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  • मानव-निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार

    मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर
    साभार –
    पृष्ठ संख्या  242 से 245 

    मैंने कॉफी पीते मित्र से कहा कि सच्चे बाबाओं/गुरूओं/संतों को छोड़कर शेष बाबाओं के लिए  भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार है।

    मित्र : आपका मतलब भारत में कई प्रकार के बाबा होते हैं।
    नोमेड : जी, बाबाओं के कई चारित्रिक प्रकार है। जैसे गरीबों के बाबा, मध्यवर्ग के बाबा, उच्च-मध्यवर्ग के बाबा, उच्चवर्ग के बाबा, व्यापारियों के बाबा, ऊंचे वेतन वाले नौकरीपेशा व नौकरशाहों के बाबा आदि।

    मित्र : भारत में इतने बाबा लोग क्यों हैं
    नोमेड : इसका कारण भारत में मानव-निर्मित ईश्वर के प्रतिनिधियों की बहुत बड़ी संख्या का होना है। चूंकि परंपरा में मानव-निर्मित ईश्वर की अवधारणा में यह मान लिया गया है; कि ईश्वर जादू से समस्या हल कर देता है, ईश्वर जादू से मानवीय स्वार्थ की इच्छायें पूरी कर देता है, ईश्वर जादू से भोगविलास व ऐशोआराम की इच्छायें पूरी कर देता है। सारांश यह कि ईश्वर का काम मनुष्य को भोग-विलास करवाना है, जो ईश्वर भोग करवा दे वह महान् व शक्तिशाली, जो न भोग करवा पाएउस पर आस्था खतम करके दूसरे प्रकार के ईश्वर में आस्था रखना। 

    भारतीय समाज में परंपरा में लोगों के मन में यह धार्मिक अनुकूलन बनाया गया है कि कुछ लोग ईश्वर से संपर्क रख सकते हैं, ईश्वर से संवाद कर सकते हैं, ईश्वर से सिद्धियां सीख सकते हैं, ईश्वर को मानव की इच्छा पूर्ति के लिए प्रसन्न कर सकते हैं और मुंहमांगा वरदान प्राप्त कर सकते हैं आदि आदि।

    मित्र :  मैं ठीक से समझा नहीं।
    नोमेड : लड़का पैदा करना हो, लड़की न पैदा करना हो, छोटे बच्चे से लेकर ऊंचे वेतनमान की परीक्षा तक किसी में भी सफलता प्राप्त करनी हो, सुंदर पत्नी प्राप्त करनी हो, कमाऊ पति प्राप्त करना हो, बीमारी का इलाज करना हो, दुश्मन को क्षति पहुंचानी हो, नौकरी प्राप्त करनी हो, प्रमोशन प्राप्त करना हो, किराएपर मकान लेना हो, मकान के लिए किरायेदार मिलना हो, पति को दुरुस्त करना हो, पत्नी को दुरुस्त करना हो, बेईमानी करके उसको महानता में बदलना हो, काली करतूतों को सफेद करना हो, पाप करके किएगएपाप को पुण्य में परिवर्तित करना हो आदि आदि अनेकों प्रकार के चिल्लर कामकाज व आवश्यकतायें हैं। जिनके लिए लोगों को ईश्वरीय प्रतिनिधियों की आवश्यकता पड़ती है। भारत के लोगों की सहज मानसिकता है कि पुरुषार्थ के बजाय, काम कराने के लिए संपर्क व संबंध खोजते हैं। और ऐसी मानसिकता का कारक भी परंपरा में ईश्वरीय प्रतिनिधियों का प्रायोजित होना ही है।

    मित्र : इसका बाबा लोग से क्या रिश्ता है।
    नोमेड : बहुत गहरा रिश्ता है। भारत में परंपरा में ऐसा धार्मिक अनुकूलन किया गया है कि कुछ लोग ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं जिनके माध्यम से ईश्वर मनुष्यों के साथ संपर्क रखते हैं। इन प्रतिनिधियों को बिना किसी भी शंका के पूरे समर्पण के साथ स्वीकारना है और इनके प्रति सेवा व समर्पण का भाव रखना है।

    मनुष्य हर उस तंत्र का मानसिक व वैचारिक अनुगामी होना स्वीकार कर लेता है, जो उसकी ऐश्वर्य, सुविधा व भोग-विलास की इच्छा की पूर्ति कराने का दावा करता है। तो जिन लोगों ईश्वर के साथ संपर्क रखने वाला प्रायोजित कर दिया जाता है, लोभी, मृत्यु व मृत्यु के पश्चात् नर्क की प्रताड़नाओं से भयभीत लोग उनको अपना गुरू स्वीकार कर लेते हैं, उनको पवित्र व पूजनीय मान लेते हैं ताकि उनके माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न कर सकें और आकाशीय-स्वर्ग या भू-स्वर्ग आदि की प्राप्ति कर सकें।

    मित्र : गुरू को तो बहुत महान् माना जाता है।
    नोमेड : इसी मान्यता व अनुकूलन का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपने अनुयायी बनाते हैं और अनुयायियों में अपने प्रति बिना मूल्यांकन व विश्लेषण के अंधी आस्था पैदा व विकसित करते हैं, जिसके समक्ष कोई भी उचित तर्क व कारक आदि सभी व्यर्थ है, कूड़ा है, मिट्टी है, अस्तित्वहीन हैं, अप्रासांगिक हैं।

    पारंपरिक धार्मिक अनुकूलन में गुरू को सबसे अधिक महान् बताया गया है। इस मूल्य का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपनी गुरूता पर अंधी आस्था रखने का अनुकूलन स्थापित करते हैं और बिना शंका अंधी आस्था कायम रखने के लिए गुरू संपूर्ण है, ईश्वरीय चेतना से संपन्न है, ईश्वर की सक्रियता व अभिव्यक्ति का अंश है इसलिए  शिष्य कभी गुरू से आगे नहीं जा सकता है आदि आदि गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में प्रायोजित करते हैं।। शिष्य द्वारा गुरू पर शंका करना अक्षम्य अपराध है, इस अपराध के लिए गुरू को शिष्य को घोर से घोर दंड देने का अधिकार है। शिष्य को गुरू का मानसिक व शारीरिक दास बनना होता है।

    मित्र : आप कहना चाहते हैं कि लोगों के मन में बैठी ऐसी परंपरागत सामाजिक व धार्मिक अनुकूलन का लाभ उठाने वाले बाजारू बाबा लोग हैं।
    नोमेड : जी बिलकुल। बाजारू बाबा लोग बड़े चतुर हैं, भलीभांति समझते हैं कि भारतीय समाज के लोग धर्मभीरु हैं और स्वार्थ पूर्ति के लिए बिना पुरुषार्थ का शार्टकट खोजते हैं। और लोगों के लिए ईश्वर का मतलब जादू करके मनुष्य की भोगने की इच्छाओं की पूर्ति कराने वाला है।

    इसलिए  जो मृत्यु के निकट नहीं हैं वे और अधिक सांसारिक भोगों के लिये; जो मृत्यु के निकट हैं वे जीवन भर किएगएस्वार्थ के कामों, हिंसा व पापों की जवाबदेही से बचकर स्वर्ग में ऐश्वर्य भोगने के जुगाड़ के लिये; बाबाओं रूपी ईश्वरीय प्रतिनिधियों के अनुगामी बनते हैं।

    मित्र : जुगाड के लिए क्या करना होता है।
    नोमेड : जुगाड़ के लिए कुछ विशेष नहीं करना होता है। अलग-अलग बाबा अपना अलग तरीका लेकर चलता है ताकि अनुयायियों के अंदर गुरू की अद्वितीयता का अहसास भी हो और कर्मकांड करना बहुत दुष्कर भी न हो। इसलिए  किसी पशु को कुछ खिलाना/नहलाना/पानी-पिलाना या किसी को दान करना आदि आदि; किसी रंग का कपड़ा पहनना या दान करनाआदि आदि; किसी दिन कुछ करना या न करना आदि आदि;  माता पिता या बड़े-बूढ़ों के दिन में कई बार पैर छू लो या रात में किसी विशेष समय जग कर पैर छू लो आदि आदि, इससे माता पिता और बड़े बूढ़े भी गुरु जी के ऊपर प्रसन्न हो गएऔर उनका गुरू जी का प्रचार भी हो गया। इसी प्रकार का कुछ ऊटपटांग करना व करवाना और तर्को से किएजा रहे कर्मकांड का संबंध दैवीय प्रयोजन से सिद्ध कर देना। 

    आजकल तो आध्यात्मिक बाबा लोग का फैशन आ गया है। जागरूक व पढ़ेलिखे लोग अपने लिए अलग प्रकार के आध्यात्मिक बाबा लोग चाहते हैं। एबाबा लोग इन लोगों को जीने का तरीका सिखाते हैं, व्यवहार करना सिखाते हैं, शांति सिखाते हैं, बाकायदा कोर्स कराते हैं, कोर्स की फीस लेते हैं। फीस लेना प्रोफेशनल्स को बाबा का प्रोफेशनल, ईमानदार व वजनदार होना सिद्ध करता है।

    पैसे कमाने और ग्लैमर भोगने के लिए बेइंतहा दौड़-भाग करते ऊंचे वेतन वाले प्रोफेशनल्स लोग जब कभी अपने बाजारूपन से अलग हटकर कुछ सोचते हैं तो उनको अंदर से भय, असुरक्षा, घुटन व कुंठा आदि महसूसती है। तो इससे पलायन करने के लिए ये लोग अपने लिए किसी को अपना आध्यात्मिक गुरू मान लेते हैं और फिर गुरू के बताई पद्धतियों के नशे में छद्म शांति महसूसते हुए पूर्ववत जीवन जीने लगते हैं।

    उपभोक्ता रूपी मनुष्य की हर वास्तविक/संभावित/आभासी आवश्यकता के लिए विकल्प प्रस्तुत कर देना ही, बाजार के तंत्र की सफलता व मजबूती है। बाजार में उपलब्ध आध्यात्मिक व गैर-आध्यात्मिक बाबा लोग भी ऐसे ही बाजारू विकल्प हैं। किसी ने लोगों से किसी बाबा के बारे में सुना, अपनी तथाकथित मूल्यांकन क्षमता व बौद्धिकता आदि से बाबा को तौला और पसंद आने पर उस बाबा को गुरू मान लिया।  व्यक्ति को अपनी पसंद का गुरू बाजार में उपलब्ध है।

    मित्र : इन बाबाओं के पास इतना पैसा कहा से आता है।
    नोमेड : बाबा लोगों के पास मुख्यतः दो प्रकार के लोगों के द्वारा पैसा अधिक आता है। व्यापारी व व्यापारियों के परिवारों से और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स, नौकरशाहों व उनके परिवारों से।

    मित्र : ऐसा क्यों, व्यापारियों की बात तो समझ आती है लेकिन नौकरशाह व प्रोफेशनल्स …… अचरज की बात है।
    नोमेड : ऐसा इसलिए  कि व्यापारियों के बाद सबसे अधिक असंतुष्ट, भ्रमित व अनैतिक लोग एही लोग हैं। इन लोगों का भ्रम, अनैतिकता व अर्थ की ताकत का अहंकार इनको अंदर की शांति नहीं प्राप्त करने देते हैं। दूसरों की तुलना में पैसा अधिक होने से अहंकार का स्तर बहुत ही ऊंचा होने के कारण ये लोग अंदर की ईमानदारी के साथ सामाजिक भी नहीं हो पाते। बाबाओं का चेला बनने से, दूसरे चेलों के साथ तथाकथित सामाजिकता का ढोंग भी जीने को मिल जाता है।

    भारत में अमूमन व्यापारी वर्ग गैर पढ़ा लिखा होता है, इसलिए इनके धार्मिक बाबा लोग पढ़े-लिखे लोगों के बौद्धिक श्रेष्ठता के अहांकारों को नहीं सुहाते हैं। इसलिए पढे-लिखे व स्वयंभू जागरूक लोगों ने अपने लिए अलग किस्म के बाबा बना लिए हैं, जिनको ये लोग आध्यात्मिक बाबा कहना पसंद करते हैं, जो इनके तार्किक अहंकारों को तर्कों से तुष्ट करते हुएबाबागिरी करते हैं।

    भारत में धार्मिक व आध्यात्मिक बाबागिरी बहुत बड़ा व ताकतवर उद्योग बन चुका है। ये लोग बाकायदा विभिन्न सत्ताओं जैसे बाजार व राजनैतिक सत्ताओं आदि के एजेंट की तरह भी काम करते हैं और अपने वेतनभोगी कर्मचारी भी रखते हैं। प्रचार कंपनियों से अपना प्रचार भी करवाते हैं और लाभ कमाते और कमवाते हैं। उद्योग बनने का एक कारण “आस्तिक व नास्तिक” की भ्रामक परिभाषाओं का प्रचलन भी है।

    मित्र : आप आस्तिक या नास्तिक किसे कहते हैं।
    नोमेड : बात मेरे कहने की नहीं है। बात आस्तिक व नास्तिक शब्दों के शाब्दिक अर्थ व किस संदर्भ में प्रयोग करने के लिए ये दोनों शब्द बनाए गए। इन शब्दों की शुरुआत होने का मत यह भी है कि वेदों को मानने वाला आस्तिक व वेदों को न मानने वाला नास्तिक है।

    यदि शाब्दिक अर्थ में जाएं तो इनका अर्थ कुछ यूँ निकलता है। आस्तिक = “जो है” उस पर विश्वास करने वाला और नास्तिक = “जो नहीं है” उस पर विश्वास करने वाला।

    मानव-निर्मित ईश्वर तो मानव का गढा हुआ है, इसलिए मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करने का तात्पर्य “जो नहीं है” उस पर विश्वास करना हुआ। जो मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे भयंकर रूप से ‘नास्तिक’ होते हैं, वह भी जबरदस्त अहंकार व हिंसक भावना से ओतप्रोत क्योंकि ये लोग ईश्वर को मनमाफिक गढ़ते हैं। जो निर्विकार अस्तित्व पर विश्वास करता है केवल वही “आस्तिक” है, क्योंकि वह “जो है” उस पर विश्वास करता है।

    लोग यदि इन दो शब्दों का अर्थ ही समझ लें तो जो बाबा लोग ढोंगी हैं, तो ऐसे बाबाओं के छद्म-जालों की मानसिक व वैचारिक दासताओं के चंगुल से बाहर निकलने की संभावना बनी रहती है।

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  • हम, हमारी स्मार्टनेस बनाम भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी – (भाग 01)

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    सामाजिक यायावर

    यह लेख-श्रंखला गंभीर, विचारशील, चिंतनशील व सामाजिक मुद्दों की धरातलीय हकीकत को समझने की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए है। भावनात्मक आवेग, धार्मिक/जातीय प्रतिक्रियाओं/आवेशों, राजनैतिक पूर्वाग्रहों व संरेखणों, अतथ्यात्मक/कुतर्क/वितर्क बहसबाजी करने वाले व वास्तविक विकास की समझ न रखने वाले महानुभावों के स्वाद के लिए इस लेख-श्रंखला में शायद ही कुछ हो।

    मेरा प्रयास सदैव यही रहता है कि मैं कोरी भावुकता, भावनात्मक आवेग, धार्मिक या जातीय उन्माद/प्रतिक्रिया, खोखले तर्को/तथ्यों, निहित स्वार्थों/पूर्वाग्रहों व राजनैतिक पूर्वाग्रहों/संरेखणों आदि के आधार पर न लिखूं। संभवतः यही कारण है कि सोशल साइट्स में विचारशील व सामाजिक दृष्टिवान लोग ही मुझे पढ़ते हैं और मेरा लिखा पसंद करते हैं। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हो चुका है कि मेरी बातों की गहराई लंबे समय बाद समझी गई है और स्वीकृत की गई है। यहां तक कि मेरे जमीनी कामों के प्रमुख साथियों को भी मेरी बातों को समझने में कई-कई वर्ष कभी कभी पांच से दस वर्ष तक भी लग गए हैं।

    मैं सन् 2013 से सन् 2015 तक कई बार भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी, बनारस को क्योटो शहर बनाने जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया में लिख चुका हूं। आजकल कुछ पाठकों ने इन मुद्दों पर लिखे गए मेरे पुराने छोटे बड़े लेखों को खोज कर फिर से उन पर टिप्पणियां देना शुरू किया है। इसलिए स्मार्ट सिटी पर यह लेख-श्रंखला मित्रों को प्रस्तुत है।

    हम भारतीयों की वर्तमान मानसिकता, सोच, समझ, कंडीशनिंग व जीवन शैली के आधार पर स्मार्ट सिटी कैसे हो सकते हैं। इस पर बात करने के पहले हम स्मार्ट सिटी क्यों चाहते हैं इसको समझने का प्रयास होना चाहिए।

    दरअसल हम दिखावटी तौर पर कितना भी भारत व भारतीय संस्कृति की महानता का दावा ठोंकते रहें, कितना भी ड्रामेबाजी करते रहें लेकिन वास्तव में हमारे अंदर पाश्चात्य देशों व उनकी जीवन शैली ही आदर्श के रूप में स्थापित रहती है। हम मुंह से कुछ भी बोलते रहें लेकिन हम अपनी जीवन शैली में पाश्चात्य देशों की शैली का ही अनुकरण करते हैं व करना चाहते हैं।

    हम रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों तक में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी स्मार्टनेस समझते हैं। हर शहर, हर कस्बे में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गए हैं। हम अपने बच्चों को वहां  भेजते हुए फक्र महसूस करते हैं।हिंदी मीडियम स्कूलों की तुलना में कई गुना अधिक फीस भी देते हैं। हमारे बच्चे भी हिंदी मीडियम स्कूलों में जाने वाले बच्चों से स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और उन बच्चों को हीन व हेय मानते हैं। ऐसी सोच हम खुद भी रखते हैं।

    दरअसल हम रेडीमेड तरीके से स्मार्ट होना चाहते हैं, हम रेडीमेड तरीके से विकसित होना चाहते हैं। इसलिए बाजार जाते हैं और स्मार्ट बनने के रेडीमेड टोटके खोजते हैं। हम जींस व टीशर्ट पहनना शुरू कर देते हैं, सुपर मार्केट में सामान खरीदना शुरू कर देते हैं भले ही हमें जींस, टीशर्ट व सुपर मार्केट की कतई जरूरत न हो। हम अपने बच्चों को स्मार्ट करना चाहते हैं तो उनको रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में भी महंगी से महंगी फीस भरकर भेजते हैं। लाखों रुपए सालाना डोनेशन देकर रद्दी इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में भेजते हैं, यदि ज्यादे रुपयों का जुगाड़ हो गया तो विदेशों में लाखों रुपए महीना फीस व खर्चों का इंतजाम करके बच्चों को डिग्री लेने के लिए भेजते हैं वह बात अलग है कि बच्चा डिग्री लेकर भी परजीवी की तरह ही रहता है। लेकिन हम तो खुद को अपने गली मुहल्ले में स्मार्ट साबित कर लेते हैं।

    जो साधारण मोबाइल का प्रयोग करता है वह स्मार्ट नहीं है, जो आईफोन का प्रयोग करता है वह स्मार्ट है। जो लड़की जींस व टीशर्ट पहने वह स्मार्ट, जो लड़की सलवार कुर्ता दुपट्टा पहने वह दकियानूसी। जो टाई पहने वह स्मार्ट जो कुर्ता पायजामा पहने वह दकियानूसी। जो बियर पिए, वाइन पिए वह स्मार्ट जो अपने हाथ की बनाई महुआ की दारू पिए वह पिछड़ा व हीन। जो महंगी मोटरसाइकिल में चले वह स्मार्ट, जो साइकिल में चले या पैदल चले वह पिछड़ा, मूर्ख व हीन।

    यही इसी प्रकार की बाजार से खरीदी जाने वाली सतही सड़कछाप स्मार्टनेस, सफलताएं, उपलब्धियां आदि ही हमारी जीवन शैली बन चुकी हैं, और हमारे जीवन का उद्देश्य व उपलब्धियां भी। हमारे अंदर इसी बाजारू स्मार्टनेस व इसके सतहीपन के कारण ही हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं। हम सबकुछ बाजार से रेडीमेड खरीदना चाहते हैं, हमारा सबकुछ बाजार से ही तय हो रहा है। बाजार से खरीदने के लिए हमें धन व संपत्ति चाहिए होता है। इसलिए धन व संपत्ति के लिए हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जाते हैं, सतही व खोखले होते चले जाते हैं।

    हमारे अंदर आविष्कार, अनुसंधान व निर्माण करने की सोच व क्रियाशीलता नहीं होती, वास्तविक उद्यमशीलता नहीं होती है। होने की बात छोड़िए हम इन गुणों का तिरस्कार करते हैं, उपहास करते हैं। जैसे हम, वैसा हमारा समाज, वैसे हमारे व्यापारी व उद्योगपति, वैसे हमारे जन प्रतिनिधि, वैसे हमारे नौकरशाह और वैसे ही हमारे नीतिनिर्माता।

    हमारे अंदर स्मार्ट सिटी के प्रति नशा इसलिए सवार है क्योंकि हम अपने अंदर पाश्चात्य देशों की तरह साफ सुथरे चमचमाते शहरों व जीवन शैली को रेडीमेड तरीके से जीना चाहते हैं। स्मार्ट सिटी के बारे में हमारी कल्पना है कि अचानक हमारे शहरों को अमेरिका का न्यूयार्क, इंग्लैंड का लंदन, फ्रांस का पेरिस, आस्ट्रेलिया का सिडनी बना दिया जाएगा। हमें लगता है कि ऐसे शहर बाजार से रेडीमेड खरीदे जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर यह जितनी कवायद हो रही है, वह बाजार से रेडीमेड स्मार्ट सिटी खरीद कर कहीं रख देने जैसी ही कवायद है। विश्वास कीजिए हमारे स्मार्ट सिटी भी सड़कछाप, सतही व टपोरी टाइप ही होगें।

    इस लेख पर कुछ बात हुई हमारी अपनी स्मार्टनेस पर। हमारे प्रस्तावित स्मार्ट सिटीज पर बात श्रंखला की अगली कड़ी में। 

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  • स्त्री का शरीर व शरीर के अंग भड़काऊ नहीं होते, स्तन व योनि जैसे यौनांग भी नहीं

    सामाजिक यायावर

    शुचिता के नाम पर, संस्कार के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, शालीनता के नाम पर, सौंदर्य के नाम पर स्त्रियों के पहनावे आदि पर सवाल खड़े करना बहुत अधिक आम बात है। यहां तक कि बलात्कार, छेड़खानी व बदतमीजी आदि का ठीकरा भी स्त्री के पहनावे पर ही फोड़ दिया जाता है।

    बकवास, कुतर्क, मानसिक विकृति, वैचारिक विकृति व बेहूदगी के आवेश/आवेग में कहा कुछ भी जाए लेकिन यह एक तथ्य है कि यदि कोई पुरुष स्त्री को भोग्या के तौर पर नहीं देखता है तो उसके सामने यदि स्त्री निर्वस्त्र भी खड़ी है तो उस पुरुष में कामवासना का भाव नहीं आएगा। वह स्त्री के शरीर को एक साधारण वस्तु के रूप में सहजता से ही स्वीकारेगा।

    जब बचपन से ही लड़कों के अंदर लड़की को यौन रूप से पुरुष के द्वारा भोग्या और लड़कियों के अंदर खुद को यौन भोग्या माने जाने के रूप में जबरन ठूंस दिया जाता है। तो लड़के की मानसिक कंडीशनिंग लड़की को भोग्या के रूप में देखने की और लड़की की मानसिक कंडीशनिंग खुद को भोग्या के रूप में देखने की हो जाती है। बहुत गहरे अंदर अवचेतन में यह कंडीशनिंग पैठ बना लेती है और मन के भावों व विचारों को नियंत्रित करने लगती है।

    स्त्री के पहनावे आदि की बात की जाती है। किंतु जिनको स्त्री को भोग्या के रूप में देखना होता है वे पूरे कपड़े पहने स्त्री को भी ऐसे देखते हैं जैसे कि कपड़ों को भेदकर स्त्री का हर अंग देख लेगें और पकड़ कर भंभोड़ डालेंगें। इसको समझने के लिए के लिए बहुत बड़ी बहस की जरूरत नहीं है, सहजता से समझा जा सकता है। 

    स्त्री के स्तन जो ब्रा व ब्लाउज से ढके रहते हैं, ऊपर से पल्लू रहता है तब भी देखने वाला पुरुष ऐसे देखता है जैसे सबकुछ दिख रहा है। स्तनों को मसलने तक की कल्पनाएं कर लेता है। ब्रा, ब्लाउज व पल्लू आदि की बात छोड़िए। स्त्री यदि रजाई से ढकी भी लेटी हो और उसका कोई अंग न दिख रहा हो, केवल पुरुष को यह मालूम पड़ जाए कि रजाई के अंदर स्त्री है तब भी उसके सारे अंगों की कल्पना वैसे ही करेगा जैसे कि सामने देख रहा हो। सारे यौनांगों की कल्पनाएं कर डालेगा। स्त्री पैंटी पहने होगी, पैंटी के ऊपर सलवार या पैंट या साड़ी या लहंगा या कुछ और। लेकिन देखने वाला पुरुष स्त्री द्वारा पहने गए दो तीन परतों के कपड़ों को भेदकर भी योनि व चूतड़ों को देखने और भभोड़ने की कल्पना कर लेता है।

    यदि स्त्री के यौनांग पुरुष में कामुकता पैदा करते हैं तो एक नवजात बच्ची की योनि के द्वारा या एक बहुत वृद्ध महिला के अंग भी कामुकता पैदा करने चाहिए। किशोर व युवा उम्र की स्त्रियों के अंगों से कामुकता पैदा होती है ऐसा क्यों?

    यदि स्तन व योनियां पुरुष में कामुकता पैदा करती हैं तो गाय, भैंस, बिल्ली, बकरी, भेंड़, कुतिया, गदही, घोड़ी, हथिनी, ऊंटनी आदि पशुओं की मादाओं के पास भी स्तन व योनियां होती हैं और ये मादाएं बिना कपड़े पहने खुलेआम घूमती रहती हैं, तब पुरुषों में कामुकता क्यों नहीं पैदा होती है जबकि इन पशु-मादाओं की योनि की बाहरी बनावट लगभग मनुष्य स्त्री की योनि के जैसी होती है। 

    पुरुष अपनी बकरियों, भैंसों, गायों, भेड़ों, घोड़ी, गदही, ऊँटनी आदि को पशु पुरुष के पास गर्भाधान के लिए लेकर खुद जाता है, पशु उसके सामने ही यौन क्रिया करते हैं इसके बावजूद पुरुष के अंदर बकरी, भैंस, गाय, भेंड़, गदही, घोड़ी आदि से सेक्स करने की इच्छा क्यों नहीं पैदा होती है जबकि उसकी आंख के सामने ही पशु मादा की योनि में पशु पुरुष अपने शिश्न को प्रवेश कराता है, यौन क्रिया करते हुए योनि के अंदर वीर्यपात करता है।   

    मैं ऐसे कई आदिवासी समाजों से मिल चुका हूं जहां आज भी स्त्रियां अपने स्तनों को नहीं ढकती हैं। उन समाजों के पुरुषों के अंदर तो स्त्री के स्तन देखकर कामुकता या वासना नहीं पैदा होती है। आदिवासी समाज में बलात्कार नहीं होते हैं। आदिवासी समाज में छेड़खानी नहीं होती है। जबकि स्त्री तो अर्धनग्न रहती है। स्त्री पुरुष दोनो दारू पीते हैं। स्त्री अर्धनग्न, स्त्री पुरुष दोनो दारू के नशे में लेकिन फिर भी नहीं बहकते हैं, बलात्कार नहीं होते हैं, यौन छेड़खानी की बेहूदीगियां नहीं होती हैं। जो पुरुष स्त्री को भोग्या के रूप में न देखकर अपने ही जैसे मनुष्य के रूप में देखता है उसको क्या फर्क पड़ता है कि स्त्री ने कपड़े पहने हैं या नहीं पहने हैं।

    वास्तविक तथ्य तो यही है कि वासना मानसिक होती है। वासना किसी शारीरिक अंग के आकार प्रकार पर निर्भर नहीं होती है। दरअसल पुरुष के द्वारा स्वयं की वासना कामुकता के लिए स्त्री को गुलाम बनाने या प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है। यदि जरूरत है तो खुद के अंदर स्त्री को अपने जैसा ही मनुष्य स्वीकारने की, स्त्री के स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकारने की।  

    स्त्री को यौन भोग्या के रूप में देखना, स्त्री शरीर के प्रति कामुक बने रहना मानसिक यौन विकृति है। वैसे ही जैसे मानसिक यौन विकृत पिता अपनी पुत्री व भाई अपनी बहन से संभोग करता है। हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं भले ही इन घटनाओं के सच को दबा दिया जाता हो।

    मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों को यह लगता है कि स्त्री के अंग स्तन व योनि कामुकता बढ़ाते हैं उन लोगों को बकरी, कुतिया, घोड़ी, गदही, भेंड़, भैंस व गाय आदि के साथ भी यौन क्रिया करना चाहिए। योनि ही तो है क्या फर्क पड़ता है किस प्रजाति के जीव की है। सभी योनियां चमड़ी, नसों व धमनियों आदि से ही तो निर्मित होती है। 

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  • दिल्ली जिंदा लाशों का मरता हुआ जहरीला शहर है

    सामाजिक यायावर

    लगभग 11 वर्ष पूर्व सन् 2005 की बात है। मैं दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में एक वैज्ञानिक मित्र के यहां अतिथि था। पास के बाजार में गया हुआ था। वहीं एक व्यापारी के यहां अचानक ही चर्चा शुरू हो गई, चर्चा को मोड़कर मैं पानी पर ले आया। मेरे अतिरिक्त चार-पांच लोग थे, सभी अमीर व पढ़े लिखे, करोड़ों का कारोबार करने वाले लोग।
     
    इन सबका कहना था कि सरकार कुछ नही करती। इनका मानना था कि पानी के समाधान के लिए धरती के अंदर खूब गहरे से पानी निकाल लाने वाली मशीनों का इंतजाम होना चाहिए। यदि ऐसी मशीने नहीं हैं तो ऐसी मशीने खोजी जाएं। वैज्ञानिक व इंजीनियर किसलिए हैं। तो यह थी इन लोगों की पानी के मुद्दे पर समझ।
    जबकि बहुत गांवों के गरीब व अनपढ़ लोग अपने छोटे छोटे प्रयासों से धरती के अंदर पानी की मात्रा बढ़ा रहे थे, पानी पैदा कर रहे थे।
     
    दिल्ली जो दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। जहां पेड़ पौधे वैसे भी न के बराबर हैं। वहां के लोग हर साल पेड़ों को छटवाते हैं, डालें कटवाते हैं वह भी केवल इस बहाने से कि बिजली का तार गुजरता है।
     
    पेड़ों को काटने के इस संगठित काम को अंजाम देती है दिल्ली महानगरपालिकाएं। दिल्ली महानगरपालिकाएं हर साल पेड़ काटती व छाटती है। दिल्ली में तो ऐसे ऐसे लोग हैं कि यदि नगरपालिका उनके इलाके में पेड़ काटना भूल जाती है तो दबाव डाल कर पेड़ कटवाते हैं।
     
    मरते हुए शहर को आखिर कब तक देश की राजधानी के तौर पर घसीटा जा सकता है। बिना तैयारी के किए जाने वाले आड-इवेन जैसे अदूरदर्शी प्रचार टोटकों से किसी मुर्दा शहर को जीवित नहीं किया जा सकता है। तभी तो मरते हुए जहरीले शहर के लोग आड-इवेन के नियम की काट के तौर पर दो-तीन सप्ताहों में ही 60 हजार नईं कारों को खरीद लेते हैं।
     
    भारत की राजधानी आज नहीं तो कल दिल्ली से हटनी ही है। सवाल यह खड़ा होता है कि जिस दिन दिल्ली राजधानी नहीं रहेगी उस दिन दिल्ली का आदमी करेगा क्या, क्योंकि तब तो प्रापर्टी की कीमतें आसमान की जगह जमीन छू रही होगीं तब भी कोई लेने वाला न होगा। दिल्ली का अधिकतर आदमी तो दिल्ली के राजधानी होने के कारण आसमान छूती कीमतों की प्रापर्टी व राजधानी होने के सुविधाओं को ही खा रहा है।
     
    भारत की आजादी के समय दिल्ली में सैकड़ों वाटर बाडीज थीं। उफनाती यमुना नदी थी और जंगल थे। प्रापर्टी से पैसे बनाने के लालच में वाटरबाडीज व जंगलों को नष्ट करके कंक्रीट की बिल्डिंगें खड़ी कर दी गईं। और तो और जब कुछ नहीं बचा तो यमुना नदी को भी पाटना शुरू करके बिल्डिंगें बनानी शुृुरू कर दीं।
     
    सबसे बड़ा सवाल तो भारत देश के लोगों के लिए है जिनके खून पसीने की कमाई से देश की राजधानी चलती है, कि –
    क्या किसी सभ्य देश की राजधानी इतनी ही सड़ियल व जहरीली होनी चाहिए…….
     
     
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  • वर्तमान भारत में जाति का अंत करना ही असली समाजवाद

    सामाजिक यायावर

    मेरे पिता के एक ब्राह्मण मित्र ने चमार जाति की लड़की से शादी की। पति पत्नी दोनो लड़ते झगड़ते व प्रेम करते हुए संतानों को पालते पोषते एक दूसरे के साथ आर्थिक विपन्नता के बावजूद जीवन जीते आ रहे हैं। मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उनमें से एक ब्राह्मण व एक चमार है, जबकि मैं लगभग एक वर्ष तक उन्हीं की गाय का दूध उनके घर से लाता रहा। आंटी जी गाय की देखभाल करती थीं और गाय को दुहतीं थीं। दूध का हिसाब किताब भी आंटी जी ही रखती थीं। अंकल जी तो फक्कड़ थे उनको पैसों का हिसाब किताब कभी समझ न आया। बहुत लोग उनको समाजवादी चूतिया कहते रहे, आज भी वही भाव रखते हैं भले ही मुंह से कहें नहीं। वर्षों बाद जब मैं बारहवीं कक्षा में पहुंचा तब अचानक किसी चर्चा के दौरान कुछ लोगों से यह बात मालूम हुई कि उनका विवाह अंतर्जातीय विवाह है।

    मेरे अपने असल जीवन में मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो ब्राह्मण या शूद्र जाति के हैं और उनका पति/पत्नी शूद्र या ब्राह्मण है। एक-आध अपवादों को छोड़कर उनमें से किसी ने बहुत गहरी साजिश या ऊंचे दर्जे की महानता के कारण शादी नहीं किया। जानपहचान हुई, प्रेम हुआ और माता पिता परिवार को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह को धरातल में उतार लाए। माता पिता को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह करना सहज घटना है, अपनी जाति में भी प्रेम विवाह करने पर भी ऐसा झेलना पड़ता है।

    मैं उन ब्राह्मणों को बहुत आदरणीय मानता हूं जिन्होंने अपनी शादी शूद्र के साथ की और उनके परिवार ने शूद्र को अपना दामाद या बहू स्वीकार किया। मैं उन शूद्रों को क्रांतिकारी मानता हूं जिन्होंने ब्राह्मणों से घृणा करने की बजाय उनको प्रेम करना सिखाया और पारिवारिक संबंधों की स्थापना की। ये भले ही छिटपुट घटनाएं हों लेकिन ये ही वे लोग हैं जो जाति का अंत करने जैसे महा-सामाजिक-आंदोलन के पथबंधु हैं।

    जाति का अंत घृणा, तिरस्कार, उपेक्षा, प्रतिक्रिया आदि से नहीं बल्कि प्रेम, सहजता व सौहार्द से ही हो सकता है। हम माने या न माने लेकिन यह कटु यथार्थ है कि जाति का अंत सहज व प्रेमपूर्ण अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों से ही हो सकता है।

    जो लोग यह दावा करते नहीं अघाते कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित दास व्यवस्था न होकर कर्म/व्यवसाय आधारित महान सामाजिक व्यवस्था थी। तो संस्कृति व महानता के ये दावेदार लोग अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों को क्यों नहीं पूरे जोरशोर से प्रोत्साहित व प्रयोजित नहीं करते हैं क्योंकि विज्ञान, उद्योग, लोकतंत्र व बाजार आदि ने तो कर्म/व्यवसाय के मायने व परिभाषाएं ही पूरी तरह से बदल दी हैं।

    समाज का विकास व सामाजिक समाधान समाज के लोगों के आपसी सौहार्द व प्रेम से ही संभव है। किसी सभ्य व विकसित समाज में जो बुरा था/है उसे ईमानदारी व खुले मन से स्वीकारते हुए समझदारी के साथ बुराई को तिलांजलि दे देना ही उचित रहता है।

    जाति व्यवस्था ने जितना नुकसान किया है उसका हिसाब किताब किया जाए तो हजारों वर्षों तक सरकारी व प्राइवेट नौकरियों व हर स्तर के शैक्षणिक संस्थानों में 70% से अधिक आरक्षण भी कम पड़ जाएगा। लेकिन यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आपस में प्रेम व सहज भाव से वैवाहिक संबंध स्थापित करने लगे तो अगली पीढ़ी से ही जाति का अंत दिखना शुरू हो जाएगा।

    हम जाति नहीं मानते हैं जैसे फर्जी बातों व नारों से जाति का अंत कभी नहीं होगा, उल्टे अंदर की टीस व प्रतिक्रिया और बढ़ती जाएगी। समाज किसी भी राजनैतिक दल, धर्म व सरकार आदि से बहुत बहुत अधिक बड़ा होता है। जाति का अंत किसी धर्म, राजनैतिक दल या सरकार के बूते की बात नहीं। जाति का अंत करने का निर्णय समाज को लेना चाहिए और आज नहीं तो कल लेना पड़ेगा ही।

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  • जाति-व्यवस्था और राजनीति

    “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”
    साभार- सामाजिक यायावर की किताब (पृष्ठ संख्या 260-261)
    www.books.groundreportindia.org

    हमें एक बात समझने का प्रयास करना होगा कि भारत में लोकतंत्र ठीक से स्थापित हो पाता, इसके पहले ही लोकतंत्र को भारत के लोगों ने ही उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। शोषक जातियों ने राजतंत्र व कबीलातंत्र खत्म होते ही आजादी के बाद भरपेट मलाई खाने में खुद को व्यस्त किया और भ्रष्टाचार की शुरुआत करके उसे नए आयाम, नयी दिशायें व नयी ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया।  यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो भारत में भ्रष्टाचार की उत्पत्ति नहीं होती।  जाति-व्यवस्था के कारण परंपरा में ही शोषण करना और शोषितों के पुरुषार्थ का हक येनकेन प्रकारेण अपने पास ही रखना, सिखाया गया। यही सामाजिक अनुकूलन 1947 की राजनैतिक आजादी के बाद भ्रष्टाचार का प्रमुख आधारभूत कारक बना। राजनैतिक आजादी के बाद संवैधानिक-आरक्षण मिलने के कारण शोषित जातियाँ हजारों सालों के लगातार भीषण व घिनौने शोषण के बाद पहली बार, खुद को कुछ कुछ मनुष्य जैसा समझने के युगांतर नशे में कई दशक तक जीतीं रहीं। तब तक शोषक जातियों ने राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक व शैक्षणिक सत्ता की खूब मलाई खायी, खूब भ्रष्टाचार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास लगातार कमजोर हुआ।

    समय के साथ जब शोषित जातियाँ खुद को कुछ कुछ मनुष्य समझने के युगांतर नशे से बाहर आयीं। तो उन्होंने राजनैतिक सत्ता में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू की और संख्याबल के कारण धीरे-धीरे शोषित जातियाँ राजनैतिक सत्ता प्राप्ति का आधार बनती गयीं। जब तक शोषित जातियाँ शोषक जातियों के लिए  राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति में पिछलग्गू रहीं, तब तक शोषक जातियों को असुविधा नहीं हुई।  उनको समाज में, देश में, व्यवस्था तंत्र आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं दिखा, या यूं कहा जाए कि भयंकर रूप से हो रहे भ्रष्टाचार को देखने की आवश्यकता नहीं लगी।

    1947 की राजनैतिक आजादी के बाद, शोषक जातियों ने शोषित जातियों को अपना पारंपरिक दास मानते हुए उनको राजनैतिक सत्ता से दूर रखा।  संवैधानिक आरक्षण के कारण जब शोषित जातियों के लोग सरकारी तंत्र में प्रवेश करने लगे और राजनैतिक सत्ता के महत्व को समझने लगे तब शोषक जातियों ने शोषित जातियों को बरगला कर अपना पिछलग्गू बनाकर राजनैतिक सत्ता की मलाई का भोग किया। किंतु समय के साथ-साथ ज्यों ज्यों राजनैतिक समझ आने के कारण जब शोषित जातियों ने अपनी राजनैतिक ताकत पहचान कर राजनैतिक सत्ताओं में अपनी सीधी व स्पष्ट दावेदारी पेश करनी शुरु की;  त्यों त्यों शोषक जातियों को व्यवस्था तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। शोषक जातियों को देश में सामाजिक परिवर्तन और ईमानदारी की आवश्यकता भीषण रूप से महसूस होने लग गयी और समय के साथ राजनैतिक व सामाजिक क्रांति की भीषण आवश्यकता की बातें होने लगीं। 

    शोषक जातियों को जाति-व्यवस्था नासूर व सडांध लगने लगी और जातिविहीन समाज की आवश्यकता दिखाई पड़ने लगी। सामाजिक परिवर्तन की लंबी लंबी बातों की आवश्यकता पड़ने लगी। जब तक शोषक जातियाँ आजाद भारत में राजनैतिक सत्ता की मलाई खातीं रहीं;  तब तक उन्हें भारतीय व्यवस्था तंत्रों में हजारों वर्षों से गहरे से व्याप्त न तो भ्रष्टाचार दिखा और न ही भारत की 1947 की राजनैतिक आजादी झूठी लगी।  किंतु ज्यों ज्यों शोषित जातियों ने राजनैतिक सत्ताओं में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु की और मलाई में अपने हिस्से की दावेदारी पेश करनी शुरू की;  शोषक जातियों को भारत की आजादी झूठी लगने लगी और तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ और इन्हीं के ही इर्द-गिर्द घूमने वाले तत्वों आदि की लिखापढ़ी वाली तथाकथित ईमानदारी तक जबरन लोगों के दिलो दिमाग को संकुचित कर दिया गया।  जबकि भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ आदि तत्वों जैसे अति-संकुचित दायरे में रखकर बिलकुल भी नहीं समझा जा सकता।  न ही इन तत्वों की शुद्धता के ढकोसलों से सामाजिक परिवर्तन ही किया जा सकता है और न ही इन ढकोसलों से भ्रष्टाचार ही समाप्त किया जा सकता है।

    भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनाने या लागू करने से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलाने से या धरना करने से भ्रष्टाचार नहीं खतम होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज की विशेषाधिकृत जातियों का लगभग हर आदमी करप्ट है, और इस आदमी को भ्रष्ट बनाया “जाति-व्यवस्था” ने। भारतीय समाज में व्याप्त कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरियों में एक तत्व यह भी है, कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है;  और अधिकतर “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” को स्थापित व महिमामंडित करने पर ही आधारित है। इसीलिए समाज की मानसिकता को मनचाही दिशा में अनुकूलित करने के लिए कोई भी तर्क व परिभाषाएं तामझाम करके स्थापित की जा सकती हैं।  इसी चरित्र ने भ्रष्टाचार को संकुचित करने वाली परिभाषाएं गढ़ने में सरलता प्रदान की। जाति-व्यवस्था ही भारत में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार की मूलभूत जनक है और जाति-व्यवस्था सबसे हिंसक सामाजिक-तानाशाही है – यह समझने व स्वीकारने का भ्रूण भी नहीं उत्पन्न होने दिया और भ्रष्टाचार की प्रायोजित संकुचित परिभाषा में ही जड़ कर रख दिया।

    सामाजिक जड़ता भारतीय समाज का मूलभूत चरित्र है।  बहुत लोगों को एक बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है कि भारत में तंत्र सफल है या सफल जैसा कुछ है, तभी आजादी के बाद इतने दशकों के बाद भी तंत्र चल रहा है और समाज की स्वीकार्यता के साथ चल रहा है।

    जो जैसा प्रायोजित हो गया उसका वैसे ही बिना प्रासंगिकता मूल्यांकन के चलते जाना, तंत्र के प्रति समाज की स्वीकार्यता न होकर वास्तव में सामाजिक जड़ता होती है। यह सामाजिक जड़ता वाला चरित्र हजारों सालों की वीभत्स व विद्रूप जाति-व्यवस्था का उत्पाद है, जिसमें जन्म-आधारित तिरस्कारों, शोषणों व दासता को दैवीय दंड-विधान मानकर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है। या जन्म-आधारित व्यवस्था के आधार पर स्वयं का दूसरों से श्रेष्ठ, पूजनीय व गौरवशाली होना दैवीय पुरस्कार मान कर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है।

    जाति-व्यवस्था से मुक्त होते ही भारतीय समाज के शोषक व शोषित दोनों ही प्रकार के वर्गों की जातियों में चारित्रिक व गुणात्मक परिवर्तन हो जायेगा। भारत, भारत के लोग व भारतीय समाज सभी वास्तव में स्वतंत्र होगें और खुली हवा में सांस ले पायेंगें। जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना भारत में कभी भी चारित्रिक बदलाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना, भारत में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समाधान व विकास की बात करता है तो वह या तो नासमझ है या सामाजिक धोखा देता है, क्योंकि यह बिलकुल ही असंभव है।

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  • रोहित वेमुला को मेरी श्रद्धांजलि – आखिर कितनी मौतों के बाद हम सामाजिक संवेदनशील व ईमानदार होगें

    सामाजिक यायावर

    तब तक हम जाति के घिनौनेपन से नहीं लड़ सकते हैं और परंपरा में अगली पीढ़ियों के बच्चों की हत्याओं या आत्महत्याओं द्वारा समाज की विभूतियों को खोते रहेंगें। शाब्दिक, तात्कालिक व क्षणिक भावुकता से कुछ देर के लिए अपने बच्चों की हत्याओं व आत्महत्याओं पर आंसू बहा देने भर से कोई समाधान नहीं होने वाला। वास्तव में जाति-व्यवस्था ही हमारे समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है।

    जब तक हम यह बिना किसी लाग लपेट के यह नहीं मानेंगें कि भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी और है। क्योंकि परंपरागत ऐसी घिनौनी गुलामी जिसमें गुलाम स्वतः ही अपनी पैदाइश से ही अपने ही माता-पिता, अभिभावकों व रिश्तेदारों द्वारा मानसिक रूप से स्वयं को गुलाम मानने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। कभी भी किसी भी परिस्थिति में कर्म आधारित व्यवस्था हो ही नहीं सकती है। कोई भी बेहतर सामाजिक व्यवस्था बिना स्वयं उस व्यवस्था में ही निहित घिनौने बीजों के जाति व्यवस्था जैसी जन्म घिनौनी व धूर्त सामाजिक व्यवस्था की परिणति तक पहुंच ही नहीं सकती।

    भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए, हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है।

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  • भाषा

    सामाजिक यायावर

    जोनाथन की माता जी मतलब हमारी साली साहिबा ने हमसे कहा कि मैं जोनाथन से हिंदी में बात किया करूं ताकि उसके मस्तिष्क में हिंदी के शब्द भी उसकी अपनी सहज भाषा के रूप में स्थापित होना शुरू हों। जोनाथन अभी भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते हैं लेकिन हम लोगों की बातें समझने लगे हैं और बिना भाषा के ही हमारी बातों का प्रतिउत्तर देते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगा उनकी सहजता को देखकर कि उन्होंने अपने पुत्र के लिए हिंदी भाषा जानने की इच्छा मुझसे जाहिर की।

    मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई क्योंकि दिखावटी व खोखले राष्ट्र व भाषा गौरव के कारण मैं उनको ईमानदारी से अपने समाज की भाषा-कुंठा की असलियत बता नहीं पाया। आखिर कैसे बताता कि हमारे देश भारत में अपने उन बच्चों को देखकर माता पिता बलइयां लेते हैं जो बच्चा हिंदी न जानने का ढोंग करता है और अमेरिकन स्टाइल में अंग्रेजी बोलने का बेढंगा ड्रामा करता है। उन रद्दी स्कूलों की फीस बहुत ऊंची होती है जिनकी खासियत सिर्फ यह होती है कि वे स्कूल में और घर में हिंदी की जगह अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं।

    मैंने अपने जीवन में बहुत सारे समुदायों से मिला हूं, बहुतों के साथ काम भी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है लेकिन हिंदी भाषी लोगों के इतना भाषा कुंठित किसी समुदाय को नहीं देखा। भारत के अंदर भी उड़िया, बांग्ला, तमिल, तेलगू, मलयाली, कन्नड़, पंजाबी किसी समुदाय को देखिए कोई भी उतना भाषा कुंठित नहीं है जितना कि हिंदी भाषी समुदाय भाषा कुंठित है। पढ़ा लिखा तरक्की किया माना जाने वाला हिंदी भाषी समुदाय तो अपने बच्चों को हिंदी का प्रयोग न करने के लिए प्रोत्साहित करता है। खुद हिंदी भाषी ही खुद को दोयम दर्जे का मानता है।

    चलते-चलते यह भी बताना चाहूंगा कि विदेशों में लोग हिंदी या संस्कृत इसलिए नहीं सीखना चाहते कि इन भाषाओं में कोई दिव्यता है या महानता है।हमारे समाज की भाषागत कुंठा का स्तर यह है कि दिव्यता व महानता की फर्जी या तोड़े-मरोड़े तथ्यों के साथ उदाहरणों की बकवास पोस्टें व खबरें सोशल मीडिया व मुख्य मीडिया में सुर्खियों के साथ देखने को मिलती रहतीं हैं।

    दरअसल सच तो यह है कि पाश्चात्य देशों के लोगों को कई भाषाओं को जानने समझने का शौक होता है। वे अपने पूरा जीवन भाषाएं सीखने का प्रयास भी करते हैं। मैं आजतक जितने भी पाश्चात्य देशों के लोगों से विदेशों में मिला हूं वे चाहे मेरे मित्र हों या रिश्तेदार या जानपहचान वाले सभी बिना अपवाद कई कई अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के जानकार हैं।

    हिंदी व संस्कृत भाषा को भी जानने वाले विदेशियों की संख्या तो बहुत ही कम है। जिस भाषा के प्रयोग खुद उस भाषा के मूल समुदाय के लोग ही करने में दोयम दर्जे का महसूस करते हों उस भाषा को प्रतिष्ठित कैसे किया जा सकता है।

    अभी मेरे कोई संतान नहीं है लेकिन जब कभी मेेरे संतान होगी। मैं ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करूंगा कि शैशवावस्था से ही मेरी संतान हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच, इटैलियन, जापानी व डच आदि भाषाओं को अपनी सहज भाषाओं के रूप में जानना पहचानना सीखे। क्योंकि इन भाषाओं को जानने वाले लोग मेरे निकट आस्ट्रेलियन परिवार में मौजूद हैं। कुछ निकट रिश्तेदार तो ऐसे भी हैं जो 15-20 अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के जानकार हैं। और तो और मैं उसको अपने गांव की गवांरू भाषा, पूर्वजों की भाषा राजस्थानी, मित्रों की भोजपुरिया भाषा व छत्तीसगढ़ की गोंडी आदिवासी भाषाओं को सीखने का भी बंदोबस्त करूंगा।

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  • पंचायत चुनावों में पढ़ाई को अनिवार्य बनाना लोकतांत्रिक व मौलिक अधिकारों का हनन

    सामाजिक यायावर


    साभार – http://panchayatkhabar.com

    स्कूली पढ़ाई किसी व्यक्ति की समझदारी का मापदंड नहीं हो सकती है। निरक्षर व्यक्ति भी बहुत अधिक समझदार व बहुत बेहतर जनप्रतिनिधि हो सकता है। बहुत ऊंची डिग्रीधारी व्यक्ति भी बहुत धूर्त जनप्रतिनिधि हो सकता है। पंचायती चुनावों में ही नहीं किसी भी प्रकार के जनभागीदारी वाले चुनावों में देश के हर आदमी को चुनाव लड़ने का हक वैसे ही होना चाहिए जैसे कि देश के हर आदमी को मतदान देने का हक है।स्कूली शिक्षा को बहुत अधिक तरजीह देने जैसी मूर्खता या अहंकार करने का सामाजिक दंश देश के लोगों को देने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है।

    लोग स्कूल जा रहे हैं, समय के साथ साथ अपने आप सभी साक्षर लोग ही चुनाव लड़ेगें। यदि किसी क्षेत्र के लोग किसी अनपढ़ को अपना जन प्रतिनिधि नहीं देखना चाहते हैं तो उनके पास अनपढ़ व्यक्ति को मतदान न करने का विकल्प सुरक्षित है। यह लोगों को तय करने दीजिए कि उन्हें अपना जन प्रतिनिधि निरक्षर चाहिए या साक्षर, ऐसा करने का उनके पास अधिकार भी है। या फिर देश के लोगो से मतदान का अधिकार भी हड़प कर लीजिए।

    भारत देश को चलाने वाले सरकारी कर्मचारी, अधिकारी व नौकरशाह ही हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक हर स्तर पर कार्यकारी अधिकार इन्हीं लोगों के पास होते हैं। ये लोग पढ़े लिखे होते हैं, ऐसा माना जाता है कि बहुत ही अधिक कठिन परीक्षाओं को पार करके नौकरी पाते हैं। फिर भी इनमें से अधिकतर लोगों ने देश व समाज की हालात खराब कर रखी है, भ्रष्टाचार को समाज व जीवन का मूलभूत अंग बना दिया है। पूरी चालाकी के साथ हर बात का ठीकरा नेताओं के सिर पर फोड़ देते हैं जबकि सारे कार्यकारी अधिकार इन्हीं सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के पास होते हैं।

    देश के किसी विभाग की बात कीजिए, सभी में खूब पढ़े लिखे लोग नीचे से लेकर ऊपर तक बैठे हैं। लेकिन सामंती अधिकार, अनापशनाप वेतन व सुविधाओं को भोगने के बावजूद ये पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारी व अधिकारी देश के लोगों के प्रति न तो संवेदनशील होते हैं और न ही जिम्मेदार होते हैं।

    नदियों को मार दिया है, प्रदूषण की भयंकर हालत कर रखी है, हर स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को बाजारू बना दिया है। गांवों को घटिया, पिछड़ा व अजागरूक बता कर खतम करने का कुचक्र रचा गया है। अब ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए पंचायती चुनावों को लड़ने के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बनाया जा रहा है।

    पहले इस बात पर इमानदारी से खुली चर्चा तो की जाए कि पढ़े लिखों ने देश को क्या दिया और गांव के गवांरो ने देश को क्या दिया है। यदि ईमानदारी से चर्चा की जाएगी तो बिलकुल साफ दिखेगा कि गांव के गवारों ने देश को बहुत कुछ दिया है। यहां तक कि पढ़े लिखों व शहरी लोगों की जरूरतों की पूर्ति का आधार भी गांव व गवांर ही हैं।

    उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गये निर्देश पर रोक लगाने के लिए संसद को चर्चा करनी चाहिए। कानून संसद बनाती है। देश का संविधान उच्चतम न्यायालय ने नहीं बनाया है। देश  के मालिक व दिशा निर्देशक देश के आम लोग हैं न कि कोई सरकार या कोई न्यायालय। संरकार और संसद को जनहित में निर्णय लेना चाहिए।

  • किताब की प्रस्तावना :: देश व समाज का निर्माण मनुष्य का दायित्व है

    मनुष्य के बिना देश हो ही नहीं सकता, और जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहां देश होगा ही होगा। मनुष्य बड़ा है देश से, क्योंकि मनुष्य बनाता है देश। देश की सत्ता, मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही बनाता व निर्धारित करता है। मनुष्य है तो देश है, बिना मनुष्य के देश का कोई अस्तित्व नहीं। यही सहज सामाजिक तथ्य है, शेष तर्क व परिभाषायें राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने वर्तमान अस्तित्व के लिये तोड़मरोड़ कर उनके अपने निहित-स्वार्थों के लिये थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिये देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है जिसका निर्माता मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़ गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की किताबों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा।

    यही बदलाव का दिन वास्तविक व व्यापक परिवर्तन का दिन होता है। सत्ता को चलानें वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है, इस यथार्थ को समझना व चारित्रिक रूप से जीना ही मनुष्य का लोकतांत्रिक होना है। मनुष्य की इस लोकतांत्रिकता के द्वारा ही उसका देश लोकतांत्रिक बनता है। किसी देश को उस देश को बनाने वाले मनुष्य लोकतांत्रिक बनाते है, दूसरे शब्दों में लोकतांत्रिक मनुष्य ही देश को लोकतांत्रिक बनाता है, न कि देश का कानून, संविधान व सत्ता प्रणाली। सत्ता प्रणाली राजतंत्रीय होते हुये भी देश व देश का मनुष्य लोकतांत्रिक हो सकता है।

    मनुष्य देश का निर्माण करता है। देश का निर्माण धार्मिक समूहों, राजनैतिक समूहों व आर्थिक तंत्रों आदि पर न तो निर्भर करता है और न ही इन सब से देश निर्माण की अपेक्षा ही की जानी चाहिये।

    देश निर्माण मनुष्य की जिम्मेदारी है। धार्मिक समूह, राजनैतिक समूह व आर्थिक तंत्र आदि मनुष्य द्वारा निर्मित देश के विभिन्न अवयव होते हैं, जिनको वर्तमान प्रासांगिकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। मनुष्य देश निर्माण की प्रक्रिया में विभिन्न अवयवों का निर्माण करता है, फिर उन्हें परिवर्तित करता है। अवयवों के निर्माण व परिवर्तन की प्रक्रिया में वह सीखता है और बेहतर निर्माता बनता है। और यही बनाना और सीखना ही मूलरूप में लोकतांत्रिक होना होता है…. यही है लोकतंत्र का मूलभाव।

    देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचनात्मकता है। इसलिये जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।

    सत्ताओं में व्यापक-सामाजिक-परिवर्तन का कोई सामाजिक-अवतार नहीं होता
    सामाजिक-अवतार राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम-मनुष्य के समाज में होते हैं

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भीसामाजिक-अवतार नहीं होता जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। सामाजिक-अवतार तो आम समाज से अंकुरित व पुष्पित होते है और मनुष्य निर्मित सत्ताओं के बिना रहते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्ही तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जानें का साहस व दृष्टि हो ही नही सकती है।  इसीलिये तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते है, ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिस्थापित किये गये हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह वास्तव में आम मानव का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह होती है, जिसमें सबसे नीचे का आधार सबसे चौड़ा और सबसे ऊपर की चोटी सबसे नुकीली और सबसे कम चौड़ी होती है।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाकर व दबाये रहते हुये ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिये मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, व्यापक-समाधान की दृष्टि नही रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    विश्व में अ-आयुधनिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलकर ही हुये हैं।

    यह किताब धन, मोहकता व मीडिया आदि के प्रायोजन के कारण बड़े दिखने वाले अदूरदर्शी व तात्कालिक लक्ष्य वाले कामों की चर्चा को नहीं करेगी या अत्यधिक प्रासांगिक होने पर ही करेगी। किताब मे ईमानदार व दूरदृष्टि वाले प्रयासो की चर्चा की गई है। जिनसे वास्तव मे समाज का वास्तविक विकास हो सकता है, दिखा है, हुआ है। इनमें से लगभग सभी कामों को या तो मैने नजदीक से देखा है, या मै खुद सक्रिय रूप से भागीदार रहा हूँ। यह किताब उद्योगपति, नौकरशाह, किसान, सामाजिक-संस्था आदि के द्वार आम-मनुष्य के तौर पर किये गये कार्यों व प्रयासों की बात करती है, जिनने देश व समाज को उत्तमता की ओर बढ़ने की दिशा दी, प्रेरित किया, गति दी।

    यह किताब उन लोगों के लिये बहुत कुछ लिये हुये है, जो लोग भारतीय समाज के विकास व समाधान के लिये ईमानदार सोच व प्रतिबद्धता रखते हैं।

    यह किताब ऐसे ही मनुष्यों को समर्पित है, ऐसे ही लोगों की चर्चा करती है, जो संज्ञानता या बिना-संज्ञानता के देश के निर्माण, पोषण व उत्तमता की ओर ले जाने के लिये विचार करते हैं, प्रयास करते हैं, कर्म करते हैं।

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    द्वारा
    विवेक ग्लेंडेनिंग उमराव ‘नोमेड’
    www.nomadhermitage.groundreportindia.org