संतुलन

Hayat Singh यह क्षोभ, विमोह, हताशा और निराशा दिन-महीने या साल विशेष से नहीं, बल्कि कई दशकों से पल रही असन्तुष्टियों का उबाल थी यह बात ज्ञात भी सभी को थी, लेकिन अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार कोई साइकिल में सवार था कोई हाथी में कोई नुक्कड़ के खोखे पर लड़ा रहा था पंजा राष्टीय से अंतर्राष्टीय की होड़ में गाँव-गुठार को भूल गए मार्क्स-लेनिन की रट के चलते गाँधी-अम्बेडकर से… Continue reading

यह सब एक दिन में नहीं हुआ

हयात सिंह यह सब एक दिन में नहीं हुआ अनगिनत सूर्योदय और सूर्यास्त गवाह बने और मिट गए नाटक का पर्दा उठने और गिरने में समय लगता हो भले चंद सेकण्ड का मगर मंचन घंटों चलता है मंचन के लिए कथा और कथानक को तो और भी अधिक कई बार बरसों लग जाते हैं एक आम दर्शक पर्दा उठने और गिरने के सिवा कहाँ कुछ सहेज पाता है स्मृति में… Continue reading