Tag: Sanjay Jothe

  • गौतम बुद्ध का अमृत और वेदांती पाखण्ड का जहर –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

    [themify_hr color=”red” width=”2″]

    गौतम बुद्ध ने जिस तरह से अनत्ता (अनात्मा) और निर्वाण की परिभाषा दी है उसे चुराकर हिन्दू वेदान्त ने एक उधार धर्म निर्मित किया है. यह दुनिया की सबसे बड़ी और खतरनाक दार्शनिक चोरी है. इस षड्यंत्र को समझना और इस चोरी को पकड़ना बड़ा कठिन है. लेकिन थोड़ा विचारपूर्वक विश्लेषण किया जाए तो इसे पकड़ा जा सकता है और समझा जा सकता है. इसके लिए हमें वेदांती रहस्यवाद का पोस्टमार्टम करना होगा. आइये ये पोस्टमार्टम करते हैं.

    हिन्दू धर्म या किसी भी अन्य धर्म की आत्मा और परमात्मा की धारणा पर खड़े रहस्यवाद को गौर से देखिये. उसका आत्यंतिक चमत्कार या उसकी अंतिम उंचाई जिस तरह से अभिव्यक्त होती है और इस उंचाई तक आने की जो प्रस्तावना या मार्ग बताया गया है वह परस्पर विरोधी है. विशेष रूप से भारतीय वेदान्त में जिस अर्थ में रहस्यवाद के आत्यंतिक शिखर परिभाषित किये गये हैं वे परिभाषाएं विरोधाभासों से होती हुई पाखण्ड और षड्यंत्र में प्रवेश कर जाती हैं. असल में अध्यात्म या रहस्यवाद द्वारा जिस तरह की व्यक्तिगत और सामूहिक मुक्ति (मोक्ष या साल्वेशन नहीं बल्कि निर्भार होने या खुश रह सकने के अर्थ में) की संभावना दिखाई जाती है, उसी संभावना की वेदांत द्वारा ह्त्या भी की जाती है. यह बहुत बड़ा खेल है जो हर आस्तिक धर्म में बहुत गहराई से चलता रहा है और आजकल बढ़ रहा है. खासकर हिन्दू वेदान्त ने इस पाखण्ड और षड्यंत्र में चार चाँद लगा दिए हैं.

    आजकल की युवा पीढ़ी को इस बात को बहुत गहराई से समझना चाहिए. शहरी मध्यम वर्ग की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक असुरक्षाओं का शोषण करने वाले इस अध्यात्म को समझना बहुत जरुरी है. आइये इस विषय में प्रवेश करें.

    वेदान्तिक या आत्मा-परमात्मा- पुनर्जन्म वादी रहस्यवाद की यह उंचाई क्या है? बहुत सरल शब्दों में कहें तो शरीर, मन और समय मात्र से जागृत दूरी बन जाना ही समस्त रहस्यवादी अभिव्यक्तियों का कुल जमा सार है. इसे और सरल करें तो कहेंगे कि जब शरीर, स्मृतियों, कल्पनाओं, अभीप्साओं सहित इन सबसे जन्मने वाले आत्मभाव (मैं के होने के भाव या खुदी के अहसास) पर विराम लग जाता है तब वह अवस्था आती है जिसे समाधि या तुरीयावस्था कहते हैं. इस तरह के ‘नाम रूप और अस्तित्व की हीनता’ ही वह निर्भार होना या मुक्ति है जिसे अतिरंजित ढंग से महत्त्व दिया गया है. इसे बहुत बढ़ा चढाकर बखान किया जाता है और इसी की प्रशंसा में सारे धर्मों के सब शास्त्र भरे हुए हैं. https://littlescholarsnyc.com

    निश्चित ही ये अवस्था बहुत आनंददायक या समाधानकारी है, इसका अनुमान हर व्यक्ति को होता ही रहता है. ये कोई ख़ास बात या दुर्लभ चमत्कार नहीं है. आप दैनिक जीवन में इस मोक्ष या निर्वाण से रोज गुजरते हैं. किसी आनन्द या भय या सावधानी के क्षण में शरीर, मन, समय आदि पीछे छूट जाते हैं तब निर्वाण साकार हो उठता है. निर्वाण का अर्थ है “कोई दिशा न होना” निर्वाण शब्द नि+वाण से बनता है. वाण का अर्थ है – दिशा. इस तरह निर्वाण का सरल अर्थ है कि आपके शरीर और मन दोनों की स्थान या समय में कोई दिशा न रही, दोनों निर्विकल्प अवधान की स्थिति में शुद्धतम वर्तमान में आ गये. चेतना किसी दिशा में कुछ खोज नहीं रही बल्कि निर्विकल्प रूप से सब चीजों का जागृत संज्ञान ले रही है, मतलब कि होश है लकिन इस होश का मालिक कोई नहीं है. जैसे कि कोई पर्वत पर खड़े होकर समंदर के विस्तार को बिना नाम दिए या पसंद नापसंद का निर्णय दिए बिना चुपचाप देखता/देखती हो ऐसे में भूत भविष्य, शरीर, मन सब शून्य हो जाता है. यही बौद्धों का ध्यान है. लेकिन श्रमणों के इस ध्यान या सामायिक को हिन्दू वेदान्तियों ने ‘धारणा और योग’ के मायाजाल की बाढ़ में डुबाकर बर्बाद कर दिया है, बुद्ध द्वारा दी गयी निर्वाण की टेक्नोलोजी को सामाजिक नियंत्रण का हथियार बनाकर बर्बाद कर डाला है.

    हिन्दू वेदान्त के अनुसार यह निर्विकल्प अवधान या जागृत चेतना का एक ख़ास व्यक्तित्व है. बौद्ध दर्शन और बौद्ध व्यवहार में इस चेतना का कोई व्यक्तित्व नहीं होता, बौद्धों के लिए यह चेतना “अनात्मा” है. लेकिन हिन्दुओं के लिए यह सनातन शाश्वत और ठोस “आत्मा” है. आत्मा का कुल जमा अर्थ “व्यक्तित्व” या “सेल्फ” या “स्व” होता है. हम अक्सर आत्मा की हिन्दू परिभाषा को ऊर्जा या प्राण से कन्फ्यूज करते हैं, लेकिन हिन्दू अर्थ में आत्मा का अर्थ ऊर्जा या चेतना नहीं होता है बल्कि एक ठोस व्यक्तित्व से होता है जो एक से दुसरे गर्भ में अनंत काल तक छलांग लगाता रहता है. बौद्ध दर्शन के अनुसार यह बात बिलकुल गलत है, बौद्धों के लिए न तो ऐसी आत्मा होती है न ऐसी छलांग (पुनर्जन्म) होता है और इसीलिये इस आत्मा और इसकी उछलकूद (पुनर्जन्म) को नियंत्रित या संचालित करने वाला कोई परमात्मा भी नहीं होता है. गौतम बुद्ध के अनुसार यही समझ अनत्ता और शून्य का सार है.

    यहाँ मैं क्यों कह रहा हूँ कि मुक्ति की वेदान्तिक परिभाषा और उसका प्रायोगिक मार्ग परस्पर विरोधी हैं? इसका एक बहुत आसान सा कारण है. वह कारण समझा जा सकता है. वेदान्त के अनुसार मुक्ति की पूरी टेक्नोलोजी का और उसके पूरे प्रेस्क्रिप्शन का विश्लेषण कीजिये आपको वेदान्त का पाखण्ड और षड्यंत्र तुरंत समझ में आ जाएगा. आइये शुरू करते हैं.

    वेदान्तिक अर्थ में बंधन का अर्थ है मोह, माया. अब मोह का अर्थ है अपने शरीर, वस्त्रों, सम्पत्ति, सम्बन्धियों, पुत्र, पत्नी, जमीन जायदाद इत्यादि से राग इसी तरह अपनी खुद की पहचान, ज्ञान, श्रेष्ठता, संस्कार, अतीत, स्वप्न, योजनाओं, कल्पनाओं और भविष्य से राग. इसी क्रम में माया का अर्थ है जो नहीं है उसको होता हुआ जानना माया है. इस प्रकार वेदान्त के लिए शरीर और मन को सुखी करने वाली हर चीज से राग या लगाव रखना बंधन है, या स्वयं को किसी अन्य विधा वस्तु या तथ्य को अनावश्यक रूप से अस्तित्ववान, श्रेष्ठ अश्रेष्ठ या विशिष्ठ जानना माया है. अब ये मोह और माया ही मिलाकर बंधन अर्थात “तादात्म्य” अर्थात “अटेचमेंट” का निर्माण करते हैं और हम उसमे अपनी मर्जी से उलझे रहते हैं. यही मर्जी से उलझे रहना ही बंधन है. बुद्ध और वेदांत दोनों के लिए इस बंधन से क्रमशः छूटने का अभ्यास ही साधना है. और इससे पूरी तरह छूट जाना मुक्ति या मोक्ष या निर्वाण है. यहाँ तक बात एकदम आसान है. सभी समझते हैं.

    इसका मतलब ये हुआ कि शरीर और मन के सुख के जितने साधन हैं उनसे एक दूरी निर्मित हो जाना ही मोक्ष है. यहाँ ध्यान दीजिये अगर यह दूरी अस्तित्वगत रूप से संभव है तभी यह दूरी पैदा की जा सकती है या बढाई जा सकती है. अगर अस्तित्वगत रूप से यह दूरी संभव नहीं है तो न तो पैदा की जा सकती है न बढाई जा सकती है. अगर हिन्दू वेदान्त और बौद्ध धर्म मोक्ष या निर्वाण को मानता है तो इसका अर्थ है कि दोनों के लिए यह दूरी संभव है इसीलिये वे इसे बढाते जाने की बात करते हैं. अब ध्यान से देखिये कि इसका क्या अर्थ है.

    अगर दूरी संभव है तो इसका अर्थ हुआ कि चेतना या होश (जो कि आपमें अभी काम कर रहा है) वह न तो शरीर है न ही मन है. अगर वह शरीर और मन ही होता तो शरीर और मन से उसकी दूरी नहीं निर्मित की जा सकती थी, उदहारण के लिए मिट्टी ही ईंट है तो मिट्टी कभी ईंट होने की पहचान से मुक्त नहीं हो सकती. लेकिन मिट्टी ईंट नहीं है तो ही वह ईंट होने के झमेले से मुक्त होकर वापस मिट्टी बन सकती है. इसका मतलब हुआ कि मोक्ष या निर्वाण की संभावना ही तब है जबकि चेतना को शरीर और मन द्वारा दिए गये व्यक्तित्व या स्व से दूर किया जा सके. अर्थात शरीर और मन द्वारा दिए गये व्यक्तित्व या स्व या आत्म से दूर होना ही निर्वाण या मोक्ष की संभावना का आधार है. यह बात बौद्ध दर्शन में विस्तार से समझाई गयी है और इसी को लक्ष्य के रूप में वेदान्त ने भी चुराया है. बौद्ध दर्शन में इस लक्ष्य के संधान का जो मार्ग है वह एकदम इसी तर्क पर आधारित है और सीधा है. लेकिन वेदान्त का मार्ग एकदम उलटा और पाखण्ड पूर्ण है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि वेदान्त ने बुद्ध के इस लक्ष्य और इसकी टेक्नोलोजी को चुराते हुए बौद्ध दर्शन से उलटा मार्ग बुना ताकि वेदांती हिन्दू धर्म पर चोरी का आरोप न लगे. लेकिन इस चोरी को पकड़ना आसान है. इसे कैसे पकड़ा जा सकता है?

    ये बहुत आसान है. समझिये, निर्वाण या मोक्ष की तरफ बढ़ते जाने का अर्थ है भौतिक शरीर और मन सहित भौतिक और मानसिक संपत्तियों या परिग्रह (मैं और मेरा) से दूर होते जाना. उन पर अपनी मालकियत को कम से कम करते जाना. मतलब कि सुख/दुःख और सुख/दुःख के साधनों पर अपनी मालकियत और चाह को कम करते जाना. इसका ये अर्थ नहीं है कि सुख को नकार देना बल्कि हकीकत ये है कि ‘मालकियत’ नकारते हुए ही सच में सुखी रहा जा सकता है. जैसे पक्षी किसी पेड़ पर मालकियत का दावा किये बिना भी उसके सौन्दर्य और फलों का सुख ले सकता है वैसा ही हम भी कर सकते हैं. लेकिन हम पक्षियों की तरह ऐसा क्यों नहीं कर सकते? इसके दो बड़े कारण हैं. पहला ये कि हम उस पेड़ और उसके सौंदर्य पर मालकियत चाहते हैं और उससे भी बड़ा कारण ये कि इस मालकियत को संभव समझने वाली सत्ता या व्यक्तित्व को हम एक ठोस रचना या आत्मा मानते हैं. मतलब ये कि न सिर्फ हम मालकियत का दावा करते हैं बल्कि मालिक को भी सनातन या शाश्वत मानने की भूल करते हैं. इस बिंदु पर आकर वेदान्तिक पाखण्ड एकदम नंगा हो जाता है. आइये इसे भी समझें.

    बौद्ध दर्शन के अनुसार वह पक्षी जो पेड़ के फलों और उसकी सुरक्षा का आनन्द ले रहा है उसका कोई सनातन या ठोस व्यक्तित्व नहीं है. उसका शरीर और मन दोनों ही क्षणभंगुर है. जैसे पेड़ का फल या पत्ता मौत/पेड़ से गिरने के बाद मिट्टी में मिलकर दूसरे पेड़ों या जंतुओं का चारा/भोजन/शरीर बन जाता है उसी तरह उस पक्षी का मन भी है जो मरने के बाद आसपास के वातावरण में धुवें की तरह फ़ैल जाता है और अगले आने वाले मनों के लिए चारा/भोजन बन जाता है. इस तरह शरीर और मन दोनों की समानांतर “फ़ूड चेन” होती हैं. इसमें आपका शरीर करोड़ों मर चुके लोगों, पेड़ों, जंतुओं के शरीर के टोकरी भर अवशेषों से बना है और आपका मन भी ऐसे ही करोड़ों लोगों के बिखर चुके मनों/विचारों के धुंवे के बादल से एक मुट्ठी धुंआ इकट्ठा करके बना है. इस तरह आपका शरीर भी प्रकृति से आया है और मन भी, आपका अपना कुछ नहीं, आप खुद भी कहीं नहीं हैं. इन दोनों बाहरी चीजों के मिलने से जो शरीर-मन का समीकरण बना है उसमें भी आपका समाज, धर्म, राज्य और परिवार एक ख़ास ढंग से रंग भरता है और एक झूठा व्यक्तित्व पैदा करता है. यही वह ‘व्यक्तित्व’ या ‘स्व’ है जिसे हम अपने होने के रूप में परिभाषित करते हैं. लेकिन सनातन या शाश्वत बिलकुल नहीं है.

    यह एकदम सांयोगिक है. आप अगर अभी हिन्दू घर में पैदा हुए हैं तो आपका ‘स्व’ या ‘व्यक्तित्व’ हिन्दू का है, आपको बचपन से ही मुसलमान परिवार रख दिया जाता तो आप मुसलमान का ‘स्व’ या ‘व्यक्तित्व’ बनाकर बैठ जाते. इस तरह कोई सनातन स्व या “आत्मा” या व्यक्तित्व नहीं है. सब क्षणभंगुर, परनिर्भर और संयोग से बना हुआ है ऐसे व्यक्तित्व की कोई ठोस या अनिवार्य या अनंताकालिक पहचान नहीं होती जो सदियों सदियों तक निरंतरता बनाये रखे. ऐसी निरंतरता (पुनर्जन्म) एक झूठ है. ऐसा व्यक्तिव सांयोगिक और क्षणभंगुर है, ये न सिर्फ जन्म और मृत्यु के बीच बदलता है बल्कि यह जीवन के दौरान भी तेजी से बदलता है. आप कोई ट्रेनिंग लेते हैं या किसी से बातचीत करते हैं या कोई नया अनुभव लेते हैं तो ये “आत्म” या “स्व” बदलता है. इसी को सेल्फ इम्प्रूवमेंट कहते हैं. यही व्यक्तित्व विकास या शिक्षा का आधार है. अगर स्व सनातन और अपारगम्य है तो शिक्षा और आत्मा विकास असंभव है तब सीखना सिखाना असंभव है. जैसे शरीर का भोजन बदलकर शरीर बदला जा सकता है वैसे ही मन का भोजन बदलकर मन (व्यक्तित्व, आत्म) को भी बदला या सुधारा जा सकता है.

    इस अर्थ में चूँकि शरीर भी बाहर से आ रहा है और मन या स्व भी बाहर से आ रहा है और उनमे समाज भी बाहर से रंग भर रहा है इसलिए इस व्यक्तित्व का अपना कुछ भी नहीं है. सब उधार और बाहरी है. उसका अपना कोई सनातन या शाश्वत गुण या अस्तित्व नहीं है. वह जिस भी परिस्थिति में फंस जाए वैसा ही मन या शरीर बना लेगा. इसीलिये ऐसे मन या शरीर से और इसके समुच्चय स्वरुप “स्व या आत्म व्यक्तित्व” से दूरी बनाना संभव है. अगर ऐसा मन शरीर और व्यक्तित्व सनातन या शाश्वत है तो ये दूरी असंभव है, तटस्थता या निर्भार होना असंभव है.

    अब दुबारा देखिये. बौद्ध दर्शन कहता है कि यह शरीर मन और इसका मिला जुला ढेर यानी यह व्यक्तित्व सब बाहरी और उधार माल है इसीलिये इसे और इसे सुख दुःख देने वाली चीजें भी बाहरी हैं. तब भीतर क्या है? बुद्ध कहते हैं कि भीतर शून्य है. यह बहुत बारीक बात है. असल में जो चेतना या होश इन सबको जान रहा है वह स्वयं में निर्वाण है. वह चेतना साक्षी या दृष्टा नहीं है बल्कि वह कोरा होश है. और यह होश पेड़ों में भी है जानवरों और इंसानों में भी है. उस चेतना या होश की संभावना के स्तर पर पूरे जीव जगत में कहीं कोई अंतर या भेदभाव नहीं है. इसीलिये बुद्ध और बौध दर्शन मनुष्य-मनुष्य ही नहीं बल्कि मनुष्य-पशु और मनुष्य-पादप विभाजन को भी खत्म कर देते हैं और एक सर्वसमावेशी एकता बनाकर सिद्ध कर देते हैं. इस प्रकार चूँकि बुद्ध के लिए कोई आत्मा या व्यक्तित्व (शरीर+स्व) है ही नहीं इसीलिये निर्वाण संभव है. न केवल संभव है बल्कि वही सच्चाई है और ‘निर्वाण हीनता’ एक झूठ है. इसीलिये बुद्ध निर्वाण को मानव का स्वभाव कहते हैं.

    लेकिन हिन्दू वेदान्त क्या कहता है? वेदान्त बुद्ध की आधी बात स्वीकार करता है और शेष आधी बात को नकारता है. हालाँकि नकार दी गयी शेष आधी बात से आने वाली टेक्नोलोजी को चुराकर उस पर अपना महल जरुर बनाता है लेकिन अपनी विशिष्ठता और मौलिकता की घोषणा करने के लिए एक षड्यंत्र भी बुनता है. वह षड्यंत्र क्या है? वह षड्यंत्र यह है कि अनत्ता या “अनात्मा” के दर्शन से आए वाली टेक्नोलोजी को इस्तेमाल करो और उसे “आत्मा” का नाम दे दो. मतलब ये कि शरीर और मन सहित आत्मा की क्षणभंगुरता के आधार पर शरीर और मन से दूरी बनाने वाले अभ्यास बौद्धों से सीख लो लेकिन उन्हें नाम ऐसा दो कि ये “अनात्मा की अनुभूति” का नहीं बल्कि “आत्मा के साक्षात्कार” करने का अभ्यास है.

    इसे ठीक से समझिये, जब अष्टावक्र, ओशो रजनीश, मोरारी बापू, रविशंकर, जग्गी वासुदेव, आसाराम बापू जैसे वेदांती बाबा ध्यान करवाते हुए ये कहते हैं कि शरीर को शिथिल करो, मन को शिथिल करो, मन और शरीर दोनों को भूल जाओ और विश्राम में प्रवेश करो तब असल में वे बौद्ध टेक्नोलोजी का ही प्रयोग कर रहे हैं. वे असल में प्रेक्टिकली यही कह रहे हैं कि शरीर तुम्हारा नहीं और व्यक्तित्व भी तुम्हारा नहीं है. और इसी क्रम में तुम भी तुम्हारे नहीं हो तो फिर झंझट क्या है? इन्हें भूल जाओ और सुखी हो जाओ. यही अष्टावक्र का महावचन है जो कि असल में बुद्ध की टेक्नोलोजी से चुराया गया है. “तू शरीर नहीं है, मन नहीं है, संस्कार नहीं है, स्मृति, कल्पना, भूत भविष्य और व्यक्तित्व नहीं है, – ऐसा जान ले और मुक्त हो जा” यही अष्टावक्र का जनक को उपदेश है. लेकिन अष्टावक्र या ओशो या आसाराम बापू जब ऐसे वेदान्त का पाठ पढ़ाते हैं तो एक भयानक गलती भी करते जाते हैं. उसी गलती से पकड में आता है कि पूरा वेदान्त बौद्ध दर्शन से चुराया गया है. आइये इस गलती को पकड़ते हैं. ये गलती क्या है?

    बुद्ध कहते हैं कि शरीर, मन, व्यक्तित्व और यह झूठी सत्ता (आत्मा) सब उधार हैं और बाहर से आये हैं इसीलिये इनको निरस्त कर देना संभव है. वेदान्त भी आधी बात मानता है कि शरीर और मन को निरस्त किया जा सकता है. लेकिन बुद्ध इसके आगे जाकर कहते हैं कि इस निरस्तीकरण के बाद कुछ शेष नहीं रहता, न अनुभव न ही अनुभोक्ता सब कुछ शून्य हो जाता है. यहाँ आकर वेदांती पंडित घबरा जाते हैं. हालाँकि वे निर्वाण की बाकी टेक्नोलोजी को चुराकर प्रयोग जरुर करते हैं लेकिन उसके तर्क की ह्त्या करके लोगों को उलझा देते हैं. इसी उलझन का नाम हिन्दू धर्म है. ये उलझन क्या है? गौर से देखिये. वेदांती पंडित कहते हैं कि यह मुक्ति संभव है और इस मुक्ति का आनंद लेने वाली सत्ता या आत्मा अजर अमर है. अब यह भयानक पाखंडी और विरोधाभासी बात है.

    असल में वेदान्त भी मानता है कि मैं और मेरे से मुक्ति ही असल मुक्ति है. लेकिन जब वे साधना, योग, तंत्र, मन्त्र आदि की शिक्षा देते हैं तो “मेरे” से मुक्ति की बात तो जरुर करते हैं लेकिन “मैं” से मुक्ति की असली बौद्ध सलाह को छुपा देते हैं. यही उनका षड्यंत्र है. वेदांती पंडित “मेरे” अर्थात “भौतिक मानसिक परिग्रहों” से मुक्त होने की सलाह और अभ्यास जरुर सिखाते हैं लेकिन “मैं” से मुक्त होने की सलाह नहीं देते, यह बौद्ध सलाह है जिसे वे छुपा देते हैं. वे इस मैं को एक सनातन आत्मा का नाम देकर खूंटे की तरह गाड़कर अमर कर देते हैं. हालाँकि फिर भी “मैं और मेरे” से मुक्ति की ढपली जरुर बजाते हैं ताकि उनकी प्रस्तावना बुद्ध की प्रस्तावना की तरह महान नजर आ सके. लेकिन आप सावधानी से देखें तो पकड लेंगे कि यहाँ क्या पाखंड चल रहा है.

    बुद्ध इस मुक्ति या निर्वाण को “मैं और मेरे” से सच्ची मुक्ति की तरह स्वीकार करते हैं और इसी स्वीकार से जन्मी टेक्नोलोजी बनाते हुए “मैं” (आत्मा या मन) और मेरे (शरीर, संबंध, संपत्ति आदि) को क्षणभंगुर और बाहरी करार देते हैं. इस प्रकार बंधन की शारीरिक या मानसिक संभावना पर पूरा विराम लगा देते हैं. लेकिन वेदान्त क्या करता है? वेदान्त “मेरे” से मुक्ति का खूब शोर मचाता है और उस “मेरे” का दलदल या भूसा पैदा करने वाले “मैं” (गेहूं) अर्थात आत्मा को सनातन, शाश्वत और परमात्मा का अंश बनाकर एकदम खूंटे की तरह गाड़ देता है.

    यही वेदान्त का असल षड्यंत्र, कन्फ्यूजन और चालाकी भी है. जब आप आत्मा या स्व को मानकर “मैं” को मजबूत करेंगे तो “मेरा” का दलदल अपने आप पैदा होगा ही. ये एकदम स्वाभाविक है. इस तरह आप अंदर से अधिक परिग्रही और मोही होते जायेंगे. अब जैसे जैसे ये परिग्रह भाव और मोह बढेगा वैसे वैसे आपकी आत्मग्लानि बढ़ेगी, इसी क्रम में आप दुखी और कन्फ्यूज होते जायेंगे और इस तरह आप संशय ग्रस्त होकर कमजोर होंगे और वेदांती पंडित इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए आपका शोषण करेगा. तब वह अपना असली खेल शुरू करता है. इस कमजोरी और संशय की हालत में वह अपना रोजगार और अधिसत्ता को कायम रखने का असली जुगाड़ बनाता है और आपको इसकी भनक भी नहीं लगती.

    लेकिन इस संबंध में बुद्ध क्या करते हैं? बुद्ध कहते हैं कि “मेरा” तो उधार है ही “मैं” (स्व,आत्मा, मन) भी उधार और बाहरी ही है. इसे जान लेने के बाद “मैं” को बचाने की हवस ही खत्म होने लगती है और मजे की बात ये कि “मेरा” को मिटाने या नकारने की तब कोई जरूरत नहीं रहती. अगर “मैं” (आत्मभाव/ खुदी का अहसास) नाम का गेंहू ही कमजोर होने लगे तो उससे पैदा होने वाला भूसा (अर्थात “मेरा”) कितनी देर टिकेगा और कैसे पैदा होगा? इस तरह बुद्ध मैं और मेरे से मुक्ति का जो दर्शन और लक्ष्य बताते हैं उसे अपनी प्रस्तावना और साधना की टेक्नोलोजी में इमानदारी से अंजाम तक पहुंचाते भी हैं. बीच में कोई कन्फ्यूजन पैदा नहीं करते. इसीलिये उनकी टेक्नोलोजी “आत्म के विश्लेषण” की टेक्नोलोजी है “आत्मसाक्षात्कार” की टेक्नोलोजी नहीं है. आत्मसाक्षात्कार दुनिया का सबसे झूठा जहरीला और पाखंडी शब्द है, ठीक ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की तरह.

    लेकिन ओशो, जग्गी वासुदेव या आसाराम बापू जैसे वेदांती गुरु आधी बात में उलझाकर संशय में डाले रखते हैं और इस संशय में असल सोशल-इंजीनियरिंग और वर्णाश्रम का खेल खेलते हैं और एक ख़ास तरह की धर्मसत्ता और राजनीतिक सत्ता को बनाये रखते हैं. इस तरह गौर से देखें तो वेदान्तिक अध्यात्म असल में ब्राह्मणवादी सत्ता को बनाये रखने का सबसे सूक्ष्म और परिष्कृत हथियार या जाल है. इसमें फंसने वाले को जिन्दगी भर ये समझ नहीं आती कि “मैं और मेरे” से मुक्ति की बात करने वाले “मैं” को सनातन क्यों बता रहे हैं? ये सवाल ही पैदा नहीं होने दिया जाता उनके मन में. वे सोच ही नहीं पाते कि अगर कोई चीज सनातन या शाश्वत है या सर्वय्व्यापी परमात्मा का अंश है तो उससे मुक्ति भी संभव नहीं है. मुक्ति या दूरी उसी चीज से संभव है जो क्षणभंगुर है, सीमित और परिवर्तनशील है.

    इस समझ को पैदा होने से रोके रखने के लिए जो षड्यंत्र रचा गया है वही वेदान्त और उसका मायावाद है. इसे सभी लोगों को और खासकर दलितों, आदिवासियों, शूद्रों (ओबीसी) और स्त्रीयों को ठीक से समझ लेना चाहिए.

    (लिखी जा रही और शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)

    – © संजय जोठे 

  • भारतीय अध्यात्म, प्रतिक्रांति का सनातन अस्त्र –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।


    भारत में सामाजिक राजनीतिक बदलाव को रोकने के लिये सबसे कारगर हथियार की तरह जिस उपकरण को सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है वो है भारत का धर्म और अध्यात्म। भारत का धर्म और इसका पलायनवादी अध्यात्म भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है लेकिन दुर्भाग्य ये कि इसे ही भारत की केंद्रीय संपदा के रूप में प्रचारित किया जाता है। ये हजारों साल से चला आ रहा षड्यंत्र है और जब तक भारत अकेला था, तब तक ये षड्यंत्र सफल भी होता रहा। लेकिन जैसे ही व्यापार, राजनीति और सामरिक समीकरणों में अन्य सभ्यताओं और मुल्कों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई वैसे ही इस षड्यंत्र की पोल खुल गयी और भारत हर सदी में किसी न किसी का गुलाम होता गया।

     

    पौराणिक कहानियों में हम जिस भारत या समाज को पाते हैं वो कभी जमीन पर रहा ही नहीं। असल में भारत का पुराण और मिथकशास्त्र भारतीय आध्यात्मिक षड्यंत्र का स्वाभाविक परिणाम हैं, जिसने इतिहास बोध, न्याय बोध और सभ्यता बोध को पनपने ही नहीं दिया। आद्यात्म पढ़े लिखे वर्ग को बाँझ बनाता है और मिथक या पुराण गरीब अनपढ़ वर्ग की गर्दन कसता है, और इस खेल का नियंत्रण ब्राह्मणवाद के हाथ में उनके शास्त्रों के और व्याख्याओं के जरिये होता है। ये तरीका हर दौर में आजमाया गया है और कामयाब रहा है। क्षत्रियों को परशुराम के द्वारा से और वैश्यों को सत्यनारायण के द्वारा काबू किया गया और शूद्रों को पुनर्जन्म से कसा गया। ऐसे हर दौर में भारत के भीतर ही भीतर चार वर्णों की व्यवस्था में एक वर्ण का आधिपत्य बनाये रखने में ये सबसे सफल रणनीति रही है।

     

    जब क्षत्रियों वैश्यों शूद्रों और जनजातीय समाजों को काबू में रखना था तब तक ये आद्यात्मिक पौराणिक षड्यंत्र बहुत सफल रहा। जब तक “काबू किये जाने योग्य” जनसँख्या भारतीय ढंग के आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म में भरोसा करती रही और इन चीजों से डरती रही तब तक ये व्यवस्था बेहतरीन ढंग से चलती रही। यहां तक सफल रही कि धर्म की रक्षा को ही जीवन और विकास की गारंटी मान लिया गया। वर्ण और आश्रम का पालन ही धर्म बन गया। और धर्मो रक्षति रक्षते जैसी उक्तियाँ और अहम ब्रह्मास्मि जैसे निहायती षड्यंत्रपूर्ण और तर्कविरोधी वक्तव्य इसी दौर में उभरे और छा गए, इनका प्रकोप अभी भी बना हुआ है।

     

    भारतीय धर्मभीरु जनसँख्या को काबू करने में मिली यह सफलता ज्यादा देर टिक न सकी। जब यवनों, अफ़ग़ानों, तुर्कों, मुगलों, ब्रिटिशों का प्रवेश हुआ तो उन्हें भारतीय ढंग के धार्मिक भयों की कोई चिंता नहीं थी वे एक तुलनात्मक रूप से सभ्य और संगठित समाज से आये थे और इसी कारण उन्होंने भारत को तुरंत गुलाम बना लिया और भारत के धर्मभीरु और उनके वेदांती आका समझ ही न सके कि ये क्या हो गया? वेदांती आका तो फिर भी इस गुलामी में अपनी सत्ता बहुत ढंग से बचाकर रख सके लेकिन क्षत्रियों, राजपूतों, वैश्यों, शूद्रों को बहुत अपमान और पीड़ा से गुजरना पड़ा। इस एक हजार साल से लंबी गुलामी में वेदांती पुरोहित वर्ग ने गुलाम बनाने वाली कौमों से भी समझौते कर लिए और गुलाम हुई भारतीय धर्मभीरु जनता पर धार्मिक अंधविश्वासों, मिथकों, पुराणों और जाति व्यवस्था का शिकंजा और अधिक कस दिया ये आजकल और तेज हो गया है।

    मुसलमानों की हुकूमत में ब्राह्मणी आधिपत्य को बहुत व्यवस्थित चुनौती नहीं मिली लेकिन ब्रिटिश आधिपत्य में ब्रिटशों ने शिक्षा, भाषा, धर्म आदि में सीधा हस्तक्षेप शुरू कर दिया इससे ब्राह्मणवाद तिलमिला उठा और यूरोपीय पुनर्जागरण के ही तत्वों से प्रभावित होकर छुटपुट सुधार और बदलाव भी करने लगा। तब तक चूँकि आधुनिकता, विज्ञानवाद और औद्योगीकरण की हवा बन चुकी थी जिसका अंग्रेजी शिक्षा द्वारा लाभ उठाकर भारतीय मध्यमवर्ग समाज बदलाव के लिए तैयार होने लगा।

    लेकिन आजादी के काफी पहले विश्वयुद्धों और आर्थिक मन्दियों के परिणाम में ये तय हो चुका था कि ब्रिटिश सत्ता ज्यादा देर भारत को गुलाम नहीं रख सकेगी तब भारतीय वेदान्तियों ने अपनी सनातन कला को फिर से चमकाना शुरू किया। जिन शास्त्रों कर्मकांडों रहस्यवादी शिक्षाओं ने इस मुल्क को गरीब गुलाम और बुजदिल बनाया था उन्ही शास्त्रों, धर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को फिर से प्रचारित करने का काम शुरू हो गया। यूरोपीय सभ्यता में रचे बसे थियोसोफिकल सोसाइटी, अरबिंदो घोष, विवेकानन्द, राममोहन रॉय, केशब चन्द्र, देबेन्द्रनाथ और अन्य अनेक लोगों ने ईसाई धर्म की नकल में एक नया धर्म बुना जो सामाजिक सुधार और ईसाई मिशनरी सेवा से प्रेरित था। यह नियो वेदांत या नियो हिंदूइस्म है जिसे हम आज देख रहे हैं। विवेकानन्द ने तो आयरलैंड की एक प्रशिक्षित कैथोलिक नन को बाकायदा ऐसा धर्म और मिशनरी काम सिखाने के लिए भारत बुलाया था। उन्हें भगिनी निवेदिता कहा जाता है।

    आजादी के बाद, देश के विभाजन के बाद वेदांती हिंदूवादी सत्ता को अपनी सुरक्षा की चिंता बराबर बनी रही। इसी दौर में धीरे धीरे ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण उभरा और बाद में शिखर पर पहुंचा। 50, 60, से लेकर 90 के दशक तक भारतीय पोंगा पंडितों ने इस नियों हिंदुइज्म को पश्चिमी मापदण्डों के अनुरूप और विज्ञान के अनुरूप ढालने का व्यवस्थित ढंग से काम किया लेकिन इस जाति व्यवस्था ने उनकी फांसी लगा दी। वे जितना ही महान बनने की कोशिश करते उतना ही भारत की गरीबी गन्दगी और सामाजिक छुआछूत के सवाल उनसे टकराने लगते। ऐसे में हिन्दू धर्म को ईसाई मिशनरी समाजसेवा प्रधान धर्म की फोटोकॉपी में बदल देने का जो प्रोजेक्ट हाथ में लिया वह असफल होने लगा।

    हालाँकि तब तक स्वतंत्र भारत में वर्ण व्यवस्था के शिखर पर बैठे लोगों ने फिर से सत्ता कायम कर ली और वे देख सके कि ईसाई धर्म की सभ्यता और समाज सेवा भारत में फ़ैल गयी तो उनकी सत्ता को शुद्र, आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों की टक्कर मिलने लगेगी। अंबेडकर, फुले, पेरियार ने तब तक यह हकीकत में करके दिखा भी दिया था।

    ऐसे में बड़ा संकट पैदा हुआ, नेहरू के सुधारों ने जिस समता और सबलीकरण की इबारत लिखी वह कुछ हद तक ही लेकिन सही दिशा में सफल रही और पिछड़ी जातियों और स्त्रियों में विराट शक्ति पैदा हुई। इन “पापयोनियों” की शक्ति बढ़ते देख पोंगा पंडितों को बड़ी चिंता हुई। अब ऐसे धर्म की जरूरत थी जो आभासी जगत में शुध्द बुद्ध होने और सबके समान होने की बात करे और सामाजिक बदलाव को भी एकदम असंभव कर दे। मतलब आश्रम की दीवार के अंदर भाईचारा, प्रेंम, सहभोज और फ्री सेक्स तक दे सके लेकिन आश्रम की दीवार के ठीक बाहर जाति और लिंग का विभाजन तुरन्त शुरू हो जाए।

    अब यह काम कैसे हो और कौन करे?

    यह काम अरबिंदो, विवेकानन्द, ओशो, आसाराम बापू जैसे लोगों ने किया। अध्यात्म और परलोक का ऐसा जाल बुना गया जिसमें कहा गया कि समाज कैसा भी सड़ता रहे तुम ज्ञान ध्यान और मोक्ष में लगे रहो। अद्वैत का प्रचार हुआ कि कण कण में ब्रह्म है, “तत्वमसि” तुम वही ब्रह्म हो, सब पंचतत्व के पुतले हैं कोई भेद नहीं। साथ ही जाति, वर्ण और लिंग के भेद और दान इत्यादी भी चलता रहा।

     

    बाद में शहरी जीवन में जाति और लिंग के भेदभाव ने शहरी मध्यम वर्ग को और अधिक डरा दिया। पहले ही भारतीयों में आपस में सहयोग, संबन्ध और प्रेम नहीं था ऊपर से शहरी जीवन की असुरक्षाओं ने मध्यम वर्ग को और डरा दिया। युवा वर्ग यूरोपीय सभ्यता, मुक्त मित्रता और मुक्त प्रेम के वातावरण से मोहित हो ही चूका था और भारतीय बाबाओं ने इसी सम्मोहन और प्यास को आटा बनाकर धर्म के कांटे पर लगाकर तीन पीढ़ियों का शिकार किया। जो मैत्री, प्रेम, सहकार, सहभोज, सुरक्षा और अपनापन समाज में युवाओं को नहीं मिलता वह आश्रमों में परोसा जाने लगा। कामकाजी वर्ग भी इस “आसान और आभासी” इंसानियत से प्रभावित होने लगा और इन बाबाओं योगियों ने बड़ी कुशलता से आध्यात्मिक पलायनवाद में शहरी कामकाजी युवावर्ग को फंसा लिया, इसी युवावर्ग में सामाजिक बदलाव की ललक उठती है, उसे नियों वेदान्तिक अध्यात्म में फंसाकर बाँझ बना दिया। 

     

    अब मजा ये कि उस धर्म और अध्यात्म के ठीक समानांतर धर्म और कॉरपोरेट का नया समीकरण बन गया जिसने राजनीति को अपने ढंग से चलाना शुरू किया। अद्वैत और छुआछूत की समानांतर पटरियों पर  पर ब्राह्मणवाद की ट्रेन फिर चलने लगे और राजनीति और कॉरपोरेट का ईंधन उन्हें तेजी से धार्मिक राष्ट्रवाद की तरफ खींचने लगा। भारतीय बाबा कारपोरेट और राजनेता अपने काम में सफल रहे। इस काम में उन्हें सबसे बड़ी चुनौती कबीर, गोरख और बुद्ध से मिली। लेकिन उसका इलाज भी ढूंढ लिया गया। बुद्ध को विष्णु, कबीर को वैष्णव और गोरख को शिव अवतार बनाकर खत्म कर दिया और उनकी शिक्षाओं को वेदान्तिक शिक्षा की तरह पुनर्जन्म और सनातन आत्मा में लपेटकर पेश कर दिया गया। अब कोई समस्या नहीं रही।

    अब इसके बाद का भारत आपके सामने है। अभी जितने बाबा योगी और गुरु हैं उन्हें और उनकी शिक्षाओं को कॉर्पोरेट और राजनीति के साथ मिलाकर इस नजर से देखिये, तब आप समझ सकेंगे कि भारतीय धर्मगुरु कितने खतरनाक मिशन में किस योजना से लगे हुए हैं। और इन गुरुओं में सबसे प्रभावशाली गुरु रहे हैं ओशो उन्होंने इस पतन में चार चांद लगा दिया। आज के पोंगा पंडितों की पूरी फ़ौज के भीष्म पितामह वे ही हैं।  आज ओशो रजनीश का जन्मदिन है। आज उन पर गहराई से विचार करें और सोचें कि इन बाबाओं, नेताओं और उद्योगपतियों के षड्यंत्रों से भारत की जनता को कैसे बाहर निकाला जाए।

     

  • कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है –Sanjay Jothe


     

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

     

         

    कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है। ऐसा क्यों है? ऐसा होना नहीं चाहिए, लेकिन है। सृजनात्मक लोगों के बीच इस तरह मेलजोल और एकता क्यों नहीं है? एकता एक नैतिक प्रश्न है अगर आपकी नैतिकता विखण्डन और विभाजन के चारे से बनी है तो सृजनात्मक आयामों में भी एकता नहीं बन पाएगी।

     

    इतिहास में देखें समाज के सबसे शक्तिशाली आयाम – राजनीति के प्रति भी हमारी जनता में एक उपेक्षा फैलाई गई थी जो अभी भी बनी हुई है- “कोउ नृप होय हमे का हानि”, ये वक्तव्य सभ्यता और एकता वाले समाज में असंभव है हाँ विभाजन वाले और असभ्य समाज में ये न केवल संभव है बल्कि यही उसके सार्वजनिक और सामाजिक जीवन का एकमात्र नियम भी है। कोई भी राजा हो हमें क्या मतलब – इसका अर्थ है कि आपके राजा और राजगुरु, राजसत्ता आपके हितैषी नहीं हैं और आपको उनसे कोई लगाव नहीं है। मतलब कि देश, इतिहास, भूगोल सहित धर्म और समाज की धारणा ही यातो अभी यहां जन्म नही ले पायी है या मिटा दी गयी है।

     

    ये धारणा क्यों जन्म नहीं ले पायी? या क्यों मिटा दी गयी? इस प्रश्न के उत्तर में भारत के पूरे इतिहास और मनोविज्ञान का सार छुपा हुआ है। अभी किसी गाँव में जाइये किसी हेण्डपम्प या तालाब या कुवें के पास खड़े हो जाइये अगर वो सूख रहा है तो पूरे गाँव को एक जैसा दुःख नहीं होता। समाज के एक बड़े वर्ग के लिए पानी का ये स्त्रोत उपलब्ध ही नहीं, उसे इस स्त्रोत के पास फटकने ही नहीं दिया जाता। ये ताल या हेण्डपम्प सूख मरे तो वे लोग कहेंगे हमे क्या मतलब सूखे तो सूख जाए। इसी तरह जिन व्यापारों, व्यवसायों में आपका या आपके परिवार, रिश्तेदारों का दखल या हित नहीं है उनके बन्द हो जाने पर या उन पर हमला हो जाने पर आप कह सकते हैं कि हमें क्या मतलब आपका बिजनेस डूबता है तो डूबे। इसी तरह जिन जातियों में आपके लोगों का भोजन या विवाह नहीं होता वे गुलाम हों या दंगे में मरें, आपको कोई फर्क नही पड़ता। अगर आपके रिश्तेदार और हितैषी हर जाति हर वर्ग में हों तो आपको उन जातियों वर्गों की ख़ुशी या सुख से सहानुभूति होगी।

    लेकिन भारत में एक किस्म का “सामाजिक वैराग्य” बनाकर रखा जाता है ये वैराग्य नहीं बल्कि पलायन और छुआछूत है, जिम्मदारी से भागने का दूसरा नाम है। इससे समाज विभाजित कमजोर और जातिवादी बना रहता है। इसीलिये गौर से देखिये तो साफ़ समझ में आएगा कि ओशो, रविशंकर, जग्गी वासुदेव जैसे भारतीय धर्मगुरु, योगी, बाबा आदि ऐसे वैराग्य और मोक्ष की धारणा से भरा जहरीला अध्यात्म हर एक पीढ़ी को पिलाते रहते हैं। ये बाबा हर पीढ़ी को पलायनवादी वेदांत सिखाते चलते हैं। इनका एकमात्र फायदा इस बात में है कि भारत की गरीब दलित दमित जनता इस सामंती और पुरुषसत्तावादी धर्म से आजाद न हो जाए। कर्मकांड न सही तो अध्यात्म की रस्सी से ही ये धर्म के खूंटे से बंधी रहे। ताकि उनका कुआँ न सूखे।

    इसी तरह आज के फ़िल्मकार साहित्यकार चित्रकार और सृजनधर्मी लोग हैं। सबके अपने कुवें और हेण्डपम्प है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। यहां अपनी झोली भर जाए तो मोक्ष मिल जाता है बाकी समाज और दुनिया जाये भाड़ में अपना कुटुंब ही वसुधैव कुटुंब है।

    हसन निसार ने एक चर्चा में थॉमस रो का उदाहरण देते हुए कहा है कि अंग्रेजी अधिकारियों ने जब भारत में पैर फ़ैलाने शुरू किये तो मुगल दरबार में किसी बादशाह के बीमार बेटे का उन्होंने एलोपैथी से इलाज किया बेटा स्वस्थ हुआ तो बादशाह ने खुश होकर कहा कि इस अंग्रेज के वजन के बराबर सोना तौलकर इसे दिया जाए। अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि बादशाह मुझे ये सोना नहीं चाहिए बस मुझे और मेरी कौम को हिंदुस्तान से व्यापार की इजाजत दे दीजिए।

    इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। हालाँकि इसका ये अर्थ नहीं कि उन अंग्रेजो की लूटमार भरी नैतिकता सर्वथा प्रशंसनीय है। लेकिन फिर भी कुछ श्रेष्ठता का तत्व तो उनमें है ही। उसी श्रेष्ठता ने भारत को आधुनिकता और सभ्यता दी है।

    अब देखिये, भारत में जब साहित्यकारों पर हमले होते हैं तो फिल्मकार बिरादरी को फर्क नहीं पड़ता। फिल्मकारों पर हमले होते हैं तो खिलाडियों को फर्क नहीं पड़ता। वो तो आजकल फिल्मकारों और खिलाड़ियों में प्रेम विवाह और अंतर्जातीय अंतरधार्मिक विवाह होने लगे हैं इसलिए उनके बीच एकता जन्म ले रही है। डॉ. अंबेडकर ने इसीलिये अंतर्जातीय विवाह की सलाह दी थी, बॉलीवुड और क्रिकेट के बीच वह सलाह बढ़िया काम कर रही है। लेकिन साहित्य, संगीत कला आदि में अभी भी मनुस्मृति ही चल रही है।

    अब बड़ा प्रश्न ये है कि साहित्य और खेल या साहित्य और फिल्म के बीच ये प्रेम क्यों नहीं पनप रहा है?

    इसका बहुत गहरा कारण है। साहित्य और फिल्म इतने गहराई से और सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं कि उनके सन्देश से बड़ा बदलाव आ सकता है। इसीलिये इस देश के धर्म संस्कृति के ठेकेदारों को पता है कि साहित्यकार और फिल्मकार तबकों को कंट्रोल करके रखना है वरना यहां की जनता कला के सृजनात्मक आयामों की शक्ति से परिचित हो गयी तो इस देश पर शोषक धर्म की सत्ता खत्म हो जायेगी।

     

    इसीलिये बहुत सोच समझकर साहित्य में भी जन विमर्श को अदृश्य बनाकर देवी देवता, भक्ति, राजे रजवाड़े, मिथक, महाकाव्य आदि की चर्चा चलती रही है। हजारों साल से इस मुल्क के साहित्य में आम आदमी की कोई बात नहीं हो रही थी, 1935 तक मुख्यधारा के साहित्य में जिस तरह का नायिका विमर्श और श्रृंगार वर्णन चला उसे देख लीजिये। वो तो भला हो कार्ल मार्क्स और अन्य दार्शनिकों का जिन्होंने भारतीय विद्वानों को पहली बार जन हितैषी साहित्य रचना सिखाया। वरना आज तक नख शिख वर्णन और भजन कीर्तन स्तुतियाँ इत्यादि ही चलती रहती।

    हालाँकि मार्क्स के आने के बाद भी भारतीय भक्ति का आभामण्डल कम नहीं हुआ है। आज भी कला, संगीत, साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र उसी परलोकी, आत्मघाती अध्यात्म में जड़ जमाये हुए है। आज भी कला के आनन्द की उपमा ‘विदेही भाव, समाधी भाव और समय की स्तब्धता’ से दी जाती है। मतलब इस लोक से हटकर परलोक में ले जाने वाली कला ही महान कला है। बाकी सब बेकार है। ये सब उसी जहरीले कुवें से निकलने वाली शब्दावली है जिसने स्त्री अधिकार और स्त्री विमर्श की बजाय नायिका विमर्श पैदा किया था। या जिसने दलित साहित्य की बजाय “दास्य भक्ति साहित्य” पैदा किया था।

    साहित्य के बाद जब फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो भारत का यही देवता विमर्श या नायिका विमर्श भक्ति में और इश्क मुहब्बत की छिछोरी रंगीनियों में ट्रांसलेट हो गया। हालाँकि यूरोप में भी फ़िल्मी सफर ऐसे ही शुरू हुआ था। पहले धर्म फिर इश्क मुहब्बत। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने अन्य विषय भी सीख लिए। बायोग्राफ़िकल, हिस्टोरिकल, डॉक्यूमेंट्री स्टाइल फिल्में वहां खूब सराही जाती हैं। इधर भारत में इसकी कल्पना ही असंभव है। यहां अभी भी रामलीला चल रही है। स्त्री विमर्श सास बहू विमर्श बना हुआ है। एक सभ्य और इंसानी समाज होने के नाते यूरोप में उन्होंने इंसानी अधिकारों की परिभाषा जल्द सीख ली और अपने साहित्य औऱ फिल्मों में उसे अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। लेकिन हमारा देश धर्मप्राण होने के नाते आज भी देवी देवताओं और मिथकों महाकाव्यों में ही घुसा जा रहा है, बहुत हुआ तो इश्क मुहब्बत और शादी के वीडियो चला देते हैं या चलताऊ देशभक्ति के हैंडपंप उखाड़ने वाले “गदरीले नायक” रच देते हैं।

    भारत का साहित्य और फिल्म आज भी पूरी तरह जन विमर्श में नहीं उतर सका है। अभी भी पुराने सौन्दर्यशास्त्र का मोह ऐसा बना हुआ है कि समानता, प्रेम, स्त्री अधिकार, दलित अधिकार की प्रस्तावनाओं से डर लगता है। और तो और बच्चों को भी वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा देने से डर लगता है कि कहीं वे अधर्मी न हो जाएं। इसीलिए सारे बाबा योगी और पंडित मिलकर बच्चो को ध्यान योग और प्राणायाम के नाम पर विभाजन और इंसानियत के विरोध के “संस्कार” सिखाते हैं।

    ये विभाजक संस्कार असल में भारत को पुराना भारत बनाये रखने की सनातन साजिश है। इसलिए सिनेमा, साहित्य, पत्रकारिता और सभी कलाओं में ठीक राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका की ही तरह सवर्ण द्विजों का ही आधिपत्य बना हुआ है। वे तय करते हैं कि किस गुण को किस भाषा में सद्गुण सिद्ध करना है। किस गुण को मानव हितैषी और “वसुधैव कुटुंब” के “अनुकूल” सिद्ध करना है या “प्रतिकूल” सिद्ध करना है। इन परिभाषाओं से अंततः वे कहाँ और कैसे पहुंचना चाहते है ये वे बहुत सावधानी से तय करते हैं। वे एक ऐसे सर्वोदय या रामराज्य की रचना करते हैं जिसमे वर्ण व्यवस्था भी जारी रहे और वर्णानुकूल कार्य करते हुए “स्वधर्म” पालन करने वाले “संस्कारी पुरुष” और “सुशीला स्त्री” सहित सभी बच्चे तर्क और मानव अधिकार भूलकर संस्कारी भी बनी रहें और यूरोपीय कला, साहित्य, सिनेमा, विज्ञान तकनीक आदि को ऊपर ऊपर सीखकर प्रगतिशील भी बने रहे। भीतर हनुमान चालीस चलती रहे और ऊपर ऊपर “वी शल ओवरकम” या “तुंकल तुंकल लिटिल इश्टार” भी चलता रहे। ऊपर टाई और भीतर जनेऊ चलती रहे। काउबॉय हैट के नीचे संस्कारी चोटी सरकती भी रहे।

    जब कला और कलाओं के प्राप्य या करणीय के प्रति आपके विद्वानों और “विद्वान षड्यंत्रकारियों” का ये रुख है तो आपकी कला और साहित्य भी विभाजन ही पैदा करेंगी और खुद भी विभाजित होंगी। उनमे आपसी मेलजोल से अंतर्जातीय विवाह नहीं होंगे बल्कि छुआछूत पैदा होगी इंटेरडीसीप्लिनरिटी या इनोवेशन का पुरस्कार या प्रेरणा नहीं होगा बल्कि व्यभिचार की टीस और “नीच वर्णसंकर” पैदा होने का भय होगा।

    ऐसी भयभीत और अनैतिक कौम से आप कैसे उम्मीद करेंगे कि वे कला या सृजन के नाम पर एकदूसरे के साथ खड़े हों? क्यों उम्मीद करेंगे? साहित्य, कला, सिनेमा और पत्रकारिता में भी जिन लोगों का दबदबा बना हुआ है क्या वे इन सृजनात्मक आयामों में कोई सार्थक एकता सिद्ध होने देंगे? क्यों होने देंगे? जबकि वे बखूबी जानते हैं कि इन आयामों में एकता का अर्थ होगा भारतीय शोषक संस्कृति का निर्णायक अंत। क्या वे इतने मूर्ख हैं कि अपनी परम्परागत सत्ता, आजीविका और भविष्य को नष्ट कर दें?

    इसीलिये भारतीय फिल्मकार पत्रकार और खिलाड़ी भारतीय समाज की समस्याओं पर कुछ नहीं बोलते। वे किस जाति या वर्ण से आते हैं ये देख लीजिए आपको उनकी चुप्पी और तटस्थता का कारण समझ में आ जायेगा। मुहम्मद अली ने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बोलते हुए सरकार से और धर्म से कड़ी टक्कर ली थी, कई हॉलीवुड सितारों ने भी इसी तरह हिम्मत दिखाई। तत्कालीन यूरोप में चार्ली चैपलिन ने और सैकड़ों साहित्यकारों रंगकर्मियों ने ये साहस दिखाया था। लेकिन हमारे क्रिकेट के भगवानों और महानायको ने क्या किया? इन्होंने कभी गरीब मजलूम और स्त्री अधिकार की बात नही की। बल्कि हर दौर में बदलते राजनितिक आकाओं के सामने इन्होंने सकर्वजनिक रूप से साष्टांग प्रणाम किये हैं। इसका क्या मतलब है?

    धर्म सत्ता अर्थसत्ता और राजसत्ता के समीकरण की एक ही चाबी है उस चाबी को सब मिल जुलकर संभालते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे सौंपते जाते हैं। इस प्रवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। इस बीच “शुद्रा दी राइजिंग” या “शरणम गच्छामि” जैसी फिल्में बनें या ऐसा साहित्य लिखा जाने लगे तो उसे बैन कर दिया जाता है। समाज के लिये घातक सिद्ध करके सेंसर कर दिया जाता है। लेकिन घर घर में मूर्खता और अनैतिकता फ़ैलाने वाले मिथक और महाकाव्यों आधारित सीरयल लगातार बढ़ते ही जाते हैं। ये सब अपने आप ही नहीं होता, इसके पीछे बहुत निर्णयपूर्वक सचेतन ढंग से कोई यांत्रिकी काम करती है।

    तो अंततः यह लिख कर रख लीजिए कि जब तक भारत में कला, संगीत, पत्रकारिता और सृजन के आयामों में स्वर्ण द्विजों और ब्राह्मणवादियों का कब्जा है तब तक साहित्य, गीत, संगीत, सिनेमा पत्रकारिता और खेल भी आम भारतीय के विरोध में ही काम करेंगे। जैसे भक्तिकाल और नायिका विमर्श को मार्क्स ने टक्कर दी थी उसी तरह संस्कृति और धर्म के विमर्श को अब अंबेडकर टक्कर दे रहे हैं। मार्क्स से बहुत कुछ सीखा है इस मुल्क ने, अब अंबेडकर से सीखने की जरूरत है। तभी भारत सच में सृजनशील और सभ्य बन सकेगा।

     

     

  • सत्य, सत्याग्रह, शूद्र, दलित और भारतीय नैतिकता –Sanjay Jothe

    संजय जोठे ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं।  मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।  सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के  मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।


    सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों में एक लंबे समय से “आत्मपीड़क सत्याग्रह” प्रचलन में बने हुए हैं. ऐसे भूख हड़ताल, उपोषण, आमरण अनशन जैसे तरीकों से समाज के एक बड़े वर्ग को झकझोरने में सफलता भी मिलती आई है. ये तकनीकें और “टूल” सफल भी रहे हैं और उनकी सफलताओं से जन्मी असफलताओं को हमने खूब भोगा भी है. पूना पैक्ट की प्रष्ठभूमि में किया गया आमरण अनशन, या भारत की आजादी की रात फैले दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक दंगे को शांत करने के लिए किया गया अनशन हो या पूर्वी पश्चिमी पाकिस्तान की तरफ बलात भेजे जा रहे अल्पसंख्यकों की चिंता से उभरा अनशन की धमकी हो, गांधी जी ने अनेकों अवसरों पर अनशन और उपोषण को एक नैतिक उपाय या उपकरण की तरह इस्तेमाल किया है और उनके सदपरिणामों और दुष्परिणामों ने मिलकर ही उस समाज की रचना की है जिसमे बैठकर हम इन पंक्तियों को लिख या पढ़ रहे हैं.

    निश्चित ही साधन शुद्धि की बात करने वाले गांधीजी का आग्रह जिसे वे “सत्याग्रह” कहते रहे थे, एक शक्तिशाली रचना थी जिसमे समाज की “प्रचलित नैतिकता” को सम्मोहित करने और झकझोर देने की बड़ी ताकत थी. एक “अधनंगे हिन्दू संत” की छवि गढ़ने में उन्होंने जो सचेतन निवेश किया था जिसकी सफलता ने उन्हें एक ख़ास उंचाई तक पहुँचाया था, उस उंचाई पर साधन की शुद्धता की बहस में साध्य की शुद्धता की बहस को एकदम से विमर्ष से गायब कर देने में सफल हो सके थे. हालाँकि डॉ. अंबेडकर जैसे लोगों ने साध्य की शुद्धता पर साधन, साध्य और शुद्धता जैसे शब्दों की महिमा को अस्वीकार करते हुए बड़े तार्किक प्रहार किये थे लेकिन उन प्रहारों का असर उतना नहीं हुआ जितना होना चाहिए था. ये असर हो भी नहीं सकता था, और ये विवशता आज भी जस की तस बनी हुई है. या कहें कि ये विवशता अब कहीं अधिक बढ़ गयी है, आज धर्मप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की परिभाषाएं जिस अर्थ में बदली हैं और ‘गांधी के रामराज्य’ पर ‘रामराज्यवादियों का गांधी’ जिस तरह हावी हो चुका है उस हालत में अब साधन या साध्य शुद्धि की बहस में अब गांधी खुद भी आ जाएँ तो वे भी निराश होकर लौट जायेंगे.

    सत्याग्रह का यह सत्य और ये साधन शुद्धि क्या है? आइये इसमें प्रवेश करते हैं. गांधीजी जिस ढंग की नैतिकता और शुचिता को समाज मनोविज्ञान के बदलाव के एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं वह एक ख़ास तरह की प्रष्ठभूमि से आती है. असल में वे शुद्ध साधन से शुद्ध साध्य तक नहीं पहुँच रहे हैं बल्कि शुद्ध साध्य की अपनी विशिष्ट कल्पना से किसी शुद्ध साधन को ‘बेक प्रोजेक्शन’ की तरह निर्मित कर रहे हैं. सरल भाषा में कहें तो वे पहले एक अहिंसक, नैतिक, धर्मप्राण, हिन्दू अर्थ के रामराज्य की कल्पना करते हैं और उसे साकार करने के लिए जो भी करणीय है उसे “शुद्ध साधन” की तरह प्रचारित और प्रयोग करने लगते हैं. ऐसे प्रयासों को वे धर्म, अहिंसा मोक्ष और नैतिकता की इबारत में ऐसे बांधते हैं कि साधन शुद्धि ही एकमात्र बहस बन जाती है. और बहुत सावधानी से साध्य की शुद्धि की कोई बहस उभरने ही नहीं दी जाती. वे साध्य को बिना शर्त शुद्ध और सर्वहितकारी मानकर ही चलते हैं. इसमें सर्व और हित की उनकी अपनी विशिष्ट परिभाषाएं भी शामिल हैं जिनके निर्माण और संशोधनों का अधिकार उन्ही के पास सुरक्षित होता है. विनोबा या कन्हैयालाल मुंशी जैसे पट्टशिष्य तक उस परिभाषा में कोई बदलाव नहीं कर सकते.

    सर्वोदय की कल्पना उन्होंने जिस विचार के साथ जोड़ी वह भी जानने योग्य है. रस्किन बांड से गांधी जी खासे प्रभावित थे, उन्ही की एक पुस्तक का गांधीजी ने गुजराती में 'सर्वोदय' के नाम से अनुवाद किया था. उनके लिए सर्वोदय का अर्थ था सबका उदय, या कहें सबका विकास, अब इस सर्वोदय को वे जिस रूप में पेश करते हैं उस अर्थ में सर्वोदय भारत का पुराना आदर्श है रहा है जिसमे भारत के उपनिषदों और धर्मशास्त्रों के पवित्र वाक्य “सर्वे भवन्तु सुखिनः” 'सर्व खल्विदं ब्रह्म', 'वसुधैव कुटुंबकम', अथवा 'सोऽहम्‌' और 'तत्त्वमसि' आदि शामिल हैं. हालाँकि हम देख चुके हैं कि इस देश में जिस दौर में इन महावाक्यों की महिमा अपने शिखर पर थी उसी दौर में मानवता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र इसी देश में इन्ही महावाक्यों को जपने वाले लोगों ने रचे थे. सर्वं खल्विदं ब्रह्मम हो या सर्वे भवन्तु सुखिनः हो उसमे इस्तेमाल किया गया यह शब्द “सर्व” असल में कुछ ख़ास “टर्म्स एक कंडीशंस” के साथ ‘अप्लाय’ होता था. इस सर्व में शूद्र और अतिशूद्रों सहित स्वयं सवर्ण द्विजों की स्त्रीयां भी शामिल न थीं. ऐसे महावाक्यों के सर्जकों के दौर में समाज में भी इन नैतिक मूल्यों का जनमानस में कोई प्रभाव नहीं हुआ था, छुआछूत, स्त्री दमन, शिक्षा से वंचित करना आदि धर्माग्यायें मजे से चलती रही. ऐसे में आज हम यह कल्पना करें कि वे ही पुराने नैतिक मूल्य हमारे समाज में यूरोपीय अर्थ के लोकतंत्र, समाजवाद और ‘सर्वोदय’ को आज संभव बना सकते हैं तो शायद हम गलत उम्मीद कर रहे हैं.

    अब हमारे लिए यह जानना भी जरूरी है कि ऐसे साध्य और उससे जन्मे ये साधन आते कहाँ से हैं? ये एक ख़ास तरह के धर्मदर्शन और तात्विक मान्यता से आते हैं जो व्यक्ति, व्यक्तित्व, समाज, धर्म, जीवन और जीवन के आत्यंतिक लक्ष्यों सहित इन लक्ष्यों के सन्दर्भ में व्यक्तियों के करणीय को एक विशेष रंग में रंगता है. इन रंगों को उभारने वाले सारे साधन “शुद्ध” हैं और इन रंगों को चनौती देने वाले या इनसे “तार्किक कंट्रास्ट” पैदा करने वाले साधन “अशुद्ध” हैं. उदाहरण के लिए किसी भी समाज की प्रचलित नैतिकता में एक संत या परोपकारी व्यक्ति का भूख से मर जाना पूरे समाज के लिए एक भारी बदनामी और चिंता का विषय बन जाता है. वहीं एक अज्ञात व्यक्ति का भूख से मर जाना किसी को दुखी नहीं करता या एक अपराधी, राष्ट्रद्रोही, या धर्मनिन्द्क सिद्ध कर दिए गये व्यक्ति को भूखों मार देना पूरे समाज को खुश भी कर सकता है.

    सत्याग्रह के सत्य की अगर बात करें तो वह भी बड़ा खतरनाक है. भारतीय वैदिक धारणा या उपनिषदिक धारणा में सत्य एक ऐसा फिक्स्ड पॉइंट है जिसके बारे में सैधांतिक रूप से (कथनी में) यह बात फैलाई गयी है कि इस “एक” सत्य की तरफ अनंत रास्ते जा सकते हैं और जिसकी अनंत व्याख्याएं हो सकती हैं. असल में यह एक परमात्मा की धारणा का ही विस्तार है. लेकिन व्यवहार में (करनी) में देखें तो इस तथाकथित सत्य तक पहुँचने के लिए अनंत मार्ग नहीं हैं मार्ग एक ही है और उस पर चलने वाले चुनिन्दा लोग भी विशेष परमिट लेकर ही चलते आये हैं. उस मार्ग में नास्तिक, अनीश्वरवादी, वेदविरोधी या विधर्मी को चलने का कोई अधिकार नहीं है. हाँ ये अलग बात है कि इन श्रेणियों से आने वाले बुद्ध, महावीर, गोरख और कबीर जैसे लोगों ने वैदिक, औपनिषदिक या हिन्दू परिभाषाओं कि चिंता न करते हुए इतनी महिमा प्रदर्शित की कि बाद के वैदिकों हिन्दुओं ने इन व्यक्तियों को भी अपनी सनातन षड्यंत्रकारी “सर्वसमावेशी” खोल में निगल लिया. इस तरह ऊपर ऊपर दिखता है कि ये सर्वसमावेशी खोल सबको सत्यान्वेषण की एक सी सुविधा या अनुमति देती है लेकिन हकीकत में ये होता नहीं है.

    अब मूल मुद्दे पर आते हुए अगर हम देखें कि इस मुल्क में सत्य, नैतिकता और आग्रह की ये परिभाषाएं हैं तो “सत्याग्रह” का क्या अर्थ और परिणाम हो सकता है? सत्य की परिभाषा और लोकमानस में उसकी स्वीकृति एक ख़ास रंग में रंगी हुई है. एक आस्तिक धर्मभीरु और रुढ़िवादी अर्थ का सत्य ही हमारे लोकमानस में स्वीकृत है. आजकल इस धर्मभीरुता के गर्भ से जन्मा राष्ट्रवाद और देशप्रेम इस एक ख़ास किस्म की नैतिकता को आकार दे रहा है जिसमे न केवल राजनीतिक सामाजिक शुचिता की परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं बल्कि स्वयं नैतिकता कि परिभाषा भी अब बड़े अनैतिक अर्थों में होने लगी है.

    अब मूल रूप से प्रश्न ये है कि आजकल सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मुक्तिकामियों में जिस तरह से सत्याग्रह प्रचलित हो रहा है उसे किस नजर से देखा जाये? उसकी सफलता असफलता सहित उसकी व्यावहारिकता और अव्यावहारिकता को किस ढंग से देखा जाए? क्या ये कार्यकर्ता ये मानकर चल रहे हैं कि समाज इतना नैतिक है कि उनके भूखे रहने पर उसे तकलीफ होगी? क्या वे ये मानकर चल रहे हैं कि उन्होंने गांधी या विनोबा की तरह अधनंगे फकीर की छवि गढ़ने में पर्याप्त ‘निवेश’ कर लिया है? क्या वे ये मानकर चल रहे हैं कि जिस नैतिकता या सामूहिक शुभ को वे सम्मान देते हैं जनता भी उसे उसी तरह सम्मान दे पा रही है? और इन सबसे बड़ा प्रश्न ये कि ये साध्य, साधन, शुचिता आदि का ये सौंदर्यशास्त्र जिस सांस्कृतिक प्रष्ठभूमि में जन्मा है क्या वह संस्कृति और उसका अतीत आजकल के लोकतांत्रिक या समाजवादी आदर्शों के साथ कम्पेटिबल है?

    इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है – “नहीं”. न तो हमारे आज के मुक्तिकामियों ने अपनी धार्मिक अर्थ की फकीराना या शहीदाना छवि निर्माण के लिए पर्याप्त निवेश किया है (कई लोग तो करना भी नहीं चाहेंगे) न ही सामान्य जन मानस में एक पवित्र पुरुष या नैतिक पुरुष के रूप में अपनी छवि स्थापित की है और ना ही संस्कृति या नैतिकता की परिभाषाओं से आने वाले पारम्परिक करणीयों का उन्होंने पालन किया है. ऐसे में वे किस अधिकार से जनता को या सरकार को नैतिक बल से झुकाना चाहते हैं? ऐसी कौनसी नैतिकता उन्होंने इस जनता में या सरकार में देख ली है? इसका भी यही उत्तर है कि जनता की नैतिकता भी कंडीशंड की जा चुकी है. ऐसी जनता की नैतिकता से उम्मीद रखकर क्या अपनी जान भूखहडताल में दांव पर लगाना समझदारी है? हरगिज नहीं. न तो सरकारें इस योग्य हैं कि उनके आगे नैतिकता का या सत्य का आग्रह किया जा सके और न ही जनता इस योग्य रह गयी है कि उससे नैतिकता का कोई आग्रह किया जा सके. लेकिन यह जानते हुए भी हमारे मुक्तिकामी किस उम्मीद में भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं? निश्चित ही वे संविधान, विधि और कानून द्वारा बनाये गये नियमों से परिभाषित अधिकारों को हासिल करने की उम्मीद में “व्यवस्था” के सामने उम्मीद लगाए बैठे हैं. अब गौर कीजिये इस बिंदु पर वे समाज की नैतिकता से नहीं बल्कि “व्यवस्था के अनुशासन” से उम्मीद कर रहे हैं. इस क्रम में वे व्यवस्था को “अव्यवस्था फ़ैल जाने का भय” दिखाते हुए समाज की नैतिकता के सक्रिय होकर अचानक सड़कों पर उतर आने की झूठी उम्मीद कर रहे हैं. ठीक से देखा जाए तो बस इस दूसरी उम्मीद में ही सारी भूल हो रही है. पहली उम्मीद तक कोई खराबी नहीं है.

    सरल शब्दों में कहें तो गांधी या विनोबा की तरह पारम्परिक संत या फकीर या ब्रह्मचारी या अणुव्रती की तरह स्थापित हुए बिना आप इस देश की जनता की नैतिकता को न तो ललकार सकते हैं न ही उससे कोई उम्मीद कर सकते हैं. इसीलिये अंबेडकर ने कभी भारतीय समाज की नैतिकता को ललकारने का वैसा प्रयास नहीं किया जैसा गांधी करते रहे थे. अंबेडकर जानते थे कि इस धर्मभीरु समाज की पाखंडी नैतिकता ही असली समस्या है, जिस नैतिकता ने भारत को सडाया है उससे क्या आग्रह करना? या यूँ कहें कि जहर के कुवें से अपने लोगों के लिए ही पीने का पानी मांगना अंबेडकर कैसे स्वीकार करेंगे? इस सच्चाई को आज के सामाजिक क्रान्तिक्रारियों पर लागू करके देखिये. वे एक दोमुही और असमंजस की स्थिति में फंसे हैं. एक तरफ वे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संविधान आदि के आदर्शों की छाँव में बुनी गयी लेकिन धर्मभीरुओं/ धार्मिक षडयंत्रकारियों द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था से कोई आग्रह कर रहे हैं और दूसरी तरफ इस “सत्याग्रह” के लिए उस जनता के आक्रोश से भी उम्मीद लगाए बैठे हैं जिसके लिए ‘सत्य’ ‘नैतिकता’ ‘शुचिता’ ‘आग्रह’ सहित इन सबके प्रति ‘अधिकार’ की परिभाषाएं क्रान्ति विरोधी और बदलाव विरोधी परिभाषाएं हैं. ऐसे में न तो ये व्यवस्था उनकी सुनेगी और न ये जनता उनकी मौत पर आंदोलित होगी. रोहित वेमुला की मौत पर भारत की आम जनता ने कितने आंसू बहाए ये बताने की जरूरत नहीं है. ये ऐसा ही है जैसे आप एक खूंखार धर्मगुरु के घर के सामने धरना देकर बैठ जाएँ और उसी धर्मगुरु के प्रवचनों पर कीर्तन करने वाली जनता से उम्मीद करें कि वो जनता आपकी भूख हड़ताल या गिरती सेहत से प्रभावित होकर अपने धर्मगुरु के खिलाफ सड़कों पर उतर आये. अगर आप ऐसी उम्मीद कर रहे हैं तो आप आत्महत्या कर रहे हैं. ये व्यर्थ की भावुकता भी है और रणनीतिक अपरिपक्वता भी है.

    ऐसे में क्या किया जा सकता है? क्या उपाय है? www.caasimada.net इसका एक ही उत्तर है कि जिस समाज की अनैतिकता ने इस व्यवस्था को जन्म दिया है या संविधान और कानून को ठीक ढंग से अमल में आने से रोका है उस नैतिकता से उम्मीद छोड़ दीजिये. व्यवस्था से शिकायत है तो ‘शिकायत निवारण की जो विधिसम्मत व्यवस्था’ है उसे अमल में लाइए. जनांदोलन और जनजागरण के लिए सड़कों पर “ज़िंदा” उतरिये, “लाश की तरह” आप एक ही बार शोभायात्रा निकाल सकते हैं. इससे काम आसान नहीं बल्कि मुश्किल होता है. ऐसे भावुक शहीदों का वही जहरीली नैतिकता कैसा दुरूपयोग करती है ये हम भगत सिंह और विवेकानन्द के जीवन से सीख सकते हैं. शहीद या विक्टिम बनने के अपने फायदे हैं लेकिन वे फायदे एक नैतिक समाज में एक सभ्य समाज में ही संभव हैं. भारत जैसे अनैतिक और असभ्य समाज में सिर्फ उन्ही लोगों का सत्याग्रह सफल हो सकता है जिनका सत्य धर्मान्ध व्यवस्था के सत्य की परछाई की तरह जन्मा हो. लेकिन अगर आप पश्चिमी मूल्यों से प्रेरित समाजवादी, लोकतांत्रिक, सेक्युलर और सहज मानवीय नैतिकता से भरी व्यवस्था के लिए संघर्षरत हैं तो आपको धर्मान्धों, गांधीवादियों, सर्वोदयवादियों और राष्ट्रवादियों के ढंग के सत्याग्रह और आत्मपीडन से बचना चाहिए.

  • खिड़की से झांकते ये वृक्ष, क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं? –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    खिड़की से झांकते ये वृक्ष
    क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं?

    उनकी ऊँचाइयों पे इठलाती
    अनगिनत कोपलों पर रचा आश्वासन
    एक दमकती हुई हरियाली लिए
    इन बेनूर सी आँखों में
    अकारण ही चमकने लगता है

    उनकी टहनियों पर झूमती
    पगली सी गिलहरियों का नृत्य
    उनकी अठखेलियों का ज्वार लिए
    इन जड़ हो चुके पैरों में
    अकारण ही मचलने लगता है

    उन पर पात-पात फुदकती
    बैचेन सी गौरैया का गीत
    अपने अंतर की वीणा लिए
    इन बद्ध हो चुके कानों में
    अकारण ही गूंजने लगता है

    क्या हर टहनी, हर पात और गौरैया में
    मेरे ही प्राणों के स्पंदन नहीं छिपे हैं?
    क्या मुझमे उनकी जिजीविषा
    और उनमे मेरे स्वप्न नहीं छिपे हैं?

    मेरी इन धमनियों में तड़पता उनका जीवन
    और उनकी ऊंचाइयों में आकाश छूते मेरे स्वप्न
    क्या सहोदर सहयात्री नहीं हैं?

    एक से उद्गम से चले
    एक से गन्तव्य की तरफ
    एक ही पाथेय लिए

    फिर हर बार हर मोड़ पर मैं
    उनमे खुद को और खुद में उनको खोजता हूँ
    उन्ही के गीतों और नृत्यों से ताल मिलाते हुए
    हर गीत में अपनी ही आवाज खोजते हुए
    हर नृत्य में अपनी ही छवि गढ़ते हुए

    और अंत मेंअपने ही नवांकुरों का स्वप्न लिए
    उनकी जड़ों में लिपटी मिट्टी तक लौटता हूँ

    उनमे विश्राम पाकर
    सारे गीत, नृत्य और स्वप्न
    उन्हें सौंप जाता हूँ …

     

  • भारतीय समाज में इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    यूरोपीय और अमरीकी विश्वविद्यालयों (सभी नहीं) में और विशेष रूप से वहां के समाज में एक ख़ास प्रवृत्ति है। वहां छात्र छात्राएं गणित के साथ मनोविज्ञान या साहित्य भी पढ़ सकते हैं। आर्ट्स, साइंस, मेडिसिन, ह्यूमेनिटीज, मैनेजमेंट आदि के बीच कोई जाति व्यवस्था नहीं है। उनमें मेलजोल और "अंतर्जातीय विवाह" जैसे "अवैध" संबन्ध तेजी से बनते हैं। भारत के लिए ये 'अवैध' संबन्ध हैं जिनसे " नीच वर्ण संकर" जन्मते हैं। विभिन्न विषयों के मेलजोल को यूरोप में "इंटेरडीसीप्लिनरिटी" कहते हैं और इन से जन्मे वर्णसंकर को "इनोवेशन" कहते हैं। लेकिन भारत में ये सब पाप है। इसीलिये भारत सड़ रहा है।

    यूरोपीय समाज में जीवन यापन के लिए जितना जरूरी है उतना सीखने के बाद भी उनकी सीखने की क्षमता पर विराम नहीं आता। वे बचपन से बुढ़ापे तक सीखते ही जाते है। 'स्वामी' विवेकानन्द जब यूरोप प्रवास पर थे तब उन्होंने एक बूढ़े जर्मन को चाइनीज भाषा सीखने की कोशिश करते पाया था, विवेकानन्द ने एक आम भारतीय की तरह पूछा कि इस कठिन भाषा को आप कितने वर्षों में सीखकर क्या लाभ ले सकेंगे? उस बूढ़े व्यक्ति ने विवेकानन्द को देखकर कहा था कि अगर तुम एक युवा होकर भी ऐसे सवाल पूछते हो तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि तुम्हारा मुल्क और समाज अन्धकार में सड़ रहा होगा।

    उस व्यक्ति की बात कितनी सही है न? विवेकानन्द जैसे 'शरीर से युवा' भारतीय व्यक्ति भी मन से कितने बूढ़े हो सकते हैं, वे सच में भारत के सच्चे प्रतिनिधि थे। भारत की सारी समस्याएं उनके व्यक्तिगत रुझानों और मनोविज्ञान सहित उनके प्रश्न-उत्तरों में साफ़ झलकती हैं।

    खैर, तो यूरोपीय समाज में आजीविका से परे भी ज्ञान की खोज चलती है। लेकिन "धर्म अर्थ काम मोक्ष" की दिव्य युति का दावा करने वाला भारतीय समाज शिक्षा, पठन-पाठन और स्वस्थ बहसों पर हजारों साल से ताला लगाकर बैठा है। 'अर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन' सिर्फ समाज के एयरटाइट कम्पार्टमेंट्स में अलग अलग लेयर्स ने ही होते हैं और इन कम्पार्टमेंट्स और लेयर्स में आपस में कोई संवाद नहीं होता। इसीलिये एक गांव या राज्य के गुलाम बना लिए जाने पर भी "कलेक्टिव आर्ग्युमेंट" से किसी "एक" राजनितिक धार्मिक या सामरिक एकता का जन्म न हो सका और भारत दो हजार साल तक गुलाम रहा।

    भारतीय समाज के स्तरों में संवादहीनता आज भी इतनी भयानक है कि एक ही गाँव में एक हैंडपंप या तालाब के सूखने पर सभी ग्रामीणों को एक सा दुःख नहीं होता, कई लोग खुश भी हो सकते हैं। एक ही तालाब पर सबका एक सा अधिकार नहीं है तो एक सी चिंताएं भी क्योंकर होंगी भला? क्या ये सभ्य समाज के लक्षण हैं? क्या भारत सभ्य है?

    एक औसत भारतीय ज्ञान से और स्वाध्याय से या अपने सुरक्षित गढ़ से परे जाकर संवाद बनाने से इतना चिढ़ता क्यों है? आजीविका सुरक्षित कर लेने के बाद पड़ता लिखता क्यों नहीं? साइंस का छात्र दर्शन, साहित्य या इतिहास पढता क्यों नहीं?

    इसका गहरे से गहरा कारण है कि लंबे समय तक भारतीय मन परम्परागत आजीविका या पेशे से इतना अधिक बंधा हुआ है कि उस सुरक्षा से परे उसे कभी कुछ देखना ही जरूरी नहीं रहा है। वह परे का कुछ देख न सके इसके लिए धर्म और परम्परा ने भारी इंतेजाम किये हैं। आज पश्चिम के प्रभाव से स्थिति थोड़ी बदली है लेकिन भारत के धर्म और उससे जन्मे मनोविज्ञान का सातत्य बहुत अर्थो में अभी भी बना हुआ है। अतीत में एक कुम्हार, लोहार या किसान से यही अपेक्षा की गयी है कि वह अपने हुनर में पारंगत हो और भेषज, साहित्य, दर्शन, राजनीती, धर्म के आयामों में प्रवेश न करे। यही उम्मीद उनसे की गयी है जो धर्म दर्शन राजनीति आदि का "रोजगार" करते आये हैं।

    इस तरह इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है। इसी वजह से भारतीय धर्मशास्त्री भौतिक या प्राकृतिक विज्ञान से इतने बेखबर होते हैं कि वे पूजा पाठ से ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदलने के दावों की बेवकूफी को देख ही नहीं पाते। यही बिमारी फिर पूरे समाज में फ़ैल जाती है। अब ये समाज सड़कर गुलाम हो जाये तो आश्चर्य कैसा?

    यूरोप या अमेरिका में ज्ञान के बढ़ने का राज़ क्या है?और भारत में ज्ञान, सभ्यता और संस्कृति के रसातल में पहुंचते जाने का राज़ क्या है? एक ही सूत्र है इसे समझने का, यूरोप में व्यक्तियों और ज्ञान के विषयों में संश्लेषण होता रहता है वहां विषयों और व्यक्तियों में अंतर्जातीय विवाह होते रहे हैं जो भारत में असंभव है। यूरोप में भूगोल पढ़ने वाला व्यक्ति दर्शन भी पढ़ सकता है। गणित या साहित्य के साथ मनोविज्ञान या संगीत भी पढ़ सकता है। लेकिन भारत में ये "शादी नहीं हो सकती" यहां साइंस ब्राह्मण है और आर्ट्स शुद्र है।

    अभी अमेरिका के MIT ने विज्ञान के छात्रों के प्रवेश के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि उनके पास मानविकी विषय के किसी प्रोफेसर का अनुशंसा पत्र होना आवश्यक है। मतलब कि क्वांटम मेकेनिक्स या इंजीनियरिंग के शोधार्थी को इतिहास, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य आदि में से किसी एक विषय के विद्वान की तरफ से रिकमेंड किया जाना जरूरी है।

    कल्पना कीजिये कि भौतिकशास्त्र का जानकार यदि मनोविज्ञान भी समझता है तो उसकी खोज इंसानी समाज के लिए कितनी व्यवहारिक न होगी? वो जो मशीन या तकनीक बनायेगा उसमे इंसानी जरूरतों के उत्तर भी मिल सकेंगे। लेकिन भारतीय ज्ञान परम्परा की सुनें तो इस भौतिशास्त्री को इतिहास, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को छूना भी पाप है। वो इधर झांकेगा भी नहीं। इसीलिये भारत इनोवेशन नहीं करता सिर्फ यूरोपीय विज्ञानं का सबसे सस्ता भारतीय वर्जन बनाता है। ये खुद रॉकेट नहीं बना सकते लेकिन एक बार यूरोप में रॉकेट बन जाये तो ये सबसे सस्ता मंगल यान बनाकर खड़े हो जाएंगे और वेदों में से पुष्पक विमान लाकर बहस करने लगेंगे। लेकिन इससे इनकी मौलिक बिमारी का कोई इलाज नहीं होता, बल्कि वो बीमारी बढ़ती ही जाती है।

    इसीलिये अब "विश्वगुरु" को ईमानदारी से विश्व का शिष्य बनकर कुछ सीखना चाहिए। अब भारतीय बच्चों को समाज की ही नहीं बल्कि सिलेबस की और विषयों की जाति व्यवस्था को भी तोड़ना होगा।

    समाज में ही नहीं बल्कि ज्ञान विज्ञानं के विषयो में भी वर्णसंकर पैदा करने होंगे। विज्ञानं ने सिध्द कर दिया है कि वर्णसंकर अधिक प्रतिभाशाली और प्रबल होते हैं। लेकिन सनातनी भारतीय धर्म बुद्धि प्रतिभा की हत्यारी रही है। इस हत्यारी व्यवस्था को विराम लगाना होगा ताकि भारतीय विद्यार्थी भी सभ्य सुसंस्कृत होकर ज्ञान विज्ञान और खेल कूद की दुनिया में अपने को साबित कर सकें, ताकि सवा अरब का ये मुल्क दो चार नोबेल, ऑस्कर और ओलंपिक जीत सके और बार बार काल्पनिक सतयुग के बिल में घुसने की बजाय कलियुग में सम्मान से जीना सीख सके।