मेरी संसद में बैठे हैं –
काठ की
कुर्सियों पर काठ के उल्लू ,
वे जब लौटेंगे दिल्ली से
तो झूठ पर
नये सपनों/ नारों
वादों का मुल्लमा चढ़ाके
हाय ! री कमबख्त सरकार
तेरे विश्वास पर
मर गया
इंतजारी में
अपनी ही देहरी पर
हाड़ का उल्लू ,
सचमुच हम कब तक
मरेंगे – जियेंगे
इस हुकूमत की इस
व्यवस्था में
अफ़सोस
मैं उनसे लड़-के क्यों नही
मरता –
उफ़ !!
मैं भी इस बात का उल्लू……..
यह सब एक दिन में नहीं हुआ
अनगिनत सूर्योदय और सूर्यास्त
गवाह बने और मिट गए
नाटक का पर्दा उठने और गिरने में
समय लगता हो भले चंद सेकण्ड का मगर मंचन घंटों चलता है
मंचन के लिए कथा और कथानक को तो और भी अधिक
कई बार बरसों लग जाते हैं
एक आम दर्शक पर्दा उठने और गिरने के सिवा
कहाँ कुछ सहेज पाता है स्मृति में
बस, आम की इसी कमजोरी का फ़ायदा
उठाता है, निर्देशक
समय के सापेक्ष
कभी साप्ताहिक, कभी मासिक अंतराल में
जरुरत पड़ने पर शहर और पात्र बदलकर
एक ही नाटक के मंचन से
अर्जित कर लेता है कहीं अधिक
हर एक दशक के बाद बदल जाता है
नाटक लिखने वाला
मंचन करने वाला
पर्दा उठाने वाला, गिराने वाला
यहाँ तक कि बदल जाता है निर्देशक
मगर, निर्देशन युगों-युगों से
जैसे का तैसा ही, चलता आ रहा है
प्रकृति प्रद्दत सभी रंग और ध्वनियों से अनभिज्ञ
आम, एक बार पुनः ठगा जाता है
कला के बहाने
संगीत के बहाने
इसीलिए, इस सबके पूर्णरूपेण
समाप्त होने की आशा और उम्मीद,बहुत
बड़ी बेईमानी है
जीवन की एक अदद जरुरत है मनोरंजन
हाँ, मनोरंजन में कटौती की जा सकती है
कब, कैसे और कितने का निर्धारण
स्वयं करना होगा
और स्वयं निर्धारण करने योग्य विवेक के लिए
जरुरी है एक और नाटक
एक और मंचन
एक और शहर
एक और नायक
एक और नायिका
एक और खलनायक
एक और पर्दा
इन सब में एक से अधिक अगर कुछ चाहिए, तो
वह है आम दर्शक
जिसकी हाल-फिलहाल कोई कमी नहीं
यह बात निर्देशक के अलावा
नाटक के पात्रों को भी पड़ गयी है मालूम
इसीलिए, सबके सब निर्देशक बनकर
नए-नए पात्रों के साथ
नए-नए तरीके से नए-नए नाटक रच रहे हैं
भीड़ कभी इधर, कभी उधर
इस भीड़ को आदत पड़ गयी है नाटकों की
हाँ, किरदार निभाने वाला
हर बार नए होना चाहिए
नया किरदार एक दिन में नहीं पैदा हो जाता
बल्कि इसके लिए
सैकड़ों- हजारों साँझ
अपना यौवन लुटा समय से पहले रात बन जाती हैं।
वैश्विक स्तर पर ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द बहुप्रचलित हो गया है और इस्लाम के आंतरिक ‘संकट’ की कई तरह से विवेचना की जा रही है। कुछ लोगों की राय है कि इस्लाम एक बहुत बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है और इस संकट से निपटने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि इसके पूर्व इस्लाम एक बहुत बड़े संकट से उबर चुका है। वह था क्रूसेड्स। वह एक बाहरी संकट था। इस्लाम का वर्तमान संकट उसका आंतरिक संकट है,जिसमें मुसलमान एक-दूसरे को ही मार रहे हैं। यहां तक कि एक ही पंथ के मुसलमान भी अपने साथियों का खून बहा रहे हैं। यह संकट पिछले कुछ दशकों में इस्लाम पर हावी हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमान, स्वयं इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हैं और इस्लाम अब अपने ही अनुयायियों को निगल रहा है। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में ‘अच्छा मुसलमान, बुरा मुसलमान’ शब्द ईजाद कर लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि इस्लाम पर अतिवादियों ने कब्ज़ा जमा लिया है। सुन्नी इस्लाम अतिवादी हो गया है और शिया इस्लाम का खोमैनीकरण हो गया है। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इस्लाम में अंदर से सुधार लाए जाने की ज़रूरत है।
यह तर्क मध्यमार्गी मुसलमानों की व्यथा को प्रदर्शित करता है, जो अलकायदा से शुरू होकर आईएस और उसके कई अवतारों में फैल गया है। सच यह है कि यह विवेचना उथली है। ज़रूरत इस बात पर विचार करने की है कि इस्लाम से आतंकवाद के जुड़ाव की यह प्रक्रिया पिछले कुछ दशकों में ही क्यों शुरू हुई। यह मानना अनुचित होगा कि केवल इस्लाम के मानने वाले ही हिंसा करते हैं। साध्वी प्रज्ञा और गोडसे जैसे हिन्दू, असिन विराथू जैसे बौद्ध और एण्डर्स बर्लिन ब्रेविक जैसे ईसाई भी आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि आतंकवाद से जुड़े अधिकांश व्यक्ति मुसलमान हैं परंतु हमें यह समझना होगा कि कबजब राजनीति भी धर्म का भेस धर लेती है। और यह बात सभी धर्मों के बारे में सही है।
वर्तमान समय की बात करने से पहले हमें धर्मों की नैतिकता और उनके आदर्शों और धर्म के पहचान से जुड़े पहलुओं के बीच अंतर करना होगा। पहचान से जुड़े पहलुओं का सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूह, समाज पर अपना दबदबा कायम करने के लिए करते हैं। अधिकांश धर्मों के पुरोहित वर्ग ने सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूहों के साथ मिलकर सामाजिक ऊँचनीच को धार्मिक पवित्रता का चोला पहनाया। चर्च और मौलाना दोनों सामंती व्यवस्था के समर्थक रहे हैं और ब्राह्मणों ने जाति और लिंग पर आधारित पदक्रम को समाज पर लादा। यह सब समाज के श्रेष्ठी वर्ग द्वारा अपना राज कायम करने की कवायद का हिस्सा था।
हमें यह भी समझना होगा कि अलग-अलग समय पर विभिन्न राजाओं ने जिहाद, क्रूसेड्स और धर्मयुद्ध जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने साम्राज्यों को विस्तार देने के लिए किया। धर्म तो मात्र एक बहाना था, असल में वे सत्ता के भूखे थे। सभी धर्मों के राजाओं के लक्ष्य एक से थे। उनका उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार करना नहीं वरन धर्म के नाम पर अपनी सत्ता को मज़बूती और अपने साम्राज्य को विस्तार देना था। ऐसे में हम केवल जिहाद की बात कैसे कर सकते हैं?हम अन्य धर्मों के शासकों द्वारा धर्म के दुरूपयोग को कैसे भुला सकते हैं?
जहां तक भारत का संबंध है, 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरूप अस्त होते ज़मींदारों और सामंतों के वर्ग ने अपनी उच्च सामाजिक स्थिति को बनाए रखने और जातिगत व लैंगिक पदक्रम को संरक्षित रखने के लिए धर्म की भाषा बोलनी शुरू कर दी। उदित होते राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध करने के लिए इस्लाम के नाम पर राजनीति करने के लिए मुस्लिम लीग जैसी संस्थाएं बनीं तो हिन्दू धर्म के नाम पर सत्ता का खेल खेलने के लिए हिन्दू महासभा और आरएसएस का गठन हुआ। एक ओर थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गांधी जैसे लोग, जो भारतीय राष्ट्रवाद के पैरोकार थे तो दूसरी ओर थे जिन्ना, सावरकर, गोलवलकर और गोडसे जैसे व्यक्ति जो धार्मिक राष्ट्रवाद के हामी थे। गोडसे ने अपने समय के महानतम हिन्दू की हत्या की और उसके अनुसार ऐसा उसने ‘हिन्दू समाज’ की खातिर किया। बौद्ध धर्म के भेस में ऐसा ही राष्ट्रवाद म्यांमार और श्रीलंका में भी फलफूल रहा है।
पिछले कुछ दशकों में अमरीका, अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम का खलनायकीकरण करता आ रहा है। अमरीका का असली उद्देश्य कच्चे तेल के कुंओं पर कब्ज़ा करना है। अपनी इसी लिप्सा के चलते अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी संस्करण को प्रोत्साहन दिया। यह सर्वज्ञात है कि अमरीका ने पाकिस्तान के मदरसों में युवकों को इस्लाम के कट्टरवादी सऊदी संस्करण में प्रशिक्षित किया और उन्हें करोड़ों डॉलर और सैंकड़ों टन हथियार मुहैय्या करवाए। अमरीका तब इन युवकों के ज़रिए अफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करना चाहता था। बाद में ये लोग अमरीका के लिए ही भस्मासुर साबित हुए। इसके पहले अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडिक सरकार को अपदस्थ किया था। इसके नतीजे में अंततः अयातुल्ला खोमैनी सत्ता में आए और इस्लामिक कट्टरता का बोलबाला बढ़ा। खोमैनी के सत्तासीन होने के बाद पश्चिमी मीडिया ने यह कहा था कि अब इस्लाम, दुनिया के लिए एक ‘नया खतरा’ बन गया है और 9/11 के आतंकी हमले के बाद, इसी मीडिया ने ‘इस्लामिक आंतकवाद’ शब्द गढ़ा।
ऐसा बताया जा रहा है मानो आतंकवाद के कैंसर का कारण इस्लाम है। परंतु गहराई से देखने पर हमें यह समझ आएगा कि हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। कुछ प्रेम का प्रचार करती हैं तो कुछ नफरत फैलाती हैं। कबीर और निज़ामुद्दीन औलिया जैसे लोग गरीबों के साथ खड़े हुए और उन्होंने सत्ताधारी पुरोहित वर्ग का विरोध किया। पुरोहित वर्ग, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए करता आया है। गांधी भी हिन्दू थे और गोडसे भी। किसी धर्म की कौनसी धारा मज़बूत होती है और कौनसी कमज़ोर, यह अक्सर तत्कालीन राजनैतिक शक्तियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
यह सचमुच चिंता की बात है कि इस्लाम कई तरह की आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है परंतु यदि इस्लाम के अतिवादी पंथ शक्तिशाली बन गए हैं तो इसका कारण धर्म है या राजनीति। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी के लिए हिन्दू धर्म समावेशी था तो गोडसे जैसों के लिए वह अन्यों से घृणा करना सिखाने वाला था। अतः, ज़रूरत इस बात की है कि हम धर्म का लबादा ओढ़े उस राजनीति को पहचानें, जो अतिवाद को बढ़ावा दे रही है और इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने नहीं आने दे रही है। हमारे समय में भी मौलाना वहीदउद्दीन और असगर अली इंजीनियर जैसी शख्सियतें हुईं जिन्होंने इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने रखा। परंतु सत्ता के समीकरणों के चलते, वे हाशिए पर पटक दिए गए और आईएस जैसी संस्थाएं केन्द्र में आ गईं। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि जो शक्तियां अतिवाद को प्रोत्साहन दे रही हैं वे दरअसल तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति में संलग्न हैं। धर्म का आतंकवाद से कोई लेनादेना नहीं है।
बैलगाड़ी से जाते हुये
उन्होंने मेरे दादा से गांव की ही बोली में
पूछी थी उनकी "जात"
उन्होंने विनीत भाव से
बता दी.
वे नाराज हुये
और चले गये
उतार कर गाड़ी से उनको
दादा ने इसको
अपनी नियती माना.
फिर एक दिन
रेलयात्रा के दौरान
उन्होंने मीठे स्वर में
खड़ी बोली में जाननी चाही
मेरे पिता से उनकी "जाति"
पिता थोड़ा रूष्ट हुये
फिर भी उन्होंने दे दी
अपनी जाति की जानकारी.
सुनकर वो खिन्न हो गये
पर क्या कर सकते थे.
रेल से नीचे
उतरने से तो रहे
सो रह गये
मन मसोस कर .
बैठे रहे साथ में चुपचाप.
बात नहीं की फिर
थोड़ा दूर खिसक लिये.
हाल में उन्होंने
धरती से मीलों उपर
उड़ते हुये
बड़े ही प्रगतिशील अंदाज में
सभ्य अंग्रेजी में
'एक्सक्यूज मी' कहते हुये
पूछ ही ली मुझसे मेरी ' कास्ट '
मेैने जवाब में घूरा उनको
मेरी आँखों का ताप
असहज कर गया उन्हें
खामोशी ओढ़े
बुत बन कर बैठे रहे वे
धरती पर आने तक.
मैं सोचता रहा
आखिर क्या बदला
तीन पीढ़ी के इस सफर में ?
बदले है सिर्फ
मॉड ऑफ ट्रांसपोर्टेशन
भाषा और वेशभूषा .
पर दिमाग में भरा भूसा
तो जस का तस रहा.
और अब वे कहते है
कहां है जातिवाद आजकल ?
कौन मानता है इस
कालबाह्य चीज को .
हालांकि वे जान लेना चाहते है
किसी भी तरह जाति
क्योंकि जाति जाने बिना
कहां चैन पड़़ता है उनको ?
इन दिनों
वे चाह रहे है कि
समाज में आये इस
" क्रांतिकारी बदलाव" पर
सहमति जताऊं
और तालियां बजाऊं !
क्या वाकई बजाऊं ?
कर्नाटक सरकार द्वारा गत 10 नवंबर, 2016 को टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने के मुद्दे पर जमकर विवाद और हंगामा हुआ। पिछले वर्ष, इसी कार्यक्रम का विरोध करते हुए तीन लोग मारे गए थे। टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने का विरोध मुख्यतः आरएसएस-भाजपा और कुछ अन्य संगठनों द्वारा किया जा रहा है। इनका कहना है कि टीपू एक तानाशाह था, जिसने कोडवाओं का कत्लेआम किया, कैथोलिक ईसाईयों का धर्मपरिवर्तन करवाया और उनकी हत्याएं कीं, कई ब्राह्मणों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया और अनेक मंदिरों को तोड़ा। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कन्नड़ की बजाए फारसी भाषा को प्रोत्साहन दिया। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि टीपू एक अत्यंत लोकप्रिय राजा थे और उनकी वीरता के किस्से अब भी नाटकों और लोकगीतों का विषय हैं। वे एकमात्र ऐसे भारतीय राजा थे जो ब्रिटिश शासकों से लड़ते हुए मारे गए। प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड ने तो यहां तक मांग की है कि बैंगलोर के नए हवाईअड्डे का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाना चाहिए। कर्नाड ने यह भी कहा है कि अगर टीपू हिन्दू होते तो उन्हें कर्नाटक में उतने ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता, जितने सम्मान से महाराष्ट्र में शिवाजी को देखा जाता है।
यह दिलचस्प है कि कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने जब 2010 में भाजपा को छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी, तब उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए टीपू सुल्तान जैसी टोपी पहनी थी और तलवार हाथ में उठाई थी। आज वे ही टीपू सुल्तान का जन्मदिन मनाए जाने के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं। यह भी दिलचस्प है कि आरएसएस द्वारा 1970 के दशक में प्रकाशित भारत-भारती पुस्तक श्रृंखला में टीपू को एक देशभक्त नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। आज वे ही लोग टीपू सुल्तान को एक धर्मांध शासक बता रहे हैं। संघ परिवार द्वारा एक ट्रेन का नाम टीपू पर रखे जाने का भी विरोध किया गया था। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि टीपू सुल्तान ने अपने सेनापतियों को पत्र लिखकर यह कहा था कि काफिरों का सफाया कर दिया जाना चाहिए। यह कहा जाता है कि ये पत्र अब ब्रिटिश सरकार के कब्ज़े में हैं। जब विजय माल्या ने लंदन में आयोजित एक नीलामी में टीपू की 42 इंच लंबी तलवार खरीदी थी तब भी बहुत बवाल मचा था। टीपू को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं।
टीपू सुल्तान कौन थे? उनका स्वाधीनता संग्राम में क्या योगदान था? टीपू ने अपना राज्य अपने पिता हैदर अली से उत्तराधिकार में पाया था। युद्ध लड़ने की तकनीकी के विकास में हैदर और टीपू का योगदान सर्वज्ञात है। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरूद्ध अपने युद्धों में मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। अंग्रेज़ों के साथ हुए उनके युद्ध बहुत प्रसिद्ध हैं। हैदर और टीपू ने ब्रिटिश साम्राज्य के भारत में विस्तार को रोकने में महती भूमिका अदा की थी। टीपू की राजनीति, धर्म पर आधारित नहीं थी। उलटे इतिहास में यह दर्ज है कि उन्होंने हिन्दू मठों को दान दिया था, यद्यपि इसके पीछे भी हिन्दुओं का समर्थन हासिल करने की राजनैतिक मंशा थी। सच यह है कि चूंकि टीपू ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी इसलिए उन्होंने उसका दानवीकरण किया।
टीपू ने मराठाओं और हैदराबाद के निज़ाम से पत्रव्यवहार कर उनसे यह अनुरोध किया था कि वे अंग्रेज़ों का साथ न दें क्योंकि अंग्रेज़, उस क्षेत्र के अन्य राजाओं से बिलकुल भिन्न हैं और यदि उनका राज कायम होता है तो यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी आपदा होगी। उनकी इसी सोच ने उन्हें अंग्रेज़ों के खिलाफ अनवरत युद्ध करने की प्रेरणा दी। ऐसे ही एक युद्ध में उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। परंतु वे आज भी कर्नाटक के लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। उन पर केन्द्रित कई नाटक और गीत (लावणी) हैं। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता के कारण ही वे आज भी कर्नाटक के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व बने हुए हैं।
जहां तक कन्नड़ और मराठी के साथ-साथ फारसी भाषा का इस्तेमाल करने की उनकी नीति का प्रश्न है, हमें यह समझना होगा कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी ही राजदरबारों की भाषा थी। टीपू कतई धर्मांध नहीं थे। कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य को लिखे एक पत्र में उन्होंने शंकराचार्य को ‘जगतगुरू’ (विश्व का शिक्षक) कहकर संबोधित किया और उनके मठ को बड़ी राशि दान के रूप में दी। इसके विपरीत, रघुनाथ राव पटवर्धन की मराठा सेना ने मैसूर के बेदानूर पर हमला कर श्रंगेरी मठ में लूटपाट की। मराठा सेना ने मठ को अपवित्र किया। शंकराचार्य ने इस बारे में टीपू को लिखा। टीपू ने पूरे सम्मान के साथ मठ की पुनर्प्रतिष्ठा की। उन्होंने श्रीरंगपट्नम के मंदिर को दान भी दिया। उनके राज में मैसूर में दस दिन तक दशहरा बड़े जोरशोर से मनाया जाता था और वाडियार परिवार का कोई सदस्य इस आयोजन का नेतृत्व करता था। ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता, मध्य कर्नाटक के चित्रदुर्गा के एक सूफी संत थिप्पेरूद्रस्वामी के अनन्य भक्त थे।
टीपू के महामंत्री एक ब्राह्मण थे जिनका नाम पुरनैया था। उनके कई मंत्री भी ब्राह्मण थे। उन्होंने जो भी गठबंधन किए उसके पीछे धर्म नहीं बल्कि अपनी ताकत में इज़ाफा करने का प्रयास था। अपनी पुस्तक ‘सुल्तान-ए-खुदाद’ में सरफराज़ शैख ने ‘टीपू सुल्तान का घोषणापत्र’ प्रकाशित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की है कि वे धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेंगे, अपनी आखिरी सांस तक अपने साम्राज्य की रक्षा करेंगे और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेकेंगे। यह सही है कि कुछ विशिष्ट समुदाय उनके निशाने पर थे। इस संबंध में टिप्पणी करते हुए इतिहासविद केट ब्रिटलबैंक लिखती हैं कि ‘‘उन्होंने ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि उन समुदायों को सज़ा देने के लिए किया था’’। उन्होंने जिन समुदायों को निशाना बनाया, वे वह थे जो उनकी दृष्टि में साम्राज्य के प्रति वफादार नहीं थे। तथ्य यह है कि उन्होंने माहदेवी जैसे कई मुस्लिम समुदायों को भी निशाना बनाया। ये समुदाय वे थे जो अंग्रेज़ों के साथ थे और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के घुड़सवार दस्ते के सदस्य थे। एक अन्य इतिहासविद सूसान बैले लिखती हैं कि अगर टीपू ने अपने राज्य के बाहर हिन्दुओं और ईसाईयों पर हमले किए तो यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अपने राज्य में रहने वाले इन्हीं समुदायों के सदस्यों के साथ उनके मधुर रिश्ते थे।
Tipu Sultan
टीपू को मुस्लिम कट्टरपंथी के रूप में प्रस्तुत करना अंग्रेज़ों के हित में था। उन्होंने यह प्रचार किया कि वे टीपू की तानाशाही से त्रस्त गैर-मुसलमानों की रक्षा के लिए टीपू के खिलाफ युद्ध कर रहे हैं। यह मात्र एक बहाना था। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज के ज़माने में हम राजाओं और नवाबों का महिमामंडन नहीं कर सकते। वे हमारे राष्ट्रीय नायक नहीं हो सकते। परंतु इसके बाद भी, टीपू, भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में तत्समय राज कर रहे भारतीय राजाओं से इस अर्थ में भिन्न थे कि वे अंग्रेज़ों के भारत में अपना राज कायम करने के खतरों को पहले से भांप सके। वे अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में सबसे पहले अपनी जान न्यौछावर करने वालों में से थे। भारत में स्वाधीनता आंदोलन, टीपू के बहुत बाद पनपना शुरू हुआ और इसमें आमजनों की भागीदारी थी। टीपू के बलिदान को मान्यता दी जाना ज़रूरी है। आज साम्प्रदायिक विचारधारा के बोलबाले के चलते टीपू जैसे नायकों का दानवीकरण किया जा रहा है। अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में टीपू की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाथी के दांत…
खाने के अलग
और दिखाने के लिए
अलग होते है
पर यह …..
सही नही है जनाब !
ये जो बाहर वाले
चमकीले और नुकीले
दांत होते है,वो
डराने के लिए
और जो….
भीतर वाले चौडे एवं काले दांत
होते है न…..
भोजन के देखकर
गुपचुप गुपचुप
मुस्कराने के लिए होते है
सच तो यह है कि….
हाथी के असली दांत
उसके पेट मे होता है
जिसके बारे मे
लोगबाग कुछ भी
नही जानते ……
प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़, निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में 2015 में सकल घरेलु उत्पाद (GDP) के लगभग 20% अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में विद्यमान थी। वहीँ 2000 के समय वह 40% तक थी, अर्थात धीरे धीरे घटते हुए 20% तक पहुंची है। 2015 में भारत का सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ था, अर्थात उसी वर्ष देश में 30 लाख करोड़ रूपये काला धन बना। इस प्रकार अनुमान लगाएं तो 2000 से 2015 के बीच न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये काला धन बना है।
रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य 12 लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध 1 रूपये से लेकर 1000 तक के नोटों का 86% था। अर्थात अगर मान भी लें कि देश में उपलब्ध सारे 500 और 1000 रुपये के नोट काले धन के रूप में जमा हो चुके थे, जो कि असंभव है, तो भी केवल गत 15 वर्षों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र 3% होता है!
प्रश्न उठता है कि फिर बाकी काला धन कहाँ है? अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिकांश काले धन से सोना-चांदी, हीरे-जेवरात, जमीन- जायदाद, बेशकीमती पुराण वस्तु (अंटिक्स)- पेंटिंग्स आदि खरीद कर रखा जाता है, जो नोटों से अधिक सुरक्षित हैं। इसके आलावा काले धन से विदेशों में जमीन-जायदाद खरीदी जाती है और उसे विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है। जो काला धन उपरोक्त बातों में बदला जा चूका है, उन पर 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से कोई फरक नहीं पड़ेगा।
अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है। इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है, इन्हें काला धन को उपरोक्त वस्तुओं में सुरक्षित रखना आता है या उन्हें सीखाने वाले मिल जाते हैं। इसीप्रकार जो कुछ नोटों के रूप में उन बड़े लोगों के पास होगा भी, उसमें से अधिकांश को ये रसूखदार लोग इधर-उधर करने में सफल हो जाएंगे। 2000 से 2015 में उपजे कुल काले धन 400 लाख करोड़ का केवल 3% है सरकार द्वारा जारी सभी 500 और 1000 के नोटों का मूल्य ।
अतः मेरा मानना है कि देश में जमा कुल काले धन का अधिकतम 3% ही बाहर आ पायेगा और 1% से भी कम काला धन सरकार के ख़जाने में आ पायेगा वह भी तब जब मान लें कि देश में जारी सभी 500 और 1000 के नोट काले धन के रूप में बदल चुके हैं। केवल 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से देश में जमा सारा धन बाहर आ जाएगा ऐसा कहना या दावा करना, लोगों की आँख में धूल झोंकना है। उलटे सरकार के इस निर्णय से सामान्य लोगों को बहुत असुविधा होगी और देश को 500 और 1000 के नोटों को छापने में लगे धन का भी भारी नुकसान होगा वह अलग।
आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ।
महाभारत में एक एक श्लोक है : श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए परधर्मसे, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है । स्वधर्ममें मरना भी कल्याणकारक है, पर परधर्म तो भय उपजानेवाला है।
आखिरी ऐसा क्या होता है कि पूंजा गोकुलदास मेघजी का गुजराती परिवार इस्लाम अपना लेता है और भारत का खंडित करके एक नया देश पाकिस्तान बना लेता है। सिर्फ़ पाकिस्तान ही नहीं, इस पाकिस्तान से एक बांग्लादेश भी निकलता है। यह इतिहास की बात है। अभी समीचीन भी नहीं है, लेकिन बहुत गंभीरता से साेचने की बात है। आप जिन्ना या पूंजा परिवार को विभीषण या जयचंद कुछ भी कहें, लेकिन इस बदलाव ने भारत को बहुत क्षति पहुंचाई है।
देश में जिस तरह की चर्चा इन दिनों चल रही है और जैसे नारेबाजियां और किलेबंदियां हो रही हैं, उनमें क्या यह आत्मविश्लेषण का विषय नहीं है कि एक सुशिक्षित व्यापारिक परिवार ने महाभारत और श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षा को छोड़कर कुरआन की शिक्षा को अपनाया। यह प्रश्न परेशान करने वाला है। आप यह पोस्ट लिखने के लिए मुझे या धर्म बदलने के लिए जिन्ना परिवार को गाली दे सकते हैं। लेकिन मेरा विनम्र अनुराध है कि कई बार आत्मविश्लेषण और आत्मावलोकन संभवत: बहुत उपयुक्त और समीचीन होता है। आख़िर कुछ तो कारण रहा होगा कि पूंजा जैसा गौरवशाली नाम बदल गया। मीठी बाई जैसा शुद्ध भारतीय संस्कारशील नाम तिरोहित हो गया।