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  • ओशो: प्रतिक्रान्ति का शिखर पुरुष –Sanjay Jothe

    ओशो: प्रतिक्रान्ति का शिखर पुरुष –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    (नोट: बाबाओं के सम्मोहन के विषय में बात करते हुए आप अगर ओशो रजनीश को भूल रहे हैं तो आप सबसे बड़ी भूल कर रहे हैं, वर्तमान बाबा बाजार का जहरीला माडल देने वाले इन बाबाजी को बार बार समझना होगा ताकि इस बीमारी का ठीक निदान किया जा सके)

    ओशो पर बात करते हुए अक्सर ही यह मान लिया जाता है कि चूँकि वे बुद्ध से सबसे ज्यादा प्रभावित थे इसलिए उनकी शिक्षाएं बुद्ध या बौद्ध दर्शन के अनुकूल हैं. यह भी मान लिया जाता है कि चूँकि उन्होंने कई बार अंबेडकर और दलितों का पक्ष लेते हुए महात्मा गांधी और हिन्दू धर्म सहित वर्ण व्यवस्था पर चोट की है इसलिए वे अंबेडकर की शिक्षाओं के पक्ष में हैं. यहाँ बहुत स्पष्टता से मैं इन दोनों मान्यताओं को नकारना चाहता हूँ.

    ओशो न तो पूरी तरह से अंबेडकर के पक्ष में हैं न ही बुद्ध या बौद्ध दर्शन के पक्ष में हैं. वे इन दोनों का ब्राह्मणीकरण कर रहे हैं और बुद्ध के मुंह से वह सब निकलवा रहे हैं जो बुद्ध के मूल दर्शन में कहीं है ही नहीं. यह बात अंबेडकरवादियों और दलितों सहित भारत के आदिवासियों, शूद्रों, पिछड़ों और स्त्रीयों को साफ़ साफ़ समझ लेनी चाहिए. इस तथ्य को उजागर करना इस किताब का एक बड़ा उद्देश्य है.

    Osho

    असल में प्रारंभिक दौर में ओशो ने जो नास्तिकवादी और तर्कवादी दिशा ली थी उसकी असफलता के बाद उन्होंने तय किया कि वे भारत की अन्धविश्वासी जनता को उसके अंधविश्वास के जरिये ही पकड़ेंगे और स्वयं को स्वीकृत बनायेंगे. उस समय उन्हें न केवल स्वयं को स्वीकृत बनाने की आवश्यकता थी बल्कि उन्हें धन संपत्ति और संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता थी. इसलिए उन्होंने गहराई से निरीक्षण करके पाया कि आम भारतीय अन्धविश्वासी और धर्मभीरु मनुष्य किस बात से प्रभावित होता है और किस बात से उत्तेजित होता है. इन दोनों का एकसाथ उपयोग करते हुए उन्होंने ब्राह्मणवादी मान्यताओं पर खड़े धर्म और साधना का प्रचार शुरू किया. इसी दौर में उन्होंने नव संन्यास की घोषणा की इसके बाद उनकी प्रसिद्धि बढती ही गयी और वे शीघ्र ही एक सम्पन्न आश्रम में रहने लगे. लेकिन ब्राह्मणवाद को उपयोग करते हुए वे यह भूल रहे थे कि जिस खेल को वे शुरू कर रहे हैं वो खेल वे खुद ही कभी बंद नहीं कर सकेंगे.

    धार्मिक अंधविश्वास पर खड़ी कोई भी रचना दुर्निवार होती है. ब्राह्मणवाद इतना जहरीला खेल है कि इसका उपयोग करने वाले को भले ही यह लगता हो कि वो इसका उपयोग कर रहा है लेकिन अंत में जाहिर होता है कि ब्राह्मणवाद ही उस व्यक्ति को निगलकर उपयोग करने लगता है. ठीक यही ओशो के साथ हो रहा है. उनके शिष्यों की आजकल की शिक्षाओं को देखिये और उनके आश्रमों को देखिये. यह बहुत साफ़ हो जाता है कि ब्राह्मणवादी खेल का उपयोग करने के बाद ओशो कभी ब्राह्मणवाद के चंगुल से आजाद नहीं हो सके और इसी खींचतान में उनका अंत हुआ. उनकी अंतिम किताब में वे ब्राह्मणी अर्थ के या वेदान्तिक अर्थ के पुनर्जन्म को प्रचारित करते हुए विदा हो रहे हैं.

    इससे साफ़ जाहिर हो रहा है कि बुद्ध की प्रशंसा और अनत्ता की प्रशंसा करते हुए भी वे अनत्ता के आधार पर रचे गये पुनर्जन्म के निषेध को अपने “सबसे विद्रोही” शिष्यों के सामने अपने अंतिम प्रवचनों में भी नहीं रख पा रहे हैं. इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यही हुआ कि या तो वे वेदान्तिक पुनर्जन्म को ही सत्य मानते हैं, या फिर बुद्ध की प्रशंसा करते हुए भी वे बुद्ध के मुंह से वेदांत की प्रशंसा करवाना चाह रहे हैं. दोनों स्थितियों में वे बुद्ध और अंबेडकर के खिलाफ जा रहे हैं और उस सनातनी पाखण्ड का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसमे “सर्वम खल्विदं ब्रह्मं” अर्थात सब कुछ ब्रह्म ही है – कहने वाले आदिशंकराचार्य एक चांडाल के स्पर्श कर जाने पर कुपित हो जाते हैं. कण कण में ब्रह्म का दर्शन करने की सलाह और भेदभाव छुआछूत एकसाथ चलाए रखना, यही सनातनी पाखण्ड है यही ब्राह्मणवाद का सबसे खतरनाक अस्त्र है. ऊपर ऊपर समावेश और प्रगतिशीलता की प्रशंसा चलती है लेकिन सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार में एक इंच का भी बदलाव नहीं आने दिया जाता सामाजिक व्यवस्था जहां की तहां एक पर्वत सी अचल बनी रहती है.

    इस लेख से गुजरते हुए सभी पाठक मित्रों से निवेदन है कि वे एक बात को बहुत साफ़ तौर से समझ लें और नोट कर लें. भगवान् रजनीश पर भारत का सबसे बड़ा ब्राह्मणवादी गुरु होने का जो आरोप यहाँ लगाया जा रहा है उसका यह अर्थ नहीं है कि भगवान् रजनीश पुरातनपंथी या रुढ़िवादी विचारक या गुरु हैं. न ही इसका यह अर्थ है कि वे प्राचीन भारतीय दर्शन और समाज व्यवस्था को बनाये रखने का सचेतन प्रयास कर रहे हैं. इसके विपरीत वे बहुत प्रगतिशील विचारों वाले, बहुत खुले और दुस्साहसिक वैचारिक प्रयोग करने वाले व्यक्ति हैं जिन्होंने कई मौकों पर पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौती दी है और पश्चिम में हुई सफल क्रांतियों की शिक्षाओं को कई कई तरह से बतलाने का प्रयास किया है.

    इसके बावजूद वे कुछ ख़ास अर्थों में भयानक रूप से ब्राह्मणवादी हैं और उनका इस तरह का ब्राह्मणवाद किसी जाहिर और घोषित रूप से काम करने वाले ब्राह्मणवाद से अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह प्रगतिशील और क्रांतिकारी चर्चाओं के पीछे छिपकर काम करता है. न केवल सिद्धांत में ऐसा है बल्कि यह जमीनी तौर पर उनके विशाल शिष्य समुदाय में उनकी दिनचर्या और उनकी दार्शनिक, धार्मिक, रहस्यवादी और सामाजिक मान्यताओं में साफ़ देखा जा सकता है. यह बात जटिल है इसलिए इसे बिन्दुवार समझना औचित होगा:

    १. भगवान रजनीश घोषित रूप से स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में हैं और स्त्री को वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि लैंगिक आजादी देने के भी पक्ष में हैं. लेकिन यह बात उनकी मुख्या प्रस्तावना में शामिल नहीं है. जिस रहस्यवाद या धर्म दर्शन को वे प्रचारित कर रहे हैं और जिस वेदान्तिक ढाँचे के आधार पर वे पुनर्जन्म और मोक्ष की धारणा का प्रचार कर रहे हैं वह ढांचा और वे धारणाएं ऐतिहासिक रूप से पुरुष सत्ता और पितृ-सत्ता को ही मदद करती आई हैं.

    उदाहरण के लिए वे गीता की व्याख्या करते हुए कृष्ण द्वारा दिए गए वक्तव्य को दोहराते हैं “स्त्रीयों में मैं कीर्ति हूँ” इस कीर्ति की व्याख्या करते हुए वे इसे एक विशिष्ठ गुण बताते हैं और इसे संवेदनशीलता और स्त्रैणता से जोड़ते हैं जो स्त्री को एक ख़ास तरह के ढाँचे में जकड़कर देखने जैसा है. यह मान लिया गया है कि स्त्री स्त्रैण ही होगी, नाजुक और संवेदनशील होना ही उसका आत्यंतिक गुण है. इस तरह की चर्चाओं का समाज पर जो प्रभाव है और रुढ़िवादी हिन्दू समाज इसे जिस भाँती स्वीकार करता है उसे अब ध्यान से देखिये. वह समाज जब स्त्री पुरुष की समानता और स्त्री अधिकारों की बातों के साथ साथ कीर्ति की इस तरह की व्याख्या सुनता है तब असल में उसकी स्मृति में क्या गहराई से रजिस्टर होता है? निश्चित ही उसके मन में आर्थिक या लैंगिक आजादी की प्रस्तावना की बजाय कीर्ति की व्याख्या ही अधिक गहराई से अंकित होगी. लेकिन जब लोग कीर्ति की व्याख्या से प्रभावित होकर भगवान् रजनीश का गुणगान करेंगे तब कई लोग गलती से यह मान लेंगे कि यह गुणगान उस व्यक्ति का है जिसने स्त्री की परिपूर्ण स्वतंत्रता की प्रस्तावना दी है.

    २. इसी तरह जब वे अंबेडकर की प्रशंसा करते हुए दलितों आदिवासियों या शूद्रों (ओबीसी) के अधिकारों को समर्थन दे रहे हैं तब वे बहुत क्रांतिकारी नजर आते हैं लेकिन असल में विचार की दृष्टि से क्रांतिकारी बनते हुए भी वे सामाजिक सस्थाओं के सन्दर्भ में जब वर्ण व्यवस्था पर टिप्पणी करते हैं तो वे वर्ण व्यवस्था के “क्रियात्मक तर्क (फंक्शनल लोजिक) का पूरी तरह समर्थन करते हैं और इसे कार्य विभाजन की ही एक पद्धति बताकर महिमामंडित करते हैं. गीता की व्याख्या करते हुए वे कृष्ण द्वारा चार वर्णों के सृजन को इसी तर्क से समझाते और वैध ठहराते हैं. इसके बाद भी उनके बाद के प्रवचनों में वे जोर देकर कहते हैं कि पैदा तो सभी शुद्र होते हैं कोई कोई अपने पुरुषार्थ से ब्राह्मण बन पाता है. इस बिंदु को सावधानी से समझना होगा. जब वे इस प्रकार का वक्तव्य दे रहे हैं तो असल में वे वर्ण व्यवस्था को मान्यता दे रहे हैं भले ही वे इसे जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर वैध ठहरा रहे हैं लेकिन अंततः तो वे इसे स्वीकृति दे ही रहे हैं और यह भी जतला रहे हैं कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और शुद्र निकृष्ट है जिसे महान श्रम करके ब्राह्मणत्व अर्जित करना है.

    आश्चर्य इस बात का है कि ठीक यही तर्क ब्राह्मणवादी भी देते हैं वे भी कर्म और श्रम के विभाजन के आधार पर ही वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करते हैं और बड़ी आसानी से श्रमिकों के विभाजन के प्रश्न से बच निकलते हैं. श्रमिकों के विभाजन का प्रश्न अंबेडकर ने उठाया था और कहा था कि वर्ण या जाति व्यवस्था असल में श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है. यहाँ यह नोट करना होगा कि भगवान रजनीश बाद के वर्षों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था को सिरे से नकारते हुए इसे नष्ट कर देने की बात भी करते हैं और कई प्रवचनों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था के जहरीले परिणामों की चर्चा करते हुए इसे अमानवीय बताते हैं.

    इस विषय में भी यही प्रश्न खडा होता है, कि समाज, वर्ण और जाति व्यवस्था पर गौर करते हुए एक आम आदमी या एक आम रजनीशी के मन में कौनसी सलाह ज्यादा गहराई से अंकित हो रही है या काम कर रही है? वर्ण व्यवस्था को उखाड़ देने की सलाह या वर्ण व्यवस्था को कृष्ण द्वारा कार्य गुण कर्म के अनुसार मानव का वर्गीकरण करने की सलाह? हम पाते हैं कि भगवान् रजनीश और कृष्ण की महिमा से प्रभावित एक आम भारतीय या रजनीशी असल में कृष्ण का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित है अंबेडकर का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित नहीं है. इस बात का परीक्षण करने के लिए किसी भी आम रजनीशी या अध्यात्मिक रुझान रखने वाले आम भारतीय हिन्दू से बात की जा सकती है.

    ३. ध्यान और समाधि सहित मोक्ष के मुद्दों पर भी भगवान् रजनीश की प्रस्तावनाएँ एकदम पारम्परिक हैं. उनमे जिन प्रयोगों का उल्लेख है और जिन नवाचारों का उल्लेख है वे बहुत नए नहीं हैं. हाँ यह अवश्य है कि वे आम जन के प्रचलन से बाहर हो गये थे और केवल मठों और आश्रमों तक सीमित हो गए थे. न केवल वे प्रयोग बल्कि उनकी सांगत व्याख्याएं भी पहले से मौजूद थीं जिनका सरलीकरण और प्रचार भगवान रजनीश ने बहुत प्रभावशाली ढंग से किया. लेकिन यहाँ एक गहरी बात जो नोट करनी आवश्यक है वो ये कि इन ध्यान विधियों और इनसे जुड़े जिस मनोविज्ञान का वे प्रचार करते रहे उसकी दार्शनिक प्रष्ठभूमि क्या है? कोई भी आसानी से देख सकता है कि इस प्रष्ठभूमि में आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्म का विस्तारित सिद्धांत, गुरु शिष्य परम्परा और कृपा या शक्तिपात आदि की पुरातन मान्यताएं हैं. ये मान्यताएं असल में ब्राह्मणवादी या वेदान्तिक मान्यताएं हैं दुर्भाग्य से इन्ही पर भारत में शोषण और दमन सहित अंधविश्वास और भाग्यवाद का पूरा भवन खडा है. ऐसे में इस मूलभूत ब्राह्मणवादी रहस्यवाद या धर्म दर्शन को प्रचारित करके वे ब्राह्मणवादी शोषण के तन्त्र को ही लाभ पहुंचा रहे हैं.

    हालाँकि वे बुद्ध या महावीर की प्रशंसा करते हुए परमात्मा या आत्मा तक को नकार देते हैं लेकिन वह उनकी मूल शिक्षा नहीं है. न ही उस शिक्षा ने उनके पूरे शिष्य समुदाय का निर्माण किया है. आज भी अगर उनके शिष्यों से यह पूछा जाए कि आत्मा और परमात्मा सहित पुनर्जन्म पर उनके क्या विचार हैं तो वे इन तीनों को स्वीकार करते हैं और पुनर्जन्म के स्मरण सहित पाप पुण्य के अगले या पिछले जन्म पर प्रभाव को भी मान्यता देते हैं. वे शून्य या अनत्ता पर आधारित ध्यान या निर्वाण की चर्चा नहीं करते हैं.

    इसके दो कारण हैं एक तो ये कि भगवान रजनीश सहित ओशो ने ही कभी भी शुन्य या अनत्ता की अलग से व्याख्या नहीं की है और न ही अनत्ता के आधार पर जन्म मरण या निर्वाण को समझाया है. दुसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण ये है कि भगवान रजनीश के अधिकाँश शिष्य वे हैं जो उनके द्वारा आत्मा और पुनर्जन्म आधारित ब्राह्मणी या वेदान्तिक रहस्यवाद से प्रभावित होकर उनके निकट आये हैं. अभी भी उनके प्रमुख शिष्य जिस तरह का संन्यास देते हैं और जिस तरह से साधना सिद्धि और निर्वाण की बात करते हैं वह आवागमन के चक्र से मुक्त होने की धारणा पर ही आधारित है.

    इसमें एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि भगवान् रजनीश और उनका परवर्ती अवतार ओशो, दोनों ही बारम्बार यह दोहराते हैं कि अनत्ता और आत्मा एक ही हैं और एक ही सत्य के दो नाम हैं. वे शून्य और पूर्ण को भी एक ही निरुपित करते हैं और इसे एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ बताते हैं. साथ ही यह भी बतलाते हैं कि बुद्ध ने अव्याख्य की व्याख्या न करके जो निर्णय लिया था वह महान निर्णय था और यह मानते हैं कि जिस चीज की व्याख्या संभव न हो उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए. इस सन्दर्भ में वे लुडविनविटगिस्टीन का प्रसिद्द वक्तव्य भी दोहराते हैं कि जिस बात को समझाया न जा सके उसे उठाया ही नहीं जाना चाहिए.

    इस सन्दर्भ में अगर हम विचार करें कि उनका वृहत्तर शिष्य समुदाय किस बात से प्रभावित होकर उनके पास आ रहा है? क्या पूर्ण को शुन्य मानकर आ रहा है? या शुन्य को पूर्ण में अनुवाद करके उनके पास आ रहा है? भगवान रजनीश में एक प्रश्न के उत्तर में बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती कहा था यह वक्तव्य उन्होंने आदि शंकर पर उठाये गए एक प्रश्न के उत्तर में दिया था जिसमे रामानुज द्वारा शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध निरुपित करने का उल्लेख किया गया था. अब ध्यान से देखना होगा कि उनका शिष्य समुदाय वास्तव में शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध मान रहा है या बुद्ध को प्रछन्न वेदांती मान रहा है? ठीक से देखें तो पता चलता है कि यहाँ बुद्ध का ही वेदान्तीकरण या ब्राह्मणीकरण हो रहा है न कि शंकराचार्य का बौद्धिकरण.

    ४. अध्यात्म, साधना और मुक्ति के प्रश्न पर भी भगवान् रजनीश की जो प्रस्तावनाएँ सर्वाधिक प्रचलित हैं वे गुरु शिष्य परम्परा और समर्पण, शरणागति पर आधारित हैं. तर्क, दुस्साहस, खतरे में जीना और अप्प दीपो भव् की बुद्ध की प्रस्तावना का वे जब तब समर्थन अवश्य करते हैं लेकिन यह उनकी मूल शिक्षा नहीं है. उनकी मूल शिक्षा, जिससे कि उनका अधिकतम शिष्य समुदाय प्रभावित है वह गुरु पर निर्भरता और सतत मार्गदर्शन देने वाले माडल पर आधारित है. बौद्ध अर्थ की अप्प दीपो भव वाली क्षण क्षण जागरूकता वाली शैली – जो कि ओशो के समकालीन कृष्णमूर्ति द्वारा सर्वाधिक प्रचारित की गयी – वह भगवन रजनीश या ओशो की मूल शिक्षा नहीं है.

    क्षणवाद और निर्विकल्प जागरूकता पर आधारित यह शैली या विधि (हालाँकि इसे विधि कहना पूरी तरह ठीक नहीं) पुनर्जन्म और आत्मा के नकार पर ही खड़ी है. इसकी मूल मान्यता यह है कि शरीर और मन सहित आत्मा (व्यक्तित्व या स्व) असल में प्रकृति और समाज के द्वारा दिए गए हैं और कोई आत्यंतिक व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती जो कि एक से दुसरे शरीर या जन्म में प्रवेश करती हो. न तो मैं और मेरे की तरह कोई शरीर है न स्व या व्यक्तित्व या आत्मा है. जो सत्ता स्व या आत्मा की तरह भासती है असल में वह एक झूठा आभास भर है जो शरीर, और समाज द्वारा दिए गए तात्कालिक व्यक्तित्व या मन के गठजोड़ द्वारा निर्मित होती है. शरीर की मृत्यु के बाद शरीर और मन के ये टुकड़े बिखर जाते हैं और अन्य शरीरों और मनों के निर्माण में उपयोग कर लिए जाते हैं. इस तरह वहां आत्मा या स्व जैसा कुछ नहीं है. बुद्ध के अनुसार इसी को अपने अनुभव से जान लेना निर्वाण या मुक्ति है.

    लेकिन भगवान् रजनीश और ओशो भी जिस ढंग से मोक्ष की व्याख्या करते रहे हैं वह ढंग सनातन आत्मा और परमात्मा को मान्यता देता है और इस आत्मा का परमात्मा में विलीन होना ही मोक्ष निरूपित किया गया है. अब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा सनातन अर्थात अजर अमर है (गीता के अनुसार) तो वह परमात्मा में विलीन होकर भी बनी रहेगी. अर्थात वह पूर्ण रूप से विलीन होकर खो नहीं रही है बल्कि अपना सत्व या अपनी अस्मिता बचाए रख रही है. अगर कहें कि वह पूर्णतया विलीन हो जाती है या खो जाती है तो फिर अजर अमर या सनातन नहीं रही. इस प्रकार आत्मा की अमरता और मोक्ष दो विरोधी सिद्धांत हुए जिनमे से कोई एक ही सत्य हो सकता है. लकिन वेदांती रहस्यवाद या ब्राह्मणवाद इन्हें एकसाथ इस्तेमाल करता है. जबकि बुद्ध इसमें परमात्मा और आत्मा दोनों को निरस्त करके निर्वाण को बहुत तर्कसंगत और सबके लिए संभव बना देते हैं. बुद्ध के अनुसार “हमारा” कोई शरीर नहीं है और “हमारा” कोई मन/व्यक्तित्व/आत्मा नहीं है बल्कि शरीर भी चार भूतों का उत्पाद है और मन भी स्मृतियों, कल्पनाओं, विचारों, संस्कारों और वासनाओं का समुच्चय है.

    ये चार भूत अर्थात पदार्थ और ये संस्कार वासनाएं अर्थात मन ये सब बाहर से आता है अन्य व्यक्तियों, प्राणियों और वनस्पतियों से यह पदार्थ आते हैं और समाज, शिक्षा, परिवार से ये विचार आते हैं इसलिए शरीर सहित मन या व्यक्तित्व भी “मेरा” या “हमारा” नहीं है बल्कि समष्टि का है और उसी में खो जाता है. जो व्यक्ति आज नजर आ रहा है वह समय में पहली और अंतिम बार जन्मा है. उसका शरीर और उसका मन मर जाने के बाद उसके शरीर के भूतों का और उसके मन के संस्कारों का सौ प्रतिशत हिस्से का दुबारा एकसाथ किसी नए गर्भ में प्रवेश कर जाना लगभग असंभव है इसलिए नया व्यक्ति इस मरे हुए व्यक्ति के शरीर या मन के अंशों को धारण करते हुए भी पूरी तरह वो पुराना व्यक्ति नहीं है. इस प्रकार कोई पुनर्जन्म नहीं होता बल्कि हर जन्म एक नए व्यक्ति का जन्म होता है.

    अनत्ता को इस तरह “शरीर और मन दोनों ही मेरा नहीं है” और मैं और मेरा जैसी भी कोई सत्ता नहीं है के रूप में जान लेना ही निर्वाण कहा गया है. हालाँकि वेदान्त और ब्राह्मणवादी रहस्यवाद भी मुक्ति को मैं और मेरे से मुक्ति के अर्थ में ही देखते हैं लेकिन वे एक भयानक विरोधाभास का निवारण नहीं कर पाते. वो विरोधाभास यह है कि अगर आत्मा अमर है तो मोक्ष में विलीन कैसे हो जा सकती है या खो कैसे सकती है? और अगर मोक्ष ही अंतिम सत्य है या आत्मा व शरीर के अल्पकालिक अस्तित्व की तुलना में वही सर्वकालिक या सनातन सच्चाई है तो आत्मा शरीर की तरह एक क्षणिक सत्ता हुई. इस बिंदु पर आते ही हम बुद्ध के दर्शन में प्रवेश कर जाते हैं. अर्थात अनंत मोक्ष के सामने आत्मा क्षणिक ही साबित होती है. यही बुद्ध का सिद्धांत है, आत्मा या स्व असल में एक क्षणिक आभास मात्र है.

    अब इतने विस्तार में जाने के बाद हम यह देखेंगे कि एक आम रजनीशी या ओशो का सन्यासी आत्मा सहित मोक्ष को किस रूप में देखता है? अनुभव बताता है कि ओशो या भगवान रजनीश का एक आम सन्यासी भारत के एक आम धार्मिक हिन्दू की भांति आत्मा की अमरता को मानता है और परमात्मा से मिलन के अर्थ में ही योग और मोक्ष को स्वीकार करता है. इस प्रकार पुनः यह सिद्ध होता है कि भगवान् रजनीश या ओशो के शिष्य असल में बुद्ध के बताये अनत्ता और निर्वाण की प्रशंसा सुनकर ओशो या रजनीश के सन्यासी नहीं हुए हैं बल्कि वे वेदांती और ब्राह्मणवादी आत्मा और मोक्ष के सिद्धांत से प्रभावित होकर रजनीश या ओशो के निकट आये हैं.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • हमें भारत मे छुआछूत, दंगा और बाबा म्यूजियम चाहिए –Sanjay Jothe

    हमें भारत मे छुआछूत, दंगा और बाबा म्यूजियम चाहिए –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जर्मनी और रवांडा जैसे कुछ अफ्रीकी देशों में कई सारे होलोकॉस्ट म्यूजियम हैं स्कूल कॉलेज के बच्चों को वहां दिखाया जाता है कि हिटलर के दौर में या हुतु तुत्सी जातीय हिंसा के दौर में किस नँगाई का नाच हुआ था, कैसे पढ़े लिखे समझदार लोग जानवर बन गए थे और एकदूसरे की खाल नोचने लगे थे। 

    मरे हुए लोगों को खोपड़ियां, कंकाल, जूते, कपड़े, उनके बर्तन, फर्नीचर इत्यादि सब सजाकर रखे गए हैं ताकि अगली पीढ़ी देख सके कि वहशीपन क्या होता है और धार्मिक नस्लीय जातीय हिंसा से क्या क्या संभव है।

    भारत मे भी हर जिले में भी ऐसा ही कम से कम एक “दंगा, छुआछूत और बाबा म्यूजियम” होना चाहिए जिसमें उस इलाके में हुए धार्मिक जातीय दंगों का विवरण और फोटो इत्यादि रखे गए हों। छुआछूत के आधार पर उस इलाके के पाखण्डी सवर्ण द्विजों ने सालों साल तक कैसे अपनी ही स्त्रियों और दलितों, यादवों, अहीरों, कुर्मियों, कुम्हारों, किसानों, मजदूरों, शिल्पियों को जानवर सी जिंदगी में कैद रखा, कैसे मूर्ख बनाकर गरीबों की जमीनों और औरतों को लूटा – ये सब बताया जाना चाहिए।

    कैसे यज्ञ हवन और पूजा पाठ करने वालों, ज्योतिषियों, गुणियों कान फूंकने वाले ओझाओं ने औरतों और शूद्रों दलितों को शिक्षा और रोजगार सहित पोष्टिक भोजन और जीवन के अधिकार से वंचित रखा ये दिखाया जाना चाहिए।

    कितने बाबाजन, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और धर्मगुरुओं ने कितने बलात्कार किये, कितने मर्डर किये, कितनी जमीने दबाई कब कोर्ट ने उन्हें दबोचा, वे कितने साल जेल में रहे – ये सब विस्तार से बताना चाहिए।

    अगली पीढ़ी अगर इन सब मूर्खताओं को करीब से देख समझ ले तो उसे कावड़ यात्रा, कार सेवा, देवी देवता के पंडालों, धार्मिक दंगों, बाबाओ के बलात्कार और जातीय धार्मिक दंगों सहित छुआछूत भेदभाव और अंधविश्वास से बचाया जा सकता है। 

    लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि ये सब बताने की बजाय भारतीय परिवार अपने बच्चों को अपने मूर्ख पारिवारिक गुरुओं, देवी देवताओं के पंडालों और आत्मा परमात्मा की बकवास सिखाने वाले शास्त्रों की गुलामी सिखाते हैं। हर पीढ़ी बार बार उसी अंध्विश्वास, छुआछूत और कायरता में फंसती जाती है। 

    भारत मे व्यक्ति और समाज की चेतना का एक सीधी दिशा में रेखीय क्रमविकास नहीं होता बल्कि यहां सब कुछ गोलाई में घूम फिरकर वहीं का वहीं पुराने दलदली गड्ढे में वापस आ जाता है। इसीलिए ये मुल्क और इसकी सभ्यता कभी आगे बढ़ ही नहीं पाती, हर पीढ़ी उन्हीं बीमारियों में बार बार फसती है जिन्हें यूरोप अमेरिका के समाज पीछे छोड़ चुके हैं।

    भारत के धर्म और सँस्कृति को इतना सक्षम तो होना ही चाहिए कि अपने लिए नए समाधान न सही कम से कम नई समस्याएं ही पैदा कर ले। बार बार उन्हीं गड्ढों में गिरना भी कोई बात हुई? 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारत और जापान का सभ्यता बोध –Sanjay Jothe

    भारत और जापान का सभ्यता बोध –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जापानी टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था की बात अक्सर ही की जाती है। जो सवर्ण द्विज हिन्दू जापान यूरोप अमेरिका आदि आते जाते हैं वे बड़ी होशियारी से वहां के समाज और सभ्यता की विशेषताओं को छिपाते हुए वहां की तकनीक विज्ञान मौसम भोजन आदि की बातें करते पाए जाते हैं. बहुत हुआ तो वे वहां के सेक्स संबंधी खुलेपन और शराब पीने के व्यवहार या परिवार के टूटने और बड़ों और बच्चों में पैदा हुए जेनेरेशन गैप की बात करते हैं. लेकिन वे पूरी सावधानी बरतते हैं कि अमेरिका यूरोप जापान आदि विकसित और सभ्य देशों की सामाजिक संस्कृति वहां के मानवता बोध, सभ्यता बोध आदि का कोई उल्लेख न हो. उन्हें पता है की अगर वे ऐसी बातें करेंगे तो अपने खुद के समाज, देश और धर्म की जहालत की पोल खुल जायेगी.

    अगर भारतीय जनता सभ्य देशों के सामाजिक व्यवहार और अनुशासन सहित वहां की मानव गरिमा के बारे में सुनेगी तो एक बार जरुर पूछेगी की जिस देशों को भौतिकवादी कहकर गाली दी जाती है उनकी सभ्यता इतनी विक्सित है तो धर्मप्राण कहलाने वाले भारत में क्या समस्या है? यहाँ छुआछूत भेदभाव जातीय हिंसा और इतनी अनैतिकता भ्रष्टाचार आदि क्यों है?

    हमारी मित्र “सम्यक संकल्प” ने अपने जापान दौरे के अनुभव को विस्तार से लिखा है. मैं हूबहू उनका लेखन यहाँ दे रहा हूँ. आप देख सकते हैं की जो समाज विज्ञान तकनीक या आर्थिक आयाम में सशक्त हुए हैं उनकी सभ्यता और सामाजिकता बोध, नैतिकता बोध ने भी काफी विकास किया है. वे समाज पहले सभ्य बने हैं उसके बाद तकनीकी या आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं. भारतीय धर्म-धूर्त और सवर्ण द्विज पाखंडी हमेशा ये समझाते हैं की भारत का धर्म और नैतिकता सबसे ऊँची है, उसे वहीं का वहीं बनाये रखते हुए इन्हें साइंस और टेक्नोलोजी का विकास करना है. ठीक यही तर्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान सहित अन्य इस्लामिक मुल्कों में दिया गया है. नतीजा साफ़ है. ये मुल्क न तो विज्ञान तकनीक सीख पाए न ही इंसानियत सीख पाए. मोबाइल से लेकर मिसाइल तक और लोकतंत्र से लेकर प्रबंधन तक हर एक चीज यूरोप अमेरिका जापान जैसे सभ्य समाजों से उधार ले रहे हैं.

    नीचे जापानी समाज की एक ख़ास विशेषता पर हमारी मित्र “सम्यक संकल्प” ने विस्तार से लिखा है  जापानी समाज में गर्भवती स्त्री के संबंध में वहां का सभ्य समाज और सरकारी तन्त्र कैसे काम करता है इसे गौर से पढ़ें और सोचें कि भारत इस मुद्दे पर कहाँ ठहरता है. इसी से तुलना कीजिये कि भारत का धर्म, संस्कृति और सभ्यता बोध की क्या हालत है.

    “गर्भवती होते ही माता को इसकी सूचना अपनी नगरपालिका या वार्ड कार्यालय को देनी होती है और उसे माता और शिशु की देखभाल संबंधी निर्देश पुस्तिका दी जाती है। इसमें सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का विवरण होता है। इसमें गर्भवती महिला की प्रत्येक जाँच का विवरण भी अंकित किया जाता है।

    शिशु के जन्म के बाद के उसके पालन-पोषण के लिए अलग से अनुदानों का प्रावधान है। यदि परिवार में चार सदस्य हों और उनकी कुल वार्षिक आय 2396000 येन (लगभग १२ लाख रुपये) से कम हो तो शिशु के तीन वर्ष का होने तक, पहले और दूसरे शिशु के लिए 5 हजार येन प्रतिमाह और तीसरे बच्चे के लिए 10 हजार येन प्रतिमाह अनुदान दिया जाता है। यदि परिवार की आय इससे अधिक हो और माता या पिता में से कोई भी राज्य या व्यावसायिक प्रतिष्ठान का कर्मी हो और उसकी वार्षिक आय 4178000येन(बीस लाख रुपये) से कम हो तो उसे राज्य सरकार या प्रतिष्ठान द्वारा अलग से इतना ही पालनपोषण भत्ता अनुमन्य है।

    पिता की मृत्यु अथवा माता का विवाह-विच्छेद होने पर, बच्चे के लिए अठारह साल की अवस्था तक और विकलांगता की स्थिति में बीस वर्ष की अवस्था तक प्रतिमास पूर्ण भत्ता 41390 येन और आंशिक भत्ता 27690 येन अनुमन्य है। दूसरे बच्चे के लिए 5000 येन और तीसरे बच्चे के लिए 3000 प्रति येन अलग से दिया जाता है।

    यदि बच्चा विकलांग हो, और परिवार की कुल आय 7410000 येन से कम हो तो अधिक विकलांगता की स्थिति में 50350 येन, और कम विकलांगता की स्थिति में 33530 येन प्रतिमास अनुदान अनुमन्य है। यदि परिपालक पिता न होकर अभिभावक हो और उसकी कुल वार्षिक आय 9041000 येन से कम हो और परिवार में 6 सदस्य हों तो उसे भी यह अनुदान अनुमन्य है।

    घर आकर नवजात शिशुओं की जाँच करने के लिए अलग से नर्सों की नियुक्ति की गयी है। प्रत्येक मुहल्ले में एक स्वयंसेवी शिशु आयुक्त नियुक्त है जो गर्भवती माताओं और शिशुओं के बारे में जानकारी लेता रहता है और उन्हें आवश्यक निर्देश देता है। यही नहीं जिनके माता पिता देर से घर लौटते हैं उनके लिए स्कूलों में अलग से मनोरंजन, क्रीड़ा और जलपान की व्यवस्था है।

    जापान में गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सुविधाएँ हैं। प्रत्येक महिला को प्रसव से पूर्व आवश्यक जाँच हेतु अस्पताल आने-जाने के लिए तीस हजार येन (१५ हजार रुपये) के कूपन, प्रसव में अस्पताल के परिव्यय के लिए 6लाख येन (तीन लाख रुपये ) तथा शिशु के जन्म के बाद उसके वस्त्रादि के लिए पुनः तीस हजार येन के कूपन दिये जाते हैं।

    यही नहीं, यदि माता-पिता अल्प-आय वर्ग चौबीस लाख येन ( बारह लाख रुपये) प्रति वर्ष से कम आय वर्ग के हों तो शिशु के वस्त्रादि के लिए प्रतिमास अलग से अनुदान दिया जाता है। जन्म के दो सप्ताह बाद शिशु के स्वास्थ्य की जाँच के लिए अस्पताल से एक नर्स घर आती है। दस वर्ष की अवस्था का होने तक सभी बच्चों की चिकित्सकीय जाँच और औषधियाँ की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाती है। इसमें माता-पिता की राष्ट्रीयता पर विचार नहीं किया जाता।

    वस्तुतः जापान के संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रत्येक नागरिक को रहन-सहन के न्यूनतम स्तर की गारंटी दी गयी है। इस अनुच्छेद के अधीन माता और शिशु के कल्याण के लिए अनेक प्राविधान किये गये हैं। इन प्राविधानों के मूल में जनसंख्या के अनवरत ह्रास को रोकने के साथ-साथ एक स्वस्थ समाज के निर्माण का संकल्प भी है। जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय की सूचनाओं के अनुसार जापान में 1960 में बाल-मृत्यु दर 30.7 और जन्मना मृत शिशुओं की दर 17 प्रति हजार थी। यह 1994 में घट कर क्रमशः 4.2 और 2.3 प्रति हजार हो गयी। इसमें जापान सरकार की स्वास्थ्य-नीति के निम्नलिखित प्रावधानों का महत्वपूर्ण योगदान है।

    यदि कोई शिशु जन्म के समय 2.5 कि.ग्रा. से कम हो अथवा समय से पहले पैदा तो ऐसे बच्चों की नियमित जाँच के लिए बुलाने पर नर्स की सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध हैं। इसके अलावा माता और शिशु के लिए अलग से चिकित्सा भत्ता दिया जाता है। विकलांग अथवा क्षयग्रस्त बच्चों के लिए विशेष सुविधाएं और गर्भवती माताओं की चिकित्सकीय जांच आदि के लिए विशेष अनुदान दिया जाता है”

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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  • विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है –Sanjay Jothe

    विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग मेडिसिन मैनेजमेंट आदि पर अधिक जोर देकर और ह्यूमेनिटीज, सोशल साइंस को कुचलकर असल मे वर्ण व्यवस्था को वापस लाया जा रहा है।

    वर्ण व्यवस्था को ज्ञान के कुप्रबंधन या ज्ञान की हत्या के अर्थ में देखिये। समाज की बुद्धि और चेतना को नियंत्रित करने वाला जो आयाम है वो धर्म, सँस्कृति, इतिहास, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि है।

    समाज विज्ञान विषयों की चेतना से युक्त या इससे वंचित समाज को जीते रहने के लिए जो तकनीकी या प्रबंधकीय ज्ञान चाहिए उतना वे कहीं से भी उधार ले आते हैं। इस तरह युध्द, सैन्य, व्यापार, टेक्नोलॉजी, चिकित्सा, प्रबंधन आदि को दूसरे देशों से आयात करने में किसी को कोई खतरा नहीं। इसमें कोई शर्म की बात भी नहीं है।

    यही भारत ने अपने ज्ञात इतिहास में किया है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ने दैनिक जीवन की तकनीकी और प्रबंधन संबन्धी विशेषज्ञताओं को विकसित किया है या कहीं से उधार लिया है। लेकिन समाज को सभ्यता, सँस्कृति, नैतिकता और इंसानियत की तरफ आगे बढ़ाने के लिए जो सबसे जरूरी आयाम था उस पर अन्धविश्वासी और धर्म-धूर्त ब्राह्मणों ने कब्जा कर रखा है। उन्होंने इस ज्ञान को अपने स्वार्थ के कारण विकसित ही नहीं होने दिया. वैज्ञानिक चिन्तन, आलोचनात्मक चिंतन और भौतिकवादी इतिहास दृष्टि को उन्होंने बार बार कुचला और बर्बाद किया है।

    यहाँ तक कि भारत के निचले तीन वर्णों की तकनीकी या प्रबंधकीय कुशलता का स्वयं उन्हें या देश को कोई लाभ नहीं मिल सका है। व्यापक रूप से गरीबी, कायरता, आलस्य, बेरोजगारी और गुलामी हमेशा बनी रही है। भारत ज्ञात दो हजार साल में युद्ध, ज्ञान विज्ञान, सभ्यता, नैतिकता आदि के मुद्दों पर निरन्तर पिछड़ता और हारता ही रहा है।

    इसका एक ही कारण है। वो है “तकनीकी और प्रबंधकीय ज्ञान से कहीं ऊंचे और महत्वपूर्ण सामाजिक दार्शनिक ज्ञान पर ब्राह्मणों का कब्जा”।

    अगर धर्म, दर्शन, इतिहास, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि के ज्ञान पर किन्ही विशेष लोगों का कब्जा है तो वे आपकी तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रबंधकीय, चिकित्सीय, गणितीय, सैन्य आदि सब तरह की क्षमताओं का इस्तेमाल अन्धविश्वास को बढाने में और दंगा फैलाने में करते रहेंगे।

    यही भारत का इतिहास रहा है। अभी भी आपकी आंखों के सामने यही दोहराया जा रहा है।

    क्षत्रिय की सैन्य कुशलता और वैश्य या शूद्र की प्रबंधकीय कुशलता आपस में मिलकर भी इस देश को भुखमरी और गुलामी से नहीं बचा सकी। क्योंकि देश, समाज को दिशा देने वाली सांस्कृतिक, दार्शनिक, वैचारिक बहस का नियंत्रण इनके हाथ मे नहीं बल्कि ब्राह्मणों के हाथ मे था। आज अभी अगर आप बहुजनों, दलितों, स्त्रियों, गरीबों, मजदूरों के हक में विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, सैन्य, चिकित्सा आदि का लाभ सुनिश्चित करना चाहते हैं तो आपको ह्यूमेनिटीज यानी सामाजिक विज्ञानों का नियंत्रण अपने हाथ मे लेना होगा।

    भारत के बहुजनों, दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और स्त्रियों को सामाजिक विज्ञानों, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि को अपने हक में मोड़ना सीखना होगा। इन विषयों पर अधिकार निर्मित करना होगा। जो कौम अपनी भाषा, इतिहास, दर्शन, साहित्य, समाज शास्त्र और सँस्कृति का विमर्श अपनी बुद्धि से आगे नहीं बढ़ा सकती वो विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, चिकित्सा आदि सीखकर भी भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरह गुलाम ही रहती है।

    भारत के बहुजनों को अपनी ऐतिहासिक पराजय और गुलामी को इस नजर से देखना चाहिए और ह्यूमेनिटीज या सामाजिक विज्ञान विषयों को गंभीरता से लेना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि बहुजन समाज से आने वाले लोग इन विषयों पर खूब लिखें, खूब पढ़ें और अपनी खुद की जरूरतों के हिसाब से नए नए विमर्श पैदा करें।

    विज्ञान या तकनीक खुद से कोई विमर्श पैदा नहीं करते बल्कि पहले से उपलब्ध सामाजिक राजनीतिक या दर्शनिक विमर्शों की सेवा करते हैं।

    जो सभ्य समाज आज विज्ञान, तकनीक प्रबंधन आदि के ज्ञान से लाभ उठा रहे हैं और एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ पा रहे हैं उन देशों समाजों को गौर से देखिये. उन्होंने पहले अपने समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा, इतिहास और दर्शन आदि के ज्ञान को दुरुस्त किया है. अपने समाज में मानविकी विषयों की बेहतर शोध और समझ को विकसित किया है इसीलिये वे विज्ञान तकनीक आदि को सही दिशा में इस्तेमाल कर पा रहे हैं।

    इसके विपरीत भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान सीरिया आदि देशों में जहां अपने सामाजिक विज्ञान अपने साहित्य इतिहास दर्शन आदि की समझ के विकास को रोका गया है वहां के समाज विज्ञान तकनीक आदि को अपनी ही जनसंख्या के हित के लिए इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. इस “उधार ली गयी” विज्ञान और तकनीक से वे अपनी समस्याओं को बढा रहे हैं कम नहीं कर रहे हैं।

    इसका सीधा मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनीक जिस तरह के मनोविज्ञान और सामाजिक, मानसिक प्रौढ़ता से पैदा होते हैं वैसा सामाजिक मनोविज्ञान और वैसी सामाजिक प्रौढ़ता पैदा किये बिना अगर किसी समाज को विज्ञान, तकनीक और प्रबन्धन आदि का ज्ञान उधार में मिल जाए तो वो उस ज्ञान से आत्मघात कर लेगा. यही भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों ने किया है।

    इस विषय में केन विल्बर्स नामक एक अमेरिकी दार्शनिक ने कहा है कि “तीसरी दुनिया के वे देश जिन्होंने अपनी जमीन पर सामाजिक मुक्ति की लड़ाई नहीं लड़ी है उन्हें अगर पश्चिमी टेक्नोलोजी सिखा दी जाए तो वे उसे सही दिशा में इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं”. किसी विज्ञान या तकनीक को कैसे और किस दिशा में इस्तेमाल करना है ये बुद्धि सामाजिक विज्ञानों की दर्शन, साहित्य,इतिहास आदि की समझ से आती है. और ये समझ भारत पाकिस्तान जैसे गरीब मुल्कों में पैदा ही नहीं हो पा रही है।

    विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है। अगर ये नियंत्रण बहुजनों के हाथ मे है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि भारत के पंचानवे प्रतिशत लोगों के हित में काम करेगा। अगर ये नियंत्रण भारत के बहुजनों के हाथ मे नहीं है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि की ये विशेषज्ञताएँ पांच प्रतिशत धर्मधूर्तों की सेवा करेंगी।

    भारत के बहुजन तय कर लें कि वे क्या चाहते हैं।

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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  • ये युवक, या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते  हैं? –Sanjay Jothe

    ये युवक, या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते हैं? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    कल ट्रेन में सफर के दौरान चार युवा इंजीनियर्स से बात करने का मौका मिला। चारों एक दूसरे से परिचित होते हुए अपनी पढ़ाई, कमाई, अनुभव, कम्पनी आदि का बखान कर रहे थे। जाहिर हुआ कि चारों देश की सबसे अच्छी सॉफ्टवेयर कम्पनियों में कार्यरत हैं, दो पुणे में एकसाथ है दूसरे दो मुम्बई एकसाथ काम करते हैं। अगली कुछ छुट्टीयों में चारो दिल्ली की तरफ जा रहे थे।

    बातचीत करते हुए हमने साथ मे चाय ली, उन्होंने उत्सुकता से मुझसे पूछा कि आप क्या करते हैं? मैंने उत्तर दिया कि मैं सोशल रिसर्च का काम करता हूँ। वे अधिक अंदाजा नहीं लगा सके और पूछने लगे कि इसमें क्या काम होता है और इसको करने से क्या फायदा होता है?

    उनकी दुविधा समझते हुए मैंने प्रतिप्रश्न किया कि आप बताएं कि कम्प्यूटर साइंस में क्या काम होता है और उससे क्या फायदा होता है? उन्होंने बताया कि कम्प्यूटर साइंस सब तरह के यांत्रिकरण, ऑटोमेशन और गणनाओं का आधारभूत टूल बन गया है, हर विषय मे हर काम में हर तरह की खोज में कम्प्यूटर की भूमिका बढ़ गयी है।

    मैंने पूछा कि कम्प्यूटर साइंस की जानकारी से आप क्या क्या समझ या समझा सकते हैं? वे बोले कि हम बता सकते हैं कि किस तरह के काम के लिए कैसा सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर लगेगा, कैसे काम किया जा सकता है। अधिक एफिशियंसी के लिए किस नई तकनीक का कैसे उपयोग हो सकता है इत्यादि।

    मैने उन्ही के उत्तर को आधार बनाते हुए कहा कि ठीक इसी तरह समाज विज्ञान है उससे हम बता सकते हैं कि कोई समाज सभ्यता, विज्ञान और तकनीक पैदा कर सकेगा या नहीं, या कि कोई समाज आने वाले समय मे सभ्य और अमीर होगा या और अधिक बर्बर या गरीब होता जाएगा?

    मैंने एक उदाहरण देते हुए बात रखी कि एक तरह से ये माना जा सकता है सोशल साइंस किसी देश मे समाज की वास्तविकता, उसकी समस्याओं, संभावित समाधानों और बदलाव के तरीकों की रिसर्च करता है। जैसे आपके कम्प्यूटर साइंस का अपना विस्तार है वैसे ही समाज विज्ञान भी है। वे समाज विज्ञान शब्द सुनकर चौंके, उन्हें समझने में दिक्कत हो रही थी कि समाज का अध्ययन विज्ञान कैसे हो सकता है? सामाजिक नियम, भोजन, रहन सहन, सामाजिक संरचना, परम्परा, जाति, वर्ण, धर्म आदि का अध्ययन विज्ञान कैसे हो सकता है?

    विज्ञान शब्द को तकनीक के अर्थ में समझने की उनकी ट्रेनिंग के कारण वे सामाजिक “विज्ञान” को समझ नहीं पा रहे थे। इसीलिये उन्हें यह भी अजीब लग रहा था कि इस “विज्ञान” पर पढ़े लिखे से नजर आने वाले ये सज्जन क्या काम करते होंगे?

    उन्होंने सीधे से पूछ लिया कि कोई उदाहरण देकर समझाएं कि इस तरह की रिसर्च में होता क्या है? मैंने उन्हें उन्ही के विषय मे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि समाज विज्ञान आपको यह बताता है कि किस तरह का समाज सभ्य, वैज्ञानिक और विकसित होगा और किस तरह का समाज असभ्य, गरीब और अवैज्ञानिक होता जाएगा। जैसी मैंने उम्मीद की थी वे गरीबी, सभ्यता, सँस्कृति आदि की बजाय विज्ञान में रुचि लेने लगे और पूछने लगे कि समाज विज्ञान किसी देश के भौतिक विज्ञान और तकनीक के विकास पर क्या जानकारी देगा? या भविष्यवाणी कर सकता है?

    ये विषय उनके पसन्द का था सो वे उत्सुकता से सुनने लगे। मैंने कहा कि सभी समाज विज्ञान और तकनीक को पैदा नहीं कर सकते, कुछ समाज दुसरो से बेहतर विज्ञान और सभ्यता की समझ रखते हैं इसलिए वे सारा विज्ञान और तकनीक पैदा करते हैं और शेष अविकसित असभ्य और पिछड़े समाजो को तकनीक और विज्ञान बेचते हैं। इसपर वे पूछने लगे कि कौनसे समाज विकसित और वैज्ञानिक हैं और कौनसे पिछड़े हैं?

    मैंने उदाहरण दिया कि बहुत मोटे तौर पर यूरोपीय, अमरीकन समाज जो कि आस्तिकता और धर्म की गुलामी से आजाद हो रहे हैं, उनको तुलनात्मक रूप से विकसित और वैज्ञानिक रुझान का माना जा सकता है और अरब, अफ्रीका, एशिया के वे सभी समाज जो किसी काल्पनिक ईश्वर और स्वर्ग नरक को मानते हैं उन्हें पिछड़ा हुआ माना जा सकता है।

    ये सुनते ही उन्हें धक्का लगा, वे कहने लगे कि वैसे तो भारत मे हमारा समाज भी आस्तिक है, धार्मिक है, ईश्वर और स्वर्ग नरक को मानता है तो क्या भारत पिछड़ा और असभ्य है? मैंने कहा कि इस बात को दूसरे ढंग से समझने की कोशिश करते हैं, क्या आपको लगता है कि सभ्यता, विज्ञान, संपन्नता और तरक्की का आपस में सीधा संबन्ध है?

    थोड़े विचार के बाद वे मानने को राजी हो गए कि सभ्य समाज ही अपने परिश्रम और साहस से वैज्ञानिक और अमीर हो सकता है। असभ्य समाज अंधविश्वासी गरीब और पिछड़े रहने को बाध्य हैं। इस सभ्यता का सीधा सबन्ध लोकतंत्र और सुशासन और विकास से कैसे जुड़ता है इसे वे थोड़ा थोड़ा देख पा रहे थे लेकिन धर्म और आस्तिकता से इसका संबन्ध बिल्कुल नहीं जोड़ पा रहे थे।

    मैंने पूछा कि जिन व्यक्तियों ने विज्ञान में मौलिक खोजे की हैं उनमे से अधिकतर लोग किस रुझान के थे? क्या वे ईश्वर स्वर्ग नरक, देवी देवता, आत्मा, पुनर्जन्म और इनसे जुड़े किसी तरह के कर्मकांड में भरोसा रखते थे या नास्तिक थे? उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग नास्तिक ही थे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वैज्ञानिक होने में ईश्वर आत्मा या कर्मकांड से कोई रुकावट पैदा होती है। वे सभी इस बात का दावा कर रहे थे कि धार्मिक, पूजा पाठी और श्राद्ध तर्पण आदि करते हुए भी वैज्ञानिक हुआ जा सकता है।

    मैंने कहा अगर ऐसा है तो फिंर आप ऐसे श्राद्ध तर्पण कर्मकांड करने वाले चार पांच वैज्ञानिकों और उनकी मौलिक खोजों के नाम बताइये। एक ने उदाहरण दिया कि रामानुजन हुए हैं जिन्होंने गणित में नई खोजें कीं। वे शाकाहारी, मन्त्रपाठी और कर्मकांडी ब्राह्मण थे। रामानुजन के अलावा वे किसी और का नाम न बता सके।

    मैंने पूछा कि इस कर्मकांड, शाकाहार और धर्म ने रामानुजन को मदद की या इसी ने उनकी जान ले ली? वे चौंके, बोले इस धर्म ने उनकी जान कैसे ली? क्या मतलब है आपका? मैंने कहा कि रामानुजन छुआछूत मानते थे वे ईसाई मांसाहारी रसोइए के हाथ का खाना नहीं लेते थे, सर्द मौसम में भी शराब या ब्रांडी नहीं पीते थे, सिर्फ अपने हाथ का पका दाल चावल खाते थे और पवित्रता की सनक ऐसी थी कि लंदन की सर्दी में भी दिन में कई कई बार नहाकर पूजा पाठ करते थे। कुपोषण और निमोनिया से उनकी मौत हो गयी। अब बताइये धर्म ने उन्हें फायदा किया या नुकसान किया? क्या धर्म और पूजा अर्चना ने उन्हें विज्ञान को आगे बढाने योग्य बनाया या उनकी हत्या कर दी? उनकी तरह रोज कर्मकांड करने वाले कितने लोग गणितज्ञ बने?

    इस सवाल पे वे एकदूसरे का मुंह ताकने लगे। लेकिन फिर भी वे स्वीकारे नहीं कर रहे थे कि धर्म और विज्ञान में विरोध का संबन्ध है। उनमें से एक युवक जिसके हाथ मे ढेर सारी अंगूठियां थी और लाल पीले धागे बंधे थे वो बोला कि धार्मिक और पूजापाठी लोगों ने भी साइंस और तकनीक बनाई है। हमारे ऋषि मुनि अपनी तकनीक के बल पर एक से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते थे। उनके पास भी एटॉमिक टेक्नोलॉजी थी। वे पशु पक्षियों से भी बात कर पाते थे।

    इस पर उस युवक का मित्र बोला कि उसने भी महाभारत में पढ़ा है कि मन्त्र की शक्ति से लोग हवा में भी उड़ सकते थे। फिर वे चारों बताने लगे कि साउंड वेव्स बहुत ताकतवर होती हैं शायद प्राचीन काल मे हमारे ऋषि मुनियों के पास कोई टेक्नोलॉजी थी जिसके जरिये वे एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते थे, मन्त्र के जरिये ब्रह्मास्त्र जैसे एटॉमिक मिसाइल जैसा कोई बम छोड़ सकते थे।

    अब चौंकने की बारी मेरी थी। अब तक जो युवक (इनमे से दो IIT से पढ़े हुए हैं) क्लाउड टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी और क्वान्टम कम्प्यूटर की बात कर रहे थे वे एकदम से तंत्र मंत्र और महाभारत कालीन एटॉमिक मिसाइल तक पहुंच गए।

    मैंने कहा चलो मान लिया कि महाभारत के समय में क्वांटम टेलीपोर्टेशन और एटॉमिक टेक्नोलॉजी थी। अब ये बताइये कि ऐसी टेक्नॉलोजी उन्होंने किस तरह के मकानों प्रयोगशालाओं या विश्वविद्यालयो में बैठकर बनाई होगी? किस तरह की धातु या प्लास्टिक आदि का इस्तेमाल किया होगा? इतनी उन्नत टेक्नोलॉजी को बनाने या चलाने के लिए उन्नत धातुविज्ञान, रसायन, कम्युनिकेशन, ट्रांस्पोर्टेशन, सड़कें, कार, ट्रेन मोटर वाहन आदि चाहिए या नहीं? लेकिन आपके ऋषि मुनि तो लकड़ी की खड़ाऊ पहनकर बिना सिले कपडे लपेटकर पैदल या बैलगाड़ी या घोड़े के रथ पर यात्रा कर रहे हैं? तीर कमान, गदा, तलवार फरसा आदि लेकर घूम रहे हैं। कागज या लैपटॉप की बजाय केले के या ताड़ के पत्तों पर लिख रहे हैं। ये कैसे सँभव है?

    अब उनके जवाब सच मे चकरानेवाले थे। एक युवक बोला कि हो सकता है कि उन्होंने अपने ज्ञान से ये समझ लिया हो कि ट्रांसपोर्ट, मोटर कार मशीनें आदि पर्यावरण के लिए खतरनाक है इसलिए वे “ईको फ्रेंडली” तरीके से जीते रहे हों। इसीलिए शायद उन्होंने बायो-डिग्रेडेबल मकान, यूनिवर्सिटी, रथ, सड़कें, कपड़े, बर्तन, आदि बनाये हो जिनके सबूत आजकल की खुदाई या पुरातत्व को नहीं मिलते। हो सकता है कि वे सादा जीवन उच्च विचार वाले लोग हों और ज्यादा सुविधापूर्ण मकान, यन्त्र आदि न बनाये हो, वे सिर्फ कंद मूल खाते रहे हों, एनर्जी और पर्यावरण को बचाते रहे होंगे।

    मैंने उनकी आंखों में झांकते हुए पूछा कि क्या आपको हकीकत में ये लगता है कि ऋषि मुनियों के पास ऐसी टेक्नोलॉजी रही होगी जिसका आज कोई सबूत कोई निशान तक नही है? वे चारों पूरे आत्मविश्वास से बोले कि ये एकदम सँभव है उन्होंने कुछ डॉक्यूमेंट्रीज के नाम गिनाए जिसने पिरामिड की टेक्नॉलिजी, माया सभ्यता, द्वारिका, सुमेरियन सभ्यता जैसी प्राचीन विकसित सभ्यताओ और उनकी तकनीकी उन्नति की बात की गई थी।

    मैंने अंत मे पूछा कि चलो मान लेते हैं कि ये सब तकनीक और साइंस ऋषि मुनियों के पास था, तो आज उनके वंशज विज्ञान तकनीक के मामले में यूरोप अमेरिका का मुह क्यों ताकते हैं? इसका जवाब और भयानक दिया उन्होने। वे बोले कि हम लोग अपने पुराने साइंस को भाषा को इतिहास को भूल चुके हैं, बीच के समय मे मुसलमानों, अंग्रेजों ने हमारे ज्ञान विज्ञान को नष्ट कर दिया। इसीलिए न हमारा विज्ञान बचा न तकनीक के कोई सबूत। इसीलिए हम दूसरों पर निर्भर हैं।

    इस चर्चा के बॉद मैं सोचता रहा कि ये उच्च शिक्षित मोटी तनख्वाह वाले शहरी युवा हैं या कि गांव के किसी मंदिर के सामने बैठे तोते वाले ज्योतिषी और पंडित हैं? मैं बार बार उनकी शक्लें और उनके महंगे मोबाइल और कपड़े जूते आदि देखता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे कि चार पाषाण कालीन जीवाश्मों से बात कर रहा हूँ। फिर बार बार यही ख्याल आता रहा कि ये युवक, या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते  हैं?

  • दलितों, आदिवासियों, शूद्रों व मुसलमानों के लिए ट्रेनिंग मोड्यूल –Sanjay Jothe

    दलितों, आदिवासियों, शूद्रों व मुसलमानों के लिए ट्रेनिंग मोड्यूल –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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    भारत के दलितों आदिवासियों, ओबीसी (शूद्रों) और मुसलमानों को मानविकी, भाषा, समाजशास्त्र, दर्शन इतिहास, कानून आदि विषयों को गहराई से पढने/पढाने की जरूरत है. कोरा विज्ञान, मेडिसिन, मेनेजमेंट और तकनीक आदि सीखकर आप सिर्फ बेहतर गुलाम या धनपशु ही बन सकते हैं, अपना मालिक और अपनी कौम के भविष्य का निर्माता बनने के लिए आपको मानविकी विषयों को पढ़ना चाहिए.

    अंबेडकर को पढ़िए, पेरियार को, मार्क्स को लोहिया को ज्योतिबा फूले को पढ़िए, भगत सिंह, राहुल सांस्कृत्यायन और देश दुनिया के सभी क्रांतिकारियों को पढ़िए. इन्हें पढ़े समझे बिना अगर आप पैसा कमा रहे हैं तो ये पैसा आपसे आपके ही लोगों के भविष्य की ह्त्या करवा रहा है. आप सीधे सीधे अपने ही बच्चों के भविष्य की हत्या कर रहे हैं.

    दलितों आदिवासियों, ओबीसी (शूद्रों) और मुसलमानों से आने वाले जितने अधिकारी, उद्योगपति, नेता, इंजीनियर, प्रोफेसर, वकील, डाक्टर या धनपति हैं वे अपनी कौमों के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं. वे सिर्फ अपने आप को “ऊँचे लोगों” के बीच स्वीकृत बनाये रखने के लिए ही मरे जा रहे हैं, ऐसे सभी लोग अपनी कौम के अपने समाज के गद्दार हैं. ये गद्दारी उनका अपना चुनाव है. उन्हें माफ़ कीजिये, आज नहीं तो कल उन्हें बुद्धि आयेगी. न भी आई तो इतिहास उनपर हंसेगा, और उनके खुद के समझदार बच्चे उनपर हसेंगे.

    अभी आप एक जरुरी काम करना शुरू करें. अपने परिवारों में अपने मित्रों में और खासकर अपनी महिलाओं के साथ ऊपर गिनाये हुए लेखकों बुद्धिजीवियों क्रांतिकारियों की किताबें और विडिओ (अगर हों तो) पढ़ाएं/दिखाएँ. उनसे इन विषयों पर चर्चा करें. बच्चों और घर की औरतों को धार्मिक अंधविश्वास, त्यौहार, वृत, उपवास और कर्मकांडों से दूर ले जाते हुए उनके साथ सीधे सीधे सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर सरल भाषा में चर्चा करें. छोटी कवितायें, कहानियां, बाल साहित्य (धार्मिक नहीं) की किताबें खोजें और अपनी महिलाओं और बच्चों को बाटें, समय निकालकर उनके बीच जाकर उन्हें समझाने की कोशिश करें. और जब भी अवसर मिले खुद इन मुद्दों को समझने की कोशिश करें.

    अगर आप ये कर सकते हैं तो आप बिना शोर मचाये दुनिया का सबसे बड़ा काम कर सकते हैं. इस काम को चौराहे या सडक पर डंडा या झंडा लहराते हुए नहीं करना है. इसे आपको अपने परिवार में अपने बच्चों और स्त्रीयों के बीच और समाज के भीतर करना है. इसमें कोई सरकार, कोई कानून, कोई संगठन किसी तरह की रुकावट नहीं डाल सकता.

    ये सबसे सुरक्षित और सबसे कारगर काम है, आप अगर तैयार हैं तो बस इतना ही काफी है. बहुत कम धन और बहुत कम समय में ये काम आप कर सकते हैं. आपको इसमें मदद करने के लिए हजारों लेखक, पत्रकार, टीचर, प्रोफेसर, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रगतिशील स्त्री पुरुष मिल जायेंगे. आप शुरू करें तो ये बहुत कम समय में एक आन्दोलन बन सकता है.

    इसके लिए मैं एक पूरा ट्रेनिंग मोड्यूल डेवेलप करने का विचार कर रहा हूँ, इस तैयारी में कुछ महीनों का समय लग सकता है. जो मित्र उत्सुक हों उन्हें इसमें प्रशिक्षित किया जा सकता है और वे इसे एक काडर डेवेलपमेंट प्रोग्राम की तरह अपने घरों, परिवारों, मुहल्लों में लागू कर सकते हैं.

     

  • भारत के स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग का नष्ट किया जाना –Sanjay Jothe

    भारत के स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग का नष्ट किया जाना –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत की इंजीनियरिंग मेडिसिन और मेनेजमेंट की पढाई के बाद अब समाज विज्ञान दर्शन इतिहास और मानविकी की शिक्षा की भी बात कर लेते हैं.

    तुर्की और अफ्रीका का उदाहरण यहाँ महत्वपूर्ण है. जब प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार हुआ और तुर्की में प्रेस लगने के बाद किताबें छपकर समाज में फैलने लगीं तब तुर्की की राजसत्ता और धर्मसत्ता को खतरा पैदा हुआ कि इस तरह ज्ञान फैला तो उनकी गुलामी कौन करेगा? ये जनता अगर तर्क, ज्ञान और चेतना से भर गयी तो उनकी अपनी सदियों पुरानी परम्पराओं पर सवाल उठाने लगेगी. ऐसे कई गुणा भाग करते हुए तुर्की में प्रेस और किताबों के साथ ज्ञान का फैलाव भी बंद हो गया. नतीजा सामने है. पूरा मिडिल ईस्ट, अरब और शेष दुनिया का इस्लामिक जगत आज ज्ञान विज्ञान के मामले में सबसे फिसड्डी बना हुआ है.

    एक अन्य उदाहरण है जो कोलोनियल एरा में रिकार्ड किया गया. अफ्रीका में मिशनरियों ने एक अफ्रीकी कबीले में बच्चों की बीमारियों से मौत पर ध्यान दिया. वहां उन्होंने पाया कि अशिक्षा की वजह से बच्चे और माताएं साफ़ सफाई और अन्य स्वास्थ्यवर्धक आदतें नहीं सीख पाते और एक से दूसरी पीढी में नहीं पहुंचा पाते. इसके लिए उन्होंने उस कबीले की स्त्रीयों और बच्चों के लिए विशेष स्कूल खोने और उन्हें पढाना शुरू किया. थोड़े समय में कबीले के सरदार ने खतरा महसूस किया. हुआ ये कि पढने वाले बच्चे इन मुखिया जी से तर्क करने लगे और कुछ पारम्परिक कर्मकांडों अंधविश्वासों आदि पर स्पष्टीकरण मांगने लगे. मुखिया जी और उनके लठैत समझ गये कि ये शिक्षा अगर फ़ैल गयी तो उनकी राजनीति खत्म हो जायेगी. मुखिया जी अपने लठैतों के साथ गये और स्कूल बर्बाद कर डाले.

    ये तुर्की और अफ्रीका में जो हुआ वो ठीक हमारे सामने भारत में हो रहा है. कुछ अलग ढंग से हो रहा है इसलिए हम समझ नहीं पा रहे हैं. लेकिन इसके कारण और परिणाम वही होंगे जो इस्लामिक और अफ्रीकी जगत में हो चुके हैं. ठीक से देखें तो हम उन परिणामों को ही जी रहे हैं.

    अब भारत के स्कूलों में आइये. समाज विज्ञान, साहित्य और दर्शन सहित राजनीति और इतिहास को भारत में जिस तरीके से पढ़ाया जाता है वो एक हैरान करने वाला तथ्य है. कुछ चुनिन्दा विश्वविद्यालय या संस्थान छोड़ दिए जाएँ तो शेष जगहों पर इन विषयों को एकदम तथ्यों को घोटने की शैली में पढाया जाता है. स्कूल के बच्चों से कुछ पूछिये वे एकदम खड़े होकर एक सांस में कुछ उत्तर दोहराने के लिए प्रशिक्षित किये जाते हैं, जो बच्चा लगातार बोलते हुए किसी रते हुए उत्तर को नहीं दोहरा पाता उसे दुसरे लोग मूर्ख समझते हैं और वो बच्चा भी खुद को कमजोर समझता है. किन्ही स्कूलों में मैंने पढ़ाई करने या अभ्यास करने के स्था पर एक ख़ास शब्द का प्रचलन देखा है, शिक्षक बच्चों को कहते हैं “याद कर” पढाई कर या पढ़ नहीं बल्कि “याद कर” ये मैंने मध्यप्रदेश के मालवा के कुछ शहरों में अधिक देखा है. अन्य शहरों के मित्र अपनी बातें जोड़ सकते हैं.

    तथ्यों को घोटकर उन्हें दोहरा देने की कला को शिक्षा या पढ़ाई कहना एक अन्य अंधविश्वास है जो उन लोगों ने फैलाया है जो असल में शिक्षा को नष्ट करके इस समाज को अन्धविश्वासी बनाये रखते हुए इसका शोषण करना चाहते थे.

    कल्पना कीजिये छोटे छोटे बच्चे अगर न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को रट्टा मारकर घोटने दोहराने के बजाय उसे प्रयोगों द्वारा ठीक ढंग से समझ ले तो क्या ये बच्चा किसी उड़ने वाले देवता का भक्त बन सकता है? क्या वो परीक्षा के भय से ऐसे देवता को नारियल चढाने जाएगा? फिर ऐसे देवता के आधार पर रचे गये शास्त्रों और परम्पराओं की गुलामी करेगा? बिलकुल नहीं करेगा.

    अब एक अन्य कल्पना कीजिये, अगर कोई बच्चा कबीर या बुद्ध या चार्वाकों या मार्क्सवादियों की भौतिकवादी तर्क पद्धति के अनुरूप विचार करते हुए तर्क से अपने जीवन और समाज की समस्याओं को सुलझाना सीख ले तो क्या वो गुरुपूर्णिमा या गुरुभक्ति या धर्म के नाम पर अंधे दंगों में शामिल होगा? बिल्कुल नहीं होगा.

    ऐसे में जो सत्ता, जो जातियां, जो वर्ण इस देश में अपना आधिपत्य बनाये रखना चाहती हैं उन्हें उस अफ्रीकी कबीले के सरदार की तरह नजर आने लगता है कि इस शिक्षा को बर्बाद करने के लिए उन्हें क्या करना है. और मजे की बात ये है कि शिक्षा जगत पर पठन पाठन लेखन पर एक ही वर्ण का कब्जा है तो वे अपना निर्णय बड़ी आसानी से पूरे समाज और देश पर थोप सकते हैं. सो वो हजारों साल से ये कर पा रहे हैं. नतीजा आपके सामने है.

    साहित्य को देखिये 1935 तक मुंशी प्रेमचंद के उभार के ठीक पहले तक भक्ति कवितायें, राग रंग, और नायिका विमर्श चल रहा था. सभी ब्राह्मण साहित्यकार जो संपन्न घरों से आते थे और जिनके परिवारों या समुदाय में शोषण या दमन की पीड़ा अनुभव नहीं की गयी थी वे अगम्य अगोचर, भक्ति और भगवान् सहित राजाओं सामंतों की स्तुतियाँ और उनका मनगढ़ंत इतिहास लिखा करते थे. उस जमाने में किसानों, मजदूरों स्त्रीयों, दलितों शूद्रों के जीवन पर एक ढंग का दस्तावेज भी खोजना मुश्किल है. जब भारत में मार्क्सवादी साहित्य दृष्टि प्रविष्ट हुई तब भारत के गैर ब्राह्मण लेखकों ने आम जनता और गरीब मजदूर स्त्री को केंद्र में रखकर साहित्य की रचना की. उसके बाद भारत के साहित्य में एक नई चेतना निर्मित हुई जिसने आगे जाकर लोकतंत्र की चेतना समाजवाद की चेतना को सहारा दिया. लेकिन इसके ठीक पहले ब्राह्मण साहित्य में नख शिख वर्णन चल रहा था, स्त्री के नायिका के सौन्दर्य के चर्चे होते थे.

    क्या ये बात कुछ बताती है हमें? साहित्य से आम आदमी गरीब मजदूर और स्त्रीयों का गायब हो जाना क्या बताता है? सदियों तक साहित्य काव्य नाटक कथाएँ सब इसी तरह से निर्मित होती रही हैं जिनमे समाज के असली आदमी और उसके जमीनी जीवन का कोई उल्लेख तक न रहा. इसीलिये भारत में विदेशी यात्रियों और अग्रेज अधिकारियों के लिखे वृत्तांत इतने महत्वपूर्ण हो गये हैं. उनमे पहली बार भारत के “जन इतिहास” की आवाज सुनाई देती है. अगर वे न होते और उनका लेखन न होता तो अभी भी भारतीय पोंगा पंडित किसी न किसी तरह का “पुराण” ही लिख रहे होते. वे हमेशा की तरह जमीनी सवालों को अध्यात्म, रहस्यवाद और मिथकों की जलेबी बनाकर खत्म कर देते.

    यही उनकी पीढी दर पीढी विशेषज्ञता रही है. इसीलिये उन्होंने हजारों साल से शिक्षा और पठन पाठन को अपना विशेषाधिकार बनाया था ताकि उनके षड्यंत्रों को कोई समझ न सके.

    इसी मानसिकता को ध्यान में रखते हुए अब विज्ञान या साहित्य या समाज विज्ञान के विषयों की भारत में पढ़ाई को देखिये. यही वर्ग सब विश्वविद्यालयों कालेजों स्कूलों में अधिकार जमाये बैठा है. https://www.sunjournal.com/ buy generic alprazolam इस वर्ग को भारत के वैज्ञानिक या लोकतांत्रिक या धर्म की गुलामी से मुक्त हो जाने का सबसे बड़ा भय सता है. ये वर्ग (या वर्ण) नहीं चाहता कि भारत के बच्चे उस अफ्रीकी कबीले की तरह तर्क और विज्ञान से भरे सवाल उठाने लगें इसलिए वे शिक्षा के साथ साथ गुरुभक्ति और देवी देवताओं का चरणामृत आवश्यक रूप से बांटते हैं. गुरु पूर्णिमा गुरुशिष्य परम्परा इत्यादि का जोर शोर से प्रचार करना उनके लिए बहुत जरुरी है.

    अब इस विरोधाभास को देखिये. जो शिक्षक अपने घर में श्राद्ध कर रहा हो अदृश्य पितरों या देवी देवताओं के भय से आक्रान्त हो वो स्कूल में बच्चों को या विश्वविद्यालय में छात्रों को विज्ञान या समाज विज्ञान में तर्क और क्रिटिकल थिंकिंग सिखा पायेगा? किस मुंह से सिखाएगा? वो स्वयं अपने जातिगत वर्णगत संस्कार के कारण वैज्ञानिक बुद्धि को अभी तक पैदा नहीं कर पाया है वो बच्चों को क्या और क्यों सिखाएगा? इस बात पर गौर कीजिये. ये एकदम जमीनी सच्चाई है कोई आसमानी बात नहीं.

    अपने आसपास के लोगों से पूछिए पिछली पीढी में या उससे पहले की पीढी में शिक्षकों के नाम और सरनेम बताएं, वे किन जातियों और वर्णों से आ रहे हैं? उनके अपने व्यक्तिगत धार्मिक रुझान क्या हैं? आपको तुरंत समझ में आयेगा कि भारत के स्कूलों कालेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग को किन लोगों ने किस बुद्धि के साथ और क्यों नष्ट किया है.

  • भारत की शिक्षा व्यवस्था और “वर्ण-माफिया” –Sanjay Jothe

    भारत की शिक्षा व्यवस्था और “वर्ण-माफिया” –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत में आजादी के बाद इंजीनियरिंग, विज्ञान, मेडिसिन या मेनेजमेंट या दर्शन मानिविकी और समाज विज्ञान की पढाई करने वाले तबके पर और उसकी समाज या देश के प्रति नजरिये पर गौर करना जरुरी है. भारत के इस सुदीर्घ दुर्भाग्य और हालिया “गोबर और गौमूत्र” के विराट दलदल को समझने के लिए हमें इस पीढ़ी के मन को और “वर्ण माफिया” के काम करने के तरीके को समझना होगा.  

    एक बहुत जरूरी बात ये नोट करनी चाहिए कि आजादी के बाद पहली पीढ़ी के ये तकनीकी बाबू और सामाजिक विज्ञानी या साहित्यकार और दार्शनिक भी अधिकांश सवर्ण परिवारों से आये हैं जिन्हें समाज मे बदलाव की कोई जरूरत महसूस नहीं होती, उन्हें अपने परिवार, रिश्तेदारों या समुदाय के बाहर किसी के जीने मरने  या शोषण से कोई सहानुभूति नहीं होती इसलिए वे यथास्थितिवादी बनकर उभरे हैं उन्होंने विज्ञान, तकनीक, मैनेजमेंट और मेडिसिन सहित समाज विज्ञान और दर्शन और स्वयं तर्कशास्त्र आदि की पढ़ाई को इतना मेकेनिकल बना दिया है कि उसमे आलोचनात्मक विश्लेषण और क्रिटिकल थिंकिंग का कोई स्कोप ही नहीं रह गया है.

    फिर से गौर कीजिये, सवाल ये है कि भारत में इंजीनियरिंग मेडिसिन और विज्ञान पढने वालों के सामाजिक सरोकार कैसे कम से कमतर होते जा रहे हैं. क्यों ये लोग पैसा कूटने की मशीन बनकर अपने ही अन्धविश्वासी अनपढ़ और गरीब लोगों का शोषण करते हैं? क्यों इनमे सामान्य सी मनुष्यता और सामाजिक हितचिन्तना पैदा नहीं होती?

    स्कूल कालेज के शिक्षा जगत का उदाहरण लिया जा सकता है. उसके जरिये समझना आसान होगा, कालेज और विश्वविद्यालय स्तर पर इंजीनियरिंग और मेनेजमेंट से रिश्ता कम ही है आम जन का लेकिन स्कूल से हम अमूमन रोज ही टकराते हैं. शिक्षा का जैसा व्यवसायीकरण और अपराधीकरण हुआ है वह चौंकाने वाला है. 

    पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में या इटली में जिस तरह से कबीलाइ परिवारवाद और वंश आधारित माफिया चलता है उसी तरह भारत में “वर्ण माफिया” चलता है. इसे अकादमिक जगत में, न्यायपालिका में, प्रशासन में और राजनीति में काम करते हुए आसानी से देखा जा सकता है. अन्य देशों का माफिया स्वयं को अपराधी महसूस करता है उसमे एक ख़ास किस्म का आत्मग्लानि का भाव भी होता है कि वे गलत कर रहे हैं लेकिन भारत का “वर्ण माफिया” शास्त्र और धर्म के गर्भ से जन्मा है. उसमे किसी तरह का कोई अपराध भाव या आत्मग्लानि नहीं होती इसीलिये इस माफिया को समझ पाना और इसे उखाड़ फेंकना एक असंभव सा काम बन गया है. 

    इस माफिया को समझने के लिए एक प्रयोग कीजिये अपने किसी मित्र से पूछिए कि भारत में सफल या समृद्ध लोगों की कल्पना करते हुए उनके सरनेम या जातिनाम बताये. आपको आश्चर्य होगा कि आपको ये सभी सरनेम ‘सवर्ण द्विजों’ के ही मिलेंगे. ये सरनेम आपको न्यायपालिका, सरकार, व्यापार, शिक्षा और प्रशासन इत्यादि के सभी आयामों में दबदबा बनाये हुए नजर आयेंगे.

    इसका क्या मतलब हुआ?

    इसका ये मतलब हुआ कि समाज को ज़िंदा रहने, प्रगति करने, बदलाव करने या यहाँ तक कि सड़-सड़ कर मर जाने के लिए भी जितने जरुरी महकमे, विभाग, या आयाम हैं उन सब पर “वर्ण माफिया” बैठा हुआ है. आप अनाज मंडियों और व्यापार में झांककर देखिये आपको “वैश्य वर्ण माफिया” बैठा मिलेगा, उस माफिया से बचकर कोई दूसरी जाति या सरनेम वाला व्यक्ति या समूह व्यापार या उद्यमिता नहीं कर सकता. न्यायपालिका और शासन, सरकार सहित धर्म में देखिये वहां “ब्राह्मण वर्ण माफिया” जमा हुआ है. वे कभी भी भारत में अपने वर्ण के दबदबे को कम नहीं होने देना चाहते, उनका न्यायबोध शासन बोध या शासन-प्रशासन का तरीका असल में आत्मरक्षण और यथास्थिति के रक्षण को समर्पित होता है. इसी तरह शिक्षा जगत को देखिये वहां भी “सवर्ण माफिया” ही मिलेगा. 

    शिक्षा जगत को गौर से देखिये वहां कौन से सरनेम या जातिनाम वाले लोग विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, डीन, चांसलर या वाइस चांसलर हैं? निश्चित ही सब के सब निर्विवाद रूप से ‘सवर्ण द्विज हिन्दू’ हैं. अब आगे बढ़ते हुए ये देखिये कि शिक्षा, शिक्षण, प्रशिक्षण और ज्ञान विज्ञान, तकनीक सहित मानविकी, समाज विज्ञान आदि विषयों में भारत में रिसर्च और नवाचार क्यों इतना कमजोर और फटेहाल है? किन लोगो पर इसकी जिम्मेदारी डाली जानी चाहिए? दलितों आदिवासियों और उनके आरक्षण पर देश को कमजोर करने का आरोप लगता है लेकिन उनकी कुल जमा संख्या इन अकादमिक संस्थानों में दो प्रतिशत भी नहीं हैं.

    भारत में 90 से 95 प्रतिशत पद सभी अकादमिक संस्थानों, स्कूलों कालेजों विश्वविद्यालयों में सवर्ण द्विज हिन्दुओं द्वारा भरे हुए हैं. अगर भारत सामूहिक रूप से शिक्षा जगत में फिसड्डी बना हुआ है तो ये सवर्ण द्विज हिन्दुओं की सोची समझी साझिश है, ये कहना गलत होगा कि ये उनकी कमजोरी के कारण हुआ है. मैं ये कहना चाहुगा कि ये उनकी सफलता है वे जो चाहते हैं वैसा कर रहे हैं. वे भारत को कमजोर गुलाम अशिक्षित और पिछड़ा बनाये रखना चाहते हैं इसके लिए वे जानते हैं क्या करना है और कैसे करना है. ये काम वे हजारों साल से कर रहे हैं. वे बहुत कुशल और सफल लोग हैं उन्हें मूढ़ या कमजोर कहना स्वयं में मूढ़ता होगी.

    मैं इसे सोची समझी साजिश क्यों कह रहा हूँ? ये बहुत गहरी और जरुरी बात है आइये इसे सरल भाषा में समझते हैं. 

    शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षर ज्ञान और कमाकर खाना सीखना नहीं होता है. शिक्षा का अर्थ होता है एक मनुष्य होने के नाते अपने विशिष्ठ व्यक्तित्व और अपने जमीर को पहचानते हुए अपने और अपने समाज के बारे में निर्णय लेकर उसपर अमल करने की ताकत हासिल करना. शिक्षा को इंसान बनने का या निर्णय लेने की ताकत हासिल करने का जरिया भी कहा जा सकता है. ऐसी शिक्षा का मतलब होगा कि व्यक्ति या समाज अपनी जिन्दगी, समाज की जिन्दगी और देश की जिन्दगी के बारे में तटस्थ और वैज्ञानिक ढंग से सोच सके और उसे बहतर बनाने के लिए जमीनी कदम उठा सके.

    अगर भारत की जनता में इस तरह की सोच पैदा होगी तो लोग सवाल उठाएंगे कि औरतों को बराबरी का हक क्यों नहीं है? क्यों उन्हें सैकड़ों साल तक शिक्षा,सम्मान और प्रेम से वंचित रखा गया? क्यों लाखों करोड़ों औरतों को उनके पतियों की लाशों पर ज़िंदा जलाया जाता रहा है? क्यों दलितों और स्त्रीयों को एकजैसा घृणित समझते हुए हजारों साल तक शिक्षा और राजनीतिक सामाजिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से वंचित रखा गया है? क्यों भारत की रक्षा का एकमुश्त ठेका क्षत्रियों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत दो हजार साल तक युद्धों में हारता रहा है और कम से कम एक हजार साल गुलाम रहा है? क्यों शिक्षा का एकमुश्त ठेका ब्राह्मणों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत अनपढ़ और अन्धविश्वासी बना हुआ है? क्यों व्यापार का एकमुश्त ठेका वैश्यों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत इतना गरीब और बेरोजगार क्यों बना हुआ है?

    भारत में अगर शिक्षा सच में ही फ़ैल जाए और दलितों, बहुजनों आदिवासियों की अधिकतम जनसंख्या तक पहुँच जाए तो फिर इतनी बड़ी संख्या पर हजारों साल से नियन्त्रण रखने वाले, इनका खून चूसने वाले धर्म और समाज व्यवस्था का क्या होगा? कौन फिर भगवान् से डरेगा? कौन जात पात को मानते हुए बिना शर्त बेगार या गुलामी करेगा? कौन फिर लोकतंत्र में एक बोतल एक नोट के बदले चुपचाप वोट देकर पांच साल के लिए सो जायेगा? कौन फिर मंदिर मस्जिद के नाम पर दंगा करेगा? कौन होगा जो नसबंदी या नोटबंदी पर सवाल न उठाएगा? फिर कौन आँख कान बंद करके भक्ति करेगा? ये वास्तविक प्रश्न हैं जो भारत में शिक्षा के लिए जिम्मेदार लोग शिक्षा के संबंध में कुछ भी नया करने से पहले अपने आपसे जरुर पूछते हैं.

    वे जब ये सवाल अपने आपसे पूछते हैं तो उन्हें उनकी “अंतरात्मा” से एक बड़ा भयानक उत्तर मिलता है. उन्हें उत्तर मिलता है कि वाकई अगर भारत की जनता शिक्षित हो गयी तो उनका “वर्ण माफिया” दस साल के भीतर मिट्टी में मिल जाएगा. इसीलिये वे अपने मुट्ठी भर लोगो को सत्ता बनाये रखने के लिए भारत की अस्सी प्रतिशत जनता को और स्वयं भारत को अज्ञान और अंधविश्वास के दलदल में फसाए रखते हैं. इसीलिये वे बहुत सोचे विचारे ढंग से स्कूलों कालेजों सहित पूरे शिक्षा तन्त्र को निकम्मा और बेकार बनाये रखते हैं.

    भारत के स्कूलों की कालेजों की व्यवस्था देखिये. वहां विज्ञान, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि किस ढंग से और क्यों पढाया जाता है. विज्ञान को तोता रटंत की तरह पढाने का असल कारण क्या है? समाज विज्ञान में लोकतांत्रिक चेतना और मानवाधिकार सहित समता और बंधुत्व की आदर्शों की बात को गायब करने का क्या कारण है? पहली कक्षा से बारहवी कक्षा तक अंबेडकर, फूले, पेरियार, अछूतानन्द, गोरख, कबीर और नानक को शिक्षा से गायब कर देने का क्या कारण है? इन सवालों के साथ फिर ये भी सोचिये कि जिस वर्ण के कर्मकांडी और अन्धविश्वासी लोगों का समाज और शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा है उनका विज्ञान से या यूरोपीय वैज्ञानिक चेतना से या यहाँ गिनाये गये अंबेडकर कबीर जैसे नामों से क्या रिश्ता है? क्या वे सच में भारतीयों को विज्ञान या अंबेडकर पेरियार या कबीर सिखाने के हक में हैं? क्या बच्चों को सही अर्थ में विज्ञान सिखाने के बाद या कबीर पढ़ाने के बाद उन्हें अन्धविश्वासी देवी देवताओं गुरुओं आदि की भक्ति में झोंका जा सकता है? क्या वास्तव में विज्ञान सिखाने के बाद गुरुपूर्णिमा पर अंधविश्वास का चरणामृत उन्ही छात्रों को पिलाया जा सकता है? इन सबका एक ही उत्तर है – नहीं!

    अगर भारत में सही तरीके की शिक्षा फ़ैल जाए तो न तो सवर्ण द्विज माफिया को कोई छात्र/छात्रा चरण स्पर्श करेगा न पोंगा पंडित बाबाओं धर्मगुरुओं की गुलामी करेगा न ही इनके फैलाए दंगों में लड़ने के लिए तैयार होगा. अब सवाल ये है कि भारत की शिक्षा और समाज पर नियन्त्रण रखने वाले लोग क्या ये सब होने देना चाहते हैं? अगर वे ये होने देना चाहते हैं तो उन्हें पिछले सत्तर सालों में या उसके भी पहले ज्ञात दो हजार साल के इतिहास में किसने रोका था? बात एकदम साफ़ है कि ये वर्ण माफिया जान बूझकर समाज को शिक्षा से वंचित बनाता आया है ताकि इसका एकाधिकार इस देश पर बना रहे.  

    कल्पना कीजिये अगर सच में ही यूरोपीय ढंग की वैज्ञानिक शिक्षा भारत में फ़ैल गयी तो शिक्षा, न्यायपालिका, शासन-प्रशासन आदि में मलाई खा रहे इस “वर्ण माफिया” के पास भारत की एतिहासिक रूप से लंबी गुलामी, कमजोरी, कायरता और धर्मान्धता सहित वर्तमान में जारी करोड़ों-करोड़ों गरीबों के शोषण और दमन से जुड़े सवालों के क्या जवाब होंगे? किसानों की आत्महत्या या मजदूरों के पलायन के सवालों के इनके पास क्या उत्तर हैं? ये वे सबसे गंभीर सवाल हैं जो भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू शासक हजारों साल से टालते रहे हैं. ये सवाल अगर दलितों, आदिवासियों, बहुजनों और स्त्रीयों के मन में आ गया तो वे इस वर्ण माफिया को उखाड़ फेकेंगे.

    इसका सीधा अर्थ ये निकलता है कि इस सवाल को उभरने से बचाने के लिए इस देश की शिक्षा व्यवस्था को लूला-लंगडा और अंधा-बहरा बनाये रखना जरुरी है. अभी वर्ण माफिया के “दैवीय आधिपत्य” को ही धर्म समझने वालों ने शिक्षा के साथ जो व्यवहार करना शुरू किया है उसे भी देखा जाना चाहिए. वे यूरोपीय ढंग की वैज्ञानिक और क्रिटिकल थिंकिंग पैदा करने वाली शिक्षा से भयानक ढंग से डरे हुए हैं. उन्हें पता है कि जैसे यूरोप में इस शिक्षा ने पुनर्जागरण लाकर धर्म और भगवान् को उखाड़ फेंका है उसी तरह उनके धर्म और भगवन को भी ये शिक्षा उखाड़ फेंकेगी इसीलिये भारत का वर्ण माफिया हजारों साल से शिक्षा को बर्बाद करने का संगठित षड्यंत्र चलाता आया है. 

    भारत की अस्सी प्रतिशत बहुजन आबादी को और कुल जनसंख्या की पचास प्रतिशत स्त्रीयों को शिक्षा से वंचित रखने वाले शास्त्र रचना कोई सामान्य बात नहीं है. ये “वर्ण माफिया” को बनाये रखने की धर्मसम्मत और शास्त्रसम्मत रणनीति रही है. ये आज भी जारी है. इसी राजनीती ने भारत को अनपढ़, विभाजित, कमजोर, डरपोक और गरीब बनाया है. 

    सोचिये अगर भारत के अस्सी प्रतिशत दलित और शूद्र शिक्षित हो सकते, शस्त्र और शास्त्र उठा सकते तो मुट्ठी भर मंगोल, शक, हूण, यूनानी या ब्रिटिश भारत को जीत सकते थे? भारत बार बार हारा क्योंकि अस्सी प्रतिशत जनता न किताब उठा सकती थी न तलवार उठा सकती थी. आज भी इन अस्सी प्रतिशत को दबाने और सताने में ही भारत की कुल जमा समझदारी और ताकत खर्च हो रही है इसीलिये भारत किसी भी क्षेत्र में अपने समकक्ष देशों या यूरोप अमेरिका से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है. 

    जिस घर में मुखिया अपने ही परिवार के शोषण और दमन में अपनी सारी ताकत खर्च किये दे रहा हो उसका पड़ोसियों से बार बार हार जाना एकदम स्वाभाविक सी बात है. भारत का सवर्ण माफिया अपने ही अस्सी प्रतिशत जनसंख्या के खिलाफ षड्यंत्र और अपराध करता रहता है इसलिए उन्हें दुनिया के अन्य सभ्य देशों के बराबर खड़े होने की तैयारी का समय ही नहीं मिलता. घर के भीतर घमासान मचा हुआ है, भारत के अंदर महाभारत और राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र का दबदबा बना हुआ है, ऐसे में पडौसियों से हारने और पिटने से कौन बच सकता है? यही भारत का कुल जमा इतिहास है.

    शिक्षा और नवजागरण को रोके रखने के लिए भारत का वर्ण माफिया बहुत बड़ी कीमत चुकाता आया है. भारत की गुलामी से बड़ी कीमत क्या हो सकती है? इसपर मजा देखिये कि जिन लोगों ने भारत को अशिक्षित कमजोर और विभाजित रखकर इसे गुलाम बनने और हारने पर मजबूर किया वे आज हमे राष्ट्रवाद सिखा रहे हैं. और शिक्षा सहित शिक्षा के पूरे तन्त्र को बर्बाद करने का सबसे बड़ा प्रयास भी आरंभ कर चुके हैं. ये सब हमारी आँखों के सामने हो रहा है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • जाति विनाश कैसे हो? –Sanjay Jothe

    जाति विनाश कैसे हो? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जाति विनाश अगर सवर्णों से अपेक्षित है तो ये व्यर्थ का प्रोजेक्ट है. लेकिन जाति विनाश दलितों पिछड़ों से अपेक्षित है तो इस प्रोजेक्ट से बहुत उम्मीद की जा सकती है.

    जाति विनाश कैसे होगा इसकी विस्तार से चर्चा करने से पहले दो वक्तव्य याद रखिये. महान आयरिश लेखक, विचारक और नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ से एक बार किसी ने पूछा था कि नेता कौन होता है? शॉ ने मजाकिया अंदाज में चुटकी लेते हुए बताया कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही हो उसी दिशा में झंडा उठाकर सबसे आगे हो लेने वाला ही नेता होता है.” दूसरा वक्तव्य डॉ. अंबेडकर का है जब वे अपनी प्रसिद्ध किताब “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के दुसरे संस्करण की भूमिका लिख रहे थे. उन्होंने लिखा “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इन दो वक्तव्यों में जाहिर तौर पर उपर उपर कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन आगे के विस्तार में जाकर हम देखेंगे कि ये ‘अलग अलग’ वक्तव्य जाति उन्मूलन के मुद्दे पर बहुत दूर से एकदूसरे से कैसे जुड़ते हैं.  

    जाति विनाश या जाति का उन्मूलन सदा से भारतीय शूद्रों (ओबीसी) दलितों (अनुसूचित जातियों) दमितों (स्त्रीयों) का सपना रहा है. इसे लेकर जितना चिंतन मंथन और काम हुआ है उसकी बड़ी असफलता को साफ़ –साफ़ देखा जा सकता है. एक सामाजिक, राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में इस मुद्दे पर जितना काम हुआ है उससे अपेक्षित परिणाम नहीं आये हैं बल्कि इस काम ने इन जातियों और समुदायों को पहचान या शिनाख्त की राजनीति (आइडेंटिटी पोलिटिक्स) की अंतहीन अँधेरी सुरंग में धकेल दिया है. इस अँधेरी सुरंग में ये ही पता नहीं चलता कि आपके नाम से आपके हक में नारे लगाने वाले राजनेताओं के हाथ में आपके लिए फूल हैं या खंजर है. इस अँधेरी राजनीति में सिर्फ शोर और नारे सुनकर जो लोग शामिल हुए हैं उनके चेहरों पर निराशा और पराजय का भाव साफ़ नजर आता है. पहले जो लोग हाथों में फूल लेकर आपके साथ नारे लगा रहे थे उनके सभी फूल अब कमल के फूल बन गये हैं. सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा और उनकी सरकारों की गुलामी करने में इन दलित आदिवासी या अल्पसंख्यक ‘क्रांतिकारियों’ को किसी तरह लज्जा का अनुभव नहीं हो रहा है. आज जब देश में दलितों आदिवासियों मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे हैं तब दलित और आदिवासी नेताओं, अधिकारियों की चुप्पी बहुत भयानक सच्चाई को उजागर करती है. ये चुप्पी सिर्फ दलित नेताओं, झंडाबरदारों और प्रशानिक अधिकारियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि शूद्र (ओबीसी), दलित आदिवासी तबकों से आने वाले बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी इस स्थिति के सामने मौन और दुविधाग्रस्त होकर खड़ा है.

    जाति नाश या जाति उन्मूलन की मूल भावना और लक्ष्य को अगर ठीक से देखा जाए तो आप पायेंगे कि एक अच्छे उद्देश्य से जो काम शुरू किया गया उसकी दिशा और उसकी कार्यपद्धति बहुत हद तक गलत रही है. ये वक्तव्य जाति उन्मूलन के अभी तक के देशव्यापी प्रयासों पर एक साझी टिप्पणी के रूप में समझा जा सकता है. इस वक्तव्य के कई पहलू हैं और ये वक्तव्य कई बिन्दुओं पर आधारित है.

    हम शुरुआत करते हैं डॉ. अंबेडकर के जाति उन्मूलन के आह्वान से. उनका प्रसिद्ध भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” जो कि असल में सवर्णों को उनके धर्म की बुराई के बारे में जागरूक करते हुए लिखा गया था उसमे जाति व्यवस्था का और उसकी अनैतिकता और दरिन्दगी का विश्लेषण किया गया है. लेकिन इसमें बहुत स्पष्ट शब्दों में जाति उन्मूलन का कोई प्रेक्टिकल रोडमेप नहीं दिया गया है. हालाँकि वो भाषण हो भी नहीं पाया और हमें तत्कालीन सवर्ण हिन्दू मानस की प्रतिक्रिया भी इस पर नहीं मिल पायी. बाद में ये भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के नाम से एक किताब के रूप में प्रकाशित हुआ. इस किताब का उद्देश्य सवर्ण हिन्दुओं को उनकी जाति व्यवस्था के प्रति जागरूक करना था ताकि वे अपनी बीमारी को पहचान सकें. इस किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में भी डॉ. अंबेडकर ने  इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. उसके बाद डॉ. अंबेडकर जाति उन्मूलन के अन्य संभव सामाजिक, राजनीतिक शैक्षणिक और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन संबंधी आयामों में भी प्रयोग और प्रवेश करते हैं. लेकिन इस सबका परिणाम क्या हुआ?

    यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि इसका परिणाम नहीं हुआ है. वास्तव में इसका बहुत कुछ परिणाम हुआ है. दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन गौर से देखा जाए तो जाति उन्मूलन नहीं हुआ है. दलितों दमितों की आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति में सुधार अवश्य हुआ है लेकिन व्यापक रूप से देखें तो भारत की सामाजिक या धार्मिक जमीन पर उनके लिए स्थिति बिलकुल भी नहीं बदली है. इसका सीधा अर्थ ये है कि ऊपर-ऊपर कास्मेटिक बदलाव हुए हैं लेकिन गहराई में जाति का विभाजन – जाति अंतर्गत विवाह और भोजन की विवशता के रूप में – अभी भी वहीँ का वहीं बना हुआ है. इसको और सरल शब्दों में कहें तो जाति के आधार पर विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध अभी भी बना हुआ है जो बताता है कि जाति अभी भी पूरी तरह बनी हुई है. फिर इस केन्द्रीय तथ्य के बाकी सारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सभ्यतागत परिणाम हैं जो हम सब रोज अखबारों में पढ़ते हैं. अखबार की ये खबरें बीमारी को दिखाती हैं लेकिन बीमारी के असल कारण – जाति और वर्ण के भेद की निरन्तरता को नहीं दिखाती है.

    दो घटनाओं को उदाहरण की तरह लीजिये. पहला उदाहरण ये कि अभी किसानों की आत्महत्याओं से हम सब दुखी और चिंतित हैं. शायद भारत ने दुनिया में अनोखा वर्ल्ड रिकार्ड बनाया है जिसमे किसानों ने युद्ध या गृहयुद्ध या आर्थिक मंदी के न होने की दशा में भी इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्याएं की हैं. इसका कुछ संबंध जाति और वर्ण की बहस से भी अवश्य जुड़ता है. जिस वर्ण या जाति के लोग किसान हैं या भूमिहीन मजदूर हैं उन जातियों वर्णों के लोगों का राजनीति और व्यापार जगत में ‘सक्रिय’ प्रतिनिधित्व कितना है? स्थानीय व्यापारियों के जगत में किस जाति या वर्ण का कब्जा है? मंडियों में अनाज के व्यापार पर और सब्जियों के बाजार में सदियों से किन जातियों और वर्ण का कब्जा है? बीज, खाद, कीटनाशकों की दुकानों और बैंकों तक में किन जातियों और वर्णों का वर्चस्व है? फिर इन सबको नियंत्रित करने वाली शासन-प्रशासन या कानून की व्यवस्था की बागडोर किन जातियों और वर्णों के हाथ में है? इस सबके बाद अब ये देखिये कि किसानों मजदूरों की जातियों के सक्रिय प्रतिनिधि ऊपर वाले स्तरों पर कितने हैं? सरल शब्दों में कहें तो बात ये है कि किसान या मजदूर के मरने पर शेष ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के मरने” जैसा दुःख होता है क्या? किसान या मजदूर के कमजोर और अशिक्षित रह जाने पर ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के पिछड़ जाने” जैसा दुख होता है क्या? इसका उत्तर है – नहीं. उन्हें इस तरह का कोई दुःख नहीं होता. उन्हें इन आत्महत्याओं से या इस पिछड़ेपन से न तो व्यक्तिगत दुःख होता है न ही उनकी राजनीति, अर्थसत्ता या सामाजिक सत्ता पर कोई खतरा नजर आता है इसीलिये वे इसे नजरअंदाज करके बड़ी आसानी से सदियों सदियों जहां के तहां बने रहते हैं.

    दूसरा उदाहरण देखिये. सवर्ण हिन्दुओं को जब महसूस हुआ कि राम मन्दिर मुद्दे को वे अपनी राजनीतिक सत्ता मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं तो उन्होंने देश भर में इसके लिए आन्दोलन छेड़ दिया. मन्दिर मस्जिद के होने या न होने से किसी गरीब हिन्दू या मुसलमान का कोई भला नहीं होता लेकिन चूँकि स्वर्ण हिन्दू राजनीति को इसकी जरूरत थी इसलिए उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द्र को नुक्सान पहुंचाते हुए भी ये काम किया. वे ऐसा कर सके क्योंकि समाज, व्यापार, शासन, प्रशासन, धर्म संस्कृति और मीडिया के हर स्तर पर उनके लोगों का दबदबा है. उनका अपना नेटवर्क और प्रेशर ग्रुप है जो देश और देश की गरीब जनता से ज्यादा अपने जातीय और वर्णगत नेटवर्क के प्रति अधिक वफादार है.

    इसका सीधा अर्थ ये हुआ कि भारत की राजनीति और सामाजिक प्रक्रियाएं सवर्णों के आपसी सामाजिक संबंधों और समीकरणों से चलती हैं. उन प्रक्रियाओं में दलितों पिछड़ों के समाजों में उभर रहे सुख दुःख का कोई असर शामिल नहीं है. सवर्ण हिन्दू अपने लिए मंदिर बनवाने के लिये देश भर में आन्दोलन कर देंगे लेकिन किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर गरीब असहाय मजदूरों और किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के मुद्दे पर कुछ नहीं करेंगे. इससे ये सीख मिलती है कि अगर दलितों शूद्रों के आपसी जातीय समीकरण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से एकदूसरे के निकट आकर एक हो जाएँ तो आप इस सवर्ण राजनीति या समाज को अपने अनुसार बदल सकते हैं. याद रखिये, दलित पिछड़ों के समाज में समाज के अलग अलग स्तरों में अगर आपसी मेलजोल नहीं है तो दलितों पिछड़ों की राजनीति इसी तरह बिकती रहेगी आपके दलित नेता सवर्णों की गोदी में बैठकर ऐसे ही पुरस्कार पाते रहेंगे.

    कल्पना कीजिये कि भारत में शासन-प्रशासन में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व रखने वाली जातियों के बच्चों में कोई बीमारी फैलती है और उनके जीवन पर संकट आता है. तब ये प्रतिनिधि क्या करेंगे? क्या ये अपने बच्चों को भी दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों के बच्चों की तरह उपेक्षा से देखेंगे? या फिर ये अपने शासन प्रशासन की शक्ति और पहुँच का इस्तेमाल अपने बच्चों की बेहतरी और सेहत के लिए करेंगे? इसका जवाब आसान है. ये लोग पूरी ताकत लगाकर अपने बच्चों की सेहत और खुशहाली के लिए शासन प्रशासन से ऐसी नीतियाँ बनवायेंगे जो उनके हित में हों. उसे लागू करवाने का भी इन्तेजाम करेंगे. ऐसा कारनामा हमारे सांसद और विधायक अपनी अपनी तनख्वाह बढवाने के लिए कई बार कर चुके हैं.

    इस काल्पनिक उदाहरण के बाद वास्तविकता में भारत की गरीब जातियों के बारे में सोचिये. उनके बारे में सोचने वाले और वास्तव में मुंह खोलने वाले इस राजनीति, शासन-प्रशासन में कितने हैं? और इससे भी बड़ी बात ये कि क्या इन लोगों को पता है कि वे अपने बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं और भारत से जाति को खत्म करके न सिर्फ अपने लोगों को बल्कि स्वयं भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी को सबल बना सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर है – नहीं. सरल शब्दों में कहें तो भारत की पिछड़ी जातियों को उनके प्रतिनिधियों और सक्षम लोगों को बहुत हद तक ये साफ़ साफ़ पता ही नहीं है कि वे अपने लोगों की और भारत की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या (जो कि दलित और शूद्र/ओबीसी/आदिवासी/अल्पसंख्यक है ) की जिन्दगी को निर्णायक रूप से सुधारने के लिए क्या कर सकते हैं या उन्हें क्या करना चाहिए.

    इस सवाल को दुसरे कोण से देखिये. क्या भारत के इन बहुसंख्य लोगों के कमजोर या बीमार होने से सवर्ण जातियों के सामाजिक सम्मान या राजनीतिक आर्थिक रुतबे में कोई खतरा पैदा होता है? इसका जवाब ये है कि भारत के बहुसंख्यक लोगों के कमजोर होने से उन सवर्णों को नुक्सान नहीं बल्कि फायदा होता है. तब वे अपनी राजनीति अपने धर्म और अपनी संस्कृति को, अपने भोजन या कपडे की पसंद को आपके ऊपर थोप सकते हैं. अभी आंख खोलकर देखिये, भारत में ये ही खेल चल रहा है. तब आप क्यों और कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ये जातियां और वर्ण दलितों शूद्रों और आदिवासियों लिए बेहतर नीतियों या बेहतर राजनीति के निर्माण के लिए मेहनत करेंगी? और आप इनसे ये उम्मीद करते हैं तो आप स्वयं क्या करेंगे? क्या बैठकर इंतज़ार करेंगे? कब तक इन्तेजार करेंगे?

    इस बात को गहराई से समझिये, राजनीति या प्रशासन में कुछ अच्छा करने की सदिच्छा के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह राजनीतिक संकल्प (पोलिटिकल विल) का विषय है. और राजनीतिक संकल्प असल में सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक लाबिंग का खेल है. हो सकता है कि सवर्ण जातियों में बहुत से संवेदनशील राजनेता, प्रशासक चिन्तक, लेखक कार्यकर्ता या सामान्य नागरिक हों. मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ ऐसे बहुत लोग हैं. और ये भी सच है कि दलितों पिछड़ों के हक की आवाज उठाने के लिए हजारों लाखों सवर्ण हिन्दूओ और ब्राह्मणों भी बहुत ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, पहले भी उन्होंने भारत को सभ्य बनाने के लिए और जाति सहित अस्पृश्यता आदि के उन्मूलन के लिए बहुत कुछ किया है. लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते तो इसका इमानदार विश्लेषण करना होगा.

    ऊपर के इस विस्तार में जाने के बाद आप देखेंगे कि जाति नाश आरंभ से एक ऐसा प्रयास रहा है जिसमे जाति व्यवस्था से पीड़ित लोगों की बजाय जाति व्यवस्था से फायदा उठाने वालों पर अधिक ध्यान दिया गया है. एक अर्थ में ये जरुरी भी था. दलितों पिछड़ों को ये बताना जरुरी था कि तुम्हारी दुर्दशा के लिए तुम नहीं बल्कि ये सामाजिक धार्मिक व्यवस्था जिम्मेदार है, ताकि वे हीन भावना से निकलकर कुछ करने को सक्षम हो सकें. साथ ही हिन्दुओं को उनके शास्त्रों और धर्म में छुपे कैंसर के बारे में भी बताना जरुरी था ताकि वे दुनिया की अन्य सभ्यताओं और धर्मों से अपनी तुलना कर सकें. ये काम न्यूटन या गेलिलियो के काम जैसा है. कबीर रैदास फूले अंबेडकर पेरियार आदि ने ये काम पूरी उंचाई तक ले जाकर मुकम्मल कर दिया है. एक तरह से उन्होंने न्यूटन की तरह गुरुत्वाकर्ष्ण सिद्धांत खोजकर दे दिया है. अब हमे आइन्स्टीन या स्टीफेन हाकिंग की तरह आगे बढना है. आज भी हम अंबेडकर फूले पेरियार की तरह सिर्फ सवर्णों को संबोधित करते रहेंगे तो इसका मतलब है कि हम हर पीढी में न्यूटन की तरह ग्रेविटी की खोज करते रहेंगे. फिर हम ग्रेविटी के ज्ञान पर आधारित राकेट यान कब बनायेंगे? तब हम मार्टिन लूथर की तरह समाज और संस्कृति में पुनर्जागरण कब लायेंगे?

    जाति व्यवस्था के लिए सवर्णों को संबोधित करने की बात हमारे लेखन, साहित्य, राजनीतिक सामाजिक बहस में और दस्तावेजों में डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण – एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट – से ही चली आ रही है. डॉ. अंबेडकर ने सवर्णों की सभा के लिए ही इसे लिखा था और इस भाषण के पहले और बाद में भी अपने लोगों के लिए सवर्णों की सदिच्छा पर निर्भर न रहते हुए भी स्वयं की शक्ति में भरोसा रखते हुए कई महत्वपूर्ण काम किये हैं, लेकिन जाति विनाश के विमर्श और आन्दोलन के केंद्र में जाति से पीड़ित जातियों की बजाय लाभ पाने वाली जातियों को रखने की प्रवृत्ति अभी भी कम नहीं हुई है. इसका सरल भाषा में मतलब ये हुआ कि आज भी दलित पिछड़ों के बीच में आपसे बातचीत होती है तो सवर्ण द्विज हिन्दुओं की भूमिका पर अधिक चर्चा होती है स्वयं दलित पिछड़े अपने बीच जाति भेद कैसे गिरा सकते हैं इस बात पर बहुत कम चर्चा होती है.

    दलितों पिछड़ों को समझना चाहिए कि समाज, राजनीती और शासन प्रशासन सहित व्यापार रोजगार आदि भी असल में सामाजिक आर्थिक संबंधों और राजनीतिक नेटवर्किंग या लॉबिंग से चलते हैं. ऊपर बताये उदाहरण में अगर सवर्ण प्रतिनिधि अपने बच्चों के इलाज के लिए या अपनी तनख्वाह बढाने के लिए शासन प्रशासन को मजबूर कर सकते हैं तो आपको भी यह सोचना है कि आप स्थानीय व्यापार, सामाजिक आर्थिक समीकरण, स्थानीय राजनीति, स्थानीय बाजार, स्थानीय या क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक या वैचारिक बहस को अपनी जातियों और वर्ण की एकता से कैसे प्रभावित कर सकते हैं? ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है जो राजनीति से ज्यादा समाज की रोजमर्रा जिन्दगी पर लागू होता है. इस प्रश्न का जो उत्तर है उसके दो पहलु हैं:

    1. पहला ये कि राजनीतिक या सामाजिक बदलाव लाबिंग या सामाजिक नेटवर्क के आपके हित में सक्रीय होने से होता है. ऐसा नेटवर्क बनाना और उसे आपके हित में सक्रीय करना आपकी यानि दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी है. अगर इसके लिए आप सवर्ण द्विज हिन्दुओं का मुंह देखते हैं तो आप कार्यवाही और सोच विचार की कमान उनके हाथों में दे देते हैं फिर वे जैसे चाहें आपको घुमाते रहेंगे.

    2. दूसरा ये कि अगर आप राजनीतिक सामाजिक नेटवर्क बनाने और सक्रिय करने में अपनी ही जातियों और वर्ण के लोगो को केंद्र में रखें सिर्फ उनसे ही उम्मीद करें और आपस में अपनी जातियों को पहले खत्म कर सकें तो जाति उन्मूलन के विमर्श और उसपर कार्यवाही की कमान आपके हाथ में होगी. तब स्वर्ण द्विज हिन्दू चाहकर भी आपको भटका नहीं सकेंगे. और तब वे आपके राजनीतिक नेतृत्व को खरीद भी नहीं पायेंगे.

    अब मुद्दा ये है कि समाज और राजनीति में दलित पिछड़े अपना नेटवर्क और अपनी लाबी को कैसे मजबूत करेंगे?

    इसके उत्तर के लिए हमें डॉ. अंबेडकर के वक्तव्य को ठीक से समझना पड़ेगा. जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है डॉ. अंबेडकर ने “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इस वक्तव्य पर गौर कीजिये. यहाँ सवर्ण हिन्दुओं से उम्मीद की जा रही है कि वे जाति व्यवस्था के जहर को समझें और ये भी समझें कि उनकी ये बीमारी शेष भारत के लिए क्यों खतरनाक है. बाद के दौर में हम देख पाते हैं कि सवर्ण हिन्दुओं को अपनी इस बीमारी की वजह से शेष भारत के नुकसान की कोई चिंता नहीं है. इसके विपरीत उन्हें इस बीमारी को बढाते जाने की चिंता अधिक है. अगर आप भारत में सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक संगठनों और प्रचलित बाबाओं कथाकारों और गुरुओं के कामों का विश्लेषण करें तो वे जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं बल्कि जिस पलायनवादी और पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से जाति व्यवस्था को ताकत मिलती है, उसी अध्यात्म का पाठ पढाये जा रहे हैं. सवर्ण सांस्कृतिक संगठन हिंदुत्व की विभाजक राजनीति कर रहे हैं और दलितों शूद्रों मुसलमानों के शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास, स्वास्थय सुविधाओं सहित सामाजिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संभावना को कमजोर बना रहे हैं, घोषित रूप से जाति आधारित आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं और इससे भी आगे बढ़कर वे आरक्षण के मुद्दे पर दलितों शूद्रों आदिवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं.

    इन बातों का मतलब ये हुआ कि सवर्ण द्विज हिन्दू अभी भी जाति को अपनी बीमारी के रूप में या देश के लिए खतरे के रूप में नहीं देख पा रहे हैं या इस तरह देखना नहीं चाहते हैं. इसका कारण भी साफ़ है कि चूँकि उन्हें इस बीमारी को बनाये रखने से फायदा होता है इसलिए वे अपनी तरफ से इसे खत्म करने का कोई काम नहीं करेंगे. इसका साफ़ मतलब ये है कि डॉ. अंबेडकर हिन्दुओं को नहीं समझा पाए कि वे बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी देश के लिए खतरनाक है. थक हारकर उन्होंने दलितों को बौद्ध धर्म में जाने की सलाह दी थी.  उनका ये कदम इस बात के लिए था कि सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद करना बेकार है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को स्वयं अन्धविश्वासी धर्म और परम्परा को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर अपनी मदद खुद करनी चाहिए.

    अब इस बिंदु पर आकर अब एक सबसे बड़ा सवाल उठता है कि स्वर्ण द्विज हिन्दुओं को छोडिये, क्या दलितों, शूद्रों आदिवासियों और मुसलमानों को ये बात समझ में आ गयी है कि “उनके अपने भीतर की जाति व्यवस्था उनके अपने लिए क्यों और किस तरह खतरनाक है?” ये सवाल अजीब लगेगा लेकिन यही असली सवाल है. और इसका उत्तर ये है कि दलितों पिछड़ों को पता ही नहीं है कि ये ‘उनकी अंदरूनी जाति व्यवस्था’ ही उनके लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है. मेरे इस वक्तव्य पर बहुत लोगों को तकलीफ होगी या इसका मजाक उड़ाया जा सकता है. लेकिन हकीकत यही है कि दलित और पिछड़े समुदाय अपनी खुद की अलग अलग जातियों में विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध नहीं तोड़ पाए हैं. अभी भी दलितों और आदिवासियों और शूद्रों में आपसी एकीकरण नहीं हो पाया है और इसी कारण इनके राजनीतिक और सामाजिक प्रेशर ग्रुप निकम्मे पड़े हैं.

    कल्पना कीजिये कि किसानों कामगारों और मजदूरों की जातियों में आपस में एकीकरण हो जाए, ये सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद लगाना छोड़कर खुद ही अपने बीच जाति नाश करके अपने बीच में विवाह और भोजन सहित अन्य सामाजिक आर्थिक व्यवहार शुरू कर दें तो क्या होगा? इससे ये होगा कि एक समाज के रूप में और एक राजनीतिक इकाई के रूप वे संगठित हो जायेंगे. एक जाति में दुसरी जाति की बेटी या बहु या रिश्तेदार होगा तो उन्हें उस जाति के गरीब या अमीर होने में दुःख या सुख का अनुभव होगा. ऐसे में जब सभी जातियों के हित एकदूसरे से विवाह और भोजन सहित व्यापार रोजगार आदि के रास्ते से जुड़ जायेंगे तब दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों के सामाजिक और राजनीतिक संगठन एक भारी संख्या (भारत की जनसंख्या का 70 प्रतिशत से भी अधिक) के जरिये अपने सपनों का समाज और भारत बना सकेंगे. तब तीस प्रतिशत या तीन प्रतिशत रसूखदारों को भी आपके लिए बदलना ही पड़ेगा. जब सवर्ण द्विज हिन्दू ये देखेंगे कि जाति व्यवस्था से ‘उन्हें’ उनकी राजनीति और उनके व्यापर को नुक्सान हो रहा है तब वे जाति उन्मूलन का प्रयास अपनी तरफ से इमानदारी से शुरू करेंगे. मतलब ये हुआ कि सभी दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों को अपनी अंदरूनी जाति व्यवस्था तोड़कर पूरे समाज को इस स्तर तक ले जाना है जहां सवर्णों को अपनी राजनीति, व्यापार, रोजगार आदि के मामले में जाति व्यवस्था से नफरत होने लगे. तभी वे कुछ करेंगे. और जब तक वे कुछ न करें तब तक हमें अपने भीतर जाति व्यवस्था को खत्म करना है.  

    अब इस लेख की शुरुआत में आये जार्ज बर्नार्ड शॉ के वक्तव्य पर लौटते हैं कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही है उसी दिशा में झंडा लेकर आगे हो लेने वाला नेता होता है” ये वक्तव्य असल में राजनीतिक नेतृत्व और राजनीतिक अवसरवादिता को व्यक्त करता है. साथ ही बर्नार्ड शॉ का ये मजाक असल में जनता की असली ताकत को भी उजागर करता है. जनता (हमारे लिए भारत की गरीब जातियां) अगर अपनी मर्जी से कोई एक दिशा चुन कर उसपर निकल पड़े तो सारे नेता उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ने के लिए मजबूर हो जायेंगे. इस बात को आप अभी भी होता हुआ देख सकते हैं. जिन लोगों ने गाय या मन्दिर या राष्ट्रवाद के इर्दगिर्द राजनीति खडी की है उन्होंने ये काम राजनीति में सीधे सीधे नहीं किया है बल्कि धीमे जहरीले धार्मिक प्रचार और शिक्षा, धार्मिक प्रवचनों, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों, धार्मिक सीरियल्स, कार्टून, फिल्मों आदि के माध्यम से भीड़ को धर्म, मन्दिर, गौरक्षा और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया है. अब जब भीड़ उन जहरीले प्रचार और शिक्षा को मानकर एक दिशा में निकल पड़ी तब उनकी “बी टीम” के राजनेता झंडा लेकर आगे हो गये हैं और भारत की राजनीति और संसद में ताकतवर होकर नजर आने लगे हैं.

    भीड़ के इस चुनाव के तर्क को आगे बढायें तो हमें देखना होगा कि दलित और पिछडे क्या सीखकर किस दिशा में दौड़ रहे हैं? आप गहराई से देखें तो उन्होंने इन सवर्ण धार्मिक बाबाओं, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों सहित उनके धर्म और देवी देवताओं से ही शिक्षा ली है और उस शिक्षा पर खड़ी जाति व्यवस्था और धर्म को अपनी ही अंदरूनी जातियों को मजबूत बनाने में इस्तेमाल किया है. जब सवर्ण नेता या किसी भी जाति वर्ण के नेता ये देखते हैं कि दलित या पिछड़े खुद ही जाति व्यवस्था और इस व्यवस्था को सिखाने वाले अन्धविश्वासी धर्म को ही मजबूत करने में लगे हुए हैं तो वे भी झंडा उठाकर उसी दिशा में दौड़ पड़ते हैं. इसमें उनकी गलती कम है दलितों पिछड़ों की गलती अधिक है. ऐसे में जाति व्यवस्था को खत्म करने वाला सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व उभर ही नहीं सकता. ऐसे में किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणापत्र में जाति उन्मूलन एक एजेंडे की तरह शामिल नहीं हो सकता. ऐसे में जाति उन्मूलन का वादा चुनाव में जीत का आश्वासन नहीं बन सकता.

    ये दलितों पिछड़ों की बड़ी आबादी के लिए बड़ी शर्म की बात है कि मंदिर या मस्जिद की लड़ाई या “मन्दिर वहीं बनायेंगे” जैसी बातें चुनाव में जीतने के लिए आश्वासन बन जाती हैं और “जाति सभी मिटायेंगे” जैसे नारों की कल्पना तक राजनीतिक घोषणापत्र या राजनीतिक रणनीति से नहीं जुड़ पाई है. इसका ये मतलब है कि बीमारी या कमजोरी राजनीति में नहीं है बल्कि दलितों पिछड़ों की भीड़ में ही कहीं असली बीमारी छुपी हुई है.  वे खुद अपनी राजनीतिक प्रतिनिधियों को ये सन्देश साफ ढंग से नहीं दे पाए हैं कि उन्हें जाति और जातिवादी धर्म को कमजोर करना पसंद है या इन्हें मजबूत करना पसंद है. जब राजनीतिक नेता दलितों पिछड़ों को सवर्ण हिन्दुओं के मन्दिरों में पंडालों में कथाओं और जगरातों में कीर्तन करता हुआ देखते हैं, पुनर्जन्म और आत्मा परमात्मा की शिक्षा से प्रभावित होता हुआ देखते हैं, लगन महूरत और ज्योतिष में भरोसा करता हुआ देखते हैं  तो वे समझ जाते हैं कि ये भीड़ जाति नाश की दिशा में नहीं बल्कि जाति को और जातिवादी धर्म को मजबूत करने की दिशा में जा रही है. तब वे भी अपनी अवसरवादी फितरत के साथ उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ते हैं और नारा लगाने लगते हैं. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ अपमानित किये जाने पर भी बार बार उसी मन्दिर में जाती है तो वे नेता नारा लगाते हैं कि ‘मंदिर वहीं बनायेंगे’. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ आपसी जातियां मिटाने लगें तो कल को ये ही नेता नारा लगायेंगे कि “जाति सभी मिटायेंगे”. आपके नेता क्या करेंगे क्या नारा लगायेंगे ये आपको आपकी भीड़ को और आपके समुदायों को आपस में मिलकर तय करना है.

    अब इस सब से करने योग्य क्या हासिल हुआ?

    इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि आपको जाति के नाश के लिए दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी है. दलितों पिछड़ों को सवर्णों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे आकर उनका धार्मिक अंधविश्वास और उस पर आधारित जाति को मिटा दें. इसके विपरीत दलितों पिछड़ों को आपस में मिलजुलकर अपनी-अपनी जातियों में विवाह, भोजन और सामाजिक, आर्थिक व्यवहार के अन्य रिश्ते बनाने होंगे. और इससे भी बढ़कर एक काम और करना होगा. जो धर्म या अन्धविश्वास जाति व्यवस्था को मजबूत करता है. जो धर्म या शास्त्र या गुरु या बाबा आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की शिक्षा देता है उससे दूरी बनाइए. उनकी शिक्षाओं में ही असली दुर्भाग्य छुपा हुआ है, जाति व्यवस्था की जड़ इसी धार्मिक शिक्षा में और इस पर आधारित पलायनवादी अध्यात्म में छुपी हुई है. अगर इस शिक्षा को दलित और पिछड़े नकार दें तो भारत भी सभ्य और समर्थ हो सकता है.

    ऐसे नकार के लिए दलितों पिछड़ों को अतिवादी नहीं बनना है, न कोई सेना या हिंसक आन्दोलन खड़ा करना है, न तो हिन्दू धर्म को अब अपमानित करना है न उनके देवी देवताओं शास्त्रों का उपहास करना है ये सवर्ण  हिन्दुओं का उनका अपना धर्म है वे जिस तरह उसे मानते हैं उन्हें मानने पूजने का संवैधानिक अधिकार उनके पास है. वे दलितों शूद्रों स्त्रीयों को अपने मंदिरों शास्त्रों के लिए अपवित्र या नीच समझते हैं तो दलितों शूद्रों को उन मन्दिरों शास्त्रों के निकट जाकर उन्हें दुखी नही करना चाहिए, ये शिष्टाचार की बात है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को पने मूल श्रमण धर्म ‘बौद्ध धर्म’ का अभी से पालन करना शुरू कर देना चाहिए. इसके लिए धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है. आपको सिर्फ आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक और अन्धविश्वासी बातों में विश्वास करना बंद करना है और भारत के संविधान के अनुरूप वैज्ञानिक चित्त का अपने भीतर और अपने परिवार रिश्तेदारों मित्रों में विकास करना है. अपने बच्चों और स्त्रीयों मित्रों रिश्तेदारों आदि को को काल्पनिक मिथकों, देवी-देवताओं, भूत-प्रेत, या पितरों आदि के पूजा पाठ आदि से दूर कर लेना है. किसी अंधविश्वास की गुलामी हो या उसका मजाक बनाना हो दोनों एक तरह की अति है, कोई भी अति समाज के लिए ठीक नहीं होती. इनके बीच में मध्यम मार्ग और संतुलित मार्ग ये है कि आप अपने भीतर की जाति व्यवस्था खत्म करें और अंधविश्वास से दूरी बना लें और वैज्ञानिक और नैतिक लोकतांत्रिक चेतना का विकास करते रहें. यही दलितों पिछड़ों और भारत को सक्षम और समृद्ध बनाने का रास्ता है.  

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • लगता था तुम सभ्य हो गये हो –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

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    लगता था तुम्हारे पुराण
    अतीत ही में कहीं छूट से गये हैं
    लगता था तुम सभ्य हो गये हो
    अपने जहरीले धर्म से आगे बढ़ गये हो

    लेकिन हम सब गलत थे

    न तुम बदले
    न तुम्हारे पुराण बदले
    न पुराण बुद्धि बदली
    न तुम्हारा धर्म ही बदला

    लगता था मुगलों, तुर्कों, ब्रिटिशों ने
    तुम्हे सभ्य बना दिया है
    कि छोड़ दी हैं तुमने वे जहरीली तरकीबें
    अपनों से अपनों को ही लडाते रहने की
    कि सीख ली है तुमने भाषा
    सभ्यता विकास और लोकतंत्र की
    कि बढ़ चले हो तुम उस नये उजास की ओर
    जिसे अर्जित करने की तुम्हारी कोई योग्यता तो नहीं थी
    लेकिन तुम्हे दिया जरुर गया था

    आज इस सबको झुठला दिया तुमने

    तुमने सिद्ध कर दिया
    कि तुम सनातन ही हो

    तुम्हारा रोग
    तुम्हारी जड़ता
    तुम्हारी मूर्खता
    और तुम्हारा शोषण

    सच में सनातन है