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  • क्या टीपू सुल्तान स्वाधीनता संग्राम सैनानी थे? 

    प्रो० राम पुनियानी


    कर्नाटक सरकार द्वारा गत 10 नवंबर, 2016 को टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने के मुद्दे पर जमकर विवाद और हंगामा हुआ। पिछले वर्ष, इसी कार्यक्रम का विरोध करते हुए तीन लोग मारे गए थे। टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने का विरोध मुख्यतः आरएसएस-भाजपा और कुछ अन्य संगठनों द्वारा किया जा रहा है। इनका कहना है कि टीपू एक तानाशाह था, जिसने कोडवाओं का कत्लेआम किया, कैथोलिक ईसाईयों का धर्मपरिवर्तन करवाया और उनकी हत्याएं कीं, कई ब्राह्मणों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया और अनेक मंदिरों को तोड़ा। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कन्नड़ की बजाए फारसी भाषा को प्रोत्साहन दिया। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि टीपू एक अत्यंत लोकप्रिय राजा थे और उनकी वीरता के किस्से अब भी नाटकों और लोकगीतों का विषय हैं। वे एकमात्र ऐसे भारतीय राजा थे जो ब्रिटिश शासकों से लड़ते हुए मारे गए। प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड ने तो यहां तक मांग की है कि बैंगलोर के नए हवाईअड्डे का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाना चाहिए। कर्नाड ने यह भी कहा है कि अगर टीपू हिन्दू होते तो उन्हें कर्नाटक में उतने ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता, जितने सम्मान से महाराष्ट्र में शिवाजी को देखा जाता है।

    यह दिलचस्प है कि कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने जब 2010 में भाजपा को छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी, तब उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए टीपू सुल्तान जैसी टोपी पहनी थी और तलवार हाथ में उठाई थी। आज वे ही टीपू सुल्तान का जन्मदिन मनाए जाने के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं। यह भी दिलचस्प है कि आरएसएस द्वारा 1970 के दशक में प्रकाशित भारत-भारती पुस्तक श्रृंखला में टीपू को एक देशभक्त नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। आज वे ही लोग टीपू सुल्तान को एक धर्मांध शासक बता रहे हैं। संघ परिवार द्वारा एक ट्रेन का नाम टीपू पर रखे जाने का भी विरोध किया गया था। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि टीपू सुल्तान ने अपने सेनापतियों को पत्र लिखकर यह कहा था कि काफिरों का सफाया कर दिया जाना चाहिए। यह कहा जाता है कि ये पत्र अब ब्रिटिश सरकार के कब्ज़े में हैं। जब विजय माल्या ने लंदन में आयोजित एक नीलामी में टीपू की 42 इंच लंबी तलवार खरीदी थी तब भी बहुत बवाल मचा था। टीपू को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं।

    टीपू सुल्तान कौन थे? उनका स्वाधीनता संग्राम में क्या योगदान था? टीपू ने अपना राज्य अपने पिता हैदर अली से उत्तराधिकार में पाया था। युद्ध लड़ने की तकनीकी के विकास में हैदर और टीपू का योगदान सर्वज्ञात है। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरूद्ध अपने युद्धों में मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। अंग्रेज़ों के साथ हुए उनके युद्ध बहुत प्रसिद्ध हैं। हैदर और टीपू ने ब्रिटिश साम्राज्य के भारत में विस्तार को रोकने में महती भूमिका अदा की थी। टीपू की राजनीति, धर्म पर आधारित नहीं थी। उलटे इतिहास में यह दर्ज है कि उन्होंने हिन्दू मठों को दान दिया था, यद्यपि इसके पीछे भी हिन्दुओं का समर्थन हासिल करने की राजनैतिक मंशा थी। सच यह है कि चूंकि टीपू ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी इसलिए उन्होंने उसका दानवीकरण किया।

    टीपू ने मराठाओं और हैदराबाद के निज़ाम से पत्रव्यवहार कर उनसे यह अनुरोध किया था कि वे अंग्रेज़ों का साथ न दें क्योंकि अंग्रेज़, उस क्षेत्र के अन्य राजाओं से बिलकुल भिन्न हैं और यदि उनका राज कायम होता है तो यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी आपदा होगी। उनकी इसी सोच ने उन्हें अंग्रेज़ों के खिलाफ अनवरत युद्ध करने की प्रेरणा दी। ऐसे ही एक युद्ध में उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। परंतु वे आज भी कर्नाटक के लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। उन पर केन्द्रित कई नाटक और गीत (लावणी) हैं। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता के कारण ही वे आज भी कर्नाटक के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व बने हुए हैं।

    जहां तक कन्नड़ और मराठी के साथ-साथ फारसी भाषा का इस्तेमाल करने की उनकी नीति का प्रश्न है, हमें यह समझना होगा कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी ही राजदरबारों की भाषा थी। टीपू कतई धर्मांध नहीं थे। कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य को लिखे एक पत्र में उन्होंने शंकराचार्य को ‘जगतगुरू’ (विश्व का शिक्षक) कहकर संबोधित किया और उनके मठ को बड़ी राशि दान के रूप में दी। इसके विपरीत, रघुनाथ राव पटवर्धन की मराठा सेना ने मैसूर के बेदानूर पर हमला कर श्रंगेरी मठ में लूटपाट की। मराठा सेना ने मठ को अपवित्र किया। शंकराचार्य ने इस बारे में टीपू को लिखा। टीपू ने पूरे सम्मान के साथ मठ की पुनर्प्रतिष्ठा की। उन्होंने श्रीरंगपट्नम के मंदिर को दान भी दिया। उनके राज में मैसूर में दस दिन तक दशहरा बड़े जोरशोर से मनाया जाता था और वाडियार परिवार का कोई सदस्य इस आयोजन का नेतृत्व करता था। ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता, मध्य कर्नाटक के चित्रदुर्गा के एक सूफी संत थिप्पेरूद्रस्वामी के अनन्य भक्त थे।

    टीपू के महामंत्री एक ब्राह्मण थे जिनका नाम पुरनैया था। उनके कई मंत्री भी ब्राह्मण थे। उन्होंने जो भी गठबंधन किए उसके पीछे धर्म नहीं बल्कि अपनी ताकत में इज़ाफा करने का प्रयास था। अपनी पुस्तक ‘सुल्तान-ए-खुदाद’ में सरफराज़ शैख ने ‘टीपू सुल्तान का घोषणापत्र’ प्रकाशित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की है कि वे धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेंगे, अपनी आखिरी सांस तक अपने साम्राज्य की रक्षा करेंगे और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेकेंगे। यह सही है कि कुछ विशिष्ट समुदाय उनके निशाने पर थे। इस संबंध में टिप्पणी करते हुए इतिहासविद केट ब्रिटलबैंक लिखती हैं कि ‘‘उन्होंने ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि उन समुदायों को सज़ा देने के लिए किया था’’। उन्होंने जिन समुदायों को निशाना बनाया, वे वह थे जो उनकी दृष्टि में साम्राज्य के प्रति वफादार नहीं थे। तथ्य यह है कि उन्होंने  माहदेवी जैसे कई मुस्लिम समुदायों को भी निशाना बनाया। ये समुदाय वे थे जो अंग्रेज़ों के साथ थे और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के घुड़सवार दस्ते के सदस्य थे। एक अन्य इतिहासविद सूसान बैले लिखती हैं कि अगर टीपू ने अपने राज्य के बाहर हिन्दुओं और ईसाईयों पर हमले किए तो यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अपने राज्य में रहने वाले इन्हीं समुदायों के सदस्यों के साथ उनके मधुर रिश्ते थे।

    Tipu Sultan
    Tipu Sultan

    टीपू को मुस्लिम कट्टरपंथी के रूप में प्रस्तुत करना अंग्रेज़ों के हित में था। उन्होंने यह प्रचार किया कि वे टीपू की तानाशाही से त्रस्त गैर-मुसलमानों की रक्षा के लिए टीपू के खिलाफ युद्ध कर रहे हैं। यह मात्र एक बहाना था। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज के ज़माने में हम राजाओं और नवाबों का महिमामंडन नहीं कर सकते। वे हमारे राष्ट्रीय नायक नहीं हो सकते। परंतु इसके बाद भी, टीपू, भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में तत्समय राज कर रहे भारतीय राजाओं से इस अर्थ में भिन्न थे कि वे अंग्रेज़ों के भारत में अपना राज कायम करने के खतरों को पहले से भांप सके। वे अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में सबसे पहले अपनी जान न्यौछावर करने वालों में से थे। भारत में स्वाधीनता आंदोलन, टीपू के बहुत बाद पनपना शुरू हुआ और इसमें आमजनों की भागीदारी थी। टीपू के बलिदान को मान्यता दी जाना ज़रूरी है। आज साम्प्रदायिक विचारधारा के बोलबाले के चलते टीपू जैसे नायकों का दानवीकरण किया जा रहा है। अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में टीपू की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • कश्मीर 2016 : जुनून के पीछे भी झाकें

    प्रो० राम पुनियानी


    उरी में भारतीय सेना के 18 जवानों के मारे जाने की घटना के जवाब में भारत द्वारा नियंत्रण रेखा के पार जो सैनिक कार्यवाही की गई, उसकी वाहवाही के शोर में कश्मीर के लोगों की व्यथा छुप सी गई है। भारत और पाकिस्तान के बीच जितनी भी झड़पें हुई हैं, उनके केंद्र में कश्मीर रहा है। भारत का कहना है कि कश्मीर उसका अविभाज्य हिस्सा है और धरती की कोई ताकत कश्मीर को उससे छीन नहीं सकती। दूसरी ओर, पाकिस्तान, कश्मीर के भारत में विलय के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करता है। पाकिस्तान का कहना है कि चूंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है इसलिए उसे पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए।

    आतंकी हमलावरों द्वारा उरी में 18 भारतीय सैनिकों को मार दिए जाने के बाद से यह मुद्दा अखबारों की सुर्खियों में आ गया। दरअसल, घटनाक्रम की शुरूआत हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की सेना के साथ एक मुठभेड़ में मौत के साथ हुई। इस घटना पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। जहां मीडिया ने इसे घाटी में सक्रिय अतिवादियों से मुकाबला करने में भारतीय सेना की बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया, वहीं कश्मीर के लोगों का एक तबका इसके विरोध में सड़कों पर उतर आया। विरोध की अभिव्यक्ति का मुख्य तरीका पुलिस और सेना के जवानों पर पत्थरबाजी है। इसके बाद हुए घटनाक्रम में लगभग 80 लोग मारे गए और 9,000 से ज्यादा घायल हुए। इनमें से अधिकांश को पेलेट से चोटे लगीं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षाबल करते हैं। कई अपनी आंखे खो बैठे हैं और अन्यों को शरीर के विभिन्न अंगों में गंभीर चोटें आईं। पुलिस और सेना के जवान भी घायल हुए। राज्य में कफ्र्यू लगा दिया गया और यह राज्य में अब तक का सबसे लंबा कर्फ्यू था।

    सरकार द्वारा शांति स्थापना के लिए कई प्रयास किए गए। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर गए और वहां के नेताओं से बातचीत की। भारत सरकार और गृहमंत्री का कहना है कि वे अलगाववादी नेताओं से बात नहीं करेंगे। जब एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल घाटी गया तब प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों जैसे सीताराम येचुरी और डी राजा ने अलगाववादी नेता गिलानी से बातचीत करने की कोशिश की परंतु उन्होंने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।

    लगभग दो माह बाद कर्फ्यू उठा लिया गया परंतु स्थिति अब भी तनावपूर्ण बनी हुई है। उरी में आतंकी हमले के बाद पूरा फोकस आतंकवाद के मुद्दे पर हो गया है। जहां तक कश्मीर के हालात का सवाल है, सरकार का कहना है कि गड़बड़ी फैलाने वाले घाटी की आबादी का पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं और उन्हें पाकिस्तान भड़का रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि घाटी में जो हालात हैं, उसके लिए पाकिस्तान भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार है। हमारे पड़ोसी देश के नेता इस मुद्दे पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं। परंतु यह भी सच है कि कश्मीरी लोगों में लंबे समय से गहरा आक्रोश और असंतोष व्याप्त है और पिछले कुछ वर्षों में यह अपने चरम पर पहुंच गया है। वहां के युवा गुस्से में हैं। उनके मन में अलगाव का भाव है। कश्मीर के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर आतंकी, घाटी में शांति का वातावरण नहीं बने रहने दे रहे हैं तो दूसरी ओर सशस्त्र बलों द्वारा लोगों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। राज्य में लागू सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सेना के कर्मी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं और कई मामलों में निर्दोष नागरिकों को जबरन परेशान किया जा रहा है।

    कश्मीर के हालात पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रपट बताती है कि घाटी में मानवाधिकारों का उल्लंघन कितना आम है। बैंगलोर में जारी इस रपट में कहा गया है कि 1990 से 2011 तक राज्य सरकार के अनुसार राज्य में 43,000 लोग मारे गए। उनमें से 21,323 ‘अतिवादी’ और 13,226 ‘नागरिक’ (अर्थात जो हिंसा में सीधे शामिल नहीं थे) थे। हथियारबंद समूहों द्वारा 5,369 सुरक्षाकर्मियों को मार डाला गया और इस अवधि में सुरक्षाबलों ने 3,642 ‘नागरिकों’को मौत के हवाले कर दिया।

    सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण बिना किसी जांच या मुकदमे के आरोपियों की जान ली जा रही है और मानवाधिकार उल्लंघन की अन्य घटनाएं हो रही हैं। इस अधिनियम की धारा 7 के अनुसार नागरिक अदालतों में सुरक्षाबलों के किसी सदस्य पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्रीय और राज्य शासन की अनुमति आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सुरक्षाबलों की ज्यादतियों को नजरअंदाज किया जा रहा है। सेना के खिलाफ जम्मू और कश्मीर में जो शिकायतें की गईं, उनमें से 96 प्रतिशत को ‘झूठा और आधारहीन’  या ‘सैन्यबलों की छवि को खराब करने के इरादे से किया गया’ बताकर खारिज कर दिया गया। इन परिस्थितियों में कश्मीर में हर घटना पर बवाल खड़ा हो जाता है और युवा विरोध करने सड़कों पर उतर आते हैं। नागरिकों में राज्य के प्रति जो गहरा असंतोष व्याप्त है, वह बहुत दुःखद है। नागरिक इलाके व्यवहारिक रूप से सेना के कब्जे में हैं। कई वर्षों से घाटी में लगभग 6 लाख सैनिक तैनात हैं। वहां के लोगों को ऐसा लगता ही नहीं है कि वहां प्रजातंत्र है। जाहिर है इन परिस्थितियों में असंतोष और गहरा होता जा रहा है। इस पूरी समस्या के लिए केवल पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा, यद्यपि पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।

    आखिर रास्ता क्या है? यूपीए-2 सरकार ने वार्ताकारों की एक तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की थी जिसने यह सिफारिश की थी कि कश्मीर की विधानसभा की स्वायत्तता पुनर्स्थापित की जाए और अतिवादियों व पाकिस्तान के साथ बातचीत की जाए। यह मांग भी लंबे समय से की जा रही है कि सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम को समाप्त किया जाए और क्षेत्र में तैनात सैन्यबलों की संख्या घटाई जाए।

    कश्मीर में शासन कर रही पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार, असंतुष्टों से बात करने तक को तैयार नहीं है। इससे घाटी में बेचैनी और असंतोष बढ़ रहा है। उरी और उससे पहले पठानकोठ पर हमले में पाकिस्तान की भूमिका ने वातावरण को और विषाक्त कर दिया है।

    हम सब को याद है कि चुनाव अभियान के दौरान भाजपा यह घोषणा करते नहीं थकती थी कि मोदी के सरकार में आने के बाद आतंकवादियों की हमला करने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी। यह दावा खोखला सिद्ध हो चुका है।

    आज आवश्यकता यह है कि पूरे क्षेत्र में शांति की स्थापना की जाए। कश्मीर के लोगों के घावों पर मलहम लगाई जानी चाहिए और उन्हें चैन से अपना जीवन गुज़रबसर करने का मौका मिलना चाहिए। कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत भी आवश्यक है। कश्मीर के साथ 1948 में विलय की जो संधि की गई थी, उसके स्वायत्तता संबंधी प्रावधानों का सम्मान किया जाना चाहिए। वार्ताकारों की समिति की रपट इस मुद्दे पर संतुलित रूख अपनाने की सिफारिश करती है। इस रपट पर गंभीरता से विचार होना चाहिए ताकि घाटी में शांति स्थापित हो सके।

     

     

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    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • अल्पसंख्यकों के लिए न्याय कहां

    प्रो० राम पुनियानी


     

     

    Justice Markandey Katju

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 26 सितंबर, 2016 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को लिखा  ‘‘आपको तो यह पता ही होगा कि अखलाक नामक एक व्यक्ति को दादरी में कथित गौरक्षकों ने पीट-पीटकर मार डाला। इस भयावह अपराध को अंजाम देने वालों को सज़ा देने की बजाए,पुलिस और स्थानीय जज, अखलाक के परिवार के खिलाफ ही कार्यवाही कर रहे हैं…क्या पुलिस पागल हो गई है?’’

    मुहम्मद अखलाक दादरी, उत्तर प्रदेश
    दादरी, उत्तर प्रदेश

    चांद खान उर्फ शान खान को अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमले के मामले में सन 2002 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसे 11 वर्ष जेल में बिताने के बाद,बिना किसी मुआवजे के रिहा कर दिया गया क्योंकि एक अदालत ने उसे बरी कर दिया। परंतु अब उसे गौहत्या के एक मामले में मुजरिम बना दिया गया है।

    मुफ्ती अब्दुल कय्यू्म मंसूरी

    मुफ्ती अब्दुल कय्यूम अब्दुल हुसैन की एक पुस्तक है, जिसका शीर्षक है ‘‘इलेविन इयर्स बिहाइन्ड द बार्स-आई एम ए मुफ्ती, नॉट ए टेरोरिस्ट’’ (सींखचों के पीछे ग्यारह साल-मैं एक मुफ्ती हूं, मैं आतंकवादी नहीं हूं)। यह पुस्तक मुफ्ती साहब के आतंकी हिंसा में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तारी, उनको शारीरिक यंत्रणाएं दिए जाने और उसके बाद, इतने लंबे अरसे तक जेल में रखे जाने की करूण गाथा कहती है। आमिर खान नाम के एक मुस्लिम लड़के को आतंकियों का साथ देने के आरोप में जब गिरफ्तार किया गया था, तब वह मेट्रिक की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। चैदह साल जेल में काटने के बाद जब वह रिहा हुआ, तब तक उसके पिता गुज़र चुके थे और उसकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं। उनकी पुस्तक ‘‘फ्रेम्ड एज़ ए टेरेरिस्ट’’ (आतंकी बताकर फंसाया गया) को पढ़ने से यह अंदाज़ा होता है कि हमारी व्यवस्था एक निर्दोष व्यक्ति के प्रति कितनी क्रूर हो सकती है।

    Hyderabad Mecca Masjid

    ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। ऐसे मुसलमान युवकों की एक लंबी सूची है जिन्हें आतंकवाद से संबंधित आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया, उनकी जिंदगी थम गई और उनके करियर व परिवार तबाह हो गए। हाजी उमरजी को गोधरा ट्रेन आगजनी मामले का मास्टरमाइंड होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। कई साल जेल में बिताने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला। मक्का मस्जिद (हैदराबाद), मालेगांव समझौता एक्सप्रेस और अजमेर धमाकों के मामलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया और बाद में कोई विश्वसनीय सुबूत न पाए जाने पर रिहा कर दिया गया। इन सभी मामलों में पुलिस की जांच पूर्वाहग्रहपूर्ण और गलत थी। यह स्पष्ट है कि पुलिस, अल्पसंख्यकों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। भारत में सांप्रदायिक हिंसा के अध्येता हमें बताते हैं कि ब्रिटिश काल में पुलिस की चाहे जो कमियां रही हों, सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में वह निष्पक्षता से काम करती थी। पुलिस के अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त होने की शुरूआत, स्वाधीनता के बाद हुई और स्वतंत्र भारत में जबलपुर में 1961 में हुए पहले सांप्रदायिक दंगे के बाद से लेकर आज तक पुलिस का अल्पसंख्यक-विरोधी दृष्टिकोण और मानसिकता हम सबके सामने है। कई मौकों पर पुलिस के अलावा, राज्य तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व ने भी निष्पक्षता नहीं दिखलाई। अधिकांश जांच आयोगों की रपटें, फिल्में और डोक्युमेंट्रियां इस तथ्य को रेखांकित करती हैं। सरकारी सेवाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है और जो चंद मुसलमान उच्च पदों पर हैं, वे भी या तो धारा के साथ बहने लगते हैं या चुप्पी साध लेते हैं। अक्सर उन्हें ऐसे क्षेत्रों में पदस्थ किया जाता है जहां वे सांप्रदायिक हिंसा को रोकने या उसे करने वालों को सज़ा दिलवाने में सक्षम ही नहीं होते।

    मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों पर श्रीकृष्ण न्यायिक जांच आयोग की रपट बताती है कि किस तरह पुलिस अधिकारियों ने दंगाईयों की हरकतों को नजरअंदाज किया और कई मामलों में उनका साथ दिया। दिल्ली में 1984 में हुई सिक्ख-विरोधी हिंसा और सन 2002 के गुजरात दंगों में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। महाराष्ट्र के धुले में सन 2013 में पुलिस वाले स्वयं दंगाईयों की भूमिका में थे। हाशिमपुरा घटना पर अपनी पुस्तक में पूर्व पुलिस महानिदेशक वीएन राय ने बताया है कि किस प्रकार पुलिस ने एक ट्रक में मुस्लिम युवकों को भरा, उन्हें दूर ले जाकर गोलियों से भून दिया और फिर उनकी लाशें एक नहर में फेंक दीं। जो लोग जिंदा बच गए, वे इस भयावह घटनाक्रम को दुनिया के सामने लाए।

    World Trade Centre, USA

    अमरीकी मीडिया ने 9/11/2001 को डब्ल्यूटीसी पर आतंकी हमले के बाद ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इस शब्द से ऐसा प्रतीत होता है मानो दुनिया में आतंकवाद के लिए केवल इस्लाम और मुसलमान ज़िम्मेदार हैं। मीडिया ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया कि अल्कायदा को इतना शक्तिशाली बनाने वाला अमरीका ही था। तब से हालात और खराब हुए हैं। न केवल समाज बल्कि राज्यतंत्र भी मुसलमानों को आतंकी बतौर देखने लगा है। पूरे विश्व में इस्लाम के प्रति इस तरह का घृणा का वातावरण बनाने में मीडिया और निहित स्वार्थी तत्वों की भूमिका रही है।

    जाहिर है, निर्दोष युवाओं और अन्यों को पुलिस और राज्य तंत्र की मनमानी से बचाए जाने की आवश्यकता है। पुलिस सुधारों के लिए कई आयोग गठित किए गए जिन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए कई सुझाव दिए। परंतु अधिकांश सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। पुलिसकर्मियों को अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की ज़रूरत है। जिन अकादमियों और संस्थानों में पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, उनके पाठ्यक्रमों में पूर्वाग्रहों और टकसाली धारणाओं के पीछे के सच को उजागर करने वाली सामग्री शामिल की जानी चाहिए। पुलिसकर्मियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि भावनाओं में बहने की बजाए उन्हें संविधान और कानून के प्रति वफादार रहना चाहिए।

    कई नागरिक समाज संगठन इन मुद्दों पर काम कर रहे हैं। वे ऐसे लोगों के मामले उठाते हैं जिन्हें झूठे प्रकरणों में फंसा दिया गया है परंतु इस तरह के संगठनों की क्षमता सीमित है। ऐसे संगठनों को मज़बूत किया जाना ज़रूरी है। जो लोग झूठे प्रकरणों में लंबी अवधि तक जेलों में पड़े रहते हैं उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए और उन्हें फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों को सज़ा दी जानी चाहिए। प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को उन लोगों द्वारा लिखी पुस्तकें अनिवार्य रूप से पढ़वाई जानी चाहिए जिन्हें झूठे प्रकरणों में फंसाया गया हो। वे राजनैतिक दल, जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के हामी हैं, उन्हें सांप्रदायिक संगठनों को अलग-थलग करने के प्रयास करने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सांप्रदायिक दलों के हाथों में सत्ता न आए। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जिसमें न्याय और शांति दोनों हों। किसी धर्म विशेष के व्यक्तियों के साथ इस तरह के घोर अन्याय को कोई समाज और देश स्वीकार नहीं कर सकता। कोई समाज कैसा है, इसका एक मानक यह है कि वह कमज़ोर वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ न्याय करता है अथवा नहीं। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि जस्टिस काटजू के पत्र को गंभीरता से लिया जाएगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • गौमांस और राजनैतिक परिदृश्य – प्रो० राम पुनियानी

    2016-09-10-beef-cowपिछले दो वर्षों में दलितों और मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा की कई घटनाएं समाचारपत्रों की सुर्खियां बनीं। इनमें से कुछ, जिनमें उना, गुजरात में जुलाई 2016 का घटनाक्रम शामिल है, ने देश के संवेदनशील नागरिकों की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। इसके पहले, जून 2015 में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की इस झूठे आरोप में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी कि उसके घर गौमांस रखा था।

    आज नरेन्द्र मोदी यह कह रहे हैं कि 80 प्रतिशत गौरक्षक असामाजिक तत्व हैं परंतु इन्हीं मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान इस मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया था। इसे जानने के लिए हमें केवल उनके भाषणों को याद करने की ज़रूरत है। श्री मोदी ने कहा था कि, ‘‘राणा प्रताप ने अपना जीवन गौरक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने गाय की रक्षा के लिए युद्ध लड़े और युवाओं के जीवन की कुर्बानी दी…’’। उन्होंने देश से बीफ के निर्यात को ‘‘पिंक रेवोल्यूशन’’ बताया था और उसकी कड़ी निंदा की थी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो बीफ के निर्यात के लिए गायों का वध किया जाएगा।

    इसी सिलसिले में दो अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। भाजपा-शासित राजस्थान में ‘‘गौ विभाग’’ का गठन किया गया है और इसका ज़िम्मा एक मंत्री को सौंपा गया है। इसी राज्य में हिंगोनिया में स्थित एक गौशाला में उचित देखभाल न होने के कारण सैंकड़ों गायों के मरने की खबर है। यह बताया जाता है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से गौशालाओं के लिए दिए जाने वाले अनुदान में भारी कमी की गई है।

    इन सब तथ्यों से यह स्पष्ट है कि गौभक्ति, दरअसल, एक समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा फैलाने का बहाना भर है। गाय से जुड़े मुद्दों पर हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी इसलिए हुई है क्योंकि कथित गौरक्षक यह जानते हैं कि केंद्र सरकार और भाजपा-शासित अनेक राज्य सरकारें उनकी गैर-कानूनी हरकतों को नज़रअंदाज करेंगी।

    यह सही है कि संविधान में गौवंश की रक्षा के लिए प्रावधान है। संविधानसभा में ‘‘काफी लंबी बहस और चर्चा, जिसके दौरान कई सदस्यों ने गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध को संविधान के मूल अधिकारों में शामिल करने की मांग की, के बाद एक समझौते पर पहुंचा गया, जिसके अन्तर्गत गाय की रक्षा को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया गया। यह अनमने ढंग और हिचकिचाहट के साथ हिन्दुओं की भावनाओं को संविधान में जगह देने का प्रयास था।’’

    इस प्रावधान को भी धार्मिक रंग न देते हुए उसे कृषि और विज्ञान से जोड़ा गया। ‘‘राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिशेध करने के लिए कदम उठाएगा।’’

    देश के 28 में से 24 राज्यों में गायों और अन्य मवेशियों के वध को प्रतिबंधित करने वाले या उन पर किसी न किसी तरह की रोक लगाने वाले कानून लागू हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में गौवध को गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया गया है और इसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान किया गया है। इन कानूनों की संवैधानिक वैधता की जांच की जानी आवश्यक है और यह पता लगाया जाना ज़रूरी है कि कहीं वे देश के कुछ समूहों या समुदायों के मूल अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करते और भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा के खिलाफ तो नहीं हैं।

    बहरहाल, जहां एक ओर गौशालाओं के लिए बजट में कमी की गई है और गौ विभागों के बाद भी गौशालाओं में रह रही गायों की देखभाल में घोर लापरवाही बरती जा रही है, वहीं गाय के नाम पर मुसलमानों और दलितों के खिलाफ हिंसा भी भड़काई जा रही है। गौमाता की रक्षा के मुद्दे पर हिन्दू संप्रदायवादी 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक कई तरह के आंदोलन चलाते आए हैं। स्वाधीनता के पहले तक मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, सूअर को घृणा का पात्र बताकर इस आग को भड़काने का काम करते रहे थे।

    ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जिनमें बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मंदिरों में गौमांस फेंका। जहां समाज के सामूहिक अवचेतन में गौमांस के मुद्दे को हमेशा जीवित रखा गया वहीं अब इसका खुलकर इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए किया जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गाय, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण व उपयोगी पशु है। जहां गाय दूध देती है वहीं बैल का इस्तेमाल खेती में किया जाता है। परंतु बूढ़े और अनुपयोगी बैलों और गायों का भोजन के रूप में इस्तेमाल भी हमेशा से होता आया है। आदिवासियों के अतिरिक्त, दलितों, मुसलमानों और ईसाईयों और यहां तक कि उच्च जातियों के हिन्दुओं के कुछ तबके भी बीफ का प्रोटीन के सस्ते स्त्रोत के रूप में सेवन करते आए हैं।

    अगर हम इतिहास की दृष्टि से देखें तो बीफ, वैदिक काल से ही खानपान का भाग था। गाय को गौमाता का दर्जा काफी बाद में दिया गया और धीरे-धीरे उसे पहचान की राजनीति का उपकरण बना दिया गया। भीमराव अंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘‘डिड हिन्दूज़ नेवर ईट बीफ?’’ में इसका खुलासा किया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था ‘‘आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि पुरानी प्रथाओं के अनुसार, वो हिन्दू एक अच्छा हिन्दू नहीं था जो बीफ नहीं खाता था। कुछ मौकों पर उसे बैल की बलि देकर उसे खाना होता था।’’

    किसी भी बहुसांस्कृतिक समाज में खानपान की विविधता अपरिहार्य है। इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है। गांधी इस मामले में हमें राह दिखाते हैं। गौमांस के मुद्दे पर उन्होंने कहा था, ‘‘…गौमांस उनका (मुसलमान) रोजाना का सामान्य भोजन नहीं है, उनका रोजाना का सामान्य भोजन तो वही है जो देश के अन्य करोड़ों बाशिन्दों का है। यह सही है कि ऐसे मुसलमान बहुत कम हैं जो धार्मिक कारण से शाकाहारी हों। अगर उन्हें मांस, जिसमें गौमांस शामिल है, उपलब्ध होगा तो वे उसे खाएंगे। परंतु एक लंबे समय से गरीबी के कारण करोड़ों मुसलमान किसी भी प्रकार का मांस नहीं खा पाते हैं। ये तो तथ्य हैं। परंतु सैद्धांतिक प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देना आवश्यक है…मेरी यह मान्यता है कि मुसलमानों को गौवध करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए…’’

    परंतु अब सांप्रदायिक ताकतों द्वारा मुसलमानों की छवि गौवध करने वालों के रूप में इस हद तक प्रचारित कर दी गई है कि जो लोग शांति, सहिष्णुता और बहुवाद के हामी हैं, उन्हें इस मुद्दे पर मुसलमानों के प्रति घृणा के भाव को समाप्त करने के लिए बहुत मेहनत और प्रयास करने होंगे।

    मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण – अमरीश हरदेनिया
    Dr Ram Puniyani Rtd Prof, IIT Bombay
    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay
  • क्या मैं अंदर आ सकती हूं, भगवन् :: आराधनास्थलों में प्रवेश के लिए महिलाओं का संघर्ष

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    शनि मंदिर शिंगणापुर, महाराष्ट्र
    शनि मंदिर
    शिंगणापुर, महाराष्ट्र

    यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है- आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

    Haji Ali Dargah Mumbai, Maharashtra
    Haji Ali Dargah
    Mumbai, Maharashtra

    शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात‘ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

    सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रम्हचारी भगवान का मन भटकेगा।

    brunei-masjidमस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।

    चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है।

    constitution-of-indiaहमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है।

    Trupti Desai Bhumata Brigade
    Trupti Desai
    Bhumata Brigade

    अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागत योग्य हैं।

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    Bhumata Brigade
    Bhumata Brigade

    लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम – ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)
    Dr Ram Puniyani Rtd Prof, IIT Bombay
    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay