प्यारी बर्फ़ तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो

Dharamraj Singh कहो धूपमैं हूँ जमी बर्फ़ठंडी पत्थर सीऊब गई हूँ बिना हिले डुलेछुपी लुकाई अपनी ही खोह मेंतुम छितराए हो दूर दूर तकक्या कोई जीने का और ढंग हैएक रंग भर जाना मैंनेक्या मेरा कोई और रंग हैघेरे रहती मुझको मृत सी चुप्पीक्या मेरे कंठ में भी छुपा कोई राग हैक्षण भर को भी होता क्या खिलना कोईकिसी स्वाद का इतरानाप्राणों सा उतरना किसी मेंकिसी हृदय को छका पानाकहो… Continue reading