Tag: Neelam Swarnkar

  • रिफ्यूजी — Neelam Swarnkar

    रिफ्यूजी — Neelam Swarnkar

    ​Neelam Swarnkar

    मेरी आँखों ने जो मंज़र देखे हैं
    वो सोने नहीं देते रात भर
    आँख बंद किये भी मैं जागता रहता हूँ।
    सपने में आने वाले हैवानों को हकीकत में देखा है
    वे इंसानों का चेहरा ओढ़े हमारे घर जला रहे थे।

    ​भागते हुए जिन लाशों को लांघा
    उनमे से कई चेहरे मेरे बेहद करीब थे
    मेरा छोटा भाई
    जो बिछड़ गया था मुझसे
    तीन दिन बाद मिला
    न रो पाया न हँस पाया।

    ​मेरा सबसे छोटा भाई
    जिसे बाँहों में कस कर पकड़ रखा था मैंने
    नाव पर चढ़ने के दौरान
    बहुत छोटा है, बोलता कुछ नहीं
    बस बड़ी-बड़ी आँखों से देखता है।
    वो पहले ऐसा नहीं था..

    ​माँ..
    जो पिता की याद और हमारे भविष्य की फ़िक्र में रोती है
    और खीझती है,
    वो भी ऐसी नहीं थी..

    ​दरअसल इस रिफ्यूजी कैंप का हर इंसान बदल गया है
    पहले ऐसा कहाँ था
    अब सब बदल गया
    मेरा मुल्क़, मेरे लोग
    ये दुनिया ही पूरी बदल गयी है।

    Neela​m Swarnkar

  • मेरी खुराक है गलत का विरोध

    Neelam Basant Nandini

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    मेरी ख़ुराक है
    गलत का विरोध
    शक्ति है..
    मैंने खुद अर्जित की है

    बदले में मतलबी, घंमडी, आलसी
    और बुरी लडकी के खिताब पाए हैं..

    अभी भी पूरी शक्ति से विरोध नहीं कर पाती
    रिश्ते, मान-सम्मान
    आड़े आ जाता है
    अक्सर एक संस्कारी लडकी से
    पराजित हो जाती हूँ मैं..

    नौ गज लंबी ज़ुबान
    चपड़ चपड़ चलती है
    औरत जात को इतना नहीं बोलना चाहिए

    मेरी दूर की दीदी की आँख डैमेज कर दी
    उन लोगों ने
    इतना भी मुँह नहीं चलाना चाहिए था उनको
    तो क्या हुआ उनकी माँ को वैश्या बोल दिया तो….
    पति/सास से बराबर ज़ुबान नहीं लड़ानी चाहिए थी…

    पर कोई कीड़ा है
    मेरे अंदर.. मेरी दूर की दीदी और उन जैसी कइयों के अंदर.. https://remotepilot101.com
    चुप्प नहीं रह पाता
    बोलता है.. बहुत बोलता है
    जब तक खुद पर लगे आरोप खारिज़ नहीं कर देता..
    बोलता जाता है…

    ये बोलना या मुंह चलाना
    एक तरह से मजबूत पकड़/रस्सी है
    जो अवसाद के कुँए में नहीं गिरने देती
    जो न बोला तो धम्म से डिप्रेशन…!!

    बोल बोल के अपने हक में लड कर
    हल्की हो लेती हैं…
    हम बदजुबान लड़कियाँ
    इसीलिए टिकी रहती हैं

    .

  • मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ

    नीलम बसंत नंदिनी


    दुनियां पूरब चलती थी
    तो मैं पश्चिम
    लडकियों को लंबे बाल पंसद थे
    मैंने मान्यताओं पर कैंची चलवायी
    लड़कियां दुपट्टों के कलेक्शन करतीं
    मैं थान से कपड़ा काट
    विद्रोह सिलवाती थी

    मैंने ज़िद की वो सब करने की
    जो लडकियों के लिए हेय था
    पापा हौसला देते रहे
    मैं उडती रही…

    परकटी, गंजी, लडकों जैसी लडकी..
    जैसे संबोधनों को
    स्कूटर के पहिए से कुचल
    आगे बढती रही..

    मैं खराब लड़की थी
    पर मुझे वही होना पसंद था!

    दसवीं में
    मेरी सहपाठिनों ने
    विवाह का पिंजरा चुना..
    मुझे अकेले जाकर
    शहर में किताबों से यारी करनी थी..

    मेरी हमउम्रों को माता पिता की मोहर लगा
    सुंदर-सा खूंटा चाहिए था
    मुझे अपनी ही पंसद के सोलमेट के साथ जीना था..

    मेरी पलकों में था वो अनंत व्योम
    जिसमें जब जी चाहूँ
    पंख फैलाए उड़ सकूं..

    मैं मुक्त थी.. मुक्त हूँ..
    सामाजिक बंधन वाली मोटी सांकल से
    पर…
    अभी और मुक्त होना बाकी है..
    फ्रीडम जैसी सहज
    पर अमूल्य चीज
    सरलता से नहीं मिलती..

    लड़ना पड़ता है
    गालियां खानी पड़ती हैं
    तथाकथित समाज की
    जीभ और दिमाग से..

    और जंग लगी जंजीर खोल
    मुक्त होना पड़ता है
    रिश्तों के मकडजाल से..

    सो कॉल्ड अच्छी बेटी,
    संस्कारी बहू,
    पतिव्रता पत्नि
    मैं बन जाती तो क्या जीवित कहलाती
    खुद से संवाद में हार नहीं नहीं जाती..

    मुझे आया ही नहीं कभी
    उस तरह जीना
    एक ही जीवन मिला है
    अपनी तरह जीने के लिए…

    असंख्य स्वप्न अपूर्ण हैं अभी
    असंख्य ख्वाहिशें बाकी हैं…

    फेफड़ो में भर ढेर सारी
    ऑक्सीजन..
    डुबकी लगानी है
    चाहतों की मछलियों संग तैरना है..

    अपनी ही बाहों का जैकेट ओढ़
    खुद को शाबाशी दे
    पार करना है
    सामने खड़ा एवरेस्ट…

    चोटी पर पहुँच
    गला फाड़ चीखना है..
    अभी मुझे जीना है
    ढ़ेर सारा जीना है….!