ्यूज होकर जब दिशाहीन हो जाता है तो ये उसे तन्त्र मन्त्र सिखाकर और भयानक कंडीशनिंग में धकेल देते हैं. इसकी पड़ताल करने के लिए इनकी गर्दन पकड़ने निकलें तो ये कहते हैं कि ये अनुभव का विषय है. इनसे फिर खोद खोद कर पूछिए कि आपको क्या अनुभव हुआ ? तब ये जलेबियाँ बनाने लगते हैं. ये इनकी सनातन तकनीक है.

    असल में सनातन आत्मा सिखाने वाला कोई भी अनुशासन एक धर्म नहीं है बल्कि ये एक बल्कि राजनीती है. इसी हथकंडे से ये सदियों से समाज में सृजनात्मक बातों को उलझाकर नष्ट करते आये हैं. भक्ति भाव और सामन्ती गुलामी के रूप में उन्होंने जो भक्तिप्रधान धर्म रचा है वो असल में भगवान और उसके प्रतिनिधि राजा को सुरक्षा देता आया है. यही बात है कि हस्ती मिटती नहीं इनकी, इस भक्ति में ही सारा जहर छुपा हुआ है. इसी से भारत में सब तरह के बदलाव रोके जाते हैं. और इतना ही नहीं व्यक्तिगत जीवन में अनात्मा के अभ्यास या ज्ञान से जो स्पष्टता और समाधि (बौद्ध समाधी)फलित हो सकती है वह भी असंभव बन जाती है.

    ये पाखंडी गुरु एक तरफ कहते हैं कि मैं और मेरे से मुक्त हो जाना ही ध्यान, समाधि और मोक्ष है और दूसरी तरफ इस मैं और मेरे के स्त्रोत – इस सनातन आत्मा – की घुट्टी भी पिलाए जायेंगे. एक हाथ से जहर बेचेंगे दुसरे हाथ से दवाई. एक तरफ मोह माया को गाली देंगे और अगले पिछले जन्म के मोह को भी मजबूत करेंगे. एक तरह शरीर, मन और संस्कारों सहित आत्मा के अनंत जन्मों के कर्मों की बात सिखायेंगे और दुसरी तरफ अष्टावक्र की स्टाइल में ये भी कहेंगे कि तू मन नहीं शरीर नहीं आत्मा नहीं, तू खुद भी नहीं ये जान ले और अभी सुखी हो जा. ये खेल देखते हैं आप? ले देकर आत्मभाव से मुक्ति को लक्ष्य बतायेंगे और साथ में ये भी ढपली बजाते रहेंगे कि आत्मा अजर अमर है हर जन्म के कर्मों का बोझ लिए घूमती है.

    अब ऐसे घनचक्कर में इन बाबाओं के सौ प्रतिशत लोग उलझे रहते हैं, ये भक्त अपने बुढापे में भयानक अवसाद और कुंठा के शिकार हो जाते हैं. ऐसे कई बूढों को आप गली मुहल्लों में देख सकते हैं. इनके जीवन को नष्ट कर दिया गया है. ये इतना बड़ा अपराध है जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती. दुर्भाग्य से अपना जीवन बर्बाद कर चुके ये धार्मिक बूढ़े अब चाहकर भी मुंह नहीं खोल सकते.

    लेकिन बुद्ध इस घनचक्कर को शुरू होने से पहले ही रोक देते हैं. बुद्ध कहते हैं कि ऐसी कोई आत्मा होती ही नहीं इसलिए इस अस्थाई स्व में जो विचार संस्कार और प्रवृत्तियाँ हैं उन्हें दूर से देखा जा सकता है और जितनी मात्रा में उनसे दूरी बनती जाती है उतनी मात्रा में निर्वाण फलित होता जाता है. निर्वाण का कुल जमा अर्थ ‘नि+वाण’ है अर्थात दिशाहीन हो जाना. अगर आप किसी विचार या योजना या अतीत या भविष्य का बोध लेकर घूम रहे हैं तो आप ‘वाण’ की अवस्था में हैं अगर आप अनंत पिछले जन्मों और अनंत अगले जन्मों द्वारा दी गयी दिशा और उससे जुडी मूर्खता को त्याग दें तो आप अभी ही ‘निर्वाण’ में आ जायेंगे. लेकिन ये धूर्त फाइव स्टार भगवान् और इनके जैसे वेदांती बाबा इतनी सहजता से किसी को मुक्त नहीं होने देते. वे बुद्ध और निर्वाण के दर्शन को भी धार्मिक पाखंड की राजनीति का हथियार बना देते हैं और अपने भोग विलास का इन्तेजाम करते हुए करोड़ों लोगों का जीवन बर्बाद करते रहते हैं.

    बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर इन बातों को गहराई से समझिये और दूसरों तक फैलाइये. एक बात ठीक से नोट कर लीजिये कि भारत में गरीबॉन, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों और आदिवासियों के लिए बुद्ध का अनात्मा का और निरीश्वरवाद का दर्शन बहुत काम का साबित होने वाला है. बुद्ध का निरीश्वरवाद और अनात्मवाद असल में भारत के मौलिक और ऐतिहासिक भौतिकवाद से जन्मा है. ऐसे भौतिकवाद पर आज का पूरा विज्ञान खड़ा है और भविष्य में एक स्वस्थ, नैतिक और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण भी इसी भौतिकवाद की नींव पर होगा. आत्मा इश्वर और पुनर्जन्म जैसी भाववादी या अध्यात्मवादी बकवास को जितनी जल्दी दफन किया जाएगा उतना ही इस देश का और इंसानियत का फायदा होगा.

    अब शेष समाज इसे समझे या न समझे, कम से कम भारत के दलितों, आदिवासियों, स्त्रीयों और शूद्रों (ओबीसी) सहित सभी मुक्तिकामियों को इसे समझ लेना चाहिए. इसे समझिये और बुद्ध के मुंह से वेदान्त बुलवाने वाले बाबाओं और उनके शीशों के षड्यंत्रों को हर चौराहे पर नंगा कीजिये. इन बाबाओं के षड्यंत्रकारी सम्मोहन को कम करके मत आंकिये. ये बाबा ही असल में भारत में समाज और सरकार को बनाते बिगाड़ते आये हैं. अगर आप ये बात अब भी नहीं समझते हैं तो आपके लिए और इस समाज के लिए कोई उम्मीद नहीं है. इसलिए आपसे निवेदन है कि बुद्ध को ठीक से समझिये और दूसरों को समझाइये.

     

  • भारतीय शास्त्रीय कलाएं और सामाजिक सरोकार –Sanjay Jothe

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    भारतीय कलाकारों, खिलाड़ियों, गायकों नृत्यकारों के वक्तव्य बहुत निराश करते हैं। उनके वक्तव्यों में आम भारतीय मजदूर या किसान या गरीब के सामाजिक सरोकार एकदम से गायब हैं। उन्होंने कला को व्यक्तिगत मोक्ष या अलौकिक आनन्द की जिन शब्दावलियों में गूंथा है उसमें फसकर कला और कलात्मक अभव्यक्तियाँ भी इस लोक की वास्तविकताओं के लिए न सिर्फ असमर्थ हो गए हैं बल्कि उसके दुश्मन भी बन गए हैं। हालांकि अभी कुछ वर्षों से पश्चिमी प्रभाव में एक भिन्न किस्म की कला उभर रही है वह एक नई घटना है, उससे कुछ उम्मीद जाग रही है।

    भारत का उदाहरण लें तो साफ नजर आता है कि कला, भाषा, संगीत काव्य आदि सृजन के वाहक होने के साथ ही शोषक परम्पराओं और धर्म के भी वाहक बन जाते हैं। खासकर भारत मे संगीत और साहित्य ने जो दिशा पकड़ी है उसका मूल्यांकन आप समाज की सेहत के संदर्भ में करेंगे तो आपको चौंकानेवाले नतीजे मिलेंगे। 1935 के पहले तक का नख शिख वर्णन और भक्ति सहित नायिका विमर्श वाले साहित्य को दखिये और आज तक के शास्त्रीय संगीत और नर्तन को दखिये – ये सब शोषक धर्म और संस्कृति के कथानकों, मिथकों, गीतों का ही मंचन, गायन और महिमामंडन करते आये हैं।

    नृत्य की प्रमुख शास्त्रीय शैलियो को देखिये वे किसी न किसी मिथक या अवतार की लीला से आरंभ होकर उस अवतार या मिथक से जुड़े सामाजिक मनोविज्ञान को सुरक्षित रखने का काम करती आई है। अधिकांश शास्त्रीय गायक अपनी गायकी जिन काव्य प्रतीकों और छंदों में बांधते हैं वे काव्य अंश सामंती दास्यभाव की भक्ति के गुणगान से या परलोकी वैराग्य और काल्पनिक ईश्वर के महिमामंडन से भरी होती है।

    यह सब सीधे तरीके से ब्राह्मणी वेदांत और ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमवादी सामाजिक संरचना को बनाये रखने का एक सूक्ष्म हथियार बन जाता है। एक खास किस्म का कल्पनालोक इन शास्त्रीय कलाओं से जन्म लेता है और स्वयं को हर पीढ़ी में आगे सौंपता जाता है। इसी से प्रेरणा लेकर हमारा फिल्मी और टेलीविजन का संगीत और नृत्य विकसित/पतित होता है। इस ढंग ढोल में जन्मे संगीत नृत्य खेल साहित्य आदि में समाज के वास्तविक सरोकारों को कोइ स्थान नहीं मिलता है। यही भारतीय कला की हकीकत रही है।

    हमारे साहित्य, संगीत, खेल और फ़िल्म सहित मीडिया की किसी भी विधा के चैम्पियनों को उठाकर देख लीजिए। उनकी कला न उनके हृदय में सामाजिक सरोकारों को पैदा कर पा रही है न उनसे प्रभावित लोगों में किसी सामाजिक शुभ को प्रेरित कर रही है।

    हां, ये ठीक है कि एक व्यक्तिगत अर्थ में, एक व्यक्ति की सृजन प्रेरणाओं को ऊर्जा और आकार देने में ये विधाएं ठीक ढंग से काम करती आई हैं लेकिन इसका सामाजिक या सामूहिक शुभ से कोई अनिवार्य संबन्ध नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारी कलाएं और उनकी अभिव्यक्तियाँ ठोस और जमीनी सरोकारों से एक खास किस्म की तटस्थता सायास बनाकर चलती हैं।

    यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोक कलाओं और जनजातीय कलाओं में यह समस्या नहीं है। लेकिन चूंकि उनका विकास अब अवरुद्ध सा हो गया है और उनके अपने वाहक अब “सभ्य” होने लगे हैं, सो उनमे पुरानी लोक कलाओं को सहेजने या विकसित करने की प्रवृत्ति क्षीण हो रही है। एक पॉप्युलर कल्चर और उसका आभामण्डल उनपर हावी हो रहा है। अब वे भी चलताऊ किस्म के न्यूज चैनल्स की शैली में परोसीे गई कला, गीत, संगीत, मंचीय काव्य, शायरी और जगरातों कथा पंडालों से प्रभावित हो रहे हैं।

    कुल मिलाकर एक सामान्य स्थिति यह है कि अब लोक कलाओं का नाम लेने वाले समूह और समुदाय ही नहीं बल्कि व्यक्ति और संस्थाएं भी सिकुड़ रही हैं। ऐसे में फिल्म या टेलीविजन पर सवार कला ही सामान्य जनसमुदाय के लिए एक बड़ी खुराक का निर्माण करती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारा आम भारतीय कलाओं की बहुत निकृष्ट और व्यक्तिगत मोक्ष के अर्थ वाले संस्करणों से कला की प्रेरणा लेता है। यह एकांत में तनाव मुक्ति का या किसी तरह के मनोलोक में खो जाने का उपाय भर होता है। इसका समाज की सामूहिकता पर क्या प्रभाव होता है यह एक अन्य भयानक तथ्य है।

    अब कलाकारों और आम जन को लोक कला सहित लोक और लोकतंत्र से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे  में कला खेल संगीत नृत्य आदि लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हुई फासीवादी शक्तियों का गुणगान करने लगे हैं। हमारा बोलीवूड, क्रिकेट, टेलीविजन और शास्त्रीय संगीत अब अपनी सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक रुझान की घोषणा कर रहा है।

    उदारीकरण के बाद राजनीति, धर्म और व्यापार की त्रिमूर्ति ने जिस नये और सर्वयव्यापी ईश्वर को रचा है अब उस ईश्वर के गुणगान में भारतीय  शास्त्रीय संगीत, नृत्य, खेल आदि कलाएं भी दोहरी हुई जा रही है। पहले देवी देवताओं और सामंतों की स्तुति होती थी अब थोड़े बदले ढंग से बाजार और राजनेता की स्तुति हो रही है। ये स्तुति प्रत्यक्ष नजर नहीं आएगी लेकिन प्रचलित राजनीति और राजनीतिक आका जिन मिथकों और महाकाव्यों से अपने विषबुझे तीर हासिल करते हैं उन्ही प्रतीकों को अपने गायन नर्तन में जिंदा रखकर असल मे ये कलाएं और कलाकार एक खास राजनीति की ही सेवा करते आये हैं।

    आश्चर्य नहीं कि कलाकार हद दर्जे के अंधविश्वासी, कर्मकांडी, ज्योतिष वास्तु आदि के गुलाम और परलोकवादी होते हैं। इनकी संगीत और काव्य की प्रशंसा सुनें तो साफ नजर आएगा कि ये संगीत या काव्य की प्रशंसा उसके आलौकिक या समयातीत होने की उपमा देते हुए करते हैं। किसी अव्यक्त अज्ञात या अज्ञेय के नजदीक जाने के उपकरण की तरह इन्हें वह संगीत नृत्य या काव्य उपयोगी नजर आता है। ऐसे में संगीत, नृत्य और काव्य स्वयं में एक काल्पनिक ईश्वर के प्रचारतंत्र के दलाल बन जाते हैं।

    इस भूमिका के बाद आप भारतीय कलाकारों,संगीतकारों, खिलाड़ियों और कुछ हद तक साहित्यकारों के समाज विरोधी वक्तव्यों को दखिये, आप देख सकेंगे कि भारतीय कला और कलाकार असल मे प्रतिक्रांति के प्राचीन उपकरण रहे हैं जिनमे शहरी मध्यम वर्ग की असुरक्षाओ और नव उदारीकरण के कीटाणुओं ने नई धार और नया जहर भर दिया है।

  • ध्यान में सबसे बड़ी बाधा: आत्मा का सिद्धांत –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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    ध्यान एक ऐसा विषय है जिसके बारे में सबसे ज्यादा धुंध बनाकर रखी जाती है और पूरा प्रयास किया जाता है कि इस सरल सी चीज को न समझते हुए लोग भ्रमित रहें. इस भ्रम का जान बूझकर निर्माण किया जाता है ताकि कुछ लोगों संस्थाओं और वर्गों की संगठित दुकानदारी और सामाजिक नियंत्रण बेरोकटोक बना रहे.

    ध्यान को चेतना या होश के एक विषय की भाँती समझना एक आयाम है और ध्यान सहित अध्यात्म को एक मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र के उपकरण की तरह देखना दूसरा आयाम है. अक्सर एक आयाम में बात करने वाले दूसरे आयाम की बात नहीं करते लेकिन मैं दोनों की बातें करूंगा ताकि बात पूरी तरह साफ़ हो जाए.

    पहले हम ध्यान को उसके चेतना और होश वाले अर्थ में समझते हैं. असल में ध्यान का अर्थ शुद्धतम होश से है. ध्यान करना या ध्यान लगाना शब्द मूलतः गलत है और ‘ध्यानपूर्ण होना’ या ‘ध्यान में होना’ शब्द ही सही है लेकिन भाषा की मजबूरी है कि ‘ध्यान करना’ एक प्रचलन बन गया है. इस हद तक ‘ध्यान करने’ की सलाह की भाषागत विवशता को माफ़ किया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से मामला यहीं नहीं रुकता. जो परम्पराएं ध्यान फैलने ही नहीं देना चाहती और ध्यान के, होश के और तर्क के खिलाफ काल्पनिक इश्वर से याचना करते हुए ही जिनका जन्म हुआ है वे आजकल ध्यान की ठेकेदारी लेकर बैठ गयी हैं.

    इन शोषक और अन्धविश्वासी परम्पराओं से जब ध्यान की सबसे बड़ी प्रस्तावनाएँ आती हैं तब जरुरी हो जाता है कि उनकी प्रस्तावनाओं में छुपे षड्यंत्रों और विरोधाभासों की पोल खोली जाए.

    भारत में ध्यान की मौलिक प्रस्तावना श्रमणों (जैनों और बौद्धों) से आई है जो प्रार्थना और याचना की बजाय पुरुषार्थ और तर्कपूर्ण इंक्वाइरी में भरोसा रखते थे. इस प्रकार ध्यान ‘भौतिकवादी’ और ‘मनोवैज्ञानिकों’ की देन है. जिस क्रिया या अभ्यास को साधना या अध्यात्मिक अभ्यास कहकर बोझिल कर दिया गया है वह अपने क्षणभंगुर मन और सांत व्यक्तित्व के निष्पक्ष दर्शन के अलावा और कुछ भी नहीं है. इसमें एक वैज्ञानिक सी अप्रोच चाहिए जो अपने मन को प्रयोगशाला बनाकर उसमे हो रही उठा पटक को बिना निर्णय लिए बिना नाम दिए जानता रहे. इस तरह देखने जानने में समझ आता है कि हकीकत में घटनाओं, मन और व्यक्तित्व सहित जीवन और समय मात्र का भी कोई केंद्र नहीं है. सब कुछ संयोग है और सब कुछ और परिवर्तनशील है. ऐसे में अस्तित्व में खूंटे की तरह गाड़ दिए गये इश्वर की कल्पना भी एक मजाक भर है.

    यह भौतिकवाद की निष्पत्ति है. जैसे शरीर निरंतर वर्धमान है या क्षीण हो रहा है उसी तरह मन भी है, उसमे भी बाहरी संवेदनाएं और संस्कार प्रवेश कर रहे हैं और समय और परिस्थिति के अनुसार फलित हो रहे हैं. इस पूरे प्रवाह में आपके लिए करणीय इतना ही है कि इसे चुपचाप या तटस्थ होकर जानते रहें. यहाँ नोट करना चाहिए कि यह आतंरिक या मानसिक धरातल की तटस्थता है. सामाजिक और दुनियावी आयाम में इस तटस्थता का सीमित उपयोग ही हो सकता है.

    शरीर और मन सहित इनके समुच्चय अर्थात व्यक्तित्व को उसकी पूरी नग्नता में काम करते हुए देखना होता है. हमारी इंच इंच गतिविधि का पूरा होश हमें स्वयं होना चाहिए. जैसे अभी आप कुछ पढ़ रहे हैं, किसी कुर्सी पर बैठे हैं, पंखा चल रहा है, कोई गंध आ रही है, विचार चल रहे हैं, पैरों में जूते या चप्पल है, नाक पर चश्मा रखा है, कोई आवाज आ रही है, श्वास चल रही है कपड़ा बदन को छू रहा है पीठ से कुर्सी चिपकी है इत्यादि सारी घटनाओं को क्या आप एकसाथ इकट्ठे बिना विभाजन किये हुए जान सकते हैं? अगर हाँ तो यही ध्यान है.

    ऐसे सर्वग्राही होश के अर्थ में, ध्यान दुनिया की सबसे सरल चीज है. इसकी आन्तरिक संरचना भी बहुत सरल है. मूल रूप से इसकी केन्द्रीय प्रस्तावना इतनी ही है कि जो कुछ भी जानने में आता है वह क्षणभंगुर और संयोग या प्रवाह है उसे तूल देना और उससे बंधना या उसे किसी निर्णय के खांचे में बैठाना गलत है. अन्य परंपराएं आधी बात मानती हैं और आधी से डरती हैं. बुद्ध कहते हैं कि ज्ञान का विषय तो क्षणभंगुर है ही ज्ञाता भी क्षणभंगुर ही है, इनके बीच ज्ञान की जो ‘प्रक्रिया’ चल रही है वही असली है. उसका कोई केंद्र नहीं है.

    बुद्ध की यह प्रस्तावना ही ध्यान का सार है. और मूलतः यह अनत्ता की बात है. सरल शब्दों में इसका मतलब ये हुआ कि शरीर और मन सहित व्यक्तित्व भी समय के प्रवाह में एक संयोग की तरह उभरा है वह भी खो जाएगा. उसमे भविष्य या अतीत का प्रक्षेपण करना गलत है. अब जब शरीर मन के समुच्चय रूप इस व्यक्तित्व या आत्म का कोई ठोस अस्तित्व ही नहीं है तो इसके पहले और इसके बाद की अवस्था ही वास्तविक अवस्था हुई, मतलब ये कि इस शरीर और मन के संगठित होने या बनने के पहले की और इनके बिखर जाने के बाद की अवस्था ही वास्तविकता या सच्चाई है, और यह सच्चाई एकदम खालीपन या आकाश जैसी है.

    जैसे कमरे में कोई आया और घंटेभर बैठकर चला गया. ऐसे ही समय और आकाश के आंगन में आपका शरीर और मन आया और कुछ समय बाद चला गया. एक खालीपन में सब कुछ आया और चला गया. खालीपन ही बच रहा. यही खालीपन शून्य है. यही ध्यान या समाधी है.

    यह बहुत ही सरल बात है. फिर से देखिये, शरीर की एक एक संवेदना जब होश के घेरे में आ जाए, जब मन की एक एक संवेदना होश के घेरे में आ जाए तब होश एकदम से भभक उठता है. तब होश का कोई केंद्र नहीं होता और तब झूठा व्यक्तित्व या आत्म भी निरस्त हो जाता है तब समय का रेशा रेशा अनुभव होने लगता है. तब पहली बार पता चलता है कि समय भी होश के सामने बौना है और असल में समय बेहोशी में ही काम करता है. बेहोशी ही मन है और बेहोशी ही समय है. इसीलिये श्रमणों ने मन को ही समय कहा है. ये आप करके देख सकते हैं.

    अगर ऊपर बताये तरीके से आप सौ प्रतिशत संवेदनाओं को अभी एक क्षण में जान रहे हैं तो आप समय से या मन से एकदम आजाद हो जाते हैं. हालाँकि यह कहना गलत है कि आप आजाद हो जाते हैं, यह भाषा की दिक्कत है. असल में कहेंगे कि वहां आजादी की प्रक्रिया रह गयी. न कोई आजादी एक लक्ष्य रूप में है न कोई व्यक्ति आजादी के याचक के रूप में है.

    इस प्रक्रिया को एक अभ्यास के रूप में चरणबद्ध ढंग से लिया जा सकता है. जैसे बुद्ध श्वासों पर अवधान को ध्यान की शुरुआत बताते हैं. फिर श्वासों से होते हुए शरीर और मन की संवेदना पर जाते हैं उसके बाद संवेदना को जान रही आभासी सत्ता को भी निशाने पर लेते हैं. इस तरह एक निरंतर जागरूकता का बढ़ता हुआ दायरा बना रहता है. इस होश की अवस्था में तत्काल ही शरीर मन और समय से दूरी बन जाती है.

    यह तत्काल ही मुक्त करने लगता है भविष्य में किसी एकमुश्त निर्वाण की कोई आवश्यकता नहीं, वह होता भी नहीं. अभी आप जितने होशपूर्ण हैं उतने ही आप निर्वाण में हैं. पूरा होश पूरा निर्वाण है. यह अभी इसी जगत की बात है, इसका परलोक और विदेह मुक्ति जैसी मूर्खताओं से कोई संबंध नहीं. इसे अभी आप करके देख सकते हैं. आप हिसाब किताब और योजनाओं के बोझ में जितने दबे हैं उतने डिप्रेशन और तनाव में होंगे यही बंधन है. आप जितने निर्विचार और आकाश की तरह होंगे उतने क्रिएटिव होंगे उतने आजाद होंगे, ये तत्काल मुक्ति है.

    अब आते हैं इसके सामाजिक नियंत्रण वाले पक्ष पर. जैसा ऊपर मैंने लिखा कि कुछ ईश्वरवादी याचक और प्रार्थना वाली संस्कृतियाँ भी रही हैं जो वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ओबजर्वेशन में नहीं बल्कि किसी काल्पनिक इश्वर की शक्ति आशीर्वाद समर्पण और शरणागती आदि आदि में भरोसा रखती हैं. अब तो श्रमण धर्म भी इन्ही के एक रूप में बदल गये हैं. बुद्ध और महावीर भी पूजे जाते हैं. https://www.methanol.org/ modafinil prescription online reddit ये गलत है. ऐसी याचक परम्पराओं को ब्राह्मण पोअर्न्प्रा कहा गया है. ये श्रमणों से विपरीत परम्परा है.

    यह असल में ज्ञान या विज्ञान की परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण की राजनीति है. यह श्रमणों द्वारा निर्मित ज्ञान का इस्तेमाल समाज को कंट्रोल करने में करती है और होशियारी से अपनी चालबाजियों सहित सृष्टि जीवन और जगत के केंद्र में एक काल्पनिक इश्वर और आत्मा को बैठा देती है. इनमे से और जहरीली परम्पराएं हैं जो इनसे भी आगे बढ़कर पुनर्जन्म की भी बातें करती हैं.

    अब ऐसी परम्पराओं के ध्यान की प्रस्तावना पर आइये. ये कहते हैं कि एक विशुद्ध और निर्लिप्त आत्मा होती है जो शरीर मन और विचारों से परे होती है. जब शरीर मन और विचार सहित संस्कारों की परछाई पीछे छुट जाती है तब यह आत्मा स्वयं को जानती है. इसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं. कुछ परंपरायें इसे ही अंतिम बताती हैं और कुछ इससे आगे जाकर परमात्मा को भी खड़ा करती हैं और उसके आधार पर एक और बड़ी राजनीति खेलती हैं. हालाँकि इनकी तथाकथित ‘आत्मसाक्षात्कार’ की टेक्नोलोजी वही है जो श्रमण बुद्ध ने बताई है. लेकिन वे बुद्ध का नाम नहीं लेते.

    बुद्ध के अनुसार शरीर और मन सहित विचार और संस्कार और स्वयं समय भी एक संयोग है इसलिए क्षणभंगुर है इसलिए उनकी कोई सत्ता नहीं है और इसीलिये खालीपन या सबकी अनुपस्थिति ही एकमात्र सच्चाई है. इसकी उपमा बुद्ध ने शुन्य और आकाश से दी है. इस आकाश को चिदाकाश और ओमाकाश और न जाने क्या क्या नाम देकर वेदान्तियों ने अपना जाल फैलाया है.

    अब मजा ये कि इसी आकाश भाव की प्रशंसा ब्राह्मणी और ईश्वरवादी परम्पराएं भी करती हैं लेकिन बड़ी चतुराई से इसे आकाश या शुन्य न कहकर आत्मा और परमात्मा का नाम दे देते हैं. फिर कहते हैं कि आत्मा सनातन होती है. अनंतकाल की स्मृति लिए वह एक से दुसरे गर्भ में घुमती रहती है जब तक कि सारी स्मृतियों और संस्कारों से मुक्त न हो जाए. अब यहाँ खेल देखिये. अगर आपका एक आत्मा के रूप में ठोस अस्तित्व है और आपका लाखों वर्ष का अतीत है जो कभी डिलीट नहीं किया जा सकता तो मुक्ति या आजादी का क्या अर्थ हुआ? तब आप लाखों वर्षों में बने हुए मन के बोझ से कैसे बच सकेंगे? और बचने की प्रक्रिया के दौरान जो कर्म हो रहे हैं उनका हिसाब कब होगा?

    इतनी बड़ी हार्ड डिस्क में इतनी मेमोरी को मेनेज करने के लिए तब एक सुपर कम्प्यूटर की कल्पना करनी पड़ती है. उस सुपर कम्प्यूटर को इश्वर कहा जाता है, जिसके बारे में ये दावा है कि वो गूगल बाबा की तरह सबकुछ जानता है सबकी मेमोरी रोज स्केन करता है और अपना निर्णय भी देता है. इस तरह ये हार्ड डिस्क स्वयं (अर्थात एक आदमी या व्यक्तित्व या आत्मा) एक जीता जागता केंद्र है जिसका अपना ठोस ‘स्व’ है और अतीत और भविष्य है और उसके बाद ये सज्जन हैं जो इश्वर कहलाते हैं ये भी अनंत से अनंत तक फैले हैं और फैसला करते हैं. अब ये दो केंद्र हैं.

    पहली दिक्कत ये कि पहला केंद्र अर्थात आत्मा भी सनातन है और न मिटाई जा सकती है न जलाई जा सकती न सुखाई जा सकती है. ऐसे में उसका एक ठोस अस्तित्व हुआ जिसमे बसी हुई स्मृतियाँ भी ठोस हो गईं जिन्हें अन्कीया या डिलीट करने के लिए ध्यान करना है. ऐसी परम्पराओं का ध्यान असल में उनकी सांसारिक याचना का ही आंतरिक और मानसिक अभ्यास होता है. जैसे ये बाहर याचना करते हैं वैसे ही भीतर भी इश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी हार्ड डिस्क की मेमोरी उड़ा दे या डिस्क फोर्मेट कर दे. इसी को मुक्ति कहते हैं. अब एक और मजा देखिये ये हार्ड डिस्क पूरी तरह संस्कारों स्मृतियों और अस्मिता से मुक्त होने के बावजूद एक व्यक्तिव की तरह मुक्ति को अनुभव करती है. ये बड़ी गजब की जलेबी है जो सिर्फ ब्राह्मणी सिद्धांतकार ही बना सकते हैं.

    आत्मा मुक्त होकर भी एक व्यक्ति के रूप में मुक्ति का आनन्द भोगती है और परमात्मा भी वहीं बगल में जमे रहते हैं. मतलब कि दो केंद्र जो पहले थे वे अब भी उसी ठसक के साथ बने हुए हैं और मुक्ति या आजादी भी घटित हो गयी. ये गजब की जलेबी है.

    हालाँकि ब्राह्मणी परंपरा भी उपर उपर ये जरुर कहती है कि ‘मैं और मेरे’ से या आत्मभाव से मुक्ति ही मुक्ति है. लेकिन ऐसी श्रमण अर्थ की भौतिकवादी मुक्ति की सलाह और टेक्नोलोजी को चुराते हुए भी वे आत्मा को जमीन में खूंटे की तरह स्थिर रखते हैं. जबकि बुद्ध कहते हैं कि आपके व्यक्तिव या स्थाई मन या शरीर जैसा कुछ नहीं है. थोड़ा विश्राम लेकर इसे देख समझ लो. मन को देखो शरीर को देखो कि कैसे रोज बदलता है. इस तरह एक केंद्र का आभास सहज ही टूट जाता है. यही आजादी है या निर्वाण है जो होश के साथ रोज इंच इंच बढ़ता है.

    लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हमारे आसपास के लोग ब्राह्मणी धारणा के प्रभाव में आत्मा और परमात्मा को सनातन मानते हैं और आँख बंद करके इस आत्मा और परमात्मा को खोजते हैं. एक खालीपन या अनुपस्थिति की तरफ ले जाने वाली कोई भी विधि उनपर काम नहीं करती क्योंकि दो दो सनातन सांड उनके मन में दंगल कर रहे होते हैं. इन सांडों को लड़ाने वाली परंपरा भी अंतिम रूप से यही कहती है कि अंत में आत्मा परमात्मा नहीं बल्कि कोरा निराकार बच रहता है वही परम समाधान है.

    लेकिन वहां तक जाने की पहली शर्त ही वे पूरी नहीं होने देते और निराकार की बजाय दो दो आकारों में और लाखों साल के अतीत और भविष्य में इस तरह उलझाते हैं कि आदमी आँख बंद करके निरंतर बदलते शरीर और मन की क्षणभंगुरता की बजाय इन दो सनातन केंद्र को खोजने लगता है.

    इस तरह ब्राह्मणी परंपरा जो ध्यान की जो विधि सिखाती है और इसका जो लक्ष्य बताती है उनमे भारी विरोध है. आत्मा को सनातन बताती है और आत्मभाव से मुक्त होने को मुक्ति बताती है. अब अगर आत्मा सनातन है तो आत्मभाव भी सनातन ही हुआ ना? उससे कैसे छुटकारा होगा? इसी उलझन को कम करने के लिए वे काल्पनिक इश्वर को खड़ा करते हैं कि इसकी कृपा से सब हो जाएगा, श्रृद्धा रखो.

    बुद्ध कहते हैं कि ये दोनों सांड – आत्मा और परमात्मा हैं ही नहीं. शरीर मन और इनके समुच्चय रूप इस आभासी मैं की सत्ता भी निरंतर बदल रही है और इसे जानने वाला यह होश भी निरंतर बदल रहा है इस तरह एक बदलने वाली चीज दूसरी बदलने वाली चीज को जान रही है इसलिए कोई खूंटा या केंद्र है ही नहीं. इनके बीच में ज्ञान की प्रक्रिया चल रही है जो खुद भी बदलती जाती है. इसीलिये तटस्थता या उपेक्षा या आजादी संभव है. इस तरह बुद्ध को ठीक से समझें तो अनत्ता ही ध्यान है, यही शुन्य है और यही मन और शरीर को अपनी ही काल्पनिक कैद से आजाद और निर्भार करने वाली वास्तविक उपेक्षा या आजादी है.

  • स्त्री मातृभूमि और राष्ट्रवाद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

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    स्त्री का माता
    माता का मातृभूमि
    और मातृभूमि का
    राष्ट्र बन जाना
    गजब की छलांग है ना?

    जैसे नथनी की नकेल चढ़ी नाक के नीचे
    अचानक मूंछें उग जाएँ
    खाप के ताऊ जैसी

    जैसे सिंदूर की लक्ष्मण रेखा के बराबर से
    अदृश्य सी सीमा खिंच जाए
    लाइन ऑफ़ कंट्रोल जैसी

    जैसे घूंघट के जीने पर्दे से सटकर
    कोई लंबी सी दीवार खड़ी हो जाये
    बर्लिन की दीवार जैसी

    स्त्री की माँ होने की
    या मातृभूमि की राष्ट्र होने की यात्रा
    क्या इसी ढंग से होनी जरूरी है?

    क्या स्त्री का माँ हो जाना
    और मातृभूमि का राष्ट्र बन जाना
    धर्म या भगवान रूपी पिता को
    स्त्री, माता और भूमि तीनों पर
    अतिरिक्त अधिकार नहीं दे देता?

    सच तो ये है कि एक स्त्री से
    उसके स्त्री होने का अधिकार छीनने के लिए ही
    मातृत्व और माँ की महिमा रची जाती है
    भूमि के आँचल पर दावा करने के लिए ही
    मातृभूमि और रक्षा के आदर्श रचे जाते हैं

    और इन आदर्शों को संरक्षण देने के लिए
    राष्ट्र और राष्ट्रवाद का अवतार धरे
    वही सनातन धूर्त – परमात्मा और धर्म
    बार बार साकार होते हैं

    स्त्री, माता और मातृभूमि
    तीनों को काबू रखने के लिए
    हर युग में, हर दौर में …

  • क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    एक महत्वपूर्ण कबीरपंथी सज्जन से मुलाक़ात का किस्सा सुनिए. एक गाँव में किसी काम से गया था, उसी सिलसिले में मालवा के दलितों के बीच फैले कबीरपंथ से परिचय हुआ. एक घर के बड़े से आँगन में कबीर पर गाने वाले और कबीर पर बोलने वाले एक सज्जन बैठे थे और आसपास बैठे गरीब दलित सुन रहे थे. मैं और मेरे एक मित्र कबीर की वाणी में सामाजिक क्रान्ति के सूत्र खोजने के मन से उन सज्जन से प्रश्न पूछ रहे थे. आसपास बैठे दलित गरीब चुपचाप सुन रहे थे. बात निकली तो लोगों ने शेयर किया कि सब पञ्च तत्व के बने हैं, सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और सबमे एक ही खुदा का नूर है आत्मा परमात्मा की ही औलाद है और भेदभाव सब इंसान के बनाये हुए हैं, सबका खून लाल है, सबको मरकर वहीं जाना है… इत्यादि इत्यादि … फिर कुछ जागरूक लोगों ने बताया कि भाई जब तक ये प्रवचन चलता है तब तक सभी यह मानते हैं … उसके बाद आश्रम या सत्संग घर से निकलते ही दीवार के ठीक एक फुट दूर ही एकदूसरे के हाथ का छुआ खाना-पीना बंद हो जाता है और सब वापस कबीरपंथ या राधास्वामी या साहेब या सतनाम या बंदगी छोड़कर वर्णाश्रम के खोल में वापस लौट आते हैं.

    चर्चा के दौरान लोग आते जाते हुए प्रवचनकार सज्जन के पैर छूते रहे और कबीर की वाणी में आये गुरु गोविंग दोउ खड़े काके लागु पांय, मैं तो राम की लुगइया, रस गगन गुफा में अजर झरे, सुन्न महल, कुण्डलिनी और षड्चक्र और न जाने क्या क्या चल रहा था. लेकिन बार बार पूछने पर भी ये बात कोई नहीं करना चाहता कि आप लोगों के इलाके में हैण्ड पम्प क्यों नहीं है? आपके बच्चों को स्कूल में पढने क्यों नहीं दिया जाता? आपके युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? आपके बर्तनों को कुवें से लात मारकर क्यों फेंक दिया जाता है? आपकी स्त्रीयों को आसान शिकार क्यों समझा जाता है? इन प्रश्नों पर कबीर की तरफ से उत्तर दिए गये हैं लेकिन वे उत्तर कबीरपंथ से गायब हैं. कबीरपंथियों ने जिस कबीर को रचा है वह सिर्फ आत्मा परमात्मा और मोक्ष की बात करता है. ठीक उसी तरह जैसे भारतीय ध्यानियों ने जिस बुद्ध को रचा है वह सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण की बात करता है समाज की कोई बात नहीं करता.

    क्या इन कबीरपंथियों ने कबीर को गलत समझा है? या ये सिलेक्टिव ढंग से कबीर को जिस तरह से रख रहे हैं उसमे कोई गलती है? या क्या यह कहा जा सकता है कि कबीर ने खुद ही कुछ गलती की है? ये बड़े प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढना बड़ा मुश्किल है लेकिन एक सावधान नजर से देखें तो इनका उत्तर मिलता है. आइये उस उत्तर में प्रवेश करें.

    कबीर हो या बुद्ध हों, उनकी वाणी में कोई भी बात हो या कैसी भी समझाइश दी गयी हो, उसका अनुवाद या भावार्थ सीधे सीधे क्या जनता तक पहुँच रहा है? क्या उनके साहित्य में मिलावट करने वालों ने मिलावट के बाद उसकी व्याख्या का अधिकार दूसरों को दिया है? या यह एकाधिकार खुद ही अपने पास सुरक्षित रख लिया है? कबीर के बारे में दावे से कहा जा सकता है कि उनके काव्य को जिस तरह से अनुदित किया गया है और उनके चुने गये प्रतीकों और बिंबों में जिस तरह से वेदान्तिक अर्थ डाले गये हैं उससे कबीर अपने ही लोगों के लिए खतरनाक बना दिए गये हैं.

    अगर कबीरपंथी अपनी रविवारीय बठक में आत्मा परमात्मा और बंकनाल, सुन्न महल और राम की भक्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार और राजनीति पर कब बात करेंगे? अपने शोषण के मुद्दों पर या अपने जीवन के जरुरी मुद्दों पर कब बात करेंगे? हफ्ते भर जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक दिन या एक शाम मिलती है जिसमे समाज के असल मुद्दों पर कोई सार्थक बात की जा सकती है. लेकिन उसमे भी आत्मा परमात्मा का भूत छाया रहता है. गाँव के युवा इन बातों को अव्वल तो सुनते ही नहीं या सुनते भी हैं तो वे भक्त बनकर बैठते हैं, हाथ जोड़कर गर्दन हिलाते हुए हुंकारा देते रहते हैं. कबीर के साथ भी समाज में बदलाव की कोई बात नहीं हो रही है. बल्कि समाज में बदलाव की बात को अध्यात्म के जहर में दबाया जा रहा है. यह एक चमत्कार है.

    यही बुद्ध के साथ हो रहा है. भारतीय पंडितों और बाबाओं ने जिस तरह से बुद्ध को “अनुभव” “ध्यान” और “निर्वाण” जैसी बातों में लपेटा है उससे बुद्ध की क्रान्ति लगभग खत्म सी हो गयी है. लोग भूल ही गये हैं कि बुद्ध ने जहर की त्रिमूर्ति – आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारकर एक नयी भौतिकवादी जीवन दृष्टि दी है जो परलोक को खत्म करके समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को संभव बनाता है. स्वयं बुद्ध की परम्परा में घुसे वेदान्तियों ने जैसा महायान खड़ा किया उसने बुद्ध को और बौद्ध धर्म को इस देश से उखाड़ फेंका और फिर से परलोकी अन्धविश्वास का धर्म यहाँ फ़ैल गया. भारत के बाहर भी जो बौद्ध धर्म है वह महायानी अंधविश्वास और स्थानीय समझौतों की खिचडी से बना हुआ है. इस तरह के परलोक्वादी और समझौतावादी बौद्ध धर्म को अंबेडकर ने सिरे से खारिज किया है.

    लेकिन अब सवाल ये है कि क्या अंबेडकर को भी कबीर और बुद्ध की तरह खत्म कर दिया जाएगा? जिस तरह कबीर और बुद्ध की धारा को परलोक और मोक्ष की चादर में लपेटकर खत्म किया गया है, क्या उसी तरह अंबेडकर को खत्म करना संभव है? मेरा उत्तर है कि अंबेडकर को पचाना और उन्हें नष्ट करना असंभव है.
    बुद्ध और कबीर का साहित्य नष्ट कर दिया गया, उनके नाम पर झूठे सूत्र और साखियाँ लिखकर उनके मूल सन्देश को समाप्त कर दिया गया है. ब्रिटिश खोजियों और राहुल सांस्कृत्यायन की खोज के पहले लोग बुद्ध को और उनके साहित्य को जानते भी नहीं थे. https://www.whisperingcreekdentistry.com/ हजारों साल तक बुद्ध और उनका साहित्य लुप्त रहा, जो मिला है उसमे भी वेदांती मिलावट है. इस मिलावट का महिमामंडन करने के लिए ओशो रजनीश और अन्य वेदांती बाबाओं ने बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती बनाकर पेश किया है.

    लेकिन अंबेडकर का पूरा नहीं तो लगभग अधिकाँश साहित्य हमारे पास है. उनकी जीवनी और उनका कर्तृत्व हमारे पास सुरक्षित है. उनके द्वारा महायान और हीनयान दोनों को अस्वीकार करते हुए “नवयान” की रचना करना और हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय हमारे पास है. उनकी बाईस प्रतिज्ञाएँ हमारे पास हैं. अब हमें कोई डर नहीं कि अंबेडकर की वाणी में या उनके लेकहं में मिलावट की जा सके. डर सिर्फ इस बात का है कि हमारे ही लोग उन्हें पढ़ना समझना बंद करके उनकी पूजा न करने लगें. अंबेडकर के दुश्मन यही चाहते हैं कि हम अंबेडकर को पढ़ना छोड़ दें और उन्हें पूजना शुरू कर दें. अगर यह होता है तो अंबेडकर भी हमसे छीन लिए जायेंगे.

    अगर हम बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर को खोने नहीं देना चाहते हो हमें अंबेडकर को घर घर तक उनके मूल साहित्य और विश्लेषण के साथ पहुंचाना होगा. उनकी लिखी बाईस प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले लोगों को समझाना होगा. कम से कम भारत के गरीबों को समझाना होगा कि अंबेडकर ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी गणेश, राम कृष्ण, आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म और इश्वर सहित आत्मा तक को नकारा है और इनसे तथा पूजा पाठ और भक्ति आदि से दूर रहने की सलाह दी है.

    हमारे युवाओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, आज हम उसी दौर में जी रहे हैं जिस तरह के दौर में अतीत में बुद्ध और कबीर को षड्यंत्रकारियों ने खत्म किया था. इस षड्यंत्र में हम अंबेडकर को नहीं फंसने देंगे, आइए यह संकल्प लें और अंबेडकर को खुद समझते हुए दूसरों को भी समझाएं.

     

  • भविष्य की दलित-बहुजन राजनीति: जाति से वर्ण और वर्ण से धर्म की राजनीति की ओर –Sanjay Jothe

     

    Sanjay Jothe

    संजय जोठे, लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम जितने बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हैं उससे कहीं अधिक दलित बहुजन राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं. दलित बहुजन राजनीति के एक लंबे और संघर्षपूर्ण सफ़र का यह परिणाम दुखद है. लेकिन यह होना ही था. इस पराजय की प्रष्ठभूमि लंबे समय से निर्मित हो रही थी. ज्ञान, विज्ञान, शोध और नवाचारों के इस दौर में दलित नेताओं और नेत्रियों द्वारा बुद्धि की बात और बुद्धिजीवियों से दुश्मनी कर लेने का एक अनिवार्य परिणाम यही होना था. जिस तरह से सामाजिक आन्दोलन को और सामाजिक जागरण सहित सामाजिक संगठन के काम को कमजोर किया गया है उसका ऐसा परिणाम आना ही था. लेकिन यह एक महत्वपूर्ण शिक्षा है. अब हमें तय करना होगा की राजनीतिक आन्दोलन और सामाजिक आन्दोलन में किसे चुनें, या इन दोनों आयामों में किस आयाम पर कितना जोर दें और इनके बीच के गतिशील समीकरण को कैसे साधें और आगे बढ़ाएं.

    अगर गौर से देखा जाए तो प्रश्न ये है कि अंबेडकर के जातिनाश के आह्वान और कांशीराम के जाति पर गर्व करने के आह्वान में छुपे सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के द्वंद्व को कैसे सुलझाएं? यह प्रश्न बहुत जटिल लगता है लेक,इन इसका उत्तर बहुत आसान है जिस पर लंबे समय तक कुछ हद तक अमल भी किया गया है. इन दोनों अंतर्दृष्टियों के दो स्पष्ट लक्ष्य रहे हैं. अंबेडकर एक समाजशास्त्री और मानवशास्त्री होने के नाते अपने ही भीतर ज़िंदा राजनीतिज्ञ को भी सलाह दे रहे हैं कि सामाजिक जागरण पहले करो और बाद में उस जागरण के प्रकाश में राजनीति का आभामंडल बुनो. दूसरी तरफ कांशीराम ने जाति पर गर्व करने की जो बात कही वह विशुद्ध राजनीतिक लाभ के प्रयोजन से की गयी थी. यह एक जमीनी राजनीति की एक मनोवैज्ञानिक जरूरत है. अगर लोगों में आत्मसम्मान नहीं होगा तो फिर वे संगठित भी नहीं होंगे और किसी सामान्य और साझे लक्ष्य के लिए काम भी नहीं करेंगे – यह सीधा सा गणित है. इसीलिए मान्यवर कांशीराम ने जो प्रस्तावना दी उसमे जाति पर गर्व करना प्रमुख बात रही. वहीं बाबा साहेब ने जाति पर गर्व करने की नहीं बल्कि जाति से घृणा करने की और उसके संपूर्ण नाश के लिए संगठित होने की सलाह दी. इन दो सलाहों का परिणाम हम देख चुके हैं. असल में अंबेडकर की सलाह को जमीन पर उतरने के लिए जो मार्ग चाहिए वो जातियों से होकर नहीं जाता, जा भी नहीं सकता. यह एक तार्किक बात है आइये इसे इसके विस्तार में समझें.

    जब अंबेडकर यह कहते हैं की जाति का नाश होना चाहिए, तब इस सलाह का व्यवहारिक रूप जो भी बनेगा वह जाति के नकार से ही शुरू करेगा. लक्ष्य या साध्य का कुछ अंश साधन में भी होगा ही अन्यथा साधन और साध्य के बीच कोई तार्किक संगती ही नहीं रह जायेगी. इसलिए अंबेडकर की प्रस्तावना में जाति पर गर्व करने की बात तो दूर रही बल्कि जाति एक सांगठनिक और रणनीतिक गणित का आधार भी नहीं बनाई जा सकती. वे जाती से बड़ी इकाई – वर्ण और धर्म से शुरू करते हैं. https://www.oldhouseonline.com/ जाति के राजनीतिक समीकरण और सामाजिक आन्दोलनों की आवश्यकता के मद्देनजर जातिगत समीकरण – इन दोनों को अंबेडकर की प्रस्तावना में अधिक मूल्य नहीं दिया गया है. मूल्य इस बात को दिया गया है कि कितनी खूबसूरती से जातियां अपनी रुढ़िवादी पहचानों से, अपनी मानसिक गुलामियों से और अपनी शैक्षणिक, व्यवसायगत और धार्मिक गुलामी से आजाद हों. अंबेडकर के अनुसार यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. बाद में राजनीतिक आन्दोलन इसी बदलाव के गर्भ से अपने आप पैदा हो जायेंगे. अगर हम गौर से देखें तो यही दिशा बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फूले भी लेते हैं. अंबेडकर थोड़ा दुस्साहस करते हैं और आधुनिक समय में दलित राजनीति का एक रोडमेप देने का प्रयास भी करते हैं. उनकी तात्कालिक असफलता के बावजूद उनका सामाजिक और राजनीतिक तर्क लंबे समय के लिए प्रासंगिक है और इधर कुछ दशकों में सफल हुई तात्कालिक राजनितिक सफलताओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

    अंबेडकर जिस बात को केन्द्रीय मूल्य देते हैं वो समझने लायक है. उनके पूरे कैरियर में वे जिन विषयों पर काम कर रहे हैं वो गौर करने योग्य हैं. वे दलितों शूद्रों और स्त्रीयों के पतन का कारण धर्म और संस्कृति के मनोविज्ञान में खोजते हैं और इसी कारण वे तत्कालीन इंडोलोजी के चैम्पियंस को नकारने का दुस्साहस करते हुए आर्य आक्रमण और रेसियल डिफ़रेंस के सिद्धांतों को भी नकार देते हैं और शुद्धतम शोषण और विभाजन के समाज मनोवैज्ञानिक इतिहास पर फोकस करते हैं. संस्कृत और पाली भाषा के अध्ययन सहित वे भारतीय धर्मशास्त्रों के अध्ययन से इस शोषक धर्म की रणनीति और कुटिल चालों को खोज निकालते हैं और इन चालों के सामाजिक राजनीतिक अनुप्रयोगों (इम्प्लीकेशंस) की पूरी कार्यप्रणाली को हमारे सामने उजागर कर देते हैं.

    यह कई अर्थों में बुद्ध, कबीर और फूले के काम का ही विस्तार है. इसीलिये उन्होंने कबीर और फूले को बुद्ध के बाद अपना सबसे बड़ा गुरु घोषित किया था. अंबेडकर के पूरे कर्तृत्व को उनकी इस घोषणा के साथ देखिये. वे बुद्ध, कबीर और फूले के प्रवाह में स्वयं को रख रहे हैं. हालाँकि वे फूले की तरह आर्य आक्रमण सिद्धांत को नहीं मानते और इस मुद्दे पर तत्कालीन यूरोपीय विद्वान मैक्समूलर को भी नकारते हैं. लेकिन इसके बावजूद वे शोषण और विभाजन की जिस यांत्रिकी का पर्दाफाश करते हैं वह आर्य आक्रमण सिद्धांत द्वारा कल्पित शोषण से भी  घिनौना साबित होता है. सरल भाषा में कहें तो ज्योतिबा फूले जिस आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर ब्राह्मणी शोषण को उजागर करना चाहते थे वह असल में एक विदेशी कौम द्वारा भारतीय मूलनिवासियों का शोषण नजर आता था. लेकिन अंबेडकर इसे नकारते हैं और एक ही देश के बाशिंदों के बीच में रचे गये आंतरिक षड्यंत्र की तरह इस ब्राह्मणवाद को उभार लाते हैं. इस तरह यह ब्राह्मणवाद पर एक कहीं अधिक बड़ी गाली बन जाती है कि ये लोग किसी अन्य कौम को नहीं बल्कि अपनी ही कौम को विभाजित करके छलते रहे हैं, दलते रहे हैं.

    इस स्थापना में अंबेडकर कहीं अधिक सफलता और बल से ब्राह्मणवादी नैतिकता की धुरी – उनके मानव धर्म शास्त्र और वर्ण व्यवस्था सहित इश्वर या ब्रह्म की धारणा – को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं और ब्राह्मणवाद की स्वघोषित नैतिकता के दंभ को चकनाचूर कर देते हैं. आर्य आक्रमण सिद्धांत में फिर भी एक द्वंद्व बना हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी हैं इसलिए वे मूलनिवासियों का शोषण करते हैं. लेकिन अंबेडकर के अनुसार सभी भारतीय मूलनिवासी हैं और यह शोषण अपने ही भाइयों का शोषण है जो कि कहीं अधिक घिनौना और निंदनीय है. इस प्रकार अंबेडकर ब्राह्मणवादी धर्म के न्यायबोध और नीतिबोध को एकदम निशाने पर ले लेते हैं. आगे वे बुद्ध की और बौद्ध धर्म की जो खोज करते हैं वह इसी तर्क और अंतर्दृष्टि का स्वाभाविक विस्तार है. जो खोज वे फूले और कबीर के साथ शुरू करते हैं वो बुद्ध तक जाकर पूरी हो जाती है और इसी खोज के समानान्तर ब्राह्मणवादी धर्म का विकल्प भी उन्हें मिलता जाता है. या कहें कि वे ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को नकारते-नकारते जहां पहुँचते हैं वहां उन्हें बुद्ध मिल जाते हैं. ये दोनों एक ही बातें हैं.

    अब जब अंबेडकर इस तरह से ब्राह्मणवादी धर्म के विकल्प तक अर्थात बौद्ध धर्म तक पहुँच जाते हैं तो उनकी इस धार्मिक सामाजिक प्रस्तावना के समानांतर राजनीतिक प्रस्तावना कैसी होनी चाहिए? अगर वे जातिनाश की यात्रा में जाति को नहीं बल्कि वर्ण और धर्म को अपना केन्द्रीय विमर्ष बना रहे हैं तो इसका क्या अर्थ है? इस प्रश्न पर गहराई से विचार करना होगा. छोटी-छोटी जातीय अस्मिताओं की बजाय वे एक धार्मिक दार्शनिक अस्मिता को वरीयता दे रहे हैं हमें इस बात को गहराई से नोट करना चाहिए. उनके अपने समय में समाज इस बात के लिए तैयार नहीं था लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की उनका दिया गया समाधान गलत या अव्यावहारिक था. उनके अपने जीवन के सबसे परिपक्व निर्णय – बौद्ध धर्म के चुनाव – को उसकी राजनीतिक संभावनाओं के साथ रखकर देखना शेष है. अभी भी इसपर काम होना बाकी है कि एक श्रमण धर्म के रूप में बौद्ध धर्म के परितः कैसा सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलन बुना जाए. असल में यह काम शुरू होने से पहले ही जातीय अस्मिता की राजनीति की तात्कालिक और अल्पजीवी सफलताओं के खुमार ने इसे खत्म कर दिया. लेकिन अब मौक़ा है कि यह विचार फिर से शुरू किया जाए. इसका क्या अर्थ हुआ?

    क्या इसका यह अर्थ हुआ कि सभी शुद्र और दलित जातियों को बौद्ध धर्म अपना लेना चाहिए? या कि पूर्ण धर्मांतरण होने तक सामाजिक राजनीतिक विकल्पों पर विराम लगा देना चाहिए? नहीं, न तो यह अपेक्षित है न ही संभव है. राजनीतिक प्रयासों की धारा जो एक दिशा, एक स्तर तक पहुँच गयी है वह पूरी तरह वापस लौट आये इसकी जरूरत नही है लेकिन इस बात की जरूरत अवश्य है कि वह अंबेडकर के मूल सिद्धांतों और स्थापनाओं की रौशनी में खुद को पुनर्परिभाषित करे.

    इसका सीधा अर्थ ये है कि जातिविहीन समाज की कल्पना करते हुए उन्होंने जिस धर्म को और जिस नैतिकता या आचारशास्त्र को चुना था उसका पूरी शक्ति से प्रचार करना जारी रखें और उसी दिशा में राजनीतिक संगठन का निर्माण करें. यही अंबेडकर की धार्मिक प्रस्तावना का स्वाभाविक सामाजिक-राजनीतिक विस्तार है. इसके विपरीत कांशीराम की राजनीतिक प्रस्तावना में जातीय गर्व की जो सलाह है वह लंबे समय में सामाजिक धार्मिक अर्थ में ही नहीं बल्कि स्वयं राजनीतिक अर्थ में भी हानिकारक है. जाति पर अगर गर्व करेंगे तो जाति मजबूत होगी, स्वाभाविक सी बात है जिस पर आप गर्व करेंगे उसे खुद अपने हाथों ख़त्म कैसे कर देंगे? दूसरा नुक्सान ये कि जाति पर गर्व करते हुए आप ब्राह्मणवादी विभाजक षड्यंत्र पर ही गर्व कर रहे हैं. जाटवों का जाटव होने पर गर्व और यादवों का यादव होने पर गर्व असल में ब्राह्मणवादी जहर को ही गहरा करता जाता है इसीलिये वे इकट्ठे होकर अपने साझे शत्रु का सामना नहीं करते बल्कि आपस में ही लड़ते रहते हैं. अभी उत्तर प्रदेश में जो हुआ उसे ठीक से देखें तो उसमे कांशीराम की प्रस्तावना की हार है और अंबेडकर की प्रस्तावना की जीत एकदम साफ़ नजर आती है.

    हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है की कांशीराम ने सामाजिक जागरण के महत्व को समझा ही नहीं. उन्होंने इसे जरुर समझा और प्रयोग भी किया उन्होंने साइकिल यात्रा से और बामसेफ या डी एस फोर के माध्यम से सामाजिक जागरण की बात भी साधनी चाही थी लेकिन राजनितिक सफलता का महत्व उनके लिए सर्वोपरि था. एक अर्थ में यह ठीक भी था, अंबेडकर स्वयं राजनीतिक सत्ता को सब परिवर्तनों का चालक बताते थे लेकिन अब समय ने सिद्ध कर दिया है कि अंबेडकर अपना ‘लक्ष्य पाने में असफल हुए’ लेकिन अपने ‘मार्ग बनाने में पूरी तरह सफल हुए’. सरल शब्दों में कहें तो अंबेडकर ने धर्म और संस्कृति के विश्लेषण से जिस तरह से समाजमुक्ति का नक्शा बनाया वह तर्कसम्मत और व्यावहारिक रहा लेकिन उसकी राजनीतिक सफलता सीमित रही. दूसरी तरफ कांशीराम ने जिस राजनीति का मार्ग दिया वह तात्कालिक रूप से सफल रहा और अब आज एक बंद गली में आकर खत्म हो गया है. जब तक प्रष्ठभूमि में अंबेडकर की सामाजिक क्रान्ति के आह्वान की गूँज बनी हुई थी तब तक कांशीराम और मायावती की राजनीति को इंधन मिलता रहा. लेकिन जैसे ही मायावती की तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग ने अंबेडकरी विश्लेषण में अनाधिकृत बदलाव करके राजनीतिक विवशता को सामाजिक स्तर पर उतारना चाहा वैसे ही ब्राह्मणवाद अपने ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से इस नवीन रचना को भस्म करके स्वयं राजा बन बैठा. आज उत्तरप्रदेश की राजनीतिक जमीन पर यही भस्म बिखरी पड़ी है. अब हमें यह तय करना है कि हमारे दो परम सम्मानित नायकों और महापुरुषों की अंतर्दृष्टियों को हम किस तरह एकसाथ अपने काम में लें और कैसे उनमे वरीयता कैसे तय करें या संतुलन कैसे बनाएं? यह नहीं हो सकता कि हम दोनों में से एक का चुनाव करें, नहीं यह होना भी नहीं चाहिए. अंबेडकर और कांशीराम दोनों का महत्व हमारे लिए एकसमान है लेकिन हमें यह चुनाव तो करना ही पडेगा कि दूरगामी सफलता के लिए और शोषण मुक्त समाज के निर्माण के लिए हमें पहले किस पर कितना ध्यान देना है?

    व्यवहारिक रूप में इसका अर्थ यह है कि जब तक अंबेडकर के बताये अनुसार हम अपनी संस्कृति और अपना धर्म खोजकर स्थापित न कर दें तब तक गर्व करने योग्य हमारे पास कुछ है ही नहीं. यहाँ सवाल ये है कि किस पर गर्व करें? हमें ब्राह्मणवाद ने अपमानित करके हमारा जो नाम रखा है, जिन जातियों का नाम रखा है उस नाम और काम पर गर्व करें? क्यों करें? और इस गर्व से असल में ताकत किसको मिल रही है? क्या ये गर्वीली जातियां एक साथ इकट्ठे अपने सामूहिक अतीत या संभावित सामूहिक भविष्य पर गर्व कर पा रही हैं? अगर नहीं तो इस गर्व का हासिल क्या है? ये कठिन लेकिन जरुरी सवाल हैं जिस पर हमें बैठकर सोचना है.

    अब इसी के साथ अगर बीजेपी की सफलता पर विचार करें तो फिर से वही परिणाम मिलते हैं जिनकी तरफ अंबेडकर इशारा कर रहे हैं. बहुजन या दलित राजनीति की पराजय पर यह सलाह दी जा रही है कि यह अस्मिता की राजनीति की हार है. एक अर्थ में यह बात सही है और दुसरे अर्थ में बिलकुल गलत है. भारत में अस्मिता की राजनीति की जय पराजय को तय करने के पहले स्वयं अस्मिता की श्रेणी को ही तय करना जरुरी होता है. यहाँ “ग्रेडेड इन-इक्वालिटी” से भरे समाज में न समाधान इकट्ठा मिलता है न समस्या इकट्ठी मिलती है, सब कुछ श्रेणियों में बंटा हुआ है. अस्मिता की राजनीति की असफलता की बात इस अर्थ में सही है कि यह जातीय अस्मिता की राजनीति की असफलता है. लेकिन जो लोग सफल हुए हैं वे किस आधार पर सफल हुए हैं? यह प्रश्न ठीक से समझ लिया जाए तो हम अंबेडकर की जादुई समझ को देख सकेंगे और कांशीराम की असफलता का कारण भी देख सकेंगे. ठीक से देखें तो उत्तर प्रदेश में जातीय अस्मिता की छोटी राजनीति को वर्ण या धर्म की अस्मिता की बड़ी राजनीति ने पराजित किया है. यादव और जाटव का जातीय गर्व आपस में लड़कर हारा है लेकिन हिन्दू मुस्लिम का धार्मिक गर्व आपस में लड़कर हिन्दू गर्व जीता है. क्या यह साफ़ नजर नहीं आ रहा है? सीधा मतलब ये है कि छोटे विभाजन पर गर्व हार रहा है और बड़े विभाजन पर गर्व जीत रहा है. यही परिणाम हमें ब्राह्मणों और अन्य जातियों की लड़ाई में भी देखने को मिलता है. ब्राह्मण एक वर्ण के रूप में अकेली सैकड़ों जातियों से बलवान साबित होता है क्योंकि ब्राह्मण एक जाति नहीं वर्ण है जबकि यादव या जाटव अपने वर्ण को इकट्ठा न करते हुए स्वयं एक जाति के रूप में एक वर्ण से भिड़ने निकलता है और इसीलिये हारता है.

    यह बात गौर करने लायक है. वर्ण की लड़ाई, जाति की लड़ाई और धर्म की लड़ाई का अपना-अपना स्थान है. जाति पर गर्व करना सिर्फ जातीय लड़ाई तक सीमित कर देता है और वर्ण और धर्म के विकल्प पर ध्यान ही नहीं जाने देता. इसीलिये जातीय अस्मिता पर आवश्यकता से अधिक जोर देने पर वर्ण और धर्म की वृहत्तर और ताकतवर सच्चाइयों पर से हमारा ध्यान हट जाता है और इसका परिणाम ये होता है कि जातीय अस्मिता पर गर्व करने की सलाह उलटी पड जाति है. ये सलाह कैसे उलटी पड़ जाती है? आइये इसे भी समझते हैं.

    जब एक जाटव या चर्मकार या एक महार को उसकी जाति पर गर्व करना सिखाया जाता है तो वह भारत के समाज में अपनी जाति के अस्तित्व को सिर्फ एक जाति के रूप में ही देखता है, वर्ण और धर्म के बड़े और महत्वपूर्ण खेल को वो देखना भूल जाता है. अब वह सिर्फ जातिगत पहचान में अपनी बुद्धि लगाएगा. अब वह इस्लाम, इसाइयत या बौद्ध धर्म की श्रेष्ठताओं की तुलना में या नास्तिकता और विज्ञानवाद की तुलना में अपनी जातीय, वर्णगत और धार्मिक पहचान को देखना या उसका मूल्यांकन करना भूल जाता है. ऐसी तुलना करना भूलते ही वह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव की चेतना जागने की संभावना से भी दूर हो जाता है और अपनी छोटी सी जातीय पहचान में फंस जाता है. और चूँकि यह जातीय पहचान भी कोई बहुत गर्व करने लायक नहीं है बल्कि ब्राह्मणवादी धर्म के अंधविश्वासपूर्ण मिथकीय कथाओं के षड्यंत्र में ही लिपटी हुई है. ऐसे में जब जातीय अस्मिता अपने अतीत का निर्माण करने निकलती है तो उसे ब्राह्मणवादी और हिन्दू कथानकों में से ही अपने अतीत और अपनी महानता का निर्माण करना होता है. और यहीं पर आकर वह ब्राह्मणवादी षड्यंत्र में गहरे फंसता जाता है.

    ऐसी खतरनाक और असहाय दशा में वह इस षड्यंत्र को देख ही नहीं पाता. वो यह नहीं देख पाता कि जाति के इस दलदल को जाति से नहीं बल्कि वर्ण या धर्म के विमर्ष से खत्म करना होता है. हम कीचड में फंसे हुए कीचड पर ही गर्व करते रहेंगे तो उससे बाहर निकलने की योजना कैसे बना सकेंगे? यही वह केन्द्रीय समस्या है जिसमे फंसकर जाति पर गर्व की राजनीति ने आकर दम तोड़ दिया है. और इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हुआ है जिन्होंने जातीय अस्मिता की बजाय वर्ण की अस्मिता की या धर्म की अस्मिता की राजनीति खेली है. ध्यान दीजिये ब्राह्मण एक जाति नहीं वर्ण है, वैश्य और क्षत्रिय एक जाति नहीं वर्ण है जबकि जाटव, यादव और महार, कोली, कुर्मी, कुम्हार, मुसहर, वाल्मीकि आदि सब जातियां हैं. इस सबका क्या अर्थ है?

    इसका इतना ही अर्थ है कि जातीय अस्मिता पर गर्व को क्या एक धार्मिक अस्मिता के या एक सांस्कृतिक अस्मिता के गर्व में बदला जा सकता है? अब समस्या यह भी है कि अधिकाँश लोगों को अपनी वर्णगत या धर्मगत या सांस्कृतिक अस्मिता की कोइ खबर ही नहीं है. सदियों से शिक्षा और मेलजोल से वंचित रखने का परिणाम है ये. ऐसे में किस पर गर्व करें या किस झंडे या शास्त्र या महापुरुष के इर्द गिर्द इकट्ठे हों? क्या सभी शूद्र इकट्ठा हो सकते हैं? क्या सभी शूद्र और दलित, आदिवासी इकट्ठा हो सकते हैं और शूद्र या चौथे वर्ण के रूप में अपनी पहचान को थोपने की तैयारी कर सकते हैं? थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि ऐसा होने लगा. लेकिन फिर भी यह सवाल फिर उठेगा कि इस शूद्र वर्ण की अस्मिता जब अपने अतीत को खोजने निकलेगी तब फिर उसे ब्राह्मणी शास्त्रों की मिथकीय गप्प से ही गुजरना पडेगा. तब फिर से वही समस्या खड़ी होगी जो जाटव, यादव या महार के साथ अपने अतीत की खोज के समय पैदा होती है. क्या यह घनचक्कर नजर आता है?

    इसका यह अर्थ हुआ कि आप एक जातीय या वर्णगत पहचान से नहीं बल्कि एक भिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से ही इस फंदे से छूट सकते हैं. और यहीं अंबेडकर अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए बौद्ध धर्म में प्रवेश कर जाते हैं. यहाँ यह भी जानना जरुरी है कि एक अन्य धर्मनिरपेक्ष अस्मिता – ‘सर्वहारा’ भी हमारे लिए काम की नहीं है. सर्वहारा ठीक वही बात है जिसे आजकल ‘आर्थिक आधार पर आरक्षण’ देने वाले कहते फिरते हैं. इस विमर्श में “गरीब” के अर्थ में क्लास या वर्ग का एक इकाई बनते ही इस गरीब के नाम पर ‘एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था’ वाली कहानिया फिर ज़िंदा हो जायेंगी और इन कहानियों से चले आ रहे सवर्णों के हाथों में बीपीएल कार्ड प्रगट हो जायेंगे और सर्वहारा का वास्तविक भारतीय चेहरा – जो कि दलित आदिवासी और ओबीसी हैं – वे फिर से गरीब सवर्ण द्विजों की भीड़ में खो जायेंगा. इसीलिये लोहिया ने वर्ग संघर्ष को नकारते हुए वर्ण संघर्ष की बात की थी.

    अब इस विस्तार में जाने के बाद यह भी हम जानते हैं कि धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव हमको एकसाथ ही चलाना पडेगा. हम पूरे भारतीय शूद्रों और दलितों के बौद्ध हो जाने तक सामाजिक राजनीतिक आन्दोलन को स्थगित नहीं रख सकते. यह न तो आवश्यक है न ही संभव है. तब क्या करें? यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है और इसका उत्तर ज़रा भी कठिन नहीं है. इसका उत्तर वही है जो अंबेडकर और कांशीराम दोनों ने प्रयोग करके दिखाया है लेकिन उसे हम बीच में अधूरा छोड़ चुके हैं. वह उत्तर यह है की बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे प्रचार द्वारा हमारी सभी जातियों को अंधविश्वास से बाहर निकाला जाये और हमारे बच्चों, युवकों और स्त्रीयों को वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और समतामूलक विचारधारा की तरह बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाए. यहाँ नोट करते चलें की धर्मांतरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है. सारे दलित और शूद्र बौद्ध हैं ही. इसे सिर्फ फिर से जीना शुरू करना है और अपने घरों से अंधविश्वासपूर्ण पूजा पाठ शास्त्र, व्रत उपवास और त्योहारों को बाहर निकाल देना है. अपनी स्त्रीयों और बच्चों को बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में अंबेडकर और ज्योतिबा फूले के बारे में शिक्षित करना है. यह एक धीमा लेकिन पक्का काम है. यह काम करते हुए हमें हिन्दू धर्म का अपमान नहीं करना है. उन्हें गाली देकर उनका महत्व नहीं बढ़ाना है, उन्हें उनके हाल पर छोड़कर चुपचाप अपने धर्म और संस्कृति को आगे बढ़ाना है. अगर हम यह काम करते हुए इसी नजरिये से जातीय राजनीति को वर्ण की राजनीति और वर्ण की राजनीति को धर्म की राजनीति तक उठा सकें तो हम न सिर्फ दलितों शूद्रों और आदिवासियों का बल्कि एक आम भारतीय का भी हित साध सकते हैं. अंततः धर्म की राजनीति भी फिर भारतीय और गैर भारतीय के द्वंद्व की राजनीति में प्रवेश करेगी. तब विशुद्ध भारतीय होना एकमात्र मूल्य रह जाएगा. यही मूल्य फिर एक स्वस्थ और मंगलमय राष्ट्रवाद का जनक होगा.

    हमारी राजनीति इस तरह क्रम में जाति से वर्ण और वर्ण से धर्म तक ऊपर उठ सके और राजनीतिक विकास के साथ ही सामाजिक धार्मिक विकास और बदलाव को भी सुनिश्चित करती चले इसकी बड़ी आवश्यकता है. उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम अब इस आवश्यकता को रेखांकित कर रहे हैं इसकी तरफ ध्यान देना जरुरी होता जा रहा है.

     

  • अंबेडकरवादी आन्दोलन और ओशो का मायाजाल –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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    अंबेडकरवादी आन्दोलन को सबसे बड़ा ख़तरा किस बात से है? यह प्रश्न जितना जटिल है उतना ही जटिल इसका उत्तर भी है. अक्सर हम सोचते हैं कि आजकल काम कर रही राजनीतिक विचारधारों या राजनीतिक सांस्कृतिक संगठनों से ये खतरा है. यह बात कुछ दूर तक सही भी है लेकिन अंबेडकरवादी आन्दोलन को सबसे ज्यादा खतरा वेदांती अध्यात्म के सम्मोहन से है. भारत के गरीब और शोषित लोगों पर जो गुलामियाँ थोपी गईं हैं वे धर्म और अध्यात्म की चाशनी में लपेटकर थोपी गयी हैं ये जहर दार्शनिक सिद्धांतों में लपेटकर पिलाया गया है. और दुर्भाग्य से हमारे दलित और शोषित लोग ही खुद इस अध्यात्म के गुलाम हो रहे हैं. https://analystprep.com modafinil predaj online

    इस बात को मैं लंबे समय से नोट करता रहा हूँ कि किस तरह अंबेडकर और बुद्ध को मानने वालों में भी वेदान्त का जहर भरा हुआ है. कई मित्र हैं जो अंबेडकर और बुद्ध को प्रेम करते हैं लेकिन इसके बावजूद वे ओशो, जग्गी वासुदेव, श्री श्री, विवेकानन्द या अन्य वेदांती बाबाओं की गुलामी में लगे हुए हैं. ऐसे बाबाओं ने ही बुद्ध और अंबेडकर को और उनकी कौम को खत्म करने के षड्यंत्र रचे हैं. हमें इन बाबाओं से मुक्त होना होगा. इस सिलसिले में एक अनुभव आपसे साझा करना चाहूँगा.

    अभी ओशो के एक सन्यासी ने फोन किया। बुद्ध के विषय में बात कर रहे थे। चूँकि वे अंबेडकरवादी और बुद्ध के प्रेमी भी हैं इसलिए उन्होंने बुद्ध के विषय में मेरे विचार विस्तार से जानने चाहे। मैं हालाकि काफी कुछ लिख चुका हूँ फिर भी चूँकि वे अंबेडकरवादी हैं इसलिए मैं उनसे विस्तार से चर्चा करने को राजी हुआ।

    बात ले देकर इस मुद्दे पर आती है कि बुध्द ने ईश्वर को आत्मा को और पुनर्जन्म को क्यों नकारा। उन मित्र ने कहा कि ओशो के अनुसार बुद्ध ईश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को जानते हुए भी ईश्वर को नकार रहे हैं। मैंने पूछा कि यह बात बुद्ध ने खुद कही है कि वे इन तीनों को जानकर भी नकार रहे हैं? इसपर वे कहने लगे कि पता नहीं लेकिन ओशो तो यही कहते हैं। अब ध्यान दीजिए, ओशो बुद्ध के बारे में बुद्ध से ज्यादा जानते हैं। यही वेदांती मायाजाल है। जैसे बाबा लोग वैज्ञानिकों से ज्यादा विज्ञान और क्वांटम फिजिक्स जानते हैं उसी तरह ओशो जैसे बाजीगर बुद्ध, महावीर कृष्ण मुहम्मद आदि के बारे में खुद उनसे ज्यादा जानते हैं।

    इन वेदान्तियों में इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी बात अपने बूते पर रखें, वे कृष्णमूर्ति या नीत्शे या रसेल या विट्गिस्टीन की तरह अपने दर्शन की जिम्मेदारी खुद नहीं लेते बल्कि विवेकानन्द, अरबिंदो, दयानन्द आदि की तरह सब कुछ वेद उपनिषद या बुद्ध महावीर कृष्ण आदि के मुंह से कहलवाते हैं। यही वेदांती बीमारी है। नया करने में इन्हें डर लगता है। इसीलिये भारत कुछ भी नया नहीं करता। कोई विज्ञानं, तकनीक, चिकित्सा प्रणाली, दर्शन,साहित्य, जीवन शैली, कपड़ा लत्ता, सिनेमा, मनोरंजन या कुछ भी खोजकर दिखा दीजिये जो आधुनिक जगत में भारत ने दुनिया को दी है। ये सिर्फ नकल करते हैं।

    ओशो इस देश के दुर्भाग्य को समझने की चाबी हैं। मौलिक करने का साहस इन्होंने दिखाया था लेकिन साठ के दशक के अंत में ही स्वयं को पुजवाने की और मठाधीश बनने की हवस ने इन्हें पक्का वेदांती बना दिया।

    बाद में इन्हें जो कुछ कहना था वो दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर कहा। और इसे वे स्वीकार भी करते हैं। उनके शिष्य इस बात के लिए उनकी तारीफ भी करते जाते हैं। उनमें इतनी भी चेतना नहीं कि इस बात के लिए वे ओशो की भर्त्सना करें कि अगर कहना ही था तो हिम्मत करके अपने नाम से कहते,दूसरों के मुंह में शब्द डालने की क्या जरूरत है? लेकिन वे ऐसा सोचेंगे ही नहीं। क्योंकि ये सब वेदांती लोग हैं, एक ही षड्यंत्र के हिस्से हैं।

    कृष्णमूर्ति इस संबन्ध में एकदम मौलिक हैं। बचपन से ही उन्हें बुद्ध का अवतार बनाकर खड़ा किया गया लेकिन उनकी ईमानदारी देखिये कि न सिर्फ उन्होंने अवतार होने से इंकार कर दिया बल्कि अपनी शिक्षाओं को भी किसी शास्त्र, परम्परा या आप्त पुरुष से नहीं जोड़ा। उनका जोर रहा कि मेरी बातों की जिम्मेदारी मेरी अपनी है किसी बुद्ध, कृष्ण, जीसस आदि की नहीं। इसीलिये अंतिम सांस तक ओशो कृष्णमूर्ति के खिलाफ बोलते रहे।

    कल्पना कीजिये अगर कृष्णमूर्ति की जगह ओशो को अवतार घोषित किया जाता तो वे कैसी बाजीगरी का जाल न फैला देते? उन्हें किसी ने बुद्ध अवतार घोषित नहीं किया तो खुद ही उन्होंने प्रचार किया कि बुद्ध मेरे शरीर में आने के लिए लालायित हो रहे हैं। अब ये मजेदार खेल है। उनके कुछ शिष्य अब इसी खेल को आगे बढ़ाते हुए अपने शरीर में शिव, नारद, नानक, कबीर गोरख, ओशो और न जाने किन किन को किराए से कमरा दे चुके हैं। इनमे इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी बात अपने नाम से कहे। ये भी गोरख कबीर और नानक के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं।

    खैर, उन मित्र को मैंने कहा कि आप अंबेडकरवादी हैं और बुद्ध को प्रेम करते हैं तो ये ओशो के मायाजाल में क्यों फस रहे हैं? अंबेडकर और बुद्ध दोनों ही आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारते हैं, तब आप क्यों कन्फ्यूज हैं? या तो बुद्ध और अंबेडकर को सीधे समझ लीजिए या ओशो के जाल में फसे रहिये।

    डेढ़ घण्टे की चर्चा के बाद भी उनके दिमाग से पुनर्जन्म, आत्मा और मोक्ष का भूत नहीं निकला।

    ये मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि आप सब जान सकें कि बुद्ध या अंबेडकरी आंदोलन के खिलाफ सबसे बड़ा कोई हथियार है तो वो वेदांती अध्यात्म ही है। भारत में अब इन वेदान्तियों ने विपस्सना के नाम से भी इस वेदांती अध्यात्म को ही बुद्ध के नाम की आड़ में फैलाना शुरू कर दिया है। किसी भी बाबा योगी या गुरु के आश्रम में चले जाइए सब बुद्ध की व्याख्या कर रहे हैं और विपस्सना में तोड़ फोड़ करके उसमें अपनी बकवास मिला रहे हैं।

    ये गजब खेल है। इन्हें कृष्ण और राम या विष्णु या तुलसी की नई व्याख्या की फ़िक्र नहीं है। लेकिन बुद्ध और कबीर की बडी फ़िक्र रहती है। कारण साफ़ है। बुद्ध और कबीर से इन्हें डर लगता है अगर बुध्द, कबीर की आग पर इनकी व्याख्याओं का पानी बार बार न डाला गया तो ये आग पूरे वेदान्तिक भूसे को जला डालेगी। इसीलिये ये अपने वेदांती, वैष्णव चैम्पियन्स को सुरक्षित रखते हैं और दंगे में बुद्ध, कबीर को आगे कर देते हैं।

    ओशो इस खेल को बहुत होशियारी से करते रहे हैं। हम किसी और से उम्मीद न करें लेकिन अंबेडकरवादियों और बुद्ध के प्रेमियों से उम्मीद कर सकते हैं कि वे ओशो की बाजीगरी को समझें और उनसे सावधान रहें। बुद्ध को अंबेडकर की दृष्टि से समझें या सीधा समझने का प्रयास करे।

  • भारतीय शूद्रों की विरासत की चोरी और आधुनिक देशभक्त –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    संजय जोठे, लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    भारत के अतीत की जो उपलब्धियां हैं उन पर गर्व करने और उसपर दावा करने वाले लोग बचकाने तर्क देते हैं। कहते हैं क़ुतुब मीनार के पास खड़ा लौह स्तंभ, शून्य का आविष्कार, सुश्रुत द्वारा सर्जरी, सूर्य चन्द्र ग्रहण की गणना, आयुर्वेद आध्यात्म आदि आज के वैदिक, औपनिषदिक परंपरा ने भारत में तब पैदा किया था जब शेष मनुष्यता जंगल में गुफाओं मे रहती थी।

    यह बात ठीक है कि भारत ने यह सब सबसे पहले पैदा किया। लेकिन जिन लोगों ने पैदा किया वे आज के वेदान्तियों, सनातनियों के पूर्वज नहीं थे। वैदिक या औपनिषदिक ब्राह्मणी परम्पराओ ने तो उस ज्ञान को नष्ट करने का दुनिया का सबसे बड़ा षड्यंत्र किया है। आज उन्ही षड्यंत्रकारों की संतानें भारत के लोकायतों, श्रमणों, शूद्रों, तांत्रिकों, जनजातियों और भौतिकवादियों द्वारा पैदा किये ज्ञान पर अपना दावा कर रहे हैं। ये बड़ा मजाक है।

    उपनिषदों में प्राचीन भारतीय भौतिकवादियों और परलोकवादी पोंगा पंडितों के संघर्ष का विस्तार से उल्लेख है। विशेष रूप से उद्दालक और याज्ञवल्क्य का उल्लेख है। उद्दालक एकदम भौतिकवादी और कार्य कारण के तर्क का पालन करते हुए जगत को समझना चाहते है और याज्ञवल्क्य ब्रह्म और आत्मा की हवा हवाई धारणा से समाज को नियंत्रित करना चाहते हैं।

    कालांतर में तर्क हारता है और राजनीति और षड्यंत्र जीतता है। उद्दालक की परंपरा चल नहीं पाती और याज्ञवल्क्य के मानस पुत्र देश को परलोकवादी आत्मा, पुनर्जन्म और ब्रह्म में घसीट ले जाते हैं। भारत के इतिहास की गहरी रिसर्च यह बताती है कि यही वह बिंदु था जब भारत के पतन की शुरुआत हुई थी। आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की जहरीली त्रिमूर्ति ने भारत के मन पर तब से जो कब्जा किया है वह आज तक बना हुआ है।

    ये त्रिमूर्ति भारत का सबसे जहरीला सिद्धांत है जो धर्म और कर्मकांड का रोजगार करने वालों ने तर्कनिष्ठ वैज्ञानिकों, शिल्पकारों और भौतिकवादियों को नीचा दिखाने के लिए विकसित किया है। भाववादी अध्यात्म या धर्म जाहिर तौर पर दुनिया भर में मनुष्यता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र रहे हैं। भारत में इसमें पुनर्जन्म का जो तड़का लगाया गया है वह इतना कारगर षड्यंत्र रहा है कि आज तक उससे भारत की जनता आजाद नहीं हो पाई है।

    इन सिद्धांतो से भारत के असली नायकों का काम छुपाया गया है। भारत के शिल्पी, कारीगर, लोहार, चमार, कुम्हार, जुलाहों आदि ने जिस वैज्ञानिक ज्ञान को विक्सित किया था वह ठोस भौतिकवादी और कार्यकारण सिद्धांत पर खड़ा ज्ञान था। आप अनुमान कीजिये, एक चर्मकार जब चमड़ा पकाता है, गलाता है, साफ़ करता है या ठीक अनुपात में काटकर उसकी सिलाई करता है तक वह रसायन, जीव विज्ञान, ज्यामिति और मौसम विज्ञान की विशेषज्ञता का उपयोग कर रहा है। यह शुद्धतम तकनीक है, विज्ञान है जो ठोस परीक्षणों और आकलनों पर आधारित है। इस ज्ञान से वह चर्मकार, लोहार, कुम्हार या किसान अपने उत्पाद बनाता है और समाज को देकर समाज को असल में जिंदा रहने और तरक्की करने में मदद करता है।

    अब एक भाववादी, परलोकवादी पंडित क्या करता है? वह सिर्फ काल्पनिक और हवा हवाई गप्प सुनाकर कर्मकांड कराता है। कथाएं सुनाता है श्राद्ध कराता है। जिन बातों का जिंदगी से कोई संबन्ध नहीं उनमें समाज को उलझाये रखता है। उलटे सीधे स्वर्ग नर्क पुनर्जन्म और मोक्ष आदि में लटकाए रखकर अपनी दक्षिणा और रोजगार के लालच में पूरे समाज को मंदबुद्धि, भाग्यवादी और कायर बनाकर रखता है। यह पंडित असल में वैज्ञानिक कार्यकारण नियमों के पालन द्वारा समाज की सेवा नहीं करता बल्कि विशुद्ध मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र रचकर समाज के कर्मठ लोगों का शोषण करता है।

    आप खुद सोचिये, कर्मकांड या श्राद्ध, कथा आदि के आचारशास्त्र में कौनसा विज्ञानं छूपा है? दाएं हाथ के अंगूठे से जलधार छोड़नी है या   सात परिक्रमा करनी है या पूर्व की तरफ काले तिल फेंकने हैं या दस ब्राह्मणों को भोज कराना है जैसे कामों का क्या कोई वैज्ञानिक या तार्किक अर्थ है? लेकिन वहीँ जब एक लोहार लोहा बनाता, गलाता, पीटता है तो उसमें विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करता है। भारत के सभी शूद्र जो कि कारीगर, शिल्पी या उत्पादक रहे हैं उन्होंने असल में विज्ञानं और तकनीक को जन्म दिया है।

    अब मजा ये है कि इन लोगों को और इनके ज्ञान को अछूत बनाया गया है। इन्हें नीच और गन्दा कहकर इन्हें समाज की निचली पायदान पर धकेला गया है। और आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म का जहर पिलाकर रोजगार चलाने वालो ने स्वयं को सबसे ऊपर रखा। इस प्रकार भारत में अन्धविश्वास फैलाने वालों ने भौतिकवाद के वैज्ञानिक नियमों पर खड़े तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान को अछूत बनाकर नष्ट कर दिया। और जब तकनीकी ज्ञान बदनाम हो गया तो शिल्पकार गरीब होते गए उनमे आविष्कार करने की या सुधार करने की प्रेरणा मरने लगी। इस तरह विज्ञानं नष्ट हुआ। दूसरी तरफ पठन पाठन का अधिकार भी सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया गया, वे बिना कुछ किये मालदार और ताकतवर बनते गये। न सिर्फ शूद्रों पर बल्कि क्षत्रियों और वैश्यों पर भी उन्होंने अंधविश्वास फैला दिया। व्यापार का मुहूर्त, युद्ध का मुहूर्त, दिशा ज्ञान, वास्तु, सामुद्रिक, प्रेत विद्या आदि में समाज के शासक वर्ग को खुद राजगुरु बनकर उलझा लिया। अब मजा ये कि जब तुर्क, अफगान, मुग़ल आदि ने आक्रमण किये तो ये ब्राह्मणी ज्ञान कुछ काम न आया। भारत में धातु, रसायन, शिल्प, भौतिकी, गणित आदि की रिसर्च बन्द होने के कारण भारत सबसे हारता रहा। जो देवता पहाड़ उठाकर उड़ जाते थे वे काम न आये। लेकिन शूद्रों की बनाई धातु की तलवार या हल ही काम आये। लेकिन इस सबसे भी कोई शिक्षा नही ली गयी। आजादी के बाद फिर से ब्राह्मणी धर्म और परलोक में फंसाया गया है।

    यह भारत को बर्बाद करने का सबसे लंबा, संगठित और कारगर षड्यंत्र रहा है। जिन परलोकवादी और कर्मकांडी लोगों ने ये खेल रचा वे भारत के असली दुश्मन और राष्ट्रशत्रु हैं।

    अब एक नया खेल शुरू हुआ है। जिन लोगों और परम्पराओं ने भारत को पतन के गर्त में पहुँचाया उसी परम्परा के झंडाबरदार अब भारत के शूद्रों के ज्ञान पर दावा कर रहे हैं। शून्य का ज्ञान बौद्धों का था, धातुविज्ञान का या शल्य चिकित्सा का ज्ञान भी शूद्रों और जनजातियों का था जिन्हें अछूत और नीच समझा गया। लेकिन आज जब भारत यूरोप के सामने लाचार खड़ा है तो भारत के पोंगा पंडित एक बार फिर शूद्रों, काश्तकारों और गरीबों की विरासत पर दावा करने को खड़े हो गए हैं। जैसे इनके पूर्वजों ने शिव, बुद्ध आदि महापुरुष चुराए थे, उसी तरह आजकल के स्वदेशी इंडोलॉजिस्ट उन शूद्रों के ज्ञान को भारत का प्राचीन ज्ञान बताकर श्रेय लूटने की तैयारी कर रहे हैं।

    निश्चित ही यह भारत का प्राचीन ज्ञान है लेकिन ये किन्ही दूसरी संस्कृतियों का ज्ञान था। यह भौतिकवादी संस्कृतियों या परम्पराओं का ज्ञान था। आज के वैदिक या उपनिषदिक परम्परा से या इनके पूर्वजों से उनका कोई रिश्ता नहीं था। रिश्ता था भी तो वो विरोध या लड़ाई का रिश्ता था। लेकिन आज हालत बदल रही है। कर्मकांडीय मूर्खता से देश को बर्बाद करने वाले लोग अब शूद्रों, शिल्पियों, किसानों आदि के ज्ञान को वैदिक भारत के ज्ञान की तरह प्रोजेक्ट करके झूठा इतिहास लिखने की तैयारी में हैं।

    इस खेल को ठीक से समझिये और भारत के इतिहास का ठीक से अध्ययन कीजिये। आप समझ सकेंगे कि जिन लोगों ने भारत को बर्बाद किया वे आज भी षड्यंत्र बुन रहे हैं और जिस ज्ञान को उनके पूर्वजों ने नीच घोषित किया था उसी ज्ञान पर आज दावा करने को खड़े हो रहे हैं। इन लोगों में कोई शिष्टाचार या कॉमन सेन्स या सामान्य नैतिकता तक नहीं है। ये परजीवी रहे हैं खुद कुछ पैदा नहीं करते सिर्फ दूसरों की विरासत को अपने खाते में दिखाने वाले पुराण और झूठ लिखते हैं। इनके षड्यंत्र को ठीक से देखिये।

  • श्मशान और मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है? –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

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    अक्सर ही ग्रामीण विकास के मुद्दों पर काम करते हुए गाँवों में लोगों से बात करता हूँ या ग्रामीणों के साथ कोई प्रोजेक्ट की प्लानिंग करता हूँ तो दो बातें हमेशा चौंकाती हैं।

    पहली बात ये कि ग्रामीण सवर्ण लोग मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, तालाब, स्कूल आदि बनवाने की बजाय मंदिर, श्मशान, कथा, यज्ञ हवन भंडारे आदि में ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। दुसरी बात ये कि जहाँ भी सार्वजनिक या सामाजिक संसाधन निर्मित करने की बात आती है वहां स्वर्ण हिन्दू एकदम से धर्मप्राण होकर विकास के खिलाफ हो जाते हैं और भूमिहीन दलित आदिवासी ओबीसी गरीब समुदाय चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते।

    सीधे तौर पर आप देख सकते हैं कि ग्रामीण भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू समुदाय में सामाजिक सहयोग से सड़क बिजली पानी और रोजगार आदि को लेकर कोई बड़ा काम करने की इच्छा नहीं होती। हाँ व्यक्तिगत रूप से वे अपने परिवार जाति समूह आदि में इन मुद्दों पर खूब काम करते हैं और किसी दूसरे समुदाय को घुसने नहीं देते। लेकिन पूरे गाँव के लिए मूलभूत सुविधा की प्लानिंग के लिए उनमे एकदम से वर्णाश्रम धर्मबुद्धि जाग जाती है।

    ये सवर्ण लोग गांवों में विकास की प्लानिंग में मंदिर और श्मशान पर बहुत जोर देते हैं। हालाँकि गांव में मंदिरों की कोई कमी नहीं होती है। और श्मशान भी एक ही बार जाना है – वो भी मरकर। तो फिर मंदिर और श्मशान पर इतना जोर देने की जरूरत क्या है?

    जरूरत है, बहुत गहरी जरूरत है। असल में अगर गांव में सड़क, बिजली, शिक्षा, रोजगार या जीवन की अन्य सुविधाएं बढ़ती हैं तो इसका फायदा सवर्ण द्विज हिंदुओं को नहीं मिलेगा। वो इसलिए कि इनके पास तो ये सब सुविधाएं पहले से ही है। लेकिन इन सब सुविधाओं के बिना जीते आये भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासियों को इससे तुरन्त फायदा होगा। उनके बच्चे जल्दी ही शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक हो सकेंगे। एक या दो पीढ़ी में ही ग्रामीण दबंगों को चुनौती मिलने लगेगी। बेगार, बलात्कार, शोषण बन्द हो जाएगा। राजनितिक समीकरण बदल जायेगा। और समझदार ग्रामीण सवर्ण ये कभी नहीं होने देंगे। इसलिए वे हर योजना हर प्लानिंग में घुसकर पूरे गाँव को मंदिर, श्मशान,धर्मशाला, भंडारा, कथा, प्रवचन, ध्यान, समाधी आदि में उलझाये रखते हैं।

    लेकिन मंदिर या श्मशान या अध्यात्म करते क्या हैं?

    असल में जाति को बनाये रखने का एक ही तरीका है। जीवन के लिए जो भी जरूरी है उसकी निंदा करो और मृत्यु और मृत्यु के बाद की बकवास की प्रशंसा करो। यही रहस्यवाद, ध्यान समाधी, धर्म, वेदांत, सूफी, भक्ति आदि का कुल जमा काम रहा है। वे परलोक जन्नत मोक्ष पुनर्जन्म, साल्वेशन, ईश्वर आदि की फफूंद उड़ाते रहेंगे और इस जिंदगी के मुद्दों पर, सड़क शिक्षा रोजगार तालाब आदि पर कोई काम नहीं होने देंगे।

    अब जैसे ही आप मंदिर, मस्जिद, चर्च या श्मशान जाते हैं वैसे ही इस जीवन से ज्यादा चिंता परलोक की होने लगती है। बस इसी मौके की तलाश में सारे पोंगा पंडित और मुल्ला पादरी आदि रहते हैं। आपमें ये परलोक का भय पैदा होते ही वे अपने शास्त्र, मिथक, कर्मकांड, रहस्यवाद और अध्यात्म लेकर घुस जाते हैं और आपको सड़क, शिक्षा रोजगार से हटाकर ध्यान, समाधी, श्राद्ध, रोज़ा, ज़कात, साल्वेशन, मोक्ष आदि में उलझा लेते हैं।

    भारत में इसी ढंग से जिंदगी की मूलभूत सुविधाओं को नकारकर परलोक की सुविधाओं पर फोकस बनाये रखा जाता है। फिर इस लोक में भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासी के बच्चे कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार बने रहते हैं और वर्णाश्रम (असल में जाति) व्यवस्था बनी रहती है।

    इसलिए जाति व्यवस्था और इसके शोषण को बनाये रखने के लिए मंदिर और श्मशान बहुत बड़ी भूमिका निभाते आये हैं। ये ही भारत के दुर्भाग्य के स्त्रोत हैं।

    इसलिए जब कोई मंदिर या श्मशान की बात करे तो सावधान हो जाइये कि वे सज्जन असल में समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।

  • बुद्ध की अनत्ता के सिद्धांत की चोरी और आत्मा का वेदांती भवन –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।


     

    वेदान्त या किसी भी अन्य आस्तिक दर्शन के अंधभक्तों से बात करते हुए बड़ा मजा आता है. कहते हैं ध्यान एक अनुभव है, इन्द्रियातीत अनुभव है. इसकी चर्चा नहीं की जा सकती इसे अनिर्वचनीय और अगम्य अनकहा ही रहने दो. अभी कल से एक प्रौढ़ और सुशिक्षित बुजुर्ग सज्जन से चर्चा चल रही थी. अंत में वे अपने सारे कमेंट्स डिलीट करके विदा हो गये और कह गये कि मैं कहता आंखन देखि, तुम शब्दों को संभालते रहो. कितनी ऊँची लगती है न उनकी बात ? लेकिन कितनी षड्यंत्रपूर्ण और बचकानी है असल में इसे देखिये. पहली बात तो वे कहते हैं कि इन्द्रियातीत अनुभव की चर्चा हो ही नहीं सकती, अब यहाँ गौर से देखिये अनुभव का मतलब ही इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान है, इन्द्रियातीत अनुभव नाम का वेदांती शब्द स्वयं वेदान्त की तरह असंभव शब्द है. वेदांत का अर्थ होता है ज्ञान का अंत – यह अर्थ है तो अनर्थ कि क्या परिभाषा हो सकती है? विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि ज्ञान या इन्फोर्मेशन या अनुभव या समझ (इस अर्थ में इन्फोर्मेशन) का कोई नाश नहीं होता. वेदान्त का अर्थ ही वेद (ज्ञान) का अंत है, इस तरह ज्ञान को नष्ट करने वाले दर्शन के रूप में वेदान्त का पूरे भारत पर क्या असर हुआ है वह समझ में आता है. हजारों साल तक अज्ञानी अन्धविश्वासी और गुलाम भारत तभी संभव है जब ज्ञान का सच ही में अंत कर दिया गया हो.

    तो, वे सज्जन कह गए कि इन्द्रियातीत अनुभव या ज्ञान की चर्चा असंभव है. यह रसगुला चखने जैसा है कोई व्याख्या नहीं हो सकती. कुछ हद तक ये ठीक है लेकिन रसगुल्ले और मिठास के अनुभव को आधार बनाकर बहुत ठोस तर्क और तर्कपूर्ण अनुमान से बहुत कुछ जाना जा सकता है. इसी पर कोमन सेन्स और विवेक सहित कल्पनाशीलता टिकी हुई है जो कि किसी भी तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है.

    कोई भी आध्यात्मिक ज्ञान या अनुभव कामन सेन्स से बड़ा नहीं होता. हो ही नहीं सकता. कामन सेन्स ने ही वह विज्ञान तकनीक, सभ्यता, नैतिकता और सौन्दर्यबोध दिया है जिसने हमें इंसान बनाया है. अब इन इंसानों को गुलाम और अन्धविश्वासी बनाकर उलझाए रखने के लिए सबसे जरुरी काम क्या होगा?

    निश्चित ही तब सबसे जरुरी काम होगा कि ज्ञान के आधार और उसकी संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए. सभी आस्तिक दर्शन और खासकर हिन्दू वेदान्त यही करता है. आजकल के बाबाओं को ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव, श्री श्री या मोरारी बापू जी या आसाराम बापूजी को देखिये. वे इन्द्रियों से हासिल ज्ञान को नाकाफी बताते हुए किसी अदृश्य अश्रव्य और अगम्य को अत्यधिक महत्व देते हैं और इस एक मास्टर स्ट्रोक से वे उस तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान, समाधी और निर्विचार सहित आनंद और अनुभव मात्र की व्याख्या का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं. इस तरह ज्ञान अनुभव और इनपर खडी सभी संभावनाओं की चाबी वे अपने पास रख लेते हैं और न सिर्फ अपना रोजगार बल्कि इस देश की जड़ता को भी सदियों सदियों तक बनाये रखते हैं.

    क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि भारत में षड्दर्शन के बाद सातवाँ दर्शन क्यों पैदा नहीं हुआ? क्या दिक्कत है? यूरोप में तो हर दार्शनिक अपना नया स्कूल आफ थॉट आरंभ कर सकता है लेकिन यहाँ अरबिंदो, विवेकानन्द, शिवानन्द, योगानन्द सहित ओशो जैसे बाजीगरों को भी इन छः डब्बों में से कोई एक डब्बा पकड़ना होता है वरना वे भारतीय ज्ञान और दर्शन की छोटी सी और उधार ट्रेन से बाहर निकाल दिए जायेंगे.

    लेकिन यूरोप में यह ट्रेन बहुत लंबी है. जितना चाहे उतना डब्बे जोड़ते जाइए. इसी से वहां नये ज्ञान विज्ञान तकनीक और सौंदर्यशास्त्र जन्म लेते ही रहते हैं. भारत की पूरी कहानी चार वर्ण और छः दर्शनों पर खत्म हो जाती है. यहाँ हाथ के पंजों की दस उँगलियों के परे कोई गिनती जाती ही नहीं. दस पर बस आ जाता है.

    यह अगम्य और अनुभवातीत क्या है? अगर यह है तो आप या मैं या कोई और इसकी चर्चा कैसे कर रहा है? अगर यह इतना ही दूर और अगम्य है तो इसकी चर्चा क्यों करते हैं? ये आत्मा परमात्मा और समाधि की रात दिन की बकवास क्यों पिलाई जाती है? फिर जब कोई इनके बारे में सच में ही जिज्ञासा करे तो घबराकर कहेंगे कि ये सब अगम्य अगोचर है. अरे भाई जब ये अगम्य अगोचर अनिर्वचनीय है तो उसकी रात दिन मार्केटिंग और बकवास करते ही क्यों हो?

    और ध्यान रखियेगा उसकी मार्केटिंग इस तरह की जाती है जैसे अभी ये बाबाजी आपके हाथ में निकालकर रख देंगे “अभी और यहीं” की भाषा में बात करेंगे और हजारों जन्म की साधना की बात भी करेंगे, गुरु की महिमा, शरणागती और गुरु शिष्य परम्परा की बात भी करेंगे.. ये ओशो रजनीश का सबसे मजेदार खेल रहा है. अमन और अनात्मा की संभावना पर जो ध्यान का अनुभव खड़ा है उसे आत्मा की बकवास के साथ सिखाते हैं. जब व्यक्ति सनातन आत्मा की चर्चा सुनकर “मैं” को मजबूत बना लेता है तब कहते हैं कि मैं से मुक्त होना ही सच्ची मुक्ति है.

    अब यहाँ खेल देखिये एक तरफ आत्मा की सनातनता का सिद्धांत देकर आत्मा (मैं, मेरे होने के भाव) को मजबूत कर रहे हैं. फिर साधना सिखा रहे हैं कि इस मैं को विलीन कर दो, ये वेदान्त की जलेबी है. दूसरी तरफ बुद्ध को देखिये वे कहते हैं कि यह मैं होता ही नहीं इसे जान लो. तब इस मैं से मोह और आत्मभाव पैदा ही नहीं होगा. तब ध्यान समाधि या तादात्म्य हीनता एकदम आसान हो जाती है. लेकिन वेदान्त यह नहीं होने देता. वह सनातन आत्मा या मैं के भाव को ठोस खूंटे की तरफ गाड़ देता है फिर इसे विलीन करने का इलाज भी बता है. मतलब पहले कीचड में पाँव डलवाता है फिर स्नान भी करवाता है. इस प्रकार वेदांती हमाम और इसके ठेकेदारों का रोजगार बना रहता है.

    अब ध्यान दीजिये मैं को विलीन करने की टेक्नोलोजी असल में बुद्ध की अनत्ता की या अनात्मा की टेक्नोलोजी हैं जिसे ये चुराकर आत्मा की टेक्नोलोजी के नाम से मार्केटिंग कर रहे हैं. ऊपर से तुर्रा ये कि अनत्ता या मैं के विलीन होने पर जो शून्य बच रहता है उसे ये “आत्मज्ञान” कहते हैं. हद्द है मूढ़ता की.

    मतलब समझे आप? आत्मा को मिटाने पर जो ज्ञान हुआ उसे बुद्ध की तरह अनात्मा का ज्ञान कहने में ये डरते हैं कि कहीं चोरी न पकड़ी जाए. उसे ये अनात्मा न कहके आत्मा का ज्ञान कहते हैं. हालाँकि ये भली भाँती जानते हैं कि आत्मा या स्व के विलीन होने पर ही इनका मोक्ष या बुद्ध का निर्वाण घटित होता है और इसीलिये तःताकथित अध्यात्म या धर्म की सारी सफलताएं असल में अनात्मा की सफलता हैं. फिर भी इनका षड्यंत्र देखिये कि इसके बावजूद भी आत्मा और उसकी सनातनता का ढोल बजाना बंद नहीं करते. यह कितना शातिर और गहरा खेल है आप अनुमान लगाइए.

    इतना स्पष्ट सा विरोधाभास क्या इन्हें नजर नहीं आता? बिलकुल नजर आता है. लेकिन दिक्कत ये है कि अगर ये समाधि या ध्यान के अनुभव को अनात्मा के अनुभव या स्व (मैं/मेरा) के निलंबित हो जाने के अनुभव की तरह प्रचारित करने लगें तो इनमे और बुद्ध में कोई अंतर नहीं रह जाएगा. तब पूरे हिन्दू धर्म और वेदान्त को चोरी पकड़ी जायेगी.

    इस खेल को गौर से देखिये और समझिये मित्रों. इस देश के शोषक धर्म पर इस स्तर से हमला करेंगे तो यह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा और बहुत प्रकार से हम शोषण और अंधविश्वासों को चुनौती दे सकेंगे. तब भारत में नैतिकता, विज्ञान, न्यायबोध और धम्म का मार्ग आसान हो सकेगा.


    (लिखी जा रही और शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)
    – © संजय जोठे