ईद के ख़ुशी के मौके पर सभी दोस्तों को बहुत मुबारकबाद. देश के मौजदा हालातो से अफ़सोस तो होता है के जिम्मेदार लोगो की जुबान पर नफ़रत फैलाने वालो के लिए कुछ अल्फाज़ भी नहीं है. अभी अभी दिल्ली पहुंचा हूँ . रास्ते में देख रहा था बच्चे ख़ुशी ख़ुशी, चहकते हुए, महकते हुए ईदगाह की और जा रहे हैं . मन में सोच रहा था के इन बच्चो को पता है के उनके समय की दुनिया कैसी होगी , नफ़रत की आग में लोगो को झोंककर आप कौन सा विकास करोगे. क्या कोई मुल्क नफ़रत की सियासत पर तरक्की कर पायेगा. हम अपने मतभेदों को जानते हैं लेकिन मनभेद नहीं था पर आज जिस तरीके से इतिहास को तोड़कर, डंडे के बलपर, गली गली मुहल्लों में अफवाह फैलाकर जो नफ़रत फैलाई जा रही है उसका मुकाबला करना होगा . सदियों से साथ रह रहे लोगो को अलग करने की साजिश का पर्दाफास करना होगा.
अगर इस देश में रह रही हज़ारो जातियों और कौमो में बहुत मतभेद थे और हैं तो उनके साथ रहने के भी लाखो किस्से मिलेंगे . केवल साथ रहने के नहीं, अपितु साथ चलने और साथ लड़ने के भी हजारो किस्से मौजूद हैं और उनको दोबारा से ढूंढ कर न केवल निकालना होगा अपितु उसको मौजूदा दौर में अपने राजनैतिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक जीवन का हिस्सा भी बनाना होगा.
अराजक लोगो के पास इतिहास में खंगाल करके भी सिवाय तिकडमो के और कुछ नहीं है . समाज को हजारो जातियों में धकेल कर उसके खिलाफ लड़ने या उसके खात्मे के लिए उनके पास कोई इतिहास नहीं है. अब शातिरपने में मुसलमानों और अंग्रेजो को जातिव्यस्था का जनक बताकर ये लोग अपने किये पर पर्दा नहीं डाल सकते. सवाल ये नहीं के जातियां किसने बनाइ और कैसे आयी अपितु सवाल ये है के आप ने अपने इतने लम्बे इतिहास में जातियों और जातिवाद के खात्मे के लिए कौन कौन से आन्दोलन किये , क्या प्रयास किये . आज़ाद भारत में दलितों, पिछडो को थोडा सा भी हिस्सा देने पर उनके खिलाफ मेरिट की झूठी दलील देने वाले क्या वाकई में उनको न्याय देंगे.
बहुत वर्षो पूर्व इंडोनेशिया के एक गाँव में गया . वो ऐतिहासिक बांडुंग से दूर जंगलो में था , जहाँ गया वो कबीलाई संस्कृति. एक सरदार और बाकी साथ में बैठे लोग . पर्दा था लेकिन सऊदी ब्रांड नहीं, मतलब औरते बात कर सकती थी. भाषा के तौर पर हम पूरी तरह अजनबी थे . हमारे इण्डोनेशियाई दोस्त ने परिचय कराया के मैं भारत से आया हूँ .बस उसका इतना कहना था के वहा के समुदाय के सर्वोच्च नेता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा . वह बहुत बाते बोल गए. कहा के हमारी संस्कृति, हमारा मज़हब पहले भारत आया और फिर इंडोनेशिया. इस्लामिक देश होते हुए भी वहां पर भारत का प्रभाव दिखाई देता है और उसको बदलने की किसी ने कोशिश न ही की . अभी भी इमामो के नाम विष्णु और राम के नाम पर मिल जायेंगे और सभी महिलाओं के नाम के आगे देवी कॉमन शब्द है चाहे वह मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम . गरुडा, बाली, राम आदि शब्द वह अत्यंत कॉमन हैं . हालांकि सऊदी पैसे का खेल अभी वहा भी दीखता है .
इसलिए ईद की ख़ुशी में बहुत से बाते सोचने की हैं . मैं अमूमन धार्मिक त्योहारों पर ज्यादा नहीं बोलता लेकिन अगर कोई मुझे बधाई मिलती है तो दे देता हूँ लेकिन मैं मानता हूँ धार्मिक कर्म कांडो से दूर भी बहुत से लोग इन त्यौहारों को एक दुसरे से संपर्क बनाने के साधन मानते हैं. बहुत से लोगो के लिए ये मौके हैं गिले सिक्वे भुलाने के और नए सिरे से दोस्ती करने के . ईद के मौके पर मैं ये कहना चाहता हूँ के आज़ाद भारत के नागरिक होने के नाते के ये देश हमेशा सबका रहेगा . ये न हिन्दू राष्ट्र होगा न इस्लामिक न ईसाईं और न कोई और . हाँ इस देश में जिनको सदियों से सत्ता, शिक्षा,संस्कृति, व्यापार, आदि से दूर रखा गया वो अब हिसाब मांग रहे हैं और इसलिए इतनी सारी दिक्कते आ रही हैं . मुसलमान इस देश में न तो बाहर से आये और यदि आये भी तो ७०० वर्ष का लम्बा इतिहास है जब उन्होंने और लोगो के साथ मिलकर ये देश बनाया . अगर मुसलमानों को ७०० वर्षो का इतिहास का हिसाब देना है तो कुछ हज़ार वर्ष पूर्व आये आर्यों को भी अपना हिसाब देना पड़ेगा . शायद ये हिसाब किताब के कारण ही आजकल इतनी परेशानिया बढ़ी हैं .
ईद के पर्व पर बहुत से लोग विरोध स्वरूप काली पट्टी पहनने की बात कर रहे हैं . विरोध करना बिलकुल वाजिब है और उसके लिए कुछ संकेतो की जरुरत होती हैं लेकिन मैं काले को विरोध के तौर नकारात्मकता के प्रतीक मानने के बिलकुल खिलाफ हूँ . न ही मैं काले धन, काला कानून इत्यादि जैसे नस्लवादी शब्दकोष का इस्तेमाल करता हूँ न करूँगा क्योंकि अन्याय के विरूद्ध हमारी लड़ाई में दलितों, पिछडो, हिस्पनिको, अफ्रीकी मूल के लोगो के साथ जाति, धर्म, नस्ल के आधार पर जो भेदभाव होता आया है उसके विरूद्ध सबको एक होना पड़ेगा . इसलिए देश में जो घट रहा है और उस पर जिम्मेवार लोगो के शंकित चुप्पी पर हमारा विरोध है और हम सभी साथियो के साथ खड़े हैं .
एक बात सभी को याद रखनी चाहिए के दुनिया भर में इन्सानियातो को शर्मसार करने वाली घटनाएं धर्म को राजनीती के जरिये सत्ता में पहुँचने वाले लोगो ने बनाई है और इसमें गैर मजहबी जो अल्पसंख्यक होते हैं उनको खलनायक बनाकर रोटिया सकने का धंधा पुराना है , जरुरत है उसको पहचानने की . कोई देश अपने एक समुदाय या नागरिक को मारकर आगे नहीं बढ़ सकता . जो लोग ये सोचते हैं के गृह युद्ध से उनकी ‘चाहत’ पूरी हो जायेगी वो गलतफहमी में हैं. युद्ध, बम, मार काट ने आज तक तो किसी समस्या का समाधान नहीं किया है और आगे भी नहीं करेंगी . समस्याओं और गलतफहमियो का समाधान बातचीत में हैं और मत भिन्नता और डाइवर्सिटी को स्वीकारने में हैं .
आज ईद के मौके पर एक बार फिर सभी को बहुत बहुत शुभकामनाये ,इन हालातो में भी हौसला बनाकर लड़ना है ताकि अपनी आगे की पीढ़ीयो को हम एक बेहतरीन समाज दे पाए . बुद्ध के मध्य मार्ग से उत्तम कुछ नहीं. हम सभी में १०० फ़ीसदी तो सभी एक नहीं सोचेंगे लेकिन कम से कम ५० फ़ीसदी भी समान सोच बनती है जो नफ़रत पैदा करने वालो की चालो को समझती है तो ३०% के दम पर देश पर राज चलाने वालो को २०१९ से पहले अच्छा विकल्प मिल सकता है . हम कही भी रहे लेकिन साथियो के संघर्षो में भागीदार बने, अगर पास में हैं तो शामिल हों, नहीं हैं तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और कम से कम विचार के लेवल पर तो प्रबुद्ध बने . लड़ाई बहुत बड़ी है लेकिन असंभव नहीं है . एक सुनहरे भविष्य के लिए हमें इतना तो करना पड़ेगा ही
सहारनपुर के घटना के बाद दलितों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा क्योंकि प्रशासन बजाय प्रभावित लोगो को मदद करने के भीम सेना को एक अपराधिक समूह घोषित करने पर आमादा है. भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद को पुलिस तलाश कर रही है और ये सूचनाएं है के उनके ऊपर रास्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने के तैय्यारी चल रही है . घायल दलित परिवार अस्पताल में हैं और प्रदेश से लेकर केंद्र तक का एक भी मंत्री, सांसद या विधायक लोगो की खोज खबर लेने नहीं गया. जिन लोगो का सब कुछ लुट गया उनके सुरक्षित घर वापसी और उनके जीवन को वापस पटरी पर लाने के लिए कोई योजना अथवा समाचार अभी तक तो नहीं सुनाई दिया है . इस सरकार और उसकी रणनीति को लेकर अगर अभी भी लोगो को गलतफहमिया हैं तो वो निकाल ले. मंचो से जय भीम के नारे और प्रधान सेवक के इमोशनल भाषण चाहे बाबा साहेब को लेकर हो या बुद्ध को लेकर हो उससे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगो को चाहिए के दलितों और पिछडो के प्रति सरकार के पिछले कुछ सालो के कार्यकाल बता सकते हैं के आखिर सरकार ने क्या क्या किया है . रोह्ति वेमुला से लेकर जे एन यू में छात्रवर्ती का प्रश्न हो या दलितों के लिए स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान की बात हो सभी न्यूनतम हो चुके हैं . अगर वेलफेयर योजनाओं को देखे तो सरकार की उनमे कोई दिलचस्पी नहीं है. बीफ बैन हो या अन्य कोई मामला, सभी किसानो और दलित पिछडो के विरुद्ध जाते हैं .
हालाँकि प्रधान्सेवक बाबा साहेब आंबेडकर और बुद्ध का बहुत नाम ले रहे हैं पर उत्तर प्रदेश के प्रधान सेवक को अम्बेडकरवाद में बहुत दिलचस्पी हो ऐसा नज़र नहीं आता और ये उनकी कार्यशैली से पता चल जाता है . अभी मेरठ के एक दिवसीय दौरे पर एक दलित बस्ती में जाते समय वो बाबा साहेब आंबेडकर के प्रतिमा को माल्यार्पण नहीं किये जबकि लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे. ऐसी बाते भूल से नहीं होती अपितु उनके पीछे अपने वोट बैंक को एक सन्देश भी देना होता है के हम सबकी तरह नहीं है .
योगी आदित्यनाथ के आने के बाद से उत्तर प्रदेश के राजपूत अति उत्साहित है . हो सकता है के बहुत सारे उन्हें महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान के बाद का सबसे मजबूत राजा मान रहे हो क्योंकि आज तक खुले तौर पर योगी आदित्यनाथ इस व्यस्था के पोषक दिखाई दे रहे हैं जो वर्णवादी है . उनके प्रसाशन पर राजपूतो के पकड़ दिखाई देती है और ये अनायास ही नहीं के वे लखनऊ में समाजवादी नेता चंद्रशेखर के जन्म दिवस अप्रेल १९ को एक कार्यक्रम में अतिथि बन कर गए और उनकी स्मृति में एक पुस्तक का विमोचन किया . मंच पर मुख्या अतिथियों में राजा भैया भी दिखाई दिए और ये कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि चंर्दाशेखर जी हालांकी खांटी समाजवादी थे लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवो में उनकी ताकत उनकी जाति ही थी लोगो को उनके समाजवाद से कम और ठाकुर होने से ज्यादा मतलब था और क्षेत्र के तमाम स्वनामधन्य नेताओं से उनके संपर्क थे और उन्होंने उसे कभी छुपाया भी नहीं . मंडल कमीशन के लागु होने पर उसके विरोध में सबसे ज्यादा चंद्रशेखर ही थे और अंत तक उनका विरोध था . उनके क्षेत्र के दलित पिछडो को चंद्रशेखर जी की राजनीती में कोई भरोषा नहीं था लेकिन वह नेताओं के नेता थे और माननीय मुलायम सिंह जी ने भी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर जी की स्मृति में एक दिन की छुट्टी की घोषणा की थी . अब सभी चंद्रशेखर जी के समाजवाद से कम और ठाकुरवाद से ज्यादा प्रभावित थे .
उत्तर प्रदेश के राजनीती में बर्चस्व की राजनीती हावी है और नेताओं को दूसरीजाति पर भरोषा नहीं होता और वे अपनी अपनी जातियों के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पे पहुंचाते हैं . ये हकीकत सबको पता है और इसिलए हिंदुत्व भी ब्राह्मणवादी राजनीती है लेकिन अब योगी जी को भी बिरादरी की आवशयकता महसूस हो रही है . कल उत्तर प्रदेश के एक साथी कह रहे थे के योगी जी अच्चा काम कर रहे हैं लेकिन भाजपा के महत्वकांक्षी नेता उन्हें कुछ करने नहीं देंगे . हकीकत यह है के छोटी छोटे निर्णयों के लेकर मीडिया ने लालू, अखिलेश और मायावती को तो घोर जातिवादी करार दे दिया जबकि दोनों की किचन कैबिनेट में भी ब्राह्मणों की अच्छी खासी भूमिका थी . इस वक़्त योगी और मोदी को मीडियाकर्मी उनके नेतृत्व के तौर पर नहीं अपितु प्रशंशक के तौर पर देख रहा है अतः उनकी न तो आलोचना हो सकती है और न ही कोई सवाल उनसे किया जा सकता है . उनके भक्तो की जमात उनसे सवाल करने वाले लोगो से बदला लेने को तैयार है . मेरा सवाल यह है के इतने दिनों से उत्तर प्रदेश में गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों का उत्पीडन हो रहा है लेकिन न तो प्रधान सेवक और न ही मुख्यमंत्री ने एक भी शब्द उनके बारे में कहा, तो क्या यह अच्छी बात है ? उन्होंने अपने लोगो से खुले तौर पर यह नहीं कहा के कानून हाथ में न लो . हम ये मानते हैं के संघ के जिन कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग शुरू से ही जाति और धर्म के संकीर्ण दायरे में हुई हो तो वो अचानक से नहीं बदलेंगे. उन्हें अभी भी नहीं लग रहा के सरकार में आने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी को ज्यादा जिम्मेवार और समझदारी से बोलना होता है . लोग आपसे सवाल करेंगे और आपकी सरकार की उपलब्धिया मांगगे लेकिन उसके उत्तर में उन्हें गौसेवक, राष्ट्रवाद और अब सहारनपुर के दंगे ही दिखाई देंगे .
सहारनपुर के दंगो के पीछे साफ़ तौर पर जिले की राजनीती में सवर्ण बर्चस्व कायम करना है . सहारनपुर में दलितों के आर्थिक सामाजिक राजनैतिक हालत उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाको से बेहतर हैं और इसलिए ये बसपा का गढ़ भी रहा है . उत्तर प्रदेश में भाजपा के लम्बी रणनीति के तहत हिन्दू मुसलमान की राजनीती में पिछडो और दलितों के नेतृत्व को पूर्णतया समाप्त करने की है. जातियों के बर्चस्व को कायम करने के लिए ही महाराणाप्रताप के जन्मदिन को मनाने की बात हुयी. लेकिन दिल में रहने वाली घृणा को देखिये के ठाकुर लोग बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति की स्थापना चमार बस्ती में भी नहीं करने देना चाहते हैं . ये साफ़ नज़र आता है के वर्णवादी सवर्णों को अम्बेडकरवादी अस्मिता से बहुत परेशानी है क्योंकि वो व्यस्था को चुनौती दे रहे हैं .
सहारनपुर घटनाक्रम से भीम आर्मी का बहुत जिक्र हो रहा है . बहुत से ऑनलाइन पोर्टल्स में आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेकर आजाद और उसके अध्यक्ष के साक्षात्कार सुनाये गए हैं . चंद्रशेखर राजनैतिक तौर पर जागरूक व्यक्ति नज़र आते हैं और उन्होंने कोई ऐसी बात नहीं की है जो समाज विरोधी या संविधान विरोधी हो . हकीकत बात यह है भीम आर्मी ने लोगो को न केवल जागरुक किया है अपितु उन्हें स्वरोजगार और व्यवसाय की तरफ भी आकर्षित किया है . भीम आर्मी अभी तक दलितवर्ग में आत्मसम्मान जगाने हेतु और उनमे एकता लाने का कार्य कर रही है लेकिन भीम आर्मी को समझना पड़ेगा के उनका इस्तेमाल बसपा की ताकत को समाप्त करने के लिये भी किया जा सकता है इसलिए आवश्यकता इस बात की है के आन्दोलन अभी सामाजिक ही रहे और राजनीतिक प्रयोग करने का प्रयास न करे क्योंकि उत्तर प्रदेश में २०१९ तक बहुजन समाज को अपनी स्थापित पार्टियों में ही परिवर्तन लाकर मज़बूत करना होगा नहीं तो मनुवादी शक्तियों के ही हाथ मज़बूत होंगे .
अभी तक बसपा की ओर से सहारनपुर हिंसा पर बहुत कुछ वक्तव्य नहीं आया है . भीम आर्मी से पार्टी ने पूर्णतया किनारा कर लिया है लेकिन वो ठीक नहीं है. बसपा मान्यवर कांशीराम द्वारा खड़ा किया गया आत्मसम्मान का आन्दोलन है और ये सब आसानी से नहीं होता. इसलिए जो लोग भीमसेना या कोई और लोगो को बसपा के विकल्प के तौर पर खड़ा करने की कोशिश करेंगे तो वो केवल वोट काटू की भूमिका में रहेंगे और कुछ नहीं कर पाएंगे . राजनीती के धरातल की हकीकत कुछ और होती है . बसपा प्रमुख सुश्री मायावती को चाहिए के वो भीम सेना या देश भर में हुए छात्रा आन्दोलन के नेताओं को एक मंच प्रदान करें . पिछले तीन वर्षो में हैदराबाद से लेकर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और अखलाक से लेकर पहलु खान तक की मौत ने, रोहित वेमुला से लेकर नजीब तक के लिए न्याय मांगते छात्र सडको पे हैं . विश्विद्यालयो की पढाई अब मुश्किल होती जा रही है और शिक्षा में हिंदुत्व का अजेंडा अब लागु हो चूका है जहा एक तरफ शिक्षा निजीकरण की और बढ़ रही है वही पाठ्यक्रम में मनुवादी विचारधारा घुसाई जा रही है . क्या बसपा या सपा जैसी पार्टिया युवाओं और छात्रो के ज्वलंत सवालो से मुंह चुरा सकती है . क्या ये अवसर नहीं के ये दोनों दल अपने अन्दर पूर्णतया पारदर्शिता लाये, युवा नेतृत्व विकसित करें और देश के युवा नेतृत्व चाहे भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद हो जिग्नेश मेवानी या कोई और, सबको कार्यक्रमों के जरिये एक मंच पर लाये ताकि जो युवा बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे है उन्हें एक राजनैतिक मंच मिल सके .
बसपा राजनितिक मजबूरियों के तहत चाहे ब्राह्मणों के साथ ‘अन्याय’ की बात कहे लेकिन वो दलितों, अकलियतो पर हो रहे अत्याचारों पर अगर खुल कर सामने नहीं आती है और यदि ऐसे आन्दोलनों का समर्थन नहीं करती जो दलितों की अस्मिताओ की रक्षा और उनकी सामाजिक आन मान के लिए बनायी गयी हैं तो उसका अस्तित्व नहीं रहेगा. बसपा को अभी भी समाज का समर्थन प्राप्त है लेकिन एक बात बसपा नेतृत्व को समझनी पड़ेगी के लोगो की सहनशीलता जवाब दे रही है . बसपा की मजबूती दलित अस्मिता के लिए जरुरी है लेकिन इसके साथ ही बसपा के अन्दर नए युवा नेतृत्व को विकसित करना पड़ेगा . आज से २० साल बाद बसपा का नेतृत्व क्या होगा और कौन करेगा इसके लिए एक नहीं कई युवा खड़े करने पड़ेंगे .
सहारनपुर का घटनाक्रम योगी आदित्यनाथ की राजनीती और उनके आड़ में ठाकुरशाही चलाने वालो के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है . संघ दलित और पिछडो के बीच के अंतर्द्वंद का लाभ लेता आया है . मुसलमानों को जबरन बीच में डालकर उसने सवर्ण नेत्रत्व को सबके उपर लाद दिया है . लेकिन जहाँ दलित पिछडो के अंतर्द्वंद हैं वही ब्राह्मण ठाकुरों के भी गंभीर अंतर्द्वंद हैं और उनकी एकता का एक ही बिंदु है वो दलित पिछड़ा विरोध की राजनीती लेकिन जब सत्ता के मलाई की बात आती है तो दोनों के अंतर्द्वंद आपस में टकरायेंगे और सुश्री मायावती ने ब्राह्मणों के साथ हो रहे ‘अन्याय’ को लेकर उस मुद्दे को खड़ा करने की कोशिश की है लेकिन वो अभी नहीं कामयाब होगी क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर या अन्य सवर्ण जातिया अभी हिंदुत्व को छोड़कर कही और जाने से रही क्योंकि मोदी और योगी युग स्वर्ण प्रभुत्वाद की एक नयी शुरुआत है और इसको वो आसानी से हाथ से जाने नहीं देंगे .
फिलहाल सहारनपुर में दलितों को न्याय देने की बात अभी तक एक भी मंत्री ने नहीं की है . सारा प्रशाश्निक फोकस ऐसा लगता है, भीम सेना पर है और घायल लोगो और उनके उजड़े घर बार कैसे बसेंगे इसके लिए कोई प्रयास नहीं किये जा रहे . दुखद बाद यह है कोई भी राजनैतिक दल अभी संघ की चालो को समझ नहीं पा रहे या उसकी काट नहीं ढूंढ पा रहे और ये उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है . जरुरत है दलितों के साथ अन्याय को ख़त्म करने की और सरकार को दलित परिवारों पर हमला करने वाले लोगो को गिरफ्तार करने की और लोगो को समय पर मुवावजा दिलवाने की . सहारनपुर के दलितों को सुरक्षा और सम्मान चाहिए और जिन भी लोगो ने दलित बस्ती को जलाया या उनकी महिलाओं और पुरुषो पर अत्याचार किया उनके खिलाफ तुरंत कार्यवाही करे क्योंकि उसके अभाव में युवा इस क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम करना बहुत मुश्किल होगा .
वैसे भी संघ का अजेंडा दलित बहुत समाज और अन्य विपक्ष को नेतृत्वविहीन कर देने का है . बसपा में विघटन का प्रयास किया गया है और अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी मीडिया को रोज ‘ब्रेक न्यूज़’ देंगे जैसे कपिल मिश्र दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के लिए और कांग्रेस के कई नेता अब सोनिया और राहुल के खिलाफ बोल रहे हैं वैसे ही मुलायम सिंह को लगातार खबरों में रखा जायेगा ताकि अखिलेश यादव भी लाइन पे रहे . लालू यादव को पहले ही फंसाने की पूरी तैय्यारी है . मतलब यह के विपक्ष में खुले तौर पर फूट डालने का अजेंडा है और इसे समझने की जरुरत है .
इस बात को भी समझना पड़ेगा के मुख्य धारा की राजनीती ने अभी तक जनता के ज्वलंत प्रश्नों पर गहरी चुप्पी साधे हुई है . चाहे वो बस्तर में आदिवासियों के जंगल में अधिकार का मामला हो या कश्मीर में राजनैतिक पहल , झारखण्ड के आदिवासियों का संघर्ष हो या विश्विद्यालयो में छात्रो के संघर्ष सभी जगह स्वयंस्फूर्त आन्दोलन खड़े हैं और राजनैतिक दल कुछ कह नहीं पा रहे हैं . या तो पार्टियों में इन सवालो पे ज्यादा चर्चा नहीं है अथवा नेतृत्व इन प्रश्नों को सही नहीं मानते हैं . हकीकत यह के अम्बेडकरवादी युवा अब अन्याय सहने को तैयार नहीं है चाहे वो रोहित वेमुला हो या भीम सेना का प्रश्न, लोग नेताओं का इंतज़ार नहीं करेंगे और आन्दोलन होंगे . बहुजन राजनीती को चाहिए के वे इन युवाओं के सपनो और आकांक्षाओं को मज़बूत करे और उन्हें रजिनैतिक रूप दे अन्यथा आन्दोलन किसी प्रश्न से शुरू होते हैं और राजनैतिक भटकाव का शिकार हो जाते हैं जो अंततः उस आन्दोलन को नुक्सान करते हैं जिसकी मजबूती के लिए वे शुरुआत करते हैं . हमारे सामने बहुत उदाहरण हैं जब नेकनीयती से किये आन्दोलन भटकाव का शिकार हो जाते हैं क्योंकि वो राजनैतिक तिकड़मे नहीं जानते . आवश्यक है के बहुजन राजनीती इन आन्दोलनों से बात करे और भविष्य की और देखे ताकि बिखराव की स्थिति पैदा न हो . उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामो से लोगो में बहुत निराशा भी है लेकिन भीम सेना ने उनमे पुनः उर्जा का संचार किया है . जब बहुजन राजनीती इन प्रश्नों पर खामोश रहेगी तो लोग अपना रास्ता खुद तय कर लेंगे लेकिन वो स्थिति बहुत अच्छी नहीं होगी क्योंकि उस परिस्थिति का लाभ वो लोग लेंगे जिन्होंने योज्नाबद्ध तरीके से सहारनपुर के घटनाक्रम को अंजाम दिया . देश में युवाओं की बहुत बड़ी आबादी जिसके मन में मौजूदा नेतृत्व और उसके तौर तरीको के प्रति घहरी निराशा है क्योंकि वो उनकी भावनाओं और महत्वाकांक्षाओ को समझने में या तो नाकाम रहा है या जानबूझकर उनकी अनदेखी कर रहा है जो लम्बे समय में राजनैतिक तौर पर नुक्सान्वर्धक हो सकता है. राजनैतिक तौर पर पार्टियों को समझना पड़ेगा के यदि प्रशाशन उत्पीडित समूहों को न्याय देने में अक्षम रहा और यदि हिंदुत्व की सेनाए लोगो को जहा तहां पीटती रही और प्रशाशन कोई कार्यवाही नहीं करेगा तो जवाब में लोग भी अन्याय का मुकाबला करने के लिए जातीय राजनीती और उसकी अक्षमता के फलस्वरूप जातीय सेनाओं पर भरोषा करना शुरू करते हैं जो अंततः लोकतंत्र के लिए खतरनाक है लेकिन अगर बिहार में रणवीर सेना दलितों का उत्पीडन नहीं करती तो जवाबी सेनाये नहीं बनती इसलिए जरुरी है के प्रशाशन कानून का शाशन स्थापित करे और लोगो को न्याय मिले .
गाय हमारी माता है,
हमको कुछ नहीं आता है,
बैल हमारा बाप है,
पढ़ना लिखना पाप है।
बचपन में ये बहुत सुना था। गाय और बैल हमारे जीवन का हिस्सा थे। दो बैलो की जोड़ी कांग्रेस का प्रसिद्ध चुनाव चिन्ह था। गाय के बछड़ा होने पर लोग उतना दुखी नहीं होते थे जितना आज होते हैं क्योंकि मशीनीकरण ने बैलो की कृषि पर आधारित उपयोगिता ख़त्म कर दी और मंहगाई के इस दौर में जहा हर चीज का मोल है, किसानो के लिए असंभव है के के अनुपजाऊ बछड़ो का बोझ अपने सर ले सके.
लगभग तीन चार वर्ष पूर्व मुझे ये लगा के हासिये के जिन समाजो के बीच हम काम करते हैं उनमे गाय भैंस पालन की आदत डाल दूध डेयरी बनाने का प्रयास करना चाहिए. लेकिन क्योंकि हमने पहले भी ऐसा करके देखा था इसलिए प्रयोग को दूसरे तरीके से किया गया।
हमने पहले वर्ष में तीन गाय और एक भैंस खरीदी। अगले वर्ष भी हमने गाये खरीदी। इस प्रकार ४ वर्षो वर्षो में हमारे प्रयासों से हमारे प्रेरणा केंद्र में कुल गाय भैंसो की संख्या १५ तक पहुँच गयी. ये हकीकत है के मात्रा दूध पर निर्भर होकर लाभ कमाने की उम्मीद भी नहीं हो सकती इसलिए हम चाहते थे के साल भर में एक दो नयी गाय भैंसे ले और एक दो बेचे भी ताकि काम अच्छे से चले।
लेकिन पिछले एक दो वर्षो में गाय के नाम पर जो गुंडागर्दी देखने के मिली है उसने तो पूरे बाजार को ख़त्म कर दिया है। पशु हाट लगभग बंद हो चुके हैं और किसान न तो गाय खरीद पा रहा है और न ही बेच पा रहा है। उसकी हालत दिन प्रतिदिन दयनीय होते जा रहे हैं।
भारत की आर्थिक नीतियों के कारण खेती आज खतरे में हैं। जानवरो के चरागाह ख़त्म होचुके हैं। किसानो के हालत तो खेती के कारण पहले ही बुरे हैं और सरकारी तंत्र शायद चाह रहा है के वो जानवर भी न पाल पाए। क्या ये किसानो को ख़त्म करने की साजिश नहीं क्योंकि जब वो जानवर पालना और खेती करना स्वयं ही छोड़ देगा तो मुकेश भाई और अडानी भाई की देश की अर्थव्यवसथा” को बचाने और बढ़ाने का समय आएगा। अम्बानी जी ,दूध, दही, फल और सब्जी सभी बेचेंगे। वैसे भी इस देश के भ्रष्ट मध्यम वर्ग को इससे कोई मतलब नहीं के सब्जी किसान की है या अम्बानी की, उसे तो साफ़ पॉलिथीन पैक में सब्जी चाहिए।
जनवरी में मैं जब अपने सामुदायिक केंद्र में था तो गर्भवती गाय की प्रसव प्रक्रिया को देखा। जैसे ही एक सहयोगी ने इस प्रक्रिया को पूरा किया, बच्चे के निकलते ही उसने कहा मिठाई। मैं आश्चर्य में के अभी तो बच्चा पूरा निकला ही नहीं और ये मिठाई मांग रहा है। थोड़ी देर में समझ आया के बछिया हुयी है इसलिए सभी खुश थे। अभी चार पांच दिन पहले मेरी सहयोगी का फ़ोन आया के गाय ने बच्चा दिया है और वो बछड़ा है। उसकी आवाज थोड़ा दुखी थी क्योंकि बछड़े का कोई करे क्या। सर , इस बछड़े का हम क्या करेंगे ? ये तो लोगो के खेत ख़राब करेगा। ज्यादातर लोग इन्हे छोड़ देते हैं।
मैंने देखा, इंसान बहुत मतलबी है। अपने घर में अगर लड़की हो तो दुखी और जानवरो में लड़का हो तो दुखी क्योंकि माल से मतलब है। लेकिन किसान की बात समझनी पड़ेगी क्योंकि आज गाय भैंस पालना बहुत मुश्किल कार्य हो गया है। पहले किसान के लिए गाय और बैल दोनों उपयोगी थे लेकिन आज जब हर चीज पैसो में खरीदी जाती है तो चारे की कीमत भी सर के ऊपर चली गयी है। हम लोगो ने चारे खर्च से बचने के लिए गांव के लोगो को अधिया पे गाय और भैंस दी। मतलब ये के गाय के बच्चा होने तक वो उसके खान पान का ध्यान रखे और जब वो बच्चा देने वाली हो या दे चुकी हो तो उसका बाजार मूल्य लगाकर आधा आधा बाँट लिया जाता है। छोटे किसान या भूमिहीन समुदायों में ये लोकप्रिय हो रहा था क्योंकि साल के आखिर में उन्हें एकमुश्त एक अच्छी रकम मिलजाती थी जिसका उपयोग वे अपने विशेष कार्यो में करते थे।
इस बार तो हद हो गयी। योगी जी की सरकार आने पर गौ सेवको के सड़को पर उतरने के बाद और सरकार की शंकित चुप्पी से किसानो की हालत तो और भी खस्ता हो गयी। क्योंकि पशुओ का व्यापार बंद हो चूका है और पशु हाट जो किसानो की बहुत बड़ी मंडी हुआ करती थी अब ठप्प पड़ी है इसलिए किसान अब गाय भैंस न तो बेच पा रहा और न ही खरीद पा रहा। हमारी जिस गाय को हमने एक मुशहर परिवार को अधिया पे दिया था बच्चा होने के बाद उसे उम्मीद थी के उसे करीब १५-२० हज़ार रुपैये मिल जायेंगे क्योंकि दुधारू गाय का बाजार मूल्य निश्चय ही ३०,००० से चालीस हज़ार से नीचे नहीं होना चाहिए लेकिन जब उन्होंने गाँव में लोगो को बुलाकर उसकी कीमत आंकी तो दुधारू गाय की कीमत मात्र १२ हज़ार रुपैया -२० हज़ार तक आंकी गयी. मतलब ये के वो परिवार जो साल भर तक गाय या भैंस की सेवा किया, अब मात्रा ८-१० हज़ार रूपया में ही संतोष करे। हम व्यक्तिगत तौर पर ऐसा नहीं होने देंगे लेकिन मैं आपके सामने जो बीमारी है उसको रख रहा हूँ।
अब गाय भैंसो की कोई कीमत नहीं है। किसान हर वर्ष अपनी कुछ गाय भैंसो को बेचते हैं और कुछ नयी लेते हैं। ये लें देन स्थानीय हाटो में होता था। पुरानी परंपरा थी और सब अच्छे से चल रहा था। गाय का बछड़ा हुआ तो किस काम का। इसलिए जब तक वो दूध देते हैं तब तक लोग रखते हैं और फिर छोड़ देते हैं क्योंकि किसी के पास इतना पैसा नहीं के वो इनकी सेवा कर सके। तो ऐसे बछड़े जब बड़े होंगे तो आवारा सांड बनेगे और फिर सड़को से लेकर खेतो में अपनी आवारगी दिखाएंगे।
अभी खबर आ रही है के केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है के वो गायो के लिए भी आधार कार्ड की व्यवस्था करेगी। हम सरकार से पूछना चाहते हैं के सरकार किसानो के हालत सुधारने के लिए क्या कर रही है। क्या गाय पालने वालो को कोई विशेष सुविधा मिलेगी. क्या उनकी बूढी गायो की देखभाल करने के लिए सरकार कुछ विशेष विभाग खोलने जा रही है। बछड़ा पैदा होने पर किसान क्या करे ? www.colombia.co यदि गाय मर गयी तो क्या करे ? क्या सरकार पशु बीमा और पशु चिकित्सा के लिए कुछ करेगी। उम्मीद है सरकार सभी किसान जो गाय भैंस पालते हैं उन्हें गैर क़ानूनी न घोषित कर दे और फिर उसके लिए लाइसेंस मांगने की बात न कहे।
गाय और भैंस हमारे जीवन का हिस्सा हैं और उससे कोई इंकार नहीं लेकिन उनकी खरीद फरोख्त से किसानो को रोकने का मतलब है के खेती को चौपट करने की व्यवस्था। सरकार को चाहिए के बीफ निर्यात पर एक श्वेत पत्र जारी करे और जो इस निर्यात के अगुआ हैं उनके नाम जारी करे। हम जानना चाहते हैं के तीस हज़ार करोड़ रुपैये के बीफ निर्यात के ठेकेदार कौन ? क्या उनकी ठेकेदारी की मज़बूत करने के लिए तो किसानो की कमर तोड़ने का इंतेज़ाम तो नहीं है ? समय आ गया है के सरकार अपने मंशा साफ़ करे। गाय सुरक्षा के नाम पर बड़ी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की हर कोशिश का पर्दाफाश होना चाहिए। गाय के नाम पर निर्दोष लोगो को मारने या परेशान करने वालो को चाहिए के उन निर्यात कंपनियों के खिलाफ आंदोलन करे जो अरबो पैसा कमा रही है। क्या विदेश में मांस निर्यात होने से आपकी भावनाये नहीं भड़कती ? छोटे कामगारों पर हाथ डालकर आप अपनी राजनीती तो कर लेंगे लेकिन आपकी नियत पर शक रहेगा आखिर वर्षो पूर्व डालडे में चर्बी की मिलावट किसी मुसलमान ने तो नहीं की। गाय को हिन्दू और मुस्लमान न बनाये और उसे किसान ने पाला है वो किसान जो आज आत्महत्या करने पर उतारू है क्योंकि उसको बचने के लिए हम कुछ नहीं कर रहे। खेती को कॉर्पोरेट के हवाले करने के षड्यंत्र को पहचानने के जरुरत है। यदि सरकार समझती है के पशुपालन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए तो उसे एक कंक्रीट योजना लानी होगी जो किसानो खासकर छोटे और मंझोले किसानो को मदद कर सके। गाय भैंस पालन और उनके रख रखाव के लिए किसानो की मदद की जाए और उनकी कोआपरेटिव बनाकर दूध व्यापर को बढ़ाया जाय लेकिन ये तभी होगा जब सरकार इन पर किसानो से बात करे और मुद्दे पर गंभीर हो। गाय को अपनी राजनीती की रोटियां सेकने का मोहरा न बनाये तो अच्छा होगा और ऐसे लोगो को तुरंत सन्देश दिया जाए के सरकार गौरक्षा के नाम पर उनकी गैर क़ानूनी हरकतों को बर्दास्त नहीं करेगी। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?