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  • बाबरी मस्ज़िद-राममंदिर विवादः न्याय ज़रूरी

    राम पुनियानी

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    एक लंबे इंतज़ार के बाद, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने कहा है कि काफी समय से लंबित रामजन्मभूमि बाबरी मस्ज़िद विवाद का हल न्यायालय के बाहर निकाला जाना चाहिए। उन्होंने इस मसले को सुलझाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रस्ताव भी दिया। संघ परिवार के अधिकांश सदस्यों ने खेहर के इस कदम की प्रशंसा की। इसके विपरीत, मुस्लिम नेताओं के एक बड़े तबके और अन्यों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि उच्चतम न्यायालय समझौते से समस्या का हल निकालने की बात क्यों कर रहा है, जबकि लोग न्यायालय में जाते ही इसलिए हैं ताकि उन्हें न्याय मिल सके।

    उच्चतम न्यायालय, बाबरी मस्जिद प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सन 2010 के निर्णय के विरूद्ध की गई अपील की सुनवाई कर रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि विवादित भूमि को तीन भागों में विभाजित कर दिया जाए। यह निर्णय भी सभी पक्षों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास अधिक था, न्याय करने का कम। इस भूमि पर निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दावा किया था। उच्च न्यायालय ने यह कहा कि भूमि के तीन हिस्से कर उसे निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांट दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि हिन्दू यह मानते हैं कि विवादित स्थान भगवान राम की जन्मभूमि है इसलिए जिस स्थान पर मस्ज़िद का मुख्य गुम्बद था, उसके नीचे की ज़मीन हिन्दुओं को आवंटित की जानी चाहिए। इसके बाद, विजयी मुद्रा में आरएसएस के मुखिया ने कहा था कि अब उस स्थल पर एक भव्य राममंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है और इस ‘राष्ट्रीय कार्य’ में सभी पक्षों को सहयोग करना चाहिए।

    कई लोगों को इस निर्णय से बहुत धक्का पहुंचा था। इन लोगों का कहना था कि उस स्थल पर बाबरी मस्ज़िद लगभग 500 सालों से खड़ी थी और वह स्थान सुन्नी वक्फ बोर्ड के कब्ज़े में था। विवाद की शुरूआत 19वीं सदी में हुई। सन 1885 में अदालत ने हिन्दुओं को मस्ज़िद के बाहर स्थित चबूतरे पर एक शेड का निर्माण करने की अनुमति देने से भी इंकार कर दिया था। इसके बाद, सन 1949 में मस्ज़िद के अंदर ज़बरदस्ती रामलला की एक मूर्ति स्थापित कर दी गई और इसके बाद से विवाद और बढ़ गया। मूर्ति की स्थापना एक सोचे-समझे षड़यंत्र के तहत की गई थी। यद्यपि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया था परंतु उत्तरप्रदेश प्रशासन ने उनकी एक न सुनी। इसके बाद, मस्ज़िद के मुख्य दरवाजे़ को सील कर दिया गया। सन 1996 में दक्षिणपंथियों के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मस्ज़िद के ताले खुलवा दिए।

    उस समय तक इस मुद्दे पर विहिप आंदोलन चला रही थी। इसके पश्चात, लालकृष्ण आडवाणी ने इस मुद्दे को   हथिया लिया। वे उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्हें यह महसूस हुआ कि इस मुद्दे से उनकी पार्टी को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इस मुद्दे का इस्तेमाल हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण करने के लिए किया गया। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद, आडवाणी के नेतृत्व में देश भर में रथयात्रा निकाली गई। जो लोग अन्य पिछड़ा वर्गों को आरक्षण देने के खिलाफ थे, उन्होंने इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

    भाजपा ने यद्यपि मंडल आयोग की रपट को लागू किए जाने का प्रत्यक्ष विरोध नहीं किया परंतु उसने इसके विरोधियों को राममंदिर आंदोलन की छतरी तले लामबंद करने की भरपूर कोशिश की, जिसमें वह सफल भी रही। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे मंडल बनाम कमंडल की राजनीति बताया।

    इस आंदोलन ने देश में सामाजिक सद्भाव और शांति को भंग किया। इस आंदोलन का चरम था बाबरी मस्ज़िद का ध्वंस। इसमें आरएसएस ने प्रमुख भूमिका निभाई और तत्कालीन प्रधानमंत्री पीव्ही नरसिम्हाराव चुप्पी साधे रहे। स्थानीय प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की और राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने वहां लोगों को इकट्ठा होने दिया। यह उन्होंने इस तथ्य के बावजूद किया कि उन्होंने उच्चतम न्यायालय से यह वायदा किया था कि बाबरी मस्जिद की रक्षा की जाएगी। जब बाबरी मस्ज़िद गिराई जा रही थी, उस समय नरसिम्हाराव ने अपने आपको पूजा के कमरे में बंद कर लिया। बाद में उन्होंने यह वायदा किया कि ठीक उसी स्थान पर मस्ज़िद का पुनर्निमाण किया जाएगा।

    इसके पश्चात्, तथाकथित पुरातत्वविदों ने, जो दरअसल कारसेवक ही थे, यह साबित करने का प्रयास किया कि मस्जिद की नींव, मंदिर के अवशेषों पर खड़ी है। विवादित भूमि पर किसी समय मंदिर था, इसका कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक या पुरातत्वीय सबूत उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि उच्च न्यायालय को दो-तिहाई भूमि हिन्दुओं को सौंपने के अपने निर्णय का आधार ‘आस्था’ को बनाना पड़ा। बाबरी मस्ज़िद का ध्वंस, आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा अपराध था परंतु इसके दोषियों को आज तक सज़ा नहीं दी जा सकी है।

    लिब्रहान आयोग ने बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस को षड़यंत्र का नतीजा तो बताया परंतु दुर्भाग्यवश उसने अपनी रपट प्रस्तुत करने में बहुत देरी कर दी। जले पर नमक छिड़कते हुए इस अपराध के बाद, आडवाणी और उनके साथी और मज़बूत होकर उभरे। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद देश भर में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई। मुंबई, भोपाल और सूरत में सैंकड़ों लोगों ने अपनी जानें गवांईं। दंगाईयों को भी आज तक सज़ा नहीं मिल सकी है।

    अदालतें न्याय देने के लिए बनाई जाती हैं। यह दुःखद है कि उच्च न्यायालय ने सबूतों की बजाए आस्था को अपने निर्णय का आधार बनाया। उच्चतम न्यायालय देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है। उससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह पूरे मुद्दे को केवल और केवल कानूनी दृष्टि से देखेगी और अब तक हुई भूलों को सुधारेगी। अगर अदालत ही समझौते की बात करने लगेगी तो न्याय कहां से होगा। इस मुद्दे पर हिन्दू समूहों ने अभी से यह कहना शुरू कर दिया है कि मुसलमानों को उस स्थान पर राममंदिर बनने देना चाहिए और उन्हें मस्ज़िद के लिए अन्यत्र भूमि दे दी जाएगी। जहां तक सत्ता की ताकत का संबंध है, दोनों पक्षों में कोई तुलना नहीं की जा सकती।

    भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और कई अन्यों ने यह धमकी दी है कि अगर मुसलमान विवादित भूमि पर अपना दावा नहीं छोड़ते तो संसद में भाजपा के सदस्यों की पर्याप्त संख्या होने के बाद विधेयक लाकर भूमि पर राममंदिर निर्माण की राह प्रशस्त की जाएगी। इस तरह की धमकी देना घोर अनैतिक है। सभी पक्षों के साथ न्याय किया जाना चाहिए। अभी से कई मस्ज़िदों को मंदिरों में बदलने की बात कही जा रही है। अगर फैसला अदालत के बाहर होगा तो हिन्दू राष्ट्रवादी, जो दूसरे पक्ष से कहीं अधिक आक्रामक और शक्तिशाली हैं, अपनी मनमानी करेंगे। दूसरी मस्ज़िदों को मंदिर में बदलने के प्रयासों को तुरंत रोका जाना चाहिए। ये अनावश्यक और मुसलमानों को आतंकित करने वाले हैं।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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  • राष्ट्रवाद-देशभक्ति पर जुनून का झंझावत

    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay

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    दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुए विवाद, जिसके चलते उमर खालिद को वहां इस आधार पर भाषण नहीं देने दिया गया कि उन्होंने राष्ट्र-विरोधी नारे लगाए थे, के बाद कई लोगों, जिनमें जानेमाने गायक अभिजीत भट्टाचार्य शामिल हैं, ने अभाविप का समर्थन किया है। पिछले साल की नौ फरवरी से, षासक दल की राजनीति से असहमत व्यक्तियों पर राष्ट्र-विरोधी का लेबल चस्पा करने का सिलसिला जारी है। ऐसे लोग विशेषकर निशाने पर हैं जो ‘कश्मीर-समर्थक’ और ‘भारत-विरोधी’ नारे लगाते हैं। किसी क्षेत्र के लिए स्वायत्तता की मांग करना, अलग राज्य की मांग उठाना या इनके समर्थन में नारे लगाना, हमारे संविधान की दृष्टि में क्या राष्ट्र-विरोध है?

    देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर पूर्व में विचार किया है। खलिस्तान के नाम से एक अलग सिक्ख देश की मांग के समर्थन में नारे लगाने को उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रद्रोह मानने से इंकार कर दिया था। इसके पहले, सन 1962 में, केदारनाथ बनाम बिहार शासन प्रकरण में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि देशद्रोह का अभियोग उसी व्यक्ति पर लगाया जा सकता है, जो ‘‘ऐसा कोई कार्य करे, जिसका उद्देश्य अव्यवस्था फैलाना, कानून और व्यवस्था को बिगाड़ना या हिंसा भड़काना हो।’’

    इसी तरह, उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के अनुसार ‘‘आज़ादी इत्यादि की मांग करना और उसके समर्थन में नारे लगाना तब तक अपराध नहीं है जब तक कि कोई व्यक्ति इससे आगे जाकर 1) हिंसा करे, 2) हिंसा आयोजित करे या 3) हिंसा भड़काए।’’

    स्पष्ट है कि अभाविप-आरएसएस की इस मुद्दे पर सोच, देश के कानून के अनुरूप नहीं है और ना ही भारतीय संविधान के मूल्यों से मेल खाती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के मामले में पुलिस ने कन्हैया कुमार, उमर खालिद और उनके साथियों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार तो कर लिया परंतु आज तक वह न्यायालय में उनके खिलाफ अभियोगपत्र दाखिल नहीं कर सकी है। यह ज़रूरी है कि हमारे पुलिसकर्मी, देश के कानून से अच्छी तरह से वाकिफ हों। आश्चर्यजनक तो यह है कि कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं, जिनमें केन्द्र और राज्य सरकारों के मंत्री शामिल हैं, ने भी इसी तरह की बातें कहीं हैं।

    भारत के सीमावर्ती इलाकों जैसे उत्तरपूर्व, तमिलनाडु, पंजाब और कष्मीर में समय-समय पर इन क्षेत्रों को अलग देश बनाए जाने की मांग उठती रही है। कई राजनीतिक दलों ने भी इस तरह की मांग का समर्थन किया है और उसके पक्ष में नारे बुलंद किए हैं। राज्यसभा में द्रविड़ नायक और द्रविड़ मुनित्र कषगम के सर्वोच्च नेता सीएन अन्नादुरई ने तमिलनाडु को देश से अलग किए जाने की मांग की थी। इस तरह की बातें स्वाधीनता के बाद से ही देश में कही जा रही हैं परंतु हाल के कुछ वर्षों में इन्हें राष्ट्र की एकता के लिए खतरा बताया जाने लगा है।

    इसका मुख्य कारण है संघ परिवार की विचारधारा। यह विचारधारा, भारतीय राष्ट्रवाद की उस अवधारणा से सहमत नहीं है, जो राष्ट्रीय आंदोलन से उभरी। संघ परिवार, हिन्दू राष्ट्रवाद का हामी है। भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा का विकास उस दौर में हुआ जब हम पर अंग्रेज़ों का शासन था। एक ओर था भारतीय राष्ट्रवाद, जो समावेशी था तो दूसरी ओर थे मुस्लिम और हिन्दू राष्ट्रवाद, जो अपने-अपने ढंग से अतीत का प्रस्तुतिकरण करते थे।

    भारतीय राष्ट्रवाद, भारत के भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों को भारतीय मानता है और उनकी सांझा परंपरा और संस्कृति पर ज़ोर देता है। गांधीजी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ और जवाहरलाल नेहरू रचित ‘भारत एक खोज’, भारत के इतिहास को धर्म से ऊपर उठने का इतिहास बताती हैं। मुस्लिम राष्ट्रवादियों का मानना था कि आठवीं सदी ईस्वी में सिन्ध में मोहम्मद-बिन-कासिम के अपना शासन स्थापित करने के साथ भारत में मुस्लिम राष्ट्रवाद का उदय हुआ। उनका कहना था कि मुसलमान इस देश के शासक रहे हैं और वे ही इसके असली मालिक हैं। हिन्दू राष्ट्रवादी इससे कहीं पीछे जाकर अपने को आर्यों का वंशज बताते हैं और यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि यह देश हमेशा से हिन्दू रहा है और हिन्दू ही यहां के मूल निवासी हैं। इसी को साबित करने के लिए शंकराचार्य ने भारत भूमि के चारों कोनों पर मठों की स्थापना की थी। इतिहास के ये दोनों ही संस्करण, समाज को स्थिर और अपरिवर्तनशील मानते हैं। वे उत्पादन के साधनों में परिवर्तन और अलग-अलग साम्राज्यों के उदय के देश पर प्रभाव को नजरअंदाज करते हुए, पूरे इतिहास को एक रंग में रंगने पर आमादा हैं।

    यूरोप में राष्ट्रवाद की अवधारणा की शुरूआत, औद्योगिक समाज के उदय और आधुनिक शिक्षा व संचार के साधनों के विकास के साथ हुई। एक भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोग स्वयं को राष्ट्र-राज्य बताने लगे। भारत का इतिहास, पशुपालक आर्यों से शुरू होकर कृषि-आधारित राज्यों से होते हुए औपनिवेशिक भारत तक पहुंचा। इस दौरान सामाजिक रिश्तों में कई परिवर्तन आए। औपनिवेशिक राज्य ने उस अधोसंरचना का विकास किया, जिससे भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारत एक राष्ट्र बना। इसके राष्ट्र बनने की राह को प्रशस्त किया हमारे स्वाधीनता संग्राम ने, जो दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन था।

    वर्तमान में देश पर हावी सांप्रदायिक विमर्श, सामाजिक परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ करता है। वह शंकराचार्य द्वारा चार मठों की स्थापना और गांधी के लोगों को भारतीय के रूप में एक होने के आह्वान के बीच के अंतर को समझने को ही तैयार नहीं है। वह यह नहीं समझ पा रहा है कि औपनिवेशिक काल के पहले, नागरिकता की कोई अवधारणा नहीं थी और आधुनिक अधोसंरचना के विकास के साथ ही नागरिकता की अवधारणा भी उभरी। हिन्दू राष्ट्रवादी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भौगोलिक क्षेत्र ही राष्ट्र का आधार है। वे यह मानते हैं कि हिन्दू संस्कृति, भारतीय नागरिकता की एकमात्र कसौटी है। वे धर्म को संस्कृति का चोला पहना रहे हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि हिन्दू अप्रवासी भारतीयों को भारत में नागरिक के अधिकार मिलने चाहिए।

    हिन्दुत्ववादियों का अति-राष्ट्रवाद, भारत के ‘‘गौरवशाली अतीत’’ और ‘‘अखंड भारत’’ की उनकी अवधारणाओं से जुड़ा हुआ है। वे यह समझना ही नहीं चाहते कि राष्ट्र-राज्य के विकास की क्या प्रक्रिया होती है। वे देश के कानूनों का भी सम्मान नहीं करना चाहते। उनके लिए राष्ट्रवाद एक भावनात्मक मुद्दा है और वे इसका इस्तेमाल लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए करना चाहते हैं। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि प्रजातंत्र में विविध विचारों और परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लिए जगह होनी चाहिए। जिस राष्ट्र-राज्य में ऐसा नहीं होगा, वह जिंदा नहीं रह सकेगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • जनसंख्या वृद्धि का सांप्रदायिकीकरण : जनसांख्यकीय आंकड़ों को समझने की ज़रूरत

    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay

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    सांप्रदायिक ताकतों द्वारा धर्मपरिवर्तन व जनसंख्या वृद्धि के संबंध में पूर्वाग्रहों और गलत धारणाओं का लंबे समय से समाज को बांटने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसी कड़ी में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजुजू ने एक ट्वीट कर कहा कि भारत में हिन्दू आबादी घट रही है क्योंकि हिन्दू धर्मपरिवर्तन नहीं करवाते और यह भी कि पड़ोसी देशों के विपरीत, भारत में अल्पसंख्यक समृद्ध और खुशहाल हैं। 

    लंबे समय से यह प्रचार किया जा रहा है कि देश की हिन्दू आबादी कम हो रही है और मुसलमानों की आबादी में बढ़ोत्तरी हो रही है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में हिन्दू, कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत हैं जबकि मुसलमान, आबादी का 14.23 प्रतिशत हैं। जनगणना 2011 के धार्मिक समुदायवार आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 से 2011 के बीच जहां देश की हिन्दू आबादी में 16.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई वहीं मुसलमानों के मामले में यह आंकड़ा 24.6 प्रतिशत था। इसके पिछले दशक में हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों की आबादी में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुई थी। 2001-2011 की अवधि में हिन्दुओं की आबादी 19.92 प्रतिशत बढ़ी जबकि मुसलमानों की आबादी में 29.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जनसांख्यकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों समुदायों की जनसंख्या वृद्धि दर घट रही है और इन दरों के बीच का अंतर कम हो रहा है।

    स्पष्टतः हमें यह ध्यान में रखना होगा कि आने वाले समय में मुस्लिम आबादी में वृद्धि की दर घटेगी और हिन्दू आबादी में वृद्धि दर के लगभग बराबर हो जाएगी। परंतु भविष्य में कभी भी मुसलमानों की आबादी, हिन्दुओं से अधिक होने की संभावना नहीं है। सन 2001 से लेकर 2011 के बीच हिन्दुओं की आबादी में 13.3 करोड़ की वृद्धि हुई, जो कि सन 2001 में मुसलमानों की कुल आबादी के लगभग बराबर थी। यह साफ है कि मुसलमानों की आबादी के हिन्दुओं से अधिक हो जाने के खतरे के संबंध में जो दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसमें कोई दम नहीं है। 

    जनसांख्यकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि अधिक प्रजनन दर, अक्सर शिक्षा के अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का नतीजा होती है। केरल के मुसलमानों की प्रजनन दर, उत्तर भारत के हिन्दू समुदायों से कहीं कम है और यहां तक कि केरल की कई हिन्दू जातियों से भी कम है। केरल के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र आदि के मुसलमानों से कहीं बेहतर है। यह तथ्य कि उच्च प्रजनन दर का संबंध शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं आदि से होता है, इससे भी स्पष्ट है कि दलितों (अनुसूचित जातियों) और आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) की जनसंख्या वृद्धि दर भी अन्य समुदायों से अधिक है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, अनुसूचित जनजातियां, कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत थीं। यह आंकड़ा सन 1951 में 6.23 प्रतिशत था। इसी तरह सन 1951 में अनुसूचित जातियों का आबादी में प्रतिशत 15 था जो कि सन 2011 में बढ़कर 16.6 प्रतिशत हो गया। अतः यह स्पष्ट है कि सांप्रदायिक तत्व जो दुष्प्रचार कर रहे हैं, उसमें तनिक भी सत्यता नहीं है और उसका यथार्थ से कोई लेनादेना नहीं है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रवीण तोगड़िया जैसे कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि देश में दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए वहीं साक्षी महाराज और साध्वी प्राची जैसे कुछ नेता हिन्दुओं से यह अपील कर रहे हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें

    भाजपा अध्यक्ष ने लोगों से यह अपील की है कि वे ईसाईयों की बढ़ती आबादी के खतरे को समझने के लिए उत्तर पूर्व की ओर देखें। उत्तर पूर्व, मुख्यतः आदिवासी इलाका है और यहां सन 1931 से 1951 के बीच ईसाई आबादी के प्रतिशत में वृद्धि हुई थी। इसका कारण था शिक्षा का प्रसार। अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो हमें पता चलेगा कि देश में ईसाईयों का कुल आबादी में प्रतिशत पिछले कुछ दशकों से लगभग स्थिर बना हुआ है, बल्कि उसमें कमी आई है। सन 1971 में ईसाई, देश की आबादी का 2.60 प्रतिशत थे। यह आंकड़ा 1981 में 2.44, 1991 में 2.34, 2001 में 2.30 और 2011 में भी 2.30 था। इस तथ्य के बावजूद यह दुष्प्रचार जारी है कि ईसाई मिशनरियां, आदिवासी क्षेत्रों में जमकर धर्म परिवर्तन करवा रही हैं। सन 1991 में आरएसएस से जुड़े बजरंग दल के दारा सिंह द्वारा ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टीवर्ट्स स्टेन्स को उसके दो नन्हे लड़कों के साथ ज़िन्दा जला दिए जाने के बाद से देश में ईसाई विरोधी हिंसा की शुरूआत हुई। वाधवा आयोग, जिसने पास्टर स्टेन्स की हत्या की जांच की, इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वे धर्मपरिवर्तन नहीं करवा रहे थे और यह भी कि क्योनझार व मनोहरपुर इलाकों में, जहां वे काम कर रहे थे, ईसाईयों की आबादी के प्रतिशत में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। ओडिसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बहाने ईसाई विरोधी हिंसा भड़काई गई। गुजरात में भी धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर ईसाईयों के खिलाफ हिंसा हुई। इसके साथ ही, ये आंकड़े भी हमारे सामने हैं कि ईसाईयों का कुल आबादी में प्रतिशत वही बना हुआ है। तो फिर आखिर धर्मपरिवर्तित ईसाई कहां छुपे हुए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि धर्मपरिवर्तित ईसाई, अपने धर्म को उजागर नहीं करते और इसलिए ईसाई आबादी के संबंध में सही आंकड़े सामने नहीं आ पाते। यह केवल एक आरोप है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। और अगर हम यह मान भी लें कि ऐसा हो रहा है, तो भी यह बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा होगा। 

    धर्मपरिवर्तन हमेशा से हिन्दू राष्ट्रवादियों के एजेंडे पर रहा है। आज़ादी के आंदोलन के दौरान धर्मपरिवर्तन करवाने की दो अलगअलग मुहिम चल रही थीं। पहली थी तंज़ीम जो लोगों को मुसलमान बनाना चाहती थी और दूसरी थी शुद्धि जो विदेशीधर्मों के अनुयायी बन गए हिन्दुओं को फिर से अपने घर वापस लाना चाहती थी। यह कहा जाता था कि धर्मपरिवर्तन कर लेने से वे लोग अशुद्ध’  हो गए हैं और इसलिए उन्हें शुद्धिकी प्रक्रिया से गुज़ार कर हिन्दू बनाना ज़रूरी है। पिछले कई दशकों से आरएसएस, विहिप व वनवासी कल्याण आश्रम, घर वापसी अभियान चला रहे हैं जिसका उद्देश्य उन दलितों और आदिवासियों को फिर से हिन्दू धर्म के झंडे तले लाना है जो बल प्रयोग के कारण मुसलमान और लोभ लालच में फंसकर ईसाई बन गए हैं। यह घर वापसी अभियान आदिवासी व ग्रामीण इलाकों और शहरों की मलिन बस्तियों में चलाया जा रहा है। 

    आदिवासी, मूलतः, प्रकृति पूजक होते हैं। आरएसएस का कहना है कि वे हिन्दू हैं। उन्हें हिन्दू बनाने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम ने उत्तर पूर्व में स्कूलों और होस्टलों का एक जाल बिछा दिया है। यह साफ है कि इन सारे कार्यक्रमों का उद्देश्य राजनीतिक है और समाज की भलाई की बात केवल असली इरादों को ढंकने के लिए कही जा रही है। दरअसल, संघ परिवार धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ना चाहता है।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया

  • अतीत का साम्प्रदायिकीकरण : ‘पद्मावती’ फिल्म यूनिट पर हमला

    Sanjay Leela Bhansali & Padmavati movie

    संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक फिल्म पद्मावतीकी शूटिंग के दौरान, हाल (जनवरी, 2017) में जयपुर में फिल्म यूनिट पर हमला हुआ। बहाना यह था कि फिल्म में एक स्वप्न दृश्य है, जिसमें मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी और राजपूत राजकुमारी पद्मावती को एक साथ दिखाया गया है। यह हमला करणी सेनानामक एक संगठन ने किया, जो राजपूतों के गौरवकी रक्षा के लिए काम करता है। उसका मानना था कि यह फिल्म राजपूतों की शान में गुस्ताखी है। यह दिलचस्प है कि फिल्म की शूटिंग अभी शुरू ही हुई है और करणी सेना के पास फिल्म की पटकथा उपलब्ध नहीं है। इस मामले में राज्य सरकार चुप्पी साधे रही और उसने इस हमले की निंदा करने तक की जरुरत नहीं समझी। हमले के बाद, भंसाली ने शूटिंग बंद कर दी और घोषणा की कि अब वे राजस्थान में कभी शूटिंग नहीं करेंगे। इसके बाद कुछ भाजपाविहिप नेताओं ने यह धमकी दी कि वे देश में कहीं भी इस फिल्म की शूटिंग नहीं होने देंगे। इसी करणी सेना ने कुछ समय पहले उन सिनेमाघरों पर हमले किये थे, जहाँ ‘‘जोधा अकबर’’ फिल्म दिखाई जा रही थी। यह फिल्म एक अन्य राजपूत राजकुमारी जोधाबाई पर आधारित थी।

    अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कथा कपोलकल्पित बताई जाती है, यद्यपि कुछ लोगों का मानना है कि चूँकि अलाउद्दीन खिलजी ऐतिहासिक चरित्र था, इसलिए यह कथा भी सही होनी चाहिए। सच यह है कि पद्मावती और उनके जौहर की कहानी खिलजी के शासनकाल के लगभग दो सदियों बाद, 16वीं सदी में सूफी संत मलिक मोहम्मद जायसी की एक रचना का भाग है। यह कहानी चित्तौड़ के शासक रतन सिंह और काल्पनिक सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा पर आधारित है। पद्मावती का तोता हीरामन, रतन सिंह को राजकुमारी की सुंदरता के बारे में बताता है। हीरामन, रतन सिंह को पद्मावती तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है और फिर दोनों प्रेमी एक हो जाते हैं। इस कहानी के अनुसार, रतन सिंह को राघव पंडित नामक एक व्यक्ति धोखा दे देता है और उस पर कुंभलनेर का राजा हमला कर देता है। इस हमले में रतन सिंह मारा जाता है। कुंभलनेर का राजा भी पद्मावती को पाना चाहता है। खिलजी भी राजकुमारी के सौन्दर्य पर मोहित है और उसे पाने के लिए रतन सिंह के राज्य पर हमला करता है परंतु खिलजी के वहां पहुंचने के पहले ही पद्मावती किले की अन्य महिलाओं के साथ जौहर कर लेती है। जिस सूफी संत ने यह अमर प्रेम कहानी लिखी थी, उसने इस कथा को सत्ता की निरर्थकता और मनुष्य की आत्मा की मुक्ति की चाहत के रूपक बतौर प्रस्तुत किया था। 

    Padmavati movie

    समय के साथ, पद्मावती, राजपूती शान का प्रतीक बन गई और खिलजी, एक हवसी मुसलमान आक्रांता का। विभिन्न समुदाय, अतीत को किस रूप में देखते हैं, यह काफी हद तक वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। इस कहानी का उपयोग इतिहास को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है, जिसमें राजाओं को अपनेअपने धर्मों के प्रतिनिधि के रूप में दिखाया जाता है। सच यह है कि राजाओं का उद्देश्य केवल अपने साम्राज्य का विस्तार करना रहता था। वर्तमान समय में इस तथ्य को भुलाकर, राजाओं द्वारा किए गए युद्धों को सांप्रदायिक चश्मे से देखा जा रहा है। यह बताया जा रहा है कि राजपूतों ने मुस्लिम आक्रांताओं के खिलाफ बहादुरी से युद्ध किया और ‘‘अपनी महिलाओं’’ के सम्मान की रक्षा की। इन महिलाओं ने मुस्लिम राजाओं के हाथों अपवित्रहोने से मर जाना बेहतर समझा। इस कहानी का इस रूप में प्रस्तुतीकरण, इतिहास को झुठलाने का प्रयास है। इतिहास में राजपूतों और मुगल राजाओं के गठबंधन के कई उदाहरण हैं और कई बार इस तरह के गठबंधन बनाने के लिए विवाहों का प्रयोग भी किया जाता था। ‘‘जोधा अकबर’’ फिल्म भी एक मुस्लिम राजा और हिन्दू राजकुमारी की कथा पर आधारित है। 

    समस्या यह है कि हम इतिहास और कल्पना में भेद नहीं कर पा रहे हैं। भारत में मुगल राजाओं ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के प्रयास में युद्ध और गठबंधन दोनों किए। अकबर और राणा प्रताप में लंबे समय तक युद्ध चला परंतु राणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने अकबर के पुत्र जहांगीर के साथ गठबंधन कर लिया। मुगल प्रशासन में कई राजपूत उच्च पदों पर थे। मध्यकालीन भारत में मुगल और राजपूतों के परस्पर संबंधों के कई उदाहरण हैं। 

    राजपूत राजकुमारियों के बारे में दो तरह की धारणाएं प्रचलित हैं। पहली, जिस पर अधिकांश लोग विश्वास करते हैं, वह यह है कि इन राजकुमारियों ने अपने सम्मान की रक्षाके लिए अपने जीवन की बलि दे दी और दूसरी यह कि राजघरानों ने अपनीअपनी सत्ता को मजबूत करने के प्रयास में परस्पर विवाह किए। पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले लोग ‘‘अपनी पुत्री किसी को देने’’ को अपने समुदाय की हार के रूप में देखते हैं और इसी कारण इतिहास के सच को भुलाकर जौहर का महिमामंडन किया जा रहा है। ‘‘जोधा अकबर’’ फिल्म बताती है कि किस तरह दो शासक परिवारों ने अपने गठबंधन को मज़बूती देने के लिए एक राजपूत राजकुमारी का विवाह मुगल बादशाह से कर दिया। आज समुदाय के सम्मान की जो धारणाएं प्रचलित हो गई हैं, उनके कारण इन ऐतिहासिक तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया जा रहा है। 

    ‘‘पद्मावती’’ फिल्म का मामला इससे भी एक कदम आगे बढ़कर है। राजपूतों के गौरव के स्वनियुक्त रक्षकों ने केवल अफवाह के आधार पर फिल्म यूनिट पर हमला कर दिया। हम नहीं जानते कि फिल्म के निदेशक फिल्म में क्या दिखाना चाहते हैं परंतु करणी सेना को एक स्वप्न के दृश्य में भी राजपूत राजकुमारी और मुसलमान बादशाह का साथ दिखाया जाना मंजूर नहीं था। इस तरह की असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी, कलात्मक स्वतंत्रता पर हमले कर रहे हैं और हिन्दुत्व की राजनीति उन्हें बढ़ावा दे रही है। फिल्म निर्माताओं और निदेशकों को इस तरह की ताकतों की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ रहा है। हमारी सरकार, जिसे अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करनी चाहिए, मूक होकर इस तरह की घटनाओं को देख रही है। इससे यह स्पष्ट है कि हिन्दुत्व की विचारधारा में कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं है और ना ही वह अतीत को किसी भी ऐसे रूप में दिखाए जाने के पक्ष में है, जो उसे नहीं भाता। हमारा राज्य, प्रजातंत्र की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है।


    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया

  • आधे कार्यकाल की समाप्ति पर कहां खड़ी है मोदी सरकार?

    प्रो० राम पुनियानी
    Rtd, IIT Bombay

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    नवंबर 2016 में मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो गया। इस सरकार का आंकलन हम किस प्रकार करें? कुछ टिप्पणीकार यह मानते हैं कि मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें देश आशाभरी निगाहों से देख रहा है और जो साहसिक कदम उठाने की क्षमता और इच्छा रखते हैं। उन्हें देश को बदल डालने का जनादेश मिला है और वे उसे पूरा करेंगे। जहां कुछ लोगों की यह सोच है, वहीं देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, मोदी और उनकी सरकार को इस रूप में नहीं देखता। यह सरकार अच्छे दिन लाने और देश के सभी नागरिकों के बैंक खातों में 15-15 लाख रूपए जमा करने के वायदे पर सत्ता में आई थी। न तो अच्छे दिन आए और ना ही 15 लाख रूपए। उलटे, मंहगाई बेलगाम हो गई और ऊपर से सरकार ने नोटबंदी के जिन्न को बोतल से निकाल आमजनों को भारी मुसीबत में फंसा दिया। ऐसा बताया जाता है कि देश भर में कम से कम 100 लोग बैंकों के बाहर लाइनों में खड़े रहने के दौरान इस दुनिया से विदा हो गए। रोज़ खाने-कमाने वालों का भारी नुकसान हुआ। लाखों प्रवासी श्रमिक अपना रोज़गार खो जाने के कारण अपने-अपने घरों को वापस लौटने पर मजबूर हो गए।

    इस सरकार की एक विशेषता है हर प्रकार की शक्तियों का एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रीयकरण। और वह व्यक्ति कौन है, इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया गया है। कैबीनेट मात्र एक समिति बनकर रह गई है जो श्री मोदी के निर्णयों पर ठप्पा लगाती है। इसका एक उदाहरण है विमुद्रीकरण के निर्णय को कैबिनेट की स्वीकृति। देश की विदेश नीति में भारी बदलाव किए जाने का ज़ोरशोर से ढिंढोरा पीटा गया।  पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया और श्री मोदी, दर्जनों विदेश यात्राओं पर गए। आज ढाई साल बाद भारत के पाकिस्तान और नेपाल से रिश्ते पहले की तुलना में खराब हैं और दुनिया में भारत के सम्मान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

    शक्तियों के केन्द्रीयकरण के साथ शुरू हुआ भाजपा और उसके साथी संघ परिवार के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषणों का दौर। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को खौफज़दा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। एक कैबीनेट मंत्री ने उन लोगों को हरामज़ादा बताया जो सरकार के साथ नहीं हैं। सरकार, विश्वविद्यालयों के कामकाज में हस्तक्षेप करने लगी। अयोग्य व्यक्तियों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का मुखिया नियुक्त किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था गजेन्द्र चैहान की भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति। विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की गई जिनकी एकमात्र योग्यता संघ की विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। विश्वविद्यालयों में अभाविप की सक्रियता अचानक बढ़ गई और उसने सभी विश्वविद्यालयों, विशेषकर जेएनयू और हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, में प्रजातांत्रिक ढंग से चुने गए छात्रसंघों और अन्य संगठनों को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया। जेएनयू में एक नकली सीडी के आधार पर कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया और रोहित वेम्युला को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया।

    संघ और उसके साथी संगठनों ने लव जिहाद और घर वापसी के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया। समाज को और विभाजित करने के लिए उन्होंने गोमांस और गाय को मुद्दा बनाया, जिसके नतीजे में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और गुजरात के ऊना में दलितों के साथ अमानवीय मारपीट की गई। अंधश्रद्धा के पैरोकार, केन्द्र में अपनी सरकार होने के कारण आश्वस्त थे कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। दाभोलकर की हत्या के बाद गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। इन सब घटनाओं और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कई प्रतिष्ठित कलाकारों, वैज्ञानिकों और अन्यों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। शीर्ष स्तर पर एकाधिकारवादी व्यवहार और सामाजिक स्तर पर संघ परिवार के साथियों की कारगुज़ारियों के कारण स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि एक समय भाजपा के साथी रहे अरूण शौरी ने वर्तमान स्थिति को ‘विकेन्द्रीकृत आपातकाल’ और ‘माफिया राज्य’ बताया।

    सरकार ने किसानों से उनकी ज़मीनें छीनने का प्रयास भी किया परंतु लोगो के कड़े विरोध के कारण यह सफल न हो सका। श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया और कुटीर व लघु उद्योगों के संरक्षण के लिए बनाए गए प्रावधान हटा दिए गए। बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति और उनकी ताकत में आशातीत वृद्धि हुई। बैंकों ने उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ रूपए के ऋण माफ कर दिए और विजय माल्या जैसे कुछ उद्योगपति, जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हज़ारों करोड़ रूपयों का ऋण था, विदेश भाग गए। कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की गई परंतु ऐसा नहीं लगता कि इनसे आम लोगों, गरीब किसानों या श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ हो। विरोध और असहमति को कुचलने की अपनी नीति के अनुरूप, उन एनजीओ को सरकार ने परेशान करना शुरू कर दिया जो अल्पसंख्यक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे थे। उनके विदेशों से धन प्राप्त करने के अधिकार पर रोक लगा दी गई।

    अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे प्रजातंत्र का एक प्रमुख हिस्सा रही है। परंतु आज हालात यह बन गए हैं कि जो भी सरकार के विरूद्ध कुछ कहता है, उसे देशद्रोही बता दिया जाता है। भारत माता की जय के नारों और सिनेमाघरों में जनगणमन बजाकर छद्म देशभक्ति को बढ़ाया दिया जा रहा है।

    मोदी की हिन्दुत्ववादी राजनीति के चलते, देश भर में अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ छुटपुट हिंसा में वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार मिटाने के लंबेचौड़े वायदे तो किए गए परंतु नोटबंदी ने भ्रष्टाचार के नए तरीकों का विकास करने में मदद की। देश का ज्यादातर काला धन या तो विदेशी बैंकों में जमा है या अचल संपत्ति व कीमती धातुओं के गहनों के रूप में है। जो थोड़ा-बहुत नगदी काला धन था, भी वह भी नोटबंदी से बाहर नहीं आ सका।

    शासक दल और उसके साथी संगठन जो भी कहें, आज आमजन दुःखी और परेशान हैं। कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता विश्वविद्यालयों के छात्रों के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं तो जिग्नेश मेवानी, दलितों के गुस्से को स्वर दे रहे हैं। ये प्रजातांत्रिक विरोध ही अब आशा की एकमात्र किरण हैं। यह भी संतोष का विषय है कि विभिन्न राजनैतिक दल, प्रजातंत्र को बचाने के लिए एक होने की कवायद कर रहे हैं। हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक व्यापक गठबंधन आकार लेगा। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • आधे कार्यकाल की समाप्ति पर कहां खड़ी है मोदी सरकार?

    प्रो० राम पुनियानी


    Narendra Modi

    नवंबर 2016 में मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो गया। इस सरकार का आंकलन हम किस प्रकार करें? कुछ टिप्पणीकार यह मानते हैं कि मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें देश आशाभरी निगाहों से देख रहा है और जो साहसिक कदम उठाने की क्षमता और इच्छा रखते हैं। उन्हें देश को बदल डालने का जनादेश मिला है और वे उसे पूरा करेंगे। जहां कुछ लोगों की यह सोच है, वहीं देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, मोदी और उनकी सरकार को इस रूप में नहीं देखता। यह सरकार अच्छे दिन लाने और देश के सभी नागरिकों के बैंक खातों में 15-15 लाख रूपए जमा करने के वायदे पर सत्ता में आई थी। न तो अच्छे दिन आए और ना ही 15 लाख रूपए। उलटे, मंहगाई बेलगाम हो गई और ऊपर से सरकार ने नोटबंदी के जिन्न को बोतल से निकाल आमजनों को भारी मुसीबत में फंसा दिया। ऐसा बताया जाता है कि देश भर में कम से कम 100 लोग बैंकों के बाहर लाइनों में खड़े रहने के दौरान इस दुनिया से विदा हो गए। रोज़ खाने-कमाने वालों का भारी नुकसान हुआ। लाखों प्रवासी श्रमिक अपना रोज़गार खो जाने के कारण अपने-अपने घरों को वापस लौटने पर मजबूर हो गए।

    इस सरकार की एक विशेषता है हर प्रकार की शक्तियों का एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रीयकरण। और वह व्यक्ति कौन है, इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया गया है। कैबीनेट मात्र एक समिति बनकर रह गई है जो श्री मोदी के निर्णयों पर ठप्पा लगाती है। इसका एक उदाहरण है विमुद्रीकरण के निर्णय को कैबिनेट की स्वीकृति। देश की विदेश नीति में भारी बदलाव किए जाने का ज़ोरशोर से ढिंढोरा पीटा गया। पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया और श्री मोदी, दर्जनों विदेश यात्राओं पर गए। आज ढाई साल बाद भारत के पाकिस्तान और नेपाल से रिश्ते पहले की तुलना में खराब हैं और दुनिया में भारत के सम्मान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

    शक्तियों के केन्द्रीयकरण के साथ शुरू हुआ भाजपा और उसके साथी संघ परिवार के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषणों का दौर। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को खौफज़दा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। एक कैबीनेट मंत्री ने उन लोगों को हरामज़ादा बताया जो सरकार के साथ नहीं हैं। सरकार, विश्वविद्यालयों के कामकाज में हस्तक्षेप करने लगी। अयोग्य व्यक्तियों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का मुखिया नियुक्त किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था गजेन्द्र चैहान की भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति। विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की गई जिनकी एकमात्र योग्यता संघ की विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। विश्वविद्यालयों में अभाविप की सक्रियता अचानक बढ़ गई और उसने सभी विश्वविद्यालयों, विशेषकर जेएनयू और हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, में प्रजातांत्रिक ढंग से चुने गए छात्रसंघों और अन्य संगठनों को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया। जेएनयू में एक नकली सीडी के आधार पर कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया और रोहित वेम्युला को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया।

    संघ और उसके साथी संगठनों ने लव जिहाद और घर वापसी के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया। समाज को और विभाजित करने के लिए उन्होंने गोमांस और गाय को मुद्दा बनाया, जिसके नतीजे में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और गुजरात के ऊना में दलितों के साथ अमानवीय मारपीट की गई। अंधश्रद्धा के पैरोकार, केन्द्र में अपनी सरकार होने के कारण आश्वस्त थे कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। दाभोलकर की हत्या के बाद गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। इन सब घटनाओं और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कई प्रतिष्ठित कलाकारों, वैज्ञानिकों और अन्यों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। शीर्ष स्तर पर एकाधिकारवादी व्यवहार और सामाजिक स्तर पर संघ परिवार के साथियों की कारगुज़ारियों के कारण स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि एक समय भाजपा के साथी रहे अरूण शौरी ने वर्तमान स्थिति को ‘विकेन्द्रीकृत आपातकाल’ और ‘माफिया राज्य’ बताया।

    सरकार ने किसानों से उनकी ज़मीनें छीनने का प्रयास भी किया परंतु लोगो के कड़े विरोध के कारण यह सफल न हो सका। श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया और कुटीर व लघु उद्योगों के संरक्षण के लिए बनाए गए प्रावधान हटा दिए गए। बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति और उनकी ताकत में आशातीत वृद्धि हुई। बैंकों ने उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ रूपए के ऋण माफ कर दिए और विजय माल्या जैसे कुछ उद्योगपति, जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हज़ारों करोड़ रूपयों का ऋण था, विदेश भाग गए। कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की गई परंतु ऐसा नहीं लगता कि इनसे आम लोगों, गरीब किसानों या श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ हो। विरोध और असहमति को कुचलने की अपनी नीति के अनुरूप, उन एनजीओ को सरकार ने परेशान करना शुरू कर दिया जो अल्पसंख्यक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे थे। उनके विदेशों से धन प्राप्त करने के अधिकार पर रोक लगा दी गई।

    अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे प्रजातंत्र का एक प्रमुख हिस्सा रही है। परंतु आज हालात यह बन गए हैं कि जो भी सरकार के विरूद्ध कुछ कहता है, उसे देशद्रोही बता दिया जाता है। भारत माता की जय के नारों और सिनेमाघरों में जनगणमन बजाकर छद्म देशभक्ति को बढ़ाया दिया जा रहा है।

    मोदी की हिन्दुत्ववादी राजनीति के चलते, देश भर में अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ छुटपुट हिंसा में वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार मिटाने के लंबेचौड़े वायदे तो किए गए परंतु नोटबंदी ने भ्रष्टाचार के नए तरीकों का विकास करने में मदद की। देश का ज्यादातर काला धन या तो विदेशी बैंकों में जमा है या अचल संपत्ति व कीमती धातुओं के गहनों के रूप में है। जो थोड़ा-बहुत नगदी काला धन था, भी वह भी नोटबंदी से बाहर नहीं आ सका।

    शासक दल और उसके साथी संगठन जो भी कहें, आज आमजन दुःखी और परेशान हैं। कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता विश्वविद्यालयों के छात्रों के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं तो जिग्नेश मेवानी, दलितों के गुस्से को स्वर दे रहे हैं। ये प्रजातांत्रिक विरोध ही अब आशा की एकमात्र किरण हैं। यह भी संतोष का विषय है कि विभिन्न राजनैतिक दल, प्रजातंत्र को बचाने के लिए एक होने की कवायद कर रहे हैं। हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक व्यापक गठबंधन आकार लेगा।


    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • चुनाव प्रक्रिया एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है

    प्रो० राम पुनियानी
    IIT Bombay (Rtd)

    पिछले कुछ दशकों में धर्मनिरपेक्षता शब्द को बदनाम करने और उसके अर्थ को तोड़ने-मरोड़ने के कई प्रयास हुए हैं। भारत के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों का बराबर सम्मान और इस सिद्धांत का कड़ाई से अनुपालन कि राज्य की नीतियां किसी धर्म से प्रभावित या निर्देशित नहीं होंगी। यही भारतीय संविधान का मूल स्वर भी है। शासक राजनीतिक दलों द्वारा धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की गलत विवेचना के कारण साम्प्रदायिक तत्वों को धर्मनिरपेक्षता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने का बहाना मिल गया है।

    इस पृष्ठभूमि में, उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ का यह निर्णय स्वागतयोग्य व राहत पहुंचाने वाला है कि ‘‘चुनाव प्रक्रिया एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है’’। इस निर्णय से उन सभी लोगों को प्रसन्नता हुई है जो बहुवाद में निहित न्याय के मूल्यों के हामी हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और किसी भी धर्मनिरपेक्ष राज्य में चुनावी प्रक्रिया के दौरान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की अवहेलना और उनका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनैतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का दुरूपयोग, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अधीन भ्रष्ट आचरण है। न्यायालय ने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और शुद्धता के संरक्षण की ज़िम्मेदारी केवल चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की नहीं है। उसके एजेंटों का आचरण और उसका चुनावी घोषणापत्र भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

    निर्णय में यह भी कहा गया है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि की सोच और आचरण दोनों धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए और यह भी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के हित में सकारात्मक कार्यवाही, धर्मनिरपेक्ष आचरण का हिस्सा है। यह निर्णय न्याय के उन मूल्यों के अनुरूप भी है जो धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र की नींव होते हैं। इस निर्णय ने भारतीय संविधान के निर्माताओं द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को मानो नवजीवन दिया है।

    इस निर्णय का कई राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है और इनमें वे दल भी शामिल हैं जो धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाते आए हैं और जिन्होंने धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी ताकत में वृद्धि के लिए किया है। इस निर्णय ने हमें वह रास्ता दिखाया है, जिस पर बहुवादी भारत को चलना चाहिए-एक ऐसे भारत को जिसमें सभी की गरिमा और अधिकारों की रक्षा हो सके। इसके साथ ही, इस निर्णय को लागू करने में आने वाली चुनौतियों का आंकलन करना भी ज़रूरी है।

    यह निर्णय उन हस्तक्षेपकर्ताओं के प्रयासों से आया है जो उच्चतम न्यायालय से यह मांग कर रहे थे कि वह 1995 के अपने कुख्यात ‘हिन्दुत्व निर्णय’ पर पुनर्विचार करे। इस निर्णय में यह कहा गया था कि हिन्दू धर्म व हिन्दुत्व इतना विविधवर्णी है कि उसे परिभाषित करना मुश्किल है और इसलिए वह ‘‘जीवन जीने का एक तरीका है’’। यह निर्णय हिन्दू धर्म की प्रकृति के कारण इसके संबंध में व्याप्त भ्रांतियों से उपजा था। हिन्दू धर्म का कोई पैगंबर नहीं है और इसमें कई धार्मिक परंपराएं शामिल हैं, जिनमें से कुछ परस्पर विरोधाभासी हैं। परंतु इसके बावजूद भी हिन्दू, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र की दृष्टि से एक विशिष्ट धर्म है, जिसकी अपनी पवित्र पुस्तकें, कर्मकांड और देवी-देवता हैं। अदालत ने 1995 के अपने निर्णय के इस महत्वपूर्ण पक्ष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। दो दशक से भी ज्यादा पुराने निर्णय के इस पक्ष पर पुनर्विचार आवश्यक है क्योंकि करोड़ों हिन्दू अपने धर्म को एक धर्म के रूप में ही देखते हैं जीवन जीने के तरीके के रूप में नहीं।

    इस मुद्दे पर कोई राय व्यक्त न कर उच्चतम न्यायालय ने सांप्रदायिक ताकतों को यह छूट दे दी है कि वे हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के नाम पर वोट मांगते रहें और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत सज़ा पाने से बचे रहें। इस विसंगति के कारण सांप्रदायिक ताकतें चुनावी लाभ के लिए धर्म का दुरूपयोग करती रहेंगी और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। इसके अतिरिक्त, ‘धार्मिक पहचान’ का इस्तेमाल हिंसा भड़काने और समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया जाता रहा है। चाहे मुद्दा राम मंदिर का हो या गोमांस का, उसके सांप्रदायिक स्वरूप को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। पिछले लगभग तीन दशकों से इस तरह के मुद्दों का उपयोग राजनैतिक लाभ के लिए किया जाता रहा है। अदालत ने इस तरह के मुद्दों, जिनका इस्तेमाल धर्म के नाम पर लोगों को एकजुट करने के लिए किया जाता रहा है, के बारे में कुछ नहीं कहा है। धार्मिक पहचान का राजनैतिक उपयोग, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। हमारे देश को इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को राजनीति से बचना होगा। जब तक यह नहीं होगा तब तक कुछ राजनैतिक दल धर्म के नाम पर वोट मांगते रहेंगे।

    हम सबको याद है कि सन 2014 के आम चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी ने मुंबई में अपनी एक सभा में कहा था कि मैं एक हिन्दू परिवार में जन्मा था और मैं राष्ट्रवादी हूं इसलिए मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूं। उनके भाषण के इस हिस्से की बड़ी-बड़ी होर्डिंग पूरे मुंबई शहर में लगाई गई थीं। क्या यह भ्रष्ट आचरण नहीं है? क्या अकबरूद्दीन ओवैसी और संघ परिवार के योगी आदित्यनाथ, प्रवीण तोगड़िया, साध्वी निरंजन ज्योति और अन्यों के घृणा फैलाने वाले भाषण राजनीतिक लाभ पाने के लिए धर्म के दुरूपयोग की सीमा में नहीं आते? क्या इस तरह के भाषणों को भ्रष्ट आचरण नहीं माना जाना चाहिए? colombia.co धर्म के आधार पर वोट मांगने के लिए धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल भी आम है। इनमें इस्लामिक और हिन्दू दोनों प्रतीक शामिल हैं। कुछ उम्मीदवार अपने पोस्टरों पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र छपवाते हैं तो कुछ अपनी तुलना किसी देवी या देवता से करते हैं। इसे हम क्या कहेंगे? कुछ समय पहले, उत्तरप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के.पी. मौर्य को एक पोस्टर में भगवान कृष्ण के रूप में दिखाया गया था जो मुलायम सिंह यादव परिवार के कौरवों से मुकाबला कर रहे हैं। अगर राजनीति को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए तो हम इस तरह के आचरण को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।

    दूसरी ओर, समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। कुछ वंचित और निर्धन समुदायों की मांगें धर्म और राजनीति से जुड़ी हो सकती हैं। भारत में हमेशा से अलग-अलग कारकों से कुछ समुदायों का शोषण और दमन होता आया है। इनमें आदिवासी, दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं। इन वर्गों की बदहाली को रेखांकित करने वाली कई तथ्यात्मक रपटें उपलब्ध हैं, जिनमें सच्चर समिति की रपट शामिल है। इन वर्गों की मांगों को पूरा करने को ‘‘सकारात्मक कार्यवाही’’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक चरित्र के अनुरूप है। इस तरह की मांगों पर किसी भी स्थिति में धर्म या जाति का लेबिल चस्पा नहीं किया जाना चाहिए।

    उच्चतम न्यायालय ने हमें रास्ता दिखाया है परंतु जब तक समाज में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की पुनर्स्थापना नहीं होती तब तक हम सही अर्थों में न्याय और शांति की स्थापना नहीं कर पाएंगे। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • आईए, करीना-सैफ के पुत्र तैमूर का स्वागत करें

    राम पुनियानी
    Rtd Prof, IIT Bombay

    हमारे समाज पर सांप्रदायिक मानसिकता की जकड़न भयावह है। हमारा समाज इतिहास को राजाओं के धर्म के चश्मे से देखता है। सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास की चुनिंदा घटनाओं और व्यक्तित्वों का इस्तेमाल, इतिहास का अपना संस्करण गढ़ने के लिए कर रही है। यही विचारधारा दोनों समुदायों के बीच घृणा के बीज बो रही है। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाते हैं तो हिन्दू संप्रदायवादी हमसे कहते हैं कि मुसलमानों से नफरत करो। इसी घृणा से उपजती है सांप्रदायिक हिंसा, जो कि अधिकांश मामलों में सोची-समझी साजिश के तहत भड़काई जाती है। इस हिंसा में मासूम लोग मारे जाते हैं और समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है, जिसका लाभ सांप्रदायिक ताकतें उठाती हैं। सांप्रदायिक शक्तियां अंतर्धामिक विवाहों और ऐसे सांस्कृतिक आचरणों की विरोधी हैं, जो विभिन्न धर्मों के लोगों को एक करते हैं। इन दिनों मुस्लिम पुरूष और हिन्दू महिला के बीच विवाह को ‘लव जिहाद’ कहा जाता है और यहां तक कि इस तरह के विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

    गत 20 सितंबर, 2016 को करीना कपूर और सैफ अली खान के पुत्र ने जन्म लिया। उन्होंने उसका नाम तैमूर (जिसे तिमूर भी उच्चारित किया जाता है) रखा। इसके बाद सोशल मीडिया पर बवाल मच गया। कई सांप्रदायिक तत्वों ने नवजात शिशु को कोसा। उनकी शिकायत यह थी कि बच्चे का नाम तैमूर क्यों रखा गया। तैमूर ने सन 1398 में दिल्ली पर आक्रमण कर लूटपाट की थी और बड़ी संख्या में आम लोगों की हत्या कर दी थी। यह दिलचस्प है कि उन दिनों दिल्ली पर तुर्की मुसलमान बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक का शासन था।

    तैमूर, चंगेज़ खान और औरंगजे़ब को भारत के मध्यकालीन इतिहास का खलनायक बताया जाता है और उन्हें आज के भारतीय मुसलमानों से जोड़ा जाता है। चंगेज़ खान मंगोल था और उसने मंगोल साम्राज्य की स्थापना की थी। वह मुसलमान नहीं वरन शेमनिस्ट था। उसने भी उत्तर भारत में लूटपाट और मारकाट की थी। औरंगजे़ब को एक ऐसे तानाशाह के रूप में देखा जाता है जिसने जज़िया लगाया, लोगों को ज़बरन मुसलमान बनाया और हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया। इन राजाओं का दानवीकरण तो किया ही जाता है, उनकी क्रूरताओं के लिए आज के भारतीय मुसलमानों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। यह नितांत हास्यास्पद है। आज के भारतीय मुसलमानों का तैमूर, औरंगजे़ब या चंगेज़ खान से कोई लेना-देना नहीं है। ये राजा अलग-अलग धर्मों के थे और उन्होंने अपने धर्म के लिए लड़ाईयां नहीं लड़ी थीं।

    सभी विजयी राजा, चाहे वे किसी भी धर्म या क्षेत्र के रहे हों, विजित इलाके में लूटपाट और मारकाट करते थे। इस लूटपाट को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए कई बार उनके दरबारी उसे धर्म से जोड़ देते थे। परंतु यह मानना भूल होगी कि किसी एक धर्म के राजा ही खूनखराबा और लूटमार करते थे। जिस युग की हम बात कर रहे हैं, उस युग में न तो कोई अंतर्राष्ट्रीय कानून था और ना ही राष्ट्रवाद की वह अवधारणा थी, जिससे हम आज परिचित हैं। राजा अपने साम्राज्य के मालिक हुआ करते थे और उनसे कोई प्रश्न पूछने की इजाजत किसी को नहीं थी। सभी धर्मों का पुरोहित वर्ग यह सिद्ध करने में लगा रहता था कि उनका राजा जो भी करता है, वह धर्म के अनुरूप है और उसे ईश्वर की स्वीकृति प्राप्त है। उस समय भारत जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं थी और हर राज्य एक अलग देश था। हम सब जानते हैं कि बाबर को राणा सांगा ने आमंत्रित किया था ताकि वह बाबर के साथ मिलकर इब्राहिम लोधी को हरा सके। मुस्लिम राजाओं के दरबारों में उच्च पदों पर हिन्दू हुआ करते थे और यही बात हिन्दू राजाओं के बारे में भी सही थी।

    आज भारत में मुस्लिम राजाओं और ऐसे राजाओं, जो अपने नाम से मुसलमान लगते हैं, को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरी ओर, शिवाजी, राणा प्रताप और गोविंद सिंह जैसे नायकों को हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का कहना था कि शिवाजी, राणा प्रताप और गोविंद सिंह के सामने एक राष्ट्रवादी बतौर गांधीजी बौने थे। जहां आज शिवाजी को एक महान राष्ट्रीय नायक के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है वहीं यह दिलचस्प है कि शुरूआत में देश के कुछ इलाकों, विशेषकर गुजरात व बंगाल में, शिवाजी को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्वीकार करने का खासा प्रतिरोध हुआ था। ये वे दो इलाके हैं जहां शिवाजी की सेनाओं ने लूटमार की थी और बेगुनाहों को कत्ल किया था। आज हालत यह हो गई है कि अगर कोई कहे कि शिवाजी की सेना भी लूटमार और मारकाट करती थी तो उसे ‘राष्ट्रीय नायक’ का अपमान बताया जाता है। बाल सामंत नामक एक सज्जन, जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय बाल ठाकरे के नज़दीकी थे, ने अपनी पुस्तक ‘शिवकल्याण राजा’ में करीब 21 पृष्ठों के अध्याय में केवल शिवाजी की सेनाओं द्वारा की गई लूटमार का वर्णन किया है। उन्होंने डच व ब्रिटिश स्त्रोतों के हवाले से शिवाजी की सेना द्वारा बड़े पैमाने पर की गई लूटमार और हत्याओं का वर्णन किया है। अशोक ने कलिंग में किस तरह का कत्लेआम किया था और खून की नदियां बहाई थीं, यह हम सबको ज्ञात है। अधिकांश राजाओं ने या तो अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अथवा अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए युद्ध किए।

    सांप्रदायिक विचारधारा का बोलबाला बढ़ने के साथ ही इतिहास की विवेचना करने का तरीका भी बदल गया है। शिवाजी की सेना द्वारा की गई लूट को नरेन्द्र मोदी औरंगजे़ब की खज़ाने की लूट बता रहे हैं! मराठा सेनाओं द्वारा श्रीरंगपट्टनम के हिन्दू मंदिर को नष्ट किए जाने की घटना को सांप्रदायिक इतिहासकारों द्वारा छुपाया जाता है। सन 1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम भी इतिहास को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने वालों की कारगुज़ारियों का शिकार हुआ है। जहां हिन्दुत्व चिंतक सावरकर उसे भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम बताते हैं वहीं इसी विचारधारा के एक अन्य बड़े झंडाबरदार गोलवलकर का कहना है कि यह विद्रोह इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसका नेतृत्व एक मुसलमान, बहादुरशाह ज़फर के हाथों में था, जो हिन्दू सिपाहियों को लड़ने के लिए प्रेरित न कर सका। हम सब जानते हैं कि यह विद्रोह इसलिए असफल हुआ क्योंकि पंजाबियों और गोरखाओं ने अंग्रेज़ों का साथ दिया।

    सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास को तोड़नेमरोड़ने और उसके चुनिंदा हिस्सों को गलत ढंग से प्रस्तुत कर अपना उल्लू सीधा करती है। कुछ लोगों ने तो सभी हदें पार करते हुए, सैफ अली खान और करीना कपूर के नवजात पुत्र को आतंकवादी और जिहादी तक बता डाला। सभी बच्चों का इस दुनिया में स्वागत किया जाना चाहिए। सैफ अली खान ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि किस तरह उनके विवाह को लव जिहाद बताया गया था और उसका विरोध हुआ था। एक ट्वीट में हिन्दू लड़कियों को यह चेतावनी दी गई है कि वे मुसलमान लड़कों से विवाह न करें क्योंकि अगर वे ऐसा करेंगी तो वे किसी चंगेज़ खान या किसी तैमूर या किसी औरंगजे़ब को जन्म दे सकती हैं। विघटनकारी विचारधारा आखिर हमारी सोच को कितना नीचे गिराएगी।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान – ज़बरिया देशभक्ति

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2016 में यह आदेश जारी किया कि सभी सिनेमा हॉलों में ‘‘मातृभूमि के प्रति प्रेम की खातिर’’ हर फिल्म शो के पहले राष्ट्रगान बजाया जाए। इस आदेश से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी बाध्यताओं के परस्पर संबंधों पर बहस शुरू हो गई है। यह आदेश देश में बढ़ती असहिष्णुता की पृष्ठभूमि में आया है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या इस तरह की कानूनी बाध्यताओं से लोगों में राष्ट्रपे्रम जगाया जा सकता है। कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि यह आदेश नागरिक अधिकारों पर हमला है। कुछ दशकों पहले तक, सिनेमा हॉलों में फिल्म की समाप्ति के बाद राष्ट्रगान बजाया जाता था। उस समय यह देखा गया था कि राष्ट्रगान के समय लोग थियेटर से बाहर निकलने लगते थे। अब महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने यह निर्देश दिया है कि देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाए और इस दौरान थियेटर के दरवाजे बंद रखे जाएं।

    राष्ट्रीय ध्वज और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की रक्षा की लिए देश में पहले से ही कई कानून लागू हैं। कुछ मामलों में कानूनों व नियमों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच टकराव के उदाहरण सामने आए हैं। केरल में जेहनोवास विटनेस नामक एक पंथ के विद्यार्थियों ने अपने स्कूल में यह कहकर राष्ट्रगान गाने से इंकार कर दिया था कि ऐसा करना मूर्ति पूजा होगी, जो कि उनकी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप नहीं है। इन विद्यार्थियों को स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। मामला उच्चतम न्यायालय तक गया, जिसने विद्यार्थियों के पक्ष में फैसला दिया और उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया।

    प्रजातंत्र में नागरिकों के अधिकारों और राज्य के प्रति उनके कर्तव्यों में संतुलन आवश्यक है। इसीलिए संविधान सभी नागरिकों को कुछ मूलाधिकार देता है और उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी भी उपलब्ध करवाता है। एक दशक पहले, उच्चतम न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में अपना निर्णय दिया था। ऐसा लगता है कि अब गंगा उलटी बह रही है। बात-बात पर ‘‘राष्ट्रवाद, मातृभूमि के प्रति प्रेम और देशभक्ति’’ जैसे जुमलों को उछाला जा रहा है। जो लोग सत्ताधारी दल या सरकार की नीतियों से असहमत हैं, उन्हें राष्ट्रविरोधी बताया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि वे ‘‘देशभक्त’’ नहीं हैं। यहां तक कि एटीएम या बैंकों के बाहर अपने ही खातों से पैसा निकालने के लिए घंटों कतार में खड़े रहने का भी महिमामंडन किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि यह देशभक्ति है और राष्ट्र की खातिर लोग लाईनों में घंटों खड़े हैं। ये कतारें मोदी सरकार द्वारा लिए गए नोटबंदी के निर्णय का परिणाम हैं और इन्हें देशभक्ति से जोड़ा जाना हास्यास्पद प्रतीत होता है। उच्चतम न्यायालय का यह आदेश एक ऐसे समय आया है जब देशभक्ति और राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाओं का इस्तेमाल, असहमति और विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा है।

    जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह अपने विरोधियों की राष्ट्रभक्ति/राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन की गतिविधियों को ‘राष्ट्रविरोधी’ बताया गया और तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के दबाव में विश्वविद्यालय के कुलपति ने रोहित वेम्युला को होस्टल से निकाल दिया और उसकी शिष्यवृत्ति बंद कर दी। इसके बाद, रोहित ने आत्महत्या कर ली। ऐसा ही कुछ दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ, जहां जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए एक नकली सीडी कुछ टेलिवीजन न्यूज़ चैनलों पर चलाई गई। कन्हैया कुमार को देशद्रोही करार दे दिया गया। बाद में यह सामने आया कि कन्हैया कुमार ने तथाकथित देशद्रोही नारे लगाए ही नहीं थे। वैसे भी, संवैधानिक स्थिति यह है कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है।  देशभक्ति और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर भड़काए जा रहे जुनून के नतीजे में गोवा में राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर एक ऐसे व्यक्ति की पिटाई कर दी गई जो व्हीलचेयर से उठ भी नहीं सकता था। मुंबई में एक युवा पटकथा लेखक को राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर सिनेमा हॉल से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।

    राष्ट्रवाद के मुद्दे पर इस तरह की ज़ोर-जबरदस्ती, चिंता का विषय है। देशभक्ति क्या है और देशभक्त कौन है, इसे परिभाषित करना आसान नहीं है। जब देश में राजाओं और नवाबों का शासन था, उस समय वे अपने प्रजाजनों से यह अपेक्षा करते थे कि वे उनके प्रति पूरी तरह वफादार रहें। राजा के प्रति वफादार न रहने की सज़ा बहुत कड़ी थी जिसमें हाथ काट देने से लेकर मृत्युदंड तक शामिल था।

    ब्रिटिश राज में देश में दो तरह के राष्ट्रवाद एक साथ अस्तित्व में थे। एक ओर उद्योगपतियों, श्रमिकों और शिक्षित लोगों का उभरता हुआ वर्ग था, जो धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण के लिए साम्राज्यवाद व औपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ा था। सरकार की निगाह में ये लोग देशभक्त नहीं थे। धर्म के नाम पर राष्ट्रवाद की शुरूआत, राजाओं और ज़मींदारों ने की। वे अंग्रेज़ों के प्रति वफादार थे। ब्रिटिश साम्राज्य इन वर्गों को देशभक्त मानता था। उनकी संस्था यूनाईटेड इंडिया पेट्रिऑटिक एसोसिएशन, धार्मिक राष्ट्रवाद की जनक बनी। मुस्लिम राष्ट्रवादी और हिन्दू राष्ट्रवादी दोनों ब्रिटिश शासकों के प्रति वफादार थे और तत्कालीन सरकार की निगाहों में देशभक्त थे। ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध जो राष्ट्रवाद संघर्षरत था, वह व्यापक और समावेशी था और किसी एक जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं था। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस का राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान के आसपास बुना गया था। इसके विपरीत, महात्मा गांधी के नेतृत्व वाला राष्ट्रवाद, प्रजातांत्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित था और उदारवादी था। स्वाधीनता के बाद, सांप्रदायिक संगठनों ने राज्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा को राष्ट्रवाद का पर्यायवाची मान लिया। जो भी लोग सरकार या राज्य से सहमत नहीं हैं, वे देशभक्त नहीं हैं। यह ठीक वही अवधारणा है जो राजाओं और नवाबों की थी। यह ठीक वही अवधारणा है जो दुनिया के सभी तानाशाहों की थी और है।

    संघ व भाजपा इस समय देश में जो वातावरण बना रहे हैं, उससे एकाधिकारवाद और तानाशाही की पदचाप सुनाई दे रही है। राजाओं-नवाबों के शासनकाल में शासक सर्वोच्च था और सभी प्रजाजन उसके अधीन थे। राजा के प्रति वफादारी ही देशभक्ति थी। तानाशाह भी जनता से अपने प्रति पूर्ण समर्पण और वफादारी चाहते हैं और इसे ही देशभक्ति बताते हैं। आरएसएस-भाजपा का यह मानना है कि राज्य सर्वोच्च है और नागरिकों को केवल उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय का यह आदेश, इसी तरह की मानसिकता की उपज है।

    इस तरह का अतिराष्ट्रवाद, प्रजातंत्र को तानाशाही में बदल सकता है। हमें उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय को इस तथ्य का अहसास होगा और वह अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करेगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • समकालीन वैश्विक संकट के पीछे धर्म है या राजनीति?

    प्रो० राम पुनियानी


    वैश्विक स्तर पर ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द बहुप्रचलित हो गया है और इस्लाम के आंतरिक ‘संकट’ की कई तरह से विवेचना की जा रही है। कुछ लोगों की राय है कि इस्लाम एक बहुत बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है और इस संकट से निपटने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि इसके पूर्व इस्लाम एक बहुत बड़े संकट से उबर चुका है। वह था क्रूसेड्स। वह एक बाहरी संकट था। इस्लाम का वर्तमान संकट उसका आंतरिक संकट है,जिसमें मुसलमान एक-दूसरे को ही मार रहे हैं। यहां तक कि एक ही पंथ के मुसलमान भी अपने साथियों का खून बहा रहे हैं। यह संकट पिछले कुछ दशकों में इस्लाम पर हावी हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमान, स्वयं इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हैं और इस्लाम अब अपने ही अनुयायियों को निगल रहा है। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में ‘अच्छा मुसलमान, बुरा मुसलमान’ शब्द ईजाद कर लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि इस्लाम पर अतिवादियों ने कब्ज़ा जमा लिया है। सुन्नी इस्लाम अतिवादी हो गया है और शिया इस्लाम का खोमैनीकरण हो गया है। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इस्लाम में अंदर से सुधार लाए जाने की ज़रूरत है।

     

    यह तर्क मध्यमार्गी मुसलमानों की व्यथा को प्रदर्शित करता है, जो अलकायदा से शुरू होकर आईएस और उसके कई अवतारों में फैल गया है। सच यह है कि यह विवेचना उथली है। ज़रूरत इस बात पर विचार करने की है कि इस्लाम से आतंकवाद के जुड़ाव की यह प्रक्रिया पिछले कुछ दशकों में ही क्यों शुरू हुई। यह मानना अनुचित होगा कि केवल इस्लाम के मानने वाले ही हिंसा करते हैं। साध्वी प्रज्ञा और गोडसे जैसे हिन्दू, असिन विराथू जैसे बौद्ध और एण्डर्स बर्लिन ब्रेविक जैसे ईसाई भी आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि आतंकवाद से जुड़े अधिकांश व्यक्ति मुसलमान हैं परंतु हमें यह समझना होगा कि कबजब राजनीति भी धर्म का भेस धर लेती है। और यह बात सभी धर्मों के बारे में सही है।

     

    वर्तमान समय की बात करने से पहले हमें धर्मों की नैतिकता और उनके आदर्शों और धर्म के पहचान से जुड़े पहलुओं के बीच अंतर करना होगा। पहचान से जुड़े पहलुओं का सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूह, समाज पर अपना दबदबा कायम करने के लिए करते हैं। अधिकांश धर्मों के पुरोहित वर्ग ने सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूहों के साथ मिलकर सामाजिक ऊँचनीच को धार्मिक पवित्रता का चोला पहनाया। चर्च और मौलाना दोनों सामंती व्यवस्था के समर्थक रहे हैं और ब्राह्मणों ने जाति और लिंग पर आधारित पदक्रम को समाज पर लादा। यह सब समाज के श्रेष्ठी वर्ग द्वारा अपना राज कायम करने की कवायद का हिस्सा था।

     

    हमें यह भी समझना होगा कि अलग-अलग समय पर विभिन्न राजाओं ने जिहाद, क्रूसेड्स और धर्मयुद्ध जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने साम्राज्यों को विस्तार देने के लिए किया। धर्म तो मात्र एक बहाना था, असल में वे सत्ता के भूखे थे। सभी धर्मों के राजाओं के लक्ष्य एक से थे। उनका उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार करना नहीं वरन धर्म के नाम पर अपनी सत्ता को मज़बूती और अपने साम्राज्य को विस्तार देना था। ऐसे में हम केवल जिहाद की बात कैसे कर सकते हैं?हम अन्य धर्मों के शासकों द्वारा धर्म के दुरूपयोग को कैसे भुला सकते हैं?

     

    जहां तक भारत का संबंध है, 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरूप अस्त होते ज़मींदारों और सामंतों के वर्ग ने अपनी उच्च सामाजिक स्थिति को बनाए रखने और जातिगत व लैंगिक पदक्रम को संरक्षित रखने के लिए धर्म की भाषा बोलनी शुरू कर दी। उदित होते राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध करने के लिए इस्लाम के नाम पर राजनीति करने के लिए मुस्लिम लीग जैसी संस्थाएं बनीं तो हिन्दू धर्म के नाम पर सत्ता का खेल खेलने के लिए हिन्दू महासभा और आरएसएस का गठन हुआ। एक ओर थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गांधी जैसे लोग, जो भारतीय राष्ट्रवाद के पैरोकार थे तो दूसरी ओर थे जिन्ना, सावरकर, गोलवलकर और गोडसे जैसे व्यक्ति जो धार्मिक राष्ट्रवाद के हामी थे। गोडसे ने अपने समय के महानतम हिन्दू की हत्या की और उसके अनुसार ऐसा उसने ‘हिन्दू समाज’ की खातिर किया। बौद्ध धर्म के भेस में ऐसा ही राष्ट्रवाद म्यांमार और श्रीलंका में भी फलफूल रहा है।

    पिछले कुछ दशकों में अमरीका, अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम का खलनायकीकरण करता आ रहा है। अमरीका का असली उद्देश्य कच्चे तेल के कुंओं पर कब्ज़ा करना है। अपनी इसी लिप्सा के चलते अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी संस्करण को प्रोत्साहन दिया। यह सर्वज्ञात है कि अमरीका ने पाकिस्तान के मदरसों में युवकों को इस्लाम के कट्टरवादी सऊदी संस्करण में प्रशिक्षित किया और उन्हें करोड़ों डॉलर और सैंकड़ों टन हथियार मुहैय्या करवाए। अमरीका तब इन युवकों के ज़रिए अफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करना चाहता था। बाद में ये लोग अमरीका के लिए ही भस्मासुर साबित हुए। इसके पहले अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडिक सरकार को अपदस्थ किया था। इसके नतीजे में अंततः अयातुल्ला खोमैनी सत्ता में आए और इस्लामिक कट्टरता का बोलबाला बढ़ा। खोमैनी के सत्तासीन होने के बाद पश्चिमी मीडिया ने यह कहा था कि अब इस्लाम, दुनिया के लिए एक ‘नया खतरा’ बन गया है और 9/11 के आतंकी हमले के बाद, इसी मीडिया ने ‘इस्लामिक आंतकवाद’ शब्द गढ़ा।

     

    ऐसा बताया जा रहा है मानो आतंकवाद के कैंसर का कारण इस्लाम है। परंतु गहराई से देखने पर हमें यह समझ आएगा कि हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। कुछ प्रेम का प्रचार करती हैं तो कुछ नफरत फैलाती हैं। कबीर और निज़ामुद्दीन औलिया जैसे लोग गरीबों के साथ खड़े हुए और उन्होंने सत्ताधारी पुरोहित वर्ग का विरोध किया। पुरोहित वर्ग, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए करता आया है। गांधी भी हिन्दू थे और गोडसे भी। किसी धर्म की कौनसी धारा मज़बूत होती है और कौनसी कमज़ोर, यह अक्सर तत्कालीन राजनैतिक शक्तियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

     

    यह सचमुच चिंता की बात है कि इस्लाम कई तरह की आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है परंतु यदि इस्लाम के अतिवादी पंथ शक्तिशाली बन गए हैं तो इसका कारण धर्म है या राजनीति। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी के लिए हिन्दू धर्म समावेशी था तो गोडसे जैसों के लिए वह अन्यों से घृणा करना सिखाने वाला था। अतः, ज़रूरत इस बात की है कि हम धर्म का लबादा ओढ़े उस राजनीति को पहचानें, जो अतिवाद को बढ़ावा दे रही है और इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने नहीं आने दे रही है। हमारे समय में भी मौलाना वहीदउद्दीन और असगर अली इंजीनियर जैसी शख्सियतें हुईं जिन्होंने इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने रखा। परंतु सत्ता के समीकरणों के चलते, वे हाशिए पर पटक दिए गए और आईएस जैसी संस्थाएं केन्द्र में आ गईं। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि जो शक्तियां अतिवाद को प्रोत्साहन दे रही हैं वे दरअसल तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति में संलग्न हैं। धर्म का आतंकवाद से कोई लेनादेना नहीं है।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)