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  • ये है इस्‍लाम में तीन तलाक की वो हकीकत, जिसे मुसलमान भी ठीक से नहीं जानते..!

    Ruman Hashmi

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    यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं। इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए। दरअसल, पति-पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है, तो अपनी ज़िंदगी जहन्नुम बनाने से बेहतर है कि वो अलग होकर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है, इसलिए दुनिया भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है, और इसलिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है।

    आइए अब जरा नजर डालते हैं पवित्र कुरान में तलाक के असल मायने क्‍या हैं?

    दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थीं।

    किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है,उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए।

    जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

    कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – “और अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है” (सूरेह निसा-35).

    इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

    तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मज़ाक उड़ा रहा होता है।

    इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्‍मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

    अक्ल की रौशनी से अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है। हर मआशरे (समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं। अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शौहर ही के घर गुज़ारे।

    फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्‍हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ”रुजू” करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं। (सूरेह बक्राह-229)

    शौहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। लिहाज़ा कुरान ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है।

    दरअसल, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए। सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है, तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए।

    अल्लाह कुरान में फरमाता है – “और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोक लो या भले तरीक़े से रुखसत कर दो, और उन्हें नुक्सान पहुंचाने के इरादे से ना रोको के उन पर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है”। (सूरेह बक्राह-231)

    लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है।

    इस मौके पर कुरान ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रुपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है, वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है।

    (नोट– अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज़ है।) अब इसके बाद बीवी आज़ाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।)

    इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर बताया गया है।

    अब फ़र्ज़ करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शिरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

    हलाला: अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में ”हलाला” कहते हैं। लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है, जान बूझकर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना ताकि पहले शौहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

    खुला: अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। दरअसल, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ”खुला” कहा जाता है।

    यही तलाक का सही तरीका है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहां इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं, जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है!

     

  • किसानो को आख़िर चाहिये क्या?

    Prem Singh
    Agriculture Social Scientist

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    1. किसानो को चाहिये खाद, बीज, पानी, ऊर्जा और विचार में आत्मनिर्भरता, जो 1970 के पूर्व थी।
    2. शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय में समानता। क्योंकि किसान इनके बिना रह नही पता। और सरकार ने इन्हें धन कमाने का ज़रिया बना रखा है।
    3. समृद्धि आधारित ऐसा क्रशि का मॉडल जो लाभ हानि से मुक्त उभय त्रप्ती दायक हो। अर्थात पर्यावरण असंतुलन कारी एवं समाज को तोड़ने वाला न हो।
    4. उत्पादकों (किसानो) का सम्मान। अर्थात नीतिगत हस्तक्षेप का अधिकार, किसानी के कार्य को राष्ट्र कार्य घोषित करना, कार्बन क्रेडिट देना।

    और ये होगा नीतिगत बदलाव से तथा मिनिमम हस्तक्षेप से। इसके लिए चाहिए ऐसी परिपक्व समझ के नीतिकार, जो सरकारों के पास हैं नहीं। इस समय वर्ल्ड बैंक के अंधनुकरण करने वाले लाभ -लालच आधारित अर्थ शास्त्री ही भरे पड़े हैं। जिनका अंधानुकरण स्वयं कर रही है परिणामों की विवेचना किए बिना।

     

  • किसान और अर्थव्यवस्था

    वह भी समय ही था जब स्कूल-कॉलेज नहीं थे, बैंक नहीं थे, थे भी तो किसान की पहुंच से दूर थे।बिना स्कूल जाए लोग खेती किसानी करना सीखें, मौसम के हिसाब से फसलों का चुनाव करना सीखें, एक दूसरे की सहायता की, समूह बनाए जितना प्रकृति से लिया उसे बढ़ा कर ही लौटाया। बच्चों का रिश्ता प्रकृति, पशुओं से सहज रूप से अपने आप ही जुड़ता चला जाता। खेतीं किसानी करने वाले परिवार जो अच्छा खा पी रहे , बाकी लोगों के लिए भी खाने का इंतजाम कर रहे, पशु पाल रहे। अपने और पशुओं के रहने की अच्छी व्यवस्था कर रहे। ऐसे परिवारों को किसी डिग्री, मैनेजमेंट से कैसे कमतर आँक सकते। लेकिन जिस देश में जहां हर व्यवस्था में जाति व्यवस्था सर घुसाए खड़ी हो जिस व्यवस्था में सदियों से यह तय होता आ रहा कि जो मेहनती है वह पूरा जीवन शोषण और दुत्कार है दूसरी और वह देखता है की जो मेहनत नहीं कर रहे, झूठ, दलाली , नौकरशाही आदि में भोग के साधन बड़ी मान सम्मान के दिखावे के साथ जुटा रहे, सेवक के नाम पर अधिकारों का दुरुपयोग उसी को दबाने में कर रहे। जहां इस दिखावे के लालच में एक एक पद के लिए लाखों लोग अपने जीवन के कई-कई साल बर्बाद कर देते है।

    एक वह व्यक्ति जो खेतीं किसानी कर सकता उसका गुलामी की और ले जाती शिक्षा का कोई मतलब नहीं लेकिन केवल क्लर्क, फौजी, सिपाही की नौकरी प्राप्त करने तक कि केवल अर्य्हता के लिए लाखों रुपए समय स्कूलों, ट्यूशनों आदि में फूंक दिए जाते है।
    एक किसान जिसकी पैदा किया गया आलू टमाटर प्याज अन्य सब्जियां एवं अन्य कच्चा माल कौड़ियों के दाम बिक जाती है वहीं प्रोसेस होकर बाजार में कई सौ गुना दाम पर बिकता है।
    एक किसान जिसे रासायनिक उर्वरकों की बिल्कुल आवश्यकता नहीं वह हजारों रुपए इन पर फूंक देता है। बाजार से कदमताल के चक्कर में किसान ऐसा फंसा की खुद अपना और अपनी जमीन का दुश्मन बन बैठा। कितने ही लड़को को कहते सुनता हूँ जमीन के बदले में नौकरी और पैसा मिल रहा तो क्या बुरा है। एक पूंजीवादी व्यवस्था के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी जहाँ देश एक फैक्ट्री हो जाए और देश के किसान उसके नौकर हो जाए।

    जब सूबे का मुख्यमंत्री कहता है की हमने किसानों से बिजली के लिए कुछ नहीं कहा तब लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि चोरी को बढ़ावा दे रहा। किसान जो अन्न उगा रहा , रख रखाव कर रहा , देश दुनिया के लिए भोजन, कपड़े आदि की व्यवस्था कर रहा सारा तथाकथित विकास जिसके शोषण के दम पर खड़ा है वह बिजली चोर हो गया। वह अच्छा खा पी ओढ़ नहीं सकता। इस नैतिकता की दुहाई वो जमात दे रही जिसके लिए बिजली का उपयोग फोन, लैपटॉप चार्ज करने , ऐसी, कूलर, वाशिंग मशीन, फ्रीज आदि उपकरण चलाने भर तक बिना एक बूंद पर्यावरण के बारे में सोचे बिना करते है। बिजली जैसे नोटों से पैदा हो जाती हो। खाना जैसे नोटों से पैदा होता हो, कपड़े जैसे नोटों से पैदा होते हो , पानी जैसे नोटों से बनता हो। केवल समझ या मन में यह सब न कर पाने की टीस भी रखते तो बेहूदी बात कहने से पहले दस बार सोचते।

    चलते चलते –

    गाँधी जी इन मंसूबों को अच्छे से समझते थे। वह देश को गांव की नजर से देखते थे। वह समझते बूझते थे कि इस देश की आत्मा गांव और किसान है। इनका बाजारीकरण करने के बजाय यहां से सीखने और प्रयोग करने की जरूरत है। वह किसान को नौकर बनने के की बजाय कुटीर उद्योगों और प्राकृतिक खेतीं के माध्यम से मालिक बनने को कह रहे थे। देश-दुनिया पर्यावरण और बेहतर जीवन जा रास्ता इन्हीं अल्टरनेट व्यवस्थाओं से होता हुआ निकेलगा जिसके केंद्र में किसान और कृषि होंगे।
    किसानों के पास हमेशा व्यवस्था बदल सकने की ताकत रहीं है, किसान आपकी दयादृष्टि पर नहीं है। किसान की दयादृष्टि पर आप है। देश की अर्थव्यवस्था पहले भी खेती किसानी पर निर्भर थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। यह हमें तय करना है की हम किसानों के शोषण पर आधारित व्यवस्था, देश को नरकीय स्थिति में ले जाने के साथ है अथवा उस व्यवस्था के जिसमें किसान और जमीन जो देश की अर्थव्यवस्था का आधार है वह पोषण और लाभ की स्थिति में होने है।

  • हत्यारा किसान, दयालु चोर और क्रांतिकारी शासक!

    Tribhuvan

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    चंपूद्वीप के गर्तखंड में एक किसान के खेत में कुछ लोग घुस आए। वे गन्ने तोड़ने लगे। सरसों उजाड़ने लगे और गाजरें नष्ट करने लगे। किसान ने ऐतराज किया तो वे नहीं माने। किसान ने आव देखा न ताव, हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मारो-मारो-चोरों को मारो।

    किसान की आवाज़ सुनकर आसपास के किसान भाग-भागकर आने लगे। वे भी शोर मचाने लगे : चोर-चोर।

    चोर डरकर भागने लगे। खेत में काम कर रहे एक मजदूर ने एक भागते चोर को पकड़ने की कोशिश की। चोर ने मजदूर को गोली मार दी। मजदूर मर गया। पूरे इलाके में हल्ला हो गया।

    घटना होते ही पुलिस आई। दो-चार दिन जांच की और आख़िर किसान को असली हत्यारा बताकर पकड़ ले गई। पूरी फ़र्द तैयार की और किसान जांच रिपोर्ट में हत्यारे को उकसाने के आरोप का दोषी पाया गया; क्योंकि किसान के “चोर-चोर! भागो चोर-चोर!!! मारो चोरों को!!!” बोलने के बाद ही चोर ने मजदूर को मारा था और चालाक चोरों ने हल्ला मचाते किसान के विडियो अपने मोबाइल फ़ोन में बना लिए थे।

    अंतत: किसान हत्या का दोषी ठहराया गया और उसे चालानी गार्ड जेल ले जाने लगे तो वहां एक और ही दृश्य था, जिसने किसान की आंखों में पानी ला दिया।

    पुलिस, प्रशासन, विधायिका, कार्यपालिका आदि आदि ने देखा कि सारे चोर जार-जार रोए जा रहे थे। किसान इन रोते हुए चोरों को एकटक देख रहा था और हैरान हो रहा था।

    पुलिस, प्रशासन, विधायिका, कार्यपालिका आदि के प्रतिनिधियों ने चोरों के प्रति सहानुभूति जताई और पूछा : अरे, तुमने हत्या की और फिर भी तुम्हें साफ बचा लिया। अब क्यों रोए जा रहे हो? मीडिया तुम्हारी तारीफें लिख रहा है, किसान की आलोचना कर रहा है, अदालत ने तुम्हारे बारे में कुछ पूछा ही नहीं, क्योंकि पुलिस की फर्द में तुम्हारे बारे में जो कुछ था, सब हटा दिया गया था। यहां तक कि किसान को किसान ही नहीं माना गया क्योंकि जमीन उसके नाम ही नहीं चढ़ी थी, वह तो पुराने जमींदार के ही नाम कागजों में बोल रही थी। किसान ने जींस पहन रखी थी और उसने एक चश्मा लगा रखा था, जिसे हमने रेबेन का साबित कर दिया था। उसके यहां रोजड़ों को भगाने के लिए सूतली बम रखे थे, पुलिस के आईओ ने सूतली शब्द हटाकर उसे बम कर दिया था और किसान सिर्फ़ हत्या ही नहीं, देशद्रोह के आरोप में भी जेल में है। पूरी सरकार तुम्हारे साथ है। अब क्यों रो रहे हो?

    सारे चोर और ज़ाेर-ज़ोर से रोने लगे और एक साथ बोले : आप जैसे न्यायकारी, दयालु, राष्ट्रभक्त, परोपकारी, सहिष्णुकारी और मानवतावादी पुलिस अफसर, मींडियाकर्मी, न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी नहीं रहेंगे तो इस देश का क्या होगा!

    सारे चोर और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। किसान प्रसन्न था कि इस देश का भविष्य स्वर्णिम है; भले न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया से करुणा और न्याय नदारद हो जाएं, कम से कम वह कुछ आंसुओं के रूप में चोरों के हृदय में तो अक्षुण्ण है!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook Wall

  • सोशल इंजीनियरिंग के लिए इतिहास से छेड़छाड़

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    विभिन्न समुदायों को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करना और हिन्दू समुदाय में नीची जातियों का निम्न दर्जा बनाए  रखना, हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रमुख एजेंडा है। इसी एजेंडे के तहत, मुस्लिम राजाओं को विदेशी आक्रांताओं के रूप में प्रस्तुत कर उनका दानवीकरण किया जाता रहा है। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने भारत के लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का प्रयास किया और इसी के नतीजे में, जाति प्रथा अस्तित्व में आई। इसी एजेंडे का दूसरा हिस्सा है आर्यों का महिमामंडन और हिन्दू पौराणिक कथाओं की इतिहास के रूप में प्रस्तुति। हाल में ब्राह्मणवादी मूल्यों को बढ़ावा देना और दलितों व ओबीसी को राष्ट्रवादी खेमे में शामिल करना भी इस एजेंडे में शामिल हो गए हैं।

    पिछले साल ओणम (सितंबर 2016) पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर यह कहा था कि ओणम, विष्णु के पांचवे अवतार वामन के जन्म का समारोह है। इसी के साथ, आरएसएस के मुखपत्र ‘केसरी’ ने एक लेख छापा जिसमें कहा गया कि पुराणों और अन्य हिन्दू धर्मग्रंथों में कहीं यह नहीं कहा गया है कि महाबली को वामन ने पाताललोक में धकेल दिया था। यह भी कहा गया कि धर्मग्रंथों में कहीं ऐसा वर्णित नहीं है कि महाबली, हर वर्ष मलयाली चिंगम माह में धरती पर आते हैं।

    यह पटकथा, केरल में ओणम से जुड़ी कथा के एकदम विपरीत है। ओणम, फसल की कटाई का महोत्सव है और यह माना जाता है कि इस दौरान वहां के लोकप्रिय राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। केरल में ओणम सभी धर्मों के अनुयायियों का त्योहार बन गया है। भाजपा, इसे विष्णु के वामन अवतार से जोड़कर, उसे केवल ऊँची जातियों का त्योहार बनाना चाहती है।

    इतिहास को संघ परिवार द्वारा किस तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, इसका एक उदाहरण है उत्तरप्रदेश के भाजपा कार्यालय, जिसकी हाल में नवीन साज-सज्जा की गई है, में टंगा एक तैलचित्र। एक नज़र देखने पर यह तैलचित्र राजपूत राजा महाराणा प्रताप का लगता है। परंतु असल में यह 11वीं सदी के एक राजा सुहैल देव का तैलचित्र है। महाराज सुहैल देव के बारे में बहुत कम लोगों ने सुना है। इन्हें पासी और भार, ये दोनों समुदाय अपना राजा मानते हैं। सुहैल देव, भाजपा के नायकों की सूची में शामिल कैसे हो गया? उत्तरप्रदेश के बहराईच में अमित शाह ने सुहैल देव की एक प्रतिमा का अनावरण किया और उस पर लिखी एक पुस्तक का विमोचन भी किया। सुहैल देव को एक ऐसा राष्ट्रीय नायक बताया जा रहा है जिसने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। उसके नाम पर एक नई ट्रेन शुरू की गई है जिसका नाम ‘सुहैल देव एक्सप्रेस’ है।

    इसी महीने (जून 2017), उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह घोषणा की कि लखनऊ के अंबेडकर पार्क में छत्रपति शाहू, जोतिराव फुले, अंबेडकर, काशीराम व मायावती के साथ-साथ सुहैल देव की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएगी। इस पार्क का निर्माण मायावती सरकार ने करवाया था और सुहैल देव को छोड़कर, अन्य सभी प्रतिमाएं वहां पहले से ही लगी हुई हैं। अब इस पार्क में अन्य जातियों के नायकों की प्रतिमाएं भी लगाई जाएंगी। यह कहा जा सकता है कि प्रतिमाएं लगाने के मामले में मायावती ने एक तरह की अति कर दी थी परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि अंबेडकर पार्क, लोक स्मृति में दलित पहचान को एक सम्मानजनक स्थान देने का प्रयास था। हाल में किया गया निर्णय, इतिहास के उस संस्करण का प्रचार करने का प्रयास है, जो हिन्दू राष्ट्रवादियों को सुहाता है। सुहैल देव के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने सालार महमूद (गाज़ी मियां) से मुकाबला किया था। गाज़ी मियां, महमूद गज़नी का भतीजा था, जो इस क्षेत्र में बसने आया था।

    प्रो. बद्रीनारायण (‘फेसिनेटिंग हिन्दुत्व’, सेज पब्लिकेशंस) के अनुसार, लोकप्रिय आख्यान यह है कि सुहैल देव ने अपने राज्य में मुसलमानों और दलितों पर घोर अत्याचार किए थे। उसके दुःखी प्रजाजनों की मांग पर सालार महमूद ने सुहैल देव के साथ युद्ध किया, जिसमें दोनों राजा मारे गए। गाज़ी मियां की दरगाह पर जियारत करने मुसलमानों के अलावा बड़ी संख्या में हिन्दू भी जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि दरगाह पर ज़ियारत करने से रोगों से मुक्ति मिलती है। दरगाह की बगल में एक तालाब है, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसमें नहाने से कुष्ठ रोगी ठीक हो जाते हैं।

    इसके विपरीत, आरएसएस और उसके संगी-साथियों द्वारा यह कथा प्रचारित की जा रही है कि गाज़ी मियां एक विदेशी आक्रांता थे और सुहैल देव ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उससे युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में सुहैल देव का ज़िक्र किया। उन्होंने सुहैल देव को एक ऐसा राजा बताया जो गोरक्षक था और जो गायों को अपनी सेना के सामने रखकर युद्ध में भी उनका इस्तेमाल करता था।

    जहां आम लोगों के ज़हन में गाज़ी मियां की छवि सकारात्मक है वहीं भाजपा, सिर्फ हिन्दू नायक बताकर अलग-अलग तरीकों से सुहैल देव का सम्मान करने की कोशिश कर रही है। सुहैल देव इस मामले में भाजपा की दोहरी रणनीति है। एक ओर वह उसे इस्लाम के विरूद्ध लड़ने वाला हिन्दू नायक बता रही है तो दूसरी ओर वह पासी-राजभर समुदायों का एक नया नायक पैदा करना चाहती है। भाजपा का लक्ष्य यह है कि दलितों की हर उपजाति के अलग-अलग नायक खड़े कर दिए जाएं – फिर चाहे उन्होंने दलितों की भलाई के कुछ किया हो या नहीं। इसका उद्देश्य दलित एकता को खंडित करना है और इससे भाजपा के नायकों में एक और राजा जुड़ जाएगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकर पार्क में जिन व्यक्तियों की मूर्तियां लगी हैं, उनमें से कोई भी सामंत नहीं था और ना ही सामंती व्यवस्था का प्रतिपादक था। इन सभी ने दलित समुदाय को उसकी गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए अलग-अलग तरह से प्रयास किए। इन सभी ने दलितों की समानता की लड़ाई में भागीदारी की। राजाओं को तो केवल पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए सामने लाया जा रहा है।

    हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए वह हिन्दू राजाओं का महिमामंडन करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। राज्यतंत्रों की शासन व्यवस्था का आज के युग में कोई भी समर्थन नहीं कर सकता। परंतु संप्रदायवादी राष्ट्रवादियों को सामंती काल के मूल्य प्रिय हैं और वे उन्हें पुनर्स्थापित करना चाहते हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का यह कथन कि राणा प्रताप को ‘महान’ बताया जाना चाहिए, इसी रणनीति का भाग है। राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने अब यह दावा भी कर दिया है कि हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर नहीं बल्कि राणाप्रताप की विजय हुई थी। पहले तो संघ परिवार केवल इतिहास के तथ्यों के नई व्याख्या करता था। अब वह तथ्यों को ही बदल रहा है। एरिक हॉब्सबोन ने बिलकुल ठीक ही कहा था कि राष्ट्रवाद के लिए इतिहास वही है, जो कि नशाखोर के लिए अफीम।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

    Tribhuvan

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    देश में हिंसक और बेकाबू होते आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस के अफ़सर क्यों विफल हो रहे हैं? क्यों अपने ही लोगों पर अपने ही लोगों को गोलियां चलानी पड़ती हैं? ऐसा क्या है कि नारेबाजी या प्रदर्शन करते लोगों पर आम लोगों के वही बेटे अपने ही लोगों पर गोलियां दागने लगते हैं, जिनसे उन्हें बहुत उम्मीदें होती हैं? क्या पुलिस को वाकई ऐसा नहीं बनाया जा रहा है? और क्या इसके लिए सिर्फ़ आज की सरकारें ही दोषी हैं?

    हम अगर लोगों के उग्र आंदोलनों को टटोलें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। आज़ादी के अांदोलन में जलियांवाला बाग नरसंहार को याद करें तो हम आम तौर पर किसी जनरल ओ डायर को कोसते हैं। हक़कीत ये है कि ये काम जनरल ओ डायर ने नहीं, कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने किया था। यह ब्रिटिश सेना का अधिकारी था और उसे अस्थायी तौर पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल लगाया गया था। वह संकीर्ण राष्ट्रवादी ब्रिटिशर्स के लिए एक नायक था, लेकिन उदारवादी ब्रिटिश इतिहासकारों आैर तटस्थ प्रेक्षकों ने उसे खलनायक बताया और उसकी निंदा की। कुछ ने उसे भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने वाली घटना का प्रणेता भी घोषित किया, लेकिन अत्याचारों के प्रति सदा से सहिष्णु हम भारतीयों ने इस नृशंस कांड को भी बर्दाश्त किया और ब्रिटिश शासन को 28 साल तक बर्दाश्त किया। नहीं किया तो उस किशोर ने जिसे शहीदे आज़म भगतसिंह कहा जाता है।

    लेकिन प्रश्न ये है कि क्या गोली कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने चलाई थी? नहीं गोलियां हमारे ही लोगों ने हमारे ही लोगों पर चलाईं और 1500 नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये हमारी ही भारतीय सेना के लोग थे। ये 9वीं गुरखा बटालियन के फौजी थे और बंदूकों के साथ-साथ खुखरियों तक से लैस थे। उनके अलावा सिख, बलौच और दूसरी बटालियनों के फौजी थे। वह अंग़रेजी शासन शैली थी और यह समझ आता है कि उनके लिए ऐसा करना जरूरी था। लेकिन आजादी के बाद हमारे शासकों ने आज तक इस नीति को नहीं बदला है। वही प्रशासनकीय शैली है और वही पुलिसीय। ऐसी कितनी ही घटनाएं बताती हैं कि स्वतंत्र भारत में हमारे शासकों ने पुलिस को वही पुलिस रहने दिया है और लोगों के प्रति नीति को भी वैसा ही।

    न जाने यह कब समझ आएगा कि हमारे अपने ही लोगों पर अपने ही पुलिस अधिकारियों को गोलियां क्यों चलानी चाहिए? हमारे शासकों को चाहिए कि वे आंदोलनों के प्रबंधन में भी अपने अफ़सरों और पुलिस के जवानों को दक्ष बनाएं और इसके लिए विश्व भर से और अपने अनुभवों से सीखने की जरूरत है। आज हमारे जवानों की न केवल ऊर्जा व्यर्थ जाती है, बल्कि उन्हें वीवीआईपी सुरक्षा के नाम पर घंटों तपना पड़ता है। हम देखते हैं कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रेदेऊ एक रेस्तरां में बैठकर गपशप कर सकते हैं, लेकिन हमारे यहां के नेताओं ने पिछले 70 साल में ऐसी संस्कृति बना दी है कि वे दुनिया के सबसे दुर्लभ नगीने हैं।

    यह समय की मांग है कि हम अपने किसानों को या आम नागरिकों को भी यह सिखाएं कि आंदोलन किए कैसे जाते हैं? आम नागरिकों में इस शिक्षा का प्रचार होना चाहिए और खासकर किसान संगठन चलाने वाले या अन्य संगठनकर्ताओं को यह प्रशिक्षण दिया जाना देशहित में है कि आंदोलन हिंसक न हों और वे एक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से सरकारी तंत्र पर दबाव बनाने में सफल रहें। भारतीय राजनेताओं बहुत चालाक हैं और वे यह नहीं चाहते कि ऐसी कोई विधि विकसित हो, क्योंकि इससे उन्हें ही नुकसान होता है, लेकिन लोकहित में आम लोगों को ऐसी लोकनीति के लिए सरकारी तंत्र पर दबाव बनाना चाहिए और कहना चाहिए कि आप वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाओं के सहयोग से ऐसे गोले या कारट्रिज विकसित करें, जिससे किसी का नुकसान नहीं हो, लेकिन वे नियंत्रित भी रहें। लाेगों को अपनी आवाज़ मुखरता से उठाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए और ऐसी संस्कृति विकसित हो कि आंदोलन से पहले ही वार्ताओं के रास्ते खुलें और आंदोलकारियों के नेताओं से बातचीत की जाए।

    सनद रहे कि गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall.

  • अरे पहले ढंग से इंसान तो बनो

    Ruman Hashmi

    [themify_hr color=”red”]

    ना मुसलमान खतरे में है,
    ना हिन्दू खतरे में है
    धर्म और मज़हब से बँटता
    इंसान खतरे में है।।

    ना राम खतरे में है,
    ना रहमान खतरे में है
    सियासत की भेट चढ़ता
    भाईचारा खतरे में है।।

    ना कुरआन खतरे में है,
    ना गीता खतरे में है
    नफरत की दलीलों से
    इन किताबो का ज्ञान खतरे में है।।

    ना मस्जिद खतरे में है,
    ना मंदिर खतरे में है
    सत्ता के लालची हाथो,
    इन दीवारो की बुनियाद खतरे में है।।

    ना ईद खतरे में है,
    ना दिवाली खतरे में है
    गैर मुल्कों की नज़र लगी है,
    हमारा सदभाव खतरे में है।।

    धर्म और मज़हब का चश्मा
    उतार कर देखो दोस्तों
    अब तो हमारा
    भारत खतरे में है |

    एक बनो, नेक बनो
    ना हिन्दू बनो ना मुसलमान बनो,
    अरे पहले ढंग से इंसान तो बनो।।

     

  • जय जवान – जय किसान :: सत्ता की दुकान

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    आप किसानों को पुलिस की गोलियों से मरवा दो। आप जवानों को आतंकवादियों की गोलियों से मरने को मजबूर कर दो। आप जय जवान और जय किसान के नारे लगाते रहो।

    आप साठ हजार और सत्तर हजार करोड़ रुपए के युद्धक विमान खरीदते रहो और जवानों को यों ही मरने उनके हालात पर छोड़ दो! आप अमेरिका और फ्रांस की हथियार कंपनियों को लाखों करोड़ रुपए लुटवाते रहो, लेकिन न इस देश के जवानों की चिंता करो और न किसानों की। आप किसानों को मूर्ख बनाते रहो, वोट लेते रहो और अपनी सरकारें स्थापित करते रहो।

    आप 15 अगस्त 1947 से ऐसा का ऐसा कर रहे हो। आपकी सत्ता की दुकान वही की वही रहती है और हर पांच, दस या पंद्रह साल में एक बार उस दुकान का बोर्ड बदलते हो। सत्ता की आपकी यह दुकान किसी राज्य में किसी के नाम से चलती है और किसी राज्य में किसी से। आप कभी किसी निरीह गाय पर दांव खेल जाते हो और कभी किसी बकरी को बादाम खिलाकर अपने सत्ता प्रतिष्ठान की दुंदुभियां बजाते रहते हो।

    किसान अपना हक मांगे तो अापकी पुलिस उसे कानून और व्यवस्था के नाम पर गोलियों से ऐसे भून देती है जैसे जनरल डायर ने हमारे ही लोगों को भून दिया था। जवान अगर अपने खाने में खराबी को लेकर ठेकेदार की शिकायत भर कर दे तो अाप बदनामी से डरकर उसकी नौकरी छीन लेते हो। आप तो आप हैं। आप और आपके चमचों के अलावा इस देश में सबके सब देशद्रोही हो जाते हो। अाप सत्ता में इतने अंधे हो जाते हो कि आप अपने ही लोगों को पार्टी द्रोही बताकर उन्हें राम की तरह बनवास जैसी हालत में फेंक देते हो, क्योंकि आपकी सत्तावादी राजनीति की आत्माओं में मंथराएं विराजती हैं।

    आप कभी कांग्रेस, कभी जनता दल, कभी कम्युनिस्ट पार्टी, कभी माले और कभी बसपा, कभी सपा, कभी अकाली, कभी आम आदमी और कभी अनाद्रमुक, द्रमुक और कभी आप शिवसेना हो जाते हो। आप कभी यह तो कभी वह का रूप धारण कर लेते हो। आप गिरगिट की तरह रंग बदलते हो और गिरगिट आपके सामने लज्जित हो जाता है। आप जब सत्ता से बाहर होते हो तो आप अपने पास अमृत कुंड रखने का दम भरत हो और जैसे ही आप सत्तासीन होते हो तो आप अपने सोने के घड़ों को विष से भर लेते हो। प्रभु, आप का यह कौनसा रूप है? आप सफेद, हरे, लाल, नीले, आसमानी और न जाने कैसे-कैसे हो जाते हो। आप तिरंगे होते हैं तो आपकी आत्मा का कालापन साफ दिखता है, लेकिन आप जब केसरिया होने की कोशिश करते हैं तो आपका हृदय केसर की क्यारियां खिलाने वाले लोगों को देखकर डरप उठता है।

    आप राजस्थान के घड़साना में किसानों को गोलियों से भून देते हो। आप आंदोलन कर रहे 70 गुर्जरों को एक साथ गोलियों से धराशायी कर देते हो। आप कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और उड़ीसा में आंदोलनकारियों के रक्त से स्नान करते हो। आप लोकतांत्रिक युग में हो और आदिम युग का सा विकल्प लेकर प्रस्तुत होते हो। आप चुनावों में ऐसे प्रस्तुत होते हैं, मानो आप ही भगवान राम और श्रीकृष्ण के अवतार हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता में आप आते हो और लोग आंदोलन करते हैं तो आपका भी स्वरूप वही पुरानी सरकार सा विकराल नजर आता है और आपकी सरकार नरमुंड धारण करने को उत्कंठित किसी काली का स्वरूप नजर आती है, लेकिन लोकतांत्रिक युग के प्रभुओ, सुनो कि काली दुष्टों का दमन करके उनके नरमुुंड पहनती थी कि न कि अपनी ही प्रजा के। वह प्रजा को सताने वालों को दंडित करती थी, लेकिन आपकी माया अनूठी है मेरे प्रभु। आप तो सताए हुओं के नरमुंडों की माला पहनते हो।

    अाप कैसे राजनेता हैं? आख़िर इस देश के राजनेता किस दिन ऐसी नीतियां बनाएंगे कि न इस देश के जवानों का रक्त बहे और न किसान का। कब हमारे राजनेता ऐसे देश का निर्माण करेंगे कि सीमा पर हमारे जवान के युद्ध आभूषण देखकर शत्रु निगाहें नीची कर ले और किसान सीना तानकर चले। कब कश्मीर में शांति लौटेगी और कब सरहद पर हम रक्तस्नान बंद करेंगे? भगवान् महावीर और बाबा नानक के इस देश में कब कोई देश के नागरिकों से प्रेम करने वाला अपना सा शासक आएगा? https://geembi.com कब कोई भगवान बुद्ध की शिक्षा लेकर इस देश के आम नागरिक के साथ उसके आंसू पौंछने और उसके क्लेश मिटाने आएगा? कब कोई भगवान राम की इस मर्यादा को इस देश में स्थापित करेगा कि किसी के मन को पीड़ा पहुंचाकर सत्ता प्राप्त करना मैं अपनी ठोकर के बराबर मानता हूं और कब इस देश में ऐसे राजसी लोग होंगे, जो सत्तासीन होने वाले भरत के साथ नहीं, वनगमन को जाते राम का साथ गहेंगे।

    आखिर क्यों हमारे देश का किसान दो रुपए किलो टमाटर और ढाई रुपए किलो प्याज बेचने को मजबूर है? नोटबंदी के दिनों में किसानों ने मुफ़्त में अपनी मटर, गोभी, आलू और अन्य फसलें मुफ्त तक कटवा डालीं। क्या किसी व्यापारी ने कभी ऐसा किया है? क्या देश में कभी ऐसे हालात बन हैं कि कारोबारियों ने घाटा खाकर चीजें बेची हों। आखिर किसान को ही आत्महत्या करने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है? क्यों ऐसा है कि चुनाव जीतने के लिए यूपी के किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाते हैं और शेष देश के किसान तड़पकर रह जाते हैं? आप क्यों ऐसी चालें चलते हैं कि एक जगह जो चीज ठीक है, वही दूसरी जगह एकदम गलत हो जाती है। आपके लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों का किसान उसी कर्जमुक्ति का पात्र क्यों नहीं बनता जो आप उत्तरप्रदेश में सहज ही बना देते हैं।

    आखिर कब वह समय आएगा जब इस देश को भगवान राम जैसा कोई शासक मिलेगा, जो अगर झूठे ही किसी की शिकायत सुन ले तो अपनी प्राण प्रिया को निकाल बाहर करे या सत्ता को ठोकर मार कर चल दे। बन-बन भटकता फिरे और सबसे कमजोर लोगों में ऐसी ताकत भर दे कि वे उफनते समुद्र पर पुल बना दें और राक्षसी सत्ता का सर्वनाश कर दें। न कि वे अपने ही भाई बंधुओं सहनागरिकों और सह शासकों को झूठे बदनाम करके अपनी मैली आत्माओं को सबसे सुवासित घोषित करने के शासकीय आदेश जारी कर दें। यह कब तक होता रहेगा?

    राजनीतिक दलों का यह रवैया कब बदलेगा कि वे खुद तो सुरक्षित होते रहें और इस देश के जवान और किसान को बेहाल मरने के लिए छोड़ दें। कभी वह अपने ही नागरिकों को यह बना दे या वह बना दे और खुद एक कड़े सुरक्षा घेरे में सदा मौज करे? सिर्फ बातों ही बातों का कारोबार करके आप कब तक यह खतरनाक खेल खेलते रहेंगे? कब तक ऐसा होगा कि किसान सिसकेगा और नेता हंसेगा? कब तक ऐसा होगा कि जब प्रदूषण फैलाने वाले कंप्यूटर अौर गैजेट्स अाएंगे तो आप उनका स्वागत करते हुए धन्य होंगे और किसान के लिए कोई बेहतरीन बीज आएगा तो आप जीएम का नाम लेकर किसानों को डरा देंगे और पेस्टीसाइड लॉबी ठटाकर आपकी मूर्खता पर हंसती रहेगी! आखिर कब तक? आखिर कब तक आप लोगों के साथ ऐसा करेंगे? आप कब तक भारतीय नागरिक को उसके धर्म और उसकी जाति में बांटकर भारत माता के हृदय की वाहिनियों में विष भरते रहेंगे? आप तक भारत माता के पुत्रों में किसान और पुलिस का फर्क करके उनके दमन की राहें प्रशस्त करेंगे? क्या सत्ता में प्रजा का कोई स्थान नहीं है? प्रिय शासको, यह हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हैं और आपका यह फर्ज है कि आप आज किसानों के साथ वही न्याय करो, जिसकी आप विपक्ष में रहकर मांग करते रहे हैं और विपक्ष तो आज कहीं प्रश्न करने को भी प्रस्तुत नहीं है, इसलिए उसके लिए कहा भी क्या जाए!

    हे मेरे शासकीय राजनेता, तू 15 अगस्त 1947 से जो अपने ही नागरिकों के रक्त से स्नान कर रहा है, वह कब तक करेगा और कब तक इसे राष्ट्रप्रेम घोषित करता रहेगा?

    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से

     

     

  • मोदी सरकार के तीन साल

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

    [themify_hr color=”red”]

    इस 26 मई को मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर विभिन्न शहरों में ‘मोदी फैस्ट’ के अंतर्गत धूमधाम से बड़े-बड़े समारोह आयोजित किए गए। इन समारोहों से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश समृद्धि की राह पर तेज़ी से अग्रसर हुआ है और कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल हुई हैं। मोदी को उनके प्रशंसक, ‘गरीबों का मसीहा’ बताते हैं। कई टीवी चैनलों और टिप्पणीकारों ने उनकी शान में कसीदे काढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

    असल में पिछले तीन सालों में क्या हुआ है?

    एक चीज़ जो बहुत स्पष्ट है, वह यह है कि मोदी सरकार में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है। यह तो सभी को स्वीकार करना होगा कि यह सरकार अपनी छवि का निर्माण करने में बहुत माहिर है। नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोज़गार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली में किए गए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन को सरकार के पिछलग्गू मीडिया ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का भी हुआ।

    विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रूपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है। पहले राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया और अब पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है और मुसलमानों के एक बड़े तबके की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी गई है। सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रूख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्यों के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र, अपराधियों को सज़ा दिलवाने की बजाए, पीड़ितों को ही परेशान कर रहा है।

    सामाजिक स्तर पर पहचान के मुद्दे छाए हुए हैं। पिछली यूपीए सरकार भी अपनी सफलताओं का बखान करती थी परंतु कम से कम यह बखान लोगों के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार संबंधी अधिकारों पर केन्द्रित था। अब तो चारों ओर झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है। पाकिस्तान के मुद्दे पर सरकार जब चाहे तब आंखे तरेरती रहती है। सीमा पर रोज़ भारतीय सैनिक मारे जा रहे हैं परंतु आत्ममुग्ध सरकार, सर्जिकल स्ट्राईक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़कों के अलावा अब लड़कियां भी सड़कों पर निकलकर पत्थर फेंक रही हैं। कश्मीर के लोगों की वास्तविक समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। उनसे संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।

    हिन्दुत्ववादी देश पर छा गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र का लगभग भगवाकरण हो गया है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर गंभीर हमले हुए हैं। ‘पारंपरिक ज्ञान’ को वैज्ञानिक सिद्धांतों पर तवज्ज़ो दी जा रही है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया जा रहा है। यहां भी अतीत का महिमामंडन करने के लिए केवल ब्राह्मणवादी प्रतीकों जैसे गीता, संस्कृत और कर्मकांड को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    दिखावटी देशभक्ति का बोलबाला हो गया है। पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने यह प्रस्तावित किया था कि हर विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक बहुत ऊँचा खंबा गाड़ कर उस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए। हर सिनेमा हॉल में फिल्म के प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान बजाया जाना अनिवार्य कर दिया गया है। एक अन्य स्वनियुक्त देशभक्त ने यह प्रस्तावित किया है कि हर विश्वविद्यालय में ‘देशभक्ति की दीवार’ हो, जिस पर सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र उकेरे जाएं। समाज के सभी वर्गों का देश की उन्नति में योगदान होता है परंतु प्रचार ऐसा किया जा रहा है, मानो केवल सेना ही देश की सबसे बड़ी सेवा कर रही हो। जो किसान खेतों में काम कर रहे हैं और जो मज़दूर कारखानों में खट रहे हैं, क्या उनकी सेवाओं का कोई महत्व ही नहीं है? लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। यह सरकार केवल जय जवान का उद्घोष कर रही है और किसान को विस्मृत कर दिया गया है।

    देश में प्रजातंत्र सिकुड़ रहा है और बोलने की आज़ादी पर तीखे हमले हो रहे हैं। मीडिया का एक बड़ा तबका शासक दल के साथ हो लिया है और वह उन सब लोगों की आलोचना करता है, जो सरकार की नीतियों के विरोधी हैं। मीडिया ने प्रजातंत्र के चैथे स्तंभ और सरकार के प्रहरी होने की अपनी भूमिका को भुला दिया है। दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या के साथ देश में असहिष्णुता का जो वातावरण बनना शुरू हुआ था, वह और गहरा हुआ है। मुसलमानों के खिलाफ तो ज़हर उगला ही जा रहा है, दलित भी निशाने पर हैं।

    आज देश में जिस तरह का माहौल बन गया है, उसे देखकर यह अहसास होता है कि केवल प्रचार के ज़रिए क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया गया है कि मोदी सरकार देश का न भूतो न भविष्यति विकास कर रही है और आम लोगों का भला हो रहा है।

    परंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई हिस्सों में लोगों ने अपने विरोध, असंतोष और आक्रोष का जबरदस्त प्रदर्शन भी किया है। किसानों के एकजुट हो जाने के कारण, मजबूर होकर, सरकार को अपना भूसुधार विधेयक वापस लेना पड़ा। कन्हैया कुमार, रामजस कॉलेज, रोहत वेम्युला और ऊना के मुद्दों पर जिस तरह देश में वितृष्णा और आक्रोष की एक लहर दौड़ी, उससे यह साफ है कि सरकार की प्रतिगामी नीतियों को चुनौती देने वालों की संख्या कम नहीं है। जहां हिन्दुत्ववादी तत्वों का स्वर ऊँचा, और ऊँचा होता जा रहा है, वहीं देश भर में चल रहे कई अभियानों और आंदोलनों से यह आशा जागती है कि भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित बहुवादी समाज के निर्माण के स्वप्न को हमें तिलांजलि देने की आवश्यकता नहीं है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • यह दुनिया ग़ज़ब है भाई

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    लालू यादव का भक्त कबीला इन दिनों नीतीशकुमार की क्या ग़ज़ब ख़बर ले रहा है। जैसे नीतीशकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भोज पर जाकर और सोनिया गांधी के भोज पर न जाकर मानो ऐसा कर दिया हो कि वे अभी गंगाजी जाने वाले थे, लेकिन अचानक से धर्म बदलकर मक्का चल दिए और हाज़ी हो गए। अरे दोस्तो, आपकी स्मृति को क्यों काठ मार गया। ये वही नीतीशकुमार हैं, जो कुछ समय पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रहे थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने से पहले नरेंद्र मोदी से बेहतर संभावित प्रधानमंत्री घोषित किया था। लालू के साथ नीतीशकुमार हो तो वह घटिया और वही नीतीशकुमार अगर नरेंद्र मोदी या भाजपा के साथ चला जाए तो पापात्मा। क्या कमाल है!

    मायावती और उनका भक्त-संप्रदाय आजकल भाजपा पर टूटकर पड़ रहा है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दलितों की इस महान् उम्मीद ने ही उत्तरप्रदेश में सबसे पहले भाजपा से गठजोड़ करके भाजपा के हिन्दुत्वाद पर मुहर लगाई थी। यह वह समय था जब वामपंथी दलों और कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करते हुए जनांदोलन खड़ा किया था। उस जनांदोलन के कई हरावल दस्ते के कई नेता आजकल नरेंद्र मोदी के यशोगान कर अपने आपको उपकृत समझ रहे हैं।

    कुछ लोग हैं, जो एक इनसान को गोमांस रखने के नाम पर नृशंस ढंग से मारकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं, मानो इस देश में इनसानियत नाम की चीज़ ही नहीं रह गई है। कांग्रेस इस पर बढ़चढ़कर हल्ला मचाती है। लेकिन अचानक हम देखते हैं कि यही पार्टी एक निरीह और निरपराध मूक प्राणी, जो दुर्भाग्य से एक कारुणिक गाय है, सार्वजनिक रूप से काटकर अपने भीतर छुपी हिंसक नृशंसता को ला बाहर करती है।

    हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र को दूषित करने पर आमादा राजनीतिक दलों, राजनीतिक लोगों और इस देश के राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों के मानस में एक विषैलापन भरता जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाएं इसकी सबूत हैं।

    लाल यादव को लोग एक बार फिर मौका देते हैं, लेकिन वह सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय आज भी पारिवारिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक ऐसा नेता है, जिसने स्वार्थाें के वशीभूत अपने साहसिक गुणों को तिरोहित करके अपने आपको लगभग डुबाे दिया है।

    मायावती के पास दलितों का एक ऐतिहासिक बल आता है, लेकिन वह सत्ता के दंभ, धन एकत्र करने और महज सीटें जीतने के लिए एक धर्मविशेष के दिखावटी प्रेम का ऐसा मूर्ख प्रदर्शन करती हैं, दूसरे धर्म के चालाक कट्टर लोग उसे चौकड़ी भुला देते हैं।

    कुछ दिन पहले एक प्रयोग हुआ आम आदमी पार्टी का। इस आम आदमी ने आम आदमी के नाम पर राजनीतिक शुचिता, व्यवहार गत ईमानदारी और सिद्धांतिप्रियता के पेट में जिस तरह छुरा घोंपा, वह तो शायद ही किसी ने किया हो।

    ये मानसिकता प्रदर्शित करती है कि एक ही व्यक्ति को ये लोग एक ही समय में महान् लोकतांत्रिक घोषित कर सकते हैं और अगले ही पल उसे फासीवादी।

    मेरी चिंता सिर्फ़ इतनी सी है कि हमारी नई पीढ़ी की नवांकुरित प्रतिभाओं के मानस पटल पर यह अविवेकीपन लाया जा रहा है।

    मुझे लगता है, हमारी नई पीढ़ी को तटस्थ होकर चीज़ों का विश्लेषण कर सोच की एक नई राह बुननी चाहिए, ताकि हम एक सबल, सुसभ्य और सुलोकतांत्रिक समाज की ओर से बढ़ सकें। ऐसे समाज की तरफ जो विवेकशील मानवतावाद से भी आगे बढ़कर प्राणि-प्रकृति प्रियता को आत्मसात कर सके।

    दरअसल, इस सबके लिए अगर कोई कुसूरवार है तो हम लोग हैं। हम अवाम। हम भारत के लोग। हम किसी के कांग्रेस के पीछे लगते हैं तो 70 साल लगे ही रहते हैं और अगर नरेंद्र मोदी हमें भाता है तो फिर ऐसा भाता है कि उसकी हिमालय जैसी भूल भी राई जितनी नहीं दिखती। हम पर कभी नेहरू का चश्मा चढ़ता है और कभी इंदिरा का। कभी हमें राजीव गांधी चमत्कृत करते हैं और कभी हमें वीपी सिंह जैसा कोई लगता ही नहीं।

    हम भारत के लोग लोकतंत्र की नसों में जो विनाशकारी तेज़ाब डाल रहे हैं, वह तो दुनिया में कहीं दिखता। हमारे सैनिक मारे जाते हैं, हमारे नागरिक मारे जाते हैं और हमारे सपने मारे जाते हैं। हम हल्ला करते हैं, लेकिन हमारी नींद नहीं उड़ती। हम जैसे बोस्निया-हर्जेगोविना बनने को उतावले हैं। हमारे सत्ताधीश आयातुल्लाह खुमैनी बनकर हमें पाकिस्तान, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान और सीरिया बनाने की राहें उलीकते हैं तो हमें दिखता नहीं। वह फिर इंदिरा गांधी हों या नरेंद्र मोदी! वह बंगाल को नारकीय हालात में बदलने वाला कम्युनिस्ट शासन हो या केरल के मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए सार्वजनिक रूप से गाय काटने वाली कांग्रेस। हम सब सेना होते हैं और हम सब पत्थर फेंकते हैं अपने ऊपर!

    हम एक प्रहसन बनने को उतावले हैं। अपने घर को सपनों का घर और अपने देश को सपनों का देश बनाने के लिए जैसे हमें कोई सरोकार ही नहीं। हम अपनी महान् सांस्कृतिक थाती को तिरोहित होते कब तक देखते रहेंगे?

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall