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  • सामाजिक यायावर के शिक्षा के प्रयोग (सन् 2004): उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील के एक गांव में एक विद्यालय

    सामाजिक यायावर के शिक्षा के प्रयोग (सन् 2004): उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले की बिलारी तहसील के एक गांव में एक विद्यालय

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    डा० राकेश सक्सेना “रफीक” से मेरी पहली मुलाकात आज से तकरीबन ग्यारह-बारह वर्ष पहले मेरे एक पत्रकार मित्र के घर में हुई थी। राकेश युवा-भारत से जुड़े हुए थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से डाक्टरेट राकेश सक्सेना मुरादाबाद के किसी डिग्री कालेज में अतिथि-व्याख्याता के रूप में पढ़ाते थे। एक दिन लखनऊ में राकेश मुझसे कहते हैं कि वे और उनके एक स्थानीय स्तर के नेता मित्र एक विद्यालय खोलना चाह रहे हैं जिसमें बच्चों के ‘मनुष्य’ होने पर प्राथमिकता दी जायेगी और शिक्षा के प्रयोग होगें। राकेश ने कहा कि मैं विद्यालय में शिक्षा निर्देशन का काम संभालूं, शिक्षा से संबंधित अनुप्रयोगों को करने के लिए मुझे सारे अधिकार रहेंगें, संस्थापक-मंडल का हस्तक्षेप नहीं होगा उल्टे मेरे अनुप्रयोगों में सहयोग ही दिया जाएगा। मैं राकेश को नहीं जानता था, ना ही जीवन में कभी उनका मित्र रहा था, केवल चंद औपचारिक मुलाकातें पत्रकार मित्र के यहाँ हुईं थीं। फिर भी ‘शिक्षा’ में प्रयोग के लालच में मैंने अपनी सहमति दे दी। सहमति देने के कारणों में गांवों के बच्चों के विकास के लिए काम करने से प्राप्त होने वाली आत्मिक संतुष्टि और एक अनजान क्षेत्र में अनजान लोगों के बीच जाकर उनके लिए काम करने की सार्थकता आदि भी थे।

    विद्यालय में मेरा पहुंचना/प्रथम-दिन

    जिन दिनों मुझे विद्यालय पहुँचना था, उन्हीं दिनों मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत ही गहरे आंतरिक दु:ख से गुजर रहा था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई खतम हो चुकी थी। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) व टोक्यो यूनिवर्सिटी जापान की विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था संयुक्त शोध परियोजना में शोध कार्य भी कर रहा था। माता-पिता ने मेरी सामाजिक गतिविधियों के कारण अपने दिल व पैतृक संपत्तियों से पहले ही बेदखल कर दिया था, आजतक बेदखल हूँ। कई अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव थे, नामचीन संस्थानों से पीएचडी करने के भी प्रस्ताव थे। किंतु जीवन में जो प्रताड़नाएं व असंवेदनशीलताएँ भोग चुका था, हजारों किताबों का वर्षों तक रात-दिन जो स्वाध्याय किया था, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी, जीवन को जिस सामाजिक प्रतिबद्धता व सक्रियता के लिए अनेक वर्षों में ढाला था। अजीब उहापोह में था कि जीवन की दिशा क्या चुनूं। यही वह समय था जब अपने जीवन की दिशा तय होनी थी।  

    जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने के लिए मैंने सोचा कि सबसे बेहतर रहेगा कि शरीर की जरूरतों से ऊपर उठकर, मन की भोग-लिप्सा व इच्छाओं से ऊपर उठकर, अहंकार से ऊपर उठकर निर्णय लिया जाए। इसलिए लंबा उपवास करने का निर्णय लिया। जीवन का सबसे लंबा उपवास किया, कुल अठारह दिनों का उपवास। लगातार अठारह दिनों तक नींबूं, पानी व नमक के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। नींबू व नमक भी कई दिन के बाद लेना शुरू किया था।

    स्वयं में इच्छाशक्ति संवर्धित करने व जीवन की दिशा चुनने वाला निर्णय लेने में सक्षम हो पाने के लिए अठारह दिनों का नीबूं-पानी उपवास किया। इसी उपवास की समाप्ति के अगले दिन भीषण शारीरिक कमजोरी की हालत में भी मैंने भारी पिठ्ठू-बैग अपनी पीठ पर लादा और भारतीय रेल के ‘जनरल डिब्बे’ में किसी तरह ठुंसते हुए निकल पड़ा सक्रिय-यायावरी की अपनी यात्रा में। मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से पिठ्ठू बैग लादकर पैदल लगभग दो किलोमीटर दूर बस-स्टैंड, वहां से भरी हुई सरकारी खटारा बस में किसी तरह से ठुस-ठुसा कर अत्यधिक खराब हालात के सड़क-मार्ग से गंतव्य तक पहुंचा।

    बिलारी तहसील मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव की सीमा में सुनसान खेतों के बीच में एक छोटा सा विद्यालय था। छोटे-छोटे तीन कमरे, एक दो तरफ से बिना दीवारों का हरी बरसाती-पालीथीन से ढका स्थान, एक हैंडपंप, एक खुला मूत्रालय, एक शौचालय, एक ईटों का ढेर लगाकर ऊपर से ढककर बनाई गई बहुत ही छोटी रसोई और छोटा सा क्रीडा-स्थल कुल मिलाकर विद्यालय-कैंपस था। विद्यालय से सटा हुआ एक और विद्यालय था उसके अतिरिक्त दूर-दूर तक केवल खेत थे।

    शिक्षा में मेरे प्रयोग

    शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ प्रयोग

    विद्यालय की स्थापना का पहला वर्ष था। विद्यालय प्रशासन के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा० शीला डागा को और शिक्षा में अनुप्रयोगों के लिए मुझे बाहर से बुलाया गया था। हम दो लोगों को छोड़कर शेष लोग स्थानीय या आसपास के क्षेत्रों के थे। विद्यालय में प्रि-नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा तक कुल मिलाकर ग्यारह कक्षायें थीं। इन ग्यारह कक्षाओं व तीन सौ से अधिक छात्र-छात्राओं के लिए कुल नौ शिक्षक-शिक्षिकाएं थीं। इनमें भी कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं युवा भारत संगठन के स्वयंसेवक थे, जिन्होंनें जीवन में कभी कोई धरातलीय प्रयोग नहीं किए थे, शिक्षा की समझ नहीं थी फिर भी इनका मानना था कि वे बहुत ही बेहतर शिक्षाविद हैं। शिक्षक-शिक्षिकाओं की इस जमात से केवल अजयवीर ऐसा युवा था जो मेरा सहयोगी बन पाया था और हर कदम पर मेरे अनुप्रयोगों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ा रहा।

    शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए जब साक्षात्कार शुरू हुए तो मुझे मालूम पड़ा कि यहाँ शिक्षा पर अनुप्रयोग करना मतलब रेगिस्तान में पानी निकालना है। अंग्रेजी में परास्नातक को साधारण अनुवाद तो दूर की बात है छोटी-छोटी वर्तनी भी शुद्ध लिखनीं नहीं आती हो, गणित से एम.फिल को आठवीं क्लास के सवाल हल करना मुश्किल हो, भूगोल से परास्नातक को नक्शा देखना नहीं आता हो आदि-आदि। ऐसे लोगों में से विद्यालय के लिए शिक्षक-शिक्षिका छाँटना था, ऊपर से इनमें से लगभग सभी को अहंकार कि इनके इतना कोई योग्य नहीं। जो उपलब्ध थे उनमें से तुलनात्मक जो बेहतर थे, उनको लेकर विद्यालय शुरू हुआ। कुछ दिनों तक शिक्षक आते-जाते रहे। सप्ताह दो सप्ताह में ऐसे ही हिचकोले लेते हुए शिक्षा के अनुप्रयोगों के तौर-तरीकों को सुनकर और संस्थापकों के प्रयास से विद्यालय को मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, सुभाषिनी वर्मा, प्रियंका शर्मा, रेखा सक्सेना व दीपशिखा तोमर जैसी शिक्षिकाएं मिलीं। सुभाषिनी वर्मा व रेखा सक्सेना छोटे बच्चों को पढ़ातीं थीं। पाँचवीं और पाँचवी से नौंवीं कक्षा तक के स्तर के शिक्षकों की भारी कमी थी। विश्वविद्यालयी डिग्रियाँ तो परास्नातक की थीं लेकिन योग्यता नहीं थी। यूं समझिए कि यदि चंद अपवाद शिक्षकों को छोड़ दिया जाए तो उनमें पांचवीं कक्षा के सामान्य विषय पढ़ाने की भी वास्तविक योग्यता नहीं थी। जबकि कोई-कोई तो दो या तीन विषयों में परास्नातक थे एक-दो तो शायद कहीं से डाक्टरेट भी कर रहे थे। शिक्षकों का वेतन पाँच सौ रुपए महीना से एक हजार रुपया महीना तक था।

    कौन शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक रूप से ठीक से पढ़ा सकता है, यह समझने के लिए मैं लगभग रोज शिक्षकों, कक्षाओं व विषयों को यादृच्छिक रूप से फेंटता था। उनकी कक्षाओं में बच्चा की तरह बैठता था ताकि समझ सकूं कि कौन सा शिक्षक किस विषय को किस कक्षा तक तुलनात्मक पढ़ा सकता है।

    मैं रोज विद्यालय समाप्ति के बाद शिक्षकों को लगभग दो घंटे पढ़ाता। छात्र, शिक्षक व शिक्षा पर संवाद की चर्चायें करता। मनीषा, रुपाली, सुभाषिनी व रेखा जैसी कुछ शिक्षिकाओं को छोड़कर किसी को भी इस प्रकार की चर्चाएं पसंद नहीं थीं। मैं शिक्षक-शिक्षिकाओं को जागृत करना चाहता था, उनका बेतहरीन बच्चों  के विकास में प्रयोग करवाना चाहता था। बने बनाए दस्तूरों से हटकर जो भी मैंने करना चाहा, उस हर बात में मेरा विरोध व असहयोग हुआ। मैं हार नहीं मानता था, दृढ़ता से अपनी बात में अड़ा रहता था।  कुछ दिनों के बाद शिक्षक मेरी बात मानते थे, मेरे हर नये विचार पर बार-बार यही होता था। किसी भी नए विचार को लागू करने के पहले मैं खुद को मानसिक रूप से तैयार करता था कि दो या तीन दिन तक मुझे शिक्षकों का बहुत अधिक विरोध झेलना पड़ेगा। कभी कभी तो शिक्षक स्तीफे तक की धमकी देते थे। किंतु कभी कोई गया नहीं उल्टे समय के साथ-साथ बच्चों  के साथ प्रेम के साथ काम करने लगे थे।

    विद्यालय, कक्षाएं, छात्रगण और छात्रों से मेरे संबंध

    मेरे रहने का इंतजाम विद्यालय से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर पास के कस्बे में पतली गंदी गलियों में से चलकर मिलने वाले एक घर में किया गया था जो एक संस्थापक का पैतृक घर था। पैतृक घर होने के बावजूद घर बहुत छोटा था, दो कमरे, एक बाथरूम, एक शौचालय व एक पेड़ था। पेड़ को छोड़कर सभी का आकार बहुत छोटा-छोटा था एवम् छत की ऊंचाई बहुत ही कम थी। घर के सामने से गंदी नाली बहती थी जिसके कारण मच्छरों का भयंकर प्रकोप था। रोज सुबह जल्दी उठकर नगरपालिका की सप्लाई वाला पानी भरना, दो-चार केले खाकर लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर फिर रिक्शा करके विद्यालय पहुंचना, इसी तरह शाम को वापस लौटना। इस प्रक्रिया में रोज का दो से तीन घंटे का समय, मानसिक व शारीरिक थकावट, केलों और रिक्शा के किराए में रुपए खर्चना। 

    बच्चों व शिक्षकों को अधिक समय दे पाऊं। विद्यालय का खर्च कम से कम हो इसलिए मैंने विद्यालय में ही रहने का निर्णय लिया। जब मैंने कहा कि मैं विद्यालय में ही रुकूंगा, उस समय विद्यालय से लगभग एक किलोमीटर तक कोई घर नहीं था केवल खेत थे। मुझसे कहा गया कि रात में जंगली जानवर आते हैं, बिस्तर नहीं है आदि आदि। मैंने कहा कि यदि जंगली जानवरों के हाथों मारा जाऊंगा तो कम से कम ‘आत्महत्या के दोष’ से मुक्त रहूंगा। मैंने विद्यालय में रहना शुरु किया। मेरे साथ अजयवीर ने भी हिम्मत दिखाई। हम दोनों रात में बच्चों की बैठने वाली बेंचों को जोड़कर बिना गद्दे व बेडशीट के ही सोते थे। मच्छरों के लगातार हमलों से परेशान होकर मच्छरदानी ले आये, फिर एक बेडशीट और दो तकिया। जब तक विद्यालय में रहे ऐसे ही सोए हम दोनों लोग। फिर वीरेंद्र भी हम लोगों के साथ सोने लगे थे। वीरेंद्र भी अजयवीर की तरह परिश्रमी थे, शिक्षक के रूप में बेहतर न होते हुए भी बच्चों को खेलकूद अच्छा सिखाते थे और मेरे अनुप्रयोगों का विरोध नहीं करते थे। 

    विद्यालय में ही सोने के कारण सुबह तीन-चार बजे जगना जुगाड़ में बैठकर दूरदराज के गावों से बच्चों को विद्यालय लेकर आना संभव हो पाया। रास्ते में बच्चों से बातें करना, हसते गाते उनसे चर्चा करना, उनको समझना, उनके साथ उनके घर में हो रही घटनाओं को समझना आदि-आदि यही करता था लगभग रोज सुबेरे बच्चो के साथ जुगाड़ की कुछ घंटे की यात्रा में। अधिकतर गांवों के रास्ते मिट्टी व ईटों के खड़ंजे के होते थे। बारिश होने पर कीचड़ में जुगाड़ का फंस जाना, सारे बच्चों का नीचे उतरना, हम सब का मिलकर जुगाड़ में धक्का लगाकर कीचड़ से बाहर निकालना, फिर जुगाड़ में चढ़ना। कभी-कभी यह प्रक्रिया कई-कई बार दोहरानी पड़ जाती थी। जीवन में पहली बार जुगाड़ में यहीं बैठा था। मेरे लिए जुगाड़ की यात्रा बहुत थकावट भरी होती थी लेकिन जुगाड़ में मेरे जाने से मुझे बच्चों के साथ विद्यालय के बाहर उनकी अपनी उन्मुक्तता व सहज जीवंतता के साथ रहने को मिलता था। मेरे व बच्चों के मध्य विश्वसनीय व अपनत्व भरे रिश्ते बनते थे और बच्चे मेरे सामने उन्मुक्त होकर व्यवहार करते थे। 

    कई बच्चों को घर से निकलते ही भूख भी लगती थी तो वे जुगाड़ में ही अपना टिफिन खोलकर खाना भी खाने लगते थे। मैंने भी उनसे एक-दो कौर लेकर खाना शुरू कर दिया था। विद्यालय में भोजनावकाश होने पर मैंने बच्चों के टिफिन में से एक-दो कौर निकाल कर खाना शुरू कर दिया था। बच्चों को मेरे द्वारा उनके टिफिन से खाना खाया जाना बहुत अच्छा लगा। बच्चे मेरे लिए एक रोटी अतिरिक्त लाने लगे, इस तरह मेरे पास प्रतिदिन बहुत रोटियां हो जातीं थीं। इन्हीं रोटियों में से मैं उन बच्चों को खाना खिलाता जो किसी कारणवश टिफिन नहीं ला पाते थे। इससे दो फायदे हुए, दलितों सहित विभिन्न जाति व धर्मों के बच्चे एक दूसरे के टिफिन से खाना खाते, बच्चों से मेरे मित्रवत रिश्ते बनते। शिक्षक व शिक्षिकाएं भी बच्चों के साथ ही भोजन करेंगे ऐसा नियम बनाया, शुरू-शुरू में मेरे इस नियम का विरोध हुआ लेकिन बेहतर परिणामों को महसूस करके कुछ शिक्षिकाओं ने भी अपने घर से अतिरिक्त भोजन लाना शुरू कर दिया था और बच्चों के साथ अपना भोजन करने लगीं। शनिवार व रविवार को मुझे व डा० शीला डागा को बच्चों के अभिभावक व्यक्तिगत रूप से दूर दराज के गांवो से भोजन के आमंत्रित करते थे।

    मैंने बच्चों के साथ बिलकुल उन्हीं की तरह बच्चा बनकर उन्हीं के बनाए नियमों के तहत खेलना शुरू किया। शिक्षकों के द्वारा बच्चों  को डांटने व मारने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। धीरे-धीरे मैं छोटे शिशु से लेकर किशोर तक लगभग सभी बच्चों  का मित्र हो चुका था और इतना विश्वास प्राप्त कर चुका था कि वे मेरी बात पर अनुप्रयोग करने को तैयार हो चुके थे। विद्यालय में बच्चों व शिक्षक के मध्य का संबंध शिक्षा का मुख्य आधार होता है, यही संबंध सब कुछ तय करता है।

    बच्चों व शिक्षकों के साथ विश्वासपूर्ण संबंध बनते ही मैंने आमूलचूल परिवर्तन के लिए दस्तूरों से हटकर कुछ बड़े निर्णय लिए जैसे कि – 

    विद्यालय व कक्षा में बच्चे को अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी

    कक्षा में बच्चे अपना मनचाहा विषय पढ़ सकते थे। एक ही समय में एक ही कक्षा में बच्चे गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, चित्रकला आदि अपनी पसंद के अनुसार कोई भी विषय पढ़ सकते थे। एक शिक्षक पर्यवेक्षक की तरह कक्षा में रहता था। बच्चे को अपने विषय के लिए आवश्यकता होने पर या तो उस विषय के शिक्षक के पास जाने या यदि शिक्षक खाली है तो शिक्षक कक्षा में आता था। यदि किसी बच्चे की इच्छा कोई भी विषय पढ़ने की नहीं है तो उस बच्चे को कक्षा से बाहर जाकर खेलने कूदने की स्वतंत्रता थी। बच्चे की इच्छा होने पर वह कक्षा के में लेटकर पढ़ व सो भी सकता था। जिन कक्षाओं में यह प्रयोग मैने किया उनके बच्चों की गुणवत्ता व सीखने की क्षमता तेजी से बढ़ी। कभी-कभी कुछ विषयों जैसे कि अंग्रेजी, विज्ञान, गणित आदि के लिए कई कक्षाएं जैसे कि छठवीं, सातवीं, आठवीं व नौवीं कक्षाएं मिला दी जातीं थीं ताकि बच्चे एक दूसरे को सिखाते हुए सीख सकें और उनमें एक दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान व जिम्मेदारी के भाव विकसित हों। 

    परीक्षा प्रणाली में आमलचूल परिवर्तन

    मैंने हमेशा से महसूस किया है कि विद्यालयों में परीक्षा प्रणाली व पाठ्यक्रम का पूरा ढांचा ही गलत है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि गणित की परीक्षा है और दस प्रकार के नियम पढ़ाए गए। एक छात्र आठ प्रकार के नियमों को जानता है और दूसरा छात्र केवल दो प्रकार के नियमों को जानता है। परीक्षा में प्रश्न पत्र बनाने वाले शिक्षक ने यदि दो नियमों पर आधारित प्रश्न पत्र बना दिया तो जिसको आठ नियम आते हैं वह शून्य अंक पाएगा और जिसको केवल दो नियम आते हैं वह पूरे अंक पाएगा। ऐसी परीक्षा प्रणाली में जो बहुत योग्य है वह नाकारा साबित हो जाता है और जो कम योग्य है वह विशेषज्ञ साबित हो जाता है। 

    मैंने प्रत्येक विषय के प्रत्येक अध्याय/नियम को प्रश्न पत्र में स्थान दिलवाया। प्रत्येक नियम/अध्याय की लिखित परीक्षा करवानी शुरू की। प्रत्येक बच्चा खुद को और अपने सहपाठियों को हर नियम/अध्याय में ग्रेड देता था। मतलब यह कि बच्चा स्वयं व अपनी कक्षा के सहपाठियों का मूल्यांकन उस विषय के लिए करता। इससे बच्चों में एक दूसरे के प्रति स्वीकार्यता बढ़ी और वे एक दूसरे से/को सीखने व सिखाने लगे।

    बच्चा प्रत्येक विषय के शिक्षक की ग्रेडिंग करता था और विषय का शिक्षक बच्चे की ग्रेडिंग करता था। बच्चे व शिक्षक दोनों को ही यह मालूम पड़ता था कि वे एक दूसरे के बारे में क्या विचार रखते हैं? इस पद्धति ने बच्चे का शिक्षक और स्वयं के ऊपर विश्वास बढ़ाया। 

    यह पद्धति बच्चों को इतनी मजेदार लगी कि वे हर दूसरे दिन परीक्षा देने को तैयार रहते, कुछ बच्चे तो जिद करते कि परीक्षा आज ली जाए।

    ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवाना

    मैंने कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड का प्रयोग बंद करवा दिया था। मेरा तर्क था कि ब्लैकबोर्ड से पढ़ाई फेंककर दी जाती है, जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को लपक लेता है वह पढ़ जाता है जो बच्चा उस फेंकी हुई पढ़ाई को नहीं लपक पाता वह नहीं पढ़ पाता है। पढ़ाई बच्चे के हाथ में ठीक से सहेजकर पकड़ाई जानी चाहिए। शिक्षक को प्रत्येक बच्चे पर ध्यान देना होता था।  कक्षाओं में कुर्सी-मेज का प्रयोग भी बंद करवा दिया था।

    बच्चों को शिक्षक व आंतरिक प्रबंधक बनाना

    बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा के बच्चों को शिक्षक की तरह पढ़ाते थे। जिन बच्चों को जिस विषय में बेहतर जानकारी होती थी वे उस विषय को अपनी कक्षा या अपनी से ऊंची कक्षा के बच्चों को पढ़ाते थे। विद्यालय का आंतरिक प्रबंधन भी बच्चों को सौंपा गया, उनके द्वारा लिए गए निर्णय शिक्षकों को भी मानने होते थे।

    ……. आदि आदि कई अनुप्रयोग मैंने किये। 

    इन प्रयोगों के लिए मेरे मन में मनीषा शर्मा, रुपाली शर्मा, अजयवीर व डा० शीला डागा का विशेष स्थान है। इन लोगों ने कभी मेरा विरोध नहीं किया। सदैव सहयोग दिया।  विद्यालय में दो सत्ता-केंद्रों के होने के बावजूद कभी भी एक पल के लिए महसूस नहीं हुआ कि दो सत्ता-केंद्र हैं। डा० शीला डागा ने कभी अपने अहंकार को तवज्जो नहीं दी। वे बच्चों  व शिक्षिकाओं को प्रेम करतीं थीं और उनका विकास देखना चाहतीं थीं। उनके लिए या मेरे लिए एक छोटे से विद्यालय का प्रधानाचार्य या शिक्षाधिकारी होना एक तरह से अपनी पहचान खोकर ही समाज के लिए काम करना था। हम दोनो एक दूसरे के संपूरक की तरह काम करते थे। शिक्षा के मेरे अनुप्रयोगों में डा० शीला डागा सदैव साथ खड़ी रहीं। मेरे व संस्थापकों के बीच संघर्ष होने की स्थिति में बीच में ढाल की तरह खड़ी हो जाती थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर का प्रधानाचार्या के रूप में नाम ही उनके छोटे से विद्यालय को उस क्षेत्र में पहचान देता था, इसलिए डा० शीला डागा का नाम विद्यालय से जुड़े रहना संस्थापकों के लिए ताकत थी। 

    मेरा विद्यालय को छोड़ना

    मेरी इच्छा थी कि लगभग एक साल रह कर इस विद्यालय में शैक्षिक अनुप्रयोगों को स्थापित करके जाऊं। किंतु जैसा सामान्यतयः भारत में विकृतिपूर्ण मानसिकता है कि जो काम नहीं करते हैं उनको काम करने वालों की लोकप्रियता से असुविधा होती है और अहंकार में चोट पहुंचती है। यहां भी ऐसा ही हुआ, संस्थापकों को मेरे अनुप्रयोगों की सफलता व उपलब्धियों को देखने के बावजूद मेरे अनुप्रयोगो से असुविधा होने लगी। मैं सोचता था कि जब तक बच्चे, कुछ शिक्षक-शिक्षिकाओं व डा० शीला डागा साथ दे रहे हैं, संस्थापकों के द्वारा किए जा रहे अपमानों में ध्यान दिए बिना बच्चों  के विकास के लिए प्रयोग करते जाऊं। बच्चों का ही कुछ भला होगा, इनके माता-पिता की ही कुछ सोच बदल जाये। 

    मेरी एक आदत रही है, अब भी है कि मैं सामाजिक कामों को करते समय बिलकुल खुद को भूल कर काम करने लगता हूँ और अपने मान-अपमान व प्रतिष्ठा आदि की जरा सा भी परवाह नहीं करता। तो अधिकतर होता यह है कि बहुत लोग मेरे बारे में यह सोचने लगते हैं कि मेरी कोई विवशता है। ऐसे लोगों को यह लगता है कि आखिर कोई क्यूंकर किसी अनजान जगह जाकर, अनजान लोगों के लिए इतनी मेहनत से काम करेगा। ऐसे लोग जो सिर्फ पहचान, प्रतिष्ठा व सत्ता के लिए ही सामाजिक कामों का दिखावा करते हैं को यह समझ ही नही आता कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो निःस्वार्थ भाव से दूसरों के विकास में भारी असुविधाएं व अपमान झेलकर भी भागीदार बनने में आत्म-संतुष्टि की प्राप्ति करते हैं। 

    रात में विद्यालय में बच्चों  के बैठने की बेंचों को जोड़कर सोना, बिना एक रुपया वेतन लिए विद्यालय के लिए काम करना, सुबह चार बजे जगकर लकड़ी के पटरों को जोड़कर बनाए गए जुगाड़ में बैठकर बिना सड़कों वाले गांवों में जाकर बच्चों को विद्यालय लाना, बच्चों  के टिफिनों से दो-दो कौर रोटी लेकर अपने भोजन का इंतजाम करना आदि-आदि जैसे तौर-तरीकों को देखकर संस्थापकों के अंदर मेरे प्रति आदर भाव या प्रेम भाव जगने की बजाए मेरे प्रति उपेक्षा व तिरस्कार का भाव जगा। उनको यह लगा कि मैं इसी तरह की बेगार मजदूरी के ही लायक हूं, यही मेरा स्तर है। स्थितियाँ यहाँ तक पहुंची कि एक दिन मुझे अपने आपको वहां से अलग करना पड़ा। मेरे हटने के अगले ही दिन से मेरे सारे प्रयोग बंद कर दिए गए और विद्यालय को दूसरे स्कूलों की तरह बना दिया गया। यदि कोई बच्चा कभी यह कह देता कि विवेक सर बहुत अच्छे थे तो उसको दंड दिया जाता। अगले सत्र में बच्चों  की संख्या बहुत अधिक घटी और दो-तीन साल में ही विद्यालय बंद हो गया। जबकि मेरे निकलने के बाद विद्यालय में कई कमरे बने, विद्यालय का भवन दुमंजिला हुआ, अच्छे चमकदार शौचालय बने, खेलकूद के सामान आदि भी आये।

    मेरी जिद, अनुप्रयोगों को करते हुए संवाद-प्रक्रिया व असहयोगों के बावजूद हार न मानना आदि कारण रहे होगें कि बच्चों  के साथ-साथ संवेदनशील शिक्षकों को भी बहुत कुछ सीखने समझने को मिला इसीलिए आजतक मुझे प्रेमभाव से याद करते हैं। मुझे आज भी याद आता है, उस विद्यालय में मेरा अंतिम दिन जब तीन सौ से अधिक बच्चे व शिक्षक-शिक्षिकाओं घंटो रोए थे। बच्चों  व शिक्षको के परिवारों ने मेरे साथ पारिवारिक रिश्ते बनाए। उनमें से कुछ के परिवारों का अभिन्न भाग बन चुका हूँ। इन परिवारों के कारण मुझे यूँ लगता है जैसे बिलारी मेरी अपनी ही मातृभूमि है। जब भी बिलारी अपने इन सामाजिक परिवारों से मिलने जाता हूँ तो विद्यालय के संस्थापकों से भी औपचारिक मुलाकात करने जाता हूँ पता नहीं क्यों आज भी उनका व्यवहार उपेक्षा व अपमान से युक्त दिखावटी ही रहता है। संस्थापकों की पता नहीं कैसी मानसिकता व सोच है कि आज तक एक छोटी सी बात नहीं समझ पाए कि मैंने उनको दिया ही है, उनसे कुछ लिया नहीं। मेरे अहसान उन पर हैं, उनका कोई अहसान मुझ पर नहीं। उनको मेरे प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। यह मेरी विनम्रता व उदारता है कि मैं उनसे मिलने जाता हूँ।

    जब भी मैं इस विद्यालय के संदर्भ में अपने अनुप्रयोगों के बारे में सोचता हूँ तो यह पाता हूँ कि अयोग्य शिक्षकों व न्यूनतम संसाधनों के बावजूद विद्यालय को जिस मुकाम तक लाकर मैने खड़ा किया था। यदि शिक्षा की समझ संस्थापकों के पास होती तो यह विद्यालय बंद होने की बजाए आज देश में शिक्षा के प्रतिष्ठित माडलों में से एक होता।

    चलते-चलते

    जिस इलाके में यह विद्यालय था वहां किसी छात्र द्वारा विज्ञान वर्ग से दसवीं कम अंकों से भी पास कर लेना बड़ी बात मानी जाती थी। हमारे पढ़ाए हुए बच्चों ने कुछ महीनों के इन प्रयोगों से प्राप्त अपने आत्मविश्वास व सोच के दम पर कुछ वर्षों बाद दसवीं व बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में जिले स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त की। जब कुछ महीनों का रिश्ता बच्चों में इतना आत्मविश्वास व सोच पैदा कर सकता है तो यदि बच्चों को अच्छे शिक्षक मिल जायें तो बच्चे क्या नहीं कर सकते हैं। 

    मेरा बहुत ही दृढ़ता से मानना है कि किसी समाज या देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह देश या समाज अपने बच्चों से व्यवहार कैसा करता है, अपने बच्चों को शिक्षा कैसे देता है। मेरा यह भी मानना है कि शिक्षा बिना सुविधाओं के भी संभव है किंतु केवल सुविधाओं से शिक्षा संभव नहीं है। बहुत लोग रोज मैकाले की शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हैं किंतु उनकी खुद की अपनी समझ भी मैकाले शिक्षा पद्धति की अनुकूलता से बाहर की नहीं होती। 

    इस प्रयोग की विस्तृत चर्चा मेरी किताब “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” में की गई है। आप चाहें तो किताब भी पढ़ सकते हैं। किताब यहां से प्राप्त की जा सकती है – ‘मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • समाजवादी पार्टी वाले “समाजवादियों” के लिए

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    जब से उत्तर प्रदेश के चुनाव में समाजवादी पार्टी की पराजय हुई है तब से अधिकतर समाजवादी फेसबुक में आंय बांय सांय बोले जा रहे हैं। कोई अखिलेश यादव को दोष देता है, कोई अवसरवादी युवाओं व नेताओं को दोष देता है, कोई चाटुकारों को दोष देता है। आरोप प्रत्यारोप का संगम चल रहा है। मैंने सोचा कि मैं भी विचारक के रूप में अपनी खरी-खरी बात रख दूं भले ही मैं समाजवादी पार्टी का सदस्य नहीं हूं। इसी बहाने समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों की सहिष्णुता व अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य वाले मूल्य पर उनकी आस्था व समझ का भी कुछ आकलन हो जाएगा।

    आपको अटपटा लग रहा होगा कि मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादी क्यों लिख रहा हूं। वह इसलिए कि जैसे भारतीय वामपंथी पार्टी का होने का मतलब वामपंथ की समझ या वामपंथी होना नहीं होता, जैसे बहुजन समाज पार्टी का होने का मतलब बहुजन होना या बहुजन के प्रति प्रतिबद्ध होना नहीं होता जैसे भारतीय जनता पार्टी का होने का मतलब हिंदूत्व की समझ रखने वाला या हिंदू होना नही होता बिलकुल वैसे ही समाजवादी पार्टी का होने का मतलब समाजवादी होना नहीं होता। लेकिन चूंकि ऐसा माना जाता है, प्रचलन में आ गया है इसलिए मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों कह रहा हूं।

    आप लोगों की प्रतिक्रियाओं से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो आपको पराजय बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। आपमें से बहुत लोग यह कहते हैं कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार से कभी कुछ नहीं लिया। मेरा कहना है कि भले ही आपने पार्टी की सरकार से कुछ नहीं लिया हो लेकिन आपकी पार्टी की सरकार होना ही आपके अंदर मनोवैज्ञानिक आत्मविश्वास, प्रसन्नता व भावनात्मक आवेग आदि बनाए रखता है। इसलिए कौन कितना मलाई खाया, कौन कितना किसके चिपका रहा इत्यादि बातों का कोई विशेष मायने नहीं।

    मायने यह रखता है कि जो नुक्ताचीनी आप अब निकाल रहे हैं वह नुक्ताचीनी आपने पार्टी के सरकार में पांच साल रहते हुए क्यों नहीं की। मान लिया जाए कि आपने की भी तो पूरी शिद्दत से लगातार क्यों नहीं की। अपने भीतर गहराई में झांकिए, यदि थोड़ी सी भी दृष्टि होगी तो उत्तर आपको मिल जाएगा।

    मैं तो यही सुझाव दूंगा कि नुक्ताचीनी निकालना बंद कर दीजिए। जमीन पर उतरिए या जो जमीन पर उतरें हों उनके साथ बिना छल व धोखे व हिडेन-एजेंडे के साथ खड़े होइए बिना शर्त। यदि ऐसा न कर पाइए तो अपनी रोजी-रोटी पाइए, भविष्य में जब यदि कभी समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो फिर समाजवादी बन लीजिएगा। इतना करने में आखिर मुश्किल क्या है, कठिनाई कहां है। बहुत सरल है।

    Akhilesh Yadav

    आपमें से बहुत लोग सोशल मीडिया के माध्यम से अखिलेश यादव को यह बताने में लगे हैं कि उन्होंने किस पर विश्वास करके गलती किया, फलां किया ढिका किया वगैरह-वगैरह। दूर से आलोचना करना बहुत आसान है। लेकिन जब सत्ता हाथ में होती है तब लोगों व लोगों की मानसिकताओं को फिल्टर कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है। यह भी तो संभव है कि यदि आप अखिलेश यादव से चिपके होते तो आपका भी चरित्र सत्ता ग्लैमर के कारण वैसा ही हो गया होता जैसा कि उन लोगों का हुआ जिनके चिपकने को आप आज नाजायज ठहरा रहे हैं।

    चुनावी धींगामुस्ती में किसके क्या बयान थे, यह सब यदि छोड़कर ईमानदारी से बात की जाए तो यह मानना पड़ेगा कि अखिलेश यादव ने काम किया और काम करने का प्रयास किया। मैं समाजवादी पार्टी व उसके लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव की बात कर रहा हूं।

    यदि नाजायज लोगों के चिपके होने के बावजूद अखिलेश यादव बेहतर सोच रख पाते हैं, बेहतर काम करने के लिए प्रयास कर पाते हैं। तो इसका मतलब यह है कि उन पर किसी के चिपके होने का कोई खास अंतर नहीं पड़ता। राजनैतिक त्रुटियां किससे नहीं होती हैं। सभी से होती हैं। राजनीति में हार जीत चलती रहती है। राजनीति में हारना या जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि अपने नेता पर विश्वास रखना और हार में भी साथ खड़े रहना।

    यदि आपको यह लगता है कि हार के जिन कारणों का विश्लेषण आप कर पा रहे हैं वह अखिलेश नहीं कर पाने में सक्षम नहीं हैं। तब अखिलेश यादव को अपने नेता के रूप में मानने का मतलब ही क्या रहा जाता है। जमीनी कार्यकर्ताओं के बारे में समझ धक्के खाने, धोखे खाने के बाद आती है। जो नेता अपनी हार के कारणों का विश्लेषण न कर पाए। जो नेता अपनी हार से सीख न ले पाए। यदि आपकी दृष्टि में अखिलेश यादव हार के कारणों का विश्लेषण कर पाने में, हार से सीख ले पाने में सक्षम नहीं तो आपके द्वारा उनको नेता के रूप में स्वीकारने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

    ऐसा भी नहीं है कि आप पूरे प्रदेश के हर एक गांव की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। ऐसा भी नहीं है कि आपने जमीन में बहुत बड़े काम किए हैं, लोगों के लिए भीषण संघर्ष किए हैं, जिनके कारण आपमें विशिष्ट क्षमता आ गई है घर बैठे जमीनी कारणों व हकीकत को समझने का। आप सिर्फ तार्किक व आवेगात्मक कयास लगा रहे हैं जिसे आप हार के कारणों के विश्लेषण का नाम दे रहे हैं।

    मूलभूत प्रश्न यह है कि आप अपने स्तर पर भरपूर ऊर्जा के साथ पांच वर्षों तक क्या करते रहे? आपने लोगों की मानसिकता अपने स्तर पर विकसित क्यों नहीं की। घर में बैठे-बैठे पोस्ट-अपडेट करने को जमीनी संघर्ष व योगदान मानने की उथली मानसिकता से तो आप बाहर निकल नहीं पा रहे हैं, किंतु अखिलेश यादव को बताना चाहते हैं कि वे क्या करें या न करें। यदि आपको विश्वास है कि अखिलेश यादव ने लोगों के लिए बेहतर काम करने का प्रयास किया तो उन पर विश्वास कीजिए। उनके साथ खड़े होइए। यदि आपको लगता है कि अखिलेश ने कोई काम नहीं किया, तो ऐसे नेता के पीछे समय व ऊर्जा बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं।

    आप हार को इस रूप में भी तो देख सकते हैं कि अखिलेश को जमीनी हकीकत से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति उनकी दृष्टि व समझ अधिक स्पष्ट होगी। यदि आपको लगता है कि आप बेहतर हैं, आप अधिक सक्षम हैं तो आपको अपनी पार्टी की कमान संभालनी चाहिए। मेरी समझ में आपकी यह बात समझ न आ रही कि सत्ता में न रहने, लोगों के लिए जमीनी पर रहते हुए संघर्ष करने से इतनी बेचैनी क्यों?

    आप तो भाजपा की तरह प्रयोगधर्मी व इच्छाशक्ति के धनी भी नहीं हैं कि आडवाणी जी को किनारे लगाकर मोदी जी को ले आवें। बिना किसी का चेहरा आगे किए हुए लहलहाते हुए सत्ता प्राप्त कर लें और आदित्यनाथ जी को मुख्यमंत्री बना दें और कोई चूं तक न करे उल्टे शान में रुदालियों व भांटों की तरह कसीदें पढ़ना शुरू कर दें।

    भाजपा तो समाजवादी होने का दावा नहीं करती फिर भी उसके कार्यकर्ता बिना मुंह बिचकाए बिलकुल जमीन पर घिसटते हुए अपनी पार्टी का प्रचार करते हैं। समाजवादी पार्टी तो समाजवादियों की पार्टी है फिर कार्यकर्ताओं को जमीन पर घिसटते हुए पार्टी का प्रचार करने में क्या झिझक। सत्ता किसी भी पार्टी की हो, सत्ता से सटे हुए लोग कमोवेश वही होते हैं। इसलिए कौन सत्ता से कैसे सटा है, से नहीं, जमीनी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की लगातार की मेहनत से पार्टियां सत्ता तक पहुंचती हैं।

    खुलेमन से स्वीकारिए कि भाजपा ने मेहनत की, लोगों का माइंडसेट को अपने फेवर में करने में कामयाब रही। कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन लोगों को यह लगा कि समाजवादी यादवों की पार्टी है इसलिए अधिकतर पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी से दूर हो गईं। इस जमीनी तथ्य का अखिलेश यादव से कुछ लोग कितना सटे रहे से कोई मतलब नहीं। हां यह आपकी व्यक्तिगत खुन्नस का विषय जरूर हो सकता है। वैसी ही खुन्नस जैसी कि पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी के सत्ता पर आने से यादवों के व्यवहारों के कारण यादवों से रखने लगतीं हैं।

    यदि हो सके तो अपने स्तर पर समाजवादी पार्टी को मजबूत कीजिए। हर जाति के लोगों का दिल जीतिए। समाज के लोगों को लगे कि समाजवादी पार्टी उनकी अपनी पार्टी है। अब वे जमाने लद गए जब आपने बिना वास्तविक जमीनी आधार वाले किसी बेहूदे आदमी को उठाकर पद दे दिया और सोच लिया कि अब उस आदमी की जाति के सारे लोग लहालहा कर आपके साथ खड़े हो जाएंगें।

    भविष्य में विजय प्राप्त करना आसान नहीं। रगड़ना पड़ेगा खुद को, तपाना पड़ेगा खुद को, जमीन पर लोगों के बीच। वास्तविक जनाधार वाले नेताओं से डरिए नहीं, उनको साथ जोड़िए, तालमेल बनाइए, साझेदारी कीजिए, हिस्सेदारी दीजिए। हर स्तर पर साझा करना सीखिए, हर स्तर पर हिस्सेदारी देना सीखिए।

    यदि आपको लगता है कि आप सही हैं लेकिन आपका नेता अक्षम है, दृष्टिहीन है, कान का कच्चा है तो बदल दीजिए अपने नेता को। किंतु यदि आपको लगता है कि आपका नेता गुणी है तो उस पर विश्वास कीजिए, नुक्ताचीनी की बजाय उसके निर्णयों के साथ खड़े रहिए इस विश्वास के साथ कि आपका नेता भी कारणों का विश्लेषण करने में कम से कम उतना सक्षम है जितना कि आप हैं।

    चलते चलते एक बात बताना चाहता हूं, भाजपा आपके एजेंडे तय करती है। भाजपा जिस चुनावी रणनीति का प्रयोग आज करती है आप उस रणनीति का प्रयोग कल करते हैं जबकि भाजपा कल एक नई रणनीति के साथ चुनाव में अपना परचम लहरा रहा होती है। आपको भाजपा का अनुसरण करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा का प्रतिरोध करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा के एजेंडों के विरोध में अपने एजेंडे तय करने की जरूरत नहीं। ऐसा करके तो आप भाजपा को और अधिक मजबूत ही करते हैं।

    आप अपने एजेंडे खुद तय कीजिए जो आम लोगों के अपने एजेंडे हों। आप सत्ता में आएं या न आएं लेकिन एजेंडे अपने रखिए। भाजपा चुपचाप 10 साल सत्ता से बाहर रहकर भी अपने एजेंडे में काम करती रहती और एक दिन अचानक पूरे देश में कब्जा कर लेती है।

    धैर्य, रणनीति, जमीनी संगठन व प्रतिबद्ध कार्यकर्ता यह चार भाजपा के मूलभूत विजयी तत्व हैं। आप इन चारों में कमजोर हैं।

    पार कैसे लगेगा यह सोचने की बजाय आप तो आपसे में ही छीछालेदर करने में लिप्त हैं। अब मर्जी आपकी, आप मुझे चाहे गरिया लें या मेरी बातों पर मनन कर लें। आपकी अपनी समझ, आपकी अपनी खुशी।

    शुभकामनाओं सहित,

    सामाजिक यायावर

  • सूचना का अधिकार अौर भारतीय सामाजिक क्षेत्र का NGO कारपोरेट

    सामाजिक यायावर

    (यह लेख उन लोगों के लिये है जो कि सूचना के अधिकार तथा ब्युरोक्रेटिक एकाउंटेबिलिटी के लिये गंभीर हैं।   यदि अाप इस श्रेणी में अाते हैं तो इसे पढ़े अन्यथा इसे कतई ही ना पढ़ें अौर मुझे क्षमा करने की कृपा करें।)

    मेरा निवेदन है कि विभिन्न व्यक्तिगत अौर संस्थागत अाग्रहों को परे रख कर इस लेख को समझने का तथा परिष्कृत करने का प्रयास किया जाये, ताकि अभी भी जो सम्भावनायें शेष हैं उनको सहेज कर इस कानून को मजबूत किया जाये।

    यह लेख उत्तरी भारत के बड़ी जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी प्रदेशों के ऊपर अाधारित है।  RTI  का कानून एक अवसर था जिससे कि भारत की अाम जनता के हाथ में कुछ ठोस ताकत पहुंच सकती थी फिर धीरे-धीरे कालान्तर में एक बड़ा वास्तविक जनान्दोलन सरकारों की अाम जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में खड़ा किया जा सकता था।

    कारण जो भी रहा हो किंतु कांग्रेस की सरकार ने सूचना का अधिकार कानून लागू किया।  यदि कानून को ध्यान से देखा जाये तो यही लगता है कि कानून को दिखावटी रूप में नहीं बनाया गया।  यह कानून भारतीय संविधान के उन चंद कानूनों मे से एक था जिनसे भारत में लोकतंत्र के मूल्यों की संभावना बनती दिखती थी।

    भारत में राजनीति दलों अौर अफसरशाही ने कभी खुद को अाम जानता के प्रति जिम्मेदार नही माना  उल्टे जनता को अपना गुलाम मानते अा रहे हैं।    इसलिये कांग्रेस पार्टी इस कानून के लिये धन्यवाद की पात्र है।

    यह कानून अाम अादमी के लिये उसकी अपनी जरुरतों के लिये बना था।  मुझे अाज तक समझ नही अाया कि इस कानून को भारत की वास्तविक अाजादी के रुप में क्यों देखा जाने लगा?   यह एक ऐसा कानून है जो कि अाम अादमी की प्रताड़ना कुछ कम कर सकने में मदद कर सकता है, इससे अधिक अपेक्षा इस कानून से नहीं की जा सकती है।   अाम अादमी को सरकारी कार्यालायों में जाकर धक्के खाने की, अपमान झेलने की तथा बार-बार चक्कर लगाने जैसी प्रताड़नाअों से कुछ अाराम इस कानून से मिल सकता है।

    यह कानून कोई बहुत बड़ा या बहुत मजबूत कानून नही है जो कि व्यवस्था को ही बदल डालने की हिम्मत रखता हो।   व्यवस्था तो तब बदलती है जब अाम समाज उठ खड़ा होता है बदलाव के लिये वह भी स्वतः स्फूर्ति के साथ।

    सिर्फ कानून बनाने से सामाजिक परिवर्तन नहीं हुअा करते क्योकि जो सत्ता कानून बनाती है वही सत्ता अपने हितों के लिये कानून को बदल भी सकती है।

    चूंकि भारत के सामाजिक क्षेत्र में वास्तविक जनशक्ति रखने वाले लोग नहीं हैं इसलिये दिन प्रतिदिन अफसरशाही व सत्ता तंत्र अौर अधिक गैर जवाबदेह तथा बेलगाम होते जा रहे हैं।

    मैं उन अगंभीर अौर सतही लोगों की बात नहीं कर रहा जो कि फंड/ ग्रांट्स के दम पर धरना प्रदर्शन करने के लिये कुछ लोगों की भीड़ जमा करके मीडिया में बने रहने या सामाजिक ग्लैमर का भोग करने के लिये किसी ना किसी मुद्दे की खोज में लगे रहते हैं अौर हल्ला गुल्ला करते रहते हैं अौर खुद को जनशक्ति के रूप में प्रदर्शित करने के भ्रम को बनाये रखने में लगे रहते हैं।

    तो यदि इन लोगों के द्वारा बनाये भ्रम से अलग होकर देखा जाये तो एक अति भयावह बात साफ मालूम देती है कि भारत में वास्तविक जमीनी अौर दूरदर्शी स्वतः स्फूर्त जनान्दोलनों का अभाव है जो कि पूरी व्यवस्था को बदलने के लिये उत्पन्न हुये हों।

    अाजादी के बाद से साल दर साल भारतीय अाम अादमी अौर अाम समाज अौर कमजोर ही हुअा है अौर भारतीय व्यवस्था तंत्र अौर अधिक अमानवीय, असामाजिक तथा गैर जवाबदेह ही होता जा रहा है।   ऐसी कमजोर हालत में  RTI जैसे कानून को जिस गंभीरता अौर दूरदर्शिता से संभालते अौर मजबूत करते जाने की अहम जरूरत थी,  जिससे कि समय के साथ साथ धीरे धीरे इसी कानून से अौर भी बड़े तरीके विकसित करके सत्ता तंत्रों को अाम समाज के प्रति जिम्मेदार बनने को विवश करके लोकतंत्र अौर स्वतंत्रता के मूल्यों को संविधान के पन्नों में छापते रहने की बजाय यथार्थ जमीनी धरातल में जीवंत उतार कर ले अाया जाता।

    यदि अफसरशाही सूचना का अधिकार कानून को हतोत्साहित करती है तो यह कोई बड़ी बात नही क्योकि अाजादी के बाद से ही अफसरशाही ने जरुरत से अधिक अधिकार पाये अौर खुद को अाम जनता का मालिक माना अौर जनता को गुलाम, तो यदि अाज अाम जनता उनसे कुछ पूछे तो यह बात अफसरशाही को कैसे बर्दाश्त होगी।

    यदि नेता व अफसर लोग इस कानून को नुकसान पहुंचाते हैं या हतोत्साहित करते हैं तो यह कोई अचरज वाली बात नहीं क्योकि अाम जनता को मजबूत ना होने देना अौर खुद को अाम जनता का मालिक बनाये रखने के लिये हथकंडे अपनाना तो इन लोगों के मूल चरित्र में है।

    हमको तो यह देखना है कि हमारे बीच से  कोई क्षति तो नही हो रही है इस कानून को।   चार वर्ष का समय पर्याप्त समयावधि होती है,   इसलिये यह मूल्यांकन करने की जरुरत है कि पिछले चार सालों में इस कानून के नाम पर क्या हुअा !!    RTI जो कि एक सहज प्रक्रिया होनी चाहिये थी, धीरे-धीरे कठिन प्रक्रिया होती जा रही है।  क्यों होती जा रही हैं, अाईये कुछ इन कारणों को भी समझने का प्रयास करें। ——

    भारत में कुछ ऐसे बड़े सामाजिक लोग हैं  जिन्होनें RTI के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये प्रति वर्ष पाये हैं अौर अभी भी पा रहे हैं साथ ही मीडिया के ग्लैमर का मजा लगातार लेते अा रहे हैं, विदेश घूम फिर रहे हैं।  कुल जमा योग यह कि इन लोगों ने हर प्रकार का सहयोग प्राप्त किया।  तो इन लोगों से इतनी सामाजिक इमानदारी की अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे लोग अपने भीतर झांक के देखें कि वास्तव में उन्होनें RTI को मजबूत किया है या कमजोर।

    वास्तव में सूचना के अधिकार कानून को पूरा खिलने के पहले ही इन प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों ने बेजान बना दिया है, ये वही लोग हैं जिन्होने अपने अापको भारत के सामाजिक क्षेत्र में मसीहाअों के रूप में स्थापित कर रखा है।   ये लोग कितना भी हल्ला मचायें अौर सरकार को गलियायें किन्तु इस सच को झुठलाया नहीं जाया सकता कि भारत सरकार ने RTI का कानून लागू करने की इच्छा शक्ति दिखायी थी।

    समय के साथ RTI कानून की दुर्गति से यह अंदाजा तो लग ही गया है कि करोड़ों रुपये हर साल का फंड पाने वाले अौर ऐनकेन प्रकारेण मीडिया की सुर्खियों में बने रहने वाले इन सामाजिक  मसीहाअों की वास्तविक समझ कितनी है। मैं अमूमन इन लोगों को भारतीय सामाजिक क्षेत्र का कारपोरेट कहता हूं।

    RTI के विकास के नाम पर तो इनमें से कुछ ने तो अपनी संस्थाअों को बाकायदा प्रोफेशनल कंपनियों की तरह चला रखा है, करोड़ों रुपये का प्रपोजल बनाते हैं RTI में काम करने के लिये,  वेतनभोगी कर्मचारी रखते हैं जो कि RTI लगाते हैं अौर तंख्वाह पाते हैं, इन वेतनभोगी लोगों के बाकायदा स्थानांतरण होते हैं।

    इन लोगों से अाप पूछें RTI के बारे में तो इतनी रिपोर्टें अापको बता देंगें कि अापको ऐसा प्रतीत होने लगता है कि जहां भी ये लोग काम कर रहे हैं वहां पर सब कुछ RTI मय हो गया है अौर स्वराज की स्थापना हो गयी है।    यह लोग अापको बतायेंगें कि कैसे इन लोगों ने RTI लगाकर अौर दबाव बनाकर गरीबी की रेखा के नीचे वाले कार्ड बनवा दिये, कैसे पासपोर्ट बनवा दिया, कैसे भ्रष्टाचार बिलकुल खतम करवा दिया, इसी तरह के अौर भी बातें अापको बतायेगें।

    इन लोगों को 3000-15000 रुपया महीना या अौर भी अधिक तन्ख्वाह मिलती है RTI के काम के लिये,  पेपर, लिफाफा तथा डाक टिकट का खर्चा बिल दिखाने पर अलग से मिलता है।

    भारत की बहुसंख्य जनता के अधिकतर काम  100 से 500 रुपये की घूस रूपी सुविधाशुल्क देने से बन जातें हैं,  एक पासपोर्ट 1000 से 3000 रुपये की घूस से बन जाता है।    यदि विभिन्न प्रकार के कामों की अौसत घूस  300  रुपये भी मान ली जाये। तो प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या 3000 महीना पाने वाला हर महीना 10 काम करवा देता है RTI लगा कर या 15000 पाने वाला हर महीना 50 काम करवा देता है?

    यदि मान लिया जाये कि करवा भी देते हैं तब भी बात वही हुयी कि  काम करवाने में सुविधा-खर्चा उतना ही अाया अौर सुविधा खर्च अपरोक्ष रुप से देना ही पड़ा, क्योकि बाकी खर्चे जैसे पेपर, पेन, लिफाफा, डाकटिकट इत्यादि किस्म के मामूली खर्चे या तो अावेदक झेलता है या बिल लगाने पर अलग से पेमेँट होता है RTI के काम के लिये नियुक्त वेतनभोगी व्यक्ति को।

    प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि हर महीने इतने गरीब अावेदक क्या सच में ही लाइन लगा कर इन लोगों के पास अाते हैं?  RTI के कानून के अाधार पर एक महीना से दो महीना तक विभिन्न चरणों में लगता है उत्तर पाने में, समस्या का हल कब होगा या नहीं होगा या कैसे होगा यह बात निश्चित नहीं, जबकि घूस देने से तो काम होने की गारंटी रहती है।

    प्रश्न यह भी खड़ा होता है क्या RTI का कानून NGOs में रोजगार पैदा करने के लिये बनाया गया था या अाम अादमी को मजबूत करने के लिये बनाया गया था?     

    लाखों-करोड़ों रुपये का फंड मिलता रहे इसलिये समय समय पर कोई भी छोटा या बड़ा मुद्दा बना कर धरना प्रदर्शन करना या सेमिनार जैसा कुछ कर देना या प्रेस कान्फेरेन्स कर देना जैसा कुछ करके दिखाते रहते हैं जिससे कि यह लगता रहे कि RTI कानून को मजबूत करने के लिये संघर्ष जारी है, अब चूंकि वेतनभोगी लोगों को वेतन इन्ही बड़े सामाजिक लोगों के ही जुगाड़ों से मिलता है इसलिये कोई अाये या ना अाये किंतु वेतनभोगी लोग अौर भविष्य में वेतनभोगी बनने की लालसा वाले लोग तो जरूर ही पहुंच जाते हैं।

    इस तरह के तरीकों से बड़े फंड का जुगाड़ भले ही बनता हो, कुछ पुरस्कारों का जुगाड़ बन जाता हो, मीडिया के ग्लैमर का भी अानंद लिया जा सकता हो, किंतु जमीनी यथार्थ में तो अाम अादमी अौर सुचना का अधिकार दोनों ही अौर कमजोर होते जाते हैं।

    उत्तर प्रदेश के एक बड़े सामाजिक सेलेब्रिटी  जिनको कि RTI के कामों का बड़ा पुरोधा माना जाता है अौर इनको अमेरिका के भारतीय मूल के लोगों से करोड़ों रुपये का फंड RTI के कामों के लिये दिया जा रहा है। यह महोदय RTI के लिये इतने प्रतिष्ठित हैं कि जिसके उपर हाथ रख देते हैं उसको RTI का विशेषज्ञ मान लिया जाता है, जिसको कह देते हैं उसको खराब अौर भ्रष्ट मान लिया जाता है।

    इन्ही सेलेब्रिटी महोदय के कुछ मुख्य कार्यकर्ता लोगों ने ग्राम स्तर के तथा ब्लाक स्तर के जन प्रतिनिधियों से इस बात पर पैसे लेने शुरु किये कि ये लोग उन लोगों पर RTI नही लगायेगें।    इन सामाजिक सेलीब्रिटी महोदय ने खुद की सूडो इमानदारी व सूडो पारदर्शिता दिखाते हुये खुद अपने ही कार्यकर्ताअों के उपर खुद ही लेख लिख कर पाकसाफ साबित करने का प्रयास किया, लेख भी कुछ इस प्रकार की शैली से लिखे गये कि लेख पढ़ने से ऐसा लगता है कि जैसे इन सेलेब्रिटी महोदय का कार्यकर्ताअों से कोई संबंध नही है बल्कि इनकी खोजी पत्रकारिता की देन है।

    इन्ही सेलिब्रिटी महोदय ने अपने एक चहेते कार्यकर्ता को एक बड़े जिले में RTI के काम करने वाले के रूप में कैसे स्थापित किया इसको भी देखा जाये,  इन महोदय नें उस जिले में खूब प्रेस कान्फरेन्सेस की ंअौर अपने चहेते को मीडिया में स्थापित किया, एक छोटे से धरने को विदेश के एक अखबार में अपनें संपर्कों का प्रयोग करवाते हुये छपवाया, ताकि क्षेत्रीय प्रशासन अौर अाम अादमी को लगे कि इनके चहेते जी बहुत बड़े अादमी हैं इसलिये यदि वह RTI लगायें तो डरा जाये अौर RTI का जवाब दिया जाये।

    कुछ लोगों को RTI के कामों के लिये वेतनभोगी कर्मचारी भी बनाया गया, जिनका कि प्रयोग धरना प्रदर्शन अौर प्रेस कान्फेरेन्सेस अादि करने में किया जाता है।

    हो सकता हो इस प्रकार की चोचले बाजियों से फंड का जुगाड़ या खुद को महापुरुष सिद्ध करके पुरस्कारों की लॅाबिंग का जुगाड़ बनता हो, किंतु अाम अादमी अौर अाम समाज को मजबूत नही हो पाता।  क्योकि अाम अादमी के पास कोई तंख्वाह नही होती, कोई सेलेब्रिटी पीछे नहीं होता, कोई रिश्तेदार विदेश नहीं में रहता जिससे कि छोटी बात को बहुत बड़ी बात बना कर किसी विदेशी अखबार में छपवाया जा सके।  

    यही कारण है कि इतने विश्वास, इतने संसाधन, धन तथा मानवीय संसाधनों का प्रयोग करने के बावजूद ये लोग RTI को अाम अादमी के लिये मजबूत क्यों नही कर पाये।

    इन्हीं महोदय के एक अौर कार्यकर्ता हैं जिनका कि लगभग दो साल पहले सन् 2007 में मुझसे अाक्रामक रूप में कहा था कि उन्होनें RTI लगाकर लगाकर अपनें जिले को अादर्श-जिला बना दिया है।    उनका दावा था कि अब उनके जिले में स्वराज अा चुका है अौर यह उनकी मेहनत अौर RTI लगानें के कारण हुअा है।

    NGO प्रायोजित कथित-यथार्थों के लिये जमीनी यथार्थ महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि इनके द्वारा प्राप्त किये जाने वाले लाखों करोड़ों रुपये सालाना  के फंड का जस्टीफिकेशन अधिक महत्वपूर्ण होता है, प्रायोजन महत्वपूर्ण होता है।

    इन सब बातों से RTI कमजोर हुअा है अौर ऐसे बहुत लोग बहुत हतोत्साहित हुये हैं जिन्होनें RTI को पैसे कमाने या मीडिया के ग्लैमर का मजा लेने या फंड का जुगाड़ नहीं माना बल्कि एक अाम अादमी की हैसियत से RTI को मजबूत करने का प्रयास करनें की भावना के साथ अपनें दम भर प्रयास करनें की प्रतिबद्धता में जीते रहे।

    NGO जगत के बड़े प्रोफेशनल लोगों तथा इनके वेतनभोगी लोगों के कारण RTI कानून कैसे कमजोर होता जा रहा है, अाईये इस पर चर्चा किया जाये।   —

    इन लोगों के कारण सूचना का अधिकार एक बड़ा हव्वा बन गया है, अाम अादमी सोचने लगा है कि सूचना का अधिकार लगाने के लिये धरना करना, प्रदर्शन करना, प्रेस कान्फेरेन्स करना या किसी बड़े अादमी का बैकअप होना बहुत जरूरी है।

    जिन लोगों को तन्ख्वाहें मिलती हैं तथा मीडिया का ग्लैमर का भोग लगाने को मिलता हो, वे लोग यह क्यों चाहेगे कि सूचना का अधिकार कानून अाम अादमी के लिये सहज उपलब्ध हो जाये।   चूंकि पिछले चार सालों में अधिकतर अावेदन इन जैसे वेतनभोगी व सामाजिक प्रोफेशनल लोगों के द्वारा ही दिये गये हैं इसलिये यह मानकर कि सभी लोग RTI के विशेषज्ञ हो चुके हैं, फार्म भरने जैसे नियम बनाकर या अावेदन फीस बढ़ाने का काम सरकारी विभागों द्रारा किया जा रहा है। 

    भारत की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ऐसा है जो कि लिखना पढ़ना नही जानता है तो फार्म भरने की बात सुनकर ही कांपने लगते हैं, फार्म भरने की प्रक्रिया होने से अधिकारियों को बैठे बिठाये अावेदन को निरस्त करने का अधिकार मिल जाता है क्योकि फार्म सही तरीके से नही भरा गया।

    कुछ राज्य सरकारें सूचना के अधिकार को कमजोर करना चाहती हैं तो फिर हो हल्ला मचाया जाता है, किंतु क्या कभी इन अति प्रतिष्ठित सामाजिक सेलेब्रिटियों द्वारा खुद का अोढ़ी हुयी सूडो ईमानदारी से ऊपर ऊठ कर मूल्यांकन किया जाता है कि इस कानून को कमजोर करने में उनका अपना खुद का कितना हाथ है?

    लेख के अंत में एक गंभीर घटना का उल्लेख करना चाहता हूं।

    तकरीबन 3 साल पहले सन् 2006 में मुझे IIT Bombay में कुछ अधिक पढ़े लिखे लोगों ने इस बात पर RTI पर शैलेष गांधी जी के सेमिनार में घुसने से रोक दिया था क्योकि मेरा यह कहना था कि सूचना का अधिकार एक सहयोगी अौर अपूर्ण कानून है, बाद में इस शर्त में घुसने दिया था कि यदि शैलेष जी कहेंगे तो भी मैं कुछ नहीं बोलुंगा बाकी लोगों को सक्रिय भागीदारी करनी थी किंतु मुझे केवल सुनना था।

    शैलेष जी ने अपनी बात की शुरुअात ही इस बात से की थी कि भारत के लोगों को अाजादी के समय स्वराज नहीं मिला था किंतु इस कानून के अाने से हमें स्वराज मिल गया है अौर हम सभी को स्वराज का अानंद लेना चाहिये।   मैं पूरे सेमिनार में कुछ नहीं बोला था किंतु मैं उनकी स्वराज वाली बात से सहमत नहीं था।

    अाज वही शैलेष जी जो कि RTI कानून को स्वराज का अाना कहते थे, अाज खुद सूचना अायोग के सर्वोच्च पदों में से अासीन है, तो अाज मैं उनसे पूछना चाहुंगा कि क्या सच में ही RTI कानून बनने से अाम समाज स्वराज का भोग कर रहा है?   यदि शैलेष जी कहेंगें कि अाम अादमी स्वराज का अानंद ले रहा है, तो मैं यह समझूंगा कि उनको भारतीय अाम अादमी कि जमीनी हकीकत की ठोस जानकारी नहीं है, हो सकता है कि शैलेष जी को स्वराज मिल चुका हो किंतु असली भारत तो अभी भी असली अाजादी की बाट जोह रहा है जो कि दिन प्रतिदिन अौर भी दूर होती जा रही है।

    भारत की जनसंख्या के बहुत बड़े भाग ने Internet के प्रयोग की बात तो दूर कभी Computer नहीं देखा है।  जो बहुत छोटा भाग Internet का प्रयोग भी करता है उसका भी बहुत ही छोटा भाग ऐसा है जो कि Internet में क्रान्तिकारिता की बात करता है, इनमें से भी अधिकतर लोग वे हैं जो कि ऊंचे वेतन देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करते हैं। तो इस अानलाईन क्रान्तिकारिता में कितनी ठोस व यथार्थ दम हो सकता है असली भारत के सामाजिक परिवर्तन के लिये इसका अांकलन सहजता से किया जा सकता है।

    इस बिंदु को समाप्त करने के पहले यह भी बताना चाहता हूं कि मुझे कोई ताज्जुब नही हुअा था कि सूचना के अधिकार के सेमिनार में एक अादमी को बोलने से मना किया गया था, किंतु यह अनुमान जरुर ही हो गया था कि भारतीय समाज का ऊंची डिग्री धारी अौर MNC में नौकरी करने वाला युवा वर्ग यही सोचता है कि समाज को समझना व सामाजिक परिवर्तन से बहुत अधिक कठिन है किताबी सवालों को हल करके डिग्री पाना अौर अधिक पैसे की नौकरी करना।

    यही सोच इस वर्ग के अंदर अहंकार अौर भ्रम पैदा करती है कि वे ही सबसे बेहतर समझते हैं अौर उनके पैसों के दम पर ही सामाजिक बदलाव संभव है।

    इस वर्ग के कुछ लोग घर बैठे क्रान्तिकारी बनने के लिये भले ही Internet में Online Groups में कुछ लिखा पढ़ी करना शुरु कर दिये कि यह कानून बहुत अच्छा है वास्तविक अाजादी दिलाने वाला है वगैरह वगैरह, किंतु इनमें से कितने लोगों ने खुद कितनी गंभीरता से RTI का प्रयोग किया है जबकि इस कानून का प्रयोग घर बैठे कोई भी कर सकता है,  यह बहुत ही अावश्यक प्रश्न है।

    बहुत लोग कहीं से Forward हुयी मेल पाकर उसी को फिर अागे Forward करने को ही बहुत बड़ी क्रान्तिकारिता के रूप में लेते हैं या अाजकल अानलाईन पिटीशन्स रूपी क्रान्तिकारी होने अौर सक्रिय जागरूक होने का नया फैशन चला है तो उसमें अपना नाम लिख कर लोग खुद को क्रान्तिकारी या सक्रिय होने का शौक पूरा कर लेते हैं अौर अंदर के अहंकार को पोषित कर लेते हैं।

    अब ई-मेल्स कब तक अौर कितनी बार फारवर्ड की जा सकती हैं, कितनी वेबसाइट्स में अानलाईन पिटीशन बनाये जा सकते हैं?  तो इस प्रकार की क्रान्तिकारिता जो कि कुछ समय तक RTI के कानून के लिये हुयी अौर समय के साथ धीरे-धीरे खतम भी हो गयी।

    अब कुछ नये मुद्दे अा गये हैं अानलाईन क्रान्तिकारिता के बाजार में, कुछ समय बाद कुछ अौर नये मुद्दे अायेंगें, लोग क्रान्तिकारी बनते रहेंगे अौर भारत की अधिकतर अाबादी शोषण अौर गुलामी भोगती रहेगी।  यही नियति बन चुकी है अब भारत के अाम अादमी अौर अाम समाज की।  जय़ हिंद।