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  • आज सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस है। आइये इस महान विभूति को नमन करें -Sanjay Jothe

    आज सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस है। आइये इस महान विभूति को नमन करें -Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe​​​​


    आज सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस है। आइये इस महान विभूति को नमन करें।

    यह दिन भारत की महिलाओं और विशेष रूप से दलितों, ओबीसी, और आदिवासी, मुसलमान महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

    भारत के इतिहास में पहली बार किसी स्त्री ने शुद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए स्कूल खोले और उन्हें पढ़ाने के लिए संघर्ष किया। सावित्री बाई जब अपने स्कूल में पढ़ाने जातीं थी तब उस दौर के संस्कारी हिन्दू ब्राह्मण उन पर गोबर, कीचड़, पत्थर और गन्दगी फेकते थे। सड़कों पर और चौराहों पर रोककर उन्हें धमकाते थे।

    Savitribai Phule

    वे कई बार रोते हुए घर लौटतीं थीं लेकिन उनके पति और महान क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले उन्हें हिम्मत बंधाते थे। ये ज्योतिबा ही थे जिन्होंने ये स्कूल खोले थे और एक शुद्र और अछूत तबके से आते हुए भी संघर्ष करके लड़कियों को पढ़ाने का संकल्प लिया।

    इस दौरान फूले दंपत्ति छोटे छोटे काम करके घर खर्च चलाते थे। एक ब्राह्मणवादी हिन्दू समाज में इन्हें कोई अच्छा रोजगार मिल भी नहीं सकता था। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई ने सब्जियां बेचीं, फूल गुलदस्ते बेचे, कपड़े सिले, रजाइयां सिलकर बेचीं, और ऐसे ही छोटे छोटे अन्य काम किये लेकिन भयानक गरीबी से गुजरते हुए भी उन्होंने भारत का पहला शुद्र बालिका विद्यालय खोला और विधवाओं के निशुल्क प्रसव और बच्चा पालन हेतु आश्रम भी चलाया।

    उस दौर के अंध्वविश्वासी बर्बर हिन्दू समाज में विधवाओं और परित्यक्ताओं को पुनर्विवाह की आजादी नहीं थी। ऐसे में विधवाओं को एक गाय बकरी की तरह घर के एक कोने में पटक दिया जाता था और ब्राह्मण परिवारों में तो उन्हें देखना छूना उनके साथ बात करना भी पाप माना जाता था।

    अक्सर ऐसी युवा विधवाओं का बलात्कार उनके रिश्तेदार या समाज के लोग ही करते थे, या उन्हें किसी तरह फुसला लेते थे। ऐसे में गर्भवती होने वाली विधवाओं को ब्राह्मण परिवारों सहित अन्य धार्मिक सवर्ण द्विज परिवारों द्वारा घर से बाहर निकाल दिया जाता था।

    ऐसी कई विधवाएं आत्महत्या कर लेती थीं। असल में ये बंगाल की सती प्रथा का एक लघु संस्करण था जिसमे स्त्री को पति के मर जाने के बाद खुद भी लाश बन जाने की सलाह दी जाती है। ऐसी आत्महत्याओं और शिशुओं की हत्याओं ने ज्योतिबा और सावित्री बाई को परेशान कर डाला था।

    आज ये बातें इतिहास से गायब कर दी गईं हैं। तब इन दोनों ने भयानक गरीबी में जीते हुए भी ऐसी विधवाओं के लिए आश्रम खोला और कहा कि अपना बच्चा यहां पैदा करो और न पाल सको तो हमें दे जाओ, हम पालन करेंगे।

    फुले दम्पत्ति ने ऐसे ही एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंत को अपने बेटे की तरह पाला था।

    इन बातों से अंदाज़ा लगाइये असली राष्ट्रनिर्माता, शिक्षा की देवी और राष्ट्रपिता कौन हैं? उस दौर के धर्म के ठेकेदार और राजे महाराजे, रायबहादुर और धन्नासेठ इस समाज को धर्म, साम्प्रदायिकता और अंधविश्वास में धकेल रहे थे और फुले दम्पत्ति अपनी विपन्नता के बावजूद समाज में आधुनिकता और सभ्यता के बीज बो रहे थे।

    सावित्रीबाई को डराने धमकाने और अपमानित करने वाले लोग आज राष्ट्रवाद, देशभक्ति और धर्म सिखा रहे हैं। देश की स्त्रियों के रूप में उपलब्ध 50% मानव संसाधन की, और शूद्रों दलितों के रूप में 80% मानव संसाधन की हजारों साल तक हत्या करने वाले लोग आज वसुधैव कुटुंब और जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी का पाठ पढ़ा रहे हैं।

    इन पाखण्डियों का इतिहास उठाकर देखिये आपको भारत के असली नायकों और दुश्मनों का पता चलेगा।

    जब जब भी गैर ब्राह्मणवादी नायकों ने ब्राह्मणवाद और हिन्दू ढकोसलों के खिलाफ जाकर कोई नई पहल की है, समाज को नई दिशा देने की किशिश है तब तब इन नायकों को सताया गया है। बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार, अंबेडकर इत्यादि को खूब सताया गया है। खैर इतना तो हर समाज में होता है लेकिन भारतीय सनातनी इस मामले में एक कदम आगे हैं।

    भारतीय पोंगा पंडित समाज में बदलाव आ चुकने के बाद एक सनातन खेल दोहराते हैं। वे सामाजिक बदलाव और सुधार के बाद असली नायकों को इतिहास, लोकस्मृति, शास्त्रों पुराणों से गायब कर देते हैं और किसी ब्राह्मण नायक को तरकीब से इन बदलावों का श्रेय दे देते हैं। हजारों पंडितों की फ़ौज हर दौर में नए पुराण और कथा बांचती हुई गांव गांव में घुस जाती है और इतिहास और तथ्यों की हत्या कर डालती है।

    ये भारत की सबसे जहरीली विशेषता है। इसी ने भारत के असली नायकों और राष्ट्रनिर्माताओं को अदृश्य बना दिया है।

    आज सावित्रीबाई फुले के स्मृति दिवस पर उस बात पर विचार कीजिये और देश के असली नायकों और बुद्ध, कबीर, फुले, अंबेडकर जैसे असली क्रांतिकारियों के बारे में खुद पढिये और समाज को मित्रों को रिश्तेदारों को जागरूक करिये।

    ये सन्देश हर घर तक पहुंचाइये।

    Sanjay Jothe

  • स्त्री यौनिकता को राष्ट्रवाद या आदर्श समाज की कल्पना से जोड़ने के कारक एवं प्रभाव –Sanjay Jothe

    स्त्री यौनिकता को राष्ट्रवाद या आदर्श समाज की कल्पना से जोड़ने के कारक एवं प्रभाव –Sanjay Jothe

    Sanjay Sharman Jothe[divider style=’right’]

    स्त्री यौनिकता पर सत्र था, मौक़ा था यूरोप, एशिया और अफ्रीका में परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलाव पर एक कार्यशाला. यूरोप, खासकर सेन्ट्रल यूरोप में परिवार में बढ़ते आजादी के सेन्स और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के बीच एक सीधा संबंध है – डेवेलपमेंट स्टडीज, मनोविज्ञान और सोशियोलोजी ने यह स्थापित कर दिया है. यह एक आधुनिक लेकिन स्थापित सच्चाई है. लेकिन क्या महिलाओं की ‘यौन आजादी’ को भी परिवार में आ रहे परिवर्तन के साथ रखकर देखा जा सकता है? जैसे स्त्री की आर्थिक आजादी का परिवार-व्यवस्था और समाज में में हो रहे बदलाव से संबंध है वैसे ही क्या स्त्री की यौन आजादी से इसका कोई संबंध बन सकता है?

    कुछ औपचारिक शेयरिंग्स और प्रेसेंटेशन के बाद असली मुद्दे लंच टाइम और काफी ब्रेक में निकले. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया, अल्जीरिया, बंगलादेश, भारत और श्रीलंका के रिसर्च-स्कालर्स एकसाथ भोजन पर बैठे. अफगानिस्तान से आये मित्र अपना अनुभव बता रहे थे कि काबुल में उनके अध्ययन और अनुसंधान के दौरान उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातें नोट कीं जो स्त्री यौनिकता के बारे में पुरुषों के ख्याल और उसके सामाजिक परिणाम से जुडती हैं.

    अफगान विद्वान् ने बताया कि एक अध्ययन के दौरान अफगान युवकों को पोर्न फिल्मे दिखाई गयीं और उसपर उनकी प्रतिक्रियाएं नोट की गईं. उन्होंने बताया कि आजकल के अफगान युवक ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि सेक्स के दौरान कोई स्त्री कैसे आनंदित हो रही है? उन युवकों में आपस में ये बड़ी चर्चा का विषय बन जाता है कि ये तो पुरुष के आनन्द का विषय है स्त्री को भी इसमें आनंद होता है क्या? अफगान विद्वान् ने कहा कि ये नया बदलाव है.

    सत्तर के दशक में कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनमे तत्कालीन अफगान समाज के युवक सेक्स के दौरान स्त्रीयों के आनंदित होने को आश्चर्य से नहीं देखते थे बल्कि उसे सहज स्वीकार करते थे.

    इस बात पर पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया से आये विद्वानों ने भी सहमती जताई कि ये बदलाव उनके समाज में भी जरुर हुआ है. अब के अफगान, पाक या सीरियाई युवकों में स्त्री की यौनिकता और यौन स्वतन्त्रता को लेकर जो विचार बदले हैं वे असल में इन समाजों के पतन की अचूक सूचना है. अब उनके समाज में स्त्री के मनोविज्ञान, उसकी भावनाओं, उसकी स्वतन्त्रता या उसके अस्तित्व मात्र पर पुरुषों के विचार बहुत नकारात्मक ढंग से बदल गये हैं.

    एक अन्य उदाहरण देते हुए अफगान मित्र ने बात और साफ़ की, आजकल अफगान समाज में एक चलन बढ़ रहा है, हालाँकि अभी भी सीमित है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ रहा है. अफगान समाज में कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में अब भाई अपनी बहन की शादी में नहीं जाना चाहते. पिता या चाचा ताऊ या मामा इत्यादि बुजुर्ग लोगों को जाना अनिवार्य है लेकिन वे भी बेमन से उस समारोह में हिस्सा लेते हैं. इसका कारण बताते हुए उन्होंने एक गजब की बात बताई.

    बात ये है कि बहन की शादी में दुल्हे के साथ आये हुए युवक जिस तरह से नाचते गाते और अपनी मर्दानगी या अधिकार का प्रदर्शन करते हैं वो दुल्हन के भाई या पिता के लिए बहुत अपमानजनक होता है. दूल्हे के साथ आई पूरी टोली अपने आप को दुल्हा समझती है और उनकी नजरों से, हाथों के इशारे से, चेहरे के हाव भाव से वे बस सेक्स के इशारे और सेक्स से जुड़े मजाक करते रहते हैं, जैसे कि पूरी टोली किसी सामूहिक सुहागरात के लिए आयी हो. ये सब देखना कम से कम दुल्हन के भाई के लिए बहुत अपमानजनक होता है. इसलिए आजकल कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में बहन की शादी में अफगान युवकों के नदारद हो जाने का चलन बढ़ रहा है.

    लेकिन मजे की बात ये है कि ये ही भाई, चाचा ताऊ और मामा लोग जब अपने परिवार या कबीले के पुरुष की शादी में जाते हैं तो वो सारी नंगाई करते हैं जिससे खुद उन्हें चिढ होती है. मतलब ये कि उनके बहन या बेटी की शादी में जो चीजें उन्हें शर्मिन्दा करती हैं वही चीजें उनके पुरुष दोस्त या पुरुष रिश्तेदार की शादी के दौरान मर्दानगी दिखाने का हथियार बन जाती हैं.

    अब गौर कीजिये इन तीन घटनाओं में सीधा संबंध है. पोर्न देखते हुए अफगान युवकों का स्त्री के आनंदित होने पर आश्चर्य व्यक्त करना और अपनी बहन के विवाह में गुलच्छर्रे उड़ा रही बरात के सामने खुद को अपमानित महसूस करना और इसी तरह की बारात में कभी खुद शामिल होकर नंगाई के नाच करने में आनंद लेना – ये मूल रूप से उनके समाज में स्त्री पुरुष संबंधों के पतन सहित स्वयं उस समाज के सभ्यतागत और नैतिक पतन का सबूत है.

    सत्तर के दशक में अफगान बाड़े में सोवियत-अमेरिकी सांडों की लड़ाई के पहले और धार्मिक आतंक के भूत के प्रवेश के पहले जो अफगान समाज था वो एकदम भिन्न था. तब स्त्रीयां स्कर्ट या जींस पहनकर विश्वविद्यालयों में पढ़ती थीं या स्मोक कर सकती थीं. तब लड़कियों के म्यूजिक बैण्ड भी हुआ करते थे. समाज में प्रेम संबंध और मित्रता बहुत आसान थी. आज के अफगानिस्तान में अब लड़का लड़की आपस में बात करना तो दूर एक दुसरे की तरफ देख भी नहीं सकते. पर्दा और बुर्का लगभग औरत की चमड़ी ही बन गये हैं, उन्हें हटाना मुश्किल है. स्त्रीयां खुद अपनी गुलामी के बारे में कोई विचार बना पाने में सक्षम नहीं रह गयी हैं.

    जब अफगान और पाक विद्वानों ने भारत के पिछले कुछ सालों में घटी घटनाओं पर टिप्पणी की तो उन्होंने जोर देकर कहा कि बॉस भारत का समाज भी अफघानिस्तान सीरिया होने की तरफ बढ़ रहा है. जिस तरह से स्त्रीयों को पर्दा, नैतिकता, सच्चरित्रता आदि का पाठ पढाया जा रहा है और जिस तरह से स्त्री पुरुष संबंधों और स्त्रीयों की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है, ठीक वैसा ही अफगानिस्तान पाकिस्तान में धार्मिक आतंक के भूत के उभार के दौरान हुआ था.

    ख़ास तौर से जब स्त्री के चरित्र से जुड़े मुद्दे, स्त्री की यौनिकता के नियन्त्रण से जुडी रणनीति अगर आपके राष्ट्रवाद से या आदर्श  समाज की कल्पना से जुड़ने लगें तो समझ लीजिये कि आपका समाज एक गहरे खतरे की तरफ बढ़ रहा है. अगर ये अगले पांच दस सालों में नहीं रुका तो आपके समाज में अफगानिस्तान और सीरिया का जन्म होने वाला है.

  • पश्चिमी दार्शनिक और भारतीय पोंगा पंडित, एक नजर में –Sanjay Jothe

    पश्चिमी दार्शनिक और भारतीय पोंगा पंडित, एक नजर में –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    मानव इतिहास की महान विदुषी एरियल ड्यूरेंट जब अपने पति विल ड्यूरेंट के साथ मिलकर विश्व इतिहास और सभ्यता सहित दर्शन के विकास का अत्यंत विस्तृत लेखा जोखा लिख रही थीं, उसी दौर में बर्ट्रेंड रसल भी दर्शन का इतिहास लिख रहे थे. फ्रायड मनोविज्ञान के रहस्य खोल रहे थे, फ्रेडरिक नीत्शे मूल्यों को और ईश्वर को चुनौती दे रहे थे, लुडविन वित्गिस्तीन पूरे तर्कशास्त्र को ही नया रूप दे रहे थे, डार्विन इसी समय में क्रमविकास की खोज करते हुए इंसान की उत्पत्ति और विकास की पूरी समझ ही बदल डाल रहे थे, हीगल के प्रवाह में मार्क्स और एंगेल्स पूरे इतिहास और मानव समाज के काम करने के ढंग को एकदम वैज्ञानिक दृष्टि से समझा रहे थे. आइन्स्टीन, मेक्स प्लांक, नील्स बोर और श्रोडीन्जर अपनी अजूबी प्रतिभा से क्लासिकल न्यूटोनियन फिजिक्स और यूक्लिडीयन जियोमेट्री सहित भौतिकशास्त्र की पूरी समझ को एक नए स्तर पर ले जा रहे थे.

    उस समय भारतीय चिन्तक क्या कर रहे थे?

    उन्नीसवी सदी के आरंभ से बीसवीं सदी के अंत तक भारतीय पंडित पश्चिमी विद्वानों से शर्मिन्दा होते हुए या तो अन्टार्कटिका में अपने पूर्वजों की खोज कर रहे थे या फिर फर्जी राष्ट्रवाद के लिए गणेश-उत्सव का कर्मकांड रच रहे थे. बंगाल के कुछ चिंतक इसाइयत की कापी करके नियो-वेदांत की और मिशनरी स्टाइल समाज सेवा की रचना कर रहे थे, अपने ब्रिटिश आर्य बंधुओं के “आर्य-आक्रमण” को अपने लिए वरदान मानते हुए भरत मिलाप सिद्ध कर रहे थे और पश्चिमी स्त्री की स्वतन्त्रता से शर्माते हुए सती प्रथा से पिंड छुडाने के लिए पहला सभ्य प्रयास कर रहे थे. इसी दौर के दुसरे संस्कारी पंडित जन भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्री फुले पर गोबर और पत्थर फेंक रहे थे, ज्योतिबा फूले के बालिका स्कूल और विधवा आश्रम को बंद कराने के लिए सब तरह के षड्यंत्र कर रहे थे, अंबेडकर को पढने लिखने से रोकने की सनातनी चाल चल रहे थे, कुछ चिन्तक-योगी नीत्शे और डार्विन की खिचड़ी बनाकर अतिमानस और पूर्ण-योग की रचना कर रहे थे.

    आजादी के बाद हमारे महानुभाव फिलहाल क्या कर रहे हैं?

    एक महर्षि बीस मिनट के ध्यान से हवा में उड़ने की तकनीक सिखा रहे थे. एक योगानन्द जी क्रियायोग के बीस बरस के अभ्यास से बीस करोड़ सालों का क्रमविकास सिद्ध करने का दावा कर रहे थे. एक महात्मा जी बकरी के दूध और उपवास का महात्म्य समझा रहे हैं. कुछ महान दार्शनिक अपने ही शिष्य की थीसिस चुराकर शिक्षक दिवस पर लड्डू बाँटने का इन्तेजाम कर रहे थे.एक रजिस्टर्ड भगवान पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों जैसे फ्रायड जुंग और विल्हेम रेख की जूठन की भेल पूरी बनाकर बुद्ध और कबीर के मुंह में वेदान्त ठूंस रहे थे. इस षड्यंत्र से वे जोरबा-द-बुद्धा की रचना करके अभी अभी गए हैं. हाल ही में एक बाबाजी हरी लाल चटनी और रसगुल्ले खिलाकर किरपा बरसा रहे हैं. एक अन्य महाराज जमुना का उद्धार कर ही चुके हैं और एक गुरूजी देश भर की नदियों को बचाने के लिए सडकों की ख़ाक छानकर फिलहाल सुस्ता रहे हैं, जल्द ही किसी नए अभियान पे निकलेंगे. वहीं एक अन्य बाबाजी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर में प्राणायाम का विश्वरिकार्ड बनाकर च्यवनप्राश बाँट रहे हैं, व्यवस्था परिवर्तन और क्रान्ति से शुरुआत करके आजकल दन्तकान्ति, केशकान्ति बेच रहे हैं.

    नतीजा सामने है.पश्चिम में वे नई सभ्यता और नैतिकता सहित ज्ञान विज्ञान साहित्य, कला दर्शन, फेशन, फिल्मों, कपडे लत्ते, चिकित्सा, भोजन, भाषा, संस्कृति और हर जरुरी चीज का विकास और निर्यात कर रहे हैं और हम सबकुछ आयात करते हुए, खरीदते हुए जहालत के रिकार्ड तोड़ते हुए गोबर के ढेर में धंसते जा रहे हैं.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद –Sanjay Jothe

    भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा.  कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है.इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

    पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदी को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और ”विल” को अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

    ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

    इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिको की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये.  कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पायी. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.

    कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा उंचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

    गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नयी बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए. 

    इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

    उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है. 

    भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता, यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

    ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है. 

    भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुडी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता –Sanjay Jothe

    महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस पर ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह को देखने की आवश्यकता –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    Mahatma Jyotiba Phule and Dr. B. R. Ambedkar

    महात्मा ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमे एक से दूसरे पायदान तक विक्सित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं. ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं.

    अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के उठाये कदमों को एकसाथ रखकर देखें. दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है. समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है. और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं.

    ज्योतिबा के समय में जब कि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीती निवारण –इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था. न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था. और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी. क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं.

    इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है. ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है. इसलिए नही कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँती पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा.

    ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा. जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं. नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं. फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है.

    आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है.

    इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है. इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है.

    यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है. जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया. ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी. यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है.

    इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है.ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है.एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना इस प्रष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है.

  • दलाई लामा बनाम तिब्बत –Sanjay Jothe

    दलाई लामा बनाम तिब्बत –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe


    Dalai Lama

    दलाई लामा जैसे लोग अपने देश और संस्कृति को बर्बाद करके विकसित और सभ्य देशों को सभ्यता और धर्म सिखाते हैं तो बड़ा मजा आता है. ये बिलकुल भारतीय बाबाओं जैसी लीला है. अपने खुद के घर में सडांध और बीमारियाँ फ़ैली है और दूसरों के साफ़ सुथरे घर में जाकर सुगंध, स्वच्छता और सौन्दर्य पर भाषण देते हैं.

    इनका अपना ज्ञान पिछली कई सदियों से तिब्बत को लगातार खोखला करता गया. भयानक अंधविश्वास, शोषण और अशिक्षा ने वहां के आम जन को जानवरों जैसी जिल्लत में बनाये रखा. महिलाओं और गरीबों सहित बच्चों के अधिकारों को कुचला गया.

    चीन का आक्रमण बहुत बाद में हो रहा है. चीन के आने के पहले ही वहां पुनर्जन्म पर आधारित दलाई लामा नाम की संस्था ने इतना शोषण किया है जिसका कोई हिसाब नहीं. एक पूरा देश और संस्कृति धीरे धीरे बर्बाद की गयी है इन महाशय के द्वारा. ये कहते हैं ये पहले वाले लामा जी के पुनर्जन्म हैं. अगर इनकी बात मान भी लें तो ये और बड़े अपराधी सिद्ध होते हैं.

    ये पहले दुसरे या दसवें बारहवें के पुनर्जन्म हैं, इसका अर्थ ये हुआ कि तिब्बत के समाज और संस्कृति को गर्त में पहुंचाने के लिए उन्होंने एक व्यक्ति या एक संस्था के रूप में हर पीढी में खुद ही जरुरी निर्णय लिए हैं.

    इसका क्या मतलब हुआ?

    यही मतलब हुआ कि आज तिब्बत जो कुछ है वह इन्हीं महाशय की देन है. कोई राष्ट्र या समाज जब इतना लचर और दकियानूसी हो जाए तो अडोस पड़ोस के देश उसपर चढ़ाई कर सकते हैं. चीन ने यही किया. चीन दलाई लामा द्वारा बनाई परिस्थितियों का अपने हित में शोषण कर रहा है.

    दलाई लामा से आज तक सही प्रश्न नहीं पूछे गए हैं. उनसे पूछा जाना चाहिए कि तिब्बत की संस्कृति और समाज को नष्ट होने से बचाने के लिए अतीत में क्या किया जा सकता था? फिर उनके चेहरे का रंग देखिये. उनसे ध्यान समाधी, सुख दुःख स्वर्ग नरक या अध्यात्म के चलताऊ सवाल करने से कुछ नहीं होता. ऐसे सवालों का जवाब देना सभी को आता है. उन जवाबों से न आज तक कुछ हुआ है न आगे कुछ होगा.

    अब ये सज्जन अपने समाज और संस्कृति की होली जलाकर दुनिया भर में ज्ञान बाँट रहे हैं. ये अच्छा मजाक है. अमेरिकी राजनीति को अगर चीन के खिलाफ एक मोहरे की जरूरत न हो तो ये इन महाशय की महानता अभी तुरंत खो जायेगी.

    कम से कम भारतीय ओबीसी, दलितों और स्त्रीयों को इन महाशय से बचकर रहना चाहिए. ये जब भी मिलें इनसे अध्यात्म के नहीं बल्कि तिब्बत के समाज के योजनाबद्ध विनाश के संबंध में सवाल पूछिए. तब देखिये इनका सारा चमत्कार धरा रह जाएगा.

     

  • ओशो रजनीश और उनकी ब्राह्मणी तकनीकें –Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश और उनकी ब्राह्मणी तकनीकें –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    “….पश्चिमी दार्शनिकों और विचारकों ने भारतीय दर्शन पर एक गंभीर टिप्पणी की है कि भारतीय दर्शन या विचार में विचार के स्तर पर हर विरोधी बात का एकीकरण या संश्लेषण हो जाता है लेकिन सामाजिक या व्यक्तिगत जीवन में एकीकरण एकदम असंभव है…”

    एक बार ओशो रजनीश से किसी ने बुद्ध के बारे में प्रश्न किया. बात अनत्ता अर्थात अनात्मा की हो रही थी, रजनीश ने सनातनी ब्राह्मणी चाल चलते हुए उत्तर दिया कि अनात्मा और आत्मा एक ही है जैसे कि पूर्ण (ब्रह्म) और शून्य एक ही है. सुनने वाले जो कि अक्सर भक्त टाइप के लोग होते हैं वे इस उत्तर से बड़े प्रभावित होते हैं और इस दिव्य “संश्लेषण” से चमत्कृत हो जाते हैं. ठीक इसी तरह अरबिंदो घोष भी “सुप्रामेंटल” या अतिमानस की धारणा देते हैं और पूर्व और पश्चिम को मिलाकर एक करने की बात करते हैं. उनके भक्त भी उनकी इन बातों से बड़े प्रभावित होते हैं.

    रजनीश जैसे बाबाओं से ये पूछा जा सकता है कि अगर आत्मा अनात्मा एक ही हैं तो बुद्ध को अनात्मा शब्द के इस्तेमाल की क्या जरूरत आन पड़ी थी? क्या बुद्ध ने स्वयं आत्मा और अनात्मा को एक ही कहा है? इसका उत्तर ये ब्राह्मणवादी धूर्त नहीं दे सकते. असल में ये किसी भी प्रश्न का उत्तर सीधे सीधे दे ही नहीं सकते. ये हमेशा दूसरों के कंधे पर बन्दुक रखके सामान्य जन की तर्कबुद्धि का शिकार करते हैं. इसी तरह आत्मा परमात्मा तक को एक ही सिद्ध करते हैं, फिर पदार्थ और परमात्मा को भी एक ही सिद्ध करते हैं. इनके इस एकीकरण के प्रोजेक्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो एक ही सिद्ध न किया जा सके. लेकिन हकीकत में जमीन पर ये धूर्त कुछ भी एक नहीं होने देते.

    पश्चिमी दार्शनिकों और विचारकों ने भारतीय दर्शन पर एक गंभीर टिप्पणी की है कि भारतीय दर्शन या विचार में विचार के स्तर पर हर विरोधी बात का एकीकरण या संश्लेषण हो जाता है लेकिन सामाजिक या व्यक्तिगत जीवन में एकीकरण एकदम असंभव है. इस सनातनी एकीकरण के गीत गाने वील महान दार्शनिक शंकराचार्य भी अद्वैत के गीत गाते फिरते थे लेकिन स्त्री, सेवक, कामगार और शूद्रों को छूने में घबराते थे. इनके मन में गहराई से झांकें तो पता चलता है कि ये लोग एकीकरण या अद्वैत की बात ही इसलिए निकालते हैं कि ये अपने भेदभाव भरे धर्म को भेदभाव के आरोप से मुक्त कर सकें.

    इनसे कोई पूछे कि महाराज आपकी धर्म व्यवस्था में स्त्री को शिक्षा का या सम्मान का अधिकार क्यों नहीं है तो ये तपाक से उत्तर देते हैं कि कण कण में ब्रह्म समाया है उसी का नूर फैला है अतिमानस का प्रकाश फैला है फिर स्त्री पुरुष का भेद कैसा? ऐसी हवा हवाई बात सुनकर हमारे लोग शांत और संतुष्ट भी हो जाते हैं. ये भी एक गजब का चमत्कार है.

    असल में ओशो रजनीश भारतीय ब्राह्मणवादी षडयंत्र का सबसे कामयाब उदाहरण हैं. उनकी जीवनयात्रा और उनके नाम बदलने से लेकर सैद्धांतिक बदलाव करने की रणनीतियों का ठीक से अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि वे किस तरह सिद्धांतों और शास्त्रों से खेल रहे हैं और प्रगतिशील या विचारवान होने के परदे के पीछे हर धर्म हर संप्रदाय के अंधविश्वास को बढाते हुए उन्हें ब्राह्मणवाद की जहरीली त्रिमूर्ति – आत्मा, परमात्मा और पुनर्जन्म में घसीट रहे हैं.

    उनके किसी भी शिष्य से पूछ लीजिये, वे बुद्ध की अनात्मा की बात करते हुए भी अंतिम रूप से अपने खुद के सात सौ साल पुराने तिब्बती अवतार की बात करते हैं और भारत तिब्बत सहित अन्य देशों के अन्धविश्वासी संप्रदायों को फिर से अतीत के खूंटे से बाँध देते हैं. उनके शिष्य समुदाय में भी जो लोग हैं वे उनकी किताबों के अलावा कुछ पढ़ते नहीं हैं इसलिए समस्या और बढ़ जाती है.

    ये असल में ब्राह्मणवादी पाखण्ड के काम करने का ऐतिहासिक तरीका है जिसका साकार रूप आप ओशो रजनीश और उनके बाद चल रहे उनके शिष्यों के आश्रम में देख सकते हैं. ब्राह्मणवाद का एक केंद्रीय चरित्र ये है कि वो खुद बाँझ होता है वो कुछ भी नया पैदा नहीं कर सकता. वो हर दो सौ पांच सौ साल में दूसरों के पैदा किये हुए ज्ञान को अपनी भाषा में अनुवाद करता है और आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के जहरीले दलदल में डुबाकर उसे नया नाम दे देता है.

    ये इन्होने बुद्ध, महावीर और कबीर के साथ किया है. महान गोरखनाथ को भी इन्होने ऐसे ही नष्ट किया है. फिर ये नए दर्शन को ब्रह्मा विष्णु महेश के किसी पौराणिक अवतार से जोड़ देते हैं और सारा श्रेय ले उड़ते हैं. साथ में इनके लट्ठबाज भक्त पुराने दार्शनिकों के ग्रन्थ उनके मत और परंपराओं को आग लगते रहते हैं. बाद में जब पुराने दार्शनिकों के ग्रन्थ और परम्पराएं जमीन से समाप्त हो जाती हैं तो इन ब्राह्मणवादी धूर्तों की पौराणिक गप्पों को फैलाने वाला तंत्र सक्रिय हो जाता है. ये इनकी आजमाई हुई तकनीक है.

    इसीलिये इनके पास इतिहास नहीं है. जो दूसरों के घर में चोरी करते हैं वे अपनी चोरी का इतिहास कभी नहीं लिखते. इतिहास के नाम पर पुराण की गप्प लिखी जाती है, उसे वे कुछ इस तरह लिखते हैं कि असल में दार्शनिक सिद्धांत और विचार जिन्होंने पैदा किये उनका कोई उल्लेख न हो, उनके वास्तविक इतिहास उनके जन्म मरण की तिथि और उनके जीवन के बारे में कोई सबूत न रह जाए. इसीलिये भारत में कबीर तक के बारे में पक्की जानकारी नहीं है की उनका जन्म कब हुआ और उनकी मृत्यु कब हुई या उनके माता पिता या स्वयं उनका धर्म क्या था. अब कबीर कोई बहुत पुराने व्यक्ति नहीं हैं. पश्चिम में यूरोप में उनके पास साफ़ साफ़ इतिहास है, उनके महापुरुष विचारक या राजा सामंत आदि से जुदा इतिहास तिथियाँ इत्यादि उनके पास हैं.

    लेकिन भारत अभी भी पुराण में फंसा हुआ है. अभी हाल ही में गुजरे शिर्डी के साईंबाबा के बारे में भी ब्राह्मणवादी धूर्तों ने यही खेल रचा है. साईंबाबा की तस्वीर और ढंग देखकर एकदम समझ में आता है कि वे मुस्लिम थे, लेकिन उनका प्रभाव ऐसा था कि उनका इतिहास और उनकी वल्दियत मिटा दी गयी. जो खेल कबीर के साथ हुआ वही साईंबाबा के साथ हो रहा है. ये है ब्राह्मणवाद का तरीका, दूसरों की मेहनत को हजम करके अपने खाते में दिखाना इनका पुश्तैनी धंधा है.

    ये धंधा ओशो रजनीश ने खूब चलाया है. खुद उनके लेक्चर्स में वे बार बार कहते हैं कि उन्होंने लाखों किताबें पढ़ीं हैं. ये सही भी है. लेकिन इस विराट अध्ययन का इस्तेमाल वे किस तरह कर रहे हैं? ये बात बहुत महत्वपूर्ण है. इस अध्ययन का इस्तेमाल वे असल में अलग अलग संप्रदायों के अंधविश्वासों का शोषण करने के लिए कर रहे हैं. इसी अध्ययन के द्वारा वे पश्चिम में जन्मे महान दार्शनिकों विचारकों को जान समझ रहे हैं और उन्हें इधर-उधर से काटकर आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के रेडीमेड ताबूत में ठूंस रहे हैं.

    एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ. रजनीश जब साठ के दशक के अंत में वामपंथी विचारों से भरे वक्तव्य दे रहे थे तब उन्होने देखा कि इस तरह उनका बड़ा प्रभाव नहीं होने वाला है. तब उन्होंने भारत की सनातन अंधविश्वास भरी बुद्धि का उपयोग करने का निर्णय लिया और लोगों को संन्यास और ध्यान आदि सिखाने लगे.

    ये तरीका सफल रहा. इसके बारे में उनके खुद के वक्तव्यों से सबूत मिलते हैं. उन्होंने खुद कहा है कि वे एकबार लेनिन के सहयोगी मानावेंद्र्नाथ रॉय से मिले थे और रॉय को उन्होंने सलाह दी थी कि “जब तक आप बाबाओं जैसा वेश धारण न करें इस मुल्क में आपको कोई नहीं सुनेगा”. अब आप सोचिये जो आदमी मंवेंद्र्नाथ रॉय जैसे महान विचारक और दिग्गज साम्यवादी को ये सलाह दे सकता है वो खुद इसका पालन क्यों नहीं कर सकता?

    ओशो ने आगे यही किया है. अब बाद में ये सज्जन स्वयं को भगवान् घोषित करते हैं और ध्यान समाधि की शिक्षा देने लगते हैं. उस जमाने में पश्चिम में फ्रायड और जुंग के साइको एनालिसिस की धूम मची थी और नवधनाड्य अमेरिकी मध्यमवर्ग के बच्चे चरस गांजे और फ्री सेक्स के पीछे पागल हुए दुनिया भर में घूम रहे थे. ओशो ने इस बात को ठीक से पकड़ा. उसी समय महान मनोवैज्ञानिक विल्हेम रेख ने ह्युमन पोटेंशियल मूवमेंट शुरू किया था जो केथार्सिस या रेचन के आधार पर दमित भावनाओं के निकास द्वारा मनोचिकित्सा करता था.

    इस मूवमेंट में सेक्स और कुंठा सहित बचपन के व्यक्तिगत दमन और सामूहिक दमन के सहज मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा चिकित्सा की जाती थी. इस मूवमेंट के द्वारा कई तरह के थेरेपी ग्रुप और एनकाउन्टर ग्रुपों की रचना की. इन सभी बातों को ओशो रजनीश ने सीधे सीधे उठा लिया, ठीक उसी तरह जैसे अरबिंदो घोष ने नीत्शे और डार्विन को उठा कर अतिमानस बना डाला था, या विवेकानंद ने भगिनी निवेदिता के मार्गदर्शन में केथोलिक मिशन को उठाकर रामकृष्ण मिशन बना डाला था.

    ओशो रजनीश ने जब ये खेल शुरू किया तब पश्चिमी हिप्पियों का हुजूम भारत आने लगा. ह्युमन पोटेंशियल मूवमेंट को सक्रिय ध्यान और तंत्र की खोल में ट्रांसलेट करके ये बाबाजी ऐसा दिखाने लगे कि ये उनकी कोई महान खोज है. गांजे चरस और फ्री सेक्स को खोजते हुए ये हिप्पी यहाँ जम गए और भारतीय भक्त इस बात से बड़े प्रसन्न हुए कि हमारे बाबाजी को फिरंगी गोरे लोग कितना मानते हैं. अब चारों तरफ धूम मच गयी. इस कंट्रास्ट को मेनेज करना कठिन था लेकिन असंभव नहीं. ऐसी ब्राह्मणवादी धूर्तता का सारा प्रयोग रजनीश ने अपने बचपन में भी खूब किया है. उनकी आत्मकथा इन बातों से भरी पड़ी है कि वे कैसे भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाते थे और अपना काम निकाल लेते थे.

    उनके भक्त उनकी इन “लीलाओं”के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते हैं, लेकिन इनमे छुपी अनैतिकता को देखना नहीं चाहते.

    पश्चिमी हिप्पियों और सन्यासियों सहित भारत के अंधविश्वासियों को एक साथ एक ही आश्रम में संतुष्ट रखना ही वो असली बिंदु है जिससे रजनीश के विरोधाभासी वक्तव्य निकलते हैं. अपने सामने बैठी इस अजीब सी भीड़ को जब वे प्रवचन देते थे तब उन्हें एक संतुलन बनाना होता था. किसी बात में एकदम अंधविश्वास की तारीफ़ करेंगे और अगली बात में उस अंधविश्वास को एकदम उड़ा देंगे. इस तरह सामने की भीड़ में बैठे सभी तरह के लोग संतुष्ट होकर उनसे चिपके रहते और चंदा देते रहते.

    इस बात को गौर से देखिये. सडक किनारे एक पेड़ के नीचे बैठे किसी तोताछाप ज्योतिष या बाबा से कभी बात कीजिये, वो भी यही तकनीक इस्तेमाल करता है. आपको कुछ कहेगा और आपके बाद के ग्राहक को कुछ और कहेगा. अगर आप दोनों साथ मिलकर उससे वही बात पूछें तो वो एकदम रहस्यवाद में उतर जाएगा और वेद वेदान्त की जलेबी बनाने लगेगा. ठीक यही ओशो रजनीश जीवन भर कर रहे हैं. वे बुद्ध के अनात्मा या पुनर्जन्म के नकार के सिद्धांत को भी सही बताते हैं और अपने सात सौ साल पुराने जन्म का वर्णन भी करते हैं. और उनके अंधे भक्त इन दोनों बातों पर ताली बजा बजाकर कीर्तन करते हैं. इससे बड़ा मजाक न दुनिया में कभी हुआ है न आगे होगा.

    ब्राह्मणवाद और ओशो रजनीश जैसे धूर्त गुरु इसी तरह भारत को हर मोड़ पर पाखंड के दलदल में वापस घसीटते रहते हैं. ये भारत का असली दुर्भाग्य है. आज भारत का समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है वो शुद्धतम ब्राह्मणवाद द्वारा पैदा की गयी समस्याएं हैं. इसे गौर से पहिचान लीजिये और ओशो रजनीश जैसे धूर्तों को बेनकाब कीजिये. बुद्ध और कबीर को मिटाने वाले इनके षड्यंत्रों से बचकर रहिये. कम से कम भारत के गरीबों दलितों शूद्रों और स्त्रीयों को इन बाबाओं से बचकर रहना चाहिए. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • ‘शौच और शौचालय की नजर से भारतीय संस्कृति के “शीर्षासन माडल” का विश्लेषण’ –Sanjay Jothe

    ‘शौच और शौचालय की नजर से भारतीय संस्कृति के “शीर्षासन माडल” का विश्लेषण’ –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    “..यहाँ जिन लोगों को ब्रह्मपुरुष के मस्तिष्क ने जन्म दिया उनका मस्तिष्क कोइ काम नहीं करता, भुजाओं से जन्मे लोगों की भुजाओं में लकवा लगा है,उन्होंने हजारों साल की गुलामी भोगी, पेट से जन्मे वणिकों ने अपना पेट भरते भरते पूरे भारत के पेट पे ही लात मार दी और गरीबी का विश्वरिकार्ड बना डाला,पैरों से जन्मे शूद्रों के पैर पत्थर से बाँध दिए वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते.ये भारतीय संस्कृति का ‘शीर्षासन माडल’ है..”

    आज विश्व शौचालय दिवस है. संयुक्त राष्ट्र संघ ने आधुनिक समय की नैतिकता को मूल्य देते हुए विश्व में सभी इंसानों को साफ़ स्वच्छ और ‘फंक्शनल’ शौचालय देने की बात को महत्व दिया है. एक आकलन के अनुसार विश्व की ढाई अरब से अधिक आबादी को शौच और स्वच्छता संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. इस वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा पुण्यभूमि भारत की आबादी का है. जिस भूमि पर शौचालय न हों वह पुण्यभूमि होने का गर्व कर सकती है, ये भारत की नैतिकता का एक छोटा सा उदाहरण है.

    शौचालय दिवस के बहाने भारत के सभ्यता बोध और नैतिकता बोध को ठीक से टटोला जा सकता है. शौचालयों का न होना, होने पर भी इस्तेमाल न होना और शौचालय बनाने वालों से लेकर शौचालय की सफाई करने वालों को अमानवीय यातनाएं और तिरुस्कृत जीवन के लिए बाध्य करना – ये बिंदु भारतीय समाज और सभ्यता मूल के चरित्र को दर्शाते हैं. हालाँकि दुनिया के अन्य देशों में भी सफाई कर्मियों को अस्वच्छ और असभ्य माना गया है लेकिन उन्हें एक खांचे या वर्ग या जाति के एयर टाईट कम्पार्टमेंट में बाधे रखकर अभिशप्त नहीं किया गया है.

    मेगसेसे पुरस्कार प्राप्त महान समाजसुधारक बेजवाडा विल्सन ने एक बढ़िया बात कही है, भारत में जो लोग गन्दगी मिटाते हैं वे नीच माने जाते हैं और जो लोग गन्दगी फैलाते हैं वे महान माने जाते हैं .असल में ये वक्तव्य भारत की नैतिकता को एकदम से उसके नग्नतम रूप में उजागर करता है. भारत की नैतिकता और सभ्यता असल में सर के बल खड़ी है. भारतीय लोग किसी तरह का योगासन करते हों या न करते हों इतना तय है कि भारत की सभ्यता और नैतिकता हमेशा से शीर्षासन में खड़ी है. यहाँ जिन लोगों को ब्रह्मपुरुष के मस्तिष्क ने जन्म दिया उनका मस्तिष्क कोइ काम नहीं करता, भुजाओं से जन्मे लोगों की भुजाओं में लकवा लगा है, उन्होंने हजारों साल की गुलामी भोगी, पेट से जन्मे वणिकों ने अपना पेट भरते भरते पूरे भारत के पेट पे लात मार दी और गरीबी का विश्वरिकार्ड बना डाला, पैरों से जन्मे शूद्रों के पैर एकदम पत्थर से बाँध दिए गए वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते. ये भारतीय संस्कृति का ‘शीर्षासन माडल’ है.

    भारतीय संस्कृति के इस ‘शीर्षासन माडल’ को ठीक से समझिये. जाति व्यवस्था का दंश सीधे सीधे समझना मुश्किल है इसे स्वच्छता के मुद्दे से या ग्रामीण या शहरी जीवन की आवश्यकताओं के नजरिये से आसानी से समझा जा सकता है. असल में जाति या वर्ण कोई मूलभूत समस्याएं नहीं हैं ये किन्ही दुसरी समस्या का परिणाम है इसीलिए जाति या वर्ण को सीधे सीधे नहीं मिटाया जा सकता.

    भारत में विभिन्न जातियों को श्रमिक समूहों के रूप में देखिये. आजकल नजर आने वाली हर जाति का एक विशेष काम रहा है. उस काम विशेष से वह ग्राम या नगर की गतिशील अर्थव्यवस्था में अपना विशिष्ठ योगदान देती आई है. कुम्हार मिटटी के बर्तन बनाता है और समाज को जीवन जीने की सुविधा बनाता है, चमार चमड़े के सामान बनाकर जीवन को अलग ढंग से सुविधा देता है, सुतार या कारपेंटर लकड़ी के सामान बनाकर एक अन्य दिशा से जीवन को समृद्ध कर रहा है, जुलाहा सबके लिए कपडे बना रहा है, एक चंडाल या डोम सफाई करके इन सबको और पूरे नगर या गाँव को बिमारियों और प्रदुषण से बचा रहा है. किसान सबके लिए अन्न उपजा रहा है, ग्वाला या अहीर पशुधन को सहेजकर सबके लिए दूध घी बना रहा है. अब ऐसी सैकड़ों जातियां हैं जो श्रम का विशिष्ठ प्रकार अपनाए हुए गाँव की अर्थव्यवस्था और जमीन पर वास्तविक जिंदगी को सहारा दे रहे हैं.ये इन जातियों या श्रम आधारित समूहों का रचनात्मक योगदान है जिससे जीवन और सभ्यता आगे बढती है.

    लेकिन मजेदार बात ये कि इतना महत्वपूर्ण काम करने वालों को एकदम अछूत और दीन हीन बनाकर रखा गया है. और जो जातियां कोई सार्थक योगदान नहीं करतीं वे स्वयं को सबसे ऊपर बनाये रखती आयी हैं. एक ब्राह्मण का या पुरोहित का समाज और सभ्यता की जमीनी यात्रा में क्या योगदान है? वो क्या पैदा करता है? एक क्षत्रिय समाज को क्या दे रहा है ? वो क्या पैदा करता है? एक वैश्य कम से कम जीवन उपयोगी उत्पादों को ट्रांसपोर्ट करके कुछ हद तक उत्पादन की प्रक्रिया को आगे बधा रहा है, इसीलिये उसे भी बहुत अर्थों में नीच ही माना गया है.

    आप कल्पना कीजिये ये कैसी संस्कृति और सभ्यता है. जीवन और समाज के लिए उत्पादन की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा रचनात्मक योगदान देने वाले लोग नीच हैं और किसी तरह का सार्थक उत्पादन न करने वाले लोग महान हैं. वे सिर्फ दूसरों का उत्पादन खा खाकर गन्दगी फैलाते हैं. उस गन्दगी को साफ़ करके उन्हें दुबारा जीवन देने वाले श्रमिकों को ये ही तथाकथित महान लोग फिर से दुत्कारते हैं और उन्हें अंतिम दर्जे का अछूत बना डालते हैं. ये कैसी नैतिकता है? ये कैसा न्याय है?

    श्रमशील जातियों या समूहों के श्रम और उत्पादन पर ही ये समाज टिका हुआ है. उनमे आपस में कोई रचनात्मक सहयोग और एकीकरण न होने लगे इसलिए अलग अलग जातियों के खांचों का निर्माण करके उन्हें जातियों के भीतर विवाह के लिए मजबूर किया गया, अंतरजातीय और अंतर्वर्ण विवाह पर रोक लगा दी गयी ताकि उनकी एकता हर पीढ़ी में टूटकर बिखरती रहे और सामाजिक गतिशीलता और परस्पर निर्भरता और सहयोग की कल्पना ही नष्ट हो जाए. ये न केवल समाज को विभाजित बनाये रखने का षड्यंत्र है बल्कि श्रम के विभिन्न रूपों और उत्पादन के तरीकों में आपसी संश्लेषण और सुधार की प्रक्रिया को भी रोक देने का षड्यंत्र है. इसीलिये भारत के श्रमिक बेहतर तकनीक और विज्ञान पैदा नहीं कर सके.

    बेहतर तकनीक और विज्ञान तब जन्म लेता है जब श्रम और कार्य के विभिन्न रूपों का संश्लेषण या मिलन होता है. एक चमार अपना चमड़ा पकाने के लिए मौसम, तापमान, नमी, लवण, क्षार, समय, बल, दबाव, नाप, तौल आदि का वैज्ञानिक हिसाब रखता है. एक कुम्हार या किसान भी मौसम नमी धूप आर्द्रता, समय आदि का वैज्ञानिक हिसाब रखता है. अगर इन दोनों तीनों में रचनात्मक सहयोग होने लगे तो ये अपने अपने ज्ञान के मिलन से निश्चित ही कोई युनिवर्सल ज्ञान बनाने का प्रयास करेंगे, कुछ नियम और सिद्धांत खोज निकालेंगे.

    यही ढंग विज्ञान को जन्म देता है. यूरोप में यही किया गया है. यूरोप के सभ्य समाज में अलग अलग विशेषज्ञता के लोग साथ में मिलकर काम कर सकते थे वे एकदूसरे से सीखते सिखाते हुए कम समय में बेहतर नतीजे लाते हुए समाज में सम्मान और धन हासिल करने के लिए तेजी से तकनीक और विज्ञान की खोज में जुट गए और तीन सौ सालों में उन्होंने वो विज्ञान पैदा कर दिया जिसकी कल्पना भारत जैसे असभ्य अनैतिक समाज हजारों साल से भी नहीं कर पा रहे हैं.

    एक ब्राह्मण या क्षत्रिय के श्रम या उत्पादन को देखिये. वे क्या उत्पादन कर रहे हैं? समाज जिन उपादानों से या तरीकों से विक्सित होता है या सभ्य होता है उनमे इनका क्या योगदान है? ब्राह्मणों को पठन पाठन का अधिकार या जिम्मेदारी जो दी गयी है उसके लिए इन्होने क्या किया है? नब्बे से लेकर पंचानबे प्रतिशत आबादी को और अपनी ही औरतों को शिक्षा से वंचित कर दिया. इन्होने खुद जिस जिम्मेदारी को उठाने का दावा किया उसी काम को या शिक्षा को ही इन्होने योजनापूर्वक बर्बाद कर डाला.

    क्षत्रियों ने समाज की रक्षा की जिम्मेदारी ली और सामंत और शोषक बनकर इस देश की उत्पादक जातियों की रक्षा नहीं बल्कि उन्ही का क़त्ल करना शुरू किया और जिनसे रक्षा करनी थी या जिनसे युद्ध करना था उनसे हारते रहे. वणिक जातियां एकदम बीच में हैं वे उत्पादन न करते हुए भी उत्पादन की प्रक्रिया से जुडी रहीं, वितरण और विपणन के माध्यम से उन्होंने बहुत कुछ योगदान किया है लेकिन उन्हें उनके सार्थक योगदान के कारण ही नीच घोषित किया गया है. भारत के कई राज्यों में वणिक, कायस्थ इत्यादि वर्ण संकर माने गए हैं वर्ण संकर एक तरह की गाली है जो वर्ण-व्यभिचार से उत्पन्न संतानों को दी जाती है.

    एक गाँव की गतिशील अर्थव्यवस्था में जिन लोगों का जितना सार्थक योगदान है उतना ही वे नीच हैं. ये भारत का संस्कृति बोध है. इसे ठीक से देखा जाये तो ऐसा लगता है किसी ने भारत के भाग्य के साथ कोई बेहूदा मजाक किया है.

    विश्व शौचालय दिवस पर ये बात गौर करने योग्य है. भारत में सफाई और स्वच्छता एक व्यक्तिगत शुचिता का मूल्य या विषय नहीं है. ये जातिगत और वर्णगत शुचिता का और आन बान शान का मुद्दा है. अगर कोई व्यक्ति अपना ही पखाना साफ़ कर रहा हो तो उसे अड़ोस पड़ोस के ‘सभ्य सवर्ण हिन्दू’ टेढ़ी नजर से देखकर उसका मजाक उड़ाते हैं. अगर कोई समझदार आदमी अपने आसपास नाली साफ़ करने लगे तो लोग उसका मजाक उड़ाते हैं. लेकिन ये ही सज्जन अगर सड़क पे खड़े होकर मूत्र विसर्जन करने लगें तो किसी को विशेष आपत्ति नहीं होती. पोलीथिन के घर का कचरा बांधकर गली मोहल्ले में फेंकते रहना भारत में सामान्य और स्वीकृत व्यवहार है. लेकिन कोई पढ़ा लिखा आदमी या औरत अगर उस कचरे को इकट्ठा करके उसका निस्तारण करने की कोशिश करे तो उसका मजाक उड़ाया जायेगा. ये भारत के आम माध्यम वर्ग की नैतिकता है.

    ये नैतिकता कहाँ से आयी है? निश्चित रूप से ये धर्मग्रंथों से आई है. भारत के धर्मशास्त्रों में देखिये. स्मृति ग्रंथों (धार्मिक कानूनों) में देखिये. मनु महाराज ने साफ़ लिखा है कि मनुष्य (असल में ब्राह्मण) इंसानी बस्ती से दूर खुले में जाकर शौच करे और तीन बार (कुछ ग्रंथों में अधिक भी है) सुखी भूमि से प्रक्षालन करे फिर जल से करे. उसके बाद किन्ही उपायों या मन्त्रों या पवित्र धागे से जुडी कुछ क्रियाओं से उस ‘पाप’ से मुक्त हो. एक ही स्थान पर एक से अधिक लोग शौच नहीं कर सकते. एक ही स्थान पर निकट संबंधी स्नान या पखाना विसर्जन नहीं कर सकते.

    इसे गौर से देखिये. असल में ये नगरीकरण के खिलाफ जाने वाली बाते हैं. नगर में नगरीय जीवन जीने के लिए स्नानागार और शौचालय जरुरी हैं. एक हे स्नानागार या शौचालय में पिता-पुत्री और माँ-बेटे को जाना होगा. अगर और बड़ी सामूहिकता की कल्पना करें जैसे कि कोई कार्यालय या होटल या सिनेमाघर हो तो उसमे तो अपरिचितों के साथ भी वाही शौचालय साझा करना पड़ेगा. तब आप क्या करेंगे? ऐसे में यदि आपकी खोपड़ी में मनु महाराज घुसे हुए हैं तो आप नगरीय जीवन का स्वागत कैसे करेंगे? आप नगर का प्रबंधन कैसे करेंगे? और एक और मजेदार बात देखिये, भारत के शासन प्रशासन सहित न्यायपालिका से लेकर नगर पालिका तक सवर्ण द्विज ब्राह्मण या क्षत्रिय ही सारे निर्णय ले रहे हैं.

    जिनकी मानसिकता और संस्कार असल में उत्पादन, वितरण और नगरीय जीवन के खिलाफ हैं वे गाँव, खेती, नगर पालिका, व्यापर, शासन प्रशासन, शिक्षा आदि का प्रबंधन कर रहे हैं.

    इसी कारण वे भारतीय विभागों कार्यालयों में कोई नया इनोवेशन नहीं कर पाते. शासन प्रशासन तकनीक विज्ञान शिक्षा कानून कपड़ा लत्ता यहाँ तक कि फिल्म और मनोरंजन भी सब यूरोप से कापी पेट्स हो रहा है. कारण क्या है? कारण ये है कि जिनका मूल संस्कार और पारिवारिक वातावरण उत्पादन, सभ्यता और इंसानी नैतिकता के खिलाफ है वे ही सारा प्रबंधन कर रहे हैं. जिस आदमी को श्रम से नफरत करने का वातावरण मिला हो वो क्या श्रमिकों के प्रति संवेदनशील और जिज्ञासु होगा?

    ब्रिटेन का उदाहरण लीजिये, विलियम स्मिथ एक कारीगर का बेटा है उसने कारीगरी और उत्पादन सहित वितरण और व्यापार को गौर से देखा समझा. यूरोप के सभ्य समाज में उसने अलग अलग श्रम समूहों की अंतर्क्रियाओं और परस्पर निर्भरताओं सहित सामाजिक गतिशीलता का गहरा अध्ययन करते हुए पूंजीवाद का मोडल दिया. बाद में इस व्यवस्था में शोषण पैदा हुआ तो दुसरे विचारकों और दार्शनिकों ने इन्ही श्रमजीवी समूहों की हित चिन्तना करते हुए समाजवाद, लोकतंत्र और साम्यवाद इत्यादि के सिद्धांत दिए. ज्यादातर बेहतरीन दार्शनिक और विचारक और वैज्ञानिक यूरोप में श्रमजीवी समूहों से आ रहे हैं. अज की भाषा में कहें तो मध्यम वर्ग से आ रहे हैं. ये वो तबका है जो उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया में बचपन से किसी न किसी रूप में शामिल होता है और समाज और सभ्यता की जमीनी प्रक्रिया में हिस्सा लेकर पहले खुद सभ्य बनता है और बाद में सभ्यता को विक्सित करने में योगदान देता है.

    इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है? हजारों साल से जो लोग जन्म के आधार पर दूसरों को नीच और अछूत समझते हैं वे इस समाज के लिए दर्शन, धर्म और नीति के ग्रन्थ लिख रहे हैं. वे लोग जिनमे इतनी भी न्यूनतम इंसानी नैतिकता नहीं है कि एक किसान या कुम्हार या वाल्मीकि या चमार या अपनी खुद की स्त्री को इंसान समझकर उसके श्रम का सम्मान कर सके वे लोग समाज के संचालन के सूत्र अपने हाथ में रख रहे हैं. ऐसा समाज अगर औंधे मुंह न गिर जाए तो अस्चर्या कैसा? ऐसा समाज गुलाम गरीब अन्धविश्वासी और बीमार न हो जाए तो आश्चर्य कैसा?

    तो दोस्तों, स्वच्छता, शौच और शौचालय का मुद्दा एक खिड़की या एक की-होल की तरह है. उसके जरिये भीतर झांकर देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि भारत स्वच्छ न होने को ही अपनी संस्कृति समझता है. अनुत्पादक, बंजर, बाँझ, कूढ़-मगज और अन्धविश्वासी बने रहना यहाँ महानता की निशानी है. उत्पादन करना श्रम करना सृजन करना (यहाँ तक कि रजस्वला होना या बच्चा पैदा करना भी) यहाँ अशुद्धि और नीचता की निशानी है. ये भारत के मन के सोचने का ढंग है इसे ठीक से पहचान लीजिये. अब अगर भारत को सभ्य और समर्थ बनाना है तो उत्पादक और श्रमिक जातियों समूहों को उनके श्रम और योगदान के अनुरूप सम्मान और अवसर देना जरुरी है. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • प्रदूषण, नैतिकता और नैतिक प्रदूषण –Sanjay Jothe

    प्रदूषण, नैतिकता और नैतिक प्रदूषण –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    “नगरीय जीवन जीने के लिए एक न्यूनतम नैतिकता बोध की और सभ्यता बोध की आवश्यकता होती है जो भारत की संस्कृति में नहीं है”

    एक बार मैंने लिखा था कि भारत में गरीबी या विकास की समस्या असल में व्यवस्था की नहीं बल्कि धर्म और नैतिकता की समस्या है, ये विकास की रणनीति या व्यवस्था का मुद्दा बिलकुल नहीं है. बहुत लोगों को बुरा लगा था उस समय. इस बात को प्रदुषण के उदाहरण से फिर समझिये.

    एक आदिवासी दलित बहुल इलाके में कुछ साल मैंने वाटर और लैंड मेनेजमेंट का काम किया, ग्राम पंचायतों पटवारियों, गाँव के दबंगों और एकदम गरीब दलितों और आदिवासियों को एकसाथ लेकर पानी बचाओ जमीन सुधारों की चुनौती से रोज जूझना होता था. उस समय पता चला कि भारतीय गाँवों में लोगों में अपनी ही जमीन, सडक, पहाड़, नदी, आदि को बचाने के लिए एक जैसा उत्साह नहीं है.

    इसके कारण पर विचार करते हुए एक गजब की बात तब उजागर हुई थी कि भारतीय समाज में एक ही सडक एक तालाब एक पहाड़, मैदान या यहाँ तक कि एक पेड़ पर भी सभी लोगों का एक जैसा अधिकार नहीं होता. नदी, पोखर, झरने या तालाब के साफ़ हिस्से पर और कुओं पर पहला अधिकार ब्राह्मणों ठाकुरों बनियों का है, फिर ग्रामीण इलाकों के खुले मैदानों, सडकों, सार्वजनिक स्थलों का भी यही हाल है. ऐसे में दलितों आदिवासियों की बड़ी आबादी को जब तालाब या नाला सुधारने के लिए इकट्ठा किया जाता है तो उनमे कोई उत्साह नहीं होता. कारण ये कि उस तालाब या कुवें पर उनका अधिकार नहीं है, ये तालाब या कुवां ठीक भी हो जाए तो उन्हें उसका लाभ मिलेगा ये बहुत निश्चित नहीं है. दुसरा कारण कि ये गरीब लोग हैं जिनके पास जमीन नहीं हैं. इसलिए पानी बचाकर खेती करने का कोई उत्साह इनमे हो भी नहीं सकता.

    याद कीजिये, अंबेडकर को चवदार तालाब सत्याग्रह क्यों करना पडा था. वो केस स्टडी भारत के धर्म और संस्कृति द्वारा मानव जीवन और उसके प्रकृति से सम्बन्धों के बारे में किये गए सभी दावों की पोल खोल देती है. “सर्वे भवन्तु सुखिनः” “वसुधैव कुटुंब” और “पुत्रोहम प्रथ्विव्याम” इत्यादि कम से कम भारतीय संस्कृति के लिए सबसे बड़े झूठ हैं. यहाँ समाज जीवन और प्रकृति पर हर व्यक्ति का एकसमान अधिकार नहीं है. यहाँ वर्ण और जाति से सबकुछ तय होता है. ये जीवन जीने का एक असभ्य और बर्बर तरीका है जिसकी पोल आधुनिक शहरी जीवन में खुलने लगी है.

    जो संस्कृति ब्रह्मा के शरीर के चार हिस्सों से अलग अलग ढंग से पैदा हुई है उसने राजधानी से लेकर गाँवों जंगलों तक में किस तरह का पदानुक्रम बना रखा है ये देखिये. एक गली मुहल्ले तक में प्राकृतिक या कुदरती संसाधन की मालकियत भी एकसमान नहीं है. ऐसे में उसे बचाने के लिए इकट्ठा होने का या सामूहिक प्रयास करने का सवाल ही कहाँ उठता है. प्राकृतिक संसाधनो को बचाने के लिए सामुदायिक प्रयास की आवश्यकता दुनिया भर में स्थापित हो चुकी है लेकिन भारत में एक साझे लक्ष्य से सहानुभूति रखने वाला समुदाय मिलना बड़ा कठिन है. ऐसे में असभ्य भारतीय समाज अपने खुद के बच्चों के भविष्य के लिए भी इकट्ठा नहीं हो पा रहा है अपनी व्यवस्था और सरकार पर दबाव नहीं बना पा रहा है.

    आज दिल्ली में जो जहर फैला है उसका क्या कारण हो सकता है?

    ये असल में एक नैतिक प्रदूषण की हालत है. एक ऐसे समाज में जहां एकसाथ बैठना खाना पाप हो, एकदूसरे से संबंधित होने के लिए आपको जाति और सरनेम पता करने की जरूरत पड़ती हो वो समाज एक साझे सामूहिक भविष्य की कल्पना कैसे कर सकता है? हर आदमी का सडक तालाब पेड़ बगीचे पर अलग अलग किस्म का हक या लगाव है. जब प्राकृतिक संसाधन नष्ट होता है तो सबको इकट्ठा एक जैसा नुक्सान का दुःख नहीं होता. जिस अनुपात में आप उससे संबंधित थे उसी अनुपात में दुःख होता है. ये भारतीय संस्कृति की गजब की विशेषता है.

    अगर पाषाण कालीन या वैदिक या मध्ययुगीन अवस्था में जी रहे होते तो ये अनैतिकता और ये असभ्य जीवन शैली आसानी से चल सकती थी. लेकिन आज के आधुनिक समाज में नैतिकता से शून्य हो चुकी जीवन शैली नहीं चलने वाली. नगरीय जीवन जीने के लिए एक न्यूनतम नैतिकता बोध की और सभ्यता बोध की आवश्यकता होती है जो भारत की संस्कृति में नहीं है. अब वायु, पानी, जमीन जंगल इत्यादि को जब तक सामूहिक सम्पत्ति न समझा जाएगा तब तक भारत जैसे असभ्य समाज आधुनिक जीवन के योग्य नहीं बन पायेंगे.

    दिल्ली या चंडीगढ़ की हवा को ठीक करने के उपाय नहीं किये जा रहे हैं. कारण वही है. सबको लगता है कि अपना घर साफ़ कर लिया अपनी गली में बगीचा लगा लिया और हो गया समाधान. जैसे गाँव के ब्राह्मण ठाकुर ये सोचते हैं कि तालाब का अपना हिस्सा साफ़ रहे तो हम साफ़ पानी पी सकते हैं. या अपने मुहल्ले का कुआ साफ़ हो गया तो सब ठीक हो गया. आजकल एक और आदत फ़ैल रही है. शहर की सामूहिक जीवन की चिंता किये बिला अपना आसन बिछाकर प्राणायाम कर लीजिये और हो गया समाधान. ये प्राणायाम और योग की मानसिकता भी एकदम खंडित और स्वार्थी जीवनशैली को जन्म देती है.

    एक घर के कोने में बैठकर प्राणायाम कर लेने से मान लिया जाता है कि आपका काम हो गया. लेकिन शहर और समाज को एक बड़े इकोसिस्टम की तरह देखने का नजरिया इससे नहीं आने वाला है.

    जीवन और जगत को खंडित करके देखने की ‘वैदिक बुद्धिमत्ता’ असल में अब मूर्खता साबित हो रही है. वैदिक बुद्धिमत्ता सब तरह की परिस्थितियों को खंड खंड करके देखती है. जैसे ब्रह्मा को चार खंडों में बांटकर उसने चार वर्ण बना दिए. वे एकोलोजी या इकोसिस्टम का सिद्धांत समझ ही नहीं सकते. गाँव के ब्राह्मण ठाकुर ये नहीं समझना चाहते कि गाँव का भूमिगत जल अगर प्रदूषित है तो एक कुंवे को साफ़ करने का कोई अर्थ नहीं है. ठीक इसी तरह दिल्ली चड़ीगढ़ के प्रभावशाली लोग हैं जो इकोसिस्टम को नहीं समझते, वे एपने घर में एयर कंडीशन और प्यूरीफायर लगाकर सुरक्षित नहीं हो सकते.

    भारत के गाँवों से लेकर शहरों तो वही की वही समस्या है. क्योंकि इनका धर्म और संस्कृति एक ही है.

    ये किसी भी शहर या गाँव में चले जाएँ ये समग्रता की भाषा में सोच ही नहीं सकते. ये खंड खंड पाखंड के आदि हो चुके हैं. एक साझे सामूहिक जीवन का विरोध करते हुए इन्होने जो धर्म और संस्कृति पैदा की है वो अब इनके शरीर और मन के जीवन को भी खंडित कर देना चाह रही है. अब इनसे कहना चाहिए कि आपके फेफड़े और ह्रदय (छाती) अगर प्रदुषण से मर रहे हैं तो चिंता मत कीजिये ये क्षत्रिय हिस्सा है जो मर रहा है, अभी भी आपके शरीर का मस्तिष्क अर्थात ब्राह्मण हिस्सा सही सलामत है. ऐसे तर्क अभी तक आये क्यों नहीं ये भी आश्चर्य की बात है.

    भारत के धर्म और संस्कृति ने जैसा समाज बनाया है उसमे व्यवस्था, कानून आदि को जिम्मेदार ठहराने से पहले हमें इस देश की नैतिकता को ठीक से पकड़ना होगा. जो समाज जीवन और प्रकृति ही नहीं परमात्मा तक पर अलग अलग ढंग से अधिकार और सामित्व देता हो वहां सामूहिक साझे भविष्य के लिए पूरी कौम को इकट्ठा करना असंभव है. यही भारत की गुलामी और हार की सबसे बड़ी वजह रही है. बहर्तीय समाज किसी भी अच्छे प्रयास में यहाँ तक कि आत्मरक्षा के लिए भी इकट्ठा नहीं हो सका है.

    ऐसे में प्रदूषण जैसी पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को सुलझाने का भारतीय असभ्य समाज का जो तरीका है उसपर गौर कीजियेगा. ये सोच और तरीका गहराई से देखिये, इस तरीके में भारतीय संस्कृति की मूल समस्या – अनैतिकता और अमानवीयता – साफ़ नजर आती है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारत के सभ्य होने की राह में सबसे बड़ी बाधा – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत के सभ्य होने की राह में सबसे बड़ी बाधा – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक ख़ास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है. कई लोगों ने भारत में सामाजिक क्रान्ति की संभावना के नष्ट होते रहने के संबंध में जो विश्लेषण दिया है वो कहता है कि भारत का धर्म इसके लिए जिम्मेदार है. निश्चित ही भारत का धर्म प्रतिक्रान्ति का हथियार है लेकिन सर उपर उपर नजर आने वाले इस धर्म को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह ठीक नहीं है.

    धर्म मोटे अर्थों में कर्मकांड, विश्वास और पूजा पद्धति इत्यादि इत्यादि का जमघट होता है, ये स्वयं अपना स्त्रोत नहीं है बल्कि ये भी किसी अन्य गहरी विधा के गर्भ से जन्मता है. ठीक से कहें तो भारतीय धर्म का मूल उसके भाववादी दर्शन में है. इस लोक के शोषण और सच्चाइयों से भाग कर परलोक में परम शान्ति या मोक्ष को खोजते हुए जन्म मरण (भवचक्र) से बाहर निकलना इस दर्शन का इसका मूल लक्ष्य है. ऐसे लक्ष्य असल में इस जमीन पर चल रहे जीवन को सम्मान नहीं देते बल्कि किसी आसमानी लोक या हवा हवाई स्वर्ग में या मोक्ष या बैकुंठ को सम्मान देते हैं.

    जो लोग ये कहते हैं की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना इस जमीन पर घट रहे जीवन के खिलाफ है वे बहुत हद तक सही हैं. इसके बावजूद ये वक्तव्य अधूरा है. मेरा गहरा अनुभव ये है की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना भी तभी उठती है जबकि आपके समाज में जमीनी जीवन के खिलाफ एक निर्णायक मनोवृत्ति बन चुकी हो. उदाहरण के लिए भारत में सामाजिक और लौकिक जीवन की जमीनी सच्चाइयों को छुपाते हुए उनमे पल रही सडांध और बीमारी को लगातार दबाते हुए समाज में यथास्थिति बनाये रखना ही भारत की परम्परा रही है.

    भारत में पुरोहित वर्ग, शासक वर्ग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा से एक ख़ास तरह की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाया है. इस संरचना में अस्सी प्रतिशत कामगारों मजदूरों, स्त्रीयों और अछूतों को पूरी व्यवस्था के लाभों से वंचित रखने का काम किया है. यह काम सैनिक बल से या लठैतों के जरिये नहीं किया जा सकता. इसे सामाजिक धार्मिक विश्वास के जरिये ही किया जा सकता है. इस ख़ास तरह की अमानवीय सामाजिक संरचना को बनाये रखने के लिए धर्म ने बड़ी चतुराई से हजारों साल तक बढिया काम किया है. भारत के धर्म ने कर्मकांडों और त्योहारों के जरिये इन अस्सी प्रतिशत बहुजनों के बीच निश्चित ही एक ख़ास तरह की गुलामी, कायरता और भाग्यवाद को फैलाया है. विशेष रूप से बहुजनों की स्त्रीयों को इस धर्म ने व्रत उपवासों, त्योहारों आदि के जरिये एकदम गुलाम और कायर बनाया हुआ है.

    ये गुलाम और डरपोक स्त्रीयां एक डरपोक कौम को जन्म देती हैं जो किसी भी बदलाव या तर्क की बात से डरते हैं. ये अस्सी प्रतिशत डरपोक और दिशाहीन लोग वही हैं जिन्हें सामाजिक क्रान्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन ये खुद उस क्रान्ति को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

    भारतीय धर्म को और उसके स्वाभाविक परिणाम को इस तरह देखना बहुत आसान है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा अनुभव ये बताता है कि हमें धर्म के बाह्य कर्मकांडीय स्वरूप पर प्रश्न उठाने से या उसे ध्वस्त कर देने भर से कोई स्थाई समाधान नहीं मिलने वाला है. बाहरी कर्मकांड रुक भी जाएँ तो यह जहरीली अमरबेल फिर से पनप जायेगी. इसका जीवन स्त्रोत कहीं और छुपा हुआ है.

    आप गौर कीजिये इस समाज के पढ़े लिखे तबके पर, ये शहरी मध्यमवर्ग तबका धर्म के बाहरी कर्मकांड जैसे कि यज्ञ, हवन, बलि, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, दान दक्षिणा, ब्राह्मण भोज आदि नहीं करता है. ये तबका – जिसमे सुशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रबन्धक, और हर तरह के पेशेवर और नई पीढी के युवा या अप्रवासी भारतीय आते हैं – वे ग्रामीण या कस्बाई कर्मकांड नहीं करते हैं. वे लोग बहुत मौकों पर प्रगतिशील भी नजर आते हैं. अक्सर वे पार्टी इत्यादि में शराब और मांस का सेवन करते हुए मिल जाते हैं. यही लोग शहरों में लिव इन रिलेशन और समलैंगिक शादियों सहित लोकतंत्र, साम्यवाद, क्रान्ति आदि के झंडे भी लहराता हुआ मिल जायेंगे. ऐसा करते हुए वे खुद की और दूसरों की नजरों में स्वयं को “गैर-रुढ़िवादी” सिद्ध कर देते हैं. लेकिन आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म में इनका विश्वास कभी कम नहीं होता.

    सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब ये हुआ कि ये प्रगतिशील युवा वर्ग सिगरेट शराब और मांस सहित फ्री सेक्स के बावजूद पूरी ठसक के साथ अंदर से धार्मिक बना रहता है और इस सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है. ये एक विचित्र लेकिन परेशान करने वाला तथ्य है. इसका ये अर्थ हुआ कि बाहरी आडंबरों से भारत के इस धर्म का या इस धर्म के वास्तविक जहर का कोई अधिक सम्बन्ध नहीं है. बल्कि बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों से भी कहीं अधिक गहराई में छुपा इसका जहरीला अध्यात्म या रहस्यवाद ही इसका असली जीवन स्त्रोत है. उसी स्त्रोत से जहर का वो फव्वारा फूटता है जो हर दौर में हर पीढ़ी में पूरे भारत को पागल बनाये रखता है. इस बात को गहराई से समझना होगा, ये थोड़ी उलझी हुई बात है.

    असल में भारत का धर्म कोई एकरूप बात नहीं है इसके हजारों विभिन्न रंग और चेहरे हैं. इसी को विविधता कहके महिमंडित किया जाता है. लेकिन इन विविध रूपों के भीतर एक सा जहर लहू बनके बहता है. वह लहू है इसकी ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की मान्यता’. इसी जहरीली त्रिमूर्ति के गर्भ से परलोक की महिमा और इस लोक की निंदा जन्म लेती है. बाहरी आडंबर, कर्मकांड कुछ भी हों अंदर ही अंदर इनमे कर्म का विस्तारित सिद्धांत (इस जन्म का कर्म अगले जन्म को तय करेगा) चलता रहता है. इसी में लपेट कर दान दक्षिणा, पुण्य, पाप आदि की सलाहकारी भी चलती रहती है, इसी से ध्यान साधना के तरीके बनाये जाते हैं और लोगों को व्यर्थ के तन्त्र मन्त्र ध्यान भजन में उलझाया जाता है. बाहर के कर्मकांड बदल भी जाएँ तो थोड़े दिनों बाद इस जहरीले कुँए से नई जहरीली बेल पनप कर समाज पर फ़ैल जाती है. उदाहरण के आजकल के पूजा पंडाल जगराते जुलूस, सामूहिक भोज आदि भारत में बहुत पुराने नहीं हैं.

    जब स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों में आजादी के आन्दोलन के लिए या तथाकथित हिन्दू जीवन दर्शन को प्रचारित करने के लिए हिन्दुओं सहित बहुजन जातियों को संगठित करने की आवश्यकता हुई तब पुराने दर्शन और कर्म के सिद्धांत पर आधारित कर्मकांडों को नये रूप में ढाल दिया गया और नये देवी देवताओं सहित नई आरती, नये पूजा विधान, जुलूस, जगराते, डांडिया, सामूहिक भोज आदि निर्मित कर दिए गये. इनमे शामिल होने वाले लोगों के मौलिक मनोविज्ञान अभी भी आत्मा, परमात्मा और कर्म के विस्तारित सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा से ही नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ये इनोवेशन किया गया था. इन नये कर्मकांडों से इन्हें आजाद करवा भी दिया जाए तो कोई बदलाव नहीं होने वाला. उस अमरबेल में से फिर नये अंकुर अपने आप निकल आयेंगे.

    यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले दलितों बहुजनों में भी इसी कारण कोई ख़ास बदलाव नहीं आता है. उनके मन में गहराई में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष या स्वर्ग या जन्नत जैसे अंधविश्वास भरे ही रहते हैं. इन जहरीले बीजों को अपने साथ ले जाकर वे ध्यान समाधी मोक्ष जन्नत आदि के लिए नये कर्मकांड खुद ही बना लेते हैं. वे भी पुराने देवी देवता छोड़कर नये देवी देवता और तीर्थ, मन्दिर ध्यान केंद्र आदि बना लेते हैं और नये धर्म में भी पुराने भारतीय धर्म की जहरीली खुराक फैला देते हैं. ये एक लाइलाज बीमारी नजर आती है.

    अब बड़ा सवाल ये है कि इसका इलाज कैसे हो?

    मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है. हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी. इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

    ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं. ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं कि कई पीढियां इसमें से बाहर नहीं निकल पाती. आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाये रखते हुए उसके ऊपर ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

    ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है. इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं. पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं. युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है.

    अपने परिवारों, गाँवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है. इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है.

    इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

    इसलिए सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों आदिवासियों को मेरी यही सलाह होती है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएँ. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें. ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही प्रगतिशील एजेंट हैं.

    आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता पौराणिक बकवास का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं. ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं.

    अगर धोती या जनेऊ या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक नही होगा. लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते.

    यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.