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  • ‘लोकतंत्र’, ‘साहब’, ‘जनलोकपाल’ और ‘बेरोकटोक-सत्ता-भोग’ की महात्वाकांक्षा

    सामाजिक यायावर

    ‘मेरी समझ में कुछ बातें नहीं आती हैं जैसे कि साहब यदि सच में ही ‘जनलोकपाल’ बिल लाना चाहते हैं तो लोकतंत्र का आदर क्यों नहीं करते हैं। इनके इस दावे का कि इनके अलावे बाकी सब लुच्चे लफंगें है और केवल इनकी ही पार्टी के लोग शुद्ध-बुद्ध हैं इसलिये देश की जनता को इनको पूर्ण बहुमत देना चाहिये ताकि साहब ‘जनलोकपाल’ कानून बना पावें……. में बहुत ही बेसिक नुक्श हैं, जिनकी चर्चा ‘साहब’ कभी नहीं करते हैं।

    भारत के संविधान के अनुसार तो ‘साहब’ को ‘जनलोकपाल’ कानून बनानें के लिये 362 सांसद लोकसभा में और 160 सांसद राज्यसभा में चाहिये। जो कि साहब की पार्टी केवल अपनें दम पर ले आयेगी ऐसा साहब जी के जीते जी हो पायेगा ऐसा लगता नहीं है क्योंकि 2014 इनकी पार्टी का सबसे स्वर्णिम अवसर है और इस बार इनकी पार्टी चुनाव ही लड़ रही है कुल 350 सीटों में, यदि साहब की पार्टी सभी 350 सीटों में जीत जाती है तब भी लोकसभा में 12 लोग और और राज्यसभा में 160 सांसद कहां से लायेंगें।

    अब सवाल यह उठता है कि जब साहब अपनें दम पर ‘जनलोकपाल’ कानून बना ही नहीं सकते हैं तो क्या यह सब धींगामुस्ती खुद के लिये बेरोकटोक सत्ता का भोग करनें के लिये ही है…….

    पता नहीं क्यों ‘साहब’ की अधिकतर बातें, दावे और तर्क बिलकुल ही हजम नहीं हो पाते हैं और थोड़ी सी ही गवईं-अकल लगाते ही बातों के बताशों की तरह ढेर हो जाते हैं।

    ‘साहब’ जिस लोकतंत्र को रोज गलियाते हैं, उसी लोकतंत्र नें सिर्फ ‘साहब’ की हवाई बातों और दावों पर विश्वास करके सत्ता सौंप दी।

    ‘साहब’ को अपनीं खुद की राजनैतिक महात्वाकांक्षा से बाहर निकलकर सच में ही देश, देश के असल व बहुसंख्य समाज और देश के लोकतंत्र का आदर करना सीखना चाहिये।

  • उत्तर प्रदेश और बिहार सामाजिक व राजनैतिक चेतना के अतिवादी राज्य हैं

    0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningगांधी जी का "नील" आंदोलन की धरती बिहार थी। देश में अंग्रेजों की दासता को नकारनें का काम जिन मंगल पांडे जी नें किया था वे उत्तर प्रदेश के ही थे। एक महिला होकर भी अंग्रेजों से भीषण पंगा लेंनें वाली झांसी की रानी भी उत्तर प्रदेश की ही थीं। 

    इन दोनों राज्यों में लगभग हर जिले में ऐसे लोग मिल जायेंगें जिन्होनें समाज को शिक्षित करनें के लिये शिक्षा संस्थानों के लिये सैकड़ों/हजारों एकड़ जमीन एक झटके में बिना किसी लाग-लपेट के दान कर दी होगी।

    मैं भूदान आंदोलन की बात नहीं कर रहा हूं। ऐसे बहुत उदाहरण हैं जो कि उस समय के हैं जबकि खुद विनोबा जी को नहीं पता था कि वे कभी भूदान-आंदोलन चलायेंगें 🙂 ।

    काशीराम जी की बात को समझनें और आगे बढ़ानें वाला राज्य भी उत्तर प्रदेश ही था, जबकि काशीराम जी नें अपनें जीवन के बेहतरीन साल पंजाब जैसे राज्यों को दिये। 

    जयप्रकाश नारायण जी बिहार की धरती में अवतरित हुये थे। 

    उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में एक से बढ़कर एक राजनैतिक व सामाजिक आंदोलन हुये हैं। लालू, मुलायम, काशीराम, मायावती, नितीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह आदि जैसे राजनेताओं का उदय और ऊंचाई पर बीसियों वर्षों के जमीनी संघर्षों को लगातार करते हुये पहुंचना … इन राज्यों के दबे-कुचले समाज की सामाजिक व राजनैतिक चेतना के ही कारण हो पाया। और ये सभी राजनैतिक प्रक्रियायें "सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन" ही रही हैं। और इस यथार्थ को किसी भी तर्क/वितर्क/कुतर्क से नकारा नहीं जा सकता है। 
     

    देश में आपातकाल लागू करवानें, हजारों लोगों को महीनों जेलों में सड़वानें और फिर आपातकाल को फेंक देनें जैसी अतिवादी राजनैतिक चेतना के सूत्रधार उत्तर प्रदेश व बिहार राज्य ही थे। 

    भारत में साम्यवाद को मजबूत आधार देनें का श्रेय उत्तर प्रदेश के ही जिले "कानपुर" को जाता है।

    उत्तर प्रदेश व बिहार के समाज नें सामाजिक व राजनैतिक चेतना को भी प्राथमिकता दी बाकी अन्य राज्यों की तरह एनकेन प्रकारेण बाजारीकरण  के कथित विकास के पीछे अंधे-भक्तों की तरह नहीं भागे। 

    सामाजिक व राजनैतिक चेतना के अतिवादी स्तर के कारण इन दोनों राज्यों में राजनीति करना और राजनैतिक सत्ता प्राप्त करना आसान नहीं है। 

    वैसे लोकतंत्र में राजनैतिक बकैती और बकलोली करनें का भी अपना अलग मजा है। किंतु हम तो आपको भारत में राजनैतिक चेतना के खिलाड़ी तब मानेंगें जब आप इन दो राज्यों में सम्मानजनक तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर कुछ उखा़ड़ पायें। 

    इन दो राज्यों नें अच्छों अच्छों को राजनीति करना सिखा दिया है, आपको भी सिखाया जायेगा बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के। सीखनें के पहले एक बात समझ लीजियेगा कि यहां के गांवों में लगभग हर आदमी अपनें घर में चुनाव, राजनीति और राजनैतिक परिवर्तन नाम की बकरियां बिना रस्सी के ही छोड़े रखता है लेकिन क्या मजाल कि बकरियां घर की डेहरी पार कर जायें 🙂 । 

    गांधी जी तो बता ही गये हैं कि बकरी का दूध मष्तिक के लिये बहुत लाभदायक होता है। 🙂
    भारत के दक्षिण से कुछ ऊपर में स्थित एक राज्य के लोगों की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों नें गांधी के साथ उठनें बैठनें वालों के व्यक्तिगत नामों के व्यक्तिगत-पहचान-कारपोरेट्स तो नहीं बनाये हैं लेकिन राजनैतिक-चेतना की बकरियां पालना जरूर ही खूब बढ़िया से जानते हैं।  

    चलते चलते एक बात और- उत्तर प्रदेश और बिहार के गांव आज भी लोगों का स्वागत करते हैं और सामाजिक लोगों को प्रेम करते हैं और साथ खड़े होते हैं। शुरुआत विश्वास से करते हैं किंतु एक सीमा से बाहर सामाजिक-धोखों को नहीं स्वीकारते हैं। स्वागत करना आता है तो धता बताना भी आता है। 

    सादर प्रणाम
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"
    एक गवांर जाहिल यायावर 
     

  • आदरणीय मित्रों से एक सविनय निवेदन : गंभीर लेखों के मसले पर

    0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningआदरणीय मित्रों,

    सादर प्रणाम

     

    आपके प्रेम, आपकी सक्रिय भागीदारी और मेरा उत्सावर्धन करते रहनें के लिये मैं आपका हार्दिक आभारी हूं। गंभीर लेखों के संदर्भ में मैं आप सुधिजनों के समक्ष अपना सविनय निवेदन रखना चाहता हूं, आप मेरे निवेदन पर विचार करनें की कृपा कीजिये। सादर 

     

    मैं एक मान्यता प्राप्त प्रोफेशनल जर्नलिस्ट हूं, कुछ छोटी मोटी प्रिंट व आनलाइन पत्रिकाओं का संपादक भी हूं जिसमें कि एक 120 पृष्ठ की मल्टीकलर अंग्रेजी भाषा की प्रिंट जरनल भी है जो कि गंभीर सामाजिक मसलों में गंभीर लेख व विश्लेषणात्मक रिपोर्ट्स प्रकाशित करती है। 

     

    मेरी चंद रिपोर्ट्स दुनिया की प्रतिष्ठित प्रिंट-जर्नल्स में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। मैंने UN, UNICEF, EU जैसी वैश्विक संस्थाओं को उनके कुछ वैश्विक-दस्तावेजो को बनानें में एक जर्नलिस्ट के रूप में सहयोग भी किया है और उनके द्वारा मुझे सम्मानजनक तरीके से धन्यवाद भी ज्ञापित किया गया है। 

     

    मेरे पास एक जर्नलिस्ट/संपादक के रूप में बस यही कुछ चंद छोटे मोटे अनुभव हैं और कुछ खास नहीं। मैं अभी सीख रहा हूं और संभवतः आजीवन सीखूंगा। मैं आभारी हूं जो कि आपमें से बहुत मित्रों से समय समय पर बहुत कुछ सीखनें को मिलता रहता है। 

     

    मैं आपसे कुछ विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। कुछ ऐसी बातें हैं जो कि मुझे आपसे कुछ और सीख पानें से हतोत्साहित करतीं हैं। कुछ मसले हैं जिनको कि मैं आपके समक्ष सादर प्रेषित करना चाहता हूं ताकि आपसे और बेहतर सीख पानें में मुझे हतोत्साहन नहीं महसूस हो। सादर

     

    मेरी अधकचरी समझ के अनुसार-

     

    लंबे व गंभीर लेख लिखना टीवी-चैनल्स की बाइट्स, अखबारों की हेडलाइन्स और मैगजीन्स की सुर्खियां पढ़कर/देखकर प्रतिक्रियास्वरूप चंद लाइनें लिखनें जैसा या बाइट्स लिखनें जैसा नहीं होता है या अखबारी खबर लिखनें जैसा भी नहीं होता है जिसमें घटना की सूचना भर दे देनी होती है या खबरों की हेडलाइन आदि का लिखना जैसा भी नहीं होता है। 

     

    लंबे व गंभीर लेख, लेखक लिखनें के पहले सोचता है, विचारता है, अध्ययन करता है, तथ्यों की पड़ताल करता है …. फिर लिख पाता है। जो नये लेखक होते हैं उनको लिखनें में बहुत समय लगता है, किंतु जो लोग लंबे समय से लिख रहे होते हैं उनके अंदर हरसमय कुछ न कुछ चिंतन/आब्जरवेशन चलता रहता है सो लिखना तुलनात्मक रूप से बहुत ही कम समय में हो जाता है। 

     

    मेरा सविनय निवेदन जो कि मेरी अधकचरी समझ के ऊपर आधारित हैं:

    • लेख/पोस्ट का मूल विषय लेख/पोस्ट होता है न कि लेख/पोस्ट में की गयी कमेंट्स:
      आपमें से कई लोग कमेंट्स में केवल यह बतानें के लिये आते हैं कि पोस्ट का विषय क्या होना चाहिये था और अपनी कमेंट्स से मुझ पर लेख/पोस्ट के मूल-विषय को बदलनें का दबाव भी डालते हैं और लगातार बहस करते हैं। और यदि मैं उनका दबाव नहीं स्वीकारता हूं तो मुझे अहंकारी/शंखनादी आदि आदि जैसी सांस्कृतिक-गालियों से सुशोभित करते हैं।

      चूंकि आप मेरे मित्र हैं, इसलिये मेरी अधकचरी समझ का आदर करना सीखिये। मैं आपकी पोस्ट में आकर आपसे कभी नहीं कहता कि आपको क्या लिखना या क्या नहीं लिखना चाहिये …. आप भी मेरे लेखों/पोस्टों में मुझे यह न बताईये कि मुझे क्या लिखना चाहिये था।

      यदि आपको लगता है कि मेरी अधकचरी समझ बेहतर नहीं है तो आप खुद लेख/पोस्ट लिखिये ताकि मुझे भी आपसे सीखकर परिष्कृत होनें का अवसर मिल सके।

    • आप मेरे मित्र होनें के नाते या मेरे पाठक होनें के नाते मुझे किसी विषय में लेख/पोस्ट लिखनें का आदेश दे सकते हैं। और यदि मुझे उस विषय की जानकारी होगी तो मैं आपका आदेश सिर-माथे रखूंगा।
      किंतु आप जब लिखे जा चुके लेख/पोस्ट के मूल-विषय में ही प्रश्न खड़ा करते हैं तो यह आपका मुझे गाली ही देना होता है और कुछ भी नहीं। भले ही आपकी भाषा कितनी भी संतुलित क्यूं न हो। 
       
    • रचनात्मकता, रचना और रचनाकार का आदर करना भी मानवीय संवेदनशीलता का आधारभूत जीवन-मूल्य है।
      मूल-विषय के बिंदुओं में सहमति/असहमति हो सकती हैं और ऐसा होना प्रशंसनीय है किंतु मूल-विषय के औचित्य को ही नकारनें का मतलब आप रचनाकार और रचना को गाली दे रहे हैं और खुद के अहंकार को पोषित कर रहे हैं, और अपनें अहंकार के कारण दूसरों पर मानसिक हिंसा भी कर रहे हैं।
       

    जिस प्रकार के लेखों को लोग पैसे लेकर लिखते हैं उस गुणवत्ता के लेखों को मैं बिना किसी आर्थिक लाभ के लिखता हूं और कापी-राइट के बिना ऐसे ही खुला छोड़ देता हूं। जबकि कई लोग मेरे लेखों को अपनें नाम से लिख रहे हैं और बेच रहे हैं वह भी चंद पंक्तियों में कुछ हेरफेर करके, और इस श्रेणी में आने वाले लोग वे हैं जो टीपते तो मेरे लेख हैं किंतु आजतक कभी मेरे लेखों में न तो "लाइक" किये और न ही "कमेंट"। ऐसे लोगों का चरित्र का मूल्यांकन सहजता से किया जा सकता है। मुझे इन लोगों के इस प्रकार के अनैतिक-चरित्र से कोई तकलीफ नहीं है क्योंकि मेरे लिये सामाजिक-चेतना व जागरूकता महत्वपूर्ण है न कि मेरा नाम। 

    दुर्भाग्य से मैं 1992 से सामाजिक सरोकारों में प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय हूं, इसलिये मेरे लिये लेखन का लक्ष्य "लाइक" "कमेंट" "सस्ती लोकप्रियता" या "आर्थिक लाभ" आदि नहीं ही है। यदि मुझे एक भी लाइक न मिले, एक भी कमेंट न मिले तब भी मैं लिखता रहूंगा। लिखना मेरे लिये सामाजिक-प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

    सादर प्रणाम
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"

  • भैंस/गाय/बकरी का ग्रामीण-अर्थव्यवस्था से संबंध और उत्तर प्रदेश/बिहार जैसे भैंस/गाय/बकरी परिवेश वाले राज्य

    सामाजिक यायावर

    मेरे दादा (पिता के पिता) जी का देहांत नवंबर 1984 में सड़क दुर्घटना के कारण हुआ था लगभग 85 वर्ष के रहे होंगें। चूंकि मेरे माता-पिता उनके साथ गांव में नहीं रहते थे सो मेरे पिता के हिस्से में आईं हुयीं भैंसें, बकरियां, गाय और बैल आदि को मेरे दादा जी नें पिता जी के हिस्से की जमीन में काम करनें वाले अपनें पारंपरिक मजदूर परिवार को दे दिया था। 

    दादा जी के देहांत के बाद जब जानवरों को लौटानें की बात आयी तो मेरे पिता जी बोले कि हमें नहीं चाहिये जो पिताजी नें अस्थायी रूप से आपको दिया वह उनकी ओर से स्थायी-दान मान लीजिये। 

    मैं छोटा था किंतु इस घटना से मेरे मन में एक बात बैठ गई कि भैंस आदि जानवर शायद बेकार होते हैं और फिजूल का सिरदर्द भी होते हैं। चूंकि शहरी परिवेश में पला-बढ़ा इसलिये गोबर गंदी चीज होती है आदि बातें शहरीकरण वाली कथित-शुचिता नें बैठा दी।  मुझे लगता है कि ऐसे ही बहुत बालकों/किशोरों के मन में धारणायें बनतीं होगीं। 

    जब बड़ा हुआ और समाज को समझनें के लिये स्वाध्याय व समाज के लोगों के द्वारा किये जा रहे आर्थिक विकास/स्वावलंबन आदि के जमीनी प्रयासों को देखना व समझना शुरु किया, तो जो बात सबसे पहले मेरी समझ में आयी वह यह कि भैंस, गाय और बकरी भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव है। 

    मैंने देखा कि कैसे महिलायें अपनी मरी हुयी बकरी को अपनी गोद में लेकर दहाड़ें मारकर रोतीं हैं। बिहार की भीषण बाढ़ों और आग से नष्ट होते गावों में मैंने देखा कि ग्रामीण कैसे अपनी जान की बाजी लगाकर अपनें जानवरों की रक्षा करता है। 

    समय के साथ मैंने समझा कि वास्तव में भैंस/गाय/बकरी आदि भारत के करोड़ों ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि ये जानवर न हों तो करोड़ों भूमिहीन परिवारों को खाना/कपड़ा और झोपड़ी तक नसीब नहीं हो। 

    उदाहरण-

    • मेरे एक बहुत ही अच्छे व विश्वसनीय मित्र हैं। बहुत बड़े चिकित्सक हैं प्रतिदिन कई सौ मरीजों को देखते होगें, अपनी पैथोलोजी है, अपना क्लीनिक है और यह सब उनके पास देश के जानेमानें मेट्रो-शहर में है। उनकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनके एक सगे भाई एक Indian Institute of Technology (IIT) के उप-निदेशक भी रह चुके हैं और एक सगे साले-भाई Airtel Company के वाइस-प्रेसीडेंट।  उनके परिवार से बहुत लोग All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) से स्नातक/परा-स्नातक की पढ़ाई पढ़े हैं।मैंने उनसे एक बार कहा कि आजकल गांवों में गायों की डेयरीज खुलवा रहा हूं, ताकि ग्रामीणों की आर्थिक व्यवस्था आगे बढ़े। मित्र बोले कि एक गाय/भैंस मेरी ओर से और मुझे 10,000 (दस हजार) रुपये निकाल कर दिये। मैंने कहा कि यह क्या है, वे बोले कि इसे आप एक गाय या भैंस कुछ भी समझ लीजिये। मैं ठहाका मारकर हंसा, मैंने कहा कि एक अच्छी गाय या भैंस 70,000-80,000 की कीमत से शुरु होती है और कई लाख रुपये तक जाती है। मैंने उनसे कहा कि जब आप कभी गांवों जाते होगें तो जो भैंसे आपको ऐसे ही जमीन में बैठी हुयी दिखतीं हैं उनमें से बहुतों की कीमत 1 लाख रुपये से अधिक की भी हो सकती है।  

      मेरे मित्र अचंभित हुये और बोले कि मुझे बिलकुल पता नहीं था कि गाय और भैंस इतनी महंगी आती है। मैंने उनको बताया कि 10 हजार में तो अच्छी बकरी मिलती है। 

    • मेरे एक मित्र हैं लखनऊ में अपनें कामकाज से 1 लाख रुपिया महीना के लगभग आज से लगभग 10 साल पहिले कमाते थे। आजकल गांवों में रहते हैं और शानदार शुद्ध हवा लेते हुये मस्ती से रहते हैं। उननें और उनकी पत्नी नें तीन गाय-भैंसे पाल रखी हैं। बच्चों को भरपूर दूध-मलाई खिलानें और मुझे जैसे मित्रों को शुद्ध खोये के पेड़े खिलाते रहनें के बावजूद महीनें का 25,000-30,000 केवल दूध से कमाते हैं वह भी गांव में। जानवरों के गोबर का प्रयोग खेती में खाद में करते हैं और कभी कभी शरीर में चुपड़ कर स्नान भी कर लेते हैं। हमनें उनसे पूंछा कि इतना पढ़नें लिखनें के बाद गांव में रहते हैं, भैंसों की सेवा करते हैं … अजीब नहीं लगता है। 

      इन मित्र का कहना है कि आजकल के लाखों B.Tech/M.Tech/MBA लड़के/लड़कियां दिन में 15-15 घंटे काम करके जितना कमाते हैं उससे अधिक मैं अपनीं कुछ गायों/भैसों और खेती से कमा लेता हूं और बढ़िया शुद्ध हवा लेता हूं और शारीरिक/मानसिक रूप से स्वस्थ भी रहता हूं।

      रही सेवा करनें की बात तो ये जानवर जीवन हैं और मेरे अपनें परिवार का हिस्सा हैं मेरे प्रति वफादार हैं। जबकि शहरी चकाचौंध के लिये कंपनीज से शोषण कराते हुये शारीरिकमानसिक बीमार जिंदगी जीनें वाले लोगों को तो यह तक नहीं पता होता कि आज जिस नौकरी में हैं उसमें कल होंगें भी या नहीं या किसकी सेवा कर रहे हैं। वे नौकर हैं और मैं मालिक हूं।
       

    मैं उत्तर प्रदेश व बिहार की ऐसी हजारों महिलाओं से मिल चुका हूं जो कि केवल गाय/भैंस की सेवाटहल करके दसियों हजार महीनें की आय करतीं हैं जबकि अंगूठा-छाप हैं। 

    मैं तो कहता हूं िक पहले असली भारत को समझ लीजिये फिर उसकी बात कीजिये। नहीं तो आप अपनीं मूर्खता में उनका उपहास उड़ातें रहेंगें जिनके जीवन की तुलना में खुद आपका जीवन ही उपहास है। 

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  • आधुनिक भारतीय समाज की “जातिवाद” के कुछ घिनौनें उदाहरण जो कि रोजमर्रा की सामान्य उदाहरण हैं

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों को समर्पित है जो लोग मुझे मेरे जातिवाद के ऊपर लिखे लेखों में ज्ञान-प्रवचन देते हैं या प्रतिक्रिया स्वरूप तर्कोंशब्दों के जाल से यह बतानें का प्रयास करते हैं कि जातिवाद खतम हो रहा है या जातिवाद अपनें भीतर बहुत ही मानवीयदूरदर्शी भाव व मानवीय लक्ष्य को समाहित किये हुये है/या था ::

    मैंनें अपनें छात्र-जीवन में भी कुछ ऐसे गावों में समाज के लिये काम किये जिन गांवों में “दलित-वेश्यायेंऔरदलितही रहते थे और आज तक रहते हैं।

    यह बातें तब की हैं जब मैं स्नातक का छात्र हुआ करता था और सेमेस्टर्स में बंक मारकर, हर शनिवार-रविवार, सर्दियो/गर्मियों/सेमेस्टर-अवकाशों में 200 किलोमीटर की दूरी स्थानीय बसों या मोटरसाइकिल में तय करके पहुंचता था और इन्हीं दलितों के घरों में रहता था, खाता था और कभी कभी इनके साथ खेतों में या किसी और काम में मजदूरों की तरह काम करता था ताकि मेरे मन को यह नैतिक सकून मिल सके कि मैं अपनें भोजन के लिये इन पर अवांछित बोझ नहीं बन रहा हूं। 

    • “दलित-वेश्याओं” वाला गांव, कुछ सौ वर्ष पूर्व उस इलाके के ऊपरी जाति के लोगों नें बसाया था। इस गांव में पति नाम की कोई वस्तु नहीं होती थी। आसपास के इलाके के गांवों से कोई भी आकर इस गांव की महिलाओं को वस्तु की तरह भोग सकता था। बिना पिता की पहचान व नाम के पैदा होनें वाली इनकी संतानों में यदि पुत्र हुआ तो वह ऊपरी जाति के लोगों के घरों में बेगारी करनें में उसको अपनें जीवन की नियति माननी होती थी, और यदि लड़की हुयी तो उसको तो महज 13-14 साल की उम्र से ही वेश्या बनना तय था ही। इस गांव की लड़कियां आज भी वेश्या बनतीं हैं और यदि 35 साल से अधिक उम्र के पुरुष से यह पूंछा जाये कि उसका पिता कौन है तो 90% से अधिक पुरुष गोलमाल जवाब देगा क्योंकि उसको पता ही नहीं कि किस पुरुष के साथ रात-बितानें से उसका जन्म हुआ।

      जब लोग जागरूक होनें लगे तो ऊपरी जाति के लोगों नें नया तरीका निकाला- इस गांव की लड़कियों को मुंबई जैसे भारतीय मेट्रो शहरों, अरब देशों और दूसरे देशों के वेश्यालयों में बेचा जानें लगा।

      यह वही गांव है जहां कि लड़कियों को मैंनें अपनीं धर्म-बहनें माना और उन्होनें मुझे रक्षाबंधन में राखी बांधी।  कुछ स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर इस गांव के लोगों के लिये गैर-परंपरागत ऊर्जा के उपकरण, प्राथमिक शिक्षा व स्वास्थ्य आदि के काम भी शुरु किये गये थे।

    • “दलित” वाला गांव में सिर्फ एक घर पंडित जी का था उसमें भी केवल एक पंडित जी ही रहते थे और उनका पूरा परिवार मेट्रो शहर में रहता था।  पंडित जी थे अकेले लेकिन पूरा गांव उनका गुलाम था क्योंकि पूरे गांव की जमीन लगभग मानिये कि उनकी ही थी। इसलिये 60 परिवारों के दलित उनके अघोषित गुलाम।महज 15 वर्ष पूर्व की ही बात है कि एक 12 साल के दलित बच्चे नें उनके खेतों में बेगार करनें से मना कर दिया तो उसको खेत में जिंदा जला दिया गया था और किसी की हिम्मतहुयी कि पंडित जी को कोई किसी कानून आदि बता पाता। यह घटना उन पंडित जी की है, जिनके परिवार के लोग न तो बहुत बड़े पदों में थे औरही कोई राजा या नवाब आदि।   

    मेरा बहुत ही दृढ़ता से यह मानना है किजातिवादका घिनौनापनहिंसा समझनें के लिये मनुष्य को अपनें स्वार्थ, अहंकार, शाब्दिक-तर्कों के कथित ज्ञान की महानता के गौरव आदि ओछेपन से बाहर आकर सच्ची मानवीय-संवेदनशीलता से घिनौनेपन को समझना होगा।

    ऊपर की बातें तो तब की हैं जब मैं छात्र होता था। तब से अब तक तो मैं कितना भारत देख चुका हूं मुझे खुद भी याद नहीं रहता…. मैं सैकड़ों घटनायें बता सकता हूं जो कि ऊपरी जातियों के वीभत्स व घिनौंनें अमानवीय आत्याचारों पर हैं। सारी घटनायें सत्य हैं और आधुनिक भारत व समाज की हैं।

    “जातिवाद” को खतम करना है तो पहले खुद में इमानदार और मानवीय होईये और तार्किक, शाब्दिक और पौराणिक-कथाओं वाला दर्शन किनारे रखकर इमानदार चिंतन कीजिये। अपनें इर्द-गिर्द की दस-पांच घटनाओं को दुनिया की कसौटी न मानिये। दुनिया आपके मुहल्ले से बहुत ही अधिक बड़ी है।

     

  • जातिवाद सबसे घिनौना/हिंसक फासिज्म और सामाजिक-भ्रष्टाचार को खतम करनें की दिशा में प्रस्तावित सामाजिकता के आधारभूत-रचनात्मक बिंदु

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”

    • जातिवाद सबसे घिनौना रेसिज्म है
    • जातिवाद सबसे हिंसक सामाजिक-फासिज्म है
    • जातिवाद ही भारत में करप्शन का जनक है
    • मनुष्य को मर्द और औरत की जाति के रूप में देखना भी एक किस्म का जातिवाद है
    • समाज और आदमी को करप्ट बनाया है “जातिवाद” नें।

    भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनानें या लागू करनें से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलानें से करप्शन नहीं दूर होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज और समाज का आदमी करप्ट है।

    आरक्षण का विरोध तो आरक्षण लागू होनें के पहले दिन से हुआ है, वह भी केवल इसलिये कि शूद्र समकक्ष क्यों खड़ा हो और सामाजिक व राजनैतिक संसाधन व ताकत शूद्र के साथ क्यों साझा हो। इसको योग्यता व अयोग्यता से जोड़ा जाना बहुत ही सतही तर्क है।

    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक माननें वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील माननें वाले अधिसंख्य सवर्ण लोगों का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिये घृणा का भाव रखते हैं क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करनें लगा है और सवर्णों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करना लगा है।

    अब मुश्किल तो यह है कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है और “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” पर आधारित है। (मुझ जैसे गवांर-जाहिल की यह पंक्ति समझनें के लिये कुछ मेहनत लगेगी)

    हजारों सालों तक कुचला है जिन्हें और उसी कुचले जानें के परिणाम स्वरूप आज संसाधन और मजे ले रहे हैं। जिनकी मेहनत का हजारों साल माल खाया है वह भी पूरी शिद्दत के साथ पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार स्थापित करके थोड़ी सी अंदर की इमानदारी और प्रेम उनके साथ भी साझा करनें की मानवीयता दिखा दीजिये।  या सारी परिभाषायें, सारा दर्शन, सारा ज्ञान, सारी ईमानदारी, सारी महानता व सारी मानवीयता केवल आपके खुद के स्वार्थ व अहंकार तक ही सीमित है।

    जातिवाद के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीनें के मौलिक अधिकार भी नहीं थे।

    जो लोग योग्यता या अयोग्यता का तर्क देते हैं उनकी सोच शायद अपनें स्व-केंद्रित स्वार्थ व भोगनें की लिप्सा में यह भूल जाती है कि हजारों वर्षौ के जातिवाद नें भारतीय समाज की करोड़ों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।  प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या कैसे की इस बात को समझनें के लिये नीचें की लाइनों को खुले मन से समझनें की आवश्यकता है।

    जातिवाद नें जन्म के आधार पर ही बचपन से ही आदमी की योग्यता व सामाजिक चरित्र तय कर दिया। –

    • ब्राम्हण का पुत्र जो कि मूढ़ बुद्धि का हो तब भी उसे विद्वान माना गया और उसको आजीवन सिर्फ कुछ पोथियों को उल्टा-पुल्टा तरीके से बांच देना है। घोर मूढ़ता को भी महान विद्वता साबित करनें के लिये पौराणिक कथायें बना दीं गयीं। भरपूर सामाजिक षणयंत्रों के साथ मूढ़ता को महान विद्वता साबित करनें का अमानवीय कुचक्र।
    • क्षत्रिय का पुत्र बहुत कायर होते हुये भी, महान बहादुर के रूप में जन्मजात मान लिया गया…. आदि आदि।
    • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुये भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा जन्मजात ही मान लिया गया।
    • शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के गुलाम के रूप में जबरन स्थापित किया गया।

    * देश में यदि पौराणिक कथाओं आदि के कथित दैवीय ज्ञान की बात न की जाये तो भारतीय समाज ज्ञान के मामलें में, शिक्षा के मामलें में कहां खड़ा हुआ … इसको समझनें के लिये किसी कुतर्क की बजाय इमानदार मन की जरूरत है। तो यह रहा हजारों वर्षों के ब्राम्हणों के परंपरागत ज्ञान व योग्यता में दावेदारी का परिणाम।

    * क्षत्रियों के पुरुषार्थ की वास्तविकता समझनें के लिये चारणों या भाटों के गीतों को महत्व देनें की बजाय यदि सैकड़ों वर्षों की लगातार स्थापित रही राजनैतिक गुलामी को सबूत के तौर पर देखा जाये तो वास्तविकता और यथार्थ  को समझनें के लिये किसी कुतर्क की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

    * वैश्यों के व्यापाराना व प्रबंधन की योग्यता, वह भी तब जबकि शूद्र रूपी बेगार गुलाम मौजूद थे खून जलाकर उत्पादन करनें के लिये, को समझनें के लिये किसी छोटे से भी शोध की जरूरत नहीं है।

    बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापाराना-प्रबंधन की दावेदारी की हो …. भारतीय समाज के जातिवाद नें लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी बेशर्मी और सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ की है।

    • सोचिये कि यदि शूद्रों को अपनी प्रतिभा को दिखानें का अवसर मिला होता तो बहुतेरे दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज नें दिये होते।
    • सोचिये कि यदि जातियां न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राम्हण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसनें पता नहीं कितनीं चीजों का आविष्कार किया होता।
    • सोचिये कि यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होनें वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनीं चीजों का आविष्कार किया होता।
    • ऐसे ही सैकड़ों-हजारों बातें सोचीं जा सकतीं हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जातिवाद नें कैसे प्रति वर्ष लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या की वह भी लगातार हजारों वर्षों तक वह भी पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ।

    भारत में जातिवाद के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, बहुत ही सीमित दायरे में तुलनात्मक रूप से जो जातियों की सीमितता में बेहतर निकल गया उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही घटिया तरीका आजतक लागू है।

    भारतीय संविधान में यदि आरक्षण की व्यवस्था न दी गयी होती तो अभी तक देश की अधिसंख्य जनता अछूत मानी जाती होती, अपनें गलें में थूंकदान और कमर में झाड़ू लटकाये घूम रही होती ताकि उसके पदचिंहों से और थूक से किसी ब्राम्हण का जन्मजात दैवीय रूप से प्राप्त ज्ञान भष्म न हो जाये।

    सवर्णों नें आजतक कभी शूद्रों को अपनें समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जातिवाद से ऊपर उठकर देखनें की चेष्टा भी नहीं किये। जातिवाद का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करनें के लिये और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। 

    भारत में योग्यता का मापदंड कौन किस स्तर की सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है, जैसे वाहियात और बेफिजूल कसौटी के आधार पर किया जाता है।

    जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जातिवाद” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाये हुये झूठों में जीते हैं और “जातिवाद” जैसी सामाजिक विभीषिका को अपनें स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।

    ज्यों ज्यों शूद्र जातियां प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों सवर्णों को समाज से “जातिवाद” खतम होते दिख रहा है, इसलिये “आरक्षण” व “जातिवादी राजनीति” का विरोध किया जाता है।

    दूर से देखनें में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जातिवाद” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिये जाते हैं, किंतु यथार्थ में तो यह विरोध स्व-केंद्रित स्वार्थों का ही है।

    वास्तव में बिना सामाजिक इमानदारी के “जातिवाद” का पत्ता भी नहीं हिलनें वाला। सवर्ण जातियों की ओर से जब भी जातिवाद के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- आरक्षण और जातिवादी राजनीति।

    यदि सवर्ण सच में ही सामाजिक इमानदार होता और जातिवाद को खतम करनें के लिये थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करता तो जातिवाद कब का खतम हो गया होता।

    सवर्णों को कुछ नहीं करना था केवल अपनें अंदर से जातिवाद की भावना खतम करनीं थी, केवल इतना ही करना था और कुछ नहीं करना था। जातिवाद की भावना शब्दों से तो खतम होती नहीं, इसके लिये जीवन में जीवंत रूप में इस भावना को जीकर प्रमाणित करना पड़ता। 

    यह भावना प्रमाणित होती अंतर्वर्णीय विवाहों को प्रोत्साहित करनें से और सहजता के साथ सामाजिक मान्यता देनें से। आजादी के 65 वर्षों में अंतर्वर्णीय विवाहों का प्रतिशत धीरे धीरे बढ़कर 100% तक हो जाना चाहिये था, किंतु आज भी हम वहीं के वहीं खड़े हैं सामाजिक घृणा के स्तर पर, शायद घृणा के और भी बढ़े हुये स्तर पर क्योंकि अब यह घृणा दोनों तरफ से हो गयी है पहले केवल सवर्णों से शूद्रों की ओर थी और शूद्र पौराणिक कथाओं को सच मानकर खुद को ब्रम्हा जी के मैल की पैदाइश की नियति व पापों का दंड भोगना मानकर जी रहे थे।

    किंतु अंग्रेजों के आनें से काफी कुछ भ्रम टूटा और संवैधानिक आरक्षण पानें के बाद जब सवर्णों के द्वारा भोगे जा रहे हजारों वर्षों के सामाजिक आरक्षण की ही तरह संवैधानिक आरक्षण को पाकर खुद को कुछ कुछ आदमी समझना शुरु किया तो हजारों सालों के शोषण की प्रतिक्रिया बननीं शुरु हुयी।

    आजादी के बाद सवर्णों नें शूद्रों को रोकनें के हथकंडों की बजाय यदि जातिवाद जैसी घिनौनी कुरीति को खतम करनें के बारे में गंभिरता से सोचा होता और सवर्ण-शूद्र को मिश्रित कर दिया होता तो आज देश की हालात ही कुछ और होती। तब हमें न तो गांधी, नेहरू व बाबासाहेब को गरियानें की जरूरत होती, न हीं देश में भ्रष्टाचार होता और न ही लोकतंत्र खतरे में होता।

    किंतु शायद ब्राम्हणों का दैवीय ज्ञान, क्षत्रियों का पराक्रम, वैश्यों की प्रबंधन कुशलता व योग्यता इतनी छोटी सी बात समझनें की भी योग्यता व दृष्टि नहीं रख पायी और देश इतनें अधिक खतरनाक मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।

    यदि अंतर्वर्णीय विवाहों के द्वारा सवर्णों और शूद्रों को मिश्रित कर दिया गया होता तो आज किसी भी प्रकार के आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती और भारत की राजनीति व लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा भी नहीं भटकती।

    कुछ अपवादों को सामनें रखकर हम लोग पूरी निर्लज्जता के साथ जातिगत-व्यवस्था को उचित साबित करना शुरु कर देते हैं।  मैं कहता हूं कि कभी तो हम सच में समाज के प्रति इमानदार हो जायें, कभी तो अपनें अंदर के चोर को खतम करें, कुछ थोड़ा सा ही सही लेकिन देश, समाज व अगली पीढ़ियों के लिये दूरदर्शी कदम तो उठा लें।

    जातिवाद का सिर्फ और सिर्फ एक ही समाधान है और वह है कि प्रतिवर्ष होनें वालीं लाखों शादियों में से अधिकतर शादिया सवर्णों और शूद्रों को मिश्रित करतीं हुयीं हों।  समान आर्थिक/सामाजिक स्तर के सवर्णों और शूद्रों के विवाहों से इस तरह की रचानात्मक शुरुआत की जा सकती है। आरक्षण से शूद्रों का आर्थिक व सामाजिक स्तर तो बढ़ा ही है, सो ऐसी सामाजिक शुरुआत कुछ मुश्किल नहीं।

    जातिवाद खतम करनें के लिये सिर्फ सवर्णों को इच्छाशक्ति का परिचय देना है और अपनें अंदर के घृणा भाव व कथित जातिवादी श्रेष्ठता के छुपे हुये अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालना है …. इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है…. और इसके अलावे कोई समाधान भी नहीं है।  

    जातिवाद का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ इमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है।  यह समाधान ही नये समाज, नये देश व नये सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो कि आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर ही होगें।  

    (नोट- इस सार्थक व मानवीय सोच वाले लेख को कृपया घृणा, अहंकार, पूर्वाग्रह और स्वार्थ से दूषित न किया जाये ऐसा विनम्र निवेदन है, सादर प्रणाम।)

    ——
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

    Vivek U Glendenning "Nomad"

  • “झाड़ुई चिराग” टाइप टोटकों से ही देश/समाज में असल बदलाव होते हैं

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग  "सामाजिक यायावर"  * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर  * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर” 

    दिल्ली की बिजली समस्या का जमीनी और स्थायी समाधान : कुछ रामबाण टाइप्स नुस्खे ::

    • धरनें में बैठ जाइये।
    • पूरे देश में अपनें फालोवरों को मोमबत्ती सुलगानें के लिये आवाहन कीजिये
    • अपनें फेसबुकिया पोस्टरबाजों की रातदिन की ड्यूटी भारत सरकार को गरियानें में लगा दीजिये।
    • अपनें प्रवक्ताओं अौर मीडिया-एक्सपर्ट्स को रातदिन मीडिया की बहसों में समय, संसाधन और ऊर्जा का सदुपयोग करनें के लिये कहिये, ताकि बिजली की समस्या का हल मीडिया बहसों रूपी “झाड़ुई चिराग” को घिसकर तुरत फुरत निकाला जा सके।
    • अपनें पोस्टरबाजों को रातदिन यह साबित करनें में लगा दीजिये कि यदि दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के अंडर में होती तो बिजली जैसी समस्यायें न होंतीं।
    • मीडिया में बयानबाजी बढ़ा दीजिये
    • रेडियो में हर मिनट यह गाना बजावाईये ” लोकपाल होता तो बिजली का उत्पादन होता और सबको फोकट में बिजली मिलता होता” ।
    • दो चार बड़े उद्योगपतियों को अपनी पार्टी में हंगामें के साथ ज्वाइन कराईये तुरत।
    • एक सबसे जरूरी बात, दूसरों को गरियाना न भूलियेगा, यह नुस्खा तो आधारभूत नुस्खा है, इस नुस्खे के बिना तो सब नुस्खे फेल वह भी फौरन से भी पेश्तर।

    पिज्जा/बर्गर किसम की फंडामेंटल मूल्यों वाली क्रांतिकारी और सामाजिक बदलाव की गहरी समझ रखनें वाले महापुरुष लोग अपनी गूढ़ समझ व इमानदार टाइप्स सामाजिक दूरदर्शिता से और भी शानदार व खालिस नुस्खे इसमें जोड़कर अपनीं पोस्टरबाजी लगातार कायम रख सकते हैं।

    इन्हीं टोटकों से देश में बदलाव होते हैं। जै हो।

     

  • दिल्ली, बिजली और बिजली का बिल

    सामाजिक यायावर

    जो बिजली भारत में लोग घरों में पाते हैं वह मोटा-मोटी तीन आधारभूत चरणों व क्रम से घर में पहुंचती है-

    1. बिजली उत्पादन (प्रोडक्शन)
    2. बिजली प्रसारण (ट्रांसमिशन)
    3. बिजली वितरण (ड्रिस्ट्रीब्यूशन)

    दिल्ली शहर-राज्य भारत का एकमात्र राज्य है जो कि बिजली की खपत तो बेइंतहा करता है, लेकिन उत्पादन नहीं करता है।

    दिल्ली के लोगों को पता ही नहीं कि बिजली पूरे देश से जबरन घसीट कर एक तरह से लूटकर दिल्ली वासियों तक पहुंचायी जाती है, इसलिये दिल्ली की बिजली की दरें बिजली वितरण कंपनीज को सब्सिडी दिये बिना, घटायी नहीं जा सकतीं हैं।

    अरविंद केजरीवाल जी की दिल्ली सरकार जब भी बिजली वाले वादों अौर दावों की बात आती है तो वितरण कंपनीज के बारे में मीडिया में बयान देना शुरु कर देते हैं, जो कि किसी भी वास्तविक समाधान तक नहीं ही पहुंचना है।

    अरविंद जी यदि वास्तव में एक प्रतिशत भी दिल्ली की बिजली के लिये गंभीर हैं तो उन्हें बिजली-उत्पादन अौर बिजली-प्रसारण जैसे प्राथमिक मुद्दों के बारे में सोचना चाहिये।  इन मुद्दों को समाधानित करनें के बाद बिजली-वितरण की खामियां दूर करनें की बात आती है। जब तक बिजली-उत्पादन व बिजली-प्रसारण आदि मुद्दों की बात नहीं होती है तब तक बिजली-वितरण कंपनीज को धमकानें आदि को राजनैतिक व वोट-बैंक की चोचलीबाजी ही कहना अधिक उचित है, क्योंकि इससे समाधान की अोर कोई भी रास्ता नहीं जाता है।

    दिल्ली के लोगों नें मौका दिया है, कुछ तो ठोस कीजिये …. आपको इतना विश्वास, ग्लैमर और अपना खुद का भविष्य सौंप दिया …. कुछ वास्तविक सामाजिक प्रतिबद्धता आप भी बिना मीडिया बयानबाजी के जीकर साबित कर दीजिये, ताकि आपके बाद भी लोग किसी पर विश्वास करनें की हिम्मत बनायें रखें।

  • काश हम धूर्त, अवसरवादी, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी और कामचोर आदि न होते तो कम से कम आजादी, आजादी के लिये संघर्ष करनें वाले पूर्वजों और गणतंत्र का निरादर और मजाक न उड़ाते होते

    सामाजिक यायावर

    भारत नें दो प्रकार की गुलामियां झेलीं हैं वह भी लगातार।

    पहली हजारों सालों की निरंतर “सामाजिक गुलामी” जो कि जातिवाद जैसी घिनौनी सामाजिक हिंसा, धूर्तता और षणयंत्र आदि से कूट कूट कर भरी हुयी थी।

    दूसरी सैकड़ों सालों की निरंतर “राजनैतिक गुलामी”।

    जिस समय देश में सड़कें नहीं थीं, संपर्क मार्ग तक नहीं थे, संचार माध्यम नहीं थे, देश की 85% से अधिक जनसंख्या को शिक्षा के अधिकार नहीं थे, बीमारियों के इलाज नहीं थे, लोगों को मौलिक अधिकार तक नहीं थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक नहीं थी …. और भी बहुत कुछ जो कि बहुत ही गंभीर व मौलिक था …. वह नहीं प्राप्त था समाज के अधिसंख्य लोगों को।

    उस समय देश के लोगों नें “बाल-विवाह” और “जातिवाद” जैसी कुरीतियों के बारे में सोचा और लड़नें का साहस किया।

    हजारों सालों की “सामाजिक गुलामी” और सैकड़ों सालों की “राजनैतिक गुलामी” के विरुद्ध लोगों नें बिना संसाधन के संघर्ष किया और विजय पायी।

    पूर्वजों नें “सामाजिक गुलामी” व “राजनैतिक गुलामी” को लगातार झेलते हुये भी “आजादी” और “गणतंत्र” के बारे में सोचा, कल्पना की। केवल सोचा या कल्पना ही नहीं किया बल्कि यथार्थ में उतार कर अपनीं आनें वाली पीढ़ियों के लिये सहेज दिया।

    बिना किसी प्रकार की नागरिक-सुविधा के, बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के, बिना संचार-माध्यमों के, बिना किसी शिक्षा आदि के …. हमारे पूर्वजों नें देश को न केवल “राजनैतिक आजादी” दिलायी बल्कि “जातिवाद” के खिलाफ भी संघर्ष किया और सैकड़ों सालों की “राजनैतिक गुलामी” के बावजूद, अशिक्षा के बावजूद, घोर नारकीय जीवन जीवन जीते रहनें के बावजूद देश को “गणतंत्र” दिया।

    लाखों, करोड़ों लोगों के निरंतर संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम है हमारे देश की आजादी व गणतंत्र।

    आइये अब अपना भी मूल्यांकन कर लें कि हमनें क्या किया आजादी के बाद-

    हमनें केवल और केवल अपनी लिप्सा, अपनें स्वार्थ, अपनें भोग आदि के लिये देश को मजाक बनाकर रख दिया। हमनें कभी देश के बारे में सोचा ही नहीं, हमनें केवल अपनी महात्वाकांक्षाओं और लिप्साओं के बारे में सोचा।

    तंत्र में खराबी हम पैदा करते हैं और गालियां देते हैं पूर्वजों को, कि उन्होनें यह न किया होता तो ऐसा होता या वैसा होता।

    हमनें पूर्वजों को गालियां देनें के लिये संगठन बनाये और जो जितना गरिया ले उसको उतना ही बड़ा बुद्धिजीवी मानते हैं और प्रशंसा करते हैं। गांधी को गरियानें के संगठन, बाबा साहेब को गरियानें के संगठन, बुद्ध को गरियानें के संगठन ….. आदि आदि।

    हम अपना खुद का स्तर अपनें खुद के स्वार्थ, अपनें परिवार व रिश्तेदारों के स्वार्थ से ऊपर कभी उठा नहीं पाये, लेकिन गांधी, बाबासाहेब, बुद्ध आदि को तबियत से हर बात में गरियानें में ही अपनी बौद्धिकता, अपनी क्रांतिकारिता, अपनी सामाजिक समझ, अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और अपना सामाजिक उत्तरदायित्व साबित करते हैं।

    आजादी के बाद की हमारी पीढ़ियां इतना अधिक स्वार्थ में लिप्त है, इतना अधिक भोगी हो गई है कि आजादी को और पूर्वजों को केवल इसलिये गरियाती है कि उसको और अधिक भोगनें को क्यों नहीं मिल रहा है। कभी किसी पूर्वज को गरियाना, कभी किसी को।

    हम ऐसे ऐसे लोगों को बिना जांचे सत्ता सौंप देते हैं जिसनें भारत को समझा तक नहीं है, जिसनें कभी कोई ठोस सामाजिक काम नहीं किया। हमनें यह समझनें की जहमत तक नहीं उठाते कि जिसको हम अपना जन-प्रतिनिधि बना रहे हैं या सत्ता सौंप रहे हैं उनकी कोई वास्तविक सामाजिक समझ है भी या नहीं।

    हम नशे में अपनें जन प्रतिनिधि चुनते हैं और अपनें ऊपर शासन करनें का अधिकार देते हैं। और फिर गालिया देते हैं गणतंत्र को और उन करोड़ों पूर्वजों को जिन्होनें हमारे लिये त्याग किया जीवन का बलिदान दिया।

    हमारे पास इतनी तमीज नहीं कि हम अपना जन-प्रतिनिधि चुन सकें और गालियां देते हैं उन करोड़ों पूर्वजों को जिन्होनें घोर नारकीय जीवन जीते हुये भी आजादी के बारे में सोचा, गणतंत्र के बारे में सोचा और अपनीं कल्पना को यथार्थ में साकार कर दिया।

    यह भारतीय गणतंत्र की ही उदारता व महानता है कि यहां लोकतंत्र को, गणतंत्र को गरियानें वाले लोग जिन्होनें वास्तविकता में समाज के लिये कभी कुछ ठोस किया भी नहीं और केवल संचार माध्यमों और लोकतंत्रिक मूल्यों को गरियानें के कारण खुद को रातोंरात क्रांतोकारी साबित करते हैं उनको लोग अपना जन-प्रतिनिधि चुनते हैं और राजनैतिक सत्ता सौपते हैं।

    ऐसा सिर्फ और सिर्फ इसलिये हो पाता है क्योंकि हमनें कभी अपनें भोगनें से ऊपर उठकर देश के बारे में नहीं सोचा, हम सब कुछ पका पकाया पाना चाहते हैं। इसलिये हम कुछ कोई पुरुषार्थ किये बिना ही अवसरवादिता से और अधिक भोगना चाहते हैं और देश व समाज की कीमत पर भोगना चाहते हैं और लगातार भोगना चाहते हैं।

    हम देश व समाज की कीमत पर, अपनीं आनें वाली पीढ़ियों की कीमत पर भोगना चाहते हैं और पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ देश व समाज का उपहास उड़ाते हुये भोगना चाहते हैं।

    “ मैं भी अपनी किशोरावस्था में आजादी व गणतंत्र का मजाक बनाता था और लड्डू व जलेबी व मिठाई आदि का ही दिन मानता था। किंतु समय के साथ साथ मैंनें जितना भारत, भारत के गांवों, भारत के लोगों और लोकतंत्र को समझा, मैनें उतना ही भारत की राजनैतिक आजादी का आदर करना सीखा। उतना ही उन लाखों-करोड़ों पूर्वजों का आदर करना सीखा जिन्होनें अपना जीवन बलिदान किया वह भी आनें वाली पीढ़ियों के लिये ताकि वे कम से कम अपनें ही देश में दूसरों के जूतों के तले तो न कुचले जायें और कुचलनें वाला यदि कोई हो तो अपना ही हो।

    मैंने यह भी सोचना शुरु किया कि मैं देश व समाज के लिये क्या कर रहा हूं जबकि कम से कम मेरे पास राजनैतिक स्वतंत्रता तो है, कुछ नहीं तो पब्लिकली गालियां बकनें का अधिकार तो रखता ही हूं। पूर्वजों के पास तो यह भी नहीं था। तो जब वे कुछ न होते हुये भी इतना सोच और कर गये तो मैं इतना सब कुछ भोगते हुये क्या कुछ बहुत थोड़ा सा भी देश व समाज के लिये नहीं कर सकता हूं।

    क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता हूं कि मैं पूर्वजों को न गरियायूं, मैं आजादी का मजाक न बनाऊं, मैं गणतंत्र का उपहास न करूं। क्या सच में इतना भोगनें के बावजूद मैं इतना भी आभारी नहीं हो सकता हूं देश के पूर्वजों के लिये।

    क्या सच में ही मैं इतना अधिक धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसारवादी आदि हूं …… क्या सच में ही मैं ऐसा ही हूं … “

    —-
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

  • सलीके का मतलब

    सामाजिक यायावर

    सलीके का मतलब:

    • आप खाते कैसे हैं,
    • पाखाना बैठकर करते हैं या कुर्सी नुमा ढांचे में बैठकर करते हैं,
    • पानी कैसे पीते हैं मसलन गिलास में कुछ पानी छोड़ देते हैं या नहीं छोड़ देते हैं,
    • चाय कैसे पीते हैं मसलन कप में आवाज/बेआवाज चुस्की या प्याली में सुरसुराकर पीते हैं,
    • टाई कैसे बांधते हैं,
    • मेहमान के आनें पर अंदर से गालियां देते हुये भी चेहरे में बड़ी और खूबसूरत मुस्कुराहट कैसे लाते हैं,
    • मन के अंदर दूसरों को अपनें से दोयम मानते हुये भी विनम्रता का ढोंग कैसे करते हैं,
    • ….. आदि आदि नहीं होता है।

    सलीके का मतलब:
    सहजता से और अंदर की ईमानदारी से दूसरे मनुष्य के साथ व्यवहार में जीना होता है।
    एक बहुत ही अमीर, बहुत ऊंची डिग्रीधारी भी बेसलीकेदार और एक गांव का अनपढ़, गरीब भी बहुत अधिक सलीकेदार हो सकता है।